Sunday, June 28, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत अंतिम भाग )

अब हुंडर के रेगिस्तान से चलने का वक्त था अब हमारे पास दो रास्ते थे वापस लेह लौट पड़ना या हुंडर से चालीस किलोमीटर दूर हॉट वाटर स्प्रिंग देखने जाना जहां गर्म पानी का सोता था |फैसला यह हुआ कि जब इतनी दूर निकल ही आये हैं तो हॉट वाटर स्प्रिंग को क्यों छोड़ दिया जाये |तो डिस्किट से सख्लरहोते हुए हम पनामिक हॉट वाटर स्प्रिंग देखने निकल पड़े सुबह के नौ बजे थे पर धूप तेज थी ये अलग बात है कि हवा की ठंडक से धूप चुभ नहीं रही थी |
गर्म पानी का सोता 
चालीस किलोमीटर मतलब कम से कम हमें डेढ़ घंटे वहां पहुँचने में लगेंगे |रास्ते में पड़ते हुए गांव मुझे उत्तर प्रदेश और राजस्थान के गांवों की याद दिला रहे थे |गांव का सूनापन मुझे अपने बचपन की याद दिला रहा था जब गर्मी की छुट्टियों में हम गांव जाया करते थे और दोपहर में गांव एक दम सूने लगते थे ,पर बाहर चलती ठंडी हवा ये बता रही थी कि ये उत्तरप्रदेश की जेठ की दोपहरी नहीं है |ऊंची नीची बल खाती सड़क और बर्फ से लदे पहाड बीच –बीच में पत्थर के बने स्तूप और झंडीदार  गेट और प्रार्थना चक्र हमें बता रहे थे ये लद्दाख है |अगर बर्फ के लदे पहाड़ों को निकाल दिया जाये तो पूरा नुब्रा घाटी का इलाका किसी रेगिस्तानी इलाके का एहसास कराता है |कांटेदार झाडियाँ जिनसे खेत और मेड की हदबंदी की गई है |पनामिक से सियाचिन मात्र सत्तर किलोमीटर दूर था पर वहां के लिए आवश्यक तैयारी न होने के कारण हम वहां तक नहीं जा सके ऐसा ही कुछ कारगिल के साथ हुआ दोनों जगहें हमारी पहुंच में थी पर हम पहुंच न पाए |
पनामिक वाटर स्प्रिंग में एक मानव निर्मित कुण्ड है जिसमें ऊपर पहाड़ों से गर्म पानी आता है मैं थोड़ा ऊपर तक गया उसके स्रोत को खोजने गया पर गर्म पानी की कतार के अलावा कुछ पा नहीं पाया |हालँकि हम नुब्रा से नहा के चले थे पर प्राकृतिक रूप से गर्म पानी से नहाने का लोभ नहीं छोड़ पाए चूँकि नहाने का कुण्ड बहुत साफ़ सुथरा था और किसी छोटे स्विमिंग पूल का आभास दे रहा था तो डुबकी मारने में कोई बुराई नहीं थी ,मैंने धीरे से पैर उसमें डाला था कि लगा  पैर जल जाएगा |पैर तुरंत निकाल लिया और उस कुण्ड में नहाने की हिम्मत नहीं पड़ी |कुण्ड के साथ कइ बात रूम बने थे जिसमें बाल्टी से नहाया जा सकता था |उस बाथरूम में भी उसी सोते से पानी आ रहा था जहां से कुण्ड में आ रहा था तो धीरे –धीरे बाल्टी से नहा कर, प्राकृतिक रूप से गर्म पानी से नहाने का लुत्फ़ उठाया |दुर्भाग्य से उसी वक्त कैमरे की बैटरी जवाब दे गई और मोबाईल पहले ही डिस्चार्ज पड़ा था इसलिए वहां की ज्यादा तस्वीरें न ले पाया |
श्योक नदी सफर की साथी 
अब हम वापस लेह लौट रहे थे इस बार मैंने यह सोचा था कि खार्दुन्गा ला पर थोड़ी ज्यादा देर रुकेंगे पर आधे रास्ते लौटने पर पता पड़ा खार्दुन्गा ला में कोई गाड़ी पहाड़ी से नीचे गिर गई है |रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है इसलिए रास्ता बंद है |ये स्थिति बहुत विकट थी पर नजीर समझदार निकला उसने मुझे बताया हमें अस्सी किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ेगा पर हम शाम तक चांग ला होते हुए लेह पहुंच जायेंगे |रोड पर खड़े रहने से चलते रहना बेहतर था |गाड़ी वापस मुडी और एक दूसरे रास्ते पर निकल पड़ी ये वही रास्ता आगे चलकर उस रास्ते से मिल जाना वाला था| जो पेंगोंग से लेह जाता है |ये रास्ता ज्यादा खराब था कहीं कहीं तो सड़क एकदम थी ही नहीं |पर नजीर को अंदाज़ा था इसलिए गाड़ी आगे बढ़ती रही |आधे रास्ते तक श्योक नदी हमारे साथ –साथ चलती रही मेरे लिए नदी समय काटने का अच्छा जरिया बनी |मैं उसकी धारा देखते और न जाने क्या –क्या सोचते हुए अपना सफर तय करता रहा|ऐसी कितनी दुर्गम जगहों पर मानव सभ्यता बसी और पनपी |प्रक्रति दोनों हाथों से  अपनी खूबसूरती लुटा रही थी |गाड़ी बीस की रफ़्तार से बढ़ी जा रही जहां रोड मिलती उसकी गति बढ़ जा रही थी |चूँकि पूरा लद्दाख सैन्य द्र्ष्टि से संवेदनशील है इसलिए सेना की गतिविधियां आपको हर  जगह दिखती रहेंगी पर कश्मीर घाटी जैसा नकारातमक मामला यहां नहीं है |
ऐसे प्रार्थना चक्र जगह -जगह देखे जा सकते हैं 

