Wednesday, August 26, 2026

सुविधा के नाम पर उपभोक्ताओं का आर्थिक दोहन

 


पारंपरिक भारतीय बाज़ार की बुनियादी पहचान खुली पारदर्शिता और मोलभाव से रही है। सब्जी मंडी से लेकर कपड़ों की दुकान तक, किसी सामान की एक तय कीमत होती थी या फिर खरीदार और विक्रेता आमने-सामने बैठकर मोल-तोल करते थे। इस व्यवस्था में सभी उपभोक्ताओं को एक समान धरातल मिलता था। लेकिन आज जब व्यापार  का पूरा ढांचा भौतिक दुकानों से सिमटकर स्मार्टफोन की चंद इंच की स्क्रीन पर केंद्रित हो चुका है, तब अर्थशास्त्र के इस बुनियादी सिद्धांत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एल्गोरिदम एक नई चुनौती दे रहा है

आज डिजिटल बाज़ार में एक ही समय, एक ही उड़ान, एक ही होटल के कमरे या एक ही कैब रूट के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग कीमतें दिखाई जा रही हैं। तकनीकी भाषा में जिसे अब तक ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ कहकर पेश किया जाता था, वह अब असल में सर्विलांस प्राइसिंग’ (निगरानी-आधारित मूल्य निर्धारण) का खतरनाक रूप ले चुका है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का वह अदृश्य डाका है, जो उपभोक्ता के निजी डेटा, उसकी मजबूरी और मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का विश्लेषण करके उसकी जेब से अधिकतम संभव पैसा खींच रहा है।

पारंपरिक अर्थशास्त्र में डायनेमिक प्राइसिंग का मतलब था मांग और आपूर्ति के संतुलन के आधार पर कीमतों का घटना या बढ़ना—जैसे त्योहारों पर टिकट महंगे होना या ऑफ-सीजन में होटल सस्ते होना। लेकिन अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन  द्वारा रेखांकित ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ इससे कहीं आगे की व्यवस्था है। जुलाई 2024 में  फेडरल ट्रेड कमीशन   ने आठ वैश्विक कंपनियों को आदेश जारी कर यह जांच शुरू की कि कंपनियाँ किस तरह उपभोक्ता के व्यक्तिगत डेटा—लोकेशन, सर्च हिस्ट्री, वित्तीय स्थिति और डिजिटल व्यवहार—का इस्तेमाल कर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कीमतें तय कर रही हैं।

इसमें एल्गोरिदम केवल बाज़ार की सामूहिक मांग नहीं देखता, बल्कि व्यक्तिगत उपभोक्ता की प्रोफाइल का एक्स-रे करता है। जब कोई उपभोक्ता कैब बुक करता है, हवाई टिकट खोजता है या ऑनलाइन राशन ऑर्डर करता है, तो एआई बैकएंड पर कुछ ही मिलीसेकंड्स में कई पैमानों की गणना करता है:

  • डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम: बुकिंग ₹1.5 लाख के प्रीमियम फोन से हो रही है या बजट एंड्रॉयड डिवाइस से?
  • स्थान और परिवेश: यूजर किसी पॉश इलाके में खड़ा है या सामान्य रिहायशी क्षेत्र में?
  • तात्कालिकता :क्या फोन की बैटरी 5% बची है या बाहर तेज बारिश हो रही है?
  • सर्च पैटर्न: उपभोक्ता ने पिछले 24 घंटों में उसी रूट या उत्पाद को कितनी बार सर्च किया है?

इन सभी पैमानों को मिलाकर एआई उपभोक्ता की 'पे करने की अधिकतम क्षमता' तय करता है और स्क्रीन पर वही कीमत दिखाता है, जो उसकी विवशता का अधिकतम दोहन कर सके।

मध्यम वर्ग पर प्रहार: आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत में मध्यम वर्ग अपनी दैनिक जरूरतों, यात्रा और खान-पान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है, इसलिए यह आर्थिक शोषण सबसे गहरा है।

  • कैब और राइड-हेलिंग: भारत के प्रमुख उपभोक्ता मंच 'लोकलसर्कल्स' के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक ऐप टैक्सी उपयोगकर्ताओं ने डार्क पैटर्न्स और अनुचित मूल्य वृद्धि का अनुभव किया है। इनमें 59 प्रतिशत ने 'ड्रिप प्राइसिंग' (अंतिम भुगतान पर छिपी हुई फीस जोड़ना) और 86 प्रतिशत ने 'बेट एंड स्विच' (कम प्रतीक्षा समय दिखाकर बाद में लंबा इंतजार कराना) की शिकायत की। इसके अलावा, एक ही समय पर अलग-अलग फोन मॉडल्स से एक ही रूट के किराए में 15 से 30 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
  • विमानन और होटल बुकिंग: लोकलसर्कल्स के 1.24 लाख से अधिक प्रतिक्रियाओं वाले अखिल भारतीय सर्वे के मुताबिक, 80 प्रतिशत हवाई यात्रियों ने बुकिंग के अंतिम चरण में छिपी हुई अतिरिक्त फीस का सामना किया। वहीं 56 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने "केवल 2 सीटें बची हैं" जैसी झूठी तात्कालिकता का सामना किया, जो उन्हें घबराहट में महंगा टिकट खरीदने पर मजबूर करती है।
  • क्विक कॉमर्स और 'लॉयल्टी पेनल्टी': ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में एक ही समय पर नियमित खरीदारों को नए ग्राहकों की तुलना में 10 से 25 प्रतिशत तक अधिक कीमतें दिखाई जाती हैं। इसे 'लॉयल्टी पेनल्टी' कहा जाता है—यानी जो उपभोक्ता किसी ऐप का जितना आदी हो चुका है, एल्गोरिदम उससे उतना ही अधिक मुनाफा वसूलता है।

पारंपरिक बाज़ार में उपभोक्ता को वस्तु के सामान्य मूल्य की जानकारी होती थी, लेकिन सर्विलांस प्राइसिंग स्क्रीन को एक अभेद्य 'ब्लैक बॉक्स' बना देती है। बराबर में बैठे दो यात्रियों को कभी यह पता नहीं चलता कि एक ही सेवा के लिए उनसे अलग-अलग शुल्क क्यों लिया गया।

