Thursday, March 27, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :पहला भाग (यात्रा वृतांत )

एक और यात्रा, यूँ तो मेरा हमेशा जीवन एक यायावर का रहा है ज्यादा समय तक कहीं टिक नहीं पाता न रिश्तों में न जगह पर कभी हालात कभी खुद की वजह से बस चले ही जा रहा हूँ तो मैं एक ऐसा भटका मुसाफिर हूँ जिसे अपनी मंजिल का ही पता नहीं है बस चला जा रहूँ|जीवन में कम ही खुशनसीब लोग होते हैं जो यात्रा को जीने के लिए यात्रा करते हैं ज्यादातर लोग यात्रा किसी न किसी सिलसिले में करते हैं पर जब मेरा मन खराब होता है मैं निकल जाता हूँ एक यात्रा पर इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ.बस फिर क्या मन बावरा उड़ चला और इस बार ठिकाना था कश्मीर.यूँ तो भारत वासियों को कश्मीर के बारे में बहुत से भ्रम हैं तो पहले उनको दूर करता चलूँ.भारत का जम्मू कश्मीर राज्य तीन भागों में विभाजित है पहला जम्मू दूसरा कश्मीर घटी और तीसरा लद्दाख ज्यादातर लोग वैष्णों देवी के दर्शन करके ये मान लेते है कि उन्होंने कश्मीर का दौरा कर लिया पर वास्तव में ऐसा नहीं है.मैं जम्मू और उसके आसपास के इलाके घूम चुका था इस बार कश्मीर देखने की तम्मना थी.कक्षा तीन में धरती का स्वर्ग नाम का पाठ पढ़ा था उसमें कश्मीर की खूबसूरती का जिक्र था बस उसकी धुंधली यादें जेहन में थी पर कश्मीर को कभी करीब से जानने का मौका नहीं मिला बस खबरों में पढ़ लिया करता था कि कश्मीर सुलग रहा है पर कश्मीर कैसा होगा इसकी कल्पना ही किया करता था.पिछले तीन महीने से लगातार काम का अत्यधिक दबाव रहा और मानसिक रूप से मुझे एक वाकई एक ब्रेक की जरुरत थी.कुछ छुट्टियाँ मिली होली की बस सोचा यही मौका है भागने का पर कश्मीर में जाऊं कहाँ ? पर कहते हैं न जब एक रास्ता बंद होता है दूसरा खुलता है कुछ ऐसा ही हुआ.एक दिन सौगत का फोन आया हमेशा की तरह उसका सवाल क्या कर रहा है ?यहाँ आजा. उसकी आदत है मैं जानता हूँ हमेशा बुलाता है और मैं उसकी बात एक कान से सुनता दूसरे से उडा देता पर इस बार एक मैं उससे मिलना चाहता था घूमना तो डबल बोंनाजा वाला मामला हो गया.उसने बताया कि उसने जिलाधिकारी अनंतनाग का पद जल्दी ही सम्हाला है.मुझे अनंतनाग के बारे में इतना ही पता था कि अमरनाथ यात्रा यहीं से शुरू होती है उसके अलावा आतंक की कुछ घटनाएँ जो अखबारों और चैनल में देखा करता था.खैर मैंने उससे बात करते करते टिकट कटवा लिया उसे पता भी नहीं पता चला कि मैं कितना बेक़रार था उससे मिलने के लिए.जीवन में कुछ चुनिन्दा लोग हैं जिनके साथ को मैं वास्तव में इन्जॉय करता हूँ जिनकी बातों से मैं कभी असहमत हो ही नहीं पाया या यूँ कहें खासा इम्प्रेस होता हूँ. सौगत उनमें से एक हैं .बेलौस, बेअंदाज़ हाँ ऐसा ही है सौगत बिस्वास.करीब दो साल पहले मिला था राजौरी में तब से काफी कुछ बदल चुका था मेरे जीवन में वैसे भी दो साल का वक्त कुछ कम भी नहीं होता.जब पूरा देश होली मनाने की तैयारी कर रहा था मैं अपना सामान बाँध रहा था.आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं पर ये मेरा अपना तरीका है.भीड़ भाड़ और त्यौहारों की बनावटी शुभकामनायें मुझे परेशान करती हैं.                       
ट्रेन में फुर्सत के पल 
मेरे पास मौका था.इन सबसे बचने का फिर क्या आई पोड में नौ फ़िल्में डालीं पांच सात किताबें खरीदीं,लैप टॉप चार्ज किया और बैठ गए ट्रेन में, सौगत मुझे बुला रहा था. ट्रेन में सालों बाद बिना किसी व्यवधान के दो फ़िल्में निपटाईं.सुरेन्द्र मोहन पाठक के दो उपन्यास पढ़ डाले.अठारह घंटे की यात्रा के बाद हम सुबह नौ बजे जम्मू स्टेशन पर उतर गए.जम्मू से अनंतनाग के बीच की लगभग 250 किलोमीटर की दूरी है जिसे मुझे सड़क मार्ग से तय करनी थी. आप सबको बताता चलूँ जम्मू से समूचे कश्मीर को जोड़ने का एक ही रास्ता है जिसे NH -1 के नाम जाना जाता है जो जम्मू से श्रीनगर जाता है वैसे 250 किमी की दूरी कोई ज्यादा नहीं लगती पर जब मामला पहाड़ों का हो तो  समय ज्यादा लगना स्वाभाविक है.मैंने लखनऊ से चलते वक्त टैक्सी की व्यवस्था सौगत से करवा ली थी तो स्टेशन पर उतरते ही जाहिद मियां हमारा इंतज़ार कर रहे थे.जाहिद नाम था हमारे टैक्सी ड्राइवर का.इसी हाइवे पर हिंदुओं का तीर्थस्थल वैष्णो देवी पड़ता है.
   
