Friday, June 19, 2026

बिना इंटरनेट वाला बचपन

 

बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली  थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता  देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!

प्रभात खबर में 19/06/2026 को प्रकाशित लेख

Thursday, June 11, 2026

एआई में बढ़ते निवेश से बदलता परिदृश्य

 

हाल ही में विश्व की बड़ी तकनीकी कंपनियों में से एक ओरेकल कॉर्पोरेशन द्वारा कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी की खबरें सुर्खियों में रही हैं। एक ही दिन में क़रीब 30 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की घटना ने सॉफ़्टवेयर उद्योग के भविष्य को लेकर एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। यह घटना केवल एक कंपनी का निर्णय नहीं, बल्कि उस व्यापक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण पूरे सॉफ़्टवेयर उद्योग में देखने को मिल रहा है। पिछले तीन दशकों में सॉफ़्टवेयर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। विशेषकर भारत जैसे देशों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने न केवल लाखों लोगों को रोजगार दिया है, बल्कि भारत को वैश्विक आईटी हब के रूप में स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई है। इन कंपनियों का प्रमुख बिज़नेस मॉडल ‘सर्विस मॉडल’ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में इंजीनियर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सॉफ़्टवेयर सेवाएँ प्रदान करते रहे हैं।

यदि हम अतीत की ओर देखें, तो कंप्यूटर पर काम करने का मतलब होता था अलग-अलग सॉफ़्टवेयर का उपयोग। उदाहरण के लिए, लेखन के लिए माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, डेटा प्रबंधन के लिए एक्सेल, और फोटो संपादन के लिए फोटोशॉप जैसे टूल्स का उपयोग किया जाता था। हर कार्य के लिए अलग टूल और हर टूल को सीखने के लिए समय और कौशल की आवश्यकता होती थी।किन्तु आज यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अब उपयोगकर्ता केवल एक साधारण निर्देश यानी प्रॉम्ट देते हैं, जैसे “इस डेटा का विश्लेषण कर दो” या “इस फोटो को बेहतर बना दो” और एआई स्वयं ही पूरा कार्य कर देता है। इस परिवर्तन ने न केवल कार्यप्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि पारंपरिक सॉफ़्टवेयर उद्योग की संरचना को भी चुनौती दी है।

एआई के बढ़ते प्रभाव के कारण वैश्विक आईटी बाज़ार में अस्थिरता भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। हाल के महीनों में सॉफ़्टवेयर कंपनियों के शेयरों में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस और और मैकेंजी ग्लोबल की रिपोर्ट्स के अनुसार, टेक सेक्टर के वैल्यूएशन में तेज गिरावट देखी गई है, जिसका अनुमान 800 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है।इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण तब सामने आया जब एआई स्टार्टअप एनथ्रॉपिक ने अपने क्लाउड-आधारित एजेंट्स के लिए एआई प्लगइन्स पेश किए। ये टूल्स कानूनी विश्लेषण, वित्तीय मॉडलिंग, कोडिंग, ग्राहक सेवा और डेटा प्रोसेसिंग जैसे जटिल कार्यों को स्वचालित रूप से करने में सक्षम हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि जिन कार्यों के लिए पहले बड़ी सॉफ़्टवेयर टीमों की आवश्यकता होती थी, वे अब मशीनों द्वारा अधिक तेज़ और कम लागत में किए जा सकते हैं।
यह परिवर्तन केवल सॉफ़्टवेयर उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि रचनात्मक क्षेत्रों जैसे फिल्म और फोटोग्राफी पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। पहले जहाँ पटकथा लेखन एक पूर्णतः मानवीय और रचनात्मक प्रक्रिया मानी जाती थी, वहीं अब एआई टूल्स की सहायता से कथानक संरचना, संवाद और चरित्र विकास कुछ ही मिनटों में संभव हो गया है। स्टोरीबोर्डिंग और विजुअल प्लानिंग जैसे कार्य, जो पहले विशेष सॉफ़्टवेयर और विशेषज्ञता पर निर्भर थे, अब टेक्स्ट-आधारित इनपुट से ही पूरे किए जा सकते हैं।

