Wednesday, April 9, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :अंतिम भाग (यात्रा वृतांत )


साथ साथ बहती झेलम 
केसर के खेत 
लेनपुरा में बादाम के पेड़ और केसर के खेत बगल में बहती झेलम नदी पम्पौर पार करने के बाद अब श्रीनगर करीब था.श्रीनगर ,अनंतनाग के मुकाबले रंगीन शहर था.शहर में घुसते ही बादामी बाग पड़ता है कभी यहाँ बादाम के बड़े बाग थे पर अब पूरे क्षेत्र में सेना का कब्जा है.कहते हैं जाड़ों में कश्मीर से रंग चला जाता है उस वक्त प्रकृति के दो ही रंग होते हैं स्याह सफ़ेद पर बसंत के आते आती धरती एकबार फिर सज जाती है सैलानियों का स्वागत करने के लिए.यूँ तो श्रीनगर में घूमने की बहुत सी जगहें थी पर मैंने सबसे पहले हारबन जाने का फैसला किया.रास्ते में कश्मीर के वजीर ए आजम का आधिकारिक आवास भी देखा जो गुपकार रोड पर है.हाँ तो ऐतिहासिक द्रष्टि से मेरे लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था जहाँ चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था हालांकि चौथी संगीति दो जगह हुई थी.एक कश्मीर और दूसरी श्रीलंका,मैं इतिहास का हिस्सा रही उस भूमि को देखना चाहता था उन लम्हों से एक बार फिर से दो चार होना चाहता था जिस विरासत को आज हम सम्हाल रहे हैं ईसा पूर्व पहली शताब्दी जब बौद्ध धर्म पूरे भारत में पाँव पसार चुका था.ऐसी जगह बार बार देखने को कहाँ मिलती है.बारिश अब तेज हो चुकी थी.हमारे ड्राइवर बशीर को ये समझ नहीं आ रहा था कि मैं वहां क्यूँ जाना चाह रहा हूँ क्यूंकि वहां कोई नहीं जाता पर मैं जिद पर अड़ा था,हम एक पतली सी सड़क पर पहुँच के रुक गए आगे का रास्ता पैदल पहाड़ी पर था,बारिश में कोई भी रास्ता बताने वाला नहीं था,पहाड पर चढ़ता चला जा रहा था और रास्ते में पड़ने वाली हर विचित्र सी जगह को हारवन बौद्ध स्तूप समझ कर निहारता था.थोडा आगे जाने पर नीले रंग का चिर परिचित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बोर्ड देख कर लगा कि शायद पहुँच गए पर अभी वो जगह दूर थी अंदाज़े से आखिरकार उस जगह तक पहुँच गए.बारिश के कारण मैं अपना कैमरा नहीं ले गया था इसलिए जल्दी जल्दी मोबाईल से तस्वीरें ली तभी कुछ लोग जो शायद उस जगह की देखभाल के लिए रखे गए थे,वहां आ गए उन्हें उस जगह के महत्त्व के बारे में बिलकुल भी अंदाजा नहीं था बस उन्हें इतना पता है कोई पवित्र जगह है जहाँ कभी बौद्ध लोग पूजा पाठ किया करते थे.मैं भीग के तर हो चुका था और ठण्ड भी लग रही थी पर मुझे खुशी थी कि मैं वहां तक पहुँच गया.उसके बाद हमारा ठिकाना शालीमार और निशात बाग बने ठण्ड और बर्फ के कारण बागों में अभी वैसी रौनक नहीं थी जैसी गर्मी में रहती है पर चिनार के चार सौ साल पुराने पेड़ देख कर ये एहसास हुआ इन पेड़ों ने जहाँगीर के राज से आधुनिक भारत तक का कितना लंबा सफर किया है और आज भी खड़े हैं शान से ,वैसे इन बागों में घूमना ऐसा था जैसे इतिहास आपके साथ चल रहा हो,जहाँगीर कभी यहाँ चले थे ,शाहजहाँ,औरंगजेब फिर अंग्रेज सब यहाँ आये और गए पर ये पेड़ पौधे निरपेक्ष भाव से सबके स्वागत के लिए तैयार रहे.



