Saturday, June 20, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत पांचवां भाग )

लद्दाख की सड़कों पर मोटरसाइकिल सवार 
लद्दाख आये हुए तीन दिन बीत चुके थे |आज चौथा दिन था पर पहले रात का किस्सा ,वैसे किस्सा कुछ यूँ है मुझे उदयपुर में अपने हॉस्टल के दिनों की रातें बड़ी याद आती हैं ऐसा ही कुछ लेह में हुआ |रात मतलब सम्पूर्ण शान्ति जब चारों ओर अँधेरा क्योंकि अभी लेह को शहरी करण का रोग नहीं लगा है |हम एयरपोर्ट के ठीक रुके थे पर रात में कोई विमान आते जाते नहीं थे इसलिए यहाँ  निस्तब्धता को महसूस किया जा सकता है |कभी कभार किसी कुत्ते की भौंकने की आवाज़ जरुर इस सन्नाटे को तोडती पर मैं रात को महसूस कर सकता था |इस सन्नाटे में जब मेरा आई पोड पुराने  गानों की मधुर लहरी छेड़ता तो लगता यही स्वर्ग है जब मैं अपने आपको ,अपने होने को महसूस कर पा रहा हूँ |कुत्ते भौंकने से याद आया ,लद्दाख शहर में कुत्ते बहुत हैं इनसे थोड़ी दूरी बनाये रखी जाए तो बेहतर है |गेस्ट हाउस का प्रमुख खानसामा अकबर अली था उसको मिला कर करीब दस लोग गेस्ट हाउस में थे जिनमें ज्यादा महिलायें और सभी मुसलमान पर कश्मीर घाटी के मुकाबले यहाँ भारत विरोधी कोई भावनाएं नहीं हैं |
सब ये चाहते हैं कश्मीर घाटी में शांति हो जाए ,घाटी के मुकाबले यहाँ का मुसलमान भारत विरोधी नहीं हैं ज्यादातर ने हिन्दी स्कूलों के बजाय फिल्मों और धारावाहिकों से सीखी है |यहाँ हिन्दी स्कूलों में सिखाई जाती है लोग कितने अमन पसंद हैं इसकी झलक तब मिली जब मैंने लेह की जेल देखी पर उसका किस्सा आगे |खैर आज हमारा कार्यक्रम आल्ची मोनेस्ट्री देखने जाने का था जो लेह से करीब 65  किलोमीटर दूर है |एक बार फिर हम रास्ते में थे रास्ते में जांसकर नदी हमारे साथ –साथ बह रही थी |खुबसूरत मीलों लम्बी सड़क जिस पर बाईक सवार यदा कदा दिख जाते ये वो लोग हैं जो मनाली या श्रीनगर से सड़क के रास्ते लद्दाख की खूबसूरती देखने आते हैं और ये सभी मोटरसाइकिल किराए पर मिलती हैं |चूँकि रास्ते में पेट्रोल पम्प बहुत कम हैं इसलिए सभी की बाईक के पीछे पेट्रोल से भरे केन जरुर दिखते हैं |पहले मैग्नेटिक हिल पर हम रुके यह वह जगह है जहाँ यह माना जाता है कि यहाँ की एक पहाडी में चुम्बकीय शक्ति है |हमारे लिए यह कोई कौतुहल का विषय नहीं था चूँकि यह आल्ची के रास्ते में था इसलिए यहाँ भी रुक लिए कुछ फोटो खींचीं |नजीर ने गाड़ी को न्यूट्रल में डाल कर छोड़ दिया गाडी आगे बढ़ने लगी |