पोस्ट-प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी सोरा, वियो और लूमा एआई जैसे टूल्स पारंपरिक वीडियो एडिटिंग और वीएफएक्स सॉफ़्टवेयर को चुनौती दे रहे हैं। ये टूल्स न केवल समय की बचत करते हैं, बल्कि रचनात्मक संभावनाओं का भी विस्तार करते हैं।फोटोग्राफी उद्योग में भी यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ ‘कैप्चर’ की पारंपरिक अवधारणा अब ‘क्रिएशन’ में बदल रही है। पहले फोटोग्राफर का मुख्य कार्य सही समय, प्रकाश और फ्रेमिंग के माध्यम से एक क्षण को कैद करना होता था, जिसके बाद एडिटिंग सॉफ़्टवेयर का उपयोग किया जाता था। किन्तु अब एआई इस पूरी प्रक्रिया को एकीकृत कर रहा है। आज स्मार्टफ़ोन और कैमरे एआई की सहायता से स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं कि किस सेटिंग पर इमेज सबसे उपयुक्त होगी। इमेजिन एआई और आफ्टरशूट जैसे टूल्स न केवल फोटो चयन और संपादन को स्वचालित कर रहे हैं, बल्कि जेनरेटिव फिल जैसी तकनीकों के माध्यम से इमेज को पुनर्निर्मित और परिवर्तित भी कर रहे हैं।

तकनीकी इतिहास पर दृष्टि डालें तो सॉफ़्टवेयर उद्योग की उत्पत्ति 1970–80 के दशक की पर्सनल कंप्यूटिंग क्रांति से मानी जाती है, जब कंप्यूटर संस्थानों से निकलकर आम लोगों तक पहुँचना शुरू हुए। इसके बाद 2000 के दशक में इंटरनेट और क्लाउड सेवाओं के विस्तार ने इस उद्योग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। मैकिंज़ी वैश्विक संस्थान की रिपोर्टों में इस परिवर्तन को “डिजिटल रूपांतरण” की लहर के रूप में समझाया है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था में सॉफ़्टवेयर की केंद्रीय भूमिका स्थापित की थी। इस पूरे विकासक्रम में सॉफ़्टवेयर का स्वरूप “इंटरफेस-आधारित” रहा था जिसका मतलब है प्रत्येक कार्य के लिए अलग सॉफ़्टवेयर और उसका विशिष्ट इंटरफेस होता था। किन्तु बड़े भाषाई मॉडल्स के आगमन के साथ यह स्थिति तेजी से बदल रही है। स्टैनफोर्ड मानव-केंद्रित एआई संस्थान की “एआई सूचकांक रिपोर्ट 2024” के अनुसार, संवाद-आधारित इंटरफेस पारंपरिक ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस को चुनौती दे रहे हैं, जहाँ उपयोगकर्ता केवल सामान्य भाषा के माध्यम से जटिल कार्यों को संपन्न कर पा रहे हैं। इस प्रकार “बातचीत” स्वयं एक इंटरफेस का रूप लेती जा रही है।

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम एआई-संचालित कोड जनरेशन के रूप में सामने आया है। २०२३ में आये गिटहब और माइक्रोसॉफ्ट के संयुक्त अध्ययन  के अनुसार, कोपायलट का उपयोग करने वाले लगभग 55–75% डेवलपर्स ने अधिक उत्पादकता और कम मानसिक थकान की सूचना दी। इससे यह स्पष्ट होता है कि अब बुनियादी कोड लेखन का कार्य धीरे-धीरे एआई द्वारा किया जा रहा है, जबकि मानव डेवलपर्स उच्च-स्तरीय समस्या-समाधान और डिजाइन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, “कोड लिखना” अब एक मुख्य कौशल न रहकर एक सहायक टूल में परिवर्तित हो रहा है। इसी प्रकार विश्व आर्थिक मंच की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट के मुताबिक़ एआई की बढ़ती भूमिका से पुनावृत्ति वाले नौकरी पेशा पर अधिक दबाव बनेगा, बल्कि उच्च स्तरीय विश्लेषणात्मक और रचनात्मक भूमिकाओं की माँग में वृद्धि होगी।

