Saturday, June 20, 2015

लखनऊ से लेह (यात्रा -वृत्तांत छठा भाग )


घास चरते  याक 
पिछली रात सोते सोते दो बज गया तीन घंटे की नींद के बाद सुबह-सुबह  हमें विश्वप्रसिद्ध पेंगोंग झील देखने जाना था |कार्यक्रम यूँ रखा गया कि हमें सुबह ७ बजे गेस्ट हाउस से निकलना था | पेंगोंग झील की प्रसिद्धी चर्चित फिल्म थ्री इडियट्स की शूटिंग के बाद और ज्यादा बढ़ गयी है | पेंगोंग लेह से लगभग 150 किलोमीटर दूर है और रास्ता बहुत ही खतरनाक है |तो सफ़र की तैयारी रात में ही शुरू हो गयी थी |नजीर ने एक ऑक्सीजन का सिलेंडर पहले ही गाडी में रख लिया था |वैसे सैलानियों को पेंगोंग जाते वक्त ऑक्सीजन सिलेंडर साथ में रखने की हिदायत दी जाती है |
झील का किनारा 
रास्ते के लिए ढेर सारी हाजमोला और टॉफी भी जरुरी है |पूरा रास्ता गोल गोल है रास्ते में बर्फबारी भी होती है इसलिए गाडी में लोहे की चेन भी राखी जाती है जिससे बर्फ पर गाडी फिसले नहीं हमें चांग ला पास से गुजरना था जो दुनिया का दूसरा सबसे ऊँचा रास्ता था |
पेंगोंग के किनारे 
इस यात्रा में कारू में तैनात मेजर पंकज अपने परिवार के साथ चलने  वाले थे मतलब हमें सेना की निगहबानी में चलना था तो कोई समस्या नहीं थी |नाश्ते खाने की जिम्मेदारी सेना की थी और हमारे जिम्मेदारी घूमने की ,धीरे –धीरे उंचाई बढनी शुरू हो गयी और पहाड़ जो अभी तक वीरान दिख रहे थे उन पर बर्फ की चादर दिखनी शुरू हो गयी |जैसे –जैसे हम आगे बढ़ते गये बर्फ की परत मोटी होती गयी ,बीच –बीच में हमें जमे हुए तालाब और नाले दिख रहे थे |गर्मी का मौसम था और बर्फ पिघल भी रही थी पर बहुत धीरे –धीरे|पूरा रास्ता ऐसा ही है जब उंचाई बढ़ती तो पहाड़ सफ़ेद हो जाते जैसे ही उंचाई घटती पहाड़ का रंग बदल जाता ,इतने रंगीन पहाड़ सिर्फ लद्दाख में ही देखे जा सकते हैं |रास्ता बहुत लम्बा और थका देने वाला था याक के भी दर्शन बीच –बीच में हो रहे थे जो यहाँ वहां हल्की जमी हुई घास जैसी चीज चर रहे थे  |आज नजीर हमारे साथ नहीं आया था इसलिए ड्राइवर से मैंने बात करनी शुरू कर दी |
रंग बिरंगे पहाड़ 
अली मुहम्मद दसवीं पास था उसका घर नुब्रा घाटी से नब्बे किलोमीटर आगे चुलुन्ग्खा गाँव में था |उसके गाँव की कहानी बड़ी विचित्र थी| चुलुन्ग्खा 1947 से पाकिस्तान का हिस्सा था |1972 की लड़ाई में इस हिस्से को भारतीय सेना ने जीत लिया और तब से यह भारतीय गांव हो गया | अली मुहम्मद सेना से बहुत खुश था उसने बताया की सेना और गाँव वाले एक दुसरे की भरपूर मदद करते हैं |सेना की मदद से गाँव में स्कूल बना है और हॉस्पिटल भी ,अगर गाँव में कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाता है तो सेना उसे हेलीकॉप्टर से अस्पताल पहुंचाती है |विचित्र किन्तु सत्य गाँव वाले सेना के लिए कुलियों का काम करते हैं |अली मुहम्मद के आधे रिश्तेदार उस पार मतलब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हैं जिनसे वो कभी नहीं मिला पर अब व्हाट्सएप पर उनके वीडियो आते रहते हैं |
