Friday, April 4, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :तीसरा भाग (यात्रा वृतांत )


गेस्ट हाउस का बाहरी भाग 
कुछ यूँ था बाहर का नजारा हमारे कमरे से 
गेस्ट हाउस के चारों तरफ बर्फ पडी थी हम उसी बर्फ के बीच रास्ता बनाकर अपने कमरे में पहुंचे.मैंने इतने सुंदर गेस्ट हाउस में रहने की कल्पना नहीं की थी. हमारे आने की पूर्व सूचना पर गेस्ट हाउस के केयरटेकर श्री युसूफ जी शाम चार बजे से इंतज़ार कर रहे थे.उन्होंने मुझे बताया कि डी सी साहब (कश्मीर मे डी एम् को डी सी कहते हैं )यानि सौगत ने दो हफ्ते पहले से उन्हें बता दिया था कि उनके कुछ मेहमान आ रहे हैं इसलिए वो अपने घर का काम जल्दी से जल्दी से खत्म करवा लेना चाहते थे पर घर की मरम्मत का काम अभी तक नहीं हो पाया इसलिए हमें इस गेस्ट हाउस में ठहराया गया.मैंने गेस्टहाउस को ऊपर से नीचे तक देखा सारी आधुनिक सुख सुविधाएँ और ठण्ड से बचने का सारा इंतजाम मैं तो उसकी खूबसूरती पर फ़िदा हो रहा  था एक सामान्य इंसान के लिए इस तरह का गेस्टहाउस एक विलासिता ही मानी जायेगी. गेस्टहाउस का वास्तु कश्मीर की शैली का था फर्श और छत लकड़ी की जिससे वो कमरे की गर्मी को बचा सकें और छत त्रिभुजाकार तिरछी जिससे बर्फ छत पर न रुके और नीचे आ जाए.वैसे भी ऐसे क्षेत्र जहाँ बर्फ गिरती है आप वहां के घरों में छत ढूढते रह जायेंगे क्यूंकि घरों में छत नहीं होती है.खैर कमरा गरम और आरामदेह था. मैंने तुरंत स्नान ध्यान किया वैसे ठण्ड इतनी थी कि पानी देखने की हिम्मत नहीं होती पर जब सारी सुविधाएँ हों तो ठण्ड का एहसास कहाँ होना था.गीजर में पानी गर्म था जिससे सफर की सारी थकान छू मंतर हो गई वैसे थकान लगी ही कहाँ थी.चाय इन्तजार कर रही थी पर मैंने युसूफ से कहा कि यदि सौगत का कार्यालय ज्यादा दूर न हो तो मैं वहां तुरंत जाना चाहूँगा.मैं युसूफ से जल्दी छुटकारा पाना चाहता था क्यूंकि इतने लंबे सफर के बाद मैं थोड़ी देर सुकून चाहता था पर वो साहब के सामने अपने नंबर बढ़ाने के चक्कर में मुझे छोड़ने को तैयार  नहीं थे .मैं सौगत से अकेले मिलना चाहता जब सरकारी ताम झाम न हो बस दो दोस्त हों और उनकी बातें पर युसूफ मियां छोड़ें तब न.मैंने उनसे बात चीत का सिलसिला शुरू कर दिया मुद्दा आतंकवाद और अब के कश्मीर के हालात थे.
                       