खूनी नाला 
                     हम अभी मुश्किल से सात आठ किमी ही चले होंगे कि हमारी गाड़ी सिदडा पर रोक ली गयी.नीली वर्दी में ट्रैफिक पुलिस ने हमें बताया कि हम आगे नहीं जा सकते क्यूंकि उस दिन उस रोड पर श्रीनगर जाने वाला रास्ता बंद था.श्रीनगर से जम्मू जाने वाला सड़क मार्ग बहुत व्यस्त रहता है और सडक की हालत ऐसी नहीं है कि वो इतने ट्रैफिक को झेल सके इसलिए बीच का रास्ता ये निकाला गया है कि एक दिन ट्रैफिक जम्मू से श्रीनगर जाएगा और एक दिन श्रीनगर से जम्मू आएगा.अब हम जिस दिन श्रीनगर वाले रास्ते पर जाना चाह रहे थे उस दिन ट्रैफिक श्रीनगर से आ रहा था.समस्या तो थी किन्तु उसका निदान निकाला गया और हमारी गाड़ी को जाने की आज्ञा मिल गया.चूँकि हम उलटे ट्रैफिक की दिशा में जा रहे थे इसलिए हमारे ड्राइवर को थोड़ी सावधानी की जरुरत ज्यादा थी.हम फिर एक बार बढ़ चले.ट्रेन की यात्रा के बाद तुरंत टैक्सी रात में बिलकुल नींद नहीं आयी पर मुझे कोई थकान नहीं थी.न किसी का फोन न मेल न शुभकामना सन्देश वाकई परम शांति वाली स्थिति यूँ कहें न किसी के आने की आस न किसी के जाने का गम पूर्ण तटस्थता.रास्ते में “हवेली” रेस्टोरेंट में कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया.हल्की बूंदा बांदी हो रही थी पर मौसम में ज्यादा ठंडक नहीं थी.जम्मू से उधमपुर तक रोड बहुत बढ़िया थी ऐसा नहीं लग रहा था कि हम पहाड़ों के रास्ते में थे.उधमपुर में “पटनीटॉप” नाम का एक टूरिस्ट डेस्टीनेशन पड़ता है जो जम्मू से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर है.हमारे ड्राइवर ने इसे गरीबों का श्रीनगर बताया आतंकवाद के चरम दिनों में जब पर्यटकों का कश्मीर घाटी जाना बंद हो गया तो लोग जम्मू क्षेत्र में पटनी टॉप में बर्फबारी का आनंद देखने आने लग गए और धीरे धीरे ये एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो गया.हमने भी दूर से पटनी टॉप के दर्शन किये और आगे बढ़ चले क्यूंकि हम कश्मीर जा रहे थे.ऊँचाई धीरे धीरे बढ़ रही थी और दूर पहाड़ों पर बर्फ दिखने लग गई थी.
       
