Wednesday, September 30, 2026

सर्च की बदलती प्रकृति और डिजिटल मीडिया की मुश्किलें

 

इंटरनेट के शुरुआती दौर की उस क्रांतिकारी संकल्पना को याद कीजिए जिसने समूचे ज्ञान-जगत को एक साझे लोकतांत्रिक सूत्र में पिरो दिया था—'हाइपरलिंक' । 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली ने जब वर्ल्ड वाइड वेब की नींव रखी, तो हाइपरलिंक केवल कंप्यूटर कोड का एक टुकड़ा नहीं था; वह ज्ञान के विकेंद्रीकरण, डिजिटल खुलेपन और एक-दूसरे के बौद्धिक श्रम को सम्मान देने का जीवंत माध्यम था। दशकों तक किसी भी सर्च इंजन की भूमिका एक विनम्र 'ट्रैफिक पुलिस' जैसी रही। उपयोगकर्ता अपनी जिज्ञासा लेकर आता, सर्च इंजन उसे संबंधित समाचार पत्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और मूल वेबसाइटों के पते (नीले हाइपरलिंक) दिखाता, और पाठक एक क्लिक के जरिए उस मूल स्रोत के दरवाजे तक पहुँच जाता। इसी आपसी लेन-देन पर आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता, स्वतंत्र मीडिया और ओपन-वेब (Open Web) की पूरी आर्थिकी टिकी हुई थी।लेकिन आज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सर्च के आक्रामक गठजोड़ ने इंटरनेट की इस मूल आत्मा को कुचल दिया है। गूगल और बिंग जैसे टेक दिग्गजों ने सर्च इंजन को 'रास्ता दिखाने वाले गाइड' से बदलकर 'सर्वज्ञानी प्रकाशक' बना दिया है। 'एआई ओवरव्यूज' और ऑटोमेटेड उत्तरों के प्रसार ने खोज की प्रकृति को ही 'जीरो-क्लिक सर्च' (Zero-Click Search) में तब्दील कर दिया है। यानी अब पाठक का सवाल गूगल के पन्ने पर ही मशीनी सारांश के जरिए हल हो जाता है। पाठक को उस मूल अखबार या पत्रकार की वेबसाइट पर जाने की आवश्यकता ही नहीं बचती| यह केवल सर्च एल्गोरिदम का तकनीकी बदलाव नहीं है; यह स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता की आर्थिक जड़ों को सुखा देने वाला ढांचागत संकट है।

ऑडियंस रिसर्च फर्म स्पार्कटोरो और डेतोस) के क्लिकस्ट्रीम पैनल अध्ययन के अनुसार, अमेरिका और यूरोपीय संघ में गूगल पर होने वाले कुल सर्च में से लगभग 58.5% से 60% सर्च 'जीरो-क्लिक' में समाप्त हो जाते हैं। 1,000 अमेरिकी सर्च में से औसतन केवल 360 क्लिक और यूरोपीय संघ में 374 क्लिक ही ओपन-वेब की स्वतंत्र वेबसाइटों तक पहुँच पाते हैं। बाकी सारे क्लिक या तो गूगल के अपने उत्पादों (यूट्यूब, मैप्स, ऐड्स) में सिमट जाते हैं या यूजर बिना किसी वेबसाइट पर गए सत्र समाप्त कर देता है।

प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, जब सर्च पन्ने पर एआई सारांश प्रकट होता है, तो सामान्य वेब-परिणामों पर क्लिक करने की संभावना आधी रह जाती है। जिन सर्च पेजों पर एआई सारांश नहीं था, वहाँ 15% यूजर्स ने किसी लिंक पर क्लिक किया; लेकिन एआई सारांश वाले पेजों पर यह घटकर मात्र 8% रह गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एआई ओवरव्यू के भीतर जो स्रोत संदर्भ के रूप में उद्धृत होते हैं, उन पर केवल 1% यूजर्स ही क्लिक करते हैं। वहीं, अहरिफ्स) के अध्ययन बताते हैं कि एआई ओवरव्यूज के कारण शीर्ष रैंकिंग वाले पेजों के सीटीआर में 58% तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है।

  डिजिटल कंटेंट नेक्स्ट और मीडिया ट्रैफ़िक विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक समाचार संस्थानों के सर्च रेफ़रल ट्रैफ़िक में औसतन 25% से 45% तक की सीधी गिरावट आई है। सूचनात्मक खोजों (में जीरो-क्लिक की दर 65% से 70% तक पहुँच चुकी है, जिसका सीधा असर स्वतंत्र मीडिया घरानों के डिजिटल विज्ञापन राजस्व पर पड़ा है।पत्रकारिता की यह त्रासदी एक गहरे अंतर्विरोध पर खड़ी है। सिलिकॉन वैली के एआई मॉडल्स और एल्गोरिदम खुद रिपोर्टिंग नहीं करते। वे किसी बाढ़ में कमर तक पानी में उतरकर ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं कर सकते, न ही किसी सरकारी दफ्तर में बैठकर घोटालों की फाइलों की पड़ताल कर सकते हैं। एआई केवल वही जानता है जो पत्रकारों और लेखकों ने अपने बौद्धिक श्रम, समय और जोखिम भरे संसाधनों से तैयार किया है।सर्च इंजनों के एआई क्रॉलर्स समाचार पोर्टलों की सामग्री को सेकंडों में खंगालते हैं, उसका सार-संक्षेप तैयार करते हैं और उसे अपने ही सर्च इंटरफेस पर सजा देते हैं। पाठक को त्वरित उत्तर मिल जाता है, सर्च इंजन उस पन्ने पर अपने विज्ञापन चलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमाते हैं, लेकिन जिस पत्रकार ने वह तथ्य जुटाया था, उसे बदले में मिलता है—शून्य ट्रैफ़िक, शून्य क्लिक और शून्य विज्ञापन राजस्व।यदि कोई प्रकाशक इस डिजिटल लूट से बचने के लिए अपनी वेबसाइट के robots.txt कोड के जरिए एआई बॉट्स को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो सर्च इंजन उसे मुख्य सर्च इंडेक्स से ही बाहर करने की अप्रत्यक्ष धमकी देते हैं। यह सामग्री निर्माताओं के सामने एक क्रूर विकल्प है: या तो अपनी सामग्री लुटने दीजिए, या फिर डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अदृश्य हो जाइए।