यह स्थिति भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी 'डार्क पैटर्न रेगुलेशन, 2023' के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करती है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग  ने अपनी ई-कॉमर्स मार्केट स्टडी में स्पष्ट कहा था कि प्लेटफॉर्म्स द्वारा डेटा के आधार पर किए जाने वाले गैर-पारदर्शी डिस्काउंट और मूल्य निर्धारण से स्वस्थ बाज़ार प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। यह न केवल आम उपभोक्ता की जेब पर डाका है, बल्कि अंतिम सेवा प्रदाताओं (जैसे कैब चालक या रेस्टोरेंट संचालक) के मुनाफे को भी प्लेटफॉर्म्स की झोली में डालने का माध्यम है।

तकनीक और नवाचार का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सुविधा के नाम पर उपभोक्ता की चौबीसों घंटे निगरानी और आर्थिक दोहन की छूट नहीं दी जा सकती।यदि कोई प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत व्यवहार या एआई एल्गोरिदम के आधार पर कीमत तय कर रहा है, तो स्क्रीन पर स्पष्ट डिस्क्लेमर और आधार मूल्य प्रदर्शित करना अनिवार्य होना चाहिए. 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' के तहत ऐसे सख्त नियम बनाए जाएं जो कंपनियों को यूजर के लोकेशन, डिवाइस प्रकार या सर्च फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल कीमत बढ़ाने के लिए करने से रोकें। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण जिसका  मुख्य कार्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाना और कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले 'डार्क पैटर्न्स' (धोखाधड़ी वाली डिजिटल तकनीकों) पर नकेल कसना है और  भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जो  भारत का प्रमुख बाज़ार नियामक है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि बाज़ार में स्वस्थ और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। इन दोनों प्राधिकरणों को स्वतंत्र साइबर व डेटा विशेषज्ञों के जरिए ई-कॉमर्स, कैब और ट्रेवल ऐप्स के मूल्य निर्धारण एल्गोरिदम का नियमित ऑडिट कराना चाहिए।

तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम और पारदर्शी बनाना था, न कि नागरिक की हर डिजिटल गतिविधि पर नज़र रखकर मुनाफा निचोड़ना। यदि सर्विलांस प्राइसिंग के इस चक्रव्यूह पर समय रहते कड़ा नीतिगत अंकुश नहीं लगाया गया, तो मध्यम वर्ग अपनी मेहनत की कमाई को एल्गोरिदम के गुप्त दांव-पेंचों में गंवाता रहेगा।

 प्रभात खबर में 26/08/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, August 25, 2026

मशीनों की चौपाल बनता इंटरनेट

 
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जब इंटरनेट का विस्तार भारत के गाँव-गाँव और कस्बों तक पहुँचा, तो इसे सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी 'डिजिटल चौपाल' कहा गया ।यह एक ऐसा लोकतांत्रिक मंच था जहाँ इंसान अपनी अनुभूतियाँ, विचार, कला और मौलिक साहित्य को साझा कर सकता  था ।लेकिन वर्ष 2026 में, जनरेटिव एआई  और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने इस चौपाल के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है समाजशास्त्रियों और तकनीकी विश्लेषकों के बीच आज जिस थ्योरी की सबसे गंभीर चर्चा है, वह है—'डेड इंटरनेट थ्योरी' मृत इंटरनेट सिद्धांत’  की अवधारणा पहली बार वर्ष 2021 में अगोरा रोड्स अगोरा’ नामक एक ऑनलाइन मंच पर "इल्यूमिनाती पाइरेट" नाम के अनाम विचारक ने प्रस्तुत की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक’ में पत्रकार केटलिन टिफ़नी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। हालांकि, इसकी जड़ें वर्ष 2016-2017 से मानी जाती हैं, जब स्वचालित बोट्स और कॉर्पोरेट एल्गोरिदम ने वेब पर हावी होना शुरू किया। यह सिद्धांत बताता है कि आज इंटरनेट पर अधिकांश सामग्री इंसानों द्वारा नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बोट्स द्वारा बनाई और सराही जा रही है।  इस प्रक्रिया में वास्तविक मनुष्य, उसकी रचनात्मकता और उसकी भाषा लगातार अदृश्य होती जा रही है 'डेड इंटरनेट थ्योरी' का मूल विचार यह है कि लगभग 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी "जीवंतता" खो चुका है ।पहले जिसे हम एक स्वाभाविक और इंसानी संवाद का माध्यम मानते थे, उसे अब कॉर्पोरेट एल्गोरिदम, एआई मॉडल्स और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन के जरिए नियंत्रित किया जा रहा है ।जनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब "रोबोटिक कचरे का गोदाम" बन चुका है ।इसकी तुलना आप  रेडियो पर गाने सुनने और स्पॉटफाई पर अपनी प्ले लिस्ट के गाने सुनने से कर सकते हैं जैसे रेडियो पर कौन गाना कब बजेगा आपको पता नहीं होता पर स्पॉटफाई अप बनी आपकी प्ले लिस्ट में अनिश्चितता का तत्त्व  गायब रहता  है अगर आप इसे शफल न करें तो आप आँकलन लगा सकते हैं कि अब अमुक गाना बजेगा| उसी  तरह आज आप जब  गूगल सर्च करते हैं , इंस्टाग्राम रील्स देखते हैं या  एक्स (ट्विटर) के थ्रेड्स पढ़ें—हर जगह एक ही तरह के पैटर्न में लिखा गया, कृत्रिम रूप से सजाया गया कंटेंट दिखाई देता है वो अनिश्चितता का तत्त्व गायब हो गया है|इंटरनेट एक ऐसी जगह बन गया है जहां सब कुछ निश्चित है आपकी आँखों के सामने जो कुछ या रहा है वो एल्गोरिदम का परिणाम है |

एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक 'औसत' निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है ।इस मशीनी कचरेके ढेर में किसी नए लेखक का मौलिक विचार, किसी पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या किसी विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा जब तक वह  इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा |असल में अब इंसान नहीं बोट्स इंटरनेट चला रहे हैं |साइबर सुरक्षा फर्म Imperva द्वारा जारी वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6% हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। यानी इंटरनेट पर आधी से अधिक गतिविधियाँ इंसानों की हैं ही नहीं। इसमें से 32% ट्रैफिक "बैड बोट्स" का है जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपीय संघ की कानून प्रवर्तन एजेंसी यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है।'न्यूज़गार्ड' के हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों "एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म" वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इंसानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।

'डेड इंटरनेट थ्योरी' केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है, यह समाज में एक गहरे अविश्वास को जन्म दे रही है ।जब इंटरनेट पर दिखने वाली आधी तस्वीरें, वीडियो और टेक्स्ट सिंथेटिक (एआई निर्मित) हैं, तो आम नागरिक का 'सत्य' पर से भरोसा उठने लगता है ।किसी भी प्रामाणिक घटना को आसानी से "एआई-जनरेटेड" या डीपफेक कहकर खारिज किया जा सकता है ।सभ्यताएँ केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक संचय से चलती हैं ।यदि इंटरनेट का उपयोग केवल बोट्स द्वारा बोट्स को जानकारी परोसने के लिए होने लगेगा, तो मानव समाज अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाएगा ।हम एक ऐसे युग में पहुँच जाएंगे जहाँ जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन सत्य की पहचान करना नामुमकिन हो जाएगा ।सभ्यता का कोई भी विकास इंसानी चेतना की कीमत पर नहीं होना चाहिए 'डेड इंटरनेट थ्योरी' हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल पर लगाम नहीं लगाई, तो हमारी डिजिटल दुनिया जल्द ही एक मृत और यांत्रिक मरुस्थल बनकर रह जाएगी

इस संकट से निपटने का रास्ता तकनीक को बंद करना नहीं, बल्कि "मानवीय प्रामाणिकता" को प्राथमिकता देना है ।मीडिया संस्थानों, प्रकाशकों और पाठकों को अब एआई-जनरेटेड सस्ते कंटेंट के बजाय हाड़-मांस के इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक, शोधपरक और संवेदनात्मक लेखन का सम्मान करना होगा ।इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इंसान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा

अमर उजाला में 25/08/2026 को प्रकाशित 

Friday, August 21, 2026

एप की 'ब्लू टिक ' वाली डिजिटल बेगार


भ्यता का विकास कितना अजीब है! जिस डाकिए की चिट्ठी का इंतज़ार कभी महबूब के खत की तरह होता था, वह पहले ईमेल के 'इनबॉक्स' में तब्दील हुआ और अब सिमटकर हमारी पैंट की दाईं जेब में धड़कने वाले एक हरे रंग के ऐप—'व्हाट्सऐप' में कैद हो चुका है ।

मूल विचार कितना मासूम था! जब यह चैट ऐप आया था, तो मकसद था दोस्तों को 'Hi' भेजना, परिवार के ग्रुप में सुबह-सुबह 'गुड मॉर्निंग' के साथ उगते हुए सूरज और गेंदे के फूलों की फोटो सरकाना या फिर छुट्टियों की तस्वीरें साझा करना । औपचारिक संवाद के लिए तो हमारी सभ्यता ने बड़ी नफ़ासत से 'ईमेल' की खोज की थी—जहाँ एक लिखित रिकॉर्ड रहता था, भाषा में एक औपचारिक शराफ़त होती थी और सबसे बढ़कर, दफ़्तर से बाहर निकलते ही लैपटॉप बंद करने के साथ काम का अंत हो जाता था ।
लेकिन भारत जैसे अति-उत्साही देश में हमने तकनीक को सिर्फ अपनाया नहीं, उसका 'रायता' फैला दिया है । आज स्थिति यह है कि ईमेल को ठंडे बस्ते में डालकर दफ़्तर का पूरा कार्यभार व्हाट्सऐप ग्रुप्स के हवाले कर दिया गया है । अब दफ़्तर आठ घंटे की कोई जगह नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली एक 'डिजिटल चौपाल' है ।
पश्चिमी देशों में श्रम कानूनों और सामाजिक मर्यादा की एक स्पष्ट सीमा रेखा है । वहाँ शाम ६ बजे के बाद बॉस अगर कर्मचारी को ईमेल भी भेजे, तो वह उम्मीद नहीं करता कि उसका जवाब तुरंत मिले । सप्ताहांत  पर काम का मैसेज भेजना लगभग एक सामाजिक अपराध माना जाता है । लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ रविवार की रात ९ बजे व्हाट्सऐप ग्रुप पर एक बजता हुआ नोटिफिकेशन  किसी तुग़लकी फ़रमान से कम नहीं होता ।
यहाँ कर्मचारी के सामने दो ही रास्ते छोड़े गए हैं: या तो आप लगातार 'मोबाईल-ऑन' मोड में रहें, अपनी चाय की चुस्की, परिवार के साथ बिताए पल और निजी जीवन को भूल जाएँ; या फिर संदेश न देखने/जवाब न देने पर अगले दिन दफ़्तर में 'गैर-जिम्मेदार' होने का उलाहना और बॉस की त्योरियां झेलें। यह एक ऐसी 'डिजिटल बेगार' है, जिसकी कोई ओवरटाइम फीस नहीं मिलती ।
'ब्लू टिक' का यह डर मानसिक सेहत को किस कदर दीमक की तरह चाट रहा है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंसान अब वॉशरूम जाते हुए भी फोन साथ ले जाता है—इस डर से कि कहीं कोई 'अति-महत्वपूर्ण' मैसेज छूट न जाए! हमने सहज अनौपचारिक संवाद के लिए बने एक साधन को एक ऐसे औजार में बदल दिया है जो हमारी निजता (Privacy) पर हर पल हमला कर रहा है ।
व्हाट्सऐप ने हमें गति तो दी है, लेकिन हमारा 'ठहराव' छीन लिया है । शायद समय आ गया है कि हम दफ़्तरी संस्कृति में इस 'व्हाट्सऐप अतिक्रमण' पर लगाम लगाएँ और ईमेल की उस सुसज्जित, अनुशासित दुनिया की तरफ लौटें, जहाँ काम और निजी ज़िंदगी के बीच एक सम्मानजनक दूरी हुआ करती थी । 

