Monday, April 7, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :चौथा भाग (यात्रा वृतांत )

अनंतनाग की अलसाई सुबह 
अगले दिन सुबह थोड़ी देर से आँख खुली सुबह के आठ बजे थे पर ऐसा लगा पूरा अनंतनाग अभी सो ही रहा है कोई शोर शराबा नहीं सब कुछ थमा हुआ.बाहर बर्फ के ढेर और एक अलसाई सुबह ऐसा लगता है सूरज के दर्शन आज नहीं होने वाले.भारत के अधिकाँश हिस्सों में आज छोटी होली का त्यौहार मनाया जा रहा था पर यहाँ होली का दूर दूर तक कोई नाम लेवा नहीं वैसे मेरे लिए अच्छा ही था.मैं होली से बचने के लिए ही यहाँ भाग आया था.नाश्ते के लिए रात को हमसे पूछा गया था कि हम क्या पसंद करेंगे मैंने साफ़ कहा था कुछ भी हो बस खालिस कश्मीरी होना चाहिए तो सुबह गिर्दा और लवासा (कश्मीरी रोटी) के साथ मक्खन सब्जी के साथ हारून मियां हमारे कमरे पर हाज़िर थे.मेरे पांच दिन के प्रवास में हारून को हमेशा फिरन पहने देखा एकदम भक्ति भाव से उन्होंने हमारी सेवा की.एकदम सच्चे कश्मीरी पता चला वो यहाँ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं जिसको शायद 130 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हैं पर खुद्दारी में कोई कमी नहीं,उनसे खूब बातें हुई आतंकवाद और सारे हालात पर उनका मानना था कि शिक्षा से ही समस्याएं दूर होंगी.आतंकवाद के कारण वो पढ़ नहीं पाए वो दूसरी में थे उसके बाद स्कूल नहीं जा पाए उसके पांच साल बाद वो सातवीं कक्षा में स्कूल गए और किसी तरह आठवीं तक पढ़ पाए.उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वो अपने बच्चे को अनंतनाग के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ने भेजते हैं जहाँ “साहबों के बच्चे पढते हैं” मैंने पूछा फीस के पैसे कैसे लायेंगे वो बोलो मैं सारा दिन सारी रात मेहनत करूँगा पर अपने बच्चे को खूब पढ़ाऊंगा.कश्मीर का पढ़ाई का माध्यम  उर्दू और अंग्रेजी है अब कुछ स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जाने लगी है.जो ड्राइवर हमें अनंतनाग और कश्मीर के अन्य हिस्सों में घुमा रहा था उसके सुन्दर अंग्रेजी में लिखे ई मेल इस बात के गवाह हैं कि जिन लोगों को पढ़ने का मौका मिला है वो अंग्रेजी से भली भांति परिचित हैं.
पहलगाम का रास्ता 
वैसे पिछली रात तय ये हुआ था कि सौगत सुबह हमारे साथ नाश्ता करेंगे और हम उनका इंतज़ार कर रहे थे पर जब दस बस गए तो हमने मौका देख के चौका जड़ दिया यानि नाश्ता कर लिया तब सौगत का फोन आया कि देर तक सोता रह गया यार तुम नाश्ता कर लो मैं गाड़ी भेज रहा हूँ .पहलगाम घूम आओ फिर शाम को मिलते हैं.साहब का आदेश मानना ही था थोड़ी देर में पूरे लाव लश्कर के साथ एक गाड़ी हमारी खिदमत में हाज़िर थी.सौगत चूँकि अपने स्टाफ से ज्यादा परिचित नहीं थे फिर भी उन्होंने विशेष रूप से ऐसे दो लोगों को हमारे साथ भेजा जो उस जगह और वहां के इतिहास से ज्यादा परिचित हों हालंकि ये बात उन्होंने मुझे बाद में बताई पर वो मेरा स्वभाव जानते हैं कि मैं सवाल बहुत पूछता हूँ. बशीर और सज्जाद हमारे साथ थे.पहलगाम अनंतनाग से तीस किलोमीटर दूर है.पहले यह तय हुआ कि यहाँ कोई सूर्यमंदिर है जो कोणार्क से भी पुराना है तो पहले मैंने उसे देखने का फैसला किया.पहली बार अनंतनाग शहर को करीब से देख रहा था.बिजली की समस्या है पर उतनी नहीं जितनी उत्तरप्रदेश में है सड़कें जल्दी टूटती हैं कारण भ्रष्टाचार नहीं हर साल होने वाली बर्फबारी है,बर्फ को हटाने के लिए भारी मशीने इस्तेमाल की जाती हैं जो सड़क को नुकसान पहुंचाती हैं.शहर और आस पास के गाँवों में आने जाने के लिए सूमो टैक्सी के रूप में इस्तेमाल होती हैं.लखनऊ में लाश के वास्ते जैसी बसें यहाँ बहुतायत में दिखीं.