Friday, December 18, 2009

अमेरिका यात्रा :प्रथम भाग


दस दिन तक हमारा यही ठिकाना था 
अमेरिका नाम तो आपने जरूर सुना होगा और हर भारतीय की तरह वहां जाने की इच्छा भी जरुर की होगी मैं भी आप से अलग नहीं हूँ बचपने से एक सपना मेरे मन भी था कि काश एक बार अमेरिका यात्रा का मौका मिले खैर मौका मिला अब ये जानना आपके लिए जरूरी नहीं होगा कि मैं अमेरिका क्यों गया इससे मेरा यात्रा वृतांत एक सीमित पाठक वर्ग तक सिमट कर रह जाएगा मुझे अमेरिका के कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी लॉन्ग बीच की यात्रा करनी थी और हमारा लगभग १० दिन का प्रवास था ,हालाँकि यह मेरी पहली विदेश यात्रा नहीं थी लेकिन जैसा कि मेरी हर यात्रा में होता कुछ न कुछ अडचने आ जाती हैं और विदेश यात्रा अपने आप में एक अनचाहा डर भी साथ लाती है वैसा इस बार भी था यूँ कहें कि घर छोड़ना बुरा भी लगता है किन्तु अपने विस्तार के लिए यात्रा करना भी जरुरी है मै ४ दिसंबर को लखनऊ से दिल्ली के लिए उड़ा
सुबह की शुरुवात जूस के साथ और कंप्यूटर तो है ही 
होटल के बाहर का द्रश्य 
इस सफ़र का तो पता भी न पड़ा करीब ५० मिनट की उड़ान थी यहाँ से लगभग १० घंटे बाद अगली उड़ान थी जो हमें अबुधाबी ले जाने वाली थी किसी तरह हमें १० घंटे इंदिरा गाँधी एयर पोर्ट पर काटने थे .अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन पर आ कर लगता है कि भारत विकास कर रहा है लेकिन कुछ विदेशी सैलानी इसे दुनिया का सबसे ख़राब विमान पत्तन बता रहे थे एक भारतीय होने के नाते मुझे बुरा लगा लेकिन हर भारतीय की तरह मुझे भी सिर्फ बुरा लगा क्योंकि हम अपनी कमियों से सीख ले रहे होते तो शायद इतिहास कुछ और होता यूँ होता तो क्या होता न मैं होता ,न तू होता तो इस किस्से को यहीं छोड़ कर हम आगे चल पड़े सुबह ४ बजे हमारे विमान ने अबुधाबी के लिए उडान भरी और इसी के साथ मैं निकल पड़ा दुनिया के एक और देश करीब ४ घंटे की उड़ान उंघते हुए पूरी हुई क्योंकि पूरी रात जागते हुई कटी थी सुबह का सूरज जब उग रहा था हमारा विमान अबुधाबी विमान पत्तन पर उतर रहा था यहाँ हमें ३ घंटे काटने थे यहाँ से अगला विमान हमें न्यू यार्क ले जाने वाला था और लगभग १४ घंटे की उड़ान थी अब तक शरीर थक कर चूर हो चुका था ।नित्यक्रिया से फारिग होने के बाद मैंने एअरपोर्ट का चक्कर लगाया बहुत खूबसूरती से बनाया गया यह एअरपोर्ट मानवीय उद्यमशीलता  का जीता जागता नमूना है जब हम सुरक्षा जांच के लिए जा रहे थे तो मैंने रास्ते देखा कई बच्चों और एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को देखा जिन्हें बीच में रोक दिया गया और उन्हें इन्तिज़ार करने को कहा गया देखने में वे भारतीय उपमहाद्वीप के लगते थे एक बात और बताता चलूँ अबुधाबी एअरपोर्ट सुरक्षा जांच से पूर्व की सारी औपचारिकता ज्यादातर प्रवासी भारतीय ही निपटाते हैं ये वो लोग हैं जो बेहतर भविष्य की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करते हैं . अबुधाबी में हमारी घड़ी डेढ़ घंटे पीछे हुई हम १४ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे अबुधाबी एअरपोर्ट पर हमारी दुबारा सुरक्षा जांच हुई अबुधाबी एअरपोर्ट पर सुरक्षा उतनी कड़ी नहीं थी सुरक्षा जांच के बाद हम विमान में थे विमान में जल्दी ही उन लोगों को देखा जिन्हें सुरक्षा जांच के वक्त इन्तिज़ार के लिए रोका गया था वो एक ही परिवार के कई बच्चे थे और एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो शायद उनका पिता था मै सारी यात्रा उन्हें ही देखता रहा मेरे मन में कई सारे सवाल उमड़ रहे थे मैं उनसे बात करना चाहता था , मै जानना चाहता था कि इतने सारे बच्चों को लेकर वो अमेरिका क्यों जा रहा था क्योंकि उनकी हालत ये बयां कर रही थी कि वे आर्थिक रूप से उतने संपन्न नहीं लग रहे थे कि वे महज देशाटन के लिए अमेरिका जा रहे हों जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतरने वाला था तब हमें कुछ फॉर्म दिए गए जिन्हें भरना अनिवार्य था ये हर देश का एक नियम है कि आपको अपनी यात्रा का पूरा ब्यौरा आव्रजन अधिकारीयों को देना था वे फॉर्म नहीं भर पा रहे थे उन्होंने मेरी मदद माँगी मैंने मदद की भी वो फॉर्म अपनी हस्तलिपि में ही भरना होता (जैसा मै जानता हूँ ) तब मुझे पता लगा कि वो सब बंगलादेशी हैं हालाँकि वो हिंदी मिश्रित भाषा जानते थे लेकिन उन्होंने मुझसे हिंदी मे बात नहीं की जबकि