Sunday, June 14, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृतांत पहला भाग )

लेह की खूबसूरती 
जुले ,आपका कुशोक बकुला रिम्पोछे एयर पोर्ट पर पर स्वागत है | 
मेरे लिए छुट्टियाँ मतलब अपने अपनों का साथ,यकीन मानिए मेरी बहुत छोटी सी दुनिया है जिसमें बहुत से लोग नहीं हैं एक बार फिर यात्रा का कार्यक्रम बना,वैसे इसे कार्यक्रम कहना ठीक न होगा क्योंकि मेरी यात्राएँ योजनायें बना कर नहीं हो पातीं.सौगत लद्दाख बुला रहे थे.पर मैं कुछ निर्णय नहीं ले पा रहा था ये सब करते करते बहुत सा समय बीत गया और हवाई जहाज के टिकट आसमान छूने लग गये|आखिरकार मैंने फैसला किया कि अब मुझे वाकी कुछ दिन आराम की जरुरत है और यह तभी हो सकता था जब मैं फोन इंटरनेट सबसे दूर हो जाऊं|मैंने सामन्य से करीब पांच गुना कीमत में लद्दाख यात्रा का टिकट कटाया और निकल पड़ा|लद्दाख यूँ कहें बचपन से मेरा ड्रीम डेस्टीनेशन रहा है वैसे ड्रीम डेस्टीनेशन तो कई हैं उनकी चर्चा फिर कभी सही|शताब्दी से नयी  दिल्ली पहुंचे जहाँ मित्र शम्भू हमारा स्टेशन पर इन्तजार कर रहे थे |चूँकि हमें कुछ घंटे ही दिल्ली में गुजारने थे और अलसुबह हमारी उड़ान थी |जो हमें लेह ले जाने वाली थी|रात के तीन घंटे शम्भू से बात में कब बीत गए पता ही नहीं चला |मेरे लाख मना करने के बाद शम्भू हमें एयरपोर्ट तक छोड़ने की जिद पर अड़े रहे |एक घंटे की नींद के बाद हम नई दिल्ली एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े| सुबह हो रही थी और दिल्ली में सुबह भी उमस थी |शम्भू को विदा कर हम एयरपोर्ट के अंदर पहुँच गए |थोड़ी सी मशक्कत के बाद हम लेह जाने वाले अपने विमान में थे |लेह से दिल्ली का सफर एक घंटे पांच मिनट का है| लेह में मेरा दस दिन का प्रवास था तो मैं पूरा समय ले कर लेह जा रहा था|
लेह में आपका स्वागत है 
हम अभी उड़े ही थे कि मैं नींद के झूले में झूलने लगा शायद आधा घंटा ही मैं सोया हूँगा कि विमान के लेह के कुशोक बकुला रिम्पोछे एयर पोर्ट पर लैंडिंग की घोषणा हो रही थी |मैंने हडबडा कर खिड़की के बाहर झाँका चारों तरफ बर्फ से लदे पहाड़ एक तरफ हिमालय और दूसरी तरफ काराकोरम,स्याह सफ़ेद का अद्भुत समागम आधे पहाड़ों पर बर्फ नहीं थी और आधे बर्फ से भरे हुए थे अभी लैंडिंग में कुछ मिनट की देर थी |मैं ऊपर से प्रकृति की लीला देख रहा था कितना छुद्र है मानव इस विशाल धरती के समक्ष ऊपर से पर्वत की चोटियाँ  
स्याह सफ़ेद पहाड़ 
ऐसी लग रही थीं  जैसे कागज़ पर किसी ने थ्री डी रूप मे पेन्सिल से आड़ी तिरछी रेखाएं खींच दी गयी हों |मैंने मोबाईल कैमरे से तस्वीरें लेने शुरू कर दीं|यात्रा में आगे बढ़ने से पहले बता दूँ लेह हवाई मार्ग के अलावा श्रीनगर और मनाली से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है |मनाली वाला रास्ता बर्फ  के कारण जून के पहले हफ्ते में बंद था और श्रीनगर वाला रास्ता बहुत लम्बा लगा मुझे |जिसमें समय बहुत ज्यादा खराब होता और शरीर की ऐसी तैसी हो जाती ,पहले मैं जम्मू से कार द्वारा श्रीनगर जाता है और वहां से फिर लेह तक का सफर कारगिल होते हुए, तो मैंने पैसे की जगह समय बचाना ज्यादा जरुरी समझा|समय बच  गया तो पैसे और कमा लूँगा |
मैंने अपने सामान को समेटना शुरू कर दिया |विमान धीरे –धीरे नीचे आ रहा था ,बर्फ वाले पहाड़ पीछे छूट रहे थे और चारों तरफ भूरे काले वीरान पहाड़ों के बीच से हमारा विमान धीरे –धीरे नीचे आ रहा था |मैं किसी छोटे बच्चे की तरह सारे द्रश्य को अपनी आँखों में समेट लेना चाहता था,कहीं कहीं हरियाली भी दिख रही थी |इस सारे वाकये में अपनी सीट बेल्ट बांधना भूल गया तभी एयर होस्टेस ने पास आकर प्यार से हिदायत दी ,कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें,मैंने माफी मांगते हुए अपनी बेल्ट कसी |नीचे ,नीचे और नीचे विमान तेजी से जमीन छूने की ओर अग्रसर हो रहा था और मैं सोच रहा था अहा लद्दाख आखिर मैं आ ही गया तुमसे मिलने ,पर इन सबके बीच थोड़ी उदासी भी थी |आप सबको बताता चलूँ मैं सिर्फ लद्दाख की खूबसूरती को देख्नने लखनऊ से इतना लम्बा सफ़र तय करके नहीं आया था,लद्दाख को देखना तो बोनस था |मैं आया था अपने दोस्त से मिलने जिससे मिलने के लिए मैं लम्बे समय से तरस रहा था |सौगत अपनी मीटिंग के सिलसिले में श्रीनगर में थे और वह तीन जून को वापस लौट रहे थे और आज एक जून की सुबह थी |जैसे ही जहाज ने जमीन छुई मैंने सौगात को संदेसा भेजा लैंडेड और उधर से तुरंत जवाब आया स्वागत है |
एयरपोर्ट से बाहर का नजारा 

