Tuesday, October 19, 2010

उदयपुर प्रवास -प्रथम भाग


.
अजय मोगरा 


अठारह साल का वक्त कोई कम तो नहीं होता लेकिन समय का पहिया कब कैसे घूम जाता है ये पता ही नहीं चलता १९९३ में अप्रैल  के महीने में उदयपुर को मैंने अलविदा कहा था उसके बाद बस मन में यही कसक उठती थी कि एक बार जाना है उदयपुर कब पता नहीं लेकिन जाऊँगा भी तो किसके पास न कोई  जान न पहचान पुरानी साथी कहाँ गए होंगे कुछ पता नहीं तब इ मेल और फोन का जमाना भी नहीं था कुछ के पते थे लेकिन जिंदगी की दौड में वो भी कब पीछे छूटते चले गए पता ही नहीं चला और जिंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती रही पहले पढाई खतम हुई फिर नौकरी की आपाधापी हर दिन नयी समस्या लाता निजी जीवन में और व्यावसायिक जीवन में भी सुकून गायब हो गया ऐसे में एक ही चारा है करो या मरो तो मैंने करने की सोची और जीवन की रेस में दौड़ता रहा ये तो नहीं पता कि जाना कहाँ पर जाना है बहुत दूर कहाँ पता नहीं जिंदगी के मायने बदलते गए पर कहीं एक आस थी उस शहर को देखने की जिसे मैं बहुत पीछे छोड़ आया था जहाँ मैंने अपनी जिंदगी के कुछ अच्छे साल गुजारे हॉस्टल की यादें प्रकृति का साथ बोलने की आजादी और न जाने क्या क्या एक दिन ऑरकुट पर एक मित्रता निवेदन देखा हाँ अजय ही था अजय मोंगरा उदयपुर का साथी जल्दी ही उसका नंबर मेरे पास था अब मेरे पास एक बहाना  था उदयपुर जाने का उस जगह को देखने का जिसके सपने अभी भी मुझे आते हैं पर एक डर था पता नहीं अजय कैसे मिलेगा खैर जल्दी ही उदयपुर जाने का टिकट मेरे हाथ में था मेरी फ्लाईट रात के ८ बजे डबोक एयर पोर्ट पर उतर गयी हालांकि मैंने अजय को अपने आने की सूचना दे दी थी पर एक डर था अंदर अगर वो नहीं आ पाया अगर उसे कहीं जाना पड़ा खैर उतरते ही मैंने पहला फोन उसे किया और उसने हमेशा की तरह मजाक किया कि वो नहीं आ पा रहा है लेकिन जल्दी ही उसने मेरे सस्पेंस को खतम करते हुए बताया कि वो बाहर इन्तिज़ार कर रहा है उदयपुर एयर पोर्ट बहुत बड़ा नहीं है मैंने उसे देखते ही पहचान लिया थोडा मोटा हो गया था बाल भी कम हुए थे बाकी वैसे ही था बिंदास जल्दी ही हम उसकी गाड़ी में थे मैं पूरे शहर को अपनी आँखों में बसा लेना चाहता था उदयपुर मेरा उदयपुर जहाँ जिंदगी के मायने बदल गए प्राथमिकताएं बदल गयीं डबोक एयर पोर्ट शहर से करीब २५ किलो मीटर दूर है हमेशा की तरह शांत थोड़ी भीड़ बढ़ गयी थी फिर भी लखनऊ के मुकाबले बहुत शांति मैं गाँव से आये हुए किसी नए व्यक्ति की तरह पूरे शहर को देख रहा था १८ साल में बहुत सी स्मृतियाँ धुंधली हो गयी थीं रास्ते समझ में नहीं आ रहे थे इंसान कितना फ्लेक्सेब्ल जीव है कितनी जल्दी सब कुछ भूल कर आगे बढ़ जाते है पर मैं पीछे लौट रहा था १८ साल पीछे जब मैं उदयपुर को अलविदा कह गया था मैं कार में बोले जा रहा था कितना कुछ सुना देना चाहता था कितना कुछ समझ लेना चाहता था पता नहीं अजय को कैसा लग रहा होगा इसकी मैंने परवाह नहीं की वैसे जिंदगी मैं ऐसे मौके कम ही आये हैं जब मैंने किसी की परवाह नहीं की शायद मिडिल क्लास मेंटलिटी लोग क्या कहेंगे हम चलते चले जा रहे थे जल्दी हम शहर में थे उदयपुर लखनऊ के मुकाबले एक गाँव जैसा है पर अपनी ऐतिहासिक विरासत और झीलों के कारण हमेशा पर्यटकों का प्रिय स्थल रहा है .भोजन करने के बाद अजय ने हमें होटल छोड़ा जहाँ उसने हमारे ठहरने की व्यवस्था की थी रात के १०.३० बज चुके थे पर मुझे न तो सफर की थकान थी और न रात होने का डर हमारा होटल फतह सागर झील के ठीक बगल में था ये झील आज से १८ साल पहले मेरी कितनी शाम की साथी रही है  इसका मुझे खुद अंदाजा नहीं  था बहुत खुश हो तो फतह सागर चले जाओ और बहुत परेशानहो तो भी फतह सागर का किनारा आपका इन्तिज़ार कर रहा होता कभी एक भाई की तरह कभी एक दोस्त की तरह और कभी एक प्रेयसी की तरह फतह सागर झील हमारे स्कूल के ठीक पीछे थी और हम लोग अक्सर उसके किनारे जा कर बैठ जाया करते थे