प्रभात खबर में21/08 /2026 को प्रकाशित लेख 

Thursday, August 13, 2026

स्क्रीन पर दिखती हिन्दी में भाषा का सौन्दर्य नहीं

 

कुछ दिनों पहले बनारस के एक अस्सी घाट के किनारे बैठे दो बुजुर्गों की बातचीत पर मेरा ध्यान गया। एक ने गहरी सांस लेकर कहा, "अब तो लंका फतह कइके ही लौटब, चाहे जे होए!" यह महज एक वाक्य नहीं था, इसमें एक खास इलाकाई जिद, रामायण का सांस्कृतिक संदर्भ और भोजपुरी-अवधी मिश्रित हिंदी का वह अनूठा रस था जिसे कोई भी भारतीय तुरंत समझ जाता। उत्सुकतावश, मैंने उसी समय अपनी जेब से स्मार्टफोन निकाला और सिलिकॉन वैली के एक सबसे आधुनिक 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल' (LLM) यानी एआई टूल को यही वाक्य सौंप दिया। एआई ने पलक झपकते ही इसका हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद किया: "Now I will return only after conquering Sri Lanka, whatever happens!" मैं स्तब्ध रह गया। मशीनी बुद्धि ने 'लंका फतह' का शाब्दिक अर्थ तो निकाल दिया, लेकिन वह उस मुहावरे के पीछे छिपे सांस्कृतिक मर्म, संघर्ष के गौरव और भाषाई आत्मा को पूरी तरह मार चुका था। एआई के लिए 'लंका' केवल एक भौगोलिक देश था, हमारी साझा चेतना का मुहावरा नहीं। यह दृश्य आज भारत के हर कोने, हर भाषा और हर डिजिटल स्क्रीन पर घटित हो रहा है। हम अनजाने में एक ऐसे भाषाई संकट की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ हमारी बोलियाँ, मुहावरे और लोकोक्तियाँ सिलिकॉन वैली के सर्वरों में बैठकर तय किए जा रहे 'औसत ज्ञान' की बलि चढ़ रही हैं।ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि चैटजीपीटी या क्लॉड जैसी एआई तकनीकें हिंदी में बहुत धाराप्रवाह लिख रही हैं। लेकिन जब आप इसकी तह में जाएंगे, तो पाएंगे कि यह हिंदी असल में 'हिंदी' है ही नहीं; यह अंग्रेजी सोच का देवनागरी लिपि में किया गया एक यांत्रिक और बेजान अनुवाद है। 
तकनीकी भाषा में इसे 'क्रॉस-लीगल इंटरफेरेंस' और 'डेटा इमबैलेंस' कहा जाता है। W3Techs के वेब प्रौद्योगिकी सर्वेक्षणों के अनुसार, इंटरनेट की शीर्ष 1 करोड़ वेबसाइटों में 50% से 60% सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है, जबकि हिंदी का योगदान मात्र 0.1% से भी कम है वहीं, यूनेस्को और कॉमन क्रॉल (Common Crawl) के वैश्विक डेटासेट दर्शाते हैं कि संपूर्ण इंटरनेट के लिखित डेटाबेस का 99% से अधिक हिस्सा गैर-भारतीय भाषाओं के नियंत्रण में है, जिससे भारतीय भाषाओं की कुल डिजिटल हिस्सेदारी 1% से भी कम रह जाती है ।वर्ष 2026 के हालिया भाषाई अध्ययनों के अनुसार, दुनिया के सबसे उन्नत एआई मॉडल्स (जैसे GPT-5 श्रेणी के मॉडल) जब हिंदी सहित 11 प्रमुख भारतीय भाषाओं पर टेस्ट किए गए, तो सांस्कृतिक और प्रासंगिक सटीकता के मामले में उनका स्कोर मात्र 45% के आसपास रहा|यूनेस्को (UNESCO) की 'एथिक्स ऑफ एआई' रिपोर्ट ने आगाह किया है कि पश्चिमी एआई मॉडल्स दुनिया भर की स्थानीय भाषाओं का 'डिजिटल विलोपन' कर रहे हैं, क्योंकि वे हर भाषा को एक समान सांचे में ढालने की कोशिश 
करते हैं।आई मॉडल्स मुहावरों और चार-अक्षर वाले सामासिक पदों (Idioms) का शाब्दिक अनुवाद कर देते हैं। जैसे 'ऊँट के मुँह में जीरा' का अनुवाद कई बार एआई 'कमिन सीड इन कैमल्स माउथ' जैसी हास्यास्पद पंक्तियों में करता है, जिससे भाषा का सौंदर्य समाप्त हो जाता है।जब दिल्ली, लखनऊ या पटना का कोई छात्र इतिहास, समाजशास्त्र या साहित्य के किसी विषय पर एआई से संवाद करता है, तो एल्गोरिदम उसे इंटरनेट पर उपलब्ध लाखों सूचनाओं का एक 'औसत' निकाल कर दे देता है। इस औसत के चक्कर में भाषा का वह अनूठा रस गायब हो जाता है जिसे हम 'सांस्कृतिक बारीकियां' (Cultural Nuances) कहते हैं।मानविकी और कला का पूरा सौंदर्य वैचारिक असहमतियों और स्थानीय संदर्भों में होता है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में जहाँ 'कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी' की परंपरा रही हो, वहाँ कैलिफोर्निया के एयर-कंडीशनर कमरों में तैयार कोडिंग यह तय कर रही है कि भारत के छात्र को राष्ट्रवाद, प्रेम, अध्यात्म या लोक-संस्कृति को किस चश्मे से देखना चाहिए। एआई के पास कबीर की उलटबांसियों का व्याकरण तो हो सकता है, लेकिन कबीर की फक्कड़ता और लोक-चेतना को समझने वाला न्यूरल नेटवर्क उसके पास नहीं है। यह ज्ञान का एक नया केंद्रीकरण है, जिसे यदि हम 'ज्ञान की नई औपनिवेशिकता' कहें, तो गलत नहीं होगा।
प्रकाशन उधयोग एक नए संकट से जूझ रहा है. नए लेखकों के आलेख व्याकरण के दृष्टिकोण से तो एकदम शुद्ध होते हैं, लेकिन उनमें कोई 'आत्मा' या मौलिक गंध नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे किसी रोबोट ने शब्दों को तरतीब से सजा दिया हो। कारण साफ है— युवा पीढ़ी अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय या रामचंद्र शुक्ल को नहीं पढ़ रही, बल्कि वह चैटजीपीटी की स्क्रीन से भाषा सीख रही है।जब भाषा से उसके मुहावरे, उसकी लोकोक्तियाँ और उसकी स्थानीय गंध गायब हो जाती है, तो वह केवल संवाद का साधन रह जाती है, संस्कृति का संवाहक नहीं। मुहावरे समाज के सैकड़ों वर्षों के सामूहिक अनुभव और बुद्धिमत्ता से बनते हैं। जब एआई इन मुहावरों को 'अप्रासंगिक' या 'अनुवाद से बाहर' मानकर छोड़ देता है, तो हम अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कटने लगते हैं।इस संकट का समाधान तकनीक का बहिष्कार नहीं, बल्कि तकनीक का 'लोकाचार' (Localization) है।
 भारत सरकार के 'इंडिया-एआई मिशन' (IndiaAI Mission) के तहत अब स्वदेशी लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर काम शुरू हुआ है, ताकि भारतीय एआई सिस्टम पूरी तरह से भारतीयों द्वारा तैयार किए गए डेटा पर प्रशिक्षित हो सकें। 'सर्वम एआई' और 'भाषीणी' जैसे प्रयास इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं— लेकिन केवल कोडिंग बदलने से बात नहीं बनेगी।हमें एआई के प्रशिक्षण में केवल कंप्यूटर इंजीनियरों की नहीं, बल्कि भाषाविदों, लोक-कलाकारों, ग्रामीण महिलाओं और समाजशास्त्रियों की भागीदारी को अनिवार्य बनाना होगा। तकनीक को यह सिखाना होगा कि भारत में 'घी शक्कर' का मतलब केवल कैलरी नहीं, बल्कि असीम स्नेह और आशीर्वाद है। जब तक हम अपने डिजिटल इकोसिस्टम को अपनी मिट्टी के डेटा से नहीं सींचेंगे, तब तक स्क्रीन पर दिखने वाली हिंदी केवल एक 'अनुवादित विवशता' बनी रहेगी, हमारी 'जीवंत चेतना' नहीं। समय आ गया है कि हम एल्गोरिदम के इस अंग्रेजी चश्मे को उतारें, इससे पहले कि हमारी भाषा अपनी ही सरजमीं पर पराई हो जाए।
प्रभात खबर में 13/08/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, August 5, 2026

