Saturday, May 5, 2018

आइये चलते हैं अंग्रेजों के देश :लन्दन यात्रा पांचवां भाग

रात के ग्यारह बजे किंग्स क्रॉस स्टेशन के बाहर की दुनिया
सार्वजनिक जगहों पर ऐसे द्र्श्य आम हैं 
शाम हो चुकी थी  अब हमें सोनी वर्ल्ड फोटोग्राफी इवेंट में शामिल होना था जिसके लिए विश्व  के दस देशों से आये शिक्षक और छात्र होटल  की  लॉबी में इक्कठे होने शुरू हो गए थे |मैं थोड़ा जल्दी घुल मिल नहीं पाता पर कनाडा के क्यूबेक विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर वहां आये सारे  शिक्षकों में मिलनसार थे |उन्होंने मुझसे चर्चा शुरू की भारत के बारे में ,मैंने उन्हें कनाडा के बारे में बताया और अभी हाल में आये उनके प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के बारे में भी चर्चा की |मैंने उनसे पूछा आप भारत के बारे में क्या जानते हैं ,उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा ज्यादा तो नहीं पर मैं आपकी वर्ण व्यवस्था  से अच्छी तरह परिचित हूँ |मैंने बात पलटी क्योंकि इस प्रश्न का क्या उत्तर दूँ ,मुझे समझ न आया |मैंने क्यूबेक राज्य  के बारे में पूछा क्योंकि कनाडा के इस राज्य  के बारे में मैंने भी कम सुना था |उन्होंने मुझे बताया कि जब वे क्यूबेक से लन्दन के लिए उड़े थे तब वहां का तापमान माइनस बाईस डिग्री था और उनके घर के आगे छ फुट ऊँची बर्फ थी |वे लन्दन के मौसम का लुत्फ़ उठा रहे थे |वो जिस  शहर में रहते थे वहां की आबादी शायद चार लाख के  आस पास थी और उनके विश्वविद्यालय में लगभग चौदह सौ बच्चे पढ़ते हैं मुझे अपना विश्वविद्यालय याद आ रहा था |हम इतनी विषमताओं में में भी कुछ सकारात्मक कर पा रहे हैं ये शायद कोई न समझेगा |आगे कुछ बताने की जरुरत नहीं है ,मैं क्लाइमेक्स पहले ही बता दे रहा हूँ |
रात के ग्यारह बजे किंग्स क्रॉस स्टेशन के बाहर की दुनिया 
उन्ही प्रोफ़ेसर के छात्र को सोनी वर्ल्ड फोटोग्राफी के स्टूडेंट केटेगरी का बेहतरीन फोटोग्राफी का पुरूस्कार मिला | हम सभी आयोजकोण के अगले दिशा निर्देश का इन्तजार कर रहे थे ,आखिर हम उनके सम्मानित मेहमान थे पर अभी कुछ झटकालगना बाकी था ,चूँकि भारत में अतिथि देवो भव होता है तो मैं यह मानकर चल रहा था कि अभी शानदार गाड़ियाँ हमें लेने आयेंगी और हम आयोजन स्थल पहुंचेंगे जो कि.लन्दन हिल्टन था |पर यह क्या आयोजन से जुडी हुई एक महिला जिनका नाम एली था ,हम सबको एक साथ संबोधित करते हुए बताया हम आयोजन स्थल तक लन्दन की ट्यूब से जायेंगे और नजदीकी मेट्रो स्टेशन हमारे होटल से पन्द्रह मिनट की दूरी पर था |
हम उस दिन वैसे ही काफी पैदल चल चुके थे पर मरता क्या न करता सभी नजदीकी मेट्रो स्टेशन की तरफ पैदल चल पड़े |मैं तस्वीर का दूसरा रुख देख रहा था ,आयोजकों के इस रुख से लन्दन के पर्यावरण पर पड़ने वाले बोझ को कितना कम कर दिया जो  कम से कम चार गाड़ियों से  निकलने वाले धुएं  से पड़ता |हम भारत की समस्याओं को तब तक दूर नहीं कर सकते जब तक हम अपने व्यवहार में सामन्ती मानसिकता से  दूरी नहीं बनाते जहाँ जितनी लम्बी गाडी उतना बड़ा व्यक्ति ,यहाँ सार्वजनिक परिवहन से चलना बेइज्जत्ती माना जाता है वहां हम प्रदूषण जैसी समस्याओं से भाषण देकर और निबंध लिख कर नहीं निपट सकते हैं |चूँकि लन्दन की ट्यूब में हम सुबह सारे  प्रयोग कर चुके  थे इसलिए वहां तक जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई पर एक बात मैं आज तक न समझ पाया ,हमने दोपहर में लौटते वक्त ओएस्टर कार्ड बनवा लिए थे पर दुनिया के अन्य हिस्सों से आये हुए लोगों ने ये कार्ड कब कैसे बनवा लिए क्योंकि आयोजकों की तरफ से ऐसा कोई निर्देश हमें न मिला था |हो सकता है वे सब पहले भी लन्दन आते जाते रहे हों |
पापी पेट का सवाल 