इस 'जीरो-क्लिक' संस्कृति की सबसे घातक मार भारत जैसे विशाल देश की भाषाई और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रही है। बड़े वैश्विक मीडिया कॉर्पोरेशंस तो फिर भी पेड-सब्सक्रिप्शन, सम्मेलनों या ब्रांड गठबंधनों के जरिए कुछ हद तक टिक सकते हैं; लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और कस्बों में स्वतंत्र रूप से चलने वाले डिजिटल पोर्टल्स और भाषाई पत्रकारों का क्या होगा? वे पूरी तरह से ओपन-वेब ट्रैफ़िक और डिजिटल विज्ञापनों पर निर्भर हैं।जब खोज इंजन ही पाठक को अपनी चहारदीवारी के भीतर रोक लेगा, तो स्थानीय न्यूज़ रूम्स में पत्रकारों की छँटनी होगी, खोजी पत्रकारिता का बजट खत्म होगा और अंततः पूरा समाज 'न्यूज़ डेज़र्ट' (समाचार-विहीन क्षेत्र) में तब्दील हो जाएगा। जब ज़मीन से नए तथ्य जुटाने वाले हाथ ही नहीं बचेंगे, तो भविष्य में यह एआई किसे खंगालेगा? क्या यह खुद अपने ही पैदा किए मशीनी कचरे को बार-बार रीसाइकल कर समाज को परोसता रहेगा?इस असंतुलन को रोकने के लिए कोई नियामक संस्था हो अब समय की मांग यही है |ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक 'न्यूज़ मीडिया बार्गेनिंग कोड' और कनाडा के 'ऑनलाइन न्यूज़ एक्ट' की तर्ज पर भारत में भी अविलंब एक विधायी ढांचा बनाया जाए। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ भारतीय मीडिया घरानों के कंटेंट के एआई इस्तेमाल पर पारदर्शी राजस्व साझा करें।अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और यूरोपीय संघ की अदालतों द्वारा सर्च एकाधिकार पर चलाए जा रहे मुकदमों से सीख लेते हुए भारतीय नियामकों को सर्च इंजनों को 'मध्यवर्ती' से 'प्रकाशक' बनने की मनमानी पर रोक लगानी होगी।एआई सारांशों में केवल नाममात्र के सूक्ष्म फुटनोट देने के बजाय पाठकों को मूल रिपोर्ट तक ले जाने वाले स्पष्ट और बड़े हाइपरलिंक्स को अनिवार्य किया जाए।सर्च इंजन और मूल प्रकाशक के बीच का संबंध सहजीविता पर आधारित था—एक को सामग्री मिलती थी, दूसरे को पाठक। 'जीरो-क्लिक' सर्च और अनियंत्रित एआई समरी ने इस नाजुक संतुलन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह लड़ाई केवल मीडिया कंपनियों के बैलेंस शीट की नहीं है; यह एक स्वतंत्र, विविध और तथ्यपरक सार्वजनिक विमर्श को ज़िंदा रखने की लड़ाई है। यदि समाज और शासन ने सूचना के इस एकाधिकारवादी दोहन पर समय रहते लगाम नहीं लगाई, तो बहुत जल्द इंटरनेट कॉरपोरेट सारांशों का एक ऐसा बंद कमरा बनकर रह जाएगा—जहाँ सूचनाएँ तो अनंत होंगी, लेकिन सच की स्वतंत्र गवाही हमेशा के लिए मौन हो चुकी होगी।

प्रभात खबर में 30/09/2026 को प्रकाशित लेख 


Thursday, September 17, 2026

वर्षा से मन मयूर नहीं नाचता ,डर सताता है

 