डिजीटल निर्भरता से जुड़े संकट

 
भारत की डिजिटल रूपांतरण की यात्रा ने जहाँ एक ओर आर्थिक समावेशन के नए द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर 'डिजिटल निर्भरता' (Digital Dependency) के रूप में एक जटिल मनो-सामाजिक संकट को भी जन्म दिया है। वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (indiabudget.gov.in) के नवीनतम अध्याय 'डिजिटल इंडिया और सामाजिक प्रभाव' में इस विषय पर गहन चिंता व्यक्त की गई है। स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है। कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही है, जो न खाया जा सकता है, न पिया जा सकता है, और न ही सूंघा जा सकता है। लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान अपने में सिमट रहा है।नतीजतन, हमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है।
अकादमिक शब्दावली में, डिजिटल निर्भरता केवल तकनीकी उपयोग की अधिकता नहीं है, बल्कि यह एक 'बाध्यकारी व्यवहारिक विकार' है। एक शोध के अनुसार, जब डिजिटल उपकरणों की अनुपस्थिति व्यक्ति में चिंता और कार्यात्मक शिथिलता (पैदा करने लगे, तो यह 'निर्भरता' की श्रेणी में आता है|भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2014 के 25 करोड़ से बढ़कर वर्तमान में लगभग 97 करोड़ हो चुकी है। भारतीयों द्वारा 2024 में स्मार्टफोन पर बिताए गए 1 लाख करोड़ घंटे हमारी श्रम उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। हालांकि डिजिटल अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान 13.42% तक पहुँच गया है, लेकिन इसके साथ ही 'डिजिटल फटीग' के कारण कार्यबल की मानसिक स्वास्थ्य लागत भी बढ़ी है।
डिजिटल निर्भरता के पीछे 'चॉइस आर्किटेक्चर' और सोशल मीडिया का 'एल्गोरिथमिक डिज़ाइन' एक प्रमुख कारक है। टेक कंपनियाँ 'डोपामाइन-लूप' और 'इनफिनिट स्क्रॉल' जैसे मनोवैज्ञानिक साधनों का उपयोग करती हैं। यह विशेष रूप से 15–24 वर्ष के युवाओं के संज्ञानात्मक विकास को बाधित कर रहा है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Attention Span) में लगातार  गिरावट देखी गई है। निम्हान्स SHUT क्लिनिक और Nielsen के 2025 के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों के 82% से अधिक युवा (15–24 वर्ष) 'डिजिटल व्यसन' के किसी न किसी स्तर से प्रभावित हैं। इसमें से लगभग 35% 'गंभीर' (Severe) श्रेणी में हैं, जो इंटरनेट के बिना अत्यधिक बेचैनी और शारीरिक तनाव महसूस करते हैं। डिजिटल निर्भरता का यह संकट अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत के 55% इंटरनेट उपभोक्ता अब गाँवों में बसते हैं। विडंबना यह है कि जहाँ ग्रामीण भारत में डिजिटल बुनियादी ढांचा तेजी से पहुँचा है, वहीं 'डिजिटल साक्षरता' का अभाव है। बिजनेस टुडे और इंटरनेट एंड मोबाईल एसोसिएशन के शोध बताते हैं कि ग्रामीण युवा दिन के औसतन 6 घंटे 'शॉर्ट वीडियो' और ऑनलाइन सट्टेबाजी में गँवा रहे हैं। यह स्थिति न केवल ग्रामीण उत्पादकता को बाधित कर रही है, बल्कि उचित परामर्श केंद्रों के अभाव में एक विशाल आबादी को मानसिक अवसाद की ओर धकेल रही है।
जहाँ भारत प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा के डिजिटलीकरण पर जोर दे रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश अब तकनीक के शुरुआती उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं।यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट  2024-25 (unesco.org) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि स्कूलों में स्मार्टफोन और टैबलेट का अनियंत्रित उपयोग सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के बजाय बच्चों की एकाग्रता और भावनात्मक स्थिरता को कम कर रहा है। भारत में जिस 'वन डिवाइस पर चाइल्ड' या 'स्मार्ट क्लासरूम' के मॉडल को सफलता माना जा रहा है, वैश्विक विशेषज्ञ इसे एक ऐसा प्रयोग मान रहे हैं जो पश्चिम में पहले ही विफल साबित हो चुका है। भारत "तकनीकी समाधानवाद" के जाल में फंसकर शिक्षा के मानवीय और संज्ञानात्मक पहलुओं को नजरअंदाज कर रहा है। विडंबना यह है कि भारत एक ऐसे 'डिजिटल प्रयोग' को बड़े पैमाने पर लागू कर रहा है जिसे विकसित देश पहले ही विफल मानकर त्याग चुके हैं। यह 'डिजिटल पुश' शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के नाम पर कहीं हमारे युवाओं की सोचने-समझने की मौलिक क्षमता को ही तो दांव पर नहीं लगा रहा?
