Friday, October 22, 2010

उदयपुर संस्मरण यात्रा :पंचम भाग

मुकेश का प्रिंटिंग प्रेस साथ में अजय 
हल्दीघाटी 

 दोपहर हो चली थी मैं पहली बार अजय के घर जा रहा था सुन्दर आलीशान मकान अजय संगमरमर का एक व्यवसायी है और ऐसा लगता है कि उसका काम धंधा अच्छा चल रहा है अजय की माँ , पिता जी उसकी पत्नी से मुलाकात हुई अजय की माँ पारम्परिक भारतीय सास से एकदम अलग उनके अंदर सास वाली हनक तो थी लेकिन वे प्रगतिशील भी दिखीं मुझे हनक का कारण शायद अजय के पिता जी का बहुत सीधा होना हो वे सरकारी सेवा से मुक्त हो जीवन का आनंद ले रहे हैं अजय की माता जी को कर चलाने का जबरदस्त शौक है उन्होंने मुझे खुद ही बताया कि प्रतिदिन २० किलो मीटर कार चलाती हैं और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं जैन धर्म से सम्बन्धित कई संस्थाओं के माध्यम से वे समाज सेवा करती हैं अजय की शादी का एल्बम देखते वक्त एक पुराना मित्र उसमे दिखा तुरंत उसका नंबर खोजा गया मुकेश चौधरी उदयपुर के सबसे बड़े प्रिंटिंग प्रेस का मालिक उसने बड़ी आत्मीयता से हम सबको अपने घर आमंत्रित किया दोपहर का भोजन हमने मशहूर गुजराती होटल नटराज में किया ये होटल गुजरातियों में बहुत लोकप्रिय है वैसे खाने के मामले में राजस्थानी खाने का भी कोई जवाब नहीं बात खाने की चली है थोडा सा इस विषय पर बात कर ली जाए राजस्थान में जैन धर्म के मानने वालों की जनसँख्या काफी ज्यादा है यह धर्म पूरी तरह अहिंसा में विश्वास करता है इसलिए यहाँ मांसाहारियों की संख्या काफी काम है जब हम हॉस्टल में थे तो हमें इस चीज का बड़ा कष्ट था कि हफ्ते में एक दिन भी हमें मांसाहार नहीं मिलता था अब तो मेरे लिए बाहर खाना खाने का मतलब ही मांसाहार होता है चूँकि मैं उदयपुर की स्थिति जानता था इसलिए मैंने मांसाहार के बारे में सोचा ही नहीं फिर इतने दिनों के बाद असली राजस्थानी खाने का स्वाद मिल रहा था गट्टे की सब्जी , फाफड़ा , मिर्च बड़ा और सबसे अलग दाल बाटी चूरमा .खाने के बाद हम लोग मुकेश के घर पहुंचे मजेदार बात ये है कि मेरे उदयपुर छोड़ने के बाद मुकेश की अजय से ये दूसरी मुलाक़ात थी खैर देर आये दुरुस्त आये थोड़ी देर रुक कर हम लोग मुकेश की नयी प्रिंटिंग यूनिट देखने डबोक गए जबरदस्त मशीने लगाई हैं मुकेश ने एक मशीन साढे छ करोड की थी सबकुछ मशीन से हो रहा था उसके बाद कार्यक्रम ये बना कि यहीं से थोड़ी दूर पर अजय का फॉर्म हाउस है क्यों न उसे भी देख लिया जाए वो फॉर्म हाउस क्या छोटा जंगल कहूँगा मैं उसे शहर से दूर शांत पर उसमे बने एक छोटे से मकान में शहर की सारी सुविधाएँ थीं तो अजय ने एक प्रस्ताव रखा कि उदयपुर से जाने के पहले एक रात मैं यहाँ रुकूं वैसे अजय को शक था कि मैं शायद ही रात को यहाँ रुक पाऊंगा पर मैंने सहर्ष हाँ कर दी फॉर्म से लौटते लौटते शाम हो चली थी उस दिन रात का खाना हम लोगो ने होटल में ही खाया .अगला दिन काफी व्यस्त रहने वाला था सुबह अजय ने ड्रायवर समेत गाड़ी भेज दी थी जो हमें एकलिंग और नाथद्वारा ले जाने वाली थी एकलिंग नाथद्वारा और हल्दीघाटी ले जाने वाली थी . होटल से निकलते ही मैंने गाड़ी अपने हॉस्टल की तरफ मुड़वा दी हमारा हॉस्टल स्कूल से लगभग एक किलो मीटर दूर था जिसके सामने एक नहर बहा करती थी जो फतह सागर में गिरती थी एक दम सीधा रास्ता देवाली से होकर जाता था पर हम लोग उस रास्ते का प्रयोग नहीं करते थे एक शोर्ट कट था उस से हम लोग आया जाया करते थे अपने अरुणोदय सदन पर ये क्या मैं रास्ता भूल रहा था