2025 में आई रॉयटर्स समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने एआई और नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग के चलते लगभग 12,000 से अधिक पदों में कटौती का संकेत दिया है।वहीं ओरेकल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन वेब सर्विसेज और गूगल जैसी कंपनियाँ बड़े पैमाने पर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रही हैं। गार्टनर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सॉफ़्टवेयर उद्योग अब सॉफ़्टवेयर एज अ सर्विस से एआई एज अ सर्विस मॉडल की ओर बढ़ रहा है। यानी अब कंपनियाँ सॉफ़्टवेयर नहीं, बल्कि “बुद्धिमत्ता” बेच रही हैं। हालांकि यह कहना अप्रासंगिक होगा कि एआई, सॉफ़्टवेयर उद्योग को पूरी तरह से खत्म कर देगा या यूजर्स की निर्भरता सॉफ्टवेयर से बिल्कुल कम कर देगा, सही बात यह है कि लोगों को टिके रहने के लिए को ख़ुद को एआई लिटरेसी और कर्मचारियों प्रॉम्ट इंजीनियरिंग जैसे महत्वपूर्ण कौशल सीखने और बदलती तकनीक के अनुरूप ख़ुद को ढालने की क्षमता सीखनी होगी ।
दैनिक जागरण में 11/06/2026 को प्रकाशित लेख 

Saturday, May 23, 2026

ए आई अवतार और स्मृतियों का कारोबार

 एक दिन आप सोकर  उठे हैं और देखें कि आपके मोबाईल पर अपने किसी ऐसे प्रियजन का वायस नोट या वीडियो नोट उन्हीं के मोबाईल नंबर से आपको मिले  जो अब इस दुनिया में नहीं हैं तो आपको कैसा लगेगा |इंटरनेट आज एक वास्तविकता है लेकिन कल तक किसी ने नहीं सोचा था इंटरनेट मृत्यु के बाद भी हमारे जीवन से जुड़ा रहेगा |पढ़ने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन भारत में मृत व्यक्तियों के एआई अवतार बनाने और 'ग्रीफ टेक'  का बाजार बहुत तेजी से फैल  रहा है |हाल ही में राजस्थान के अजमेर शहर में रहने वाले कपड़ा व्यापारी जयदीप शर्मा के विवाह समारोह के  रिसेप्शन में  स्क्रीन पर जयदीप के स्वर्गीय पिता प्रकट हुए, । उन्होंने न केवल नए जोड़े को शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिया, बल्कि वहां मौजूद मेहमानों से भी बात की ।जयदीप ने स्थानीय टेक-क्रिएटर को खोजा था, जिसने उनके पिता की कुछ पुरानी तस्वीरों, पुराने वॉयस नोट्स और उनके व्यवहार के तौर-तरीकों का अध्ययन करके, एक मिनट का 'एआई डीपफेक अवतार' तैयार किया था। 
वैश्विक स्तर पर 'हियरआफ्टर एआई'और 'स्टोरीफाइल'  जैसी कंपनियां अब बाकायदा इस 'ग्रीफ टेक' (शोक तकनीक) को एक संगठित बिजनेस मॉडल में बदल चुकी हैं। ये कंपनियां किसी व्यक्ति के पुराने चैट्स, वॉयस मैसेज और सोशल मीडिया डेटा के आधार पर उनका डिजिटल भूत या 'घोस्ट बॉट' तैयार कर रही हैं। और भारत भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं|प्रथम दृष्टया यह किसी भावुक परिवार का अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति अगाध प्रेम और तकनीकी चमत्कार लग सकता है|लेकिन जहां भावनाएं तीव्र होती हैं, वहां बाजार सबसे पहले अपनी जड़ें जमाता है।

ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (होराईजन डाटा बुक ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 'एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग' और 'डिजिटल लेगेसी सर्विसेज' (जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है) का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। साल 2023 में भारतीय बाजार का कुल आकार 1,737.1 मिलियन डॉलर था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह बाजार 7.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए साल 2030 तक 2,820.20  मिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस अभूतपूर्व वृद्धि दर के साथ भारत इस क्षेत्र में एशिया-पैसिफिक का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है।ये मामला सिर्फ बाजार का नहीं बल्कि इसके अनेक  मनोवैज्ञानिक और विधिक पहलू भी हैं |जिन पर लोगों का ध्यान काम जा रहा है |
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद 'शोक मनाना' एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इंसान पहले रोता है, तड़पता है, इनकार की स्थिति से गुजरता है और अंत में  उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। लेकिन 'ग्रीफ टेक' इंसान को शोक की पहली अवस्था यानी 'इनकार' में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।

