Thursday, March 26, 2026

युवाओं की पसंद बनते माईक्रो ड्रामा

 

लंबी फीचर फिल्में और टीवी धारावाहिक धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं। आज का युवा सब कुछ शॉर्ट फॉर्म में चाहता है, चाहे मनोरंजन हो, भावनाएं हों या कहानियाँ। रील्स देखते-देखते उसकी ध्यान अवधि में लगातार गिरावट हो रही है, नतीजन घंटे भर के सीरियल पर गौर करना अब बड़ी चुनौती हो गई है। इस बदलते परिदृश्य को समझते हुए कंटेंट निर्माताओं ने हमारे सामने एक नया विकल्प पेश किया है, माइक्रो ड्रामा। यानी कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाने वाली कहानियाँ, जिनमें सस्पेंस भी है, इमोशन भी और क्लाइमेक्स भी।
माइक्रो ड्रामा जिसे लोग वर्टिकल माइक्रो वेब-सीरीज भी कहते हैंअसल में स्मार्टफोन के लिए बनी एक नई कंटेंट स्टाइल है। ये छोटे-छोटे एपिसोड होते हैंजिनकी समय अवधि 1-2 मिनट होती है। सबसे खास बात यह है कि ये वीडियो हॉरिजॉन्टल नहीं बल्कि पोर्ट्रेट मोड में बनाए जाते हैं ताकि इन्हें मोबाइल स्क्रीन पर आसानी से देखा जा सके। हर एपिसोड तेज रफ्तारडायलॉग्स और ट्विस्ट से भरा होता है। कि देखने वाले को अगली कड़ी देखने का मन हो जाए। अमेरिका और चीन जैसे देशों में यह नया कंटेंट फॉर्मेट बाजार का रूप ले चुका है। भारत में भी इस माइक्रो ड्रामा फॉर्मेट ने अपने पैर पसारने शुरु कर दिए हैं। वेन्चर इन्टेलिजेंस के आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में माइक्रो ड्रामा ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने करीब 28 मिलियन डॉलर की रकम जुटाई वहीं इस साल जुलाई तक ही 44 मिलियन डॉलर का निवेश हासिल किया है। इसी तरह रील टीवी,पॉकेट टीवी रील शॉर्टफ्लिकरील्स जैसे कई प्लेटफॉर्म भी इस नए शॉर्ट वीडियो फॉर्मेट में उतरे हैं। दिग्गज एंटरटेंनमेंट प्लेयर जैसे जीटीवीएफएमएक्स प्लेयर जैसे बड़े प्लेटफॉर्म भी इसमें काफी निवेश कर रहे हैं। जी ने हाल ही में अपने वर्टिकल एप बुलेट को लॉन्च किया है।
 
कंसल्टिंग फर्म बर्नस्टीन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों के इंटरनेट यूजर्स महीने में औसतन 35-40 जीबी डाटा का उपयोग करते हैं। जबकि मेट्रो शहरों में यह आंकड़ा 30 जीबी से भी कम है। ऐसे में माइक्रो ड्रामा बनाने वाले एप्स अपना ध्यान इन शहरों के लोगों पर ज्यादा कर रहे हैं। मसलन अलग-अलग भारतीय भाषासंस्कृति और ऐसी कहानियाँ जिससे कोई भी जुड़ जाए। इन ड्रामों में ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती हैकई बार ये पारंपरिक धारावाहिकों की तरह बिना तर्क और बे सिर-पैर के भी दिखाई देते हैं। जिससे छोटे शहरों और कस्बों में माइक्रो ड्रामा अच्छी लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि महिलाओं की हिस्सेदारी भी इसके दर्शक वर्ग में लगातार बढ़ रही है। दर्शक अक्सर बस या मेट्रो में सफर के दौरानबिस्तर पर सोने से पहले या छोटे-छोटे ब्रेक में इन्हें देखकर अपना खाली समय भरते हैं।
 