हम देर शाम लेह पहुंच गए |अब हमारी यात्रा समाप्त हो रही थी |आख़िरी दिन मैंने सौगत के साथ उसके ऑफिस में गुजारने का फैसला पहले से ही कर लिया था |सिंधु समारोह लेह में मेरे लौटने के अगले दिन शुरू हो रहा था |पूरा प्रशासन उसकी तैयारियों में व्यस्त था सौगत बार –बार मुझसे आग्रह कर रहे थे कि रुक जाओ मैं सस्ता टिकट करवा दूँगा अपना टिकट कैंसिल करवा दो, लखनऊ छोड़े ग्यारह दिन हो चुके थे |सिंधु समारोह का हिस्सा मैं भी बनना चाहता था पर 
लेह में आख़िरी रात 
परिस्थितयां ऐसी नहीं थी कि मैं रुक पाऊं |उस दिन हमने दिन का खाना उसके ऑफिस में साथ –साथ खाया |मेरे लिए खास कर लेह के बेहतरीन मोमो मंगवाए गए |उस दिन सौगत ने ऑफिस से जल्दी छुट्टी की |आमतौर पर वह रात के नौ बजे घर पहुंच पाता है पर उस दिन रात आठ बजे हम उसके घर पर इक्कठा हो चुके थे |मटन पक रहा था और कैम्प फायर की आग जल चुकी थी |अगले दिन सुबह सुबह हमारी दिल्ली के लिए उड़ान थी और मैं थोड़ा जल्दी गेस्ट हाउस पहुंचना चाहता पर सौगत ने अपनी टिपीकल स्टाईल में कहा चाचे इतनी जल्दी किस बात की है तुझे कल तो तू चला ही जायेगा |रात के डेढ़ बजे तक महफ़िल सजी रही |सौगत का वश चलता तो वो सारी रात न सोने देता पर मेरी हालत पर तरस खाकर उसने डेढ़ बजे हमें मुक्त कर दिया |गर्मी की उस ठंडी रात में हमने भारी मन से उससे विदा ली |यात्रा जरुर खत्म हो रही थी पर जिंदगी का सफर जारी था |हम वापस अपनी दुनिया में कुछ सुहानी यादों को जोड़े हुए लौट रहे थे |सच में कभी –कभी जिंदगी कितनी खूबसूरत लगती है |सौगत तुम याद आते हो बस ....................  
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समाप्त 

5 comments:

deepudarshan said...

पूरी लेह यात्रा वृतांत का जिस खूबसूरती से वर्णन आपने किया है वो अदभुत है पढ़ कर अच्छा लगा...लेह गये बिना लेह से आपने परिचित भी करा दिया ....

Mehndi Agarwal said...

Sir, just finished reading all the blog posts about your trip to Ladhak. They were very informative & interesting and as someone who wishes to travel the world someday, reading about your experiences renewed my interest exploring new things. I’ve heard so much about the place and especially its people, I can only hope to experience their hospitality soon. Until then, Ladhak is definitely one of the places on top of my travel bucket list.

arvind singh Yadav said...

Nic one sir , ladhak k baare me to bahut suna tha ki aisa wha pe waisa bahut accha lgta hi mausam bahut badhiya hota hi lekin aapke experience ko padh k aisa lag rha hi jaise jaise aapne line likhi hai waise waise koi guide person ladhak k bare me bta rha hi or hm ghumm rhe hai...thanks sir giving us to good knowledge about ladhak

journalist said...

बहुत शानदार आपने लिखा है। लेह के बारे मैं कई जानकारियां मिली। एक बार मैं भी जरूर लेह जाउंगा

Suraj Verma said...

एक बार तो लेह जाना बनता है,आपने इतना कुछ बता दिया लेह के बारे में की अब तो जाना ही पड़ेगा। सर थैंक यू

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