Sunday, June 15, 2008

इटली यात्रा प्रथम भाग




एक थका देने वाला दिन वीजा कि भाग दौड़ के साथ शुरू हुआ यात्रा का सिलसिला यूं तो दिल्ली का मौसम मेरी यात्रा के वक्त काफी सुहाना हो गया था और सोने पर सुहागा किया मेरे पुराने मित्र सौगत और अविनाश के साथ ने .रात ग्यारह बजे अविनाश ने मुझे दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तर राष्ट्रीय पर छोडा और मैं मन में कई शंकाएँ और उमंगों के साथ एयर पोर्ट के अंदर प्रवेश किया .ये कहना कि सब बड़ा आसान था और मैं काफी रोमांचित था झूठ लिखने जैसा होगा यात्रा के पहले की कागजी औपचारिकताओं ने मुझे परेशान कर दिया था । उसके बाद दुनिया के एक ऐसे देश की यात्रा जिसका जिक्र या तो बचपन में इतिहास की किताबों में गैरीबाल्डी  , मैजिनी या कैवूर के किस्सों में ही पढ़ा था या बड़े होने पर सोनिया गाँधी के देश के नाते इतना ही परिचय था मेरा इटली से लेकिन एक दिन अचानक अपने आप को उस देश में महसूस करना जहाँ मुझे एक ओर रोमांचित कर रहा था वहीं दूसरी ओर मैं अंदर से डरा हुआ भी था और जो स्वाभाविक भी है क्योंकि डर सबको लगता है और गला भी सबका सूखता है मन में एक सपने के सच होने की खुशी भी थी कि मैं दुनिया और जिन्दगी को करीब से देख सकता हूँ वही मन के किसी कोने में एक डर भी था डर मुझे पेरिस से था वो डर क्यों था उसका जिक्र में आगे करूँगा ।
रात के १२.४० पर एयर फ्रांस की उड़ान ने दिल्ली से पेरिस का सफर शुरू किया रात काफी हो चुकी थी लेकिन सफर में मुझे नींद कम ही आती है मैंने एक फ़िल्म देखनी शुरू की तभी एयर होस्टेस खाने की प्लेट लेकर मेरे सामने खडी थी रात के दो बजे आप क्या खा सकते हैं ? लेकिन एयर फ्रांस का नियम यह है की वे अपने स्थानीय समय के हिसाब से खाने और नाश्ते का पर्बंध करते हैं गो की फ्रांस में उस वक्त रात के ९.३० बज रहे थे मैंने कुछ जूस पी कर अपने टिकट के पैसे वसूलने की कोशिश की लेकिन प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया. फ्रांस के स्थानीय समय सुबह के ६ बजे और भारत के स्थानीय समय दिन के ९.३० बजे हमारा विमान पाकिस्तान अफगानिस्तान , इरान जर्मनी होते हुए पेरिस के चार्ल्स दी गौल एअरपोर्ट पर उतरा मौसम खुशगवार था यूरोप की सरज़मीन पर मेरा स्वागत सर्द हवाओं ने किया , वो सुबह काफी सुहानी थी . अब मेरे डर का सच सामने आने वाला था मुझे बताया गया था की पेरिस में अंग्रेजी बोलने वालों को पसंद नहीं किया जाता है .पेरिस से मुझे बोलोना की दूसरी फ्लाईट पकड़नी थी और समय कम था पेरिस का चलेस दी गौल एअरपोर्ट दुनिया के कुछ बड़े एअरपोर्ट में से एक है. एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल में जाने के लिए काफी वक्त के जरुरत होती है ऐसे में मेरा डरना लाजिमी था आधे घंटे तक रस्ते में आने वाले हर शख्स से में टर्मिनल २ डी का रास्ता पूछता रहा और कोई भी मुझे सही रास्ता नहीं बता पा रहा था न तो मैं किसी के बात समझ पा रहा था और न ही कोई मेरी झुन्झुलाहत में मैं एअरपोर्ट से बाहर आ गया एक बस वाले से मैंने मदद मांगी उसने अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में मुझे टर्मिनल २ डी का रास्ता बताया मैं किसी तरह टर्मिनल २ डी तक पहुँचा. मेरे हुलिए के कारण (दाढी) सिक्यूरिटी चेक पर मेरी दो बार जांच की गयी. खैर ये भी जिन्दगी का हिस्सा है मेरी सारी जल्दबाजी बेकार गयी क्योंकि बोलोना जाने वाली फ्लाईट आधे घंटे लेट थी . भारतीय समय के अनुसार मैं शाम के ४.