Wednesday, July 15, 2026
डाक टिकटों के झरोखों से दुनिया देखना
Thursday, July 9, 2026
डिजीटल क्रांति का नया अध्याय
IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
Thursday, June 25, 2026
एल्गोरिदम की दुनिया का दूसरा पहलू
आमतौर पर सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), आदि को सामान्य जनमानस के विचारों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि सोशल मीडिया सही मायने में एक ऐसा मीडिया है, जो किसी भी तरह के दबाव से मुक्त है। पिछले कुछ समय से जनमत के निर्माण में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन सूचना साम्राज्यवाद के इस दौर में इंटरनेट भी सूचना के मुक्त प्रवाह का विकल्प बनकर नहीं उभर पा रहा है। यह एक ऐसे मायाजाल का निर्माण करता है जिसमें सब कुछ वास्तविक लगते हुए भी वास्तविक नहीं लगता है। इस मायाजाल की जड़ें केवल वैचारिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सबसे हिंसक प्रहार समाज के सबसे कमजोर और असुरक्षित तबके पर हो रहा है, जिसकी पुष्टि वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं के दस्तावेज़ भी करते हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की हालिया 'सुरक्षा और तकनीक' रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर की सरकारें और सीमा सुरक्षा बल अब प्रवासियों की पात्रता तथा आयु की जांच के लिए 'एआई फेशियल रिकग्निशन' तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। इन रिपोर्टों में यह प्रमाणित किया गया है कि ये ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिदम अश्वेतों, महिलाओं और प्रवासियों के प्रति जन्मजात रूप से पूर्वाग्रही हैं, जो बड़े पैमाने पर मानवीय बहिष्करण को जन्म दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों को अलग-थलग करने वाला यह तकनीकी पूर्वाग्रह जब भारत के भीतर प्रवेश करता है, तो यह यहाँ सदियों से मौजूद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के साथ मिलकर और अधिक हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि पहले से ही मुख्यधारा से कटे हुए समाज के हिस्से इस डिजिटल ढांचे में और पीछे छूटते चले जाते हैं।
भारतीय संदर्भ में यह एल्गोरिद्मिक रंगभेद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों को और गहरा कर रहा है। देश में इंटरनेट उपयोग में लैंगिक असमानता गहरी बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और GSMA Mobile Gender Gap Report के अनुसार, पुरुषों में इंटरनेट उपयोग दर लगभग 57% है, जबकि महिलाओं में यह केवल 33% है। मोबाइल इंटरनेट उपयोग में भी महिलाएँ पुरुषों से लगभग 50% पीछे हैं। इसके अलावा, डिजिटल कौशल में पुरुषों की भागीदारी 22.78% है, जबकि महिलाओं की केवल 13.91%। यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुँच में लैंगिक असमानता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है। इस संरचनात्मक अंतर के कारण एल्गोरिदम पर अंग्रेजी और कुछ गिने-चुने शहरी केंद्रों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जिसके चलते ग्रामीण भारत और क्षेत्रीय विमर्शों को एल्गोरिदम 'ट्रेंडिंग' की मुख्यधारा से बाहर कर देता है।
पहुंच और कौशल का यह लैंगिक व क्षेत्रीय अंतर जब एक ओर आम नागरिक को हाशिए पर धकेलता है, तो वहीं दूसरी ओर जो लोग इस डिजिटल स्पेस के भीतर मौजूद हैं, उनके लिए यह वर्चुअल दुनिया एक गहरे अविश्वास और असुरक्षा का मैदान बन जाती है। मुख्यधारा का विमर्श अब सत्य और असत्य के बीच के भेद को ही समाप्त करने पर आमादा है, जिसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनियंत्रित विकास काम कर रहा है। डिजिटल स्पेस में अब सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 और 2026 के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित भ्रामक सामग्री और डीपफेक आज वैश्विक लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। एआई टूल्स का दुरुपयोग करके किसी भी व्यक्ति या विचार की सामाजिक हैसियत और गरिमा को पल भर में नष्ट किया जा सकता है।
विश्वसनीयता के इस संकट की भयावहता का अंदाज़ा महज़ कुछ सैद्धांतिक चेतावनियों से नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहे विस्फोटक आंकड़ों से लगाया जा सकता है। Resemble.AI की रिपोर्ट (2025) के अनुसार डीपफेक सामग्री की मात्रा में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। 2019 में जहाँ केवल 14,000 डीपफेक वीडियो मौजूद थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 8 मिलियन तक पहुँच गई — यानी लगभग 571 गुना वृद्धि। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 की तीसरी तिमाही तक हर तिमाही में औसतन 2,031 डीपफेक घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 1,500% अधिक है। तकनीक की यह हिंसक बाढ़ जहां एक तरफ भ्रामक विमर्शों को जन्म देती है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई सचेत नागरिक इन बाधाओं को पार करके अपनी स्वतंत्र असहमति या प्रतिरोध दर्ज कराना चाहता है, तो इस तंत्र के पास उसकी आवाज़ को घोंटने के लिए और भी सूक्ष्म, अदृश्य हथकंडे मौजूद हैं।
इन बाधाओं को पार करके कोई यूजर अगर अपनी असहमति दर्ज कराता है तो उसके 'शैडो-बैनिंग' किये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वर्चुअल मंचों पर वैचारिक विरोध को दबाने के लिए 'शैडो-बैनिंग' जैसी अदृश्य सेंