Friday, April 4, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :दूसरा भाग (यात्रा वृतांत )

     
बर्फ देख कर रहा नहीं गया 
हम अनंतनाग की तरफ बढे जा रहे थे.सड़क पर जाम के कारण हमारी गाड़ी अक्सर रेंग रेंग कर बढ़ रही थी पर वो जाम कुंठित नहीं कर रहा था शायद आस पास के दृश्य इतने सुंदर थे कि मैं तो उन्हीं में रम सा गया.शायद यही कारण था कि जब भी जाम लगता ड्राइवर लोग एक दूसरे की मदद करते वो भी हंसते मुस्कुराते ज्यादातर सवारी गाड़ियों के ड्राइवर श्रीनगर को देश से जोड़ने वाले इस एक मात्र मार्ग पर चलते हैं इसलिए एक दूसरे से परिचित होते हैं और सडक पर एकदूसरे के हाल चाल लेते रहते हैं.हालांकि सभी कश्मीरी में ही बात कर रहे थे पर उनकी भाव भंगिमा से लगता था कि वो खुश थे अपने अभावों भरे जीवन से.हमारे ड्राइवर जाहिद को उस खतरनाक सड़क पर चलने के महीने के मात्र 4500 रुपये मिलते हैं जो लखनऊ के ड्राइवर के मुकाबले बहुत कम था और जान का जोखिम ज्यादा.जाहिद अनंतनाग में पला बढ़ा नौजवान था जिसका बचपना आतंकवाद के साये में बीता और जवानी सड़क पर बीत रही है उसने कश्मीर के बाहर एक ही शहर देखा वो था दिल्ली जहाँ वो इलाज के सिलसिले में गया था और डर कर वापस आ गया,उसे जो स्वास्थ्य संबंधी समस्या थी उसका सस्ता इलाज कश्मीर में नहीं हो सकता.इतना नरमदिल खुशमिजाज इंसान कैसे 4500 रुपये में अपना जीवन चलाता होगा ये मैं काफी देर तक सोचता रहा.खुद्दारी का आलम ये था कि उसने हमारे साथ चाय वगैरह जब भी पी हमारे लाख कहने पर पैसे नहीं देने दिए.वो बस मुझे यह कह कर निरूत्तर कर दिया कि आप हमारे मेहमान हो और कश्मीरी अपने मेहमान की इज्ज़त करते हैं.
                मुझे उत्तर प्रदेश के ड्राइवर आ रहे थे जो सवारी से चाय पीने के जुगाड में लगे रहते हैं.हम जैसे जैसे धरती के स्वर्ग के करीब होते जा रहे थे सड़क और मौसम दोनों का मिजाज बदल रहा था.सड़क पर हिन्दी उधमपुर के बाद ही गायब होने लग गई मतलब दुकानों के नाम और सड़क पर लगे मील के पत्थर उर्दू और अंग्रेजी भाषा में ही थे.हम हल्की बारिश में बर्फ की चादर में लिपटे पहाड़ों के बीच धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे.मैं बहुत ज्यादा उत्साहित हो रहा था चारों तरफ ऐसे दृश्य थे जो हमेशा मेरी कल्पना में रहे या उन्हें फ़िल्मी परदे पर ही देखा था पर यहाँ तो साक्षात चारों तरफ सब कुछ मेरी आँखों के सामने था.मेरी आदत है यात्राओं में,मैं बहुत कम बोलता हूँ पर मैं लगातार जाहिद से बोले जा रहा था,मुझे ये बिलकुल नहीं लग रहा था कि पिछले 36 घंटे में मैं सिर्फ चार घंटे ही सोया था.अचानक हमारी गाड़ी को रुकना पड़ा हम जवाहर टनल के पास थे और टनल पर गाड़ियों की लाइन लगी थी जिसमें ज्यादातर सेना के वाहन थे क्यूंकि हम जिस तरफ से जा रहे थे उस दिन सामान्य ट्रैफिक बंद था.इससे पहले कुछ फोन खड़ खड़ाये जाते जाहिद ने बताया कि टनल की विद्युत व्यवस्था में कुछ समस्या थी इसलिए टनल को बंद किया गया पर जल्दी ही टनल को खोल दिया गया और हमारी गाड़ी टनल के अंदर प्रवेश कर गई.
जवाहर टनल(सुरंग)
इतनी लंबी सुरंग में चलने का पहली बार सौभाग्य मिल रहा था जम्मू को कश्मीर और सारे देश के सड़क मार्ग से जोड़े रखने का काम पहाड़ों को काट कर बनाई गई  ये ढाई किलोमीटर की सुरंग करती है.एक तरफ आने का मार्ग है दूसरी तरफ जाने का मार्ग अंदर पीले बल्ब टिमटिमा रहे थे थोड़ी थोड़ी दूर पर पब्लिक् फोन बूथ के संकेत जरुर दिख रहे थे पर कोई फोन नहीं दिखा अंदर की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं थी,जगह जगह बिजली के तार लटके और पेंट उखड़ा हुआ था इसके रखरखाव का जिम्मा बी आर ओ यानि सीमा सड़क संस्थान करता है और चौबीस घंटे सेना के जवान मुस्तैदी से पहरा देते हैं.ये सुरंग कश्मीर के निवासियों की जीवन रेखा है सड़क मार्ग से होने वाला सारा व्यापार इसी पर निर्भर है इसलिए सुरक्षा की द्रष्टि से यह सुरंग बहुत संबेदनशील है.