Friday, October 22, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :तृतीय भाग

मोती मगरी महाराणा प्रताप स्मारक 
फतह सागर 
 सुखाडिया सर्कल भी एक प्रमुख चौराहा है इस चौक का नाम राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री मोहन लाल् सुखाडिया के नाम पर है जहाँ खूबसूरत फोव्वारे लगे हैं अब बोटिंग होने लगी है जब हम लोग यहाँ पढते थे  तो होली वाले दिन यहाँ रंग खेल कर इसमें डुबकी लगाते  थे तब ये भी एक शांत इलाका था अब यहाँ भेल पूरी और पाव भाजी और मटका कुल्फी की दुकाने हैं दिन में फिर भी शांति रहती हैं लेकिन शाम होते ही यहाँ अच्छी  खासी भीड़ हो जाती है जैसे लखनऊ में बाग और नगर बहुतायत में हैं उसी तरह उदयपुर में जगहों का नाम सर्कल (सुखाडिया सर्कल ,चेतक सर्कल ) , और पोल (सूरज पोल , चाँद पोल ,हाथी पोल ) पर हैं मैंने जानने की कोशिश की पर इसका कोई सटीक उत्तर नहीं मिल पाया सुखाडिया सर्कल से लगा हुआ है सहेलियों की बाडी ,ये एक उद्यान है जहाँ खूब सारे फोव्वारे लगे हुए हैं उदयपुर के राजघराने की महिलाओं के लिए इस उद्यान का निर्माण किया गया था जहाँ वो अपना मन बहला सकें इस उद्यान की खास बात ये है कि इसमें पम्प या मोटर से फोव्वारों में पानी  नहीं आता इस उद्यान का सीधा सम्बन्ध फ़तेह सागर झील से है वहां पर इकठ्ठा हुए पानी के दबाव से इस उद्यान के फोव्वारे चलते हैं . खूबसूरत जगह है यहीं पर दूसरे दिन अजय से फिर मुलाक़ात हुई वो अपना काम छोड़ कर सिर्फ ये पता करने आया कि सब ठीक है कि नहीं या मुझे कोई परेशानी तो नहीं हालाँकि उदयपुर और यहाँ के स्थल मेरे लिए नए नहीं थे मैं यहाँ के चप्पे चप्पे से वाकिफ था फिर भी वो नहीं माना शाम को मिलने का वायदा करके वो चला गया इसके करीब में भारतीय शिल्प लोक कला मंडल है जहाँ  कठपुतली के शो होते है इसके अतिरिक्त भारतीय लोक कलाओं का अच्छा संग्रहण यहाँ है कठपुतली का शो राजस्थानी भाषा में था जो मुझे थोड़ी बहुत ही समझ में आती है लेकिन शो अच्छा था राजस्थानी भाषा में सा को हा बोलते हैं हम लोग अपने स्कूली दिनों में इसका काफी मजाक बनाया करते थे जैसे ये पूछना सेठ जी साबुन है क्या इसे राजस्थानी में बोलेंगे हेठ जी हाबुन है कई , कई मतलब क्या होता है .बेटी शब्द सभी के लिए समान रूप से प्रयोग होता है यानि लड़का लड़की सभी के लिए एक ही शब्द बेटी एक और वाक्य जिसने मुझे पुराने दिनों की याद दिला दी चल वा  कई बात नईं नईं शब्द नहीं के रूप में बोला जा है  मतलब छोडो यार कोई बात  नहीं आम राजस्थानी भोला और सीधा होता है ये धारणा मेरी पहले भी थी और इस बार की यात्रा में भी मुझे ऐसा ही महसूस हुआ उदयपुर में एक ही मॉल है जहाँ किसी भी हमारे तरफ के भाई के लिए हाथ साफ़ करना बहुत आसान है .दिन भर घूमने के बाद मुझे कोई थकान नहीं थी मैं यहाँ सिर्फ चार दिन के लिए था  और
सहेलियों की बाडी 
भारतीय लोक कला मंडल 
 ऐसे में आराम करने का कोई मतलब नहीं था वैसे भी मैं उदयपुर घूमने नहीं अपने बरसों पुराने मित्र से मिलने आया था .अब बारी थी मोती मंगरी घूमने की जहाँ महा राणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी ऐसा मुझे बताया गया था बरसों पहले एक पहाड़ी पर एक छोटा सा खंडहर नुमा किला है जहाँ महाराणा प्रताप की एक विशाल मूर्ति लगी है इतने सालों के बाद ये जगह भी बदल गयी खूब सारी और मूर्तियां लग गयीं और पार्क बना दिए पहले हम लोग यूँ ही घूमने चले जाया करते थे पर अब कैमरे तक का टिकट था यहाँ से फतह सागर बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ता है पर्यटन एक फलता फूलता उद्योग है इसकी जीती जगती मिसाल है उदयपुर के विभिन्न स्मारक जो कुछ बिक सके बेच डालो संस्कृति इतिहास यही तो वैश्वीकरण है क्या करेंगे गन्दा है पर धंधा है


सुखाडिया सर्कल

जारी .......................................
शाम को हमारे भोजन का इन्तिजाम सुखाडिया सर्कल पर था पाव  भाजी और भेल पूरी अपने जीवन में पहली बार इस यात्रा में खाना हुआ उसके बाद मैंने और अजय ने बर्फ का गोला खाने का निश्च्चय किया राज स्थानी में इसे गोटा बोलते हैं यानि हेठ जी गोटो है कई ,हा हा 

चौथा  भाग पढने के लिए क्लिक करें http://mukulmedia.blogspot.in/2010/10/blog-post_3680.html#.V1fsRZF96Ul

2 comments:

Abhigyan said...

mitrawar, bahut achcha varnan kiya hai aapne. Sare sthan aakhon ke samne ghum gaye hai.
Abhigyan

archana chaturvedi said...

Heat ji maane aage padhe do khadi to badi chokho so

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