मैंने उन्हें उस भाषा में बात करते सुना था मन में कई सवालों को लिए मै यही सोचता रहा ये छोटे बच्चे अपने अपनों से दूर कैसे रहेंगे और यहाँ क्या करेंगे मुझे उनमे कई भारतीय छोटू दिखे जो वहां कहीं न कहीं खप जायेंगे वैसे भी अमेरिका सबको अपना लेता हैं उसका इतिहास भी यही कहता है . न्यू योर्क के लिए उडान भरते वक्त मैंने ये नहीं सोचा था कि जिन्दगी एक नया अनुभव होने वाला था जिसे टाइम ज़ोन इफेक्ट कहा जा सकता है हम दिल्ली से ५ की सुबह ४ बजे उड़े थे लेकिन जब हम लगभग १४ घंटे की उड़ान के बाद न्यू योर्क पर उतरे तो उस वक्त दिन के तीन बज रहे थे इस तरह हमारी जिन्दगी से एक रात गायब हो गयी जो थी भी और नहीं भी जिन्दगी भी ऐसी ही है एक मृगतृष्णा हम भागते रहते हैं लेकिन सत्य तो मृत्यु है फिर भी ..........
भारतीय समय के हिसाब से जब हम न्युयोर्क  उतर रहे थे भारत में  ६ की सुबह हो रही थी लेकिन न्यू योर्क में उस वक्त ५ की शाम थी. १४ घंटे की थका देने वाली उड़ान के बाद जब हमारा विमान न्यू योर्क एअरपोर्ट पर उतर रहा था वहां हल्की बर्फ बारी हो रही अपनी आँखों से बर्फ गिरते देखने का यह मेरा पहला अनुभव था थोड़ी देर में जोरदार बारिश होने लग गयी जो हमारे लोस एंजलिस के लिए उड़ान भरते वक्त जारी रही ठण्ड बहुत थी और एक बार हम फिर ६ घंटे की उड़ान के लिए तैयार थे न्यू योर्क एअरपोर्ट काफी बड़ा और खूबसूरत है हमको एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल जाने के लिए ट्रेन पकडनी पडी लेकिन सुविधाओं के हिसाब से मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा आप सब मुझसे असहमत हो सकते हैं .आव्रजन सम्बन्धी औपचारिकता निपटाने के बाद हम अमेरिका की सरज़मीन पर थे . अमेरीकी समय के अनुसार हम रात के ११ बजे लोस एंजलिस एयर पोर्ट पर उतर रहे थे ,शरीर थक कर चूर हो चुका था हमारे मेजबान एअरपोर्ट पर हमारा इन्तिज़ार कर रहे थे थोड़े देर में हम होटल के रास्ते में थे चौड़ी चौड़ी सड़कें जिनपर सरपट दौड़ते चौपहिया वाहन रौशनी से जगमगाता शहर वैसे जब हमारा विमान लोस एंजलिस एअरपोर्ट पर लैंड कर रहा था तो नीचे मैंने रौशनी में जगमगाता शहर देखा क्या खूबसूरती से समकोण पर काटती सड़कें पूरा शहर एक खूबसूरत लैंड एस्केप लग रहा था और मुझे याद आ रहा था बचपने में इतिहास की किताबों में पढी हड़प्पा सभ्यता के बारे में पढी बातें सारी सडकें एक दुसरे को समकोण पर काटती थीं हिन्दुस्तान अपने इतिहास से चिपका रहा और अमेरिका अपना भविष्य बनाता रहा मैंने अक्सर अमेरिका की आलोचना इस आधार पर सुनी है अरे वो क्या देश है उसका तो कोई इतिहास ही नहीं और मुझे ग़ालिब चाचा का शेर याद आता रहा "दिल के खुश रखने को ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब " हड़प्पा सभ्यता की कुछ खास बातें मैं अमेरिका मैं देखने वाला था मसलन वहां की सफाई व्यवस्था . हम २० मिनट की ड्राइव के बाद लोंग्बीच शहर के होलीडे इन् होटल में थे . ड्राइव की बात पर बताता चलूँ अमेरिका में दूरी समय में मापी जाती है ब्लोगर सरताज समीर लाल की ये पंक्तियाँ पढ़ लीजिये अमेरिका का फलसफा समझ में आ जाएगा "अमेरीका का अजब शिगूफा है. बस सबसे अलग दिखना है, मानो यही मोटो हो. आज भी माईल में दूरी आँकते हैं जबकि पूरा विश्व किलो मीटर पर आ गया है. तापमान फेरेन्हाईट में, पेट्रोल गैलन में, वजन पॉण्ड में. " कुछ और जोड़ता चलूँ लाइट के जो स्विच हमारे लिए ऑफ होते हैं अमेरिका में ऑन होते हैं भारतीय कोई भी बिजली के उपकरण अमेरिका में नहीं चल सकते क्योंकि उनके प्लग अलग किस्म के होते हैं इसके लिए आपको कन्वर्टर की जरूरत होगी और इन समस्याओं का शिकार मैं अपने होटल पहुँचते हुआ पहले ऑन ऑफ का चक्कर समझा उसके बाद मैंने सोचा अपने सकुशल पहुँचने की सूचना घर दे दी जाए लेकिन मेरा लैपटॉप उचित प्लग न हो पाने के कारण नहीं चला बड़ी समस्या हुई खैर हमारी एक साथी इस की व्यवस्था कर के ले गयीं थी और वो प्लग उनोहेने मुझे सहर्ष दे दिया जिस से मैं अपना लैपटॉप चला पाया ये कन्वर्टर मेरे लिए एक बड़ी समस्या बना क्योंकि मैं अपने साथ बहुत से उपकरण ले गया था (वीडियो कैमरा , स्टिल कैमरा , मोबाइल , ऑडियो रिकॉर्डर इत्यादि ) और इन सबको चार्जिंग की जरुरत पड़ती है ,पहले दिन तो काम चला आगे मैं किश्तों में सोता था और सारी रात अपने उपकरणों को चार्ज करता था .
जारी .......................................................

