Friday, October 22, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :चतुर्थ भाग

श्रीमती पुष्पा शर्मा 
जेहरा मैडम 

 मैं  जब तक उदयपुर में रहा फतेहसागर जाना नहीं भूल शाम को यहाँ भी काफी भीड़ होने लग गयी है और देर रात तक लोग यहाँ अपने परिवार के साथ घूमते रहते हैं फतहसागर तो गुलज़ार हुआ है पर वो शांति जो हमें अपने स्कूल के दौरान यहाँ आकर मिलती थी अब नहीं रही अगले दिन मैंने फैसला किया आज स्कूल चला जाए , अजय चूँकि देर से सोकर उठता है इसलिए उसे बताये बगैर मैं स्कूल पहुँच गया .लग ही नहीं रहा था ये वही इंटर कॉलेज है जहाँ चारों  तरफ रौनक रहा करती थी हँसते खिलखिलाते बच्चे हर जगह दिखते थे .  कैंटीन उजड़ी हुई वेद् प्रकाश शर्मा के उपन्यास से शब्द उधार लूँ तो विधवा की मांग की तरह सूनी सीधे प्रिंसपल रूम की तरफ गया आजकल प्रिंसपल श्रीमती पुष्पा शर्मा हैं जिन्होंने हमें ९.१०.और ११ में इंग्लिश  पढ़ाई थी मुझे उम्मीद कम  थी वो मुझे पहचान पाएंगी हालाँकि सुरक्षित रास्ते के तौर पर मैंने अपनी दाढी ,मूंछे गायब करवा दीं थी जिस से मैं पुराने जैसा लगू वो किसी काम से अपने कक्ष से बाहर निकल रहीं थी मैंने उन्हें देखते ही अभिवादन किया और अपना नाम बताया बस नाम बोलते ही उनके जेहन में हमारा पूरा बैच घूम गया तुरंत उन्होंने अपना सारा काम छोड़ कर मुझसे बात करना शुरू कर दिया मेरी पत्नी जो इस यात्रा में मेरे साथ थीं वो अचंभित सी सारा दृश्य देख रहीं थी बाद में उनकी टिप्पडी थी ऐसा भी कहीं होता है क्या तुरंत पुराने दिनों की याद को ताजा करने का सिलसिला शुरू हो गया जिसमे कैंटीन की ताजी कचौरियों की गर्माहट भी शामिल थीं ,पुष्पा मैडम से मैं उन दिनों सबसे ज्यादा बात किया करता था तभी जेहरा मैडम वहाँ आ गयीं जिन्होंने १० वीं कक्षा में विज्ञान पढाया था फिर बातें और मुलाकातें खूब हुई लेकिन जो तस्वीर मैं विद्या भवन की अपनी दिमाग में बना कर वहां लोगों से मिलने गया था उन सबसे नितांत अलग अनुभव हो रहा था जो दुखद था  वो वक्त अब बीत चुका था जब हम वहां पढ़ा करते थे वो सारे साथी वहां से जा चुके थे बहुत से शिक्षक या तो स्वर्गवासी हो गए थे या सेवामुक्त इन सबके बीच मैं अपने स्कूल को खोजने की कोशिश कर रहा था लेकिन वक्त बदल चुका था और दुनिया भी हमेशा भरा रहने वाला पुस्तकालय खाली  था किताबें कम  हो गयी थीं हमारी संगीत शिक्षिका वहाँ मिलीं उनकी बातों से लगा स्कूल से संगीत जा चुका है .कला की बारीकियां सिखाने वाले नसीम साहब अब बूढ़े हो चले थे इनके हाथ में कैमरा देख कर पहली बार मुझे कैमरे से प्यार हुआ था लेकिन अब की दुनिया पुरानी दुनिया जैसी नहीं थी सब कुछ वैसा ही था कुछ बदलावों को छोड़कर पर न जाने क्यों मैं उन सबसे अपने आप को जोड़ नहीं पा रहा था शायद यही जीवन है जो लगातार चलता रहता है आगे बढ़ता रहता है फिर यादों से जीवन की प्रेरणा ली जा सकती है पर उनसे चिपक कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता हम भी अपने क्लास रूम की ओर बढे न वैसे बच्चे थे न वैसा माहौल सब कुछ ठहरा हुआ, थमा हुआ   विद्या भवन की तरह अजय कहता है १९९३ के बाद स्कूल पीछे लौट गया नए ज़माने से टकराने की हिम्मत देने वाली संस्था का ये कायराना रवैया मुझे नहीं भा  रहा था. पुष्पा मैडम हमारे साथ थीं हालाँकि उन्हें कहीं जाना था फिर भी उन्होंने पूरा वक्त दिया मेरे कुछ प्रिय शिक्षकों में से ज्यादातर अब वहां नहीं थे पर उनकी स्मृतियों के निशान मैं वहां खोज रहा था खत्री साहब और उम्मेद सिंह दोनों अच्छे खिलाड़ी अब नहीं रहे ,रमेश शर्मा सर का भी निधन हो चुका है हाँ मधु मैडम से संक्षिप्त मुलाकात जरुर हुई हर जगह से भोजन का बुलावा घर आओ ढेर सारी बातें करेंगे मैं बेमन से नंबरों का आदान प्रदान कर रहा था मुझे पता था मुझे किसी के यहाँ नहीं जाना ये मेरा तरीका था अपने गुस्से को जताने का मैं तो उस विद्या भवन से मिलने आया था जहाँ जिंदगी का सबसे अलमस्त दौर गुजरा था पर ये क्या ये तो एक ठहरा हुआ संस्थान है
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

