Monday, June 15, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत दूसरा भाग )

गेस्ट हाउस की बालकनी 
गाडी मैं बैठते ही मुझे लगा कि अब थोडा टाईम लगेगा गेस्ट हाउस पहुँचने में पर ये क्या मुश्किल से पांच मिनट में हमारी गाडी रुक गयी और वो अधिकारी जो हमें एयर पोर्ट पर मिले थे बाहर हमारा इन्तजार कर रहे थे |मैंने पूछा क्या, आ गया ? जवाब मिला हाँ यही है  गीजर पैलेस  गेस्ट हाउस ,सामान उतारा गया और पहली मंजिल पर  कमरा नंबर एक जिसका नाम खार्दूंगला सुइट था हमारे लिए खुल गया आगे एक ड्राईंग रूम और अंदर एक शानदार बेड रूम सारी आधुकिक सुविधाओं  से युक्त सामने एक सुन्दर बालकनी जहाँ से लेह एयरपोर्ट पर उड़ते उतरते हवाई जहाज दीखते थे |मैं लेह को छोड़कर अब तक पूरा कश्मीर देख चुका हूँ एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि जम्मू कश्मीर सरकार के सारे गेस्ट हाउस बहुत उच्च गुणवत्ता वाले और खुबसूरत जगहों पर स्थित होते हैं ,उत्तर प्रदेश के मुकाबले इनकी सेवाएँ कहीं ज्यादा अच्छी होती हैं |