हालांकि ये माइक्रो ड्रामा बड़े बजटबड़े सेट या बड़े एक्टर्स के मोहताज नहीं होते हैं। बस अच्छी कहानी और कुछ ठीक-ठाठ कलाकारों से भी काम चल जाता है। फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने की राह देख रहे एक्टर्स-इंफ्लुएंसर्स के लिए भी यह एक अच्छा मंच है। साथ ही इसे बनाने में खर्च भी काफी कम होता है और शूटिंग भी जल्दी खत्म हो जाती है। इसलिए कंटेंट इडस्ट्री और प्लेटफॉर्म्स इस तरह के कंटेंट पर अच्छा खासा निवेश कर रहे हैं। अब तो इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर इन्फुलएंसर्स और कंटेंट क्रियेटर्स खुद का माइक्रो ड्रामा बना रहे हैं। वे अपने लंबे वीडियो को छोटे-छोटे क्लिप्स में काटकर हर क्लिप का अंत ऐसा रखते कि लगे अगले पार्ट में क्या होगा। इससे दर्शक खुद ही अगले पार्ट के लिए बेताब हो जाते है।
हालांकि माइक्रो ड्रामे की लोकप्रियता के साथ-साथ उनकी कंटेंट गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं। चूंकि प्रोडक्शन तेज और बजट कम होता हैतो कई बार कहानियाँ सतही और बिना मतलब की होती है। आलोचक कहते हैं इनमें कई बार इनमें विवादित और अश्लील कंटेंट का भी उपयोग होता है। अंत में माइक्रो ड्रामा न सिर्फ क्रिएटर्स और प्लेटफॉर्म्स के लिए नए अवसर खोल रहा है बल्कि दर्शकों की बदलती आदतों को भाँप कर मनोरंजन का नया फॉर्मेट भी परोस रहा है। छोटे एपिसोडतेज़ और सस्पेंस भरी कहानी और मोबाइल-फ्रेंडली डिजाइन ने इसे डिजिटल दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया है। साथ ही भविष्य में यह बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट्स का भी हिस्सा बन सकता है।
प्रभात खबर में 26/03/2026 को प्रकाशित 

Thursday, March 19, 2026

कंटेंट क्रियेशन से रोजगार के अवसर

 


हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार यूट्यूब भारत में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा रोजगार देने वाला प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है, जिसने टीसीएस, विप्रो, इनफोसिस और रिलायंस जैसी बड़ी पारंपरिक कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया है; ऑक्सफोर्ड इकॉनॉमिक्स की रिपोर्ट बताती है कि यूट्यूब से जुड़ी क्रिएटिव इकॉनमी ने पिछले साल भारतीय जीडीपी में 16000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया और 9.3 लाख से ज्यादा पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर रोजगार पैदा किया, हालांकि यह रोजगार सीधे सैलरी वाली नौकरियों के रूप में नहीं बल्कि “पूर्णकालिक समतुल्य” स्वरोजगार के रूप में है, जिसमें लाखों स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स, वीडियो एडिटर, कैमरा ऑपरेटर, सोशल मीडिया मैनेजर और डिजिटल गिग वर्कर्स शामिल हैं, क्योंकि यूट्यूब खुद किसी को नौकरी पर नहीं रखता बल्कि एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है। वहीं यूट्यूब की अपनी रिपोर्ट के अनुसार 63 प्रतिशत क्रिएटर्स के लिए यह उनकी आय का मुख्य स्रोत है, जबकि इस पूरे इकोसिस्टम से स्वास्थ्य सेवाएँ, मार्केटिंग एजेंसियाँ, पीआर फर्में और तकनीकी उपकरण बनाने-बेचने वाली कंपनियाँ भी सीधे या परोक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं।