फतह सागर और ऊपर सज्जन गढ़ का किला 


अरावली सदन यहीं नीचे मेस थी 
 मैं सबसे पहले फतह सागर से मिलना चाहता था वैसे राजस्थान हमेशा एक शांतिप्रिय प्रदेश रहा है हम जब यहाँ पढ़ने आये थे तो अक्सर हमें इस बात पर ताज्जुब होता था कि कैसे यहाँ ५० पैसे घंटा पर सायकिल मिला करती थी वो भी बिना किसी गारन्टी के लोगों को भरोसा था लोगों पर लखनऊ में ऐसी बातें सोचना भी थोडा मुश्किल है फतह सागर पूरा भरा था शायद उसे अंदाज़ा हो गया कोई पुराना बिछड़ा साथी बरसों बाद उससे मिलने आ रहा था यही सोच कर उसका भी दिल भर आया था मुझे बताया गया इस बार उदयपुर में कई साल बाद खूब बारिश हुई और सारी झीलें इस वक्त पानी से लबालब भरी हैं थोड़ी देर फतह सागर पर बैठने के बाद होटल वापस लौट आया उस रात मुझे लगभग एक दशक बाद चैन की नींद आयी जिसमें न कोई सपना था न यूँ ही आँख का  खुल जाना और फिर सारी रात आँखों आँखों में ही काट देने का कष्ट  सुबह जल्दी आँख खुल गयी सोचा चलो फतह सागर को दिन की रौशनी में देखने का लुत्फ़ उठाया जाए और हम पहुँच गए फतह सागर अजय ने ११ बजे आने को कहा था और हमारे पास काफी वक्त था काफी  कुछ बदल गया था फतह सागर का सामने का जंगल और खेत काफी कुछ खतम हो चुका था और सभ्यता के नए जंगल उग आये  थे जिन्हें हम विकास करना कहता हैं उनको देखकर लग रहा था उदयपुर तरक्की कर रहा था पर किस की कीमत पर इसकी फिक्र किसे है आओ विकास विकास खेलें इस खेल में जीत कौन रहा है ये तो पता नहीं पर उदयपुर हार रहा है .अजय ने स्कूल साथ चलने का वायदा किया था लेकिन मैं स्कूल देखने का लोभ नहीं छोड पाया फतह  सागर से एकदम करीब था मैंने सोचा अंदर नहीं जायेंगे बाहर से ही देख लेंगे अंदर अजय के साथ चलेंगे वहाँ पहुँचते ही एक झटका सा लगा एकदम शांत माहौल लग ही नहीं रहा था इतना बड़ा स्कूल जो कभी राजस्थान के शांति निकेतन के नाम से जाना जाता था वो शांत वीरान सा जंगल लग रहा था साथ के सारे होस्टल भी इस बात की गवाही दे रहे थे कि अब शायद यहाँ कोई नहीं रहता है बाहर से चक्कर लगाने के बाद हम अपने होटल लौट आये .
दूसरा भाग पढने के लिए क्लिक करें http://mukulmedia.blogspot.in/2010/10/blog-post_21.html#.V1frz5F96Ul

20 comments:

ashish said...

नमस्ते गुरु जी ! गुरु जी यह लेख पढ़ते हुए मै अपने अतीत में खो गया..जिंदगी के उन सुनहरी यादों में को ताज़ा किया इस लेख ने...जो हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं....

aagaz..........nayi kalam se said...

bhut khub sir...
is lekh me hum sab apna bhavishya padh sakte hai.......

Ashish Vaish said...

