Wednesday, June 24, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत आठवां भाग )

लेह का नवनिर्मित टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर 
नुब्रा घाटी जाने  से पहले की एक रात का किस्सा हुआ यूँ की सौगत ने जम्मू कश्मीर राज्य का पहला टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर लेह में बनाया है |जब मैं पहले दिन यहाँ पहुंचा था तो यह आकार ले रहा था जिसका उदघाटन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद को करना था |यह टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर एकदम यूरोपीय तर्ज पर बनाया जा रहा था |सौगत ने बेकार पड़े एक पुराने डाक बंगले को इसके लिए चुना और इसका नवीनीकरण कराया जहाँ लेह के पर्यटक स्थलों को आडियो वीडिओ के माध्यम से दिखाया जाता है |एक छोटा सा संग्रहालय भी यहाँ बनाया गया है जहाँ से आपको लद्दाख की सभ्यता संस्कृति की आपको झलक मिल सकती है |इसके अलावा यहाँ एक ऑक्सीजन बार भी जहाँ आप ऑक्सीजन की कमी होने पर भुगतान करके ऑक्सीजन ले सकते हैं |एक और ख़ास बात यह सरकारी होते हुए भी एक कोर्पोरेट शैली में काम करता है |मेरे लिए खुद यह हैरत की बात थी कि यह लगातार बारह  घंटे सातों दिन सुबह के नौ बजे से रात के नौ बजे तक काम करता है |चूँकि लेह में विदेशी पर्यटक बहुत ज्यादा आते हैं और एक तरफ चीन और दूसरी तरफ पाकिस्तान से लगा होने के कारण यह एक संवेदनशील पर्यटक स्थल है |यहाँ आने वाले विदेशियों को बहुत ज्यादा परेशानी होती है टूरिस्ट एजेंट परमिट के नाम पर उनसे ज्यादा पैसे ऐंठते हैं और परेशानी अलग से |
कारवां बढ़ा जा रहा है 
सौगत ने पर्यटकों को इन सब परेशानियों से निजात दिलाने का एक केंद्रीयकृत तरीका निकाला सब कुछ ऑनलाइन |आप दुनिया के किसी भी देश से यहाँ आ रहे हों आप पहले ही अपना पंजीकरण यहाँ आने के लिए करा सकते हैं |इस टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर में आपको सारा सम्बन्धित साहित्य नक्शों समेत उपलब्ध कराया जाता है |आप अपने समय के हिसाब से यह आंकलन कर सकते हैं कि आपको क्या –क्या चीजें देखनी हैं |एक साल पहले तक पेंगोंग और नुब्रा घाटी जाने के लिए भारतीयों को भी परमिट बनवाना पड़ता था |अब यह व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है पर विदेशियों के लिए अभी भी अनिवार्य है और इसी परमिट के लिए उन्हें कलेक्टर ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ते हैं |इस टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर के बन जाने से सभी को बड़ी सहूलियत होने वाली थी |मेरे दस दिन के लेह प्रवास में मैंने इसे पूरा आकार लेते देखा | वैसे भी मुझे और सौगत को साथ बैठने का मौका देर रात मिलता और हम न गेस्ट हाउस पर मिलते न उसके घर पर हम कोई एक सुनसान जगह चुनते जहाँ हमारी बतकही में व्यवधान डालने वाला कोई न हो ,हम ऐसी ही एक बैठकी की प्लानिंग कर रहे थे कि सौगत ने मुझसे कहा एक काम कर टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर चले जाओ पर किसी को यह नहीं पता चलना चाहिए कि तुम मेरे दोस्त हो ,तुम्हें एक सामान्य पर्यटक बन कर जाना है और सेंटर कैसे काम कर रहा है इसकी मुझे रिपोर्ट देनी है |
पहाड़ों के बीच खार्दूंगा ला का रास्ता 
काम मुश्किल था पर करना तो था रात के आठ बज रहे थे |मैंने अपने दिमाग में पुरी प्लानिंग कर ली |नजीर को भी मैंने नहीं बताया गाडी टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर से पहले रोक कर मैंने नजीर से बहाना बनाया कि मुझे बाजार को देखना है इसलिए वो वहीं रुके उसने मेरे साथ आने की भरसक कोशिश की |किसी तरह उसे मैंने गाडी में ही रुकने को मनाया और मैं पहुँच गया टूरिस्ट इन्फोर्मेशन सेंटर ,काम अभी भी चल रहा था |रिसेशप्सन पर दो महिलाओं ने मेरा स्वागत किया मैंने अपने आपको एक दुर्घटना का मारा बताया जो लेह में चार दिन के लिए फंस गया और अब मैं लेह घूमना चाहता हूँ |उन दोनों महिलाओं ने शान्ति से मुझे सुना फिर मेरे सामने एक नक्शा रख दिया जिसमें लेह के आस-पास की सारे पर्यटक स्थल की जानकारी थी |उन दोनों महिलाओं ने भरसक मेरी या एक भटके हुए पर्यटक की मदद की |किसी सरकारी अभिकरण में इस तरह के व्यवहार की मैंने बिलकुल भी उम्मीद नहीं की थी |
खार्दूंगा ला 