मौसम पहले मन के मिज़ाज से आते थे, अब वे मौसम विभाग की चेतावनियों और प्रदूषण सूचकांक के डरावने आंकड़ों के साथ दाखिल होते हैं। हमारे देखते-देखते जाड़ा, गर्मी और बरसात—तीनों ऋतुएं हमारे तथाकथित 'विकास' की वेदी पर कुर्बान हो चुकी हैं। अब मौसम बदलते नहीं, बल्कि जीवन की लय को झकझोर कर रख देते हैं। कुदरत का जो चक्र कभी जीवन को सहजता और ठहराव देता था, वह अब कंक्रीट के जंगलों और इंसानी आपाधापी में उलझकर दम तोड़ रहा है।
याद कीजिए, कभी गर्मियों की दोपहर का अपना एक अलग सुकून होता था। छत पर शाम को पानी का छिड़काव, खस की भीनी खुशबू, नानी के हाथ का बना आम का पना और आंगन में बिछे बिस्तरों पर तारों को गिनते हुए सो जाना। आज गर्मी का मतलब है पचास डिग्री की झुलसाती लू, तपती डामर की सड़कें और कंक्रीट के कमरों को ठंडा करने के लिए दीवारों पर चौबीसों घंटे हांफते हुए एयर कंडीशनर। हमने हरियाली काटकर जो कंक्रीट के टावर खड़े किए हैं, वे अब आग की भट्ठी की तरह दहकते हैं।
जाड़ा कभी धूप की गुनगुनाहट, तिल-गुड़ की मिठास और मां के हाथ से बुने रंग-बिरंगे स्वेटरों का नाम था। सुहानी धूप में बैठकर मूंगफली के छिलके बिखेरना और देर तक बतियाना जाड़े की रूह हुआ करता था। आज जाड़ा आते ही सूर्य देवता विकास के काले धुएं के पीछे गुम हो जाते हैं। आसमान में कोहरा नहीं, जहरीला स्मॉग तैरता है। बच्चे धूप में खेलने के बजाय एयर प्यूरीफायर वाले कमरों में कैद हो जाते हैं और सांसों की हिफाजत के लिए स्कूलों में ताले लटक जाते हैं। सर्दी अब ठिठुरन का मौसम नहीं, फेफड़ों का संकट बन चुकी है।
रही बात बरसात की, तो वह कभी मिट्टी की पहली सौंधी महक और बेपरवाह बचपन की कागज़ी कश्तियों का त्योहार थी। अब नदियों के पेट और तालाबों को पाटकर बनी पॉश कॉलोनियों में बारिश केवल जलभराव, गाड़ियों के जाम और सीवर के उफनने का खौफ लाती है। बादल बरसते हैं तो मन में कोई मयूर नहीं नाचता, बल्कि यह डर सताता है कि कल दफ्तर कैसे पहुंचेंगे।
इस सारी तबाही की जड़ में है हमारी अंधी रफ्तार। सबको बहुत जल्दी है—जल्दी आगे निकलने की, जल्दी मकान की किस्तें चुकाने की, जल्दी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने की। इस दौड़ में हमने जीने का ठहराव खो दिया और अपनी छोटी-छोटी मासूम खुशियों को मोबाइल की छह इंच की चमकती स्क्रीन में गिरवी रख दिया।
आज इंसान आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को छूने से कतराता है कि कहीं कपड़े न मैले हो जाएं, तबीयत न बिगड़ जाए। मगर वही इंसान बालकनी में खड़े होकर पानी की चंद बूंदों के साथ पंद्रह सेकंड की रील जरूर शूट करता है। मिट्टी से जुड़ने, बारिश में बेधड़क भीगने और ठंड की धूप को बदन पर महसूस करने का जो सच्चा मानवीय सुख था, वह अब सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'व्यूज' के बाज़ार में बिक गया है। असली बारिश में भीगने की जगह अब भीगने की रील देखना ज़्यादा तसल्ली देता है।
हमने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया, उसका हर्जाना अब हमारी आत्मा चुका रही है। मौसमों से उनका मूल सौंदर्य छीनकर हमने खुद को डिजिटल पिंजरों में बंद कर लिया है। जब तक हम रुककर सांस नहीं लेंगे और कुदरत के साथ फिर से रिश्ता नहीं जोड़ेंगे, तब तक मौसम सिर्फ कैलेंडर की तारीखें बनकर रह जाएंगे—बिना किसी एहसास और बिना किसी खुशबू के।
प्रभात खबर में 17/09/2026 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, September 8, 2026

समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाईन चुप्पी'

 

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।
आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
प्रभात खबर में 08/09/2026  को प्रकाशित 

Wednesday, August 26, 2026

सुविधा के नाम पर उपभोक्ताओं का आर्थिक दोहन

 


पारंपरिक भारतीय बाज़ार की बुनियादी पहचान खुली पारदर्शिता और मोलभाव से रही है। सब्जी मंडी से लेकर कपड़ों की दुकान तक, किसी सामान की एक तय कीमत होती थी या फिर खरीदार और विक्रेता आमने-सामने बैठकर मोल-तोल करते थे। इस व्यवस्था में सभी उपभोक्ताओं को एक समान धरातल मिलता था। लेकिन आज जब व्यापार  का पूरा ढांचा भौतिक दुकानों से सिमटकर स्मार्टफोन की चंद इंच की स्क्रीन पर केंद्रित हो चुका है, तब अर्थशास्त्र के इस बुनियादी सिद्धांत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एल्गोरिदम एक नई चुनौती दे रहा है