मैग्नेटिक हिल 
यहाँ सैलानियों का जमावड़ा लगा हुआ था खासकर मोटरसाइकिल सवार जो सेल्फी स्टिक के साथ विभिन्न मुद्राओं में फोटो खींच रहे थे |हम उस भीड़ में कुछ और ही सोच रहे थे |आमतौर पर किसी पहाडी इलाके में हरे भरे पहाड़ दीखते हैं पर लद्दाख अलग है यहाँ पहाड़ इतनी ज्यादा उंचाई पर हैं कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कुछ नहीं उगता यानि स्याह सफ़ेद पहाड़ और इन पहाड़ों के बीच खड़ा मैं अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा था |सच है लद्दाख में तन मन एकाकार हो जाते हैं |सामने के पहाड़ सूने नंगे थे पर पीछे के पहाड़ों पर खासी बर्फ गिरी हुई थी |सूरज अपनी तेजी से चमक रहा था |ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है जब मैं सुख की घड़ी में तटस्थ हो जाता हूँ राग द्वेष से परे सुख दुःख से मुक्त बस मैं होता हूँ ऐसा ही कुछ यहाँ महसूस कर रहा था |लगता था घड़ियाँ रुक गयी हैं और मैंने समय के चक्र को उस मैग्नेटिक हिल पर रोक लिया था |मेरी तटस्थता को नजीर की आवाज ने तोडा :सर चला जाए |हाँ चलना ही तो है तभी तो यहाँ तक आ पहुंचे हैं अभी कितनी दूर जाना है पता नहीं |
संगम 
थोड़ा आगे जाने पर संगम था ,हाँ इसे भी संगम कहते हैं जहाँ जांसकर और सिन्धु का मिलन होता है यहाँ से सिन्धु ही आगे बढ़ती है और जांसकर नदी उसमें विलीन हो जाती है |यहाँ रिवर राफ्टिंग का मजा लिया जा सकता है |हम जब वहां पहुंचे ही थे की बहुत तेज आंधी आ गयी ,हमें भागकर अपनी गाडी में शरण लेनी पडी ,फिर बूंदाबांदी शुरू हो गयी |आल्ची मोनेस्ट्री बाकी की सारी मोनेस्ट्री की ही तरह है बस इसे पुरातत्व विभाग का संरक्षण हासिल है यहाँ पर भी सब कुछ वैसा  ही था |
बौद्ध मन्त्र लिखी हुई झंडियाँ बुद्ध की मूर्तियाँ और दीवारों पर बुद्ध के विभिन्न अवतारों वाले भित्ति चित्र जो पर्याप्त संरक्षण के अभाव में खराब हो रहे हैं |कुछ भी हो हमें अपनी विरासत सम्हालना नहीं आया |इसके लिए भी हमें यूरोप या अमेरिका से सीखना चाहिए |यहाँ खुबानी के कुछ पेड़ों से कच्ची खुबानी तोड़ कर खाने का लुत्फ़ उठाया |

आल्ची गोम्पा 


लद्दाख के अन्य गोम्पाओं के मुकाबले आल्ची गोम्पा के आस पास बड़ा बाजार सजा हुआ है शायद यहाँ विदेशी सैलानी ज्यादा आते हों |तरह तरह के स्मृति चिन्ह आप यहाँ से खरीद  सकते हैं पर कीमत के हिसाब से सब बहुत महेंगे हैं |खुबानी लद्दाख में सबसे ज्यादा होने वाला फल है |अन्य पहाडी भागों के मुकाबले यहाँ चीड या देवदार के पेड़ नहीं होते हैं यहाँ सफेदा नाम का पेड़ होता है जिसकी लकड़ियों का इस्तेमाल मकान की बीम बनाने में किया जाता है |ये पेड़ ऊँचें तो होते हैं पर इन पर पत्तियां कम होती हैं ,तना ज्यादा लम्बा होता है आकार में यूकेलिप्टस के पेड़ जैसा कुछ |
सफेदा पेड़ 
पास में ही आल्चीको बाँध (डैम ) था तो फैसला किया गया क्यों न इन मानव निर्मित नए तीर्थों के दर्शन कर लिए जाएँ |सिन्धु जांसकर नदी पर पर बना यह बाँध दूर से ही दिखाई देता है |बाँध की तलहटी में खासी हरियाली है जहाँ सुंदर सरसों के फूल खिले हुए थे |किसी बाँध को करीब से देखने का यह पहला अवसर था |बाहर से यह बाँध भी बाकी के सारे बांधों जैसा ही है |पानी की एक एक विशाल धारा उपर से नीचे गिर रही थी और उसकी बौछारें हम तक आ रही थीं |चूँकि बाँध के आस –पास फोटोग्राफी वर्जित है इसलिए हम मन मसोस कर रह गये |अब बाँध के अन्दर जाना था जमीन से लगभग साथ फीट नीचे हम ऊपर बहती नदी के ठीक नीचे थे |यह विज्ञान का चमत्कार ही था उपर नदी अपने पूरे वेग में बह रही थी और उसके ठीक नीचे आलीशान एक विशाल कक्ष बना था जहाँ टर्बाइन लगी हुई थी
आल्चीको डैम 
जो जल उर्जा को विद्युत् उर्जा में बदल रही थी |सब कुछ कम्प्युटरीकृत बाँध के दरवाजे भी कंप्यूटर से खोले और बंद किये जाते थे |दीवारों में कई तरह के कंप्यूटर लगे हुए थे जो लगातार बाँध से सम्बन्धित सूचनाएं प्रेषित कर रहे थे |वहां के इंजीनियर बड़ी तत्परता से हमें एक –एक चीज समझा रहे थे |हम जितने नीचे आये थे उसके दुगुने नीचे टर्बाइन के पर थे |मुझे यह जानकर बड़ी हैरानी हुई कि बाँध की उत्पादन क्षमता पैंतालीस मेगावाट थी पर उससे उत्पादन मात्र पंद्रह मेगावाट का हो रहा था |बाँध इतनी बिजली बनाने में सक्षम था कि जिससे पूरे कश्मीर की बिजली मांग को पूरा किया जा सकता था पर ग्रिड न होने के कारण यह बाँध अपने द्वारा उत्पादित बिजली को किसी को बेच नहीं सकता था यहाँ
आल्चीको डैम की तलहटी 
तक पुरे लेह क्षेत्र में बिजली कटौती होती है भले ही वह कुछ देर की हो  |ग्रिड कब तक लगेगी मैंने पूछा जवाब आया कम से कम बीस साल अगर आज काम शुरू हो जाए तो ,तब तक बाँध को कम बिजली बनानी पड़ेगी | बीस साल का समय इस लिए बताया गया क्योंकि यह उंचाई पर बसा क्षेत्र था जहाँ खम्भे लगाना एक दुरूह कार्य था |वहां तीन विशाल टर्बाइन लगे हुए थे पर उत्पादन एक से ही हो रहा था |फोटो खींचने की मेरी आतुरता को देखते हुए मुझे वहां बाँध के एक मॉडल की फोटो कुछ सोचकर इजाजत दे दी गयी पर उस मॉडल के पास एक कौतुहल मेरा इन्तजार कर रहा था उस मॉडल के पास एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था जहाँ तरह –तरह के भगवान्  सजे थे |
बाँध का मॉडल 
आश्चर्य किन्तु सत्य कारण में भरोसा रखने वाला विज्ञान भी भगवान भरोसे था | 