जैसे ही मैं वहां से निकला सौगत की गाडी वहां पहुँच गयी और मुझे मजबूरी में उसके साथ जाना पडा |मुझे सौगत के साथ देखकर उन दोनों महिलाओं के चेहरे पर कोई भाव नहीं आये ,मुझे यह देखकर तसल्ली हुई कि यहाँ के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यहाँ कौन आया उनका जो काम है वो पूरी तल्लीनता से अपना काम करेंगी |मेरे साथ जो हुआ उसकी रिपोर्ट मैंने सौगत को दे दी और चलने से पहले वहां के विजिटर रजिस्टर में उन महिलाओं की तारीफ़ भी लिखी |उनके द्वारा दिए गए पर्यटन साहित्य को  मैं अपने साथ लखनऊ इस वायदे के साथ ले आया कि मैं इन सबका हिन्दी में अनुवाद करके भेजूंगा ,वो भी मुफ्त में क्योंकि वहां सबकुछ या तो उर्दू में था या अंग्रेजी में मुझे उम्मीद है अगली बार जब मैं लद्दाख जाऊँगा तो मुझे सारी पर्यटन सामग्री हिन्दी में भी मिलेगी |सौगत ने मुझसे वायदा किया जितनी जल्दी मैं इन सबका अनुवाद करके भेज दूंगा उतनी जल्दी इसका अनुवाद प्रकाशित करा दिया जाएगा |
उस रात हम करीब एक बजे तक देश दुनिया की बातें करते रहे ,कितना कुछ बदल गया था हमारे जीवन में ,कितना कुछ था हमारे पास याद करने को,कितना कुछ था जो हम पहले कितनी आसानी से कर लिया करते थे पर अब नहीं कर सकते |
फुर्सत के लम्हे 
हम दोनों की जिन्दगी बहुत तेजी से बदल रही थी पर ये रिश्ता इसलिए अहम् था कि हम दोनों में बहुत कुछ ऐसा था जो साझा था हम भले ही अक्सर न मिलते हों ,फोन पर भी एकाध महीने में बात करते हों पर हमारा दर्द का रिश्ता है |
अगले दिन हम नुब्रा जाने के लिए तैयार थे |एक बार फिर ऑक्सीजन सिलेंडर गाडी में डाला गया ,टॉफी और हाजमोला से जेबें भरी गयी |नुब्रा लेह से 120 किलोमीटर दूर है |चूँकि हमें एक रात नुब्रा में रुकना था इसलिए समय की कोई समस्या नहीं थी |हम सुबह आठ बजे नुब्रा के लिए निकल पड़े |शुरुवात में रास्ता समतल था धीरे –धीरे उंचाई बढ़ने लगी |मैं रास्तों का आनंद ले रहा था |
ये रास्ते हैं पहाड़ के ....
हम एक बौद्ध श्मशान से गुजरे दुर्भाग्य से मैं उसकी तस्वीर न ले पाया ,फैसला ये किया गया कि जब नुब्रा से लौटेंगे तो तब थोड़ी देर वहां रुका जाएगा |पर लौटते वक्त हमें रास्ता बदलना पड़ा और वो श्मशान हमसे छूट गया |पहाड़ों का वीराना बढ़ रहा था ,सामने बर्फ से लदे पहाड़ थे जिनके बीच में से हमें गुजरना था |नुब्रा घाटी के लिए रास्ता खार्दुन्गा ला पास को पार कर जाना होता है | गेस्ट हाउस में हम जिस सुइट में रुके थे उसका नाम भी खार्दुन्गा ला था | खार्दुन्गा ला दुनिया की सबसे उंचाई पर बनी सड़क थी जिस पर गाड़ियाँ चल सकती थी |जैसे –जैसे खार्दुन्गा ला पास आ रहा था हमें लग रहा था जैसे हम बर्फ के देश में हो |चारों तरफ बर्फ पहाड़ पर बनी सडक ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने सफ़ेद कपडे पर पेन्सिल से रेखाएं खींच दी हों |

खार्दुन्गा ला पर गाडीयों की एंट्री होती है और आधे से ज्यादा पर्यटक यहाँ से वापस लेह लौट जाते हैं |आधे ही नुब्रा की ओर रुख करते हैं |तेज धूप निकली हुई थी पर बीच –बीच में मौसम बदल जाता और बदली छा जाती और हल्की बर्फबारी होने लगती | खार्दुन्गा ला पास पर अफरा तफरी का लाम था चारों तरफ गाड़ियाँ और लोग ,कुछ उस बोर्ड पर जाकर फोटो खिंचवा रहे थे जहाँ लिखा था दुनिया की सबसे ऊँची गाड़ियों के चलने लायक रोड |
जारी ...............................................................


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