जब आपके पास एक ऐसा 'घोस्ट बॉट' या डिजिटल क्लोन हो जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी हूबहू आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो मानव मस्तिष्क कभी उस मृत्यु को स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यह तकनीक इंसान को एक अंतहीन अवसाद और 'अवास्तविक दुनिया' में धकेल सकती है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु को एक महायात्रा माना गया है। जहां 'तर्पण', 'श्राद्ध' और 'अंतिम संस्कार' के जरिए मृत आत्मा को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और उसकी स्मृतियों को दिल में एक पवित्र धरोहर के रूप में सहेजा जाता है। लेकिन एआई तकनीक मृत व्यक्ति को एक 'इंटरैक्टिव प्रोडक्ट' में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक हमें अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है जो वास्तव में हमारी मानवीय गरिमा को तहस नहस  कर सकती  है भारत का 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' मुख्य रूप से जीवित नागरिकों के डेटा अधिकारों की बात  करता है। लेकिन मृत व्यक्ति के व्यक्तिगत के आंकड़ों का कैसा और कहाँ तक इस्तेमाल हो सकता है ?क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी 'डिजिटल आत्मा' को फिर से बनाने  का अधिकार टेक कंपनियों या उनके  परिवार को होना चाहिए, यह बड़ा  सवाल है|
मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी मृत व्यक्ति के 'डिजिटल अवतार' के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो किन परिस्थितियों में उनका डिजीतल अवतार बनाया जा सकता है । यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में 'प्रोजेक्ट दिसंबर' और 'सीयांस एआई' जैसी कंपनियां सस्ते में  चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं।जो चैट जी पी टी जैसे  मॉडल्स पर चलता है। और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है।इनका उद्देश्य उद्देश्य शोक में मदद करना है, लेकिन इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा  गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डेटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा। 

ए आई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा चढ़ा कर  या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल  किया जा सकता है जिसमें मजाक, अश्लील समाग्री , और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं |वैसे भी   मृत व्यक्ति  खुद को बचा  नहीं सकता। उस की "डिजिटल छवि" को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। इससे पहले कि यह समस्या गंभीर हो यह नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है  कि  केवल कानूनी स्तर पर 'मरणोपरांत भूल जाने के अधिकार'  को कड़ाई से परिभाषित किया जाए, बल्कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम यह भी समझें कि अपनों को खोने का दर्द सहना और उन्हें सम्मान के साथ विदा करना ही इंसान होने की पहली शर्त है। स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी  लगती हैं न कि कोडिंग के जरिए कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए 'डिजिटल भूतों' में ।
अमर उजाला में 23/05/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, May 12, 2026

जीवन के संघर्ष का हमराही है गमछा

गर्मियां आ गयी वो भी पूरी शिद्दत से, बात गर्मी की हो तो शरीर को गर्मी से बचाने की पहली जरुरत टोपी होती है लेकिन टोपी एक शहरी अवधारणा ग्रामीण भारत जिस वस्त्र का उपयोग करता है उसे हम गमछे के नाम से जानते हैं . भारत की विविधता में गमछा कई नामों से जाना जाता है। उत्तर भारत में इसे अंगोछाअसम में गमोछाऔर दक्षिण भारत में अंगवस्त्रम कहते हैं। कहीं यह साफी है तो कहीं तुवालु। नाम चाहे जो भी होयह सूती वस्त्र अपनी सुगमता और बहुमुखी उपयोग के कारण हर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।इसे उदारीकरण का असर कहें या शहरी होने की चाह गमछा तौलिये के मुकाबले शहरों में पिछड़ा सा लगता है.इसे इस तरह से कह सकते हैं  तौलिए और गमछे की तुलना दरअसल दो संस्कृतियों की तुलना है—एक जो दिखावे के भारीपन से दबी हैऔर दूसरी जो सादगी के हल्केपन में उड़ रही है।तौलिया एक ऐसा सामान है जिसे 'रखरखावकी बीमारी है। इसे इस्तेमाल करने के बाद सुखाना एक प्रोजेक्ट है। अगर धूप न मिलेतो यह दो दिन में ही ऐसी गंध छोड़ने लगता है जैसे किसी पुराने पुस्तकालय की सीलन भरी किताबें हों। तौलिया अहंकारी होता हैवह केवल बदन पोंछने का काम करेगावह भी तब जब आप उसे सम्मानपूर्वक स्टैंड पर टांगें। आप तौलिए से अपनी स्कूटी साफ नहीं कर सकतेन ही इसे सिर पर पगड़ी की तरह बांधकर लू से बच सकते.गमछा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहींबल्कि एक चलता-फिरता स्विस आर्मी नाइफ है। 