आज डिजिटल बाज़ार में एक ही समय, एक ही उड़ान, एक ही होटल के कमरे या एक ही कैब रूट के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग कीमतें दिखाई जा रही हैं। तकनीकी भाषा में जिसे अब तक ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ कहकर पेश किया जाता था, वह अब असल में ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ (निगरानी-आधारित मूल्य निर्धारण) का खतरनाक रूप ले चुका है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का वह अदृश्य डाका है, जो उपभोक्ता के निजी डेटा, उसकी मजबूरी और मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का विश्लेषण करके उसकी जेब से अधिकतम संभव पैसा खींच रहा है।

पारंपरिक अर्थशास्त्र में डायनेमिक प्राइसिंग का मतलब था मांग और आपूर्ति के संतुलन के आधार पर कीमतों का घटना या बढ़ना—जैसे त्योहारों पर टिकट महंगे होना या ऑफ-सीजन में होटल सस्ते होना। लेकिन अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन  द्वारा रेखांकित ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ इससे कहीं आगे की व्यवस्था है। जुलाई 2024 में  फेडरल ट्रेड कमीशन   ने आठ वैश्विक कंपनियों को आदेश जारी कर यह जांच शुरू की कि कंपनियाँ किस तरह उपभोक्ता के व्यक्तिगत डेटा—लोकेशन, सर्च हिस्ट्री, वित्तीय स्थिति और डिजिटल व्यवहार—का इस्तेमाल कर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कीमतें तय कर रही हैं।

इसमें एल्गोरिदम केवल बाज़ार की सामूहिक मांग नहीं देखता, बल्कि व्यक्तिगत उपभोक्ता की प्रोफाइल का एक्स-रे करता है। जब कोई उपभोक्ता कैब बुक करता है, हवाई टिकट खोजता है या ऑनलाइन राशन ऑर्डर करता है, तो एआई बैकएंड पर कुछ ही मिलीसेकंड्स में कई पैमानों की गणना करता है:

  • डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम: बुकिंग ₹1.5 लाख के प्रीमियम फोन से हो रही है या बजट एंड्रॉयड डिवाइस से?
  • स्थान और परिवेश: यूजर किसी पॉश इलाके में खड़ा है या सामान्य रिहायशी क्षेत्र में?
  • तात्कालिकता :क्या फोन की बैटरी 5% बची है या बाहर तेज बारिश हो रही है?
  • सर्च पैटर्न: उपभोक्ता ने पिछले 24 घंटों में उसी रूट या उत्पाद को कितनी बार सर्च किया है?

इन सभी पैमानों को मिलाकर एआई उपभोक्ता की 'पे करने की अधिकतम क्षमता' तय करता है और स्क्रीन पर वही कीमत दिखाता है, जो उसकी विवशता का अधिकतम दोहन कर सके।

मध्यम वर्ग पर प्रहार: आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत में मध्यम वर्ग अपनी दैनिक जरूरतों, यात्रा और खान-पान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है, इसलिए यह आर्थिक शोषण सबसे गहरा है।

  • कैब और राइड-हेलिंग: भारत के प्रमुख उपभोक्ता मंच 'लोकलसर्कल्स' के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक ऐप टैक्सी उपयोगकर्ताओं ने डार्क पैटर्न्स और अनुचित मूल्य वृद्धि का अनुभव किया है। इनमें 59 प्रतिशत ने 'ड्रिप प्राइसिंग' (अंतिम भुगतान पर छिपी हुई फीस जोड़ना) और 86 प्रतिशत ने 'बेट एंड स्विच' (कम प्रतीक्षा समय दिखाकर बाद में लंबा इंतजार कराना) की शिकायत की। इसके अलावा, एक ही समय पर अलग-अलग फोन मॉडल्स से एक ही रूट के किराए में 15 से 30 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
  • विमानन और होटल बुकिंग: लोकलसर्कल्स के 1.24 लाख से अधिक प्रतिक्रियाओं वाले अखिल भारतीय सर्वे के मुताबिक, 80 प्रतिशत हवाई यात्रियों ने बुकिंग के अंतिम चरण में छिपी हुई अतिरिक्त फीस का सामना किया। वहीं 56 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने "केवल 2 सीटें बची हैं" जैसी झूठी तात्कालिकता का सामना किया, जो उन्हें घबराहट में महंगा टिकट खरीदने पर मजबूर करती है।
  • क्विक कॉमर्स और 'लॉयल्टी पेनल्टी': ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में एक ही समय पर नियमित खरीदारों को नए ग्राहकों की तुलना में 10 से 25 प्रतिशत तक अधिक कीमतें दिखाई जाती हैं। इसे 'लॉयल्टी पेनल्टी' कहा जाता है—यानी जो उपभोक्ता किसी ऐप का जितना आदी हो चुका है, एल्गोरिदम उससे उतना ही अधिक मुनाफा वसूलता है।

पारंपरिक बाज़ार में उपभोक्ता को वस्तु के सामान्य मूल्य की जानकारी होती थी, लेकिन सर्विलांस प्राइसिंग स्क्रीन को एक अभेद्य 'ब्लैक बॉक्स' बना देती है। बराबर में बैठे दो यात्रियों को कभी यह पता नहीं चलता कि एक ही सेवा के लिए उनसे अलग-अलग शुल्क क्यों लिया गया।

