Thursday, January 14, 2010

अमेरिका यात्रा तीसरा भाग


अमेरिका में हमारे के आगे के दिन काम करने के थे मुझे कलिफोर्निया विश्वविद्यालय लॉन्ग बीच में भविष्य की संभावनाएं तलाशनी थीं जो भारत के लिए काम सकें खैर ये मुद्दा छोड़ कर मैं अपने कुछ पर्यवेक्षण आप से बांटना चाहता हूँ पहले कुछ उनके दैनिक जीवन पर, हम भारतीय अंग्रेजों की गुलामी करते करते खुद भी उनके जैसे हो गए पूरे विश्वविद्यालय में एक भी
विश्वविद्यालय का छात्र संघ भवन 
'चपरासी" नामक जीव मैंने नहीं देखा हर काम खुद कीजिये वो भी बगैर लज्जा के पर हमारे यहाँ नेता की हैसियत उसके सुरक्षा गार्ड और अधिकारी की उसके चपरासियों से आंकी जाती है हर जगह कॉफ़ी की मशीन लगी है पी लीजिये उम्मीद मत कीजिये कि कोई आएगा और पिलाएगा ये उम्मीद जो नकारात्मक ज्यादा है हमारा बेडा गर्क करती रही है कोई दिन आएगा जब कोई आएगा और हमारी सब समस्याएँ ख़तम हो जायेंगी वहां के कुलपति को मैंने बिना किसी सुरक्षा गार्ड के लोगों से , छात्रों से मिलते देखा विश्वविद्यालय के डीन को छ्तारों के साथ पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपने खाने का इन्तिज़ार करते देखा और लड़के भी उतने ही सहज भाव से उनके साथ खड़े थे मानों आगे उनका ही एक साथी खड़ा हो इज्ज़त दिल में होती है इसका नज़ारा भी किया पूरे विश्वविदयालय में शांति थी व्यर्थ का कोलाहल नहीं था मैंने वहां के छात्र संघ भवन का भी दीदार किया साहब हमारे पांच सितारे होटल को मात देता भवन जहाँ छात्र अपनी रुचियों के हिसाब से अपने समय का सद्य्पयोग कर सकते थे बोवलिंग एली , स्केवेश टेबल टेनिस .सिनेमा हाल और जाने क्या क्या मैंने बताया कि हमारे छात्र संघ चुनाव में बड़ी हिंसा होती है तो वहां के छात्रों ने मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं किसी दुसरे गृह की बात कर रहा हूँ .कहीं कोई गंदगी नहीं सब व्यवस्थित है शायद उन्हें कानून मानने की आदत पड़ गयी है और अभी हमें ये आदत डालनी है .
सब कुछ बड़ा :मॉल में सब्जियां 
चूँकि वहां लोग अपनी गाड़ियाँ खुद चलते हैं और वाहन चालक जैसी चीज़ मैंने नहीं देखीं इसलिए रोज हमारे मेजबानों मे से ही कोई रोज हमें लेने आता था और कोई छोड़ने रोज शाम को हमारा भोजन या तो किसी के घर पर होता था या किसी प्रसिद्ध रेस्तराओं में हमने कम्बोडिया , मैक्स्सिकन , चाइनीज़, इटालियन और अमेरिकी भोजन का अलग अलग दिनों मे लुत्फ़ उठाया ऐसे ही एक रेस्र्त्राओं मे बैठे हुए मैं अमेरिका के बारे में सोच रहा था कि अमेरिका जैसे बहुसांस्कृति देश को कैसे परिभाषित किया जाए तभी मुझे ये पंक्तियाँ सटीक लगीं लिखने को पास में कुछ नहीं था सो मैंने पेपर नैपकीन का इस्तेमाल किया और ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ जब मे भोजन की टेबल पर बैठ कर कुछ लिखना चाहता था हाँ अब मेरे साथ वो कागज़ के टुकडे सुरक्षित हैं जो मुझे अक्सर अमेरिका की याद दिलाते हैं तो गौर फरमाईये उन पंक्तियों को "अमेरिका शायद इसलिए अमेरिका है यहाँ दुनिया का हर देश मौजूद है एक ऐसा देश जहाँ देश में देश है और देश में विदेश देश में विदेश इसलिए क्योंकि यह इतना बड़ा है कि इसमें दुनिया के तीन टाइम जोन हैं और देश में देश इसलिए कि यहाँ के मूल निवासी अभी भी अभिशप्त हैं वो काले लोग जिन्हें हम नीग्रो कहते हैं भले ही ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हों मैंने गरीब लोगों में ज्यादातर काले ही लोगों को देखा हाँ एक मजेदार बात आवास विहीन लोग अमेरिका में भी हैं जो झुग्गी बना कर रहते हैं हाँ इनकी संख्या कम है लेकिन गरीबी यहाँ भी है जब हमने ऐसे ही एक झुग्गी की और इशारा अपने मेजबानों को किया तो उन्होंने  इसे हँसते हुए लोंग्बीच का धारावी बताया "