इसके उपयोगों की सूची इतनी लंबी है कि इस पर शोध पत्र लिखा जा सकता है।सुरक्षा कवच: चिलचिलाती धूप में यही गमछा हेलमेट के नीचे पसीने का दुश्मन बनता है और चेहरे पर लपेट लिया जाए तो 'डाकूलुक के साथ-साथ लू से भी बचाता है।बाजार गए और थैला भूल गएकोई बात नहीं। गमछे के दो कोनों में गांठ लगाइए और देखिए कैसे यह दो किलो आलू और एक किलो टमाटर का बोझ हंसते-हंसते उठा लेता है.गाँव की पगडंडियों पर जब प्यास लगेतो इसी गमछे की चार परतें पानी छानने के काम आती हैं।किसी पार्क की बेंच गंदी हो या बस की सीट पर धूल होगमछा बिछाइए और 'महाराजाकी तरह विराजमान हो जाइए।आज की दुनिया 'सस्टेनेबिलिटीऔर 'ईको-फ्रेंडलीहोने का ढोंग कर रही हैलेकिन गमछा जन्मजात पर्यावरण प्रेमी है। तौलिए को धोने के लिए आपको बाल्टी भर पानी और ढेर सारे डिटर्जेंट की जरूरत पड़ती हैक्योंकि उसकी घनी बुनाई मैल को पकड़ कर बैठ जाती है। 

इसके विपरीतगमछा 'मिनिमलिस्टहै। आधा बाल्टी पानी और एक बार साबुन की टिकिया उस पर फिरा दी जाएतो वह चमक उठता है।सबसे बड़ी बात इसके सूखने की रफ्तार है। पंखे की हवा में भी यह दस मिनट में सूखकर तैयार हो जाता है। तौलिए की तरह इसे 'ड्रायरकी जरूरत नहीं पड़ती। इसका मतलब है—कम पानीकम बिजली और कम प्रदूषण। जब गमछा पुराना हो जाता हैतब भी वह हार नहीं मानता। वह 'पोछेके रूप में पदोन्नत होकर घर की सफाई करता है और अंत में मिट्टी में मिलकर विलीन हो जाता है। यह 'जीरो वेस्टजीवनशैली का असली ब्रांड एंबेसडर है।वहीं तौलिया आपको आलसी बनाता है। नहाने के बाद भारी तौलिए में लिपटे रहना एक सामंती सुख दे सकता हैलेकिन गमछा आपको फुर्ती देता है। गमछा कंधे पर होतो इंसान काम करने के लिए तैयार रहता है। यह श्रम की पहचान है। एक तरफ तौलिया है जो फाइव स्टार होटलों के सफेद कमरों में शोभा बढ़ाता हैऔर दूसरी तरफ गमछा है जो खेत की मेड़ से लेकर ऑफिस की कुर्सी तक हर जगह अपनी जगह बना लेता है।

अंत मेंयदि हम उपयोगितापर्यावरण और बहुमुखी प्रतिभा के तराजू पर तौलिए और गमछे को तौलेंतो गमछे का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। तौलिया एक जरूरत हो सकती हैलेकिन गमछा एक संस्कार है। यह हमें बताता है कि जीवन की जटिलताओं को सुलझाने के लिए किसी भारी-भरकम समाधान की नहींबल्कि एक हल्के और लचीले व्यवहार की जरूरत है।इसलिएअगली बार जब आप किसी मॉल में महंगे आयातित तौलिए को देखेंतो मुस्कुराइए और अपने कंधे पर रखे उस दो मीटर के सूती जादू को सहलाइएजो न केवल आपका बदन सुखाता हैबल्कि आपकी संस्कृति को भी जिंदा रखता है। तौलिया सिर्फ नहाने के बाद का साथी हैपर गमछा जीवन के हर संघर्ष का हमराही है।

