Tuesday, April 8, 2014

कितनी खूबसूरत तस्वीर है,ये कश्मीर है :छठा भाग (यात्रा वृतांत )

श्री अनंतनाग मंदिर 
आज बड़ी होली का दिन था और सौगात का परिवार भी अनंतनाग जम्मू से आने वाला था तो कहीं बाहर न जाकर अनंतनाग में ही रहने का फैसला किया गया.पहले हम एक पुराने मंदिर गए होली के हुडदंग में जहाँ देश के अधिकाँश हिस्से  डूबे  थे. होली वाले दिन हमें उस मंदिर में कुछ गुलाल के चिह्न मंदिर में देखने को मिले वास्तव में भारत विविधताओं का देश है.उस मंदिर को देखकर मुझे एहसास हुआ कि एक वक्त यहाँ हिंदू धर्म  मानने वालो की प्रधानता रही होगी और यहाँ नागों की बहुतायत  रही होगी शायद इसी वजह से इसका नाम अनंतनाग पड़ा.मंदिर में घुसने से पहले हमारे साथ जो सुरक्षा गार्ड था. उसने सेना के जवानों को बताया हम मेहमान थे और मंदिर घूमना चाहते हैं तब हमें अंदर जाने दिया गया मंदिर के गेट पर एक बंकरनुमा चेक पोस्ट था उसके बाद मंदिर की शुरुवात होती है.पता पड़ा इस मंदिर के प्रांगण में सी आर एफ के जवान भी डटे हैं ये पता नहीं पड़ पाया कि वो मंदिर की सुरक्षा के लिए रुके हैं या उनकी यूनिट अस्थाई रूप से यहाँ कुछ दिन के लिए है.चारों तरफ मुस्लिम बाहुल्य इलाका बीच में ये मंदिर इस बात का गवाह है कि इतिहास के पन्नों में काफी कुछ बार बार बदला है.मंदिर में सन्नाटा पसरा था कोई पुजारी मुझे नहीं दिखा.कश्मीर के मंदिरों में मुझे एक जलाशय जरुर दिखा जिसमें पहाडो से आता साफ़ पानी इकट्ठा होता रहता है मंदिर के बाहर जलाशय से निकले उस पानी में लोग अपने दैनिक क्रिया क्रम निपटाते दिखे और हाँ उस कुण्ड में बहुत बड़ी बड़ी मछलियाँ भी पली रहती हैं.दर्शानार्थी उन्हें आंटे की गोलियाँ खिलाते और मंदिर में  होने के कारण उनका शिकार नहीं किया जाता तो उनका जीवन बड़े सुकून का होता है.मंदिर की दशा बता रही थी कि उसका जीर्णोधार किया गया है और काम अभी भी जारी है.इस मंदिर के कुंड में नाज जैसी आकृति के पौधे निकले हुए थे.आप तस्वीर में देख सकते हैं. बशीर ने बताया शहर की हर महत्वपूर्ण खाली जगह पर सेना का कब्ज़ा है और ये लोग अब जाने के मूड में नहीं दिखते.