15 comments:

Arvind Mishra said...

विलंबित बधाई और अगली कड़ी का इंतज़ार !l

Udan Tashtari said...

वाह, मुकुल भाई..आनन्द आ गया विवरण पढ़कर.

जाते वक्त आपसे बात करने का प्रयास किया मगर आप उसी समय निकले थे होटल से.

बड़ा सुखद रहा था आपसे बतियाना!!

अजय कुमार झा said...

वाह मुकुल जी ,
आपके साथ अमरीका घूमने का मजा ही कुछ और आने वाला है ये तो पहली कडी पढ के ही अंदाजा हो गया ..अब अगली की प्रतीक्षा रहेगी

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया विवरण दिया है.अच्छा लगा.....प्रतिक्षा रहेगी....

Ranvijay Singh said...

agle ank ka intazaar rahega

Ranvijay Singh said...

agle ank ki prateeksha rahegi

MAKAD said...

गुरूजी यात्रा वृतांत सुनाते सुनाते आपने काफी कुछ कह डाला है. सच है कि अमेरिका वाले ज़िन्दगी अपनी तरह से जीते हैं और लोगों को भी जीने का वही सिखा डालते हैं पर हम उन्हें देख कर ज़िन्दगी जीना चाहते हैं. खैर अगली कड़ी का इन्जार है. अमेरिका सी लौटे गुरूजी

Digvijay Singh Rathor Azamgarh said...

विदेश यात्रा का अपना अलग आनंद होता है. आपने जिस तरीके से मन में आने वाले विचारो को अपने ब्लॉग में लिखा है वह बहुत मनभावन है.
किस्तों में आप कि बाते जानने से और मज़ा आएगा.
सर मेरा एक और अनुरोध है आपने हमें यात्रा वित्रांत पढाया भी है और अब आप लिख रहे है .... इन यात्रा वित्रान्तो को पुस्तक आकर देने के बारे में भी विचार करियेगा.

डॉ. मनोज मिश्र said...

संस्मरण तो रोचक है.

Jyoti Verma said...

maza aa gaya sir! shayad isase sabko labh hoga!!

vinay ko suno said...

jindagi yatra aur sbdown me khud ko khoto hua main ,yahi soch raha hoon
desh duniya aur logo ke beech abhi kitni khai hai
bahut accha sir aglae ank me kuch phir ........

सुनीता शर्मा said...

आपका मीडिया सचमुच अच्छा लगा अभी सारी पोस्ट तो नही पढी लेकिन जिस तरह आपने अमेरि का व भारत की तुलना की वह दिलचस्प है ।

Priyanka said...

bahut hi mazadaar rahi hogi apki yaatra sir,..................

virendra kumar veer said...

SIR YATRA KA BAHUT HI ACCHA VIVRAN DIYA AAPNE. SABDO SE HI AAPNE AMERICA KI YATRA KARA DI.

Anonymous said...

आपकी शैली का सदैव अद्भुत रही है गुरुदेव। फिर चाहे वह संक्षेप वाचन हो या बारीक लेखन

पसंद आया हो तो