पत्थर साहिब गुरुद्वारा 
इन विशाल वीरान पहाड़ों से  गुजरते हुए बार –बार मेरा मन यहाँ के वन्य जीवन के बारे में सोच रहा था ,तभी एक पहाडी लोमड़ी हमारे सामने आ गयी पर हमारे दस दिन के प्रवास में और किसी जंगली जानवर के दर्शन नहीं हुए जबकि हम औसतन सौ किलोमीटर प्रतिदिन इन्हीं वीरानों में चलते थे.नजीर ने जरुर बताया कि उसने पहाडी तेंदुआ को कई बार देखा है और वह भी वहां जहाँ हम रुके हुए हैं यानि हमारे गेस्ट हाउस के पास |
पहाडी लोमड़ी 
लौटते वक्त पत्थर साहिब  गुरुद्वारा में कुछ देर के लिए रुके यह गुरुद्वारा सेना द्वारा बनवाया गया है जहाँ सेना लंगर चलाती है |
उसके बाद सेना द्वारा निर्मित हाल ऑफ़ फेम संग्रहालय देखा गया जहाँ कारगिल युद्ध से जुडी हुई बातों के अलावा लद्दाख के इतिहास भूगोल की अच्छी जानकारी मिलती है इसके बगल में बच्चों के लिए सेना पार्क है जहाँ सेना की ट्रेनिंग के दौरान जो ,जो करतब करने पड़ते हैं वो सारे बड़े मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत किये गए हैं |
हाल ऑफ़ फेम संग्रहालय 
यह पार्क सेना के उन सामानों से बनाया गया है जो अब खराब हो चुके हैं |टिकट चालीस रुपये मात्र जबकि संग्रहालय का किराया पचीस रुपये मात्र |
शाम को शहर के एस एस पी ने एक छोटी सी दावत रखी थी वो लखनऊ के ही हैं और सौगत के बताने पर कि लखनऊ से उनका एक दोस्त आया हुआ हमें भी उस पार्टी में आमंत्रित किया गया |सुरों से सजी हुई उस पार्टी में कब रात के एक बज गए हमें खुद ही नहीं पता चला |सौगत ने मेरा परिचय शहर के एस एस पी सुनील कुमार गुप्ता से मेरा परिचय कराया |उनको देखते ही मुझे लगा कि इनको कहीं देखा है पर कहाँ ये बहुत दिमाग पर जोर डालने के बाद भी समझ नहीं आया |
एस एस पी डॉ सुनील गुप्ता (बीच में )
मैंने अपनी शंका सौगात से शेयर की और उनका जवाब हमेशा की तरह वैसा ही था जैसा की अमूमन ऐसे मुद्दों पर होता है अबे छोड़ न एक ही शहर कहीं देखा होगा |खैर एस एस पी साहब से जब बात चीत शुरू हुई तो पता चला हम एक ही समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ें हैं |यह लखनऊ लौटकर पता चला हम और वो ग्रेजुएशन में एक ही क्लास में पढ़ा करते थे |उनका घर भी मेरे घर के पास ही निकला |अब बात चीत मुड़ चली थी शहर की कानून व्यवस्था पर मैंने अपना एक ओब्सर्वेशन उनसे शेयर किया |मैंने दिन में लेह का केन्द्रीय कारागार देखा था |उसकी दीवारें इतनी छोटी थीं की जेल के अन्दर का द्रश्य बाहर से बड़े आराम से दिखता है और जेल है भी बहुत छोटी मतलब उसका परिसर बहुत विशाल है पर दो चार कमरे ही बने दिखते हैं जिनसे कभी भी कोई भाग सकता है | जब मैंने अपनी यह शंका सुनील से जाहिर की तो उन्होंने एक और मजेदार बात बताई लेह जेल में इस वक्त मात्र 32 कैदी हैं जिनमें से 9 विचाराधीन है और कारगिल जिले के कैदी भी यहीं हैं |अब आप अंदाजा लगा सकते हैं लेह में अपराध कितना कम है |मेरा व्यक्तिगत रूप से यह मानना है लेह में आकर आपको लगता ही नहीं आप भारत में है जैसे पहाडी सड़क पर अक्सर  गाड़ियों का आमना सामना हो जाता है गलती किसी भी की हो गाली क्या मैंने अपने ड्राइवर को भुनभुनाते नहीं देखा गाली तो लगता है जैसे यहाँ दी ही नहीं जाती ये अलग बात है एक बार मैंने गेस्थाउस के कुक को गाली देते तब सुना था जब उसने बताया की चार घंटे से बिजली नहीं आ रही है और आप डी सी साहब (सौगत ) को फोन करो |लड़कियां औरतें पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं और कोई ऐसा काम नहीं है जो वो न करती हों ,जहाँ पुरुष अधिपत्य हो ,लोग अनजान आदमी से मिलते हुए भी जुले अभिवादन करना नहीं भूलते|जिन्दगी थोड़ी मुश्किल है पर लोग खुशहाल हैं |
जारी ....................................................................

1 comment:

Harshit Srivastava said...

Hamesha ki Taraha bahut khoob (Y)

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