Thursday, June 11, 2026
एआई में बढ़ते निवेश से बदलता परिदृश्य
Saturday, May 23, 2026
ए आई अवतार और स्मृतियों का कारोबार
ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (होराईजन डाटा बुक ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 'एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग' और 'डिजिटल लेगेसी सर्विसेज' (जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है) का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। साल 2023 में भारतीय बाजार का कुल आकार 1,737.1 मिलियन डॉलर था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह बाजार 7.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए साल 2030 तक 2,820.20 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस अभूतपूर्व वृद्धि दर के साथ भारत इस क्षेत्र में एशिया-पैसिफिक का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है।ये मामला सिर्फ बाजार का नहीं बल्कि इसके अनेक मनोवैज्ञानिक और विधिक पहलू भी हैं |जिन पर लोगों का ध्यान काम जा रहा है |
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद 'शोक मनाना' एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इंसान पहले रोता है, तड़पता है, इनकार की स्थिति से गुजरता है और अंत में उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। लेकिन 'ग्रीफ टेक' इंसान को शोक की पहली अवस्था यानी 'इनकार' में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।
जब आपके पास एक ऐसा 'घोस्ट बॉट' या डिजिटल क्लोन हो जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी हूबहू आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो मानव मस्तिष्क कभी उस मृत्यु को स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यह तकनीक इंसान को एक अंतहीन अवसाद और 'अवास्तविक दुनिया' में धकेल सकती है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु को एक महायात्रा माना गया है। जहां 'तर्पण', 'श्राद्ध' और 'अंतिम संस्कार' के जरिए मृत आत्मा को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और उसकी स्मृतियों को दिल में एक पवित्र धरोहर के रूप में सहेजा जाता है। लेकिन एआई तकनीक मृत व्यक्ति को एक 'इंटरैक्टिव प्रोडक्ट' में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक हमें अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है जो वास्तव में हमारी मानवीय गरिमा को तहस नहस कर सकती है भारत का 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' मुख्य रूप से जीवित नागरिकों के डेटा अधिकारों की बात करता है। लेकिन मृत व्यक्ति के व्यक्तिगत के आंकड़ों का कैसा और कहाँ तक इस्तेमाल हो सकता है ?क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी 'डिजिटल आत्मा' को फिर से बनाने का अधिकार टेक कंपनियों या उनके परिवार को होना चाहिए, यह बड़ा सवाल है|
मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी मृत व्यक्ति के 'डिजिटल अवतार' के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो किन परिस्थितियों में उनका डिजीतल अवतार बनाया जा सकता है । यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में 'प्रोजेक्ट दिसंबर' और 'सीयांस एआई' जैसी कंपनियां सस्ते में चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं।जो चैट जी पी टी जैसे मॉडल्स पर चलता है। और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है।इनका उद्देश्य उद्देश्य शोक में मदद करना है, लेकिन इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डेटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा।
ए आई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा चढ़ा कर या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें मजाक, अश्लील समाग्री , और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं |वैसे भी मृत व्यक्ति खुद को बचा नहीं सकता। उस की "डिजिटल छवि" को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। इससे पहले कि यह समस्या गंभीर हो यह नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है कि केवल कानूनी स्तर पर 'मरणोपरांत भूल जाने के अधिकार' को कड़ाई से परिभाषित किया जाए, बल्कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम यह भी समझें कि अपनों को खोने का दर्द सहना और उन्हें सम्मान के साथ विदा करना ही इंसान होने की पहली शर्त है। स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी लगती हैं न कि कोडिंग के जरिए कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए 'डिजिटल भूतों' में ।
Tuesday, May 12, 2026
जीवन के संघर्ष का हमराही है गमछा
इसके
उपयोगों की सूची इतनी लंबी है कि इस पर शोध पत्र लिखा जा सकता है।सुरक्षा कवच: चिलचिलाती धूप में यही गमछा हेलमेट के नीचे पसीने का दुश्मन बनता है
