Tuesday, April 8, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :पांचवां भाग (यात्रा वृतांत )

लिद्दर नदी और पहलगाम के नज़ारे 
बेताब वैली 
हम लोग पहलगाम के रास्ते पर पड़ने वाले मार्तंड मंदिर की तरफ बढ़ चले.बशीर हर मोड के किस्से कहानी से हमें परिचित कराता जा रहा है.रास्ते में कुछ उजाड घरों पर मेरी नजर गयी.मैंने पूछा कि ये क्या उसने बताया ये मकान उन पंडितों के हैं जो आतंकवाद  के दिनों में अपना घर छोड़कर पलायन कर गए थे.मैंने जब उन मकानों की तस्वीरें लेनी शुरू की तो उसने कहा साहब इन मकानों की तस्वीरें मत लो आप हिन्दुस्तान जा कर लोगों को बताओगे कि कश्मीर में बड़ा जुल्म है .मैंने उसकी बात को अनसुना करके तस्वीरें खींचना जारी रखा.फिर उसने एक साफ़ सुथरे पर्याप्त सुरक्षा वाले एक बड़े घर के पास गाड़ी रोक दी,मैंने पूछा कि ये क्या उसने जो बताया वो मुझे अचंभित करने वाला था ये वो मकान थे जो सरकार ने कश्मीरी पंडितों के लिए खुद बना कर दिए थे,मैंने किसी भी मीडिया इस तरह के वाकये का जिक्र पढ़ा ,देखा नहीं था,कुछ परिवार दिखे भी पर मेरे पास उनसे बात करने का वक्त नहीं था.
कश्मीरी पंडितों के खाली मकान 

