Thursday, June 25, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत नवां भाग )

पहाड़ में ऊंट की सवारी 
      खार्दूंगा ला के बाद गाड़ियों की भीड़ कम हो गयी और अब ढलान शुरू हो गयी अब हम नीचे उतर रहे थे |पहाड़ों की बर्फ धीरे –धीरे ख़त्म होने लगी |अब पहाड़ धूसर रंग के हो चले थे,सन्नाटा,ठंडी हवा,तेज चमकती धूप के साथ अब हमारे साथ श्योक नदी भी चल रही थी,गर्मी का मौसम था पर नदी अभी उतना पानी नहीं था इस बार बर्फ देर से पिघल रही थी |साफ़ नीला पानी उस वीराने में भी आँखों को ठंडक दे रहा था वैसे पानी था भी बहुत ठंडा | नुब्रा घाटी श्योक और नुब्रा नदी के संगम पर बसी है | नुब्रा घाटी का प्रशासनिक केंद्र डिसकिट है और यहीं पर शुरुवात में हमारे रुकने की व्यवस्था की गयी थी |गेस्ट हाउस पहुँचने पर नुब्रा के बारे में जैसा सुना था वैसा कुछ नहीं लगा एक पहाडी गाँव और छोटी सी मार्केट ,दोपहर का समय था ज्यादातर दुकाने बंद थीं ,पूरा गाँव अलसाया सा घरों में बंद था |
श्योक नदी 
मुझे लगा यह तो नाम बड़े दर्शन छोटे वाली कहावत चरितार्थ हो रही है |न रेगिस्तान न ऊंट न नाखिल्स्तान ,नुब्रा घाटी के बारे में जैसा पढ़ा था ऐसा कुछ भी नहीं था |गेस्ट हाउस यूँ तो अच्छा था पर लेह के गीजर पैलेस जैसी सुख सुविधाएं भी नहीं थी |दिन में यहाँ बिजली नहीं आती तो कुल मिला कर बड़ा नीरस सा माहौल था |हम इसी उहापोह में थे कि क्या करें तभी सौगत का संदेसा आया कि यहाँ से दस किलोमीटर दूर हुन्डर गाँव है जहाँ हम सैंड ड्युन्स का मजा ले सकते हैं और वहीं कोई ओर्गेनिक रिसोर्ट है जहाँ हम टेंट में रुक सकते हैं |फैसला हमें करना था |मैं अनिर्णय की स्थिति का शिकार हो रहा था |एक बार फिर सौगत ने राह दिखाई कि कमरे में बहुत बार रुके हो इस बार टेंट में रुकने का मजा लो |मैंने भी सोचा चलो एक बार टेंट में रुकने का मजा लिया जाए |
पहाडी रेगिस्तान 
टेंट में बसेरा 
एक बार फिर सामान बाँधा गया और हम हुन्डर के ऑरगेनिक रिसोर्ट चल पड़े |अभी कुछ किलोमीटर ही चले होंगे कि सारा नजारा बदल गया |एक छोटा मोटा पहाडी रेगिस्तान हमारे सामने था |नजीर ने हमें बताया कि यहीं अभी हमें कैमल राईड करनी है यनि ऊंट की सवारी वो भी ऐसे ऊँटों पर जो सारे भारत में यहीं पायें जाते हैं यनी डबल हम्प्ड कैमल दो कूबड़ वाले ऊंट ,यह नुब्रा की खासियत थी |हरियाली बढ़ रही थी पर यह हरियाली उन कांटेदार झाड़ियों की थी जो नुब्रा के इस रेगिस्तान में ही पायी जाती हैं |हम ऑर्गेनिक रिसोर्ट पहुँच रहे थे चारों ओर फ़िल्मी माहौल वाले टेंट ,झूले और मचान दिख रहे थे |मन में थोड़ी सी शंका थी अगर यहाँ व्यवस्था ठीक न निकली तो .................|मेरा तो .तो ही रह गया सब कुछ अद्भुत थी |एक डबल बेड रूम वाला जिसके साथ अटैच्ड बाथरूम सब कुछ प्राकृतिक ,पानी पहाड़ों से सीधे आ रहा था |हमारे टेंट के सामने एक छोटा सा तालाब था जिसमें मछलियाँ तैर रही थी |बगल में एक मचान बना हुआ था जिस पर चढ़ कर हम पुरे एरिये को देख सकते थे |ऊँचे –ऊँचे सफेदा के पेड़ ,पहाड़ों के बीच यह रिसोर्ट बना था|दिन में कोई बिजली नहीं दी जाती है सब कुछ प्राकृतिक था रौशनी के लिए सूरज,पानी पहाड़ों से सीधे आता हुआ | प्रकृति की गोद में हजारों बार यह शब्द पढ़ा है और शायद सैकड़ों बार लिखा भी है पर महसूस पहली बार कर रहा था |चाय पानी करके अब सैंड ड्युन्स का मजा लेना था |
डिसकिट मोनेस्ट्री
आते वक्त दूर से ही देखा था पर जैसे ही हम वहां पहुंचे लगा यह लद्दाख में ही संभव है चारो और पहाड़ कुछ पर बर्फ कुछ वीराने ,घाटी में दूर तक पसरा हुआ रेगिस्तान और बीच में बहता हुआ छोटा सा नाला उसके आस पास हरियाली ,दबंग सलमानखान के शब्दों में हम कन्फ्यूज हो गये कि हम हैं कहाँ  इसे रेगिस्तान कहें या  नखलिस्तान या पहाडी  इलाका ,पानी भी था ही |लोग ऊंट की सवारी का मजा ले रहे थे |पंद्रह मिनट की सवारी के दो सौ रुपये प्रति सवार कोई हाय हाय किच किच नहीं न कोई मोल भाव सब कुछ शान्ति से सम्पन्न हो रहा था लोग आ रहे थे लोग जा रहे थे |सूरज डूब रहा था हवा ठंडी हो रही थी लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी |वैसे लोगों के हुजूम को भीड़ कहना भीड़ के साथ ज्यादती होगी इतने विशाल क्षेत्र में शायद सौ या  दो सौ लोग होंगे|
रेगिस्तान में नखलिस्तान और नजीर 
शाम होते ही आसमान तारों से भर गया इतना साफ आसमान और तारों की झिलमिल हम वाकई प्रकृति की गोद में थे |रिसोर्ट में कैम्प फायर की व्यवस्था थी पर मैंने अपने टेंट में तान के सोने की सोची |रात शांत थी सिवाय कुछ कुत्तों की आवाज के जो रात भर भौंकते रहे |सुबह मैंने जल्दी उठकर बाहर घूमने की सोची पर ठण्ड के कारण हिम्मत न पडी |
सुबह हम डिसकिट मोनेस्ट्री की तरफ चल पड़े जहाँ सौ फीट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा लगी थी अपनी उंचाई के कारण यह मूर्ति पूरे डिसकिट में आसानी से दिखती है |बुद्ध का इतना आकर्षक और रंग बिरंगा रूप आप लद्दाख की विभिन्न मोनेस्ट्री में ही देख सकते हैं |देश के बाकी भागों में बुद्ध की मूर्तियाँ बहुत सादगी लिए होती हैं |
दिन के नौ बजे रह रहे थे हमारा अगला पड़ाव डिसकिट से सख्लर होते हुए पनामिक हॉट वाटर स्प्रिंग था जहाँ सोते से गर्म पानी निकलता है |यूँ तो यह एक गर्म पानी का सोता था पर ठण्ड में गर्म पानी के सोते को देखने का अपना लग सुख होता है |
 जारी .........................................................


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