यह स्थिति भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी 'डार्क पैटर्न रेगुलेशन, 2023' के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करती है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग  ने अपनी ई-कॉमर्स मार्केट स्टडी में स्पष्ट कहा था कि प्लेटफॉर्म्स द्वारा डेटा के आधार पर किए जाने वाले गैर-पारदर्शी डिस्काउंट और मूल्य निर्धारण से स्वस्थ बाज़ार प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। यह न केवल आम उपभोक्ता की जेब पर डाका है, बल्कि अंतिम सेवा प्रदाताओं (जैसे कैब चालक या रेस्टोरेंट संचालक) के मुनाफे को भी प्लेटफॉर्म्स की झोली में डालने का माध्यम है।

तकनीक और नवाचार का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सुविधा के नाम पर उपभोक्ता की चौबीसों घंटे निगरानी और आर्थिक दोहन की छूट नहीं दी जा सकती।यदि कोई प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत व्यवहार या एआई एल्गोरिदम के आधार पर कीमत तय कर रहा है, तो स्क्रीन पर स्पष्ट डिस्क्लेमर और आधार मूल्य प्रदर्शित करना अनिवार्य होना चाहिए. 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' के तहत ऐसे सख्त नियम बनाए जाएं जो कंपनियों को यूजर के लोकेशन, डिवाइस प्रकार या सर्च फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल कीमत बढ़ाने के लिए करने से रोकें। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण जिसका  मुख्य कार्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाना और कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले 'डार्क पैटर्न्स' (धोखाधड़ी वाली डिजिटल तकनीकों) पर नकेल कसना है और  भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जो  भारत का प्रमुख बाज़ार नियामक है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि बाज़ार में स्वस्थ और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। इन दोनों प्राधिकरणों को स्वतंत्र साइबर व डेटा विशेषज्ञों के जरिए ई-कॉमर्स, कैब और ट्रेवल ऐप्स के मूल्य निर्धारण एल्गोरिदम का नियमित ऑडिट कराना चाहिए।

तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम और पारदर्शी बनाना था, न कि नागरिक की हर डिजिटल गतिविधि पर नज़र रखकर मुनाफा निचोड़ना। यदि सर्विलांस प्राइसिंग के इस चक्रव्यूह पर समय रहते कड़ा नीतिगत अंकुश नहीं लगाया गया, तो मध्यम वर्ग अपनी मेहनत की कमाई को एल्गोरिदम के गुप्त दांव-पेंचों में गंवाता रहेगा।

 प्रभात खबर में 26/08/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, August 25, 2026

मशीनों की चौपाल बनता इंटरनेट

 
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जब इंटरनेट का विस्तार भारत के गाँव-गाँव और कस्बों तक पहुँचा, तो इसे सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी 'डिजिटल चौपाल' कहा गया ।यह एक ऐसा लोकतांत्रिक मंच था जहाँ इंसान अपनी अनुभूतियाँ, विचार, कला और मौलिक साहित्य को साझा कर सकता  था ।लेकिन वर्ष 2026 में, जनरेटिव एआई  और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने इस चौपाल के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है समाजशास्त्रियों और तकनीकी विश्लेषकों के बीच आज जिस थ्योरी की सबसे गंभीर चर्चा है, वह है—'डेड इंटरनेट थ्योरी' मृत इंटरनेट सिद्धांत’  की अवधारणा पहली बार वर्ष 2021 में ‘अगोरा रोड्स अगोरा’ नामक एक ऑनलाइन मंच पर "इल्यूमिनाती पाइरेट" नाम के अनाम विचारक ने प्रस्तुत की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका ‘द अटलांटिक’ में पत्रकार केटलिन टिफ़नी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। हालांकि, इसकी जड़ें वर्ष 2016-2017 से मानी जाती हैं, जब स्वचालित बोट्स और कॉर्पोरेट एल्गोरिदम ने वेब पर हावी होना शुरू किया। यह सिद्धांत बताता है कि आज इंटरनेट पर अधिकांश सामग्री इंसानों द्वारा नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बोट्स द्वारा बनाई और सराही जा रही है।  इस प्रक्रिया में वास्तविक मनुष्य, उसकी रचनात्मकता और उसकी भाषा लगातार अदृश्य होती जा रही है ।'डेड इंटरनेट थ्योरी' का मूल विचार यह है कि लगभग 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी "जीवंतता" खो चुका है ।पहले जिसे हम एक स्वाभाविक और इंसानी संवाद का माध्यम मानते थे, उसे अब कॉर्पोरेट एल्गोरिदम, एआई मॉडल्स और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन के जरिए नियंत्रित किया जा रहा है ।जनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब "रोबोटिक कचरे का गोदाम" बन चुका है ।इसकी तुलना आप  रेडियो पर गाने सुनने और स्पॉटफाई पर अपनी प्ले लिस्ट के गाने सुनने से कर सकते हैं जैसे रेडियो पर कौन गाना कब बजेगा आपको पता नहीं होता पर स्पॉटफाई अप बनी आपकी प्ले लिस्ट में अनिश्चितता का तत्त्व  गायब रहता  है अगर आप इसे शफल न करें तो आप आँकलन लगा सकते हैं कि अब अमुक गाना बजेगा| उसी  तरह आज आप जब  गूगल सर्च करते हैं , इंस्टाग्राम रील्स देखते हैं या  एक्स (ट्विटर) के थ्रेड्स पढ़ें—हर जगह एक ही तरह के पैटर्न में लिखा गया, कृत्रिम रूप से सजाया गया कंटेंट दिखाई देता है वो अनिश्चितता का तत्त्व गायब हो गया है|इंटरनेट एक ऐसी जगह बन गया है जहां सब कुछ निश्चित है आपकी आँखों के सामने जो कुछ या रहा है वो एल्गोरिदम का परिणाम है |

एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक 'औसत' निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है ।इस मशीनी कचरेके ढेर में किसी नए लेखक का मौलिक विचार, किसी पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या किसी विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा जब तक वह  इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा |असल में अब इंसान नहीं बोट्स इंटरनेट चला रहे हैं |साइबर सुरक्षा फर्म Imperva द्वारा जारी वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6% हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। यानी इंटरनेट पर आधी से अधिक गतिविधियाँ इंसानों की हैं ही नहीं। इसमें से 32% ट्रैफिक "बैड बोट्स" का है जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपीय संघ की कानून प्रवर्तन एजेंसी यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है।'न्यूज़गार्ड' के हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों "एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म" वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इंसानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।

'डेड इंटरनेट थ्योरी' केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है, यह समाज में एक गहरे अविश्वास को जन्म दे रही है ।जब इंटरनेट पर दिखने वाली आधी तस्वीरें, वीडियो और टेक्स्ट सिंथेटिक (एआई निर्मित) हैं, तो आम नागरिक का 'सत्य' पर से भरोसा उठने लगता है ।किसी भी प्रामाणिक घटना को आसानी से "एआई-जनरेटेड" या डीपफेक कहकर खारिज किया जा सकता है ।सभ्यताएँ केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक संचय से चलती हैं ।यदि इंटरनेट का उपयोग केवल बोट्स द्वारा बोट्स को जानकारी परोसने के लिए होने लगेगा, तो मानव समाज अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाएगा ।हम एक ऐसे युग में पहुँच जाएंगे जहाँ जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन सत्य की पहचान करना नामुमकिन हो जाएगा ।सभ्यता का कोई भी विकास इंसानी चेतना की कीमत पर नहीं होना चाहिए ।'डेड इंटरनेट थ्योरी' हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल पर लगाम नहीं लगाई, तो हमारी डिजिटल दुनिया जल्द ही एक मृत और यांत्रिक मरुस्थल बनकर रह जाएगी ।

इस संकट से निपटने का रास्ता तकनीक को बंद करना नहीं, बल्कि "मानवीय प्रामाणिकता" को प्राथमिकता देना है ।मीडिया संस्थानों, प्रकाशकों और पाठकों को अब एआई-जनरेटेड सस्ते कंटेंट के बजाय हाड़-मांस के इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक, शोधपरक और संवेदनात्मक लेखन का सम्मान करना होगा ।इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इंसान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा ।

अमर उजाला में 25/08/2026 को प्रकाशित 

Friday, August 21, 2026

एप की 'ब्लू टिक ' वाली डिजिटल बेगार


सभ्यता का विकास कितना अजीब है! जिस डाकिए की चिट्ठी का इंतज़ार कभी महबूब के खत की तरह होता था, वह पहले ईमेल के 'इनबॉक्स' में तब्दील हुआ और अब सिमटकर हमारी पैंट की दाईं जेब में धड़कने वाले एक हरे रंग के ऐप—'व्हाट्सऐप' में कैद हो चुका है ।

मूल विचार कितना मासूम था! जब यह चैट ऐप आया था, तो मकसद था दोस्तों को 'Hi' भेजना, परिवार के ग्रुप में सुबह-सुबह 'गुड मॉर्निंग' के साथ उगते हुए सूरज और गेंदे के फूलों की फोटो सरकाना या फिर छुट्टियों की तस्वीरें साझा करना । औपचारिक संवाद के लिए तो हमारी सभ्यता ने बड़ी नफ़ासत से 'ईमेल' की खोज की थी—जहाँ एक लिखित रिकॉर्ड रहता था, भाषा में एक औपचारिक शराफ़त होती थी और सबसे बढ़कर, दफ़्तर से बाहर निकलते ही लैपटॉप बंद करने के साथ काम का अंत हो जाता था ।
लेकिन भारत जैसे अति-उत्साही देश में हमने तकनीक को सिर्फ अपनाया नहीं, उसका 'रायता' फैला दिया है । आज स्थिति यह है कि ईमेल को ठंडे बस्ते में डालकर दफ़्तर का पूरा कार्यभार व्हाट्सऐप ग्रुप्स के हवाले कर दिया गया है । अब दफ़्तर आठ घंटे की कोई जगह नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली एक 'डिजिटल चौपाल' है ।
पश्चिमी देशों में श्रम कानूनों और सामाजिक मर्यादा की एक स्पष्ट सीमा रेखा है । वहाँ शाम ६ बजे के बाद बॉस अगर कर्मचारी को ईमेल भी भेजे, तो वह उम्मीद नहीं करता कि उसका जवाब तुरंत मिले । सप्ताहांत  पर काम का मैसेज भेजना लगभग एक सामाजिक अपराध माना जाता है । लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ रविवार की रात ९ बजे व्हाट्सऐप ग्रुप पर एक बजता हुआ नोटिफिकेशन  किसी तुग़लकी फ़रमान से कम नहीं होता ।
यहाँ कर्मचारी के सामने दो ही रास्ते छोड़े गए हैं: या तो आप लगातार 'मोबाईल-ऑन' मोड में रहें, अपनी चाय की चुस्की, परिवार के साथ बिताए पल और निजी जीवन को भूल जाएँ; या फिर संदेश न देखने/जवाब न देने पर अगले दिन दफ़्तर में 'गैर-जिम्मेदार' होने का उलाहना और बॉस की त्योरियां झेलें। यह एक ऐसी 'डिजिटल बेगार' है, जिसकी कोई ओवरटाइम फीस नहीं मिलती ।
'ब्लू टिक' का यह डर मानसिक सेहत को किस कदर दीमक की तरह चाट रहा है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंसान अब वॉशरूम जाते हुए भी फोन साथ ले जाता है—इस डर से कि कहीं कोई 'अति-महत्वपूर्ण' मैसेज छूट न जाए! हमने सहज अनौपचारिक संवाद के लिए बने एक साधन को एक ऐसे औजार में बदल दिया है जो हमारी निजता (Privacy) पर हर पल हमला कर रहा है ।
व्हाट्सऐप ने हमें गति तो दी है, लेकिन हमारा 'ठहराव' छीन लिया है । शायद समय आ गया है कि हम दफ़्तरी संस्कृति में इस 'व्हाट्सऐप अतिक्रमण' पर लगाम लगाएँ और ईमेल की उस सुसज्जित, अनुशासित दुनिया की तरफ लौटें, जहाँ काम और निजी ज़िंदगी के बीच एक सम्मानजनक दूरी हुआ करती थी । 