जैसे ही हम सुरंग से बाहर निकले जैसे लगा कोई पर्दा खुला अद्भुत दृश्य था.हम सचमुच कश्मीर में प्रवेश कर गए थी चारों तरफ बर्फ से लदे  पहाड क्या शानदार दृश्य था.मैं उसे बयान नहीं कर सकता सिर्फ महसूस कर सकता हूँ.हमारे कश्मीर पहुँचने के दो दिन पहले ही बहुत तगड़ी बर्फबारी हुई थी.मैं लखनऊ में अखबारों के माध्यम से यह जान रहा था कि मार्च के महीने में इतनी बर्फ सालों बाद कश्मीर में पडी और ये बर्फबारी इतनी तगड़ी थी कि एक बार हमारा जाना लगभग टल ही गया पर सौगत ने भरोसा दिया कि एक बार जम्मू पहुँच जाओ उसके बाद कोई दिक्कत नहीं होगी.आप लोगों को बताता चलूँ कि हम जिस दिन जम्मू से अनंतनाग के लिए चले वो सडकमार्ग पिछले सात दिन से बंद था इसलिए हमें उल्टी दिशा में भी जाम ज्यादा झेलना पड़ा.
बर्फ और रास्ता 
बीच-बीच में सौगत खुद भी फोन से हम लोगों की खैर खबर ली जा रही थी और उनका कार्यालय लगातार हमारे ड्राइवर के संपर्क में था.सौगत का मेहमान होने के कारण रास्ते में पड़ने वाले चेक पोस्ट पर हमें कोई समस्या नहीं आयी पर जाहिद ने बताया कि यहाँ की पुलिस भी चेकिंग के नाम बिलावजह गाड़ी रोकती पर्यटकों के सामान की तलाशी लेती है.पर्यटकों को परेशानी न हो इसलिए ड्राइवरों को घूस देनी पड़ती है हाँ घूस का रेट थोडा सस्ता है.कभी कभी बीस रुपैये में भी पुलिस वाले मान जाते हैं.हम बनिहाल से गुजर रहे थे उसके बाद क़ाज़ीगुंड और हमारी मंजिल अनंतनाग जहाँ सौगत हमारे इंतज़ार में थे.चूँकि सौगत को यहाँ आये हुए अभी एक महीना ही हुआ था इसलिए वो भी अकेले थे उनका परिवार जम्मू से होली वाले दिन हमसे जुड़ने वाला था तो दो पुराने दोस्त मिलने वाले थे.अब माहौल एक दम बदल गया था सड़कों पर भीड़ भाड़ एकदम कम हो रही थी.किसी किसी गाँव में चहल पहल दिखी पर गाडियां सिर्फ सड़कों पर दिख रही थी.
फिरन पहने लोग 
किशोर और बच्चे फिरन (कश्मीरी पहनावा ) पहने और अंदर कांगड़ी(अंगीठी) लिए इधर उधर दिख रहे थे.महिलायें और लड़कियां सड़क पर बनिहाल के बाद से बिलकुल भी नहीं दिखी.मैंने कहीं पढ़ा था जिंदगी स्याह सफ़ेद नहीं होती पर यहाँ जो मैं प्रकृति का रूप देख रहा था वो एकदम स्याह- सफ़ेद था चारों तरफ बर्फ और उसके बाद जो कुछ भी था वो चाहे किसी भी रंग का हो, दिख काला ही रहा था चाहे वो पेड़ हों या कुछ और पर इस स्याह सफेद वातावरण में ,मैं जिंदगी के सारे रंग देख रहा था.लोग प्रकृति से लड़ते जूझते जी रहे थे,पहाड़ों का जीवन वैसे भी कठिन होता है,मैं सैलानी बना अपने दोस्त से मिलने जा रहा था.हम संघर्ष के दिन के साथी रहे हैं.हम दोनों ने जो चाहा वो पाया पर वो दिन जो हम जौनपुर में छोड़ आये अब उनदिनों की अलमस्ती को याद करते हैं वो बेरंगे दिन अब रंगीन लगने लग गए हैं.सच है जो बीत जाता है वो बीत तो जाता है पर याद भी आता है.सौगात कश्मीर आ गए ,मैं लखनऊ,हम जो चाहते वो मिल तो गया पर काफी कुछ पीछे छूट गया उसकी कसक कम से कम मुझे तो है ही.पिछली बार जब हम मिले थे उसके बाद लगभग डेढ़ साल बाद हम मिल रहे थे इस बीच मैंने जीवन में काफी कुछ खोया पाया है और सौगत के साथ भी जरुर कुछ ऐसा ही हुआ होगा.इसी खोने पाने का नाम जीवन है.हम काजीगुंड पहुँच चुके थे और उम्मीद कर रहे थे कि शाम के सात बजे तक अनंतनाग पहुँच जायेंगे.बत्तियाँ जल चुकी थी और सडक पर सनाट्टा ऐसी ही बर्फ से भरी सड़क पर हमारी गाड़ी अनंतनाग (खन्नाबल)के सरकारी अतिथिगृह में पहुँच रही थी.
हम अनंतनाग में थे.
जारी .......                   




3 comments:

कौशलेन्द्र said...

Maja aa gya Sir :)

विकास सिंह said...

जाहिद भाई की "खुद्दारी" और पुलिस वालों की "रंगदारी" के बारे में जानकर अच्छा और बुरा दोनों लगा॥

Meenakshi said...

बहुत बेहतरीन लिखा है आपने. कश्मीर आँखों के सामने जीवंत हो गया. अपने गुलमर्ग जाते हुए वहाँ के लोकल लोगो से उनकी भाषा में 'कितनी खूबसूरत ये तस्वीर...' भी सुना होगा. बहुत अद्भुत अनुभव है.

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