हालांकि इस व्यवस्था में नौकरी की अस्थिरता बहुत अधिक है। यहाँ नियमित वेतन, कर्मचारी सुविधाएँ या सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं होती। लोगों की आय एल्गोरिदम, विज्ञापन नीति या प्लेटफॉर्म के फैसलों से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए यूट्यूब की कोई भी नई नीति या एल्गोरिदम बदलाव एक वीडियो क्रिएटर की आय को अचानक से कम भी कर सकते हैं। 2023 में आई लिंकट्री और कंवर्टकिट की ग्लोबल क्रियेटर इकॉनमी पर आई एक रिपोर्ट में सामने आया कि वैश्विक स्तर पर 85 प्रतिशत से अधिक क्रियेटर स्थिर पूर्णकालिक आय नहीं कमा पाते हैं और ज्यादातर की आय, प्रायोजक, विज्ञापन और यूट्यूब मॉडल पर निर्भर होती है। इसी वजह से कई पूर्णकालिक कंटेंट क्रिएटर्स पहले दो साल के भीतर बर्नआउट महसूस करने लगते हैं। हर दिन नए वीडियो बनाना, दर्शकों के कमेंट्स का दबाव और लगातार कुछ करते रहने की रणनीति से बर्नआउट की स्थिति हो जाती है। वहीं नौकरियों के दावे को देखें तो यूट्यूब का पारंपरिक भारतीय कंपनियों से आगे निकलना सीधे-सीधे सही नहीं है। टीसीएस, रिलायंस, इंफोसिस जैसी कंपनियाँ कर्मचारी को एक वेतन पर रखती है, वहीं ऑक्सफोर्ड इकॉनॉमिक्स मॉडल यूट्यूब पर काम कर रहे लोगों को एफटीई के तौर पर देखता है, जिसका अर्थ है कि एक तरफ कंपनियाँ स्थायी कर्मचारियों को काम में लेती हैं वहीं दूसरी ओर यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर्स, फ्रीलांसर और सप्लाई-चेन के विविध श्रमिकों को मिलाकर एक आंकड़ा पेश करता है। वहीं यह बात भी गौर करने वाली है कि यू्ट्यूब के माध्यम से युवा अपनी प्रतिभा, कौशल के जरिये दर्शकों तक पहुँचकर आमदनी कमा पा रहे हैं। जिससे पारंपरिक नौकरियों पर निर्भरता भी कम हुई है। कई ग्रामीण व छोटे शहरों के लोग खेती, शिक्षा, शिल्प आदि विषयों पर वीडियो बनाकर पैसे कमा रहे हैं।

बीते कुछ समय में भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुँच बड़े पैमाने पर बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि यूट्यूब सबसे उपयोगी प्लेटफॉर्म के रूप में सामने आया है। दूरदारज के गाँवों और छोटे शहरों के लोग अपनी भाषा में कंटेंट बना और देख रहे हैं। जिससे स्थानीय क्रिएटर्स को भी अवसर मिले हैं। साल 2024 में यूट्यूब इंडिया और स्मिथगिगर की एक रिपोर्ट में सामने आया कि 83 प्रतिशत जेन जी युवा स्वयं को कंटेंट क्रिएटर कहते हैं और 75 प्रतिशत का मानना है कि कंटेंट बनाना उनका वास्तविक करियर है। वहीं भारत की एक क्रिएटिव ऊर्जा ने अर्थव्यवस्था को भी खासा बल दिया है। यूट्यूब के सफल होने से कई अन्य उद्यम जैसे डिजिटल एजेंसियाँ, एड प्रोडक्शन स्टूडियो, मार्केटिंग सर्विसेज भी उभरे हैं जिससे कई नई इकोसिस्टम कंपनियों को रोजगार मिला है। वहीं यूट्यूब के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी परिवर्तन आया है, शैक्षणिक चैनलों की बहार आने से छात्र और ग्रामीण वर्ग इन चैनलों से सीख कर नए कौशल को आत्मसात कर रहा है। इसके साथ ही कई क्रिएटर्स शिक्षा सामग्री तैयार करके नए शिक्षक भी बन गए हैं। इन बदलावों का सबसे गहरा असर भारत के युवाओं पर देखा जा रहा है। आज की जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी पारंपरिक नौकरियों और पेशों से हटकर रचनात्मक, स्वतंत्र और डिजिटल-केंद्रित करियर की ओर बढ़ रही है। जहाँ पहले इंजीनियर, डॉक्टर या सरकारी नौकरी को ही “सफलता” का पैमाना माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में युवा यूट्यूब को एक संभावित करियर प्लेटफॉर्म के रूप में देख रहे हैं।

