Friday, October 22, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :अंतिम भाग

अजय का फॉर्म हाउस 

 शाम को नीमच माता का कार्यक्रम तय हुआ उदयपुर के लगभग हर कोने से ये पहाड़ी दिखती है जिस पर नीमच माता का मंदिर है मंदिरों से मेरा जुडाव अब  सिर्फ इतिहास और उनके स्थापत्य के कारण ही रहा है नीमच माता इस लिए खास है क्योंकि ये हमारे हॉस्टल के ठीक सामने वाली पहाड़ी पर बना इसके इतिहास की जानकारी किसी को नहीं है बस मंदिर है और लोग पूजा करते हैं जब हम पढते थे तो लगभग हर महीने एकाध बार वहां जरूर जाते थे इसके भी कई कारण थे एक तो वहां से शहर बड़ा खूबसूरत दिखता है पूरा उदयपुर लगभग ७५० मीटर ऊंचाई से बहुत ठंडी हवा चलती है और वहां शांति से बैठकर नारियल खाने का आनंद जिसमे ये भी नहीं लगता था कि पैसे की बर्बादी हुई क्योंकि वो तो भगवान के नाम पर प्रसाद चढ़ाया हुआ होता था और जब पास में पैसे ज्यादा न हो तो इतनी ऐयाशी करने का हक  हम जैसे गरीब लोगों को उन दिनों हुआ करता था सोचा चलो देखेंगे कि वहां से हमारा हॉस्टल कैसा दिखता है पहले नीमच जाने का जो हम लोगों का मनपसंद रास्ता था वो पहाड़ियों के रास्ते से था एक तो उस से थकान कम लगती थी और वो छोटा  भी पड़ता था तब सीढियां बनी हुई थीं पर हम कभी उससे चढ़े नहीं पर इस बार स्तिथियाँ बदली थी अब मैं पर्यटक बनकर इस शहर में आया था सब अजनबी थे वहां भी बदलाव की बयार बह रही थी सीढ़ियों की जगह एक गलियारा ऊपर तक बन गया था सीढियां गायब थीं पहाड़ी बदली बदली लग रही थी हमारा शोर्ट कट न जाने कहाँ गायब हो गया था हालाँकि सारे रास्ते मैं उस जगह का अंदाजा लगता रहा लेकिन न जाने वो भी पुराने लोगों की तरह कहीं गम हो गया था हॉस्टल तो मैं देख ही नहीं पाया एक तो शाम हो चली थी दूसरे बीच में बहुत निर्माण कार्य हो गया था मंदिर भी बहुत बदल गया था लगता है अब काफी धनी भक्त यहाँ आने लग गए हैं जिनकी मुरादें यहाँ पूरी हो रही हैं भगवान भी लगता है वैश्वीकरण का शिकार हो रहे हैं ऐसा लग रहा था हमारी प्यारी जगह जहाँ हम कभी बैठा करते थे वो भी गायब थी हवा तो अब भी ठंडी चल रही थी पर पहले जैसा सुकून नहीं था शायद शन्ति मंदिर में नहीं हमारे दिमाग में होती है जिसकी तलाश में हम न जाने कहाँ भटकते फिरते हैं देखिये न मैं भी कहाँ से कहाँ पहुँच गया था . जिन यादों की तलाश में मैं यहाँ तक आ चुका था वो तो कहीं थी ही नहीं कुछ भी तो ऐसा नहीं था फिर क्या चीज थी जो मुझे यहाँ खींच रही थी शायद अजय की दोस्ती मुझे हमेशा लगता था कि जिंदगी के किसी न किसी मोड पर हम टकरायेंगे जरुर और आज मैं उसी के कारण अपने पुराने शहर में था शाम को हमारा भोजन बावर्ची होटल में था जहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजन का लुत्फ़ उठाया गया कष्ट इस बात का था अजय मुझे कही कुछ भी खर्च नहीं करने दे रहा था वो मेरी हर छोटी बड़ी जरुरत पर नज़र रखता था वो अगर हमारे साथ नहीं भी होता तो भी हर घंटे फोन करता धीरे धीरे हमारे लौटने का वक्त हो रहा था .