स्वास्थ्य मंत्रालय की Tele-MANAS हेल्पलाइन (telemanas.mohfw.gov.in) ने 2022 से अब तक 20 लाख से अधिक कॉल प्राप्त की हैं , जिनमें डिजिटल तनाव एक प्रमुख कारक के रूप में उभरा निम्हान्स (NIMHANS )का SHUT (Service for Healthy Use of Technology) क्लिनिक (nimhans.ac.in) अब भारत में डिजिटल डिटॉक्स और व्यवहारिक सुधार का प्रमुख केंद्र बन गया है।
इसी उपचारात्मक पहल के तहत ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 के माध्यम से सरकार ने सट्टेबाजी आधारित एल्गोरिदम को विनियमित करने का प्रयास किया है, ताकि युवाओं को वित्तीय और मानसिक जोखिमों से बचाया जा सके। अब वह समय आ गया है जब हमें इंटरनेट को महज़ एक तकनीकी उपकरण मानना छोड़कर इसके गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों पर व्यापक विमर्श करना होगा। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की चेतावनी और वैश्विक देशों के अनुभवों से स्पष्ट है, डिजिटल निर्भरता कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान केवल डेटा की गति कम करने या विज्ञापनों को रोकने से हो जाएगा। यह एक व्यवहारिक संकट है, जो हमारी चेतना की गहराई तक पैठ बना चुका है।
एक 'विकसित भारत' और मानसिक रूप से सशक्त समाज के निर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकारों, नीति-निर्माताओं या ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 जैसे कानूनों पर नहीं छोड़ी जा सकती। सरकारें बुनियादी ढांचा दे सकती हैं, सुरक्षा नियम बना सकती हैं और Tele-MANAS (telemanas.mohfw.gov.in) जैसे हेल्पलाइन केंद्र खोल सकती हैं, लेकिन डिजिटल संयम का संस्कार अंततः व्यक्ति और परिवार को ही विकसित करना होगा।
हमें यह समझना होगा कि तकनीक का 'स्वामी' बनना है या उसका 'दास', यह चुनाव हमारा है। परिवारों को 'स्क्रीन-फ्री' संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा।जहां मोबाईल के बगैर भी जीवन को महसूस किया जा सके |
अंततः, डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात में नहीं मापी जानी चाहिए कि हमारे पास कितने जीबी डेटा या कितने करोड़ स्मार्टफोन हैं, बल्कि इस बात में मापी जानी चाहिए कि उस तकनीक का उपयोग करने वाला मस्तिष्क कितना स्वतंत्र, एकाग्र और रचनात्मक है। यदि हम अपनी सोचने की मौलिक क्षमता को तकनीक के एल्गोरिदम के हवाले कर देंगे, तो हम एक 'स्मार्ट' देश तो बन सकते हैं, लेकिन एक 'प्रबुद्ध' राष्ट्र कभी नहीं।
दैनिक जागरण में 05/08/2026 को प्रकाशित 
 

Tuesday, July 28, 2026

हमारा दिमाग खाली हो रहा है

 सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी संचय करने की प्रवृत्ति रही है। पहले गुफाओं में चित्र बने,अन्न को सहेजा सभ्यता का निर्माण हुआ|इंसान ने घर बनाना शुरू किया   फिर कागज़ पर इतिहास लिखा गया और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में हमने सब कुछ ‘कम्प्यूटर और हार्ड ड्राइव’ में सेव करना शुरू कर दिया। 'Ctrl + S' सिर्फ एक कमांड नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान को सुरक्षित रखने का हमारा डिजिटल रक्षा कवच बन गया था लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जनरेटिव एआई (जैसे ChatGPT, Claude, Gemini) के आगमन ने इस मानवीय आदत पर एक ऐसा प्रहार किया है, जिसकी चिंता  समाजशास्त्रियों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों सभी को  है । जब मनुष्य अपनी बनाई चीज़ों को सहेजना बंद कर देता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाता है। सभ्यताएं केवल निर्माण से नहीं, बल्कि संचय और संरक्षण से जीवंत रहती हैं।