 प्रभात खबर में 12/05/2026 को प्रकाशित लेख 

 


Saturday, May 2, 2026

ओ टी टी ने बदल दी डबिंग की दुनिया

 एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

आज का युवा कोरियन ड्रामास्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फिल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फिल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

 

भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर परसाल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब कियाजिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ हॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तककंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।

भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्सबढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्टप्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही हैजिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया हैबल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।

 
ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहींबल्कि एक वैश्विक संवादसांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएं हैं।

 दैनिक जागरण में 02/05/2026 को प्रकाशित 

Monday, April 27, 2026

नया गेमिंग नियम: डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास

 


देश बदला दुनिया बदली इसी के साथ सभ्यता के लिए सबसे जरूरी मनोरंजन के भी तौर तरीके बदले |फिर खेल भी कहाँ पिछड़ने वाले थे |जब सब डिजिटल हो रहा है तो खेल क्यों न हो ?पर मामला इतना सा भर नहीं है |इंटरनेट के मौद्रिकीकरण ने खेलों को भी नहीं छोड़ा और जब डिजिटल खेलों के साथ धन जुड़ा वहीं से मामला गंभीर हो गया |लंबे इंतजार के बाद  1 मई 2026 की तारीख एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है। इसी दिन से देश में 'ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026' (PROG Rules) लागू हो रहे हैं। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि उस जटिल डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास है जिसमें भारत का युवा और निवेश जगत पिछले एक दशक से उलझा हुआ था। 10 साल की लंबी वैधता वाले गेमिंग सर्टिफिकेट और बिना पैसे वाले खेलों को पंजीकरण से मुक्ति देने जैसे प्रावधानों के साथ सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 'नियंत्रण' से अधिक 'नियमन' पर भरोसा कर रही है। इस नियमन की सबसे बड़ी उपलब्धि 'कौशल' (Skill) और 'किस्मत' (Chance) के बीच के सदियों पुराने विवाद को तकनीकी रूप से परिभाषित करना सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. के.आर. लक्ष्मणन बनाम तमिलनाडु राज्य जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कोई भी खेल 'कौशल का खेल' तब कहलाता है जब उसमें खिलाड़ी की मानसिक योग्यता, रणनीति, निर्णय लेने की क्षमता और अनुभव जीत का मुख्य आधार होते हैं।
इसके विपरीत, 'किस्मत का खेलवह है जहाँ परिणाम पूरी तरह से भाग्य या संयोग पर निर्भर करता हैजैसे सट्टेबाजी या लॉटरी। नए नियम इस अंतर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सख्ती से लागू करते हैं। सरकार ने 'रियल मनी गेमिंगके उन रूपों को प्रतिबंधित कर दिया है जो सट्टेबाजी (Betting) के करीब थेजबकि 'ई-स्पोर्ट्सऔर कौशल आधारित खेलों को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया है। यह स्पष्टता निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण थीक्योंकि बिना परिभाषा के करोड़ों का निवेश हमेशा जोखिम में रहता था।