गोश्त में ज्यादातर भेंड काटी जाती हैं या मुर्गा ,भेंड का गोश्त बकरे के मुकाबले थोडा सख्त होता है वैसे अगर कोई भी बूढा जानवर काट के पकाया जाए तो उसका गोश्त सख्त होता है.अखरोट खूब होता है यहाँ पचास पैसे का एक अखरोट और सेब अधिकतम तीस से चालीस रुपये किलो,हमें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था लखनऊ से चलते वक्त की मार्च के महीने में इतनी ठण्ड और बर्फ झेलनी पड़ेगी और हम इसकी पूरी तैयारी से नहीं आये थे.हमने इसी बहाने बाजार का चक्कर लगाया किसी भी आम हिन्दुस्तानी बाजार जैसा पर ये कश्मीर था सुबह देर से जगता और शाम को जल्दी सो जाता.सड़कों पर फिरन पहने जयादातर पुरुष सड़कों पर दिखते लड़कियां बहुत कम दिख रही थी.मेरा अपना ओबसर्वेशन और लोगों से हुई बात चीत के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँच गया कि कश्मीर में गरीबी नहीं है पर बेरोजगारी बहुत है.कोई भी इंसान भूखा नहीं सोता भीख मांगने वाले लोग कम से कम मुझे तो नहीं दिखे.बाजार हों या मोहल्ले भीड़ भाड़ तो दिख रही थी पर मुझे न जाने क्यूँ ये शहर सूना सूना लग रहा था.हर शहर का अपना एक माहौल होता है शोर होता वो गायब था शहर में एफ एम् स्टेशन था पर कहीं कोई गीत संगीत की आवाज नहीं ये धर्म का मामला था या सभ्यता की निशानी मेरी समझ से परे है. 
क़दमों के निशान
कोई हवा में मोबाईल लहराता कोई गाना सुनता नहीं दिखा.सारे साईन बोर्ड उर्दू या अंग्रेजी में पूरे अनंतनाग में सिर्फ शहर के बाहरी हिस्से में फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया का एक गोदाम ऐसा था जिसमें हिन्दी में खाद्य निगम लिखा था.मकानों में ज्यादा रंग रोगन नहीं किया जाता और उनकी बाहरी सजावट पर भी कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता अधिकतर मकान सूने सूने लगते.सेना के जवान चौराहों पर दिखते हैं पर बहुत ज्यादा नहीं है.पान और गुटखे की दुकाने एकदम न के बराबर हैं पर ऐसा नहीं था कि बिलकुल भी न हों.मैंने एक बात गौर की लोग सिगरेट बहुत पीते हैं इसके पीछे क्या कारण है कोई बताने वाला नहीं मिला पर मुझे लगता है कहीं न कहीं बेरोजगारी से पैदा होने वाला तनाव और सेना की इतने लंबे समय से उपस्थिति इसका कारण हो सकता है.शराब की एक भी दूकान नहीं है. सरकारी आबकारी नीति का पता नहीं पर श्रीनगर में मैंने एक शराब की दूकान को बंकरनुमा दडबे में देखा मुझे बताया गया.इस दूकान को बंद कराने के लिए यहाँ ग्रेनेड हमला किया गया तब से ऐसा हाल है.पर तस्वीर का दूसरा रूख ये है कि अगर मैं अपने सूत्र पर भरोसा करूँ तो अनंतनाग में सत्तर प्रतिशत लोग शराब पीते हैं,विचित्र किन्तु सत्य और सेना अवैध रूप से शराब उपलब्ध कराती है.आम कश्मीरी हिन्दुस्तान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता कुछ बड़े शहरो के नाम को छोड़कर वे अपनी दुनिया में खुश हैं उन्हें किसी की जरुरत नहीं                                                           जारी ................                                                                        

3 comments:

shashank mishra said...

Sir यात्रा वृतांत का महत्त्व पहले समझ नहीं आया था
राहुल संकृत्यायन की " मेरी लद्दाख यात्रा " पढ़ी थी पाठ्यपुस्तिका में बहुत पहले जब छोटा था।।
पर आज आपका ब्लॉग पढ़ कर लगा के उपयोग क्या है
कश्मीर बिना भ्रमण किये ही करीब से देखने का और जानने का मौका मिला।।
और उपयोगिता भी समझ आ गई।। आपके अगले लेख का इंतजार रहेगा।।

कौशलेन्द्र said...

waah sir, aaj to sach me anantnag ghuma dia aapne...

कौशलेन्द्र said...

Waah SIr, aaj to sach me anantnag ghuma dia aapne...

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