सामने ही खूबसूरत डल झील थी.एक बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा जिस हिसाब से पर्यटकों की आवाजाही है उस मुकाबले झील बहुत साफ़ है एक पूरा शहर बसा है मैंने झील में घूमते हुए सेना का कैम्प भी झील में देखा,बाजार घर ,स्कूल क्या नहीं था.हमने डल का चक्कर लगाया और चल पड़े हजरत बल देखने.हजरतबल की ये मस्जिद मुस्लिमों के लिए एक बड़े तीर्थ की तरह है.यहाँ मोहम्मद साहब की दाढी का एक बाल सुरक्षित है जिसे सुरक्षा कारणों से साल में सिर्फ दस बार जनता के दर्शन के लिए खोला जाता है.इस मस्जिद को शाहजहाँ ने बनवाया था बाद में इसका जीर्णोद्धार शेख अब्दुल्लाह ने कराया इसका गुम्बद दूर से ही बहुत खूबसूरत दिखता है पर अभी इसकी मरम्मत चल रही थी इसलिए हम इसकी असली खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद नहीं कर पाए.मस्जिद के अंदर पूरी शान्ति थी कुछ हाथ दुवा में उठे थे कुछ अपनी फ़रियाद रो रो कर रहे थे पर माहौल में रूहानी सुकून था.मस्जिद के प्रमुख से मैंने बात की,मैं उनका नाम भूल रहा हूँ.उन्हें ये जानकर नबहुत खुशी हुई कि मैं इतनी दूर से हज़रतबल आया हूँ. हजरतबल के करीब ही सामने कश्मीर विश्वविद्यालय था और मेरा मन मचल गया.कश्मीर के इस विश्वविदयालय देखने को हमने गाड़ी अंदर मुड़वा दी.हरा भर कैम्पस जिसमें विद्यार्थियों की खूब भीड़ थी ,पर छात्र छात्राएं काफी अनुशासित दिखे.इतनी भीड़ होने के बावजूद कोई हल्ला गुल्ला शोर शराबा नहीं.मैं पूछते हुए पत्रकारिता एवं जनसंचार बिभाग पहुंचा अब तक बारिश बंद हो चुकी थी और खिली खिली धूप निकाल आयी थी.धूप का मजा लेने बहुत से लोग बाहर निकाल आये.मैं विभाग के बाहर पहुंचा और विभाग के अध्यक्ष के बारे में पूछा था.
हजरत बल 
विभाग की एक शिक्षिका बाहर ही  खड़ी थी.उन्हें मेरे बारे में जानकर बड़ी खुशी हुई वो बड़े अदब से मुझे विभाग के अध्यक्ष प्रो मसूदी के कक्ष तक ले गयीं.वहां एक कश्मीर के फिल्म निर्देशक भी बैठे थे और फिर क्या बातचीत का सिलसिला शुरू होगया.जब उन्हें लगा कि मैं कश्मीर के दर्द को समझता हूँ और दूध मांगोगे खीर देंगे कश्मीर मांगोगे चीर देंगे टाईप का नहीं हूँ तो उनका दर्द छलका कैसे सेना के जवानों ने कितनी बार उनके साथ बदतमीजी की वो भी उन की उम्र का ख्याल किये बगैर,सबके पास ऐसा कुछ न कुछ था जो सेना से जुड़ा हुआ था.जाहिर है उनके पास एक रोजगार था समाज में हैसियत इसलिए भूल कर आगे बढ़ गए लेकिन दर्द तो गहरा है.उन्होंने मुझे बताया कि सेना का दिखना अब कम हुआ है पर जवान अब भी हैं हाँ वो ऐसी जगहों पर नहीं है जिससे आसानी से उन्हें देखा जा सके बस इतना अंतर आया है उनका मानना था कि सेना खुद ही यहाँ से जाना नहीं चाहती क्यूंकि उससे बड़े आर्थिक हित जुड़े हैं.सही भी जहाँ तक मेरी जानकारी है सेना के बजट का ऑडिट नहीं होता है.