भारत में गेमिंग अब केवल समय बिताने का साधन नहींबल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति है। ल्युमिकाई (Lumikai) की प्रतिष्ठित वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग 2023-24' है के अनुसारभारत का गेमिंग बाजार वर्तमान में लगभग 3 बिलियन डॉलर का मूल्य रखता है। विदित  हो कि यह उद्योग 28% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है। जो 2028 तक 5 बिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को छू लेगा।
भारत में वर्तमान में लगभग 50 करोड़ से अधिक गेमर्स हैंजिनमें से एक बड़ा हिस्सा 'इन-गेमखरीदारी के जरिए राजस्व में योगदान दे रहा है। यह वृद्धि केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैयह भारत को वैश्विक सॉफ्टवेयर और एनीमेशन हब बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
हालांकि आलोचक ये मानते हैं कि इन नियमों के आने में थोड़ी देर हुई जिसका फायदा उठाया कर देश के लाखों युवाओं और किशोरों को सट्टे की लत लगी और ये लोग रातों रात अमीर बनने  के सपने देख कर इस तरह के खेलों के आदी हो गए जिनमें पैसा शामिल राहत था |, लेकिन इसके पीछे की जटिलताओं को समझना आवश्यक है। देरी के मुख्य रूप से तीन कारण बताए जा सकते हैं
पहला ये है कि  भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'जुआ और सट्टेबाजीराज्य सूची (State List) का विषय है। कर्नाटकतमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने जब अपनी सीमाओं में गेमिंग पर प्रतिबंध लगायातो मामला अदालतों में पहुँचा। केंद्र सरकार को एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था जो राज्यों की शक्तियों का सम्मान करे और पूरे देश के लिए एक समान डिजिटल ढांचा भी प्रदान करे। दूसरा कारण है तकनीकी अस्पष्टता मतलब  पारंपरिक खेलों के विपरीतऑनलाइन गेम्स के एल्गोरिदम इतने जटिल होते हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जीत कौशल से हुई है या सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित 'किस्मतसे। सरकार को विशेषज्ञों की समितियों और तकनीकी ऑडिटर्स की एक फौज तैयार करनी पड़ी जो इन दावों की पुष्टि कर सकें।तीसरा है आर्थिक और सामाजिक संतुलन साधना  एक तरफ 28% GST लगाने का आर्थिक दबाव था और दूसरी तरफ युवाओं में गेमिंग की लत (Gaming Disorder) से जुड़ी सामाजिक चिंताएं। सरकार एक ऐसा कानून चाहती थी जो न तो उद्योग का गला घोंटे और न ही समाज की युवा पीढी को  जोखिम में डाले।
नए नियमों के तहतएक बार किसी गेम को उसकी श्रेणी (कौशल या मनोरंजन) के आधार पर सर्टिफिकेट मिल जाता हैतो वह दस  साल तक वैध रहेगा। यह गेम डेवलपर्स को एक दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है। सबसे राहत की बात छोटे डेवलपर्स और छात्रों के लिए है, बिना वित्तीय लेनदेन वाले खेलों (Social & Casual Games) को अनिवार्य पंजीकरण की कतार से बाहर रखा गया है। इससे कॉलेज कैंपस और छोटे स्टार्टअप्स में 'इनोवेशनकी लहर आएगी।      उपभोक्ता सुरक्षा के लिए  आयु सत्यापन (Age Verification) और खर्च की सीमा तय करने जैसे फीचर्स से छात्रों और बच्चों पर गेमिंग के दुष्प्रभाव कम होंगे।विदेशी निवेश (FDI) में  स्पष्ट नियमों के कारण अब वैश्विक गेमिंग कंपनियाँ भारत में अपने सर्वर और ऑफिस स्थापित करने में संकोच नहीं करेंगी।पांच  बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में ग्राफिक्स डिजाइनर्सकोडिंग एक्सपर्ट्स और डेटा एनालिस्ट्स के लिए लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
मई से लागू होने वाले ये नियम भारतीय गेमिंग जगत की 'शुद्धिका काम करेंगे। भारत अब गेमिंग के क्षेत्र में केवल एक 'उपभोक्ता' (Consumer) नहींबल्कि एक 'नियामकऔर 'निर्माता' (Creator) के रूप में उभर रहा है। यह नियमों और विकास का वह संतुलित संगम हैजिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी।
 प्रभात खबर में 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित लेख