सौगत और मैं फुर्सत के कुछ पल साथ में 
युसूफ साहब पेशे से इंजीनियर थे.सरकारी सेवा में आने से पहले वो कई विदेशी कंपनियों के साथ काम कर चुके थे.जब उन्हें लगा कि मैं भारत माता का तटस्थ भक्त हूँ और समस्या की जड़ तक जाना चाहता हूँ कि कश्मीर में अभी तक सेना क्यूँ है,लोग अभी तक हिन्दुस्तान से अपने आप को क्यूँ नहीं जोड़ पाए तो उन्होंने खुल कर बोलना शुरू किया वो जब नौ दस साल के थे तब कश्मीर मे आतंकवाद ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. पहले तो लगा कि ये वक्त भी बीत जाएगा पर वो वक्त इतनी जल्दी नहीं बीता अक्सर सेना घर गाँवों को घेर लेती है और उसके बाद शुरू होता पूछताछ और तलाशी का सिलसिला बहुत बुरा दौर था.कहीं कोई सुनवाई नहीं.एक तरफ आतंकवादी दूसरी तरफ मिलीटेंट.एक अपना किस्सा बताते हुए वो भावुक हो गए बोले मेरी नयी नौकरी लगी थी.मुझे पहली तनख्वाह मिली मैं घर वालों के लिए तोहफे लेकर बस से घर लौट रहा था.जब वो अपने घर के करीब पहुंचे.सेना ने बस को रोक लिया और सबको उतार कर अपने साथ ले लिया.युसूफ फर्राटेदार अंग्रेजी में बोले जा रहे थे.मैं सब कुछ भूल  कर उनके चेहरे के भाव पढ़ रहा था उनके चेहरे पर लाचारी और गुस्से के मिले जुले भाव आ जा रहे थे.वो बोले जा रहे थे “मैंने आर्मी वालों से पूछा मुझे कहाँ ले जाया जा रहा है वो भी अपने घर के इतने करीब आ जाने के बाद पर उन्हें कुछ भी नहीं बताया गया.हालंकि उनके साथ कोई ज्यादती नहीं की गई और तीन घंटे उलटे रास्ते ले जाने के बाद उन्हें इस जवाब के साथ छोड़ दिया गया कि आर्मी का काफिला उधर से गुजरना था और कुछ आतंकवादियों के उसी तरफ होने की आशंका थी.सेना को नहीं पता था कि कौन आतंकवादी है और कौन आम आदमी इसलिए सारे मुसाफिरों को रोक् लिया गया.उन्हें जाड़े की ठंडी रात में अपने घर से इतनी दूर अकेले छोड़ दिया गया कि वो उस  रात दो बजे कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचे.वो कश्मीरी मिश्रित हिन्दी में  बोले मिलीटेंट की गलती की सजा मुजे (मुझे) क्यूँ उनको पकड़ो.बात में दम था मुझे भी आते वक्त सेना के ट्रकों और जवानों से परेशानी हो रही थी हालंकि मैं तो कुछ दिन के लिए आ रहा था पर इन लोगों ने दशकों तक इस दौर को झेला है.भले ही सेना कितनी भी सभ्य क्यूँ न हों पर हथियार बंद सैनिक और काफिले मनोवैज्ञानिक रूप से एक दबाव डालते हैं.ये मैंने भी खुद महसूस किया मैंने लखनऊ में कैंट एरिया के अलावा सेना को कहीं नहीं देखा पर यहाँ तो रास्ते में सेना के काफिले दहशत पैदा  करते हैं.हम जिस हाइवे पर आ रहे थे.वहां मैंने देखा कि सेना के काफिले छोटी गाड़ियों को जल्दी पास नहीं देते.सड़क सेना की नहीं है. सड़क सबकी है और उसपर चलने का अधिकार सबका है.जाहिद ने मुझे बताया कि रोज कम से कम पन्द्रह से बीस ड्राइवर सेना के लोगों से सड़क पर पास मांगने की कीमत गालियों और झापड से चुकाते हैं.किसी को भी इस स्थिति से गुस्सा आएगा वो कश्मीर हो या भारत का कोई हिस्सा पुलिस से थोडा बहुत लड़ा भीडा जा सकता है पर जब बात सेना की हो तो डर लगना स्वाभाविक है.आप शायद मेरी बात से इत्तेफाक न रखें पर किसी ऐसी जगह जाइए जहाँ सेना का ज्यादा मूवमेंट हो आपको थोड़ी देर में परेशानी होने लगेगी.युसूफ साहब बोले मेरे पास रोजगार था मैं नहीं बहका पर बहुत से लोग इतने खुशनसीब नहीं थे वो बहक गए.मेरा सीधा सवाल था कि क्या आर्मी के बगैर कश्मीर की कल्पना की जा सकती है वो बोले फिलहाल अभी तो नहीं आगे का अल्लाह जाने.मुझे उनकी साफगोई पसंद आयी.तभी सूचना आयी सौगत थोड़ी देर में वहां पहुँच रहे हैं.मेरी इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं.आठ बजे चुके थे.भूख सी भी लग रही थी तो तय यह पाया गया कि सब सौगत के घर खाना खायेंगे और बाकी की गपशप वहीं होगी.
सौगत के घर की बाद की तस्वीर तब काफी बर्फ हटाई जा चुकी थी 
सौगत के घर की भी वही हालत थी चारों तरफ बर्फ,हमारे गेस्टहाउस और सौगत के घर की दूरी मुश्किल से सात आठ सौ मीटर ही होगी.यह अनंतनाग का सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र था.सौगत अभी जल्दी ही यहाँ आया था इसलिए उसे खुद भी अपने घर के बारे में ज्यादा पता नहीं था हम दोनों ही साथ उस दो मजिले आलीशान घर को एक्सप्लोर करने निकल पड़े.घर के इतिहास के बारे में हमें कोई बताने वाला नहीं मिला पर उसकी बनावट से लगता है कि घर काफी पुराना है.अगर मैं सही हूँ तो ये कश्मीर के राजे रजवाडों के दौर का था जिसमें समय समय पर परिवर्तन होते रहे हैं.खाना खाते रात के बारह बज गए और हमें पता ही नहीं चला.मैंने सौगत से विदा ली.     जारी ......

2 comments:

कौशलेन्द्र said...

accha hai, bahut accha...

Kalpana Singh said...

बेहद खूबसूरती से बयाँ दास्तां

पसंद आया हो तो