 तकनीक की दुनिया में सहेजने की यह घटती आदत कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की रिपोर्ट भी इस बात को साबित करती हैं। माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन की मई 2024 की 'वर्क ट्रेंड इंडेक्स' रिपोर्ट बताती है कि आज दुनिया के 75% से ज्यादा दफ्तरी कामकाजी लोग  अपने रोज के काम, कोडिंग और रिसर्च के लिए सीधे एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर हमारे व्यवहार पर पड़ा है। साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई (Kaspersky) ने साल 2015-2016 के अपने एक बड़े शोध में इस आदत को 'डिजिटल विस्मृति' (Digital Amnesia) का नाम दिया था। इस रिसर्च के मुताबिक, 64% से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी चौबीसों घंटे मौजूद है, तो वे उसे अपने कंप्यूटर या दिमाग में सहेजने की मेहनत छोड़ चुके हैं। इसे विज्ञान में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहते हैं, यानी दिमाग पर जोर डालने और डेटा सुरक्षित रखने का काम इंसानों ने पूरी तरह मशीनों को सौंप दिया है। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हम चीज़ों को संभालकर रखने के पुराने दौर से निकलकर, हर चीज़ को तुरंत पा लेने  के एक ऐसे नए दौर में आ चुके हैं जहाँ हम पूरी तरह तकनीक के भरोसे हैं।

पिछले दो दशकों तक किसी भी डिजिटल क्रिएटर, लेखक, कोडर या छात्र के लिए सबसे बड़ा डर था— डेटा का खो जाना। बिजली गुल होने या सिस्टम क्रैश होने के डर से उंगलियां अनैच्छिक रूप से हर दो मिनट में 'Ctrl + S' दबा देती थीं। यह इस बात का प्रतीक था कि हम अपने द्वारा बनाए गए या खोजे गए कंटेंट के मालिक थे और उसे भविष्य के लिए सहेजना हमारी ज़िम्मेदारी थी।

आज जनरेटिव एआई ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कोई कोडर अपने कोड की लाइब्रेरी सेव नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि अगली बार ज़रूरत पड़ने पर एआई कुछ ही सेकंड में नया और बेहतर कोड लिख देगा। लेखक अपने रफ ड्राफ्ट सहेज कर नहीं रखते, और छात्र अपने रिसर्च नोट्स का बैकअप नहीं लेते। जब ज्ञान 'ऑन-डिमांड' (मांग पर) उपलब्ध हो, तो उसे सहेजने की मेहनत कौन करे? तकनीक की भाषा में इसे 'एल्गोरिद्मिक री-जेनरेशन' कहा जाता है, जहाँ संचय की आवश्यकता ही समाप्त हो रही है।

इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय असर बेहद गहरा है। 

  साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो द्वारा 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक प्रसिद्ध शोध में पहली बार 'गूगल इफेक्ट' को दुनिया के सामने रखा गया था, जिसमें शोधकर्ताओं ने ये निष्कर्ष निकाला था कि जब लोगों को पता होता है कि जानकारी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगी, तो हमारा दिमाग जानकारी को याद रखने के बजाय 'यह कहाँ मिलेगी' उस रास्ते को याद रखता है।

जनरेटिव एआई के दौर में यह 'गूगल इफेक्ट' अब 'एआई एम्नेशिया' (AI Amnesia) या डिजिटल विस्मृति में बदल चुका है। हम फोन नंबर याद रखने की आदत पहले ही खो चुके थे, अब हम विचारों के तार्किक ढांचे को भी याद रखना छोड़ रहे हैं।जब हम किसी चीज़ को 'सेव' करते हैं, तो हम उसे एक श्रेणी (Folder) देते हैं, जो हमारे मस्तिष्क में एक न्यूरल पाथवे बनाती है। सेव न करने का मतलब है कि हम उस ज्ञान के साथ अपना मानसिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं।सब कुछ तात्कालिक और क्षणभंगुर हो गया है। जो चीज़ सहेजी नहीं जाती, वह मस्तिष्क के लिए भी अस्थायी हो जाती है।

जब हमने 'सेव' करना छोड़ दिया, तो हमने अनजाने में अपने ज्ञान का मालिकाना हक भी छोड़ दिया। पुराना डेटा जो हम सेव करते थे, वह हमारा व्यक्तिगत इतिहास था। उसमें हमारी कमियां, हमारे सुधार और हमारी मौलिक सोच के निशान थे।

आज हम जो कुछ भी लिख रहे हैं या बना रहे हैं, वह सीधे एआई के सर्वरों पर जा रहा है। यदि कल को ये एआई टूल्स सशुल्क (Paid) हो जाते हैं या इनका सर्वर डाउन हो जाता है, तो हमारे पास अपने काम का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। यह ज्ञान की एक नई औपनिवेशिकता है, जहाँ हमारा व्यक्तिगत बौद्धिक डेटा कुछ चुनिंदा सिलिकॉन वैली की कंपनियों के नियंत्रण में है । हम इतिहास के सबसे बड़े 'कंटेंट क्रिएटर' तो बन गए हैं, लेकिन हमारे पास अपना खुद का कोई 'आर्काइव' (संग्रह) नहीं है।

यह सच है कि तकनीक हमारे काम को आसान बनाती है और समय बचाती है। एआई ने हमें उत्पादकता की एक नई अंधी रफ़्तार दी है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंप्यूटर की 'रैंडम एक्सेस मेमोरी'  की तरह यदि मनुष्य भी केवल तात्कालिक प्रोसेसिंग पर निर्भर हो जाएगा, तो उसकी दीर्घकालिक बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाएगी। जो मानव सभ्यता के विकास का मूल आधार है |

'Ctrl + S' केवल एक तकनीकी शॉर्टकट नहीं था, वह हमारी चेतना का एक हिस्सा था जो कहता था— "यह विचार मूल्यवान है, इसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।" यदि हम पूरी तरह से डिजिटल विस्मृति के इस प्रवाह में बह गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें।

 अमर उजाला में 28/07/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, July 15, 2026

डाक टिकटों के झरोखों से दुनिया देखना

 

आज सुबह अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से पुरानी किताबों को हटा रहा था, तो अचानक धूल से सनी एक डायरी नीचे आ गिरी । यह कोई साधारण डायरी नहीं थी, बल्कि मेरी 'स्टैम्प कलेक्शन बुक' (डाक टिकट संग्रह पुस्तिका) थी । पन्ने पलटे तो देखा कि आखिरी डाक टिकट संभवतः सन् 1994 में लगाया गया था । उसे छूते ही बीते वक्त की एक सोंधी सी महक कमरे में तैर गई । मन स्मृतियों के उस गलियारे में चला गया जहाँ जीवन स्क्रीन की रफ़्तार से नहीं, बल्कि सब्र और सुकून के सुरों में ढला था ।