आखिरी दिन हम लोगों ने होटल छोड़ दिया क्योंकि आख़िरी रात हमें अजय के फॉर्म हाउस में बितानी थी अजय अभी भी निश्चिंत नहीं था कि हम रात में वहां रुक पायेंगे या नहीं पर चूँकि अब हमें शहर छोड़ कर फॉर्म हाउस जाना था और वहां से एअरपोर्ट भी नजदीक था इसलिए मैंने कुछ देर के लिए पैदल शहर घूमने का फैसला किया पुराने लोग न सही पुरानी यादों को ही जी लिया जाए चेतक सर्कल , स्वप्नलोक,हाथीपोल फतहपुरा सब को विदा कह कर हम अजय के घर आ गए जहाँ से सबको फॉर्म हाउस के लिए निकलना था मुकेश अपने परिवार के साथ वहां हमसे जुड़ने वाला था अजय का परिवार हमारे साथ चल रहा था दोपहर के बाद हम सब अजय के फॉर्म हाउस पर थे .फोर्म् हाउस फिल्मों में देखा था कभी किसी फॉर्म हाउस में वक्त बिताने का पहला मौका था खूबसूरत भव्य विशाल मेरे पास इससे ज्यादा शब्द नहीं उसके बारे में लिखने को बीच में सुन्दर गोल लान सुन्दर मकान जहाँ आधुनिक जीवन की सब सुविधाएँ थी मुकेश के आ जाने के बाद क्रिकेट का खेल शुरू हुआ हालाँकि महिलाएं पहले से खेल रहीं थी पर अजय को कोई भी आउट नहीं कर पाया स्कूल के ज़माने से अजय क्रिकेट खेल रहा था इस बात के गवाह विद्या भवन की टूटी हुई डेस्कें थी फिर वहां लकडियों की कमी भी नहीं थी शाम घिर रही थी और उसके बाद जो सूर्यास्त मैंने वहां देखा वो अद्भुत था सूरज धीरे धीरे अस्ताचल को जा रहा था मैं टकटकी लगाये उसे देख रहा था अपने कैमरे की नज़र से आज उदयपुर में हमारी आख़िरी शाम थी बरसों के बिछड़े दोस्त मिले और आज के बाद फिर बिछड जाने वाले थे और फिर रह जानी थी यादें उदयपुर कल फिर मेरे लिए इतिहास हो जाने वाला था लेकिन इस बार बहुत कुछ यहीं छूट जाने वाला था मेरे मन का एक हिसा यहीं रह जाने वाला था अजय के पास , उसके फॉर्म हाउस पर जिंदगी तो चलती रहेगी मैं भी अपनी जिंदगी में मशगूल हो जाउंग और शायद अजय भी लेकिन जीवन के कुछ ऐसे पल हमेशा के लिए मेरी यादों का हिसा बन जाने वाले थे मैं चाह रहा था वक्त यहीं रुक जाए पर जो रुक जाये वो वक्त नहीं हो सकता दाल बाटी चूरमा तैयार था बरसों पहले खाया था क्लास कैम्प में आज फिर, जिंदगी एक  कैम्प ही तो है बस्ती है उजडती है पता नहीं अभी मुझे कितनी बार और बसना है उजड़ना है  खाना खत्म होते होते १० बज चुके थे और फिर अजय और मुकेश ने अपने परिवारों के साथ विदा ली इतना सन्नाटा और शांति जीवन में कम ही जगहों पर महसूस की है जब आप मौन से बातें कर सकें जब आप अँधेरे में देख सकें जब आप अपने  अंदर झाँक सकें कुछ ऐसा ही माहोल था चारों ओर अँधेरा  मैं सोच रहा था जिंदगी कितनी खूबसूरत लगती है कभी कभी पर कल मुझे फिर एक नयी दुनिया में होना है जहाँ दिल नहीं दिमाग चलता है जहाँ रिश्ते आपसी लेंन  देंन  और स्वार्थ पर बनते हैं अजय ने जो कुछ किया वो क्यों किया जिंदगी में इतने साल के बाद भी वो मुझे क्यों नहीं भूला कोई जवाब नहीं है इन प्रश्नों का मेरे पास आपके पास हो तो जरूर बताएगा चलते चलते अजय ने मेरे लिए एक विशेष गणेशजी की मूर्ति मुझे भेंट की जो उसने मेरे लिए अपने कारखाने पर बनवाई थी . अलविदा अजय जिंदगी को कुछ पल के लिए ही सही खूबसूरत बनाने के लिए शुक्रिया  अलविदा उदयपुर जिंदगी रही तो फिर मिलेंगे

नारू  जी फॉर्म हाउस के रखवाले 

फॉर्म हाउस का विहंगम दृश्य 

डूबता सूरज :कल फिर निकलेगा 

फॉर्म हाउस में बना घर 
समाप्त

13 comments:

ashish said...

