Thursday, May 3, 2018

आइये चलते हैं अंग्रेजों के देश :लन्दन यात्रा तीसरा भाग


                                लन्दन की पहली सुबह थके होने के बावजूद जल्दी ही आँख खुल गयी |सड़कों पर सिर्फ बड़ी गाड़ियों के चलने का शोर था बाकी आवा जाही छोटी गाड़ियों की भी खूब थी |मैं चौथे तल से गाड़ियों का आना –जाना देख रहा था |सब कुछ व्यवस्थित जेब्रा क्रॉसिंग पर कोई पैदल चलने वाला आँख बंद करके निकल सकता था और मजाल है कि कोई गाडी उसे छू के निकल जाए |कहीं कोई ट्रैफिक पुलिस नहीं जब लाल बत्ती जली तो सब गाडी रोक देते हैं |कोई भी स्मार्ट बन के सिस्टम को चकमा देने की कोशिश नहीं करता पूरा ट्रैफिक सी सी टीवी की निगरानी में है पर ये लोग कानून के डर से नियम नहीं तोड़ते बल्कि कानून मानना इनके जींस में हैं |बत्ती हरी होने के बाद सब एक्सीलेटर पर तेज पैर दबाते हैं इससे शोर होता है पर एक्सीलेटर पर तेज पैर दबाने का कारण यह है कि अगली लाल लाईट सडक पर बीच में अचानक से कोई नहीं आएगा न इंसान न जानवर इसलिए गाड़ियाँ शोर करते हुए निकलती हैं पर इतनी गाड़ियों के बावजूद प्रदुषण नहीं था हमें लगा हम भारत के हिल स्टेशन पर हैं पर ऐसा कुछ नहीं था हम लन्दन में थे दुनिया के सबसे बड़े महानगरों में से एक |सुबह का समय बच्चे स्कूल जा रहे थे ,पूरे लन्दन में सडक पर चलने वाले लोगों में सबसे ज्यादा सम्मान पैदल और साइकिल चलने वालों का होता है |जिनके लिए हर सडक के किनारे रास्ता बना हुआ है जिस पर न तो कोई ठेलिया लगाता है और न ही कोई मोटर साइकिल चलाने वाला गाडी भगाता है |
छतों पर लगे एंटीना 

मुझे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बनवाया फूटपाथ याद आया जिसकी दुर्दशा हो चली है और कहीं ,कहीं उसे तोड़कर सडक में मिलाया जा रहा है |कुछ बच्चे अपने स्केट बोर्ड से अपना सफ़र तय कर रहे थे |हम हैरानी से सडक पर चलने वाली गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे |हमारे मुल्क में तो लोगों का स्टेटस उनकी गाड़ियों की लम्बाई और उनके ब्रैंड से होता है पर यहाँ तो कितनी ब्रांडेड गाड़ियाँ इधर से उधर जा रही थीं लेकिन सडक पर चलने का पहला हक़ पैदल और साइकिल वालों का ही था |असली समाजवाद तो लन्दन की सड़कों पर उतरा हुआ था और हम अपने देश में नारों और  वायदों में उसे खोज रहे थे |मजेदार बात है इस समाजवाद को लाने में इंग्लैण्ड में कोई क्रान्ति नहीं हुई सब कुछ समय के साथ अपडेट होता गया |वो चाहे धर्म हो या राजनीति या फिर लोगों का सिविक सेन्स |
पोस्ट बॉक्स क्या चमक रहा है  

कहीं सिस्टम दिख नहीं रहा था पर काम कर रहा था न पुलिस न ट्रैफिक पुलिस न पिस्तौल न डंडा |कैसे हो रहा था ये सब ,मेरे भारत महान में कहाँ कमी रह गयी |दिमाग में विचारों की आंधी चल रही थी |आजादी के सत्तर साल में कम से कम सात सौ डेलीगेशन नेताओं और अधिकारियों के तो लन्दन जरुर आये होंगे |लन्दन की ट्रैफिक व्यवस्था को समझने वैसे भी हमारा सब कुछ इन्हीं का तो दिया हुआ है सेना से लेकर पुलिस तक सब फिर गड़बड़ कहाँ है ?जीवन के इन अनसुलझे सवालों को छोड़कर अब अपने दिन की शुरुआत करनी थी |वर्ल्ड फोटोग्राफी ऑर्गेनाइजेशन का पुरूस्कार वितरण समारोह शाम को सात बजे था और हमें पांच बजे तक होटल  में उनके प्रतिनिधि से मिलना था यानि पूरा दिन खाली था |नाश्ते के बाद हमने लन्दन को एक्सप्लोर करने का निश्चय किया |गूगल मैप रास्ता बताने के लिए था हालंकि मुझे यह ठीक से चलाना नहीं आता पर अंशुल इन सब मामलों में एक्सपर्ट था और दूसरा होटल में मुफ्त में मिलने वाले तमाम तरह के साहित्य जिनमें लन्दन घूमने की तमाम तरह की जानकारी लिखी हुई थी |
मकान की होती मरम्मत 