प्रभात खबर में21/08 /2026 को प्रकाशित लेख 

Thursday, August 13, 2026

स्क्रीन पर दिखती हिन्दी में भाषा का सौन्दर्य नहीं

 

कुछ दिनों पहले बनारस के एक अस्सी घाट के किनारे बैठे दो बुजुर्गों की बातचीत पर मेरा ध्यान गया। एक ने गहरी सांस लेकर कहा, "अब तो लंका फतह कइके ही लौटब, चाहे जे होए!" यह महज एक वाक्य नहीं था, इसमें एक खास इलाकाई जिद, रामायण का सांस्कृतिक संदर्भ और भोजपुरी-अवधी मिश्रित हिंदी का वह अनूठा रस था जिसे कोई भी भारतीय तुरंत समझ जाता। उत्सुकतावश, मैंने उसी समय अपनी जेब से स्मार्टफोन निकाला और सिलिकॉन वैली के एक सबसे आधुनिक 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल' (LLM) यानी एआई टूल को यही वाक्य सौंप दिया। एआई ने पलक झपकते ही इसका हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद किया: "Now I will return only after conquering Sri Lanka, whatever happens!" मैं स्तब्ध रह गया। मशीनी बुद्धि ने 'लंका फतह' का शाब्दिक अर्थ तो निकाल दिया, लेकिन वह उस मुहावरे के पीछे छिपे सांस्कृतिक मर्म, संघर्ष के गौरव और भाषाई आत्मा को पूरी तरह मार चुका था। एआई के लिए 'लंका' केवल एक भौगोलिक देश था, हमारी साझा चेतना का मुहावरा नहीं। यह दृश्य आज भारत के हर कोने, हर भाषा और हर डिजिटल स्क्रीन पर घटित हो रहा है। हम अनजाने में एक ऐसे भाषाई संकट की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ हमारी बोलियाँ, मुहावरे और लोकोक्तियाँ सिलिकॉन वैली के सर्वरों में बैठकर तय किए जा रहे 'औसत ज्ञान' की बलि चढ़ रही हैं।ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि चैटजीपीटी या क्लॉड जैसी एआई तकनीकें हिंदी में बहुत धाराप्रवाह लिख रही हैं। लेकिन जब आप इसकी तह में जाएंगे, तो पाएंगे कि यह हिंदी असल में 'हिंदी' है ही नहीं; यह अंग्रेजी सोच का देवनागरी लिपि में किया गया एक यांत्रिक और बेजान अनुवाद है। 
तकनीकी भाषा में इसे 'क्रॉस-लीगल इंटरफेरेंस' और 'डेटा इमबैलेंस' कहा जाता है। W3Techs के वेब प्रौद्योगिकी सर्वेक्षणों के अनुसार, इंटरनेट की शीर्ष 1 करोड़ वेबसाइटों में 50% से 60% सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है, जबकि हिंदी का योगदान मात्र 0.1% से भी कम है । वहीं, यूनेस्को और कॉमन क्रॉल (Common Crawl) के वैश्विक डेटासेट दर्शाते हैं कि संपूर्ण इंटरनेट के लिखित डेटाबेस का 99% से अधिक हिस्सा गैर-भारतीय भाषाओं के नियंत्रण में है, जिससे भारतीय भाषाओं की कुल डिजिटल हिस्सेदारी 1% से भी कम रह जाती है ।वर्ष 2026 के हालिया भाषाई अध्ययनों के अनुसार, दुनिया के सबसे उन्नत एआई मॉडल्स (जैसे GPT-5 श्रेणी के मॉडल) जब हिंदी सहित 11 प्रमुख भारतीय भाषाओं पर टेस्ट किए गए, तो सांस्कृतिक और प्रासंगिक सटीकता के मामले में उनका स्कोर मात्र 45% के आसपास रहा|यूनेस्को (UNESCO) की 'एथिक्स ऑफ एआई' रिपोर्ट ने आगाह किया है कि पश्चिमी एआई मॉडल्स दुनिया भर की स्थानीय भाषाओं का 'डिजिटल विलोपन' कर रहे हैं, क्योंकि वे हर भाषा को एक समान सांचे में ढालने की कोशिश 