हमने कहकहे लगाये मैंने कहा कि आप लोग इतनी अच्छी खातिर करते हैं कि कौन जाना चाहेगा वैसे भी कश्मीर तो जन्नत है.हम शहर घूमने के बाद सौगत के घर पहुंचे भाभी आ चुकी थी ,थोड़ी देर होली की हंसी ठिठोली हुई.उसके बाद मामला फंसा असल में जिस सूर्य मंदिर को हम देख कर आये थे वो असली सूर्य मंदिर नहीं था.इंटरनेट की मदद से उस असली सूर्यमंदिर के भग्नावेशों को ढूढ निकाला गया पता पड़ा पुजारी ने हमें बेवकूफ बनाया असली सूर्य मंदिर उस मंदिर से आठ किलोमीटर दूर पहाड़ी पर मटन नामकी जगह पर है.ये लोग अपने पैसे के चक्कर में उन खंडहरों में जाने नहीं देते क्यूंकि वहां पूजा नहीं होती जबकि ये मंदिर कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी पुराना है.मैं सोच रहा था जम्मू कश्मीर सरकार को अपने टूरिस्ट डेस्टिनेशन की ठीक से बर्न्डिंग करनी चाहिए जिससे श्रीनगर पहलगाम ,गुलमर्ग जैसी जगहों पर से पर्यटकों का बोझ कम किया जाए मैंने इससे पहले राजोरी में भी यही महसूस किया कि यहाँ इतनी खूबसूरत जगहें हैं पर वहां कोई घूमने नहीं आता अब आतंकवादी घटनाओं का वैसा कोई खौफ नहीं अब सूर्य मंदिर के बारे में कितने कम लोग जानते हैं.प्लान ये बना शाम के चार के बजे के करीब इस मंदिर का  चक्कर  लगा लिया जाये.उससे पहले सौगात की अपने कार्यलय में व्यस्तता थी.मैंने उससे कहा अगर उसे समस्या न हो तो क्या मैं इसके साथ कार्यालय चल सकता हूँ.उसने खुशी खुशी मेरे अनुरोध को स्वीकार कर लिया.मैंने एक कोना पकड़ लिया और ये अंदाज़ा लगाने लगा कि यहाँ का प्रशासन कैसे काम करता है.जिलाधिकारी से मिलना बहुत आसान था.लोगों की दरख्वास्त अंग्रेजी और उर्दू में आती मुझे दिखी.अंग्रेजी में बात करने वाले लोग भी जनाब कह के संबोधित करते चूँकि चुनाव नजदीक थे इसलिए लगातार मीटिंग का सिलसिला चल रहा था और मैं अपने नोट्स ले रहा था.मैंने सौगात से किसी इतिहासकार से मिलाने की इच्छा प्रकट की उन्होंने अपने किसी मातहत को तुरंत बुला भेजा.उसने फौरी तौर पर तुरंत हामी भर दी पर मुझे लग गया था ये आदमी कुछ करेगा नहीं और हुआ भी वही शाम तक वो किसी इतिहासकार को न खोज पाया.
           