कुछ हिदायतें भी साथ थीं जो मुझे उन भारतीय मित्रों से मिलीं थी जो पहले लन्दन घूम आये थे |उनमें से एक थी लन्दन में दुनिया के बहुत से शानदार म्यूजियम हैं और उन्हें देखने का मौका न छोड़ा जाए |तो गूगल पर एक म्यूजियम का पता डाला गया पता चला करीब साढ़े बारह किलोमीटर दूर है |ब्लैक टैक्सी हम लोग भुगत चुके थे |लन्दन की शानदार डबल डेकर लाल बसें आ जा रही थीं पर हमें न तो उनका रूट पता था न टिकट का सिस्टम वही हाल  लन्दन की ट्यूब यानि मेट्रो का था तो तय यह किया गया कि आज पैदल ही घूमा जाए आगे देखा जाएगा |तो  पैदल सफ़र शुरू हुआ यह तरीका लन्दन को करीब से समझने में खासा कारगर रहा |जिन दिनों हम वहां थे लन्दन में जगह –जगह निर्माण कार्य चल रहा था पर मजाल है कि कहीं धूल या कोई समस्या मिली एक और चीज जो ख़ास गौर करने वाली थी ईंट ,बालू या मकान निर्माण  की सामग्री किसी के घर के आगे या रोड पर बिखरी हो यहाँ तक की कंक्रीट बनाने वाली मशीन भी  नहीं दिखी |
मुझे बताया गया ये सब काम लन्दन से कहीं दूर होता है यहाँ सब असेम्बलिंग का काम होता है |हमारे यहाँ बहुमंजिली इमारतों को बांस या लकड़ी से घेरा जाता है जबकि यहाँ लोहे की पाईप से ,लोगों को परेशानी न हों तो उन लकड़ी के पाइपों को जोड़ने वाले स्क्रू पर भी फोम का कवर चढाया जाता है |जिससे आने जाने वाले के किसी के कपडे भी अगर उसमें फंसें तो वो न फटें और किसी को भी चोट न लगे |विकसित देश इंसानी जान की कीमत के साथ जानवरों की जान की कीमत समझते हैं और एक हम ?एक बात जो  हैरान करने वाले थी .यहाँ   के घरों में अभी छतों पर एंटीना लगा हुआ था | रास्ते  में साइकिल सवारों के जत्थे मिल रहे थे जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों थे पर किसी तरह  की कोई समस्या नहीं |
साइकिल सवारों के जत्थे                            

                             हम उस चमकती धूप में लन्दन को क़दमों से नाप रहे थे पर हवा ठंडी थी |रोड पर हम विदेशियों को देखकर न तो कोई अजूबे से देख रहा था न कोई फब्ती कस रहा था जैसा हमारे  देश में होता है |किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था सबका जीवन शान्ति से चल रहा था |हमें इस शहर में स्वास्थ्य के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूकता दिखी |हमारे प्रवास के दौरान हम किसी भी समय  रोड पर पहुंचे हो वहां कोई न कोई दौड़ता जरुर दिखा और इसमें महिला पुरुष दोनों ही थे |एक बार फिर हम प्रकृति के साथ विकास करना क्या होता है समझ रहे थे |सूरज सर पर आ रहा था हम लन्दन के आँचल में हँसते ,मुस्कुराते, गुमसुम लेकिन शांत लोगों के बीच से गुजर रहे थे |

जारी ..........................

2 comments:

sant said...

समाजवाद का बेहतरीन उदाहरण... सारी जानकारी मिली। #हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। शुक्रिया सर।

DeepsK said...

सारा दृश्य आँखों के सामने घूम गया....������

पसंद आया हो तो