करते हैं।आई मॉडल्स मुहावरों और चार-अक्षर वाले सामासिक पदों (Idioms) का शाब्दिक अनुवाद कर देते हैं। जैसे 'ऊँट के मुँह में जीरा' का अनुवाद कई बार एआई 'कमिन सीड इन कैमल्स माउथ' जैसी हास्यास्पद पंक्तियों में करता है, जिससे भाषा का सौंदर्य समाप्त हो जाता है।जब दिल्ली, लखनऊ या पटना का कोई छात्र इतिहास, समाजशास्त्र या साहित्य के किसी विषय पर एआई से संवाद करता है, तो एल्गोरिदम उसे इंटरनेट पर उपलब्ध लाखों सूचनाओं का एक 'औसत' निकाल कर दे देता है। इस औसत के चक्कर में भाषा का वह अनूठा रस गायब हो जाता है जिसे हम 'सांस्कृतिक बारीकियां' (Cultural Nuances) कहते हैं।मानविकी और कला का पूरा सौंदर्य वैचारिक असहमतियों और स्थानीय संदर्भों में होता है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में जहाँ 'कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी' की परंपरा रही हो, वहाँ कैलिफोर्निया के एयर-कंडीशनर कमरों में तैयार कोडिंग यह तय कर रही है कि भारत के छात्र को राष्ट्रवाद, प्रेम, अध्यात्म या लोक-संस्कृति को किस चश्मे से देखना चाहिए। एआई के पास कबीर की उलटबांसियों का व्याकरण तो हो सकता है, लेकिन कबीर की फक्कड़ता और लोक-चेतना को समझने वाला न्यूरल नेटवर्क उसके पास नहीं है। यह ज्ञान का एक नया केंद्रीकरण है, जिसे यदि हम 'ज्ञान की नई औपनिवेशिकता' कहें, तो गलत नहीं होगा।
प्रकाशन उधयोग एक नए संकट से जूझ रहा है. नए लेखकों के आलेख व्याकरण के दृष्टिकोण से तो एकदम शुद्ध होते हैं, लेकिन उनमें कोई 'आत्मा' या मौलिक गंध नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे किसी रोबोट ने शब्दों को तरतीब से सजा दिया हो। कारण साफ है— युवा पीढ़ी अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय या रामचंद्र शुक्ल को नहीं पढ़ रही, बल्कि वह चैटजीपीटी की स्क्रीन से भाषा सीख रही है।जब भाषा से उसके मुहावरे, उसकी लोकोक्तियाँ और उसकी स्थानीय गंध गायब हो जाती है, तो वह केवल संवाद का साधन रह जाती है, संस्कृति का संवाहक नहीं। मुहावरे समाज के सैकड़ों वर्षों के सामूहिक अनुभव और बुद्धिमत्ता से बनते हैं। जब एआई इन मुहावरों को 'अप्रासंगिक' या 'अनुवाद से बाहर' मानकर छोड़ देता है, तो हम अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कटने लगते हैं।इस संकट का समाधान तकनीक का बहिष्कार नहीं, बल्कि तकनीक का 'लोकाचार' (Localization) है।
 भारत सरकार के 'इंडिया-एआई मिशन' (IndiaAI Mission) के तहत अब स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर काम शुरू हुआ है, ताकि भारतीय एआई सिस्टम पूरी तरह से भारतीयों द्वारा तैयार किए गए डेटा पर प्रशिक्षित हो सकें। 'सर्वम एआई' और 'भाषीणी' जैसे प्रयास इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं— लेकिन केवल कोडिंग बदलने से बात नहीं बनेगी।हमें एआई के प्रशिक्षण में केवल कंप्यूटर इंजीनियरों की नहीं, बल्कि भाषाविदों, लोक-कलाकारों, ग्रामीण महिलाओं और समाजशास्त्रियों की भागीदारी को अनिवार्य बनाना होगा। तकनीक को यह सिखाना होगा कि भारत में 'घी शक्कर' का मतलब केवल कैलरी नहीं, बल्कि असीम स्नेह और आशीर्वाद है। जब तक हम अपने डिजिटल इकोसिस्टम को अपनी मिट्टी के डेटा से नहीं सींचेंगे, तब तक स्क्रीन पर दिखने वाली हिंदी केवल एक 'अनुवादित विवशता' बनी रहेगी, हमारी 'जीवंत चेतना' नहीं। समय आ गया है कि हम एल्गोरिदम के इस अंग्रेजी चश्मे को उतारें, इससे पहले कि हमारी भाषा अपनी ही सरजमीं पर पराई हो जाए।
प्रभात खबर में 13/08/2026 को प्रकाशित 

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