Monday, June 16, 2008

इटली यात्रा -दूसरा भाग






दूसरे दिन मैं जल्दी ही सो कर उठ गया या ये कहें कि मुझे नींद ही नहीं पडी नए लोग नया परिवेश नयी भाषा सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था इसी दिन मुझे बोलोना विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट परिचर्चा में हिस्सा लेना था । एक खास बात जो मुझे बोलोना में दिख रही थी वो यह कि अपना काम सभी ख़ुद करते थे शायद इसका कारण श्रम का बहुत महंगा होना था । नहा धो कर मुझे होटल के नाश्ते के कक्ष में उपस्थित होना था अर्थात सेल्फ सर्विस नाश्ते की टेबल पर मुझे एक ही वस्तु समझ में आयी वह था फलों का रस बाकी सारी चीजें या तो मैं उनके बारे में जानता नहीं था या उनकी पैकिंग और इटालियन भाषा के कारण मुझे ये समझ नहीं आया कि वे क्या हैं । खैर अब वक्त था काम का , मुझे बोलोना विश्वविद्यलाया पहुचना था आम तौर पर एक विश्वविद्यालय की छवि जो किसी के भी मन में होगी वैसे ही मैंने भी कुछ सोच रखा था एक बड़ा सा मैदान होगा कुछ बोर्ड लगे होंगे वगैरह वगैरह , लेकिन वो सारी छवियाँ वहाँ पहुँच कर ध्वस्त हो गयी । बोलोना शहर लगभग एक हज़ार साल पुराना शहर है और बोलोना विश्वविद्यलाया दुनिया के सभी आधुनिक विश्वविद्यलाया में सबसे अधिक पुराना है । इस प्राचीन शहर की आधी से ज्यादा इमारतें वैसे ही हैं जैसे की वे आज से ६०० या ७०० साल पहले थीं .खास बात ये है की इस शहर में आधुनिकता और प्राचीनता का अद्भुत समागम देखने को मिलता है बाहर से इमारतें पुरानी हैं लेकिन भीतर से आधुनिकता का सारा साजो समान समेटे हैं और शायद ये संतुलन हमारे भारतीय शहर नहीं बना पाए आप किसी भी भारतीय शहर को देखें नए और पुराने का भेद स्पस्ट दिखेगा लेकिन यहाँ ऐसा .है . मैं बात कर रहा था बोलोना विश्वविद्यालय की टुकडों में फैला हुआ अलग भवन अलग काम के लेकिन वास्तुकला के हिसाब से इसकी खूबसूरती का कोई जवाब नहीं यहाँ गुजरने पर ऐस लागता है की आप आतीटी की गलियों से गुजर रहें हों . यहाँ इतिहास जीवंत हो उठता है शायद यही खासियत है इस जगह की . बाहर से यह किसी प्राचीन इमारत की तरह लगता है जहाँ कोई बोर्ड नहीं है लेकिन अंदर नवीन सभ्यता की एक से एक उन्नत चीज़ आपको नज़र आयगी विश्वविद्यालय में बार हिन्दुस्तान में कोई सोच नहीं सकता लेकिन यहाँ है बगैर किसी हो हल्ले के . जगह जगह मशीनें लगी हुई हैं जिनमें पैसा डाल कर आप अपने मतलब का पेय ले सकते हैं . खाश बात ये की इनको कोई तोड़ता नहीं और न ही किसी तरह का जुगाड़ लगाकर मुफ्त में चीजें हथियाने की कोशिश की जाती है .

विश्वविद्यालय के जिस हिस्से में परिचर्चा होनी थी वो इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा के यंत्रों से युक्त था (वैसे बोलोना में के सभी रिहायशी इलाकों मैं इलेक्ट्रोनिक सुरक्षा यंत्रों का प्रयोग  होता है और हर चौराहे पर क्लोस सर्किट कैमरा लगे हैं ज्सिसे कोई भी यातायात के नियमों का उल्लंघन नही करता )
विश्वविद्यालय का माहौल किसी ओपन एयर थियटर जैसा लग रहा था .सब अपने आप में मगन पढने वाले पढ़ रहे थे और घूमने वाले घूम रहे थे . लड़के और लड़कियों में १:३ का अनुपात था . वैसे पूरे बोलोग्ना शहर में भी लड़कियां ही ज्यादा  दिखायी पड़ती हैं खास बात ये की यहाँ सिगरेट का बहुत प्रचलन है और लड़कियां भी खूब सिगरेट पीती हैं













5 comments:

kranti ki patrakarita said...

bus ek viswas ke saath ki jeevan mai mehnat ka koi todh nahi hota hai. aap mehnat karte jayie jeevan kudd ba kudh kubhsurat hota JAATA HAI.ABHI bhi puri yatra baki hai. agar koshin ki jaaye to is par bhi ek book likhi ja sakti hai. my best wishes always with aap ke saath. so carry on.

Dr. Mukul Srivastava said...
This comment has been removed by the author.
Priya said...

sounds really great sir!!!!
you must have great experience by looking at those beautiful edifices of the university....and also their different way of working n technological advances....

and its good to know that the ratio of girls there, was greater then that of boyz....

archana chaturvedi said...

Niyam insan ko sakth nai anusasit bana dete hai par kai log ise makhol bana uda dete hai hum saamnjsya ki baat to karte hai lekin kar nai paate hai sayad isi liye hum yaaha hai

virendra kumar veer said...

hum jo kahte hai o karne ki to door ki baat kai karne ki koshis bhi nahi ki jati.is liye aaj hum yanha hain. ek viswas hi insaan ko aage badne ki liye prerit karta hai. khud par viswas aur confidence ke saat mehnat ki jaye to life khud b khud khubsurat lagne lagti hai.ur khud par trust hona bahut jarruri hai life me aage jana hai to....................

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