 बहरहाल हम जब लन्दन हिल्टन पहुंचे तो लगा किसी भव्य थियेटर में पहुँच गए हों ,मैंने इतना व्यवस्थित कार्यक्रम अपने जीवन में इससे पहले कभी न देखा था सोनी वर्ल्ड फोटोग्राफी  इस आयोजन में लोग टिकट लेकर भी आते हैं और लन्दन का सारा मीडिया भी वहां उपस्थित था|कार्यक्रम शुरू होने में अभी थोड़ा समय बाकी था लोग वहां के बार में तरह –तरह की मदिरा का लुत्फ़ उठा रहे थे खासी भीड़ थी पर कहीं कोई शोर शराबा नहीं था सब कुछ लन्दन के ट्रैफिक  की तरह  ऑटो मोड में था |जगह जगह बड़े –बड़े साईंन बोर्ड  लगे हुए थे जहाँ सारे लोगों के नाम सहित उनके बैठने की पूर्व निर्धारित जगह लिखी हुई थी |हर टेबल पर आठ लोग हमारे साथ न्यूजीलैंड और वेल्स का दल था |शानदार कार्यक्रम की चरम परिणित रात के भोजन के साथ होनी थी जिसमें बीफ के कुछ व्यंजन थे ,मैंने वेल्स     की शिक्षिका से बात करनी शुरू की ,उच्च शिक्षा की दशा दिशा और बाजारीकरण ,मंहगी फीस और न जाने क्या क्या ,जो हमारे प्रश्न थे उनके उत्तर विकसित देश कब का खोज चुके थे और उनकी जो समस्याएं थी वो हमारे लिए कोई मसला थी ही नहीं क्योंकि एक आम भारतीय उन्हीं मसलों के साथ पलता बढ़ता और मेरी नजर में उन्हें समस्या कहना समस्या शब्द का अपमान होता ,सच है यात्राएँ आपका विस्तार करती हैं और आपको सहनशील बनाती हैं |
लन्दन की मशहूर काली टैक्सी 

मैं कुछ ऐसी ही परिस्थितयों से दो चार हो रहा था |रात हो रही थी अब होटल  लौटना था आये सब साथ थे पर जाने का समय  सबका अलग –अलग था पर हमें कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि हम अब लन्दन ट्यूब एक्सपर्ट हो चुके थे |हमारा नजदीकी स्टेशन किंग्स क्रॉस था  जहाँ से पंद्रह मिनट की पैदल यात्रा और फिर होटल पहुँच जाना था |रात में लन्दन कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रहा था |चारों तरफ रौनक ही रौनक ,लड़कियों और ,महिलाओं की इतनी ज्यादा संख्या देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि रात के ग्यारह बज गए हैं लोग खा रहे थे पी रहे थे ,चुम्बनों का आदान प्रदान कर रहे थे पर कहीं कुछ भी अजीब नहीं था सब सामान्य लग रहा था वो बहले ही सार्वजनिक स्थल पर थे कोई किसी की निजता में हस्तक्षेप नहीं कर रहा था ,न ही कोई लिंग भेद दिख रहा था |भारत को अभी यह संतुलन बनाना सीखना होगा तभी सही मायने में हम सभ्य कहे जायेंगे बाकी तो महानता के किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है पर मुझ जैसे एक आम आदमी को जो शान्ति से भारत में  जीना चाहता है ऐसा समाज कब मिलेगा इसका मुझे इन्तजार है |लन्दन हमें अपना रहा था और हम प्रवासी उसके स्वागत से अभिभूत हो रहे थे |लन्दन में दूसरी रात हमें सुलाने के लिए तैयार थी          
 जारी .......
                                    

3 comments:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - सुमित्रानंदन पंत और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Anonymous said...

Hey very nice blog!

Unknown said...

I can feel London...very well crafted

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