मैंने एक बात खास देखी जैसे हमारे यहाँ पुर ,नगर जैसे विशेषण मोहल्लों  या रिहाईश के लिए इस्तेमाल होते हैं वैसे यहाँ “बल” का प्रयोग होता है जैसे खन्ना बल,गांदरबल ,हज़रत बल,मैंने इसका कारण जानने की कोशिश की तो जो पता चला वो यह था कि पुराने वक्त में कश्मीर में जगह जगह पानी था या पहाड तो बल उस सूखी जगह को कहते हैं. जहाँ लोग आकर व्यापार करते थे धीरे धीरे लोग वहाँ आकर बसने लोग और उसे सूखे स्थान के नाम के आगे “बल” लग गया.कश्मीर में आपको “बल” काफी सुनने को मिलेगा.अब मार्तंड मंदिर देखने की बारी थी .जाहिर है मंदिर एक ऐसी जगह था जहाँ कभी हिंदू आबादी ज्यादा रहती थी.मंदिर में घुसते मुझे झटका सा लगा मैं किसी प्राचीन स्थापत्य वाले मंदिर की कल्पना कर रहा था पर वहां तो सारा मामला नया था.एक बड़े तालाब की पीछे तीन गुम्बद ,तालाब में खूब सारी मछलियाँ जिनको लोग आंटे की गोलियाँ खिलाते थे और कुछ भी नहीं और पुजारियों का नाटक कहाँ से आये हैं पूजा करवा लो चूँकि मैं मंदिर पर्यटन की द्र्ष्टि से गया था न कि दर्शन करने तो मैंने कुछ तस्वीरें खींची और पुजारी से पूछा कि पुराना मंदिर कहाँ है उसने कहा यही है.
नकली सूर्य मंदिर 
मुझे लगा कुछ गलतफहमी हुई होगी या पुराना मंदिर भूस्खलन में गिर गया होगा उसकी जगह नया बनवाया गया होगा तो वहां से हम पहलगाम के लिए चले अभी तक थोड़ी बहुत सूरज की रौशनी थी पर धीरे धीरे वो रौशनी कम होती गयी और उसकी जगह बदली और धुंध ने ले ली.इसी रास्ते पर “बटकूट” गाँव पड़ा.इसी गाँव के मलिक नामके बाशिंदे ने सबसे पहले अमरनाथ गुफा खोजी थी और उसके वंशजों को अमरनाथ श्राइन बोर्ड आज भी एक निश्चित धनराशि देता है यूँ कहें धन्यवाद कहने का एक तरीका सौगत ने बाद में मुझे बताया कि इस धनराशि को लेकर मलिक के वंशजों में अब मुकदमेबाजी हो रही है.एक बार फिर हम धुंध और बरफ में खो जाने वाले थे.हमारे साथ स्थानीय लिद्दर नदी बह रही थी.गनीमत थी कि नदी नहीं जमी थी बाकी सबकुछ सफ़ेद सिर्फ नदी का पानी बह रहा था बाकी सब कुछ थमा हुआ शांत मैंने खिड़की खोली तो ठंडी हवा ने ऐसा स्वागत किया कि मुझे खिड़की बंद करनी पडी.ये एक ऐसी खूबसूरती है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है.पहलगाम ही वो जगह है जहाँ से “अमरनाथ”यात्रा शुरू होती है.पह्लगाम गर्मियों में अपनी हरियाली के लिए और जाड़ों में बर्फ के लिए प्रसिद्द है.हम घूमते हुए बेताब वैली की तरफ चले.बेताब वैली के नामकरण की अजीब कहानी है मुझे बताया कि अस्सी के दशक में यहाँ बेताब फिल्म की शूटिंग हुई थी.
छड़ी मुबारक यहीं रक्खी जाती है 
 तबसे यह जगह पर्यटन के मानचित्र में उभरी नहीं तो सिर्फ स्थानीय लोगों के अलावा यहाँ कोई नहीं आता पर अब ये एक बड़ा टूरिस्ट डेस्टीनेशन है .मन मोहने वाला द्रश्य सिर्फ लिद्दर नदी एक छोटी सी धार दिख रही थी चारों ओर सिर्फ बर्फ बर्फ मैं थोड़ी देर प्रकृति के इस रूप के साथ रम सा गया.भीड़ भाड़ खूब थी पर जितनी बर्फ हमारे चारों तरफ थी उस हिसाब से ठण्ड नहीं थी.बरफ इतनी ज्यादा थी कि सैलानियों के लिए लोग हाई बूट किराए पर दे रहे थे पर मुझे अपने वुडलैंड पर पूरा भरोसा था दूसरा मैंने फैसला किया कि मैं ज्यादा बर्फ के अंदर नहीं जाऊँगा.कुछ लोग दस रुपये में लकड़ी का डंडा बेच रहे थे जिससे लोग बर्फ में चल सके. नवविवाहित जोड़े काफी दिख रहे थे जो शायद हनीमून मनाने पहलगाम आये थे.अब सोचता हूँ तो लगता है कि मैं वाकई खुशनसीब हूँ ये खूबसूरती देखना कितने लोगों को नसीब होता है दोपहर होने वाली थी हम थोड़ी देर और घूमना चाह रहे थे.हमारे खाने की व्यवस्था होटल मांउट स्नो में की गई थी.तभी सौगत का संदेसा आया कि वो भी पहलगाम आ रहा है फिर क्या अंधा क्या चाहे दो आँखें अब आने वाला था मजा मैंने फैसला किया दोपहर का खाना थोड़ी देर से खाए जाएगा वो भी सौगत के साथ बस फिर क्या हमने बर्फ के मैदानों के चक्कर लगाये पहलगाम गोल्फ कोर्स ,अक्कड़ पार्क सब बर्फ में दबे थे और बगल में लिद्दर नदी बही जा रही थी.सौगत के आते ही हम भोजन पर टूट पड़े पर मुझे “कहवा” ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया.
कहवा का प्याला 
ठण्ड से बचने के लिए कश्मीर में कहवा एक आवश्यक आवश्यकता है कहवा  पाउडर के साथ केशर बादाम पिस्ता वाह वाह.
भूस्खलन वाली जगह का मुआयना 
भोजन के बाद सौगत ने मुझे बताया कि पहलगाम के आगे एक फोरेस्ट पार्क में भूस्खलन के कारण एक गाँव तीन दिन से पूरे शहर से कटा हुआ उसका काम देखने जाना है चलोगे क्या मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी.वहां काम जारी था लगभग डेढ़ सौ लोग गाँव का रास्ता साफ़ करने लगे थे पर मौसम के कारण काम में देर हो रही थी.सौगत को काम पर पहली बार देख रहा था इनको जवाब उनको सांत्वना किसी को डान्ट किसी को प्यार रास्ते में लोगों का काफिला मिला जिसने फ़रियाद की कि प्राइवेट होटल वाले अपने वाहन सड़क पर खड़ी कर रहे हैं जिससे पतली सड़क पर और जाम लग जाता है.समस्या का तुरंत समाधान किया गया.
टेबल टेनिस पर दो दो हाथ करते हम 
शाम ढलने लगी थी और हम अनंतनाग लौट पड़ेशाम का वक्त टेबल टेनिस और बिलियर्ड्स खेल कर बिताया टेबल टेनिस मैंने होस्टल छोड़ने के बाद नहीं खेला था वो शाम वाकई कुछ अजीब थी टेबल टेनिस में मेरी शुरुवात शानदार रही है एक वक्त मैं 6-1 से जीत रहा था पर मैच खत्म होते होते उलटफेर हुआ सौगत ने  मुझे सिर्फ  दो प्वाईंट ही जोड़ने का मौका दिया और मैं हार गया.शाम को मेरी मांग पर मछली की व्यवस्था की गयी मैंने मूली में पकी ट्राउट मछली पहली बार खाई.कश्मीरी वाजवान का यह अनुभव भी शानदार रहा,जैसे हम खाने को दस्तरख्वान बोलते हैं कश्मीर में इसे वाजवान बोला जाता है .एक बार फिर रात के बारह बजे और कश्मीर में एक और सुहाना दिन खत्म हुआ.    जारी ........