मैं और अजय स्कूल में 

जिसको न आगे बढ़ने की चाह है और न जिसके पास आने वाली पीढ़ियों को देने के लिए सुनहरे सपने हैं तभी अजय का फोन आ गया वो भी थोड़ी देर में स्कूल में मेरे साथ था अब मेरे साथ एक साथी था जो उन लम्हों को जी सकता है जो अब जीवन में कभी लौट कर नहीं आयेंगे सारी प्रयोगशालों का बुरा हाल था एक वक्त में यहाँ के लैब विश्वाविद्लयों  को टक्कर देते थे भूगोल लैब जहाँ माथुर साब बैठा करते थे वीरान सा पड़ा था माथुर साहब की एक खास बात थी जाडा ,गर्मी या बरसात वो सिर्फ पैंट शर्ट में ही मिलते थे नीली पैंट और हल्की नीली शर्ट किसी ने उन्हें कोट या स्वेटर पहने कभी नहीं देखा मुझे पता चला वो भी सेवा मुक्त हो चले हैं. कैंटीन में कुछ छोटे बच्चे दिखे हमारे वक्त में जूनियर सेक्सन का कोई भी बच्चा वहां जाने की हिम्मत नहीं करता था एसेम्बली हाल सिर्फ अपनी परछाई दिख रहा था वहाँ भी क्लास चलती देख मुझे थोडा अचरज हुआ विद्याभवन में जगह की कमी कभी नहीं रही फिर इस शांत खूबसूरत को क्यों नष्ट कर दिया गया . जेहरा मैडम से मिलने हम लोग जूनियर सेक्सन गए जहाँ कि अब वो इंचार्ज थी वहीं पुष्पलता श्रीमाली मैडम भी मिलीं जिन्होंने कभी हमें संस्कृत पढ़ाई थी वहां से लौटते वक्त जेहरा मैडम की आँखें भर आयें पर न जाने क्यों मुझे कुछ नहीं  हुआ क्या वाकई अब बच्चे संस्कारी नहीं रहे या दुनिया बदल गयी. अजय मेरी पत्नी को उन जगहों के बारे में बता रहा था जिनसे कुछ न कुछ किस्से जुड़े हुए थे पर मैं तो कहीं और था उन यादों में जिसका मैं और ये स्कूल साथ साथ कभी हिस्सा थे एक बारगी मुझे ये लगा कि शायद मुझे स्कूल आना ही नहीं चाहिए था कमसे काम यादों में तो सब कुछ वैसा ही रहता जैसा मैंने छोड़ा था पर अब तो सब बदल जाएगा हमेशा के लिए विद्या भवन अब पहले जैसा नहीं दिखेगा अब वास्तविकता कुछ और है  स्कूल घूमने के बाद मैंने विदा ली
उस जगह से जिसने मेरे व्यक्तित्व निर्माण में एक बड़ी भूमिका निभायी है अलविदा विद्या भवन पता नहीं इस जीवन में दुबारा आना हो या न हो 
पुष्प लता श्रीमाली मेरी संस्कृत शिक्षिका 
जारी ..................
पांचवा भाग पढने के लिए क्लिक करें http://mukulmedia.blogspot.in/2010/10/blog-post_7341.html#.V1fsfJF96Ul



4 comments:

ashish said...

इंसान कभी कभी बहुत चाहकर भी कुछ नही कर सकता.....अपने विद्यालय के प्रति आप के इस प्रेम और इस लगाव को मेरा नमन......

Digvijay Singh Rathor Azamgarh said...

sir itne dino bad school wapas jana sahi main adbhut hai.

Abhigyan said...

dost, aisa na bolo, mera Udaipur jane ka jo sapna hai, use dhumil mat karo. Tumhare dil me jo gussa hai, usse lagta hai ki vastav me Vidya Bhawan badal gaya hai. Pusha madam aur Pushplata madam ke chechre par samay ki lakire saaf nazar aati hai. Kahte hain ki parivartan prakriti ka niyam hai. But I really hope if these changes makes Vidya Bhawan a better place.
Abhigyan

archana chaturvedi said...

Is lekh me aapki udasi saaf jahir ho rahi hai

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