लोंग्बीच विश्वविद्यालय 
यहाँ काम के घंटे सुबह से शाम के बजे तक है हम बजे के बाद घूमने निकल पड़ते बगैर मकसद के यूँ ही कभी कभी मैं अपने अपने आप से बात किया करता था क्या कभी हम इन मानकों के हिसाब से जीवन जी पायेंगे जैसे आज अमेरिका का अधिकतर निवासी जी रहा है और जवाब अक्सर ना ही होता था क्योंकि कानून बनाने से कुछ नहीं होता देखिये भारत में किस चीज़ के लिए कानून नहीं है भीख मांगना अपराध है बालश्रम अपराध है भूरण हत्या जुर्म है उत्तर प्रदेश में एक आबकारी विभाग है जो ये सुनिश्चित करता है कि लोग ज्यादा से ज्यादा शराब पियें जिससे सरकार को ज्यादा टैक्स मिले और दूसरी तरफ मद्य निषेध विभाग है जो लोगों को मद्य निषेध के लिए कहता है मज़े की बात है ये सारा काम होता है आम जनता के टैक्स के रूप में दिए गए पैसे से "आगे शमशान पीछे कब्रिस्तान बीच में मेरा भारत महान" अमेरिका को लैंड ऑफ़ ला कहा जाता है और वास्तव में ऐसा है भी हुआ यूँ भी कि हम लोग एक दिन जोशुवा ट्री राष्ट्रीय पार्क जा रहे थे पेट्रोल (अमेरिअक में जिसे गैस कहा जाता है ) भरा कर हम लोगों ने एक टर्न लिया तभी थोड़ी देर में एक पुलिस वाला (होली वुड फिल्मों में देखा करता था आज हकीकत थी ) अपनी मोटर साइकिल से हमारे पीछे लग लिया हमने डर कर गाडी रोक ली वो बड़े ही अदब से हमारे मेज़बान से बोला कि आपने बोर्ड नहीं देखा आपने गलत टर्न ले लिया है वास्तव में हम लोगों ने ऐसा कोई बोर्ड नहीं देखा था पर अब फंस चुके थे कानून कह रहा था कि हम गलत हैं तो गलत हैं उसने गाडी के कागज़ मांगे पर लायसेंस और इन्सुर्रेंस के अलावा कुछ था और मुझे तकनीक का एक और चमत्कार देखना था उसने एक पाम टॉप जैसा यन्त्र निकला उसपर इन्सुरेंस का नंबर डाला और सारा रेकोर्ड उसके सामने था कोई कागज़ झंझट ही बहस की गुन्जाईश हमारे मेज़बान ने अपना परिचय दिया कि वो स्टेट एम्प्लोयी हैं और अपने भारतीय मित्रों के साथ जा रहे हैं लेकिन उसने रूखे किन्तु अदब भरे स्वर में जवाब दिया वो सिर्फ अपना काम कर रहा है और थोड़ी देर में हमारे मेज़बान का टिकट (हिन्दुस्तानी  मे आप इसे चालान काटना कह सकते हैं ) तैयार था उसने उसी पाम टॉप पर हमारे मेज़बान का हस्ताक्षर लिया और टिकट थमा दिया . मै सोच रहा था ये घूस ले लेता तो हमारे मेज़बान का तनाव कम हो जाता पर ऐसा नहीं हुआ शायद ये उच्च तकनीक का कमाल था कुछ और जोड़ता चलूँ तकनीक के इस्तेमाल पर यहाँ के लोग किसी का पता नहीं बता पाते हम एक दो बार शोर्टकट मरने के लिए लोगों से पूछते तो वो मिलते तो बड़े प्यार से थे लेकिन रास्ता नहीं बता पाते थे जीपी एस सिस्टम कारों मे लगे हुए मैंने पहली बार देखा अपना गंतव्य भर दीजिये और वो आपको आपके मुकाम तक पहुंचा देगा (हिन्दुस्तान में ऐसा होना इस लिए मुश्किल है क्योंकि यहाँ एक रात में रोड पर कालोनी बन जाती है और अगली रात में सरकार वोट बैंक के लिए उसे नियमित कर देती है अब बनाओ जी पी एस आजादी के ६० साल में हमने सिर्फ एक नया शहर बसाया है और वो है चंडीगढ़ )
लोंग्बीच विश्वविद्यालय 