Friday, April 24, 2026

ए आई के नक़्शे में भारत

 

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी शब्द मात्र  नहींबल्कि 'चतुर्थ औद्योगिक क्रांति' (Industry 4.0) का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) रिपोर्ट 2025 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसारभारत 92% AI एडॉप्शन दर  के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान  पर है। यह आंकड़ा  न केवल भारत की डिजिटल शक्ति  को दर्शाता हैबल्कि वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।रिपोर्ट के अनुसार भारत (92%) ने स्पेन (78%) और ब्राजील (76%) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (64%) और जापान (51%) जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देश ए आई  एडॉप्शन की इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं।उल्लेखनीय है कि यहाँ 'एडॉप्शनका अर्थ केवल ए आई के परिचय से नहींबल्कि सक्रिय उपयोग से है (कम से कम सप्ताह में कई बार)।भारत की इस बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं |जिसमें सबसे प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी 'डिजिटल नेटिवहै।संज्ञानात्मक लचीलापन (Cognitive Flexibility) युवाओं में अधिक होता हैजिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं और भारत इसमें अपवाद नहीं है|दूसरा है लीपफ्रॉगिंग (Leapfrogging) की प्रवृत्ति मतलब भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है।
 ये उसी तरह का मामला है जैसे भारत ने लैंडलाइन फोन  के युग को छोड़कर सीधे मोबाइल क्रांति कीवैसे ही अब वह पारंपरिक सॉफ्टवेयर से सीधे AI-इंटीग्रेटेड सिस्टम की ओर बढ़ रहा है।तीसरा कारण: भारतीय श्रम बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का होना है। यहाँ AI को 'जॉब रिप्लेसमेंटके बजाय 'जॉब एनहांसमेंटटूल के रूप में देखा जा रहा हैजिससे व्यक्तिगत उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि होने की सम्भावना है।भारत की 'नंबर 1' रैंकिंग केवल उपयोग तक सीमित नहीं हैबल्कि यह 'AI रेडीनेस' (AI तत्परता) को भी रेखांकित करती है। भारत सरकार का 'IndiaAI' मिशननेशनल स्ट्रैटेजी फॉर  एआई   और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जैसे IITs और विश्वविद्यालय स्तर पर  एआई   पाठ्यक्रमों का समावेश इस तत्परता को आधार प्रदान कर रहा है। भारत मेंनीति आयोग का कहना है कि एआई को अपनाने से 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 957 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हो सकती है और देश की वार्षिक विकास दर में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। भारत ने भी नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय रणनीतिनामक एक चर्चा पत्र के माध्यम से एआई पारिस्थितिकी तंत्र को गति देने की अपनी रणनीति शुरू की है। भारत दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे बड़ा डेटा उपभोक्ता है।  एआई   को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा ही ईंधन है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है |जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है

जापान और अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे 'संस्थागत जड़ताऔर 'सख्त नियामक ढांचे'  उत्तरदायी हैं। जिसमें  ए आई लिए जरुरी आवश्यक आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं और वहां की जनसंख्या अपने आंकड़ों के लिए ज्यादा सजग है|दूसरा  वहाँ डेटा गोपनीयता (Privacy) और कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया हैजबकि भारत में 'ओपन-सोर्स कल्चरऔर नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है।आने वाले समय में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो चार होना पड़ेगा |सबसे जरुरी है कि भारत का ए आई इस्तेमाल में स्वरुप कैसा होगा?जिसे क्रियेटर बनाम कंज्यूमर के नजरिये से समझा जा सकता है | दुनिया में हुई  'सोशल मीडिया क्रांति' (2004-2015) के दौरान भारत एक 'इनोवेटर' (बनाने वाला) के बजाय केवल 'कंज्यूमर' (उपयोगकर्ता) बनकर रह गया था|ए आई के आने के बाद यह बहस भी जोरो पर थी क्या वैसी ही गलती कहीं भारत दुबारा तो नहीं दोहरा देगा |भारत केवल वैश्विक AI मॉडल्स जैसे चैट जी पी टी, गूगल जेमिनी,को-पाइलेट का उपभोक्ता बना रहेगाया हम अपने खुद  के 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है |

हमें एल्गोरिथमिक बायस (Bias) और डेटा संप्रभुता पर शोध की ज्यादा आवश्यकता है। एल्गोरिथमिक बायस डेटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता हैजिससे ए आई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव हैं जिसमें भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में कोई बात सही होती वहीं दूसरे राज्य या संस्कृति में हो सकता है वो सही बात गलत हो ऐसे में ए आई कई तरह की गलतियां कर सकता है । वहींडेटा संप्रभुता यह सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं और कानूनों के अधीन रहे। इन पर शोध अनिवार्य है ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके।भारत अब डिजिटल विभाजन  के दूसरी ओर नहींबल्कि केंद्र में खड़ा है। 92% एडॉप्शन रेट इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार हैबल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है। भारत का यह ' एआई   मोमेंटउसे आने वाले दशकों में उसे  वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु बनाएगा या नहीं इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना होगा |

अमर उजाला में 24/04/2026 को प्रकाशित 

 

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