वहीं डाटा यह भी बताता है कि यूट्यूब की आय सरंचना बेहद असमान है, ग्लोबल क्रिएटर इकॉनमी की एक रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर 85 प्रतिशत से अधिक क्रिएटर्स पूर्णकालिक आय अर्जित नहीं कर पाते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि केवल 3 से 5 प्रतिशत क्रिएटर्स ही ऐसे हैं जिनकी आय नियमित, अधिक और लंबे समय तक एक जैसी होती है। वहीं अधिकांश क्रिएटर्स की आय अनियमित और कई बार बेहद कम या शून्य तक भी पहुँच जाती है। 2023 में साहतमने आई इंफ्लुएंसर मार्केटिंग की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर करीब 70 प्रतिशत क्रिएटर्स ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 100 अमेरिकी डॉलर यानि 8-9 हजार रुपये से भी कम रहती है।

यूट्यूब भारत में रोजगार के स्वरूप को बदलने वाला प्लेटफॉर्म जरूर बन चुका है, लेकिन इसे पारंपरिक अर्थों में “सबसे बड़ा नियोक्ता” कहना एक आंशिक और सतही निष्कर्ष होगा। यूट्यूब ने जहाँ एक ओर युवाओं, ग्रामीण आबादी और छोटे शहरों के लोगों को अपनी प्रतिभा, भाषा और कौशल के जरिए आमदनी के नए रास्ते दिए हैं, वहीं दूसरी ओर यह मॉडल अस्थिरता, अनिश्चित आय और सामाजिक सुरक्षा के अभाव से भी भरा हुआ है। यहाँ कुछ लोग बहुत सफल होते हैं, जबकि ज़्यादातर लोगों की कमाई कभी होती है, कभी नहीं। न तय सैलरी है, न नौकरी की गारंटी और न ही भविष्य की सुरक्षा। इसलिए यूट्यूब को एकमात्र करियर मानना जोखिम भरा हो सकता है। बेहतर यही है कि युवा इसे अपने हुनर दिखाने और अतिरिक्त आमदनी का साधन मानें, साथ ही पढ़ाई, दूसरे कौशल और वैकल्पिक करियर विकल्पों पर भी ध्यान दें। यूट्यूब एक मौका है, लेकिन जीवन की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ उसी पर टिका देना समझदारी नहीं होगी।

दैनिक जागरण में 19/03/2026 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, March 17, 2026

सीमित दृष्टि से बाहर निकली आज की डबिंग

 एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फ़िल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फ़िल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं।

 प्रभात खबर में 17/03/2026  को प्रकाशित लेख 

Thursday, February 19, 2026

डिजिटल पीढ़ी का विरोधाभास

 इस तेजी से डिजिटल होती संस्कृति में हमारी पीढ़ी एक बड़े विरोधाभास से जूझ रही है। यूँ कहने को तो हम इंसानी सभ्यता की सबसे ज्यादा कनेक्टेड पीढ़ी हैं लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा अकेली है। ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया, रील्स की शोर-शराबे वाली दुनिया ने हमें अंदर से थका दिया है। इसी थकान और तनाव से बचने के लिए आज की जेन जी पीढ़ी ने एक नया तरीका ढूंढ लिया है जिसे बेड रॉटिंग कहते हैं। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है इसका अर्थ उतना ही सीधा है। इसका मतलब है जानबूझकर घंटों या दिनभर बिस्तर पर पड़े रहना और निष्क्रिय गतिविधियों में लिप्त रहना जैसे फोन स्क्रॉल करना, फिल्म देखना या बस लेटे रहना। हालांकि जेन जी इसे सेल्फ केयर यानी आत्म देखभाल का नया और क्रांतिकारी तरीका बताते हैं। भारत में हैशटैग बेड रॉटिंग पर आज लाखों व्यूज इस बात का सबूत है कि अब यह आदत भारतीय युवाओं के जीवन में भी गहरी पैठ बना रही है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में तनाव या बर्नआउट से लड़ने का एक कारगर तरीका है या फिर अपने जीवन से मुँह मोड़ लेना एक खतरनाक बहाना जो व्यक्ति को अवसाद और निष्क्रियता के अंधेरे कुएँ में धकेल रहा है।

बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया , जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बेड रॉटिंग के पीछे कई कारण हैं, एक ओर बदलती जीवनशैली और बढ़ता तनाव इसका एक कारण है वहीं दूसरी ओर छात्रों के बीच हसल कल्चर भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी की मनोचिकित्सक निकोले होलिंग्सहेड बताती है कि हमारा समाज हमेशा से खुद को व्यस्त करने और अत्यधिक उत्पादक होने पर जोर देता है। ऐसे में उस सामाजिक दबाव को  जो हर पल कुछ न कुछ उत्पादक करने के लिए मजबूर करता है, को आज के युवा खारिज कर रहे हैं।