आज की सोशल मीडिया वाली पीढ़ी जब पूछती है कि "आपकी हॉबी क्या है?" तो उनका आशय ऑनलाइन गेमिंग, नेटफ्लिक्स बिंज-वॉचिंग या रील्स स्क्रॉलिंग से होता है । लेकिन हमारे दौर में शौक का मतलब वर्चुअल दुनिया के 'लाइक और व्यूज' बटोरना नहीं, बल्कि भौतिक रूप से जिंदगी को जीना और महसूस करना होता था । तब हम बड़े गर्व से कहते थे—"डाक टिकट इकट्ठा करना।"
सच तो यह है कि इंटरनेट ने सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान नहीं किया, बल्कि हमारे जीवन के उन तमाम खूबसूरत और रचनात्मक शौकों को भी चुपचाप लील लिया, जो कभी हमारी शख्सियत का अहम हिस्सा हुआ करते थे ।
सोशल मीडिया के इस शोर-शराबे वाले युग से पहले, हम देश और दुनिया को इंटरनेट या गूगल से नहीं, बल्कि डाक टिकटों और पुराने सिक्कों के झरोखे से देखा करते थे । उन अभावों के दिनों में भी जेनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) के चक्कर इस उम्मीद में लगा लेते थे कि देखें आज कौन सा नया डाक टिकट आया है । जेबें खाली होती थीं, इसलिए खिड़की से टिकट खरीद तो नहीं पाते थे, लेकिन दोस्तों की दरियादिली और चिट्ठियों से उतरे टिकट ही हमारे संग्रह की जागीर बनते थे । लिफाफे से भाप देकर टिकट उतारना किसी वैज्ञानिक प्रयोग जैसा रोमांचक था । आज कूरियर और ईमेल के इनबॉक्स ने टिकट संग्रह के उस पूरे रोमांच को ही दफ़न कर दिया है ।हम उन दिनों बहुत सी चीजें बस यूं ही किया करते थे वो यूज एण्ड थ्रो का जमाना नहीं था |हमारी पीढ़ी के लोग सब सहेज लेना चाहते थे चाहे वो शौक हो या यादें वो भी बगैर किसी कारण से |अब देखिए न इंटरनेट और स्पॉटिफ़ाई (Spotify) ने संगीत को हमारे अँगूठों पर ला दिया है, लेकिन इसने ऑडियो कैसेट इकट्ठा करने और सहेजने के उस दीवाने शौक को मार डाला। अपनी पसंदीदा फिमों के गानों की खुद 'मिक्सिंग' करवाकर कैसेट तैयार करवाना और जब रील फंस जाए तो पेंसिल डालकर उसे धीरे-धीरे री-वाइंड करना—यह केवल एक शौक नहीं, संगीत से रिश्ता जोड़ने का हमारा तरीका था। इसी तरह शनिवार की शाम वीसीआर किराये पर लाना और पड़ोसियों को इकट्ठा करके फिल्म देखना एक त्योहार जैसा शौक था, जिसे आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के 'अकेलेपन' ने पूरी तरह खत्म कर दिया है।
चिट्ठियाँ लिखने और मीलों दूर बैठे किसी अनजान 'पेन-फ्रेंड' (पत्र-मित्र) से दोस्ती निभाने का शौक हमारी पीढ़ी की सबसे खूबसूरत याद है । हम पंद्रह-पंद्रह दिन एक अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड के आने का इंतजार करते थे । उस इंतज़ार में एक रूहानी सुकून था। आज वॉट्सऐप के इंस्टेंट 'ब्लू टिक' ने संदेशों की गति तो बढ़ा दी, लेकिन शब्दों के भीतर की उस गर्माहट और हाथ की लिखावट के अहसास को सुखा दिया ।
इसी तरह, मशहूर हस्तियों, शिक्षकों या दोस्तों से उनकी ऑटोग्राफ बुक में कुछ पंक्तियाँ लिखवाना और उनके हस्ताक्षर सहेजना एक लोकप्रिय शौक था। आज उसकी जगह 'सेल्फी' के ठंडे और बेजान पिक्सल्स ने ले ली है।
नब्बे के दशक तक, गर्मियों की दोपहर में किराये की दुकान से दो रुपये में 'राज कॉमिक्स', 'डायमंड कॉमिक्स' या 'चाचा चौधरी' लाकर छुपकर पढ़ना हर बच्चे का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था । उन पन्नों की महक और तस्वीरों की रंगीन दुनिया हमें कल्पनाओं के असीमित ब्रह्मांड में ले जाती थी। आज वह कॉमिक्स कल्चर, किताबों की छोटी दुकानें और पुस्तकालयों का ठहराव 'पीडीएफ संस्कृति', रील्स और किंडल स्क्रीन के सामने पूरी तरह दम तोड़ चुका है ।
आज की पीढ़ी अपनी हॉबी की भी १५ सेकंड की रील बना देती है । वहाँ शौक को जीने का संतोष नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने और 'लाइक्स' बटोरने का एक अदृश्य सामाजिक दबाव है । सोचता हूँ, अगर हमारे ज़माने में सोशल मीडिया या इंटरनेट होता, तो क्या हम इन शौकों को इतनी शिद्दत से जी पाते? शायद नहीं। हमारे समय के शौक हमें 'सब्र', 'तटस्थता' और 'एकाग्रता' सिखाते थे।
खैर, जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है; वक्त के पहिये को पीछे नहीं घुमाया जा सकता । डिजिटल क्रांति ने हमें आधुनिक और चौबीसों घंटे 'कनेक्टेड' तो बना दिया, लेकिन बदले में हमसे हमारी रचनात्मकता और हमारे वो मासूम शौक छीन लिए जो हमें एक संवेदनशील इंसान बनाते थे । अलमारी में बंद वह पुरानी स्टैम्प बुक और धूल खाती डायरियाँ आज केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट के मायाजाल में फँसने से पहले के उस बेहद खूबसूरत, धीमे और ठहर कर जीने वाले दौर का जीवंत दस्तावेज़ हैं ।
प्रभात खबर में 15/07/2026  को प्रकाशित 

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