३० बजे बोलोना एअरपोर्ट पर उतरा जहाँ बोलोना विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि मेरा इंतज़ार कर रहे थे. एअरपोर्ट से मैं सीधे अपने होटल पहुँचा जो बोलोना विश्वविद्यालया से एक दम करीब था और शहर के एकदम बीचों बीच स्थित था. शाम के समय मुझे बोलोना के अंतर्राष्ट्रीय संगीत संग्रहालय ले जाया गया यह संग्रहालय लगभग ५०० वर्ष पुराना था. जहाँ संगीत से संबंधित सैकडो वर्ष पुरानी पांडूलिपियाँ और वाद्य यन्त्र सुरक्षित हैं .बोलोना आने वाले सैलानियों को हिदायत है की वे यहाँ के संग्रहालयों में सामान्य परिधान में ही प्रवेश ले सकते हैं. पहले दिन मैं सूरज ढलने का इंतज़ार करता रहा पर रौशनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी .मुझे बताया गया की यहाँ सामान्यता रात के १० बजे रात होती है. शायद यही कारण की हमारे फ़िल्म निर्माता यूरोप में शूटिंग करने को बेताब रहते हैं क्योंकि वे कम समय मैं ज्यादा  काम कर सकते हैं . बोलोना का मौसम काफी सुहाना था सुबह और शाम अच्छी ठंड पड़ती है हालांकि अभी वहाँ गर्मियों का मौसम चल रहा है फ़िर भी हवा में नमी रहती है मैं जितने दिन भी रहा एकाध दिन छोड़ कर सामान्यता रोज बारिश होती थी. पहले ही दिन मुझे इस बात का एहसास हो गया था की इटली के लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति पर बहुत गर्व है पूरे बोलोना शहर में मुझे एक या दो साईन बोर्ड ही अंग्रेजी में दिखे. एक समस्या अभी आनी बाकी थी वो थी खाने की चूँकि मैं दिल्ली से आधी रात को उड़ा था इसलिए खाना खा के ही चला था दिन में सफर की थकन और तनाव के कारण कुछ नहीं खाया गया. लेकिन शाम को जब सूअर के मांस के साथ तरह तरह के पकवानों के साथ मेरा सामना हुआ तो मेरी हालत विचित्र थी हालांकि मैं मांसाहारी हूँ और मेरा मानना है की मांस , मांस है चाहे वो किसी का भी हो अगर आप मांस खाते हैं तो मांस में भेद मत कीजिये किंतु बोलोना में समस्या यह थी की वो उबले हुए मांस के टुकडे थे जिन्हें चीज के साथ सभी बड़े चाव के साथ खा रहे थे बगैर मसाले के मैंने कभी भोजन की कल्पना ही नहीं की थी फ़िर भी कुछ टुकड़े मैंने खाने की कोशिश की आख़िर पापी पेट का सवाल था |
पहला दिन इस एहसास में खत्म हो गया कि मैं विदेश में हूँ वही धरती वही आसमान पर ये भारत नहीं था |यह एक साफ़ सुथरी दुनिया थी जो भारत से कई मामलों में अलग थी |मैं पुरे दिन हिन्दी बगैर बोले रहा और यह एहसास मेरे लिए एकदम नया था हालांकि मैं बोल रहा था पर अपनी मात् भाषा नहीं बल्कि अंग्रजी ,भाषा को लेकर इटली में भी समस्या थी यहाँ ज्यादातर लोग अंगरेजी नहीं बोलते हैं लेकिन किसी तरह मैंने काम चलाना सीख लिया मुझे अगले सात दिन इसी मुल्क में गुजारने थे |