लेकिन इसके पीछे एक जटिल और गंभीर समस्या भी उभर रही है। मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओं, तनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावट, बेचैनी, अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भारत और दुनियाभर में मानसिक स्वास्थ्य के आंकड़े चिंताजनक हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार से ग्रसित हैं वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर करीब 21 आत्महत्याएं होती हैं जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। साल 2024 में आई विश्व खुशहाली रिपोर्ट में भारत ने 118वां स्थान प्राप्त किया था जो कि मानसिक चिंता को दर्शाता है।

हाल ही में ऑस्ट्रैलिया की एक मनोवैज्ञानिक संस्था जीएम5 की ओर से तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूली छात्रों का सर्वेक्षण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक 24 प्रतिशत छात्रों में किसी न किसी तरह की मानसिक संकट के लक्षण मिले वहीं 6 से 10 प्रतिशत ऐसे छात्र मिले जो गंभीर या अति गंभीर श्रेणी में आते हैं जिन्हे तत्काल सहायता की आवश्यकता है। ऐसा ही एक रिपोर्ट रिसर्च संस्था सेपियंस लैब की ओर से भी जारी की गई । जिसमें कोविड महामारी के बाद 18-24 साल के भारतीय युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की जुड़ी समस्याओं  का उल्लेख था। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में इस आयु वर्ग का औसत एमएचक्यू यानी मेंटल हेल्थ क्वोशियंट 28 था जो 2023 में गिरकर 20 हो गया साथ ही ज्यादातर युवाओं में किसी न किसी प्रकार की मानसिक समस्या मिली। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में साल 2024 में सामने आये एक बहुराष्ट्रीय शोध के मुताबिक दुनियाभर के किशोर प्रतिदिन औसतन 8 से 10 घंटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करने, वीडियो गेम खेलने जैसी गतिहीन गतिविधियों में बिता रहे हैं।

हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है , कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीप, स्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकर, मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइन, दोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइन, जैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा है, जो कभी शांत नहीं होता, अंतहीन फीड्स, नेटफ्लिक्स, असीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।

कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता है, लेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बेड रॉटिंग से न्यूरोट्रांसमीटर्स विशेषकर डोपामिन और सेरोटोनिन के स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इनकी कमी से मोटिवेशन में गिरावट, उदासी, और ऊर्जा की कमी महसूस होती है , जो व्यक्ति को और निष्क्रिय बनाती है, और अंत में यह एक दुष्चक्र हो जाता है जिससे उदासी और बढ़ जाती है और उदासी से निष्क्रियता । पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलना, शारीरिक क्रियाएं करना, दोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजाय, किताबें पढ़ना, संगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। और यदि कोई इस चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा है तो किसी मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से बात करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थ, उत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।
दैनिक जागरण में 19/02/2026  को प्रकाशित लेख 

Wednesday, February 18, 2026

स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की दीवारे

 

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।
शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।

आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
अमर उजाला में 18/02/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, February 11, 2026

रियल एक्सप्रेशन की जरूरत

ए साल में आप सब जरुर खुशियों के साथ टैग हो गए होंगे,खुशियों के साथ हैंग आउट जारी होगा और चिली वेदर में चिलेक्स कर रहे होंगें.  अब चूँकि नया साल है तो मैंने सोचा क्यूँ न आपके साथ एक नयी भाषा में बात की जाए जिसे जेन ज़ी  ज्यादा बेहतर समझती है . जेन जी के लोग हमारी पीढ़ी से की मामले में अलग हैं जैसे उन्होंने इंटरनेट के साथ अपनी आँखें खोलीं |वे इंस्टा रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के साथ पाले बढ़े.तरह तरह के मोबाईल के बारे जानना और चलाना उनके लिए बच्चों  का खेल है पर हम लोगों को सब सीखना पड़ा. उन्ही एप की दुनिया में तरह-तरह  के मेसेजिंग एप हैं. जिनमें प्रमुख हैं चैटिंग एप जैसे व्हाट्स एप। जब मैं ये लेख लिख रहा था तभी मुझे किसी व्हाट्स एप ग्रुप में यह चुटकुला पढ़ने को मिला. “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन :३०  एमक्यों दिखाता हैहा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है. यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा लोगों से हो जायेगी तो समस्या आयेगी ही. क्योंकि एक ओर मोबाईल नेट  क्रांति ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है.  वहीं कहीं हम बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस दौड़ में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए जैसी रेस में शामिल हो जाते हैं । इस दौड़ में जेन जी सबसे आगे हैं इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये. हंसी आये या ना आये हा हा लिख कर कोई स्माईली बना दो.  सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं पर क्या आप वाकई खुश हैं क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँअक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की रियल प्रॉब्लम का सल्यूशन ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड यानि जेन जी  के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं कि नहीं.  दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या फिर आप इमोशनली वीक है.  

