Thursday, October 21, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :द्वितीय भाग

चेतक सर्कल जहाँ पिक्चर हाल भी है 

इस यात्रा पर आगे बढ़ने से पूर्व मैं आपको अजय और अपने स्कूल के बारे में थोडा सा बताता चलूँ मैं विद्या भवन स्कूल में १९८९ से १९९३ तक पढाई की आज तक मैंने अपने जीवन में इतना बड़ा और सुविधाओं वाला स्कूल नहीं देखा ये अलग बात है कि जब हम स्कूल पहुंचे उसकी सुविधाएँ पर्याप्त रख रखाव के खतम होने लग गयी थीं पर विद्या भवन में पूरे व्यक्तित्व विकास पर ध्यान दिया जाता था यानि पढाई –लिखाई के अलावा खेल कूद संगीत शिल्प आदि की सभी सुविधाये थी हाँ पर आप  इसे अनुशासन की कमी कहें या योग्य शिक्षकों का अभाव या विद्या भवन का बच्चों को सिखाने का अपना तरीका किसी बात पर जोर न देना इसलिए जो सीखना चाहता उसके लिए सब कुछ था बड़े बड़े खेल के मैदान होकी  का अलग फुटबाल का अलग बास्केट बाल कोर्ट सब कुछ था ऊपर से प्रकृति का साथ हरियाली शांत इलाका जहाँ आप मौन से एकाकार हो जाएँ पढ़ने के लिए एक बड़ा पुस्तकालय जहाँ दुनिया भर का साहित्य भरा हुआ था अगर कुछ कसर रह जाए तो सेवा मंदिर का पुस्तकालय भी था जो कि विद्या भवन ट्रस्ट का ही था अक्सर मैं सुबह होने वाली असेम्बली (प्रार्थना ) से गायब होकर सेवा मंदिर भाग जाया करता था जहाँ सारे अखबार पढ़ कर लौट आता ये बात तब की है जब हमें विद्या भवन में पढते हुए २ साल हो चुके थे .मुझे आज भी सामूहिक प्रार्थना समय की बर्बादी लगती है खैर ये मेरा मानना है और सब उस से सहमत हों ये जरूरी नहीं सेवा मंदिर पुस्तकालय बहुत ही खूबसूरत एवं व्यवस्थित था वे दिन धर्मयुग और रविवार के आख़िरी दिन थे साहित्य और अख़बारों से मेरा वास्तविक परिचय यहीं हुआ तब हमारे घर में एक अखबार ही आता था वैसे मेरे पिता जी का वश चले तो अब उसकी भी जरुरत नहीं है वहीं मैंने जाना देश और दुनिया कैसे बदल रही है ईराक का कुवैत पर आक्रमण हो या सोवियत संघ का पतन सबसे महत्वपूर्ण  मसला मंडल और कमंडल का उदय उन्हीं दिनों हुआ और मैंने भी खूब पढ़ा लेकिन अब लगता है इस मसले पर ज्यादातर जानकारियां एकपक्षीय थीं अजय से मेरी मुलाकात ११ वीं क्लास में हुई अजय किसी दूसरे स्कूल से आया था मैं भी पहली बार एक ऐसी क्लास में जिसमें शहर वाले बहुसंख्यक थे इस पहले हॉस्टल और शहर दोनों की टक्कर बराबर की रहा करती थी ऐसे में हम हॉस्टल वाले शहर वालों से थोड़ी दूरी बना कर  रहते थे ११ क्लास में सिर्फ ४ लोग ही हॉस्टल वाले थे इसका भी एक कारण था ११ क्लास में ज्यादातर हॉस्टल वासी विज्ञानं विषय की और चले गए और मैंने मानविकी (कला ) विषय लिया हालाँकि मेरे इस फैसले की तत्कालीन मित्रों ने सराहना नहीं की थी पर मुझे अपनी हैसियत पता थी इस तरह शहर के काफी लड़के मेरे मित्र हो गए लेकिन मुझे अजय का साथ ज्यादा अच्छा लगता था हालाँकि वो काफी शरारती था और शिक्षकों को परेशान उसके और उसके अन्य मित्रों का प्रिय शौक था मैं बस मूक दर्शक बन उन स्थितियों का आनंद लिया करता था दिन बीतते रहे और हमारी पढाई चलती रही साथ साथ दोस्ती भी पढ़ने लिखने में ठीक ठाक होने के कारण (ऐसा लोगों का मानना था ) कई स्वार्थी मित्र बन गए जो किसी न किसी बहाने अपना काम करवाना चाहते थे और हॉस्टल के चक्कर काटा करते थे अजय भी हॉस्टल आता था पर मेरे बहुत याद करने पर भी कोई ऐसा वाकया मुझे नहीं यादआया जब अजय हॉस्टल किसी काम से आया हो वो सिर्फ मुझसे मिलने आता था
मेरी चिठ्ठी जिसे अजय ने १५ साल से सम्हाल कर रखा था 
लेक पैलेस 
बातें बहुत सी हैं वो फिर कभी सही पर ११ और १२ में मेरे टॉप करने की खबर मुझे अजय के पत्रों से ही मिली थी १२ वीं के आख़िरी पर्चे के दिन ही हमारा आरक्षण था लखनऊ के लिए इसलिए मैं उस से बगैर मिले चला आया था लखनऊ आकार मैंने उसे दो बार पत्र लिखा था जिसमें एक बार उसका जवाब भी आया फिर हम सब अपनी अपनी जिंदगी में मशगूल हो गए मैंने भी सोचा अजय मुझे भूल गया होगा और अजय ने भी ये मान लिया था कि मैं भी उसे भूल गया ,पर जब इस बार मैं अजय से मिला तो उसने मेरे द्वारा १९९५ में लिखे दोनों पत्रों को दिखाया उन दोनों पत्रों को उसने इतने अच्छे से सम्हाल रखा था कि लगता है जैसे वे कल ही लिखे गए हों (शुक्रिया अजय )हालाँकि उन पत्रों को मैंने १५ साल पहले लिखा था सच सच कहूँ तो मुझे इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी क्योंकि मैंने उसे पत्र भी लिखा था ये बात मैं भी भूल चुका था (मुझे सिर्फ एक चिठ्ठी की याद थी ) कभी कभी यूँ ही बैठे बैठे बी एस एन एल की साईट पर उसका नंबर खोजता था पर वो कभी मिला नहीं मुझे लगता था अजय का स्वभाव ऐसा था नहीं कि वो कंप्यूटर से दोस्ती करेगा पर ये नियति का खेल देखिये मना जाता है कि मैं थोडा बहुत कंप्यूटर जानता हूँ पर मैं उसे नहीं खोज पाया और उसने पहले मुझे खोज लिया और फिर मैं उदयपुर में था सिर्फ अजय के लिए दूसरे दिन अजय अपनी पारिवारिक समस्याओं में व्यस्त था इसलिए हम लोगों ने अकेले घूमने का निश्चय किया पहले गुलाब बाग उदयपुर का छोटा सा चिड़िया घर जिसे आप १ घंटे में घूम सकते हैं फिर बारी थी लेक पैलेस और सिटी पैलेस की झील के बीच में बना हुआ एक महल जिसे अब एक होटल का रूप दे दिया गया है जिस से उदयपुर के पूर्व महाराणा के वंशजों का जीवन यापन होता है सिटी पैलेस अधिकारिक रूप से उदयपुर के महाराणाओं का महल रहा है (सिवाय महाराणा प्रताप के वे कभी महल में नहीं रहे अपने द्वारा ली गयी प्रतिज्ञा के कारण ) इसको बनवाने की शुरुवात महाराणा उदय सिंह ने की थी जिन्होंने उदयपुर शहर भी बसाया अपनी झीलों के कारण उदयपुर को भारत का वेनिस भी कहा जाता है इस महल को अब संग्रहालय का रूप दे दिया हो महाराणा के वंशजों ने जिसमे महंगे टिकट पर आप उदयपुर के पुराने इतिहास की झलक पा सकते हैं ध्यान रहे किसी भी तरह के कैमरे को अंदर ले जाने की फीस मात्र २०० रुपये है इस महल का हिस्सा निजी आयोजन के लिए भी दिया जाता है सशुल्क यहाँ जो भी चीजें हैं वो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ज्यादा पुरानी नहीं हैं विदेशी पर्यटकों के लिए ये बड़े आकर्षण का केंद्र है इसका रखरखाव महाराणा मेवाड़ फाउन्डेसन करता है उदयपुर की झीलों में बने होटलों में अकसर कई रिअलिटी शो की शूटिंग होती रहती है राहुल और राखी का स्वयंवर यहीं हुआ जब मैं यहाँ पढ़ा करता था कई फिल्मों की शूटिंग 
मैं और अजय 
देखने का लुत्फ़ उठाया था जिसमे धर्म संकट , फूल बने अंगारे , खुदा गवाह थीं .अब बारी थी भोजन की मैंने चेतक सर्कल पर भोजन करने का निश्चय किया वैसे यहाँ चेतक सर्कल को चेटक सर्कल बोलते हैं शहर का व्यस्त चौराहा चेटक सर्कल जहाँ अब काफी भीड़ होने लग गयी है पहले ये एक शांत  इलाका था परिवर्तन प्रकृति का नियम है सुना था देखा उदयपुर में
जारी ................
तीसरा भाग पढने के लिए क्लिक करें http://mukulmedia.blogspot.in/2010/10/blog-post_22.html#.V1fsFZF96Ul