                                                                                                   

6 comments:

कौशलेन्द्र said...

चौथे और पांचवे भाग में मुझे दो खबरिया एंगल भी नजर आए सर, पहले बात चौथे की... सेना शराब का व्यापार करती है... अब पांचवे पर आते हैं... पहलगाम के रास्ते पर बशीर की बात... आप हिन्दुस्तान जा कर... क्या वे सच में खुद को हिन्दुस्तानी नहीं मानते...

shalu awasthi said...

kahwaa powder wah wah :) bahut khoob sir ..bahut kareeb se dekha hai aapne kashmeer ke ek ek bhaag ko

Dr. Mukul Srivastava said...

@कौशलेन्द्र कडुआ है पर सच तो यही है ये मसला इतना आसान नहीं जितना हम समझते हैं या जो मीडिया बताता है इसे आप जाकर ही महसूस कर सकते हैं

shashank mishra said...

@कौशलेन्द्र जी -- मेरे कुछ काश्मीरी मित्र है जिन्होंने मुझे बताया था के वास्तविकता ये है की काश्मीरी सिर्फ अमन चैन से जीना चाहते हैं इसलिए ना वो हिंदुस्तान से सरोकार रखना चाहते है न पाकिस्तान से।।
दो चक्की के बीच वो पिस रहे हैं ।।
जैसा की हारून मिया ने चौथे भाग में बताया की शिक्षा का आभाव भी काश्मीर की हालात का जिम्मेदार है।।
काश्मिरियो को भरोसा नहीं होता है हिन्दुस्तानी फ़ौज पर क्यू की जैसा sir ने बताया की फौज भी कई ऐसे गलत काम करती है।। कई बार काश्मिरियो से ज्यादती की जाती रही है फौजियों द्वारा कई फिल्मो द्वारा भी ऐसी कई कहानिया चित्रित की गई हैं।।
Sir आपसे भी एक प्रश्न पूछना था की व्यापार में कितना scope है वहां पर और मैंने ये भी सुना था शायद की वहां जमींन नहीं खरीदी जा सकती है।।

Dr. Mukul Srivastava said...

सही कहा @shashank ji वहां व्यापार के नाम पर सिर्फ पर्यटन ही है और खेती कोई इंडस्ट्री वहां नहीं है इसलिए बेरोजगारी है

shashank mishra said...

काश सरकार ये समझ पाती की अगर काश्मीर पर अपना आधिपत्य समझती है तो उसके विकास और लोगो के व्यक्तिगत विकास की जिम्मेदारी का निर्वहन भी सरकार को करना चाहिए।।
हो सकता है कुछ ऐसी बाते हो जिसके विषय में मुझे ना पता हो परन्तु आज़ादी के 67 साल बाद भी एक बहुत बड़ा राज्य भारत के विकास योजनाओ से वंचित रह गया।।

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