मेरे जेन ज़ी मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं चैटिंग करने के लिए उम्र पडी है.  ये टाईम कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये.  

 प्रभात खबर में 11/02/2026 को प्रकाशित 

Monday, January 26, 2026

युवाओं के सपनों को उड़ान डे रहे हैं देश के स्टार्ट अप्स

 

स्टार्टअप इंडिया आज सिर्फ एक सरकारी योजना नहींबल्कि आम भारतीय युवाओं के सपनों और हौसलों का प्रतीक बन चुका है। साल 2016 में शुरू हुई इस पहल ने बीते दस वर्षों में देश की सोच और काम करने के तरीके को बदल दिया है। .उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) की ‘स्टार्टअप इंडिया वार्षिक मान्यता रिपोर्ट’. के अनुसारसाल 2025 में करीब 44 हजार नए स्टार्टअप पंजीकृत हुएजो अब तक किसी एक साल में सबसे बड़ी संख्या है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2026 तक भारत में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की कुल संख्या दो लाख से ज्यादा हो चुकी है.  यह साफ दिखाता है कि अब देश में नौकरी मांगने की बजाय नौकरी देने की सोच तेज़ी से मजबूत हो रही है.

स्टार्टअप्स ने न केवल रोजगार सृजन किया है बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भरता और नवाचार की ओर प्रेरित किया है.  सामाजिक दृष्टि से यह आंदोलन ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच अवसरों की खाई को कम कर रहा हैमहिलाओं की भागीदारी बढ़ा रहा है और तकनीकी समाधान से शिक्षास्वास्थ्य व पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला रहा है.

 डीपीआईआईटी और वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त आकलन. के अनुसार आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। नैसकॉम (NASSCOM) और ट्रैक्शन की ‘भारतीय तकनीकी स्टार्टअप परिदृश्य रिपोर्ट’. के आंकड़े बताते हैं कि देश में 120 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां मौजूद हैं.  यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब दुनिया भर में निवेश की रफ्तार धीमी रहीजिसे ‘फंडिंग विंटर’ कहा गया। इसके बावजूद भारतीय स्टार्टअप्स ने लागत नियंत्रणमुनाफे और स्थिर बिजनेस मॉडल पर ध्यान देकर निवेशकों का भरोसा बनाए रखा.

 इस स्टार्टअप आंदोलन की सबसे अहम बात इसका भौगोलिक विस्तार है। डीपीआईआईटी की ‘राज्यों की स्टार्टअप रैंकिंग रिपोर्ट’. के अनुसारभारत के लगभग 50 प्रतिशत स्टार्टअप अब टियर-2 और टियर-3 शहरों से आ रहे हैं। जयपुरइंदौरलखनऊअहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर अब सिर्फ उपभोक्ता नहींबल्कि नवाचार के केंद्र बनते जा रहे हैं। छोटे शहरों के युवा स्थानीय समस्याओं—जैसे खेतीशिक्षास्वास्थ्य और लॉजिस्टिक्स—के लिए तकनीक आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि स्टार्टअप इंडिया ने उद्यमिता को वास्तव में लोकतांत्रिक बना दिया है.