किसी भी जवान की कश्मीर पोस्टिंग पर उसके वेतन में अन्य जगह तैनात सैनिक के मुकाबले ज्यादा फायदा होता है ऐसा मुझे बताया गया.प्रो मसूद ने बताया कि ये पीढ़ी जिसे आप कैम्पस में देख रहे हैं इसने बुलबुल की नहीं बम्ब की वाज सुनी है.फिलहाल उपरी तौर पर शांति है पर कब तक रहेगी कोई नहीं जानता.भारत के बारे में इतनी कम जानकारी का आलम ये था कि और प्रदेशों के पोस्ट पेड़ फोन कश्मीर में  काम करते हैं ये उन्हें पता ही नहीं था.शैक्षिक रूप से मुझे कश्मीर विश्वविद्यालय एक विकसित विश्वविद्यालय लगा.मैंने कुछ बच्चों से मुलाक़ात की उनके बनाई समाचारपत्र और शोध्पत्रिका की एक पार्टी मुझे भेंट की गयी और मैंने वहां से विदा ली दोपहर हो चुकी थी और अभी काफी कुछ घूमना था और अगले ही दिन सुबह सुबह जम्मू के लिए कुछ कर देना था.श्रीनगर एक कॉस्मोपॉलिटन शहर है जहाँ खूब भीड़ और सारी बड़े शहर की सुविधाएँ हैं पर मनोरंजन के साधनों  का अभाव है.मशहूर लाल चौक पर लोगों का हुजूम था.फ्लाई ओवर भी मुझे दिखे.श्रीनगर की लालमंडी में एक अनोखा संग्रहालय है जिसे एस पी एस म्यूजियम के नाम से जाना जाता है . जहाँ कश्मीर के इतिहास की बहुत सी जानकारी मिल सकती है पर लोगों को इसके बारे में बहुत कम पता है.संग्रहालय बहुत सम्रद्ध है पर जगह की बहुत कमी है और रखरखाव बहुत खराब यहाँ मैंने मैमथ (लुप्त हो चुकी हाथी की प्रजाति )का अस्थि पिंजर देखा तो डायनासोर के अण्डों का जीवाश्म ,प्राचीन मूर्तियों और सिक्कों का विशाल संग्रह भी है.हम थक चुके थे लौटते वक्त हमने एक चौराहे पर एक टैंक देखा हमें बताया गया कि ये टैंक 1948 में पाकिस्तान की सेना से छीना गया था.टैंक को सजा संवार कर एक चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है जो बादामी बाग के करीब है.हम बहुत सी चीजों को छोड़कर वापस अनंतनाग लौट रहे थे जहाँ सौगात का परिवार खाने पर हमारा इंतज़ार कर रहा था.मुझे खुशी इस बात की थी कि मैं लोगों से कह सकूंगा हाँ मैंने कश्मीर देखा है.रात को खाने पर मेरा मनपसंद मांसाहार इन्तजार कर रहा था.मैंने सौगत और भाभी से विदा ली दोस्त से बिछड़ते वक्त थोडा मन भावुक हो उठता है अब पता नहीं कितने सालों बाद मुलाक़ात हो ,फोन पर बात तो कभी कभार हो जाया करती है पर मुझे और सौगात दोनों को फोन पर ज्यादा बात करना पसंद नहीं है.दोनों की जिंदगियां आगे बढ़ रही हैं और यादें पीछे छूट रही हैं.अगला पूरा दिन हमें सड़क मार्ग की यात्रा करनी थी और शाम को हमें ट्रेन पकडनी थी जो मुझे वापस उस दुनिया में ले जाने वाली थी जहाँ से परेशान होकर मैं भागा था लेकिन लौटना तो था,फिर भी रात के ग्यारह बज ही गए .
समाप्त   

1 comment:

Sonali Kanojia said...

Kashmir is d most beautifull part of India... Its history,beauty,culture can be learned and experienced only by visting their in reality... Sir thanx for writing it soo nicely...

पसंद आया हो तो