गुरुजी! आप ने तो भाव बिभोर कर दिया....,इंसान कितना बेबस होता है ????? .......काश! वक़्त पर कोई जोर चलता ..... .आप के दोस्त और आपकी दोस्ती को सलाम!!!!

Anonymous said...

sir aap apne sath sabko samil kar lete mja a gya padkar bas roya nhi hu

brijendra said...

dhanyawaad Mukulji, ek to waqt bereham hota hai, ooper se aapki jyadaatiya; puraani yaado ko is tarike se koi yaad dilata hai kya ki aah si nikalne lage dil se. Aapne bahut galat kiya akele jaa ke vahan. Vahan ki swarnim yaade: pata nahi vo jagah swarnim hai, ye vo umra, ya dono?
Brijendra

deepu said...

sir jitni bar pado utna jyada apki yatra padne ka man karta hai

दस्तक said...

sir aaj maine jab aapki is yaatra ke sabhi bhaag ek k baad ek lagataar padhe to bht anand aaya..aur aapke jeevan ka ek pehlu bhi pata chala..jo shyd kabhi class me rhkar nahi jaan paayi..!

Abhigyan said...

aapki aur Ajay ki dosti ko namaskar aur prarthna hai ye dosti aise hi bani rahe. Bahut achcha lagya tumhari yatra ka varnan padh kar ke. God bless Vidya Bhawan.

Mukesh Mehrotra said...

Wo fatah Sagar ki sham, wo Eswal ke phafare,wo pandit ji ki Cycle,wo Munna ki canteen,wo Nimach Mata se udaipur ka drishya,wo mess ki ghanti,wo techncal section, wo assembly hall, wo Jamnalal....Kaun bhool sakta hai !Lagata hai aapane Vidya Bhawan ko pure man se jiya hai.

AAGAZ.. said...

आपकी उदयपुर यात्रा के सारे भाग पढ़े.. पढ़कर इस पर टिप्पणी करने से ज्यादा उदयपुर घूमने का मन हुआ.. आपका वृतांत पुराने दोस्तों की याद दिला गया जब बिना किसी स्वार्थ के दोस्ती हुआ करती थी.. शुक्र है कि मेरे पुराने और सबसे प्यारे दोस्त बिना किसी स्वार्थ के आज भी मेरे साथ हैं..

दोस्ती और दोस्तों के लिए-------

ज़िन्दगी राह है समंदर का
तुम अगर साथ हो तो अच्छा है
वक़्त की तनहाइयों की महफिलों में
यूँ अगर बरसात हो तो अच्छा हो..
("collected " )

archana chaturvedi said...

Sr ji ager bura na maan to aapki is yatra vadnan ka mukabla koi or yatra nai le sakti ...is yatra ke 6 bhag hai or aage padne ki usukta barabar bani rai aapka bhut bhut dhanyawaad jo apne itne khash pallo ka jikr kiya

virendra kumar veer said...

uday pur ki yatra par aab koi comment karne ka mann nahi kar raha hai,sabhi yataoin me uday ki yatra bahut hi majedar rahi aab to uday pur jane ka mann kar rha hai.

swarth dosti ko kamjor kar deta hain. aur hum is kamjori ko nahi palte hain sir. isliye aaj bhi har mod par humare dost humre saat hain bina kisi swarth ke.

Chandni said...

apki udaipur ki yatra ka varnan padh kar behad anand praapt hua....meri dua hai ki apki aur ajay ji ki dosti hamesha salamat rahey.........

ARUSHIVERMA said...

Time and tide waits for none, each and every aspect of life is covered in this article.

Shambhu Nath said...

पागल बना देते हो मुकुल... इतना जज़्बाती तो अपने संस्मरण से नहीं होता जितना तुम्हारे से हो जाता हूं

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