14 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

आपका काम आकर्षक है, ब्लोग जगत मैं आपके स्वागत के साथ एक प्रार्थना भी है की कृपया ब्लोग शीर्षक, अपना परिचय आदि भी हिन्दी में लिखें..

हाँ, वर्ड वेरीफिकेशन भी हटा लें, शुभकामनायें

अनूप शुक्ल said...

सही है। संस्मरण आगे भी लिखते रहें।

Rahul said...

sahi hai lage rahiye ..upcb bhai log

Amit K. Sagar said...

यात्रा संस्मरण को पढ़ना मतलब आधी यात्रा करीने जैसा भी है. बहुत खूब. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
---
उल्टा तीर

anil.verma@voitv.in said...

mukul sir,
blog ki duniya me aapka swagat hai.
sir, aapko pata nahi mai yyd hun ya nahi lekin maine aapke blog per aapki photo dekhte hi aapko pehchhan lia. sir mai anil kumar verma, jise aapne purvanchal university me kabhi siksha di thi. is samay mai voice of india news channel me kam kar raha hun. maine etv sansthan ko alvida keh dia hai.sir aapka blog padha. bahut accha laga.mere blog per bhi jaaiega aur apne amulya sujhav deejiyega.mujhe intzaar rahega.

samvedna said...

mukul sir,
blog ki duniya me aapka swagat hai.
sir, aapko pata nahi mai yyd hun ya nahi lekin maine aapke blog per aapki photo dekhte hi aapko pehchhan lia. sir mai anil kumar verma, jise aapne purvanchal university me kabhi siksha di thi. is samay mai voice of india news channel me kam kar raha hun. maine etv sansthan ko alvida keh dia hai.sir aapka blog padha. bahut accha laga.mere blog per bhi jaaiega aur apne amulya sujhav deejiyega.mujhe intzaar rahega.

free to express said...

sir..itne acche blog padne ke badh shyaad hi koi allfaaz bachte hai.. bas is waqt itna hi keh sakte hui ki apna blog aur Italy ki yatra ka pura details zaldi hi update kare!! Yeh post padhne ke baad mujhe cheten bhagat ki writing style yaad aa gaye!!

अनिल कुमार वर्मा said...

मुकुल सर,

आपका ब्लाग देखा। आपको एक बार फिर पढ़ना काफी सुखद लगा। पूर्वांचल विश्व विद्यालय में दो साल आपसे काफी कुछ सीखने को मिला। अपने पांच साल के पत्रकारिता के कैरियर में आपसे सीखा हुआ काफी कुछ काम आया। आप सोच रहे होंगे आखिर मैं हूं कौन। सर मैं अनिल कुमार वर्मा। अब शायद आप पहचान गए होंगे। सर आपके ब्लाग के ज़रिए हमने भी इटली की सैर कर ली। चलिए अच्छा है अब आपको लगातार पढ़ने का मौका मिलेगा। सर मैनें भी अपना ब्लाग बनाया है। कभी फुरसत निकालकर उसकी सैर भी करिएगा। आपके मार्गदर्शन का इंतजार रहेगा।

अनिल कुमार वर्मा said...

मुकुल सर,
अपने ब्लॉग पर आपकी टिप्पणी पढ़ी। यकीन मानिए बहुत अच्छा लगा। आपने पूछा है कि मैं आपके ब्लाग तक कैसे पहुंचा। दरअसल सर मुझे आपको ब्लाग का एड्रेस चिठ्ठाजगत के ज़रिए प्राप्त हुआ था। सर इसी तरह से मेरा हौंसला बढ़ाते रहिएगा, आप लोगों का आशीर्वाद हिम्मत बंधाता है।

kranti ki patrakarita said...

blog sapno ko sach mai baya karne ka ek kubsurat medium hai. abhi to aap ko bahut door jana hai.abhi to yeh surwat hai.

Priya said...

hello sir,

really sir i saw italy through your blog...as your writeup is so powerful that it made me feel the things...


i can understand how though /exciting it would have been to be in some other country about which we just read or heard things in history, and that to all alone n which as every thing contrary to our country(lang,food,culture,people etc...)


but you did a great job sir n and really true sir "paapi pet ke liye kya kuch nahi karna padta...but its too a necessity of life...so it should not be cared much...


thank's a lot that you wrote all the incidents on ur blog for us to read....its actually fun to read all this...
i just wish, you have such wondrous trips ahead in your life n i know you surely will, as you completely deserves it and moreover i'll get a chance to read nice blogs written by you.....


keep up the good work sir......


best regards........

archana chaturvedi said...

khanai ka phala hi bhaag itna rochk hai ti aage to padhna hi padega aakhir paapi dimag ka sawal hai

virendra kumar veer said...

app yatraoin ka varnan itani behtarin tarike se karte hain aur aisa lagta hai ki aap ke saat yatara hum bhi kar rahe ho.

manovika soni said...

bahut sundar..

पसंद आया हो तो