4 comments:

PRATIGYA SHUKLA said...

sir aage kb likh rhe hain........ aur vaakai me apke dost ki to baat hi alag hai sir abhi tk letter rkha hai unhone......

Ashish said...

आपका ब्लॉग पढ़ा अच्छा लगा, आपके माध्यम से मुझे भी उदयपुर और उस स्कूल के बारे में जानने का मौका मिला जहा से आपकी शुरुआती शिक्षा हुई है, आपके लिखे लैटर को अजय ने कैसे अब तक सहेज कर रखा था ये दोस्ती की गहराईयों को दिखती है, सच में कमाल का दृष्टांत लिखा है, पढ़ कर हर कोई भावुक हो जायेगा

virendra kumar veer said...

AAPKE BLOG SE UDAY PUR KI SAIR BHI KAR LI SIR.
KYA DOSTI HAI SIR, AUR HAISIYAT KI HISAAB SE HI KAAM BHI KARNA CAHIYE.SAMUHIK PRARTHNA SE ACCHA HAI KUCH AISA KIYA JAYE JISSE LOGA KA BHALA HO FALTU ME TIME BARBAAD KARNE SE KYA FAYDA.JINDAGI KUCH ACHE DOST MILTE HAIN TO KUCH BURE.

archana chaturvedi said...

Aapke yatra varttant ik dum jivant hai bhut hi rochk

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