 आइये कुछ खाने पीने की बात कर ली जाए आम अमेरिकी मीठा बहुत पसंद करता है डोनट उनका राष्ट्रीय सुबह का नाश्ता है इसका स्वाद मुझे भारतीय बालू शाही की याद दिला रहा था हालंकि ये कई स्वादों मे उपलब्ध है डोनट के साथ कॉफ़ी डोनट को आप शाही टुकडे के समीप रख सकते हैं अमेरिका में दुनिया के हर हिस्से का खाना उपलब्ध है हमने यहाँ दो दिन भारतीय खाने का लुत्फ़ उठाया एक दिन शुद्ध शाकाहारी और एक दिन मांसाहारी एक दम भारतीय स्वाद मै तो इसेस्वाद का वैश्वी करणकहूँगा एक शाम हम लोग लॉन्ग बीच में लिटल इंडिया विलेज गए लगा कि भारत में गए चारों तरफ भारतीय नाम ,भारतीय सामान , क्या नहीं था सब्जी, जेवर, साड़ी, कुरता अचार आप बस कल्पना कीजिये वैसे यहाँ की सब्जियों को देखकर लग रहा था कि ये भी उपभोक्तावाद की शिकार हैं कुछ भी छोटा नहीं सब बड़े बड़े वो केला हो या आलू तरोई सब साफ़ कोई गंदगी नहीं वैसे हमारे यहाँ तो सब्जी पर जितनी मिटटी लगी हो उसे उतना ही ताज़ा माना जाता है इसे आप "vegetable shock " कह सकते हैं .
जारी .....................

10 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

ok, thanks.

डॉ. मनोज मिश्र said...

यात्रा का आनंद आ रहा है,जारी रखें.

deepakkibaten said...

badhai sir khichadi ki. desh me baithkar videsh ki baten badi lubhti hain.

Jyoti Verma said...

maza aa gaya america ke bare me itne kareeb se jaan kar

Jyoti Verma said...

टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम किया हुआ है. सभी टिप्पणियाँ ब्लॉग लेखक के द्वारा अनुमोदित की जानी चाहिए.sir moderation hata digiye.

neha said...

bahud khoob sir, apke es article ne to purani yaadaine taza krdi, apke hi andaz mai...
"dil dhundhta hai phir wahi fursat ke raat- din .........".

Srivastava said...

Hi
Exqusiste explanations.Felt as if walking on the downtown LA

Anonymous said...

Sir apne apni is yatra ke kuch ansh class me humlogon ke saath bhi share kiye the...sabkuch achanak se nazron k samne ghum gaya
.. thanx for such a nice memory..

mohd zakariya said...

काश एक सफ़र ऐसा मेरा भी होजाता😊
सुपर सफरनामा है सर जी👌👌👌

Parmatma Mishra said...

बहुत खूब सर। जिन सोचा तिन पाइया।

पसंद आया हो तो