अब तक मेरे मोबाईल का थ्री जी नेटवर्क काम कर रहा था ,खुशी इस बात की थी चलो इंटरनेट से सबको अपनी खोज खबर देता रहूँगा पर नेट की स्पीड बहुत स्लो थी |मुझे नहीं पता था की अगले दिन मेरी यह खुशी काफूर हो जाने वाली थी |चाय पानी का दौर शुरू हुआ और यह तय हुआ कि अब थोडा सो लिया जाए वैसे भी अगले चौबीस घंटे हमें सिर्फ आराम करना था तो जल्दी हम बिस्तर की शरण में चले गये |एक बजे नींद खुली तो नहा कर भोजन किया गया और फिर रजाई ओढ़ कर सो गए फिर शाम को ही आंख खुली |
आसमान में उड़ता विमान 
उत्साह का जोश कहें या कुछ न करने की बैचैनी शाम को मैंने गेस्ट हाउस का चक्कर लगाया ,हवा ठंडी और तेज थी और आसमान में बादल नजर आ रहे थे |परेशानी यहीं  से शुरू हुई ,मैंने एक जरुरी हिदायत को नजरंदाज किया ,हमें सिर्फ आराम करना था और बाहर टोपी लगा कर निकलना था और मैंने इन दोनों का पालन शाम को नहीं किया |सर के एक कोने में दर्द शुरू हुआ फिर सांस लेने में परेशानी और कुछ ही देर में ऐसा लगा कि सब कुछ ठीक नहीं है नौ बजते बजते हालत खराब हो चुकी थी |डॉक्टर को सूचना भेजी गयी वो एम्बुलेंस समेत हाजिर हुआ ऑक्सीजन का सिलेंडर उतारा गया |डॉक्टर ने देखना शुरू किया |ऑक्सीजन का लेवल कम था और मैंने दोपहर में नहा भी लिया था सोने पर सुहागा शाम को बगैर टोपी के गेस्ट हाउस के चक्कर भी मारे |डॉक्टर ऑक्सीजन लगा और तीन दिन में एक बार नहाने  की हिदायत के साथ चला गया |
मोनेस्ट्री के ऊपर विमान 
रात ऑक्सीजन के साथ कटी सुबह एक बार फिर चेक अप हुआ अब ऑक्सीजन का लेवल ठीक था लेकिन अभी हम लेह घूमने लायक नहीं हुए थे |सहूलियत के लिए एक ऑक्सीजन का सिलेंडर जब तक हम रहे हमारे साथ एक ऑक्सीजन का सिलेंडर का हमेशा रहा |
मैंने डॉक्टर से इधर उधर की बात शुरू कर दी |डॉक्टर तासी यही नाम था उनका जम्मू से उन्होंने एम् बी बी एस किया था और लद्दाख के रहने वाले थे |उन्होंने हिन्दी जम्मू में सीखी इस क्षेत्र में ज्यादातर लोगों ने हिन्दी या तो बाहर जाकर या फिर हिन्दी फिल्मों से सीखी है |जब डॉक्टर तासी अपने सहयोगियों से बात कर रहे थे तो मैं अंदाजे से उन लोगों की बातें समझने की कोशिश कर रहा था |दूसरे दिन ही मुझे समझ में आ गया कि यहाँ की महिलायें सिर्फ घरों में चूल्हा चौका तक सीमित नहीं हैं बल्कि बाहर के हर कार्य में पुरुषों से बराबर कन्धा मिला कर कार्य करती हैं |डॉक्टर तासी की टीम में उनको छोड़कर दो लोग थे जिनमें एक पुरुष और एक महिला थी |हमारे गेस्ट हाउस में ज्यादातर काम करने वाली महिलायें थीं जिनके जिम्मे हमारे खाने और नाश्ते की व्यवस्था थी |एक और बात जो काबिल ए गौर है हम जिस दिन लौट रहे थे तो एक एक करके सभी काम करने वाले हमसे मिलने आ रहे थे जिनमें ज्यादातर महिलायें थीं |
समय बिताने के लिए करना है कुछ काम 
जाहिर है वो मुझसे टिप की अपेक्षा कर रही थी और इसमें मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा क्योंकि वे सभी एक बार बेल बजाने के कुछ ही क्षणों में हमारे सामने होतीं थी और उन्होंने हमारा बहुत ख्याल रखा था |मैंने उन्हें एक लड़के को बुलाने को कहा जो हमारा सामान गाडी में नीचे रख दे पर उन्होंने कहा इसकी कोई जरुरत नहीं उन्होंने तुरंत हमारा सामान उठा लिया और बड़े आराम से ले जाकर गाडी में रख दिया |खैर डॉ तासी से मैंने काफी बातें कीं उन्होंने बताया कि यहाँ उच्च शिक्षा की बड़ी समस्या है बड़े स्कूल और कॉलेज जम्मू या श्रीनगर में हैं |
ऑक्सीजन की भरपाई 
हर एक के लिए घर छोड़ना आसान नहीं होता है भाग्यशाली लोग ही आगे पढ़ पाते हैं |बाकी या तो सेना में जाते हैं या यहीं रुक कर छोटा मोटा काम करते हैं |आधिकारिक रूप से लेह की कुचल जनसँख्या लगभग ढाई लाख है जिसमें सत्तर प्रतिशत बौद्ध और शेष में मुस्लिम और हिन्दू लोग हैं इसलिए शहर में कहीं ज्यादा भीड़ नहीं हैं और कश्मीर घाटी के मुकाबले यहाँ धार्मिक  सौहाद्र कायम हैं सब मिलजुल कर रहते हैं | चूँकि कोई काम था नहीं कहीं जा सकते नहीं थे तो मैं अपने गेस्ट हाउस से उड़ते हुए विमानों की फोटो खींचे हुए समय काटने लगा |बहरहाल शाम तक मैं हल्का महसूस कर रहा था |सौगात लगातार फोन से हमसे जुड़े हुए थे अपनी व्यस्तताओं के बावजूद |शाम को नाजिर को लेकर हम सौगत के घर गये हालांकि सौगात नहीं थे पर भाभी के अलावा जो सबसे बड़ा मौका था सौगात के पिता जी से मिलने का था |जिनकी लिखी हुई किताबों को पढ़कर मेरा जीवन हमेशा के लिए बदल गया और दलित साहित्य से पहला परिचय भी सौगत ने अपने पिता जी के किताबों द्वारा करवाया गया |सबसे मुलाक़ात और बात चीत के क्रम में मैंने महसूस किया की मेरा सर दर्द फिर शुरू हो गया है इसलिए बगैर खाना खाए मैंने वहां से गेस्ट हाउस लौटने का निर्णय लिया |
तीसरा  भाग पढने के लिए क्लिक करेhttp://mukulmedia.blogspot.in/2015/06/blog-post_17.html#.V1-Kp_l96Uk 
                                            जारी ..........

2 comments:

Gaurav Sengar said...

Sir, aapka blog padha! baut shandar lek tha! is se pad kr meri iccha wha jane ki or jayda ho gyi hai. Thanks for sharing ur experience..

Rergards,
Gaurav pratap singh

Dr Prabhat Tandon said...

अगले भाग की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी ।

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