 महिला उद्यमिता के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। .‘भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाएं रिपोर्ट (WISER)’. के अनुसारभारत के करीब 45 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला संस्थापक या निदेशक शामिल है। यह आंकड़ा बीते पांच वर्षों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि महिलाएं अब केवल फैशन या शिक्षा तक सीमित नहीं हैंबल्कि फिनटेकहेल्थ-टेकमैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी नेतृत्व कर रही हैं। इसी वजह से भारत महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाने लगा है.

रोजगार के मोर्चे पर स्टार्टअप्स का प्रभाव और भी गहरा है। डीपीआईआईटी की ‘स्टार्टअप प्रभाव रिपोर्ट’. के अनुसारस्टार्टअप्स अब तक सीधे तौर पर 21 लाख से अधिक नौकरियां पैदा कर चुके हैं। वहीं .नीति आयोग की ‘भारत में गिग इकॉनमी और भविष्य का कार्य’ रिपोर्ट. बताती है कि गिग इकॉनमी तेजी से फैल रही है और आने वाले वर्षों में करोड़ों युवाओं को लचीले रोजगार के अवसर मिलेंगे। आज गिग वर्क सिर्फ डिलीवरी सेवाओं तक सीमित नहीं हैबल्कि इसमें आईटी प्रोफेशनल्सडिजाइनर्सकंटेंट क्रिएटर्स और कंसल्टेंट्स भी शामिल हैं।ये स्टार्ट अप इंडिया का ही कमाल है कि गिग एकोनॉमी स्टार्ट अप इंडिया के साथ मिलकर एक नए भारत का निर्माण कर रही है.

 तकनीक के क्षेत्र में 2025 खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप-टेक का साल रहा। .नैसकॉम–जिनोव की ‘डीप-टेक स्टार्टअप रिपोर्ट’. के अनुसारबड़ी संख्या में नए स्टार्टअप एआईस्पेस-टेकरोबोटिक्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी में काम कर रहे हैं। .इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ‘इंडिया एआई मिशन प्रगति रिपोर्ट’. के मुताबिकसरकार ने स्टार्टअप्स को कंप्यूटिंग पावर और डेटा तक आसान पहुंच दी हैजिससे भारतीय भाषाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तकनीकी समाधान तैयार किए जा रहे हैं.

 सरकारी नीतियों ने इस पूरे सफर को मजबूती दी है। .वित्त मंत्रालय और डीपीआईआईटी की ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस सुधार रिपोर्ट’. बताती है कि एंजेल टैक्स जैसी बाधाओं को हटाया गया और नियमों को सरल किया गया। वहीं .गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) की वार्षिक रिपोर्ट. के अनुसारस्टार्टअप्स ने सरकारी प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों करोड़ रुपये का कारोबार किया है। इसके अलावा .स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना और क्रेडिट गारंटी योजना पर डीपीआईआईटी की प्रगति रिपोर्ट. यह दिखाती है कि पूंजी की कमी अब अच्छे विचारों के रास्ते में बड़ी बाधा नहीं रही.

 कुल मिलाकर, 2025 में दर्ज हुए ये हजारों स्टार्टअप सिर्फ आंकड़े नहीं हैंबल्कि उस बदलते भारत की तस्वीर हैं जो आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अलग-अलग सरकारी और उद्योग रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि स्टार्टअप इंडिया अब एक स्थायी और निर्णायक आंदोलन बन चुका है। चुनौतियां जरूर हैंलेकिन उद्योग संवर्धन विभागनीति आयोग और नैसकॉम जैसे संस्थानों के आकलन साफ संकेत देते हैं कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ने में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक मजबूत आधार बनने जा रहा है। मोबाईल क्रांति होने के साथ अब आने वाले दशक में इसमे वृद्धि होने की संभावना है आंकड़े बताते है की आने वाले वक्त में इससे भारतीय एप बाजार में बड़ा परिवर्तन होगा और कंप्यूटर शिक्षा में नवाचार बढ़ने से और स्टार्ट अप कम्पनियों को वित्त के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ेगा .जाहिर है भारतीय एप के डिजीटल प्लेटफार्म पर बढ़ती संख्या देश की बड़ी आबादी का जहाँ जीवन आसान करेगी वहीं विकसित  भारत का सपना जल्दी ही हकीकत का रूप लेगा. 

प्रभात खबर में 26/01/2026 को प्रकाशित 

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