खूबसूरत नज़ारे 
मौसम हमारे साथ धूप छाँव का खेल,खेल रहा था.धीरे धीरे शाम हो रही थी हमें चलते हुए चार घंटे हो चुके थे पहाड़ों पर बर्फ बढ़ती जा रही थी और गाड़ी का शीशा खोलने का जोखिम नहीं लिया जा सकता था मैंने जेकेट भी पहन ली थी.रामबन हालाँकि जम्मू क्षेत्र में पड़ता है पर पहाड़ों पर बढ़ती बर्फ बता रही थी कि हम कश्मीर के करीब आ रहे थे रास्ते में चिनाब नदी 
चिनाव नदी 
भी पडी जो कुछ रास्ते हमारे साथ चल रही थी मैं जहाँ तहां गाड़ी रोक कर फोटोग्राफी में हाथ आजमा रहा था और जहाँ मैं गाड़ी रोक नहीं रहा था वहां सडक पर लगा जाम हमें मजबूरन रोक दे रहा था.मैंने बताया कि सड़क बहुत संकरी है और ट्रैफिक बहुत ज्यादा अक्सर गाडियां खाई में गिरती हैं लोग मरते हैं पर जिंदगी के साथ साथ गाडियां भी चलती रहती हैं.जाहिद मियां हमें हर मोड और रास्तों के बारे में जानकारी दे रहे थे.एक खूनी नाले के बारे में भी बताया जहाँ बहुत ज्यादा हादसे होते हैं.रामबन पार कर हम बनिहाल पहुँच रहे थे.रास्ते की खूबसूरती का एहसास था या सौगत से मुलाकात होने की खुशी थकान बिलकुल भी नहीं लग रही थी.मैं तो आँखें फाड़ फाड़ कर खूबसूरती को आँखों में बसा लेंना चाहता था जिससे वो उम्र भर के लिए मेरे दिमाग के किसी कोने में हमेशा के लिए महफूज़ रह जाए.इसके लिए मैंने कैमरे को अपने से दूर किया और धरती के इस स्वर्ग को आँखों में बसाना शुरू किया.
जारी .......................


5 comments:

shalu awasthi said...

bahut hi badhiya travelogue h sir..sach mein kashmir ki yatraa ghar baithe ho gai ...aage ki kadi ka intezaar rahega

Alka Singh said...

Travelogue acha tha. pdhne se kuch confusion bhi dur ho gai.

creativity in thoughts said...

pursuasive travelogue which can influence others to read it and to enjoy the natures beauty

Smriti Mishra said...

thank u so much sir.mujhe phr se Kashmir ki sair karane k liye..jis tarah se aapne wahan ki khubsurti ko apne shabdo me piroya hai ek baar phr yaadien taza ho gai.thanx a lot..aapke jariye mai ek baar phr Kashmir hum rahi hu..mujhe b aage ki kadi ka intejar rahega..aapki yatra shubh ho..

Anonymous said...

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