भैया मुकुल...विद्या भवन स्कूल उदैपुर हमारी वेह पाठशाला है जहाँ हमने साथ साथ रह कर जड़ों का निर्माण किया था..उस स्कूल की वीरानी इस बात की गवाही दे रही है मेरे दोस्त की हम जैसे अब उस स्कूल का भाग नहीं रहे....तुम अब गए हो मैं तो बीच में दो बार जा चुका हूँ और अरुणोदय छात्रावास जा कर आँखे न जाने क्यूँ भर आतीं हैं.......उन पुरानी स्मृतियों को तुमसे शेयर करने का बहुत मन है इसलिए इस बार लखनऊ तुमसे मिलने आ रहा हूँ....समय अवश्य निकाल लेना मेरे लिए..

Abhigyan said...

Mukul, Aap ka lekh padh kar aanken chalchala uthi aur dil bhar aya. Humari kehani ek hi, par aap khush kismat hai ki aapko Udaipur jane ka awsar mila. Mere dil me abhi bhi wo hi 1993 ka Udaipur basa hua hai.
Dhanyawad is lekh ke liye.

Sachin gupta said...

maine sare part pade 30 min me maine udaipur me bitay 2 saal ka ek ek pal jee liya thanks yaar mujhe phir se un sunahri yaado ke paas le jaane ke liye

C.p. jeengar said...

sir,hum sabhi bahut khush kismat h ki hume Vidya bhawan jaisi family mili, jaha se humne bahut kuch sikha or apne gar se dur rahkar ek alag hi prakar ki jindgi ji h,jo ki is life ka sabse haseen pal tha,jo bhulae bhi nhi bhoola jaega.... vha ki hostel life to apne aap m bahut hi super thi........
hamare time m 2 rupees per hour cycle kiraya tha, keval 5 rupees m pura udaipur goom lete the vo bhi baris k mousam m....

archana chaturvedi said...

Aap ke is lekh me aapki utsukta or khushi saaf saaf najar a rai hai

sana said...

udaypur shehar apki life me kya jagah rakhta h sir is sansmaran se pta chal rha h

ARUSHIVERMA said...

By going through all the articles related to udaipur trip one thing is clarified that its the new and intresting place to explore from part 1 to 6. And thanks a lot for sharing your experiences with us.

Kumar's said...

ek hostel me padhne wale jitne bhi log honge mere khayal se wo apne sabse khoosurat pallo ko wahi bitate hain unme se main bhi hun sir aur aaj hamara hostel bhi ek viram jungal ki tarah ho gaya hai kyo ki satyam computers ke sath hamara school bhi juda tha ye padhne ke baad aap ne purani yaadon ko phir taza kar diya.....

Anonymous said...

mukul....
main vidya bhawan me 1985 se 1990 tak calcutta sadan me tha...tumhe to pehchan nahi paya..but vidya bhawan pariwar ke har member ko aaj tak apne pariwar ka hi samajhta hun...shayad ye meri majboori ho...kyunki jo pariwar wahan mila....wo atmiyata abb kahin bhi nahi milti....apne schhol ko bahut miss karta hun tumne yaad taza kar di.......shayad abb wo yaden hi hamari asset hain....shubhkamnao sahit....subhash

Dr. Mukul Srivastava said...

सुभाष जी आपको अच्छा लगा आभार अपना कुछ पता ठिकाना देते तो कुछ बात चीत का सिलसिला आगे बढ़ता आभार

samra said...

very nice post sir...matlab mujhe yeh feel hua ki jab aap bohat saalon baad apne bichde hui jagah se milte hai ya logon se to kitne saare jazbaat hote jo ek sath umad aate hai..

mujhe is tym pata nhi kyun bohat acha feel ho raha hai aap udaipur ka trip padhke ..mujhe bhi apne purane din yaad aane lage..i really miss my school and frnds:)

piyush rajan said...

mukul ji ye dekh ker aacha laga ki aap ateet ko sahej ker rakhne me kitne utsuk rahte hai . purane dosto ko kojna aur milna to sabhi chahte hai per kam log hi aisa kar pate hai.

piyush rajan said...

mukul ji ye dekh ker aacha laga ki aap ateet ko sahej ker rakhne me kitne utsuk rahte hai . purane dosto ko kojna aur milna to sabhi chahte hai per kam log hi aisa kar pate hai.

umendra said...

un purani yade taja karne k lie mukul tumhe dil se dhanyabad deta hoon.jivan me smritian thi use es lekh ne sajeev kar dia

Umendra kumar Yadav said...

मुकुल पुरानी यादे ताजा करने के शुकिया आज पढ कर यादे जीवंत हो गयी umendra

Umendra kumar Yadav said...

purani smritio ko taja karne k lie mukul dhanybd. Aj sari smritia jivant ho gae.

BHASHA EXPRESS said...

बहुत अच्‍छा वृत्‍तांत है।

ANKIT Yadav said...

puraani yaade bahut hi takleef deti hai... guzare huye wo pal sabhi ki aankhe nam kar jati hai

पसंद आया हो तो