बुधवार, 20 जून 2007

ये जीवन तो यूं ही बीता
आस निरास मैं सब कुछ रीता
कुछ सपने कुछ अरमान
इन्हीं उम्मीदों पर जीता इन्सान

मैंने भी देखे थे कुछ सपने
हो ना सके वो मेरे अपने
अथक प्रयास घोर प्रतायासा
हो ना सकी पूरी आशा

सोमवार, 18 जून 2007

ओगा बोगा दोगा

सबको चकमा देकर एक रातमैं किसी स्वपन की पीठ पर बैठ कर उड़ जाऊँगा।
हैरत में डाल दूँगा सारी दुनिया कोसब पूछते बैठेंगे ?
कइसे उड़ गया ?क्यों उड़ गया ?
तंग आ गया हूँ मैं हर पल नष्ट हो जाने कीआशंका से भरी इस दुनिया सेऔर भी ढेर तमाम जगह हैं इस ब्रह्मांड मेंमैं किसी भी दूसरे ग्रह पर जाकर बस जाऊँगामैं तो कभी का उड़ गया होताचाय की गुमटियों और ढाबों पर गरम होते तंदूर परसिकती रोटियों के लालच में हिलगा रहा इतने दिनट्रक ड्राइवरों से बतियाते हुएमैदान में पड़ी खटियों परगुजार दीं मैंने इतनी रातेंक्या यह सुनने को बैठा रहूँ धरती परकि पालक मत खाओ ! मैथी मत खाओ !मत खाओ हरी सब्जियाँमैं सारे स्वपनों को गूँथ-गूँथकरएक खूब लम्बी नसैनी बनाऊँगाऔर सारे भले लोगों को ऊपर चढ़ाकरहटा लूँगा नसैनीऊपर किसी ग्रह पर बैठ करठेंगा दिखाऊँगा मैं सारे दुष्टों कोकर डालो कर डालो जैसे करना हो नष्टइस दुनिया कोमैं वहीं उगाऊँगा हरी सब्जियाँ औरतंदूर लगाऊँगा।देखना एक रातमैं सचमुच उड़ जाऊँगा।