Friday, June 19, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत चौथा भाग )



थिकसे मोनेस्ट्री 
 थिकसे गोम्पा दूर से ही दिखाई पड़ता है भव्य ,खुबसूरत कुछ सीढियां चढ़कर हम गोम्पा के भीतर थे ,बुद्ध की विशाल प्रतिमा ,सारे गोम्पा का एक ही जैसा कार्यक्रम होता है और एक जैसी ही संरंचना ,यह लामाओं की एक पुरी दुनिया है जहाँ उनके काम की सारे चीजें मौजूद हैं इसलिए बाहरी दुनिया से जुड़ाव की उनकी कोई जरुरत ही न हो सुबह शाम प्रार्थना और बाकी के वक्त में पठन पाठन यहाँ मेरी मुलाक़ात स्तेंजीन लामा से हुई जो पिछले सताईस वर्षों से इस मठ में हुई |
स्तेंजीन लामा के साथ 
मेरी बात तो शुरू हुई थी बुद्ध के काली रूप को लेकर क्योंकि जहाँ तक मेरी जानकारी है बौद्ध धर्म दुनिया का एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ हिंसा के लिए रत्ती भर जगह नहीं है फिर ये काली रूप वाले बुद्ध की मूर्ति क्यों उन्होंने अपनी हिन्दी में मुझे समझाने की पूरी कोशिश की पर मेरी जिज्ञासाओं का अंत न देखकर उन्होंने मुझसे कहा कि वो हिंदी में मुझे समझा नहीं सकते लद्दाखी मुझे नहीं आती थी और वो अंग्रेजी जानते नहीं थे |पर मामला यहीं खत्म नहीं हुआ मैंने उनसे घर परिवार के बारे में जानकारी ली |उन्होंने बताया की वो जब छोटे थे तभी से यहाँ आ गए पर बीच –बीच में घर आते जाते रहते हैं |मैंने पूछा कि आपका मन घर परिवार बसाने का नहीं होता,उनका सीधा जवाब था नहीं पर कैसे इस प्रश्न का जवाब न दे पाए |शायद या तो मैं अज्ञानी था मुझे और कुछ पढने की जरुरत थी या वो बहुत ज्यादा विद्वान् हर गोम्पा में मैंने हिन्दू धर्म के अवतारों की तरह महात्मा बुद्ध की अनेक रूपों में मूर्तियाँ और भित्ति चित्र देखे |
थिकसे मोनेस्ट्री 
ऐसा क्यों और कब हुआ इस जिज्ञासा का समाधान पूरी यात्रा में नहीं हुआ |यह बौद्ध धर्म पर हिन्दू धर्म का प्रभाव था या कुछ और कारण ,भाषा की समस्या एक बड़ी बाधा थी हालांकि नज़ीर हमारे साथ था जो स्थानीय निवासी था पर वह मुसलमान था शायद इसी कारण वह किसी गोम्पा में हमारे साथ अन्दर नहीं जा रहा था |यह मैं अंदाजे से कह रहा हूँ मैंने कई बार उसे अंदर चलने के लिए कहा पर उसने कोई न कोई कारण देकर मुझे निरुत्तर कर दिया |वैसे भी भारत एक महान देश है यहाँ कानून का राज़ नहीं भावनाओं का राज़ चलता है तो उसकी भावनाएं आहत न हों जाएँ इसलिए मैंने जोर नहीं दिया,इस समस्या का जिक्र मैंने सौगत से भी किया और इस बात की गुजारिश की कि लेह के किसी पढ़े लिखे विद्वान् से मेरी बात करा दो पर ऐसा कोई मिल न सका कारण सीधा था पुरे लेह (लद्दाख ) में कोई विश्वविद्यालय नहीं है जहाँ कोई तटस्थ व्यक्ति   निरपेक्ष तरीके से 
आपकी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके ,बाकी विद्वान् तो कई हैं पर सब अपने नजरिये को थोपने की कोशिश करते हैं जैसा यहाँ लामा कर रहे थे |
थिकसे का प्रार्थना चक्र 
थिकसे गोम्पा के बाद बारी थी “शे पैलेस” देखने की,पहले यह लद्दाख के राजा का महल था पर अब  यहाँ बुद्ध का विशाल मंदिर है,पूरा परिसर सन्नाटे में था,ज्यादातर कमरे बंद थे चूँकि यह मंदिर था  यहाँ गोम्पा की तरह लामाओं की पढ़ाई  का काम नहीं होता है इसलिए यहाँ ज्यादा लामा नहीं रहते हैं  फिर तीस रुपये का टिकट कटाकर और जूते  खोलकर मैं अंदर गया |जिस लामा ने टिकट दिया वही हमारे साथ अंदर आया,नजारा कुछ ऐसा था बुद्ध की विशाल मूर्ति जिसका सर हमारे सामने थे बाकी का धड जमीन से कई फुट नीचे था जिसके पैरों के पास लद्दाखी परम्परा गत कपडे का टुकड़ा जिसको पहनाकर किसी अतिथि का स्वागत करते हैं सैकड़ों की संख्या में चढ़ाये हुए थे |