हम विमान से बाहर निकले ,पर यह क्या लेह का  कुशोक बकुला रिम्पोछे एयर पोर्ट भारत के अन्य एयरपोर्ट की तरह नहीं था चारों तरफ बंकर और सेना के जवान ,मुझे बताया गया कि यह सेना के द्वारा बनाया गया विमान पत्तन है जिसमें दो पट्टियाँ हैं एक का इस्तेमाल सेना करती है जबकि दूसरी पट्टी का इस्तेमाल व्यवसायिक विमानों के लिए होता है |सेना के विमान और हेलीकॉप्टर उड़ान भर रहे थे |सूरज अपनी पूरी चमक के साथ धूप बिखेर रहा था पर बाहर तापमान 9 डिग्री सेल्सियस था मैं एक साधारण टी शर्ट पहने था ,इसे कहते हैं गर्मी में ठंडी का एहसास ,पूरा भारत गर्मी में तप रहा था और मैं यहाँ जल्दी से जल्दी गर्म कपडे पहन लेना चाहता था|विमान पत्तन पर हमारा स्वागत लद्दाखी भाषा में हुआ जुले , जुले हेल्लो का एक रूप है ,अगले दस दिन यह शब्द हमारी दैनिक बोलचाल का अंग बन जाने वाला था |लेह लगभग साढ़े ग्यारह हजार फीट की उंचाई पर स्थित है ,अब तक मेरी सारी दुनिया में की गयी यात्राओं  में सबसे उंचाई पर की गयी यात्रा |विमान पत्तन पर लगातार घोषणा की जा रही थी ,यहाँ ऑक्सीजन की कमी है ,मैदानी इलाकों से आये लोगों को यहाँ सांस लेने में ,सर दर्द और जी मिचलाने जैसी दिक्कत हो सकती है |चौबीस घंटे सिर्फ आराम करें कहीं घूमने न जाएँ ढेर सारा पानी पीयें ,दौड़ें नहीं और किसी तरह की समस्या में तुरंत डॉक्टर से मिलें अन्यथा समस्या गंभीर हो सकती है |चूँकि मुझे अभी तक कोई समस्या नहीं आ रही थी और मैं इन बातों से मैं परिचित था वैसे भी हमें आज के दिन पूरा आराम करना था इसलिए इन बातों पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया |हम अपना सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकले वहां दो लोग मेरे नाम की तख्ती लेकर इन्तजार करते मिले, उनमें से एक लेह प्रशासन के अधिकारी थे और दूसरे मियां नजीर जो अगले दस दिन हमारे साथ रहकर हमें घूमाने वाले थे |
...........................................................................................जारी 
दूसरा भाग पढने के लिए क्लिक करें  

11 comments:

Ghufran Ahmad said...

Akele aakele ghum lo beta

Ghufran Ahmad said...

Akele aakele ghum lo beta

sushil kumar said...

अति सुन्दर वर्णन यात्रा वृत्तांत का सर पढ़ कर आनंद आ रहा । पढ़कर लग रहा जैसे हैम खुद लद्दाख में हैं ।

Anonymous said...

Sajeev vreetant Sir................

विकास सिंह said...

अतुल्य भारत

Shambhu Nath said...

वाह, साथ लेकर चलने की जो ये तुम्हारी अदा है, वाकई कमाल की है, वर्चुअल दर्शन वो भी असली जैसे करा देते हो, अगली कड़ी मे फोटो की संख्या बढाओगे तो आनंद आ जाएगा

मनीष हिंदवी said...

मुकुल भाई आपका यात्रा वृतान्त पढ़ कर ही ये एहसास हो रहा है की ये यात्रा कितनी रोचक और खूबसूरत रही होगी। शब्दों का इतना खूबसूरत प्रयोग किया है आपने की ये मेहसूस हो रहा है की मैं भी लेह पहुँच गया हूं।

deepudarshan said...

लेह की खूबसूरती का वर्णन इससे अच्छा और क्या होगा ...आनंद आ रहा है पढने में सर

दिनेश कुमार अवस्थी said...

आपने विमान यात्रा कर के समय तो बचा लिया पर मार्ग में बिखरा प्राकतिक सुन्दरता देखने से वचित रहे

दिनेश कुमार अवस्थी said...

आपने विमान यात्रा कर के समय तो बचा लिया पर मार्ग में बिखरा प्राकतिक सुन्दरता देखने से वचित रहे

Tanupreet Kaur said...

Such a beautiful place

पसंद आया हो तो