और चेहरे पर लपेट लिया जाए तो 'डाकू' लुक के साथ-साथ लू से भी बचाता है।बाजार गए और थैला भूल गए? कोई बात नहीं। गमछे के दो कोनों में गांठ लगाइए और देखिए कैसे यह दो
किलो आलू और एक किलो टमाटर का बोझ हंसते-हंसते उठा लेता है.गाँव की पगडंडियों पर
जब प्यास लगे, तो इसी गमछे की चार परतें पानी छानने
के काम आती हैं।किसी पार्क की बेंच गंदी हो या बस की सीट पर धूल हो, गमछा बिछाइए और 'महाराजा' की तरह विराजमान हो जाइए।आज की दुनिया 'सस्टेनेबिलिटी' और 'ईको-फ्रेंडली' होने का ढोंग
कर रही है, लेकिन गमछा जन्मजात पर्यावरण प्रेमी
है। तौलिए को धोने के लिए आपको बाल्टी भर पानी और ढेर सारे डिटर्जेंट की जरूरत
पड़ती है, क्योंकि उसकी घनी बुनाई मैल को पकड़
कर बैठ जाती है।
इसके
विपरीत, गमछा 'मिनिमलिस्ट' है। आधा बाल्टी
पानी और एक बार साबुन की टिकिया उस पर फिरा दी जाए, तो वह चमक उठता है।सबसे बड़ी बात इसके सूखने की रफ्तार है। पंखे की हवा
में भी यह दस मिनट में सूखकर तैयार हो जाता है। तौलिए की तरह इसे 'ड्रायर' की जरूरत नहीं
पड़ती। इसका मतलब है—कम पानी, कम बिजली और कम
प्रदूषण। जब गमछा पुराना हो जाता है, तब भी
वह हार नहीं मानता। वह 'पोछे' के रूप में पदोन्नत होकर घर की सफाई करता है और अंत में मिट्टी में
मिलकर विलीन हो जाता है। यह 'जीरो वेस्ट' जीवनशैली का असली ब्रांड एंबेसडर है।वहीं तौलिया आपको आलसी बनाता है।
नहाने के बाद भारी तौलिए में लिपटे रहना एक सामंती सुख दे सकता है, लेकिन गमछा आपको फुर्ती देता है। गमछा कंधे पर हो, तो इंसान काम करने के लिए तैयार रहता है। यह श्रम की पहचान है। एक तरफ
तौलिया है जो फाइव स्टार होटलों के सफेद कमरों में शोभा बढ़ाता है, और दूसरी तरफ गमछा है जो खेत की मेड़ से लेकर ऑफिस की कुर्सी तक हर जगह
अपनी जगह बना लेता है।
अंत
में, यदि हम उपयोगिता, पर्यावरण और बहुमुखी प्रतिभा के तराजू पर तौलिए और गमछे को तौलें, तो गमछे का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। तौलिया एक जरूरत हो सकती है, लेकिन गमछा एक संस्कार है। यह हमें बताता है कि जीवन की जटिलताओं को
सुलझाने के लिए किसी भारी-भरकम समाधान की नहीं, बल्कि एक हल्के और लचीले व्यवहार की जरूरत है।इसलिए, अगली बार जब आप किसी मॉल में महंगे आयातित तौलिए को देखें, तो मुस्कुराइए और अपने कंधे पर रखे उस दो मीटर के सूती जादू को सहलाइए, जो न केवल आपका बदन सुखाता है, बल्कि आपकी संस्कृति को भी जिंदा रखता है। तौलिया सिर्फ नहाने के बाद
का साथी है, पर गमछा जीवन के हर संघर्ष का हमराही
है।
प्रभात खबर में 12/05/2026 को प्रकाशित लेख
Saturday, May 2, 2026
ओ टी टी ने बदल दी डबिंग की दुनिया
आज का युवा कोरियन ड्रामा, स्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी है, जिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबी, महंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फिल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फिल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारों, निर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैं, जिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा है, जिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर पर, साल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब किया, जिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ हॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तक, कंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।
भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्स, बढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियों, भाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।
वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्ट‑प्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया है, बल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।
ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषा, सीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदान‑प्रदान का भी युग है, जहाँ एक ओर युवा कोरियन, स्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैं, वहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि एक वैश्विक संवाद, सांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएं हैं।
दैनिक जागरण में 02/05/2026 को प्रकाशित
Monday, April 27, 2026
नया गेमिंग नियम: डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास
इसके विपरीत, 'किस्मत का खेल' वह है जहाँ परिणाम पूरी तरह से भाग्य या संयोग पर निर्भर करता है, जैसे सट्टेबाजी या लॉटरी। नए नियम इस अंतर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सख्ती से लागू करते हैं। सरकार ने 'रियल मनी गेमिंग' के उन रूपों को प्रतिबंधित कर दिया है जो सट्टेबाजी (Betting) के करीब थे, जबकि 'ई-स्पोर्ट्स' और कौशल आधारित खेलों को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया है। यह स्पष्टता निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण थी, क्योंकि बिना परिभाषा के करोड़ों का निवेश हमेशा जोखिम में रहता था।
भारत में गेमिंग अब केवल समय बिताने का साधन नहीं, बल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति है। ल्युमिकाई (Lumikai) की प्रतिष्ठित वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग 2023-24' है के अनुसार, भारत का गेमिंग बाजार वर्तमान में लगभग 3 बिलियन डॉलर का मूल्य रखता है। विदित हो कि यह उद्योग 28% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है। जो 2028 तक 5 बिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को छू लेगा।
भारत में वर्तमान में लगभग 50 करोड़ से अधिक गेमर्स हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा 'इन-गेम' खरीदारी के जरिए राजस्व में योगदान दे रहा है। यह वृद्धि केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है; यह भारत को वैश्विक सॉफ्टवेयर और एनीमेशन हब बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
हालांकि आलोचक ये मानते हैं कि इन नियमों के आने में थोड़ी देर हुई जिसका फायदा उठाया कर देश के लाखों युवाओं और किशोरों को सट्टे की लत लगी और ये लोग रातों रात अमीर बनने के सपने देख कर इस तरह के खेलों के आदी हो गए जिनमें पैसा शामिल राहत था |, लेकिन इसके पीछे की जटिलताओं को समझना आवश्यक है। देरी के मुख्य रूप से तीन कारण बताए जा सकते हैं
पहला ये है कि भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'जुआ और सट्टेबाजी' राज्य सूची (State List) का विषय है। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने जब अपनी सीमाओं में गेमिंग पर प्रतिबंध लगाया, तो मामला अदालतों में पहुँचा। केंद्र सरकार को एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था जो राज्यों की शक्तियों का सम्मान करे और पूरे देश के लिए एक समान डिजिटल ढांचा भी प्रदान करे। दूसरा कारण है तकनीकी अस्पष्टता मतलब पारंपरिक खेलों के विपरीत, ऑनलाइन गेम्स के एल्गोरिदम इतने जटिल होते हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जीत कौशल से हुई है या सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित 'किस्मत' से। सरकार को विशेषज्ञों की समितियों और तकनीकी ऑडिटर्स की एक फौज तैयार करनी पड़ी जो इन दावों की पुष्टि कर सकें।तीसरा है आर्थिक और सामाजिक संतुलन साधना एक तरफ 28% GST लगाने का आर्थिक दबाव था और दूसरी तरफ युवाओं में गेमिंग की लत (Gaming Disorder) से जुड़ी सामाजिक चिंताएं। सरकार एक ऐसा कानून चाहती थी जो न तो उद्योग का गला घोंटे और न ही समाज की युवा पीढी को जोखिम में डाले।
नए नियमों के तहत, एक बार किसी गेम को उसकी श्रेणी (कौशल या मनोरंजन) के आधार पर सर्टिफिकेट मिल जाता है, तो वह दस साल तक वैध रहेगा। यह गेम डेवलपर्स को एक दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है। सबसे राहत की बात छोटे डेवलपर्स और छात्रों के लिए है, बिना वित्तीय लेनदेन वाले खेलों (Social & Casual Games) को अनिवार्य पंजीकरण की कतार से बाहर रखा गया है। इससे कॉलेज कैंपस और छोटे स्टार्टअप्स में 'इनोवेशन' की लहर आएगी। उपभोक्ता सुरक्षा के लिए आयु सत्यापन (Age Verification) और खर्च की सीमा तय करने जैसे फीचर्स से छात्रों और बच्चों पर गेमिंग के दुष्प्रभाव कम होंगे।विदेशी निवेश (FDI) में स्पष्ट नियमों के कारण अब वैश्विक गेमिंग कंपनियाँ भारत में अपने सर्वर और ऑफिस स्थापित करने में संकोच नहीं करेंगी।पांच बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में ग्राफिक्स डिजाइनर्स, कोडिंग एक्सपर्ट्स और डेटा एनालिस्ट्स के लिए लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
1 मई से लागू होने वाले ये नियम भारतीय गेमिंग जगत की 'शुद्धि' का काम करेंगे। भारत अब गेमिंग के क्षेत्र में केवल एक 'उपभोक्ता' (Consumer) नहीं, बल्कि एक 'नियामक' और 'निर्माता' (Creator) के रूप में उभर रहा है। यह नियमों और विकास का वह संतुलित संगम है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी।
प्रभात खबर में 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित लेख
Friday, April 24, 2026
ए आई के नक़्शे में भारत
वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी शब्द मात्र नहीं, बल्कि 'चतुर्थ औद्योगिक क्रांति' (Industry 4.0) का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) रिपोर्ट 2025 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत 92% AI एडॉप्शन दर के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान पर है। यह आंकड़ा न केवल भारत की डिजिटल शक्ति को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।रिपोर्ट के अनुसार भारत (92%) ने स्पेन (78%) और ब्राजील (76%) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (64%) और जापान (51%) जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देश ए आई एडॉप्शन की इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं।उल्लेखनीय है कि यहाँ 'एडॉप्शन' का अर्थ केवल ए आई के परिचय से नहीं, बल्कि सक्रिय उपयोग से है (कम से कम सप्ताह में कई बार)।भारत की इस बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं |जिसमें सबसे प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी 'डिजिटल नेटिव' है।संज्ञानात्मक लचीलापन (Cognitive Flexibility) युवाओं में अधिक होता है, जिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं और भारत इसमें अपवाद नहीं है|दूसरा है लीपफ्रॉगिंग (Leapfrogging) की प्रवृत्ति मतलब भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है।
जापान और अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे 'संस्थागत जड़ता' और 'सख्त नियामक ढांचे' उत्तरदायी हैं। जिसमें ए आई लिए जरुरी आवश्यक आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं और वहां की जनसंख्या अपने आंकड़ों के लिए ज्यादा सजग है|दूसरा वहाँ डेटा गोपनीयता (Privacy) और कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया है, जबकि भारत में 'ओपन-सोर्स कल्चर' और नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है।आने वाले समय में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो चार होना पड़ेगा |सबसे जरुरी है कि भारत का ए आई इस्तेमाल में स्वरुप कैसा होगा?जिसे क्रियेटर बनाम कंज्यूमर के नजरिये से समझा जा सकता है | दुनिया में हुई 'सोशल मीडिया क्रांति' (2004-2015) के दौरान भारत एक 'इनोवेटर' (बनाने वाला) के बजाय केवल 'कंज्यूमर' (उपयोगकर्ता) बनकर रह गया था|ए आई के आने के बाद यह बहस भी जोरो पर थी क्या वैसी ही गलती कहीं भारत दुबारा तो नहीं दोहरा देगा |भारत केवल वैश्विक AI मॉडल्स जैसे चैट जी पी टी, गूगल जेमिनी,को-पाइलेट का उपभोक्ता बना रहेगा, या हम अपने खुद के 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है |
हमें एल्गोरिथमिक बायस (Bias) और डेटा संप्रभुता पर शोध की ज्यादा आवश्यकता है। एल्गोरिथमिक बायस डेटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता है, जिससे ए आई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव हैं जिसमें भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में कोई बात सही होती वहीं दूसरे राज्य या संस्कृति में हो सकता है वो सही बात गलत हो ऐसे में ए आई कई तरह की गलतियां कर सकता है । वहीं, डेटा संप्रभुता यह सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं और कानूनों के अधीन रहे। इन पर शोध अनिवार्य है ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके।भारत अब डिजिटल विभाजन के दूसरी ओर नहीं, बल्कि केंद्र में खड़ा है। 92% एडॉप्शन रेट इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार है, बल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है। भारत का यह ' एआई मोमेंट' उसे आने वाले दशकों में उसे वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु बनाएगा या नहीं इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना होगा |
अमर उजाला में 24/04/2026 को प्रकाशित
Tuesday, April 14, 2026
इंटरनेट थका रहा है जेन ज़ी को
बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया , जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओं, तनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावट, बेचैनी, अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है , कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीप, स्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकर, मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइन, दोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइन, जैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा है, जो कभी शांत नहीं होता, अंतहीन फीड्स, नेटफ्लिक्स, असीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।
कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता है, लेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलना, शारीरिक क्रियाएं करना, दोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजाय, किताबें पढ़ना, संगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थ, उत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।