बुद्ध की विशाल प्रतिमा 
मुझे लगता है वो ऊपर से नीचे डाल दिए गये थे |वैसे सफ़र में सोचना सफर के मजे को खराब कर देता है पर एक मैं था जो सफर में होते हुए सोचे जा रहा था सारे मठ मंदिर आज से दौ सौ तीन सौ साल पहले बनाए गए थे तब न बिजली थी न सड़कें कैसे रहते होंगे यहाँ लोग इतनी विषम परिस्थितयों में ,मंदिर के अन्दर फोटो खींचने की मनाही थी |मैं मंदिर के चढ़ावे पर ध्यान देने लगा,माजा की बोतल,सोयाबीन के तेल की बोतलें,डिब्बाबंद दूध,डिब्बाबंद जूस, और न जाने क्या क्या और तो और जीरो कोक के कई केन भी चढ़े थे |मैंने वहां के पुजारी से पूछा हिन्दू मंदिरों में जो चढ़ावा चढ़ता है वो तो पुजारी का हो जाता है |यहाँ के चढ़ावे का क्या होता है उसने पानी टूटी फूटी हिंदी में बताया कि यह सब भक्तों का है जो मंदिर में आते हैं यह उनका है आप जो चाहें इसमें से ले सकते हैं |
प्रार्थना चक्र 
वाह प्यास लगी थी पर मैंने ज्यादा लालच किये हुए बिना एक माजा की बोतल उठा ली |हिन्दू धार्मिक स्थलों में तो पुजारी का ज्यादा से ज्यादा जोर कर्मकांड और दक्षिणा ऐंठने में रहता है पर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था आपकी मर्जी हो कुछ चढ़ा दीजिये अगर नहीं चढ़ाएंगे तो न आप पुजारी की गाली खायेंगे न वो आपको घूर कर देखेगा |हम एक कमरे में गये जहाँ सैंकड़ों दिए जल रहे थे और हजारों सोयाबीन तेल की बोतलें रखीं हुई थीं पर कोई यह बताने वाला नहीं मिला की क्यों ?
शाम होने को आ रही थी और अभी हमें एक महत्वपूर्ण जगह जाना था जी हाँ रैंचो के स्कूल वही स्कूल जहाँ थ्री ईडियट फिल्म की शूटिंग हुई थी जहाँ रैंचो सब कुछ छोड़ छाड़कर रह रहा था (फिल्म में ) स्कूल को लद्दाखी में द्रुक पद्मा स्कूल कहते हैं पर अब यह पूरे  लेह में रैंचो स्कूल के नाम से जाना जाता है जहाँ सोलर उर्जा का अधिकतम इस्तेमाल किया जा रहा है |पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब स्कूल की कुछ जगहों पर ही घुमाया जाता है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है |पहले एक काउंसलर ने स्कूल के इतिहास विकास और स्कूल को मिले पुरुस्कारों के बारे में बताया फिर स्कूल के लिए चंदे की बात कही ,वहां से पहले से उपस्थित कुछ पर्यटकों ने सेंटी होकर स्कूल के डोनेशन बॉक्स में चंदा डाला |
रैंचो स्कूल
कुछ ने  रैचो टीशर्ट और टोपी खरीदी |हम निर्लिप्त से खड़े बाजार और ब्रैंडिंग के रिश्ते  को समझ रहे थे इस दुनिया में बाजार से परे भी कुछ है क्या वो चाहे धर्म हो या स्कूल सब अपने आपको अपने अपने तरीके से बेच ही तो रहे थे,मठ के प्रवेश में लिया जाने वाला चाहे वो तीस रुपये का टिकट हो या चंदे की गुहार लगाती वो स्कूल की शिक्षिका सब ही तो बाजार में हैं |
रैंचो कैप 
मैं गलत हो सकता हूँ पर मेरा सोचने का तरीका कुछ ऐसा ही है |पांच रुपये का स्केल सौ रुपये में बेचा जा रहा है और लोग बड़े मजे से खरीद भी रहे हैं |क्यों न हो अब वह एक स्कुल नहीं ब्रांड बन चुका है और वो स्कूल ब्रांड न होता तो शायद हमारी गाडी उसके सामने से फर्राटा भरते निकल गयी होती |इसी तरह के विचारों में डूबते उतरते हम अपने गेस्ट हाउस की निकल पड़े |शाम के सात बज रहे थे फिर भी रौशनी ठीक ठाक थी |हवा में ठंडक बढ़ रही थी और हम थके मांदे लौट रहे थे |

जारी ...................................

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