सेना के कैम्प के पास 
वो और उसका परिवार भारत के साथ खुश है |बात पाकिस्तान की हो रही थी पर हम जा चीन की तरफ रहे थे | पेंगोंग का दो तिहाई हिस्सा चीन में है और एक तिहाई लगभग  पैंतालीस किलोमीटर भारत में हैं | पांच घंटे का रास्ता बहुत लम्बा लग रहा था एक तो रात को सोने को नहीं मिला उस पर बगैर धूप का चश्मा लगाये बर्फ के बीच से दिन में गुजरना आँखें चुंधिया रही थी |दिन के करीब एक बजे हम लोग पेंगोंग पहुँच गये |तस्वीरें तो पेंगोंग की पहले भी देखी थीं पर यह उससे ज्यादा खुबसूरत थी |मैंने फैसला किया मैं तस्वीरें कम खींचूंगा और सुन्दरता को आँखों में ज्यादा समेट लूँगा |
हम सेना के बेस कैम्प में रुके जहाँ आम लोगों का प्रवेश वर्जित था और वहां खडी पेट्रोलिंग बोट की तस्वीरें खींचने की मनाही थी |मेजर पंकज ने बड़े प्यार से मेरे कान में कहा|कुछ देश की सुरक्षा से जुड़े मसलों पर बात हुई ,हमें भी सेना की बोट पर झील में कुछ देर नौका विहार करने का लुत्फ़ मिला | फिर हम उस जगह पहुंचे जहाँ थ्री इडियट्स के अंतिम हिस्सों की शूटिंग हुई वहां पानी में कुछ देर अठखेलियाँ की ,पानी बहुत ठंडा था |पेंगोंग खारे पानी की झील है मतलब झील में नमक बहुत ज्यादा है ,बाकी झील के इतिहास और भूगोल की जानकारी देने वाला कोई मिला नहीं तो हम बस उसे निहारते रहे रंग बिरंगे पहाड़ों के बीच नीले रंग की झील ,जिसके  पानी का रंग समय के साथ बदलता है इसका कारण उसके आस –पास रंग बिरंगी आभा छोड़ने वाले पहाड़ हैं |
थ्री ईडियट शूटिंग पॉइंट 
यहं कुछ टेंट वाले भी हैं जहाँ रात में टेंट में रुका जा सकता है |एक दो रिसोर्ट भी हैं पर शाम के वक्त झील के पास बहुत तेज हवा चलती है |इसलिए झील के पास न जाने की हिदायत दी जाती है |पेंगोंग तक किस्मत वाले ही पहुँचते हैं सोचते बहुत लोग हैं तो मैं अपनी किस्मत पर इतरा रहा था |प्रकृति का साथ कुछ गिने चुने लोग और शान्ति |मैंने सेना के जवानों से पूछा आप लोग इस वीराने में दिन भर करते हैं |उनका रूटीन निर्धारित है सुबह शाम झील में पेट्रोलिंग औरछुट्टी मिलने का इन्तजार की घर जा सकें |
पेंगौंग में नौका विहार 
तीन बज रहे थे और हमारे लिए सेना के कैम्प में खाना लग चुका था |हवा तेज हो रही थी और रास्ते में बर्फबारी होने का अंदेशा था |जल्दी से भोजन निपटा कर हम वापस लौट चले हाँ लौटते वक्त सेना के जवानों ने हमें कुछ पत्थर भेंट किये वो क्या हैं ,कैसे हैं अभी इसका उत्तर नहीं मिला |पेंगोंग आते वक्त कुछ ख़ास बातों का ख्याल धुप का चश्मा ऑक्सीजन का सिलेंडर ,गर्म कपडे वैसे आधे रास्ते आपको गर्मी लगेगी फिर ठण्ड तो मौसम की इस धुप छाँव के लिए तैयार हो कर आइये|
जारी .........................................................................

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