चारों तरफ मकान ही मकान जिन पहाड़ियों पर से हम गुजरा करते थे वहां कॉलोनी बन गयी थी नहर के उस पार जहाँ सिर्फ जंगल था मकानों की कतारें लग गयी थीं होस्टल शायद अब बंद हो चुका था चारों  तरफ घास कितनी अच्छी बुरी यादों का साथी आज खुद एक याद बन कर खड़ा था कमरों में ताले पड़े थे खट्टे मन से बाहर निकला सब बदल चुका था इसी हॉस्टल में जीवन का पहला नाटक खेला था और पहली बार मंच संचालन किया था और जो वाह वाही मिली थी उसने मेरे जीवन की दशा बदल कर रख दी थी मंच और मुकुल एक दूसरे के पर्याय हो गए जहाँ यारों के कहकहे लगते थे वो ईमारत आज इन्तिज़ार में हैं कहाँ गए वो लोग हमारे वार्डन जोशी साहब अपने घर हल्द्वानी गए थे उनसे मुलाकात न हो सकी अरुणोदय में समय का पहिया लगता है उल्टा घूम गया आगे जाने की बजाय पीछे चला गया सब कुछ अरुणोदय से ऐसे मुलाकात होगी सोचा न था . अरुणोदय के बाद हम चल पड़े इतिहास से मिलने हल्दीघाटी यहीं रास्ते में एक जगह है इसवाल वहां का फाफड़ा बहुत प्रसिद्द हैं तो चलते चलते उसका भोग लगाया फाफड़ा बेसन से बनता है और तली हुई मिर्च के साथ खाया जाता है राजस्थानी मिर्च की खास बात ये होती है ये देखने में तो काफी बड़ी होती हैं पर उतनी कडुवी नहीं होती ऐसी मिर्च का अपना एक अलग स्वाद आता है , हल्दीघाटी मेरा पहले भी देखा हुआ था लेकिन इस बार जो हल्दीघाटी देखा तो लगा हम अब इतिहास से पैसा बनाना सीख गए हैं हल्दीघाटी मुगलों और महाराणाप्रताप की लड़ाई के लिए याद किया जाता है दोनों तरफ पहाड़ी के बीच एक छोटा सा दर्रा जहाँ युद्ध हुआ था उसी जगह वो छोटा सा नाला जो अब सूख चुका है जिसको पार करते वक्त महाराणा का प्यारा घोडा चेतक स्वर्ग सिधार गया था पिछली बार जब मैं हल्दी घाटी आया था करीब २० साल पहले अपने भूगोल के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में जब हमारी पूरी क्लास ने एक रात का कैम्प किया था इसी टूर में अजय ने बस ऐसा भयानक नृत्य किया था जिसे मैं आज तक नहीं भूला हूँ तब बहुत कम पर्यटक यहाँ आया करते थे पर आज एक संग्राहलय यहाँ किसी सज्जन ने बनवा लिया है जिस से वो अच्छा पैसा बना रहे हैं यूँ हल्दीघाटी में ऐसा कोई चिह्न या साक्ष्य नैन है जिस से आप उस युद्ध को याद कर सकें सिर्फ पहाड है और जंगल चेतक जहाँ मरा था वो नाला भी सुख और सिकुड चुका है लेकिन जो नए लोग  आते हैं वो यहाँ बेवक़ूफ़ बनते हैं .फिर तीर्थ यात्रा एकलिंग जी और नाथद्वारा दोनों ही मंदिर बहुत खूबसूरत हैं अपने स्थापत्य के लिए पर इस बार अंदर न जा सके हम गलत समय पर वहां थे भगवान आराम कर रहे थे .वापस उदयपुर में अगला पड़ाव शिल्पग्राम एक खूबसूरत स्थल विदेशियों के लिए भारत के सभी प्रदेशों  के गांव के जीते जागते प्रतिरूप शाम बिताने की अच्छी जगह ...........
शिल्पग्राम 
अजय अपने परिवार के साथ 
जारी 
शिल्पग्राम 




अजय की माता जी 


अजय के भयानक नृत्य की यादें 
अंतिम भाग पढने के लिए क्लिक करें http://mukulmedia.blogspot.in/2010/10/blog-post_1142.html#.V1fs7JF96Ul

3 comments:

deepu said...

sir mja a jata hai pad kar

virendra kumar veer said...

AAP KA YE LEKH PAD KAR MAJA AGYA RAJASTHANI KAHNE KI KHUSBOO BHI AGAYE.YATRA KARNA AUR DOSTO SE MILNA HUME BHI MAJA AATA HA SIR.

archana chaturvedi said...

Na jane kyu ye lekh pad kar udaypur jaane ki laalsa ho rai aap parstut hi itna behtr kiya hai

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