Thursday, June 19, 2008

इटली यात्रा :तीसरा भाग

वीक एंड की तैयारी 
                               
पार्टी का आयोजन स्थल 
परिचर्चा ख़त्म होने के बाद मैं होटल के कमरे में थोड़ी देर आराम करने आया पर मैं इटली में होने को लेकर इतना  उत्साहित था कि मुझसे आराम नहीं हुआ ,मैं अकेले बोलोना शहर घुमने निकल पड़ा ,बाद में मुझे बताया गया ऐसा करना ठीक नहीं था क्योंकि एक तो मैं विदेशी दुसरे मुझे इटैलियन भाषा भी नहीं आती ऐसे में पूरी संभावना मेरे भटक जाने की थी |पूरा शहर किसी बड़ी पार्टी में तब्दील जान पड़ता था,कुछ भिखारियों को देखा वो इतने साफ़ सुथरे थे और सलीके से भीख मांग रहे थे कि मेरे दिमाग में जो भिखारियों की छवि बनी थी वो तार –तार हो रही थी |
सड़क पर भिखारी 
इस दिन पहली बार मैंने जाना कि वीक एंड क्या होता है पूरा शहर में जैसे उत्सव मनाया जा रहा हो लोग चारों ओर बिखरे हुए थे जो सम्पन्न थे वो अपनी गाड़ियों को लेकर आस पास की जगहों पर घुमने निकल पड़े थे और जो कम साधन सम्पन्न थे वो सड़कों पर मौज मस्ती कर रहे थे |
बड़ी मजेदार बात यह है कि मैं जिस होटल में ठहरा था उसका नाम तक मुझे नहीं याद था इसलिए मैं ज्यादा दूर नहीं गया और दो घंटे में होटल वापस लौट आया |शाम को मेरे सम्मान में एक भोज का आयोजन मेरी मेजबान सिल्विया के माता –पिता के घर किया गया था ,जहाँ तरह –तरह के मांसाहारी पकवान जिसमें ज्यादातर सूअर के गोश्त के थे और इटैलियन वाइन की व्यवस्था थी |वहां कई शहर के भद्र जन आमंत्रित थे |
मैं और सिल्विया 
बात चीत का सिलसिला जल्दी ही आतंकवाद के मुद्दे पर आ गया |मैंने उन सबको बताया कि कैसे पेरिस एयरपोर्ट में दाढी रखने के कारण  मेरी दो –दो बार तलाशी हुई |वहां पहली बार मैंने जाना कि यूरोप में भी अमेरिका के प्रति कोई अच्छी भावनाएं नहीं हैं खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर |इटली आने से पहले मुझे सारे गोरे लोग एक जैसे लगते थे पर इटली में मेरे काफी भ्रम टूट रहे थे |
अब बारी खाने की थी |इतने सारे पकवानों के बावजूद मुझसे कुछ भी नहीं खाया नहीं जा रहा था सब कुछ सादा कोई मसाला नहीं ,मैंने किसी तरह गोश्त के कुछ टुकड़े ठूंसे |मुझे घर और घर के खाने की बड़ी याद आ रही थी |मेरा मन कर रहा था कि किसी तरह मैं वापस लखनऊ पहुँच जाऊं |पार्टी ख़त्म होते होते रात के ग्यारह बज गये |ख़ास यह बात थी कि इस पार्टी में किसी तरह का शोर शराबा नहीं था और न ही किसी तरह के संगीत की कोई व्यवस्था |इटली में पहली बार जाना विदेश में पले –बढे बच्चों में इतना स्वाव्लमबन और उद्यमशीलता कैसे आ जाती है |इटली में हर बच्चा चाहे लड़का हो या लडकी हाई स्कूल करते ही अपना घर स्वेच्छा से छोड़ देता है और खुद कमाई करते हुए अगर पढना चाहता है तो आगे की पढ़ाई करता है पर माता –पिता पर अपनी पढ़ाई का बोझ नहीं डालता |हाँ सप्ताहांत में जरुर अपने माता –पिता से मिलने आता है |
शहर का बाजार 
सिल्विया एक ऐसी ही लडकी थी जिसका पी एच डी वाइवा  लेने मैं आया था वह अपने पुरुष मित्र के साथ उसके फ़्लैट में रहती थी जिसे दोनों ने मिलकर खरीदा था और दोनों जल्दी ही शादी करने की सोच रहे थे |सिल्विया बोलोना विश्वविद्यालय में एक प्रोजेक्ट में कार्यरत थी |

देर रात मैं होटल पहुंचा|इतनी दूर मैं घर से पहली बार आया था मुझे लगा कि मुझे घर फोन करना चाहिए समय यही रात के बारह बजे थे इस उतावलेपन में मैं यह भूल गया कि इटली का समय भारत के समय से तीन घंटे पीछे था यानि इस समय यहाँ लखनऊ में रात के साढ़े तीन बज रहे होंगे और इस वक्त घर पर सभी गहरी नींद में सोये होंगे और हुआ भी वही फोन नहीं उठा |मैंने किसी तरह सोने की कोशिश की पर न जाने क्यों अब मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं इटली आया ही  क्यों ? शायद इसका एक बड़ा कारण भाषा और खाना था |बहरहाल अगली सुबह का इन्तजार था जब इटली घूमने जाना था |
                             
बांग्लादेशी कामगारों के साथ 
इटली यात्रा में आज मेरा तीसरा दिन था और मुझे रात में नींद अच्छी आयी सुबह मैंने इटली भाषा का पहला शब्द सीखा “बुनजुवार्नो” मतलब गुडमोर्निंग |ये शब्द भी बस महज इत्तेफाक से सीख पाया हुआ यूँ कि जब मैं होटल में सुबह के नाश्ते के लिए नीचे जा रहा था तो रास्ते में मुझे जो लोग भी भी मिलते वो
 “बुनजुवार्नो” कहते पहले तो मैं इसका मतलब समझ नहीं पाया |बाद में मुझे इस शब्द का सही मतलब पता लगा |मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि भले ही लोग आपसे परिचित हों या न हों मैं अपने सात दिनों के प्रवास में कुछ शब्द ही सीख पाया जैसे धन्यवाद को "ग्रात्शिया" कहते हैं |खैर खाने की एक बड़ी समस्या थी जिसका समाधान मेरी मेजबान ने निकाल लिया |मेरे होटल के बगल में ही एक भारतीय रेस्टोरेंट था जिसका नाम "ताजमहल" मुझे यह सोचकर अच्छा लगा चलो इसी बहाने अपने "मुलुक" के लोगों से बात होती पर मेरी यह धारणा जल्दी ही टूट गयी |जब मैं उस होटल में पहुंचा वो एक पाकिस्तानी का रेस्टोरेंट था चूँकि पाकिस्तान के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसकी ग्लोबल अपील हो पर भारत के पास ताजमहल था फिर क्या एक पाकिस्तानी ने भारतीय नाम से रेस्टोरेंट खोल लिया |मैंने उससे थोड़ी बहुत बात करने की कोशिश की पर उसका जवाब ठंडा था इससे अच्छा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक रेस्टोरेंट में कुछ बांग्लादेशियों से मिला उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया |

3 comments:

Santosh Kumar Prajapati said...

Wakai bahut adbhut anubhav the aapke Sir...

hemant kumar pal said...

वाह मजा आ गया इटली की घर बैठे सैर करा डी आपने

Ashutosh Chaturvedi said...

vah sir...aapne itali pahuncha diya balak ko thanx.

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