इस तस्वीर के बोर्ड में देखिये सरदार के आगे S लिखा है 
एक और मजेदार बात सौगत के कार्यालय में अनंतनाग के पूर्व जिलाधिकारियों की उत्तरवर्तन सूची लगी थी उसमें कुछ के आगे MR. लिखा था कुछ के आगे DR. लिखा था पर कुछ नाम के आगे S लिखा हुआ था MR और DR का मतलब तो मैं समझ रहा था पर इस S का मतलब क्या है.सौगत से पूछा जो जवाब मिला वो बड़ा अनूठा है कश्मीर में सरदार के आगे MR या DR न लगाकर S लिखते हैं मतलब सरदार क्या सरदार श्रीमान या डॉक्टर नहीं हो सकते दुबारा विचित्र किन्तु सत्य आप चाहे तो सौगत की तस्वीर के पीछे लगे बोर्ड में इसे खुद भी परख सकते हैं. 

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष

मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष
शाम को हम उस असली मार्तंड मंदिर को खोजने चल पड़े जिसके बारे में माना जाता है सातवीं –आठवीं शताब्दी में इसका निर्माण हुआ.ये एक ऐसे पठार पर बना हुआ है जहाँ से पूरी कश्मीर घाटी देखी जा सकती है पर अब इस विशालकाय मंदिर के ही खंडहर ही बचे हैं.उन खंडहरों के बीच जा कर लगा कि जब ये मंदिर अपने भव्य स्वरुप में रहा होगा तो कई किलोमीटर दूर से दिखता रहा होगा पर अब सिर्फ भग्नावशेष बचे हैं जिनकी भी कोई ठीक से देखभाल नहीं है मंदिर को सिर्फ कंटीले बादों से घेरा गया है और भारतीय पुरात्व विभाग का बोर्ड ही ये बताता है कि ये कोई महत्वपूर्ण इमारत है.बारिश हो रही थी फिर भी हमने भीगते हुए मंदिर को पूरा देखा.शाम को एक और अनोखी चीज से हमारा परिचय होना था.चूँकि कश्मीर में खतरनाक वाली ठण्ड पड़ती है इसलिए जो लोग साधन संपन्न लोग होते हैं वो कमरे के नीचे की जगह को खोखला छोड़ते हैं जिससे वहां जलती हुई लकडियाँ डाली जा सकें और फर्श लकड़ी की न बनवाकर उसकी जगह पत्थर लगवा देते हैं जिससे लकड़ी की गर्मी पत्थर में जाती है और पत्थर के ऊपर मोटा कालीन बिछा रहता है जिससे कालीन के साथ –साथ कमरा भी गरम रहता है .ये उपाय आधुनिक उपायों के मुकाबले ज्यादा स्वास्थ्यप्रद होता है .हीटर या ब्लोअर शरीर में पानी की कमी पैदा कर देते हैं जबकि इसमें ऐसा नहीं होता तो दो तीन घंटे तक महफ़िल वहीं सजी और उसके बाद स्वादिष्ट भोजन और कहवा अब हमारे लौटने का दिन करीब आ रहा था तो आख़िरी दिन श्रीनगर घूमने का कार्यक्रम रखा गया.श्रीनगर के लिए हम सुबह आठ बजे निकल गए मौसम ठंडा और सुहाना था.बूंदाबांदी हो रही थी.लोग उठ ही रहे थे मैंने देखा कि सेना के जवान दो दो के समूह में जम्मू श्रीनगर हाइवे पर जा रहे थे मेरे ये पता करने पर ये लोग इतनी सुबह कर क्या रहे हैं पता लगा ये इन का रोज का काम है ये हाइवे की पेट्रोलिंग कर रहे है.रात में अगर किसी ने बम्ब वगैरह रख दिया हो तो उसे खोज लिया जाए उनके साथ बम्ब निरोधक दस्ता और शिक्षित कुत्ते भी थे.अनंतनाग को श्रीनगर से जोड़ने वाला रास्ता चौड़ा हो रहा है.पेड़ काटे जा रहे हैं पर इस विकास की भारी कीमत “ग्रीन टनल” को चुकानी पड़ रही है.ग्रीन टनल का मतलब हरी सुरंग इस रास्ते के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड लगे हैं जिनकी शाखाएं ऊपर आसमान में जुड जाती हैं जिससे सड़क पर ऐसा लगता है कि वो किसी हरे गलियारे गुजर रही है पर रोड चौड़ी करने के कारण एक तरफ के पेड़ काटे जा रहे हैं और ग्रीन टनल इतिहास हो रहा है.
ग्रीन टनल 
बसंत का मौसम होने के कारण पेड़ों  की पत्तियां गिर चुकी थीं इसलिए हम्ग्रीन टनल से गुजरने का वैसा लुत्फ़ नहीं उठा पाए जैसा गर्मियों में श्रीनगर आने वाले सैलानी उठाते हैं.सज्जाद ने आगढ़ किया कि मैं एक बार गर्मियों में जरुर कश्मीर की यात्रा करूँ जब सारे पेड़ पौधे और घाटी के फूलों का लुत्फ़ उठा सकूँ .इस वक्त तो हर जगह बर्फ है.हरियाली का लुत्फ़ तो कहीं भी  उठाया जा सकता है पर ऐसी बर्फ भारत में और कहाँ मिलेगी,सर्दियों में आने का दूसरा फायदा सैलानियों की भीड़ कम रहती है और आप सही मायने में पर्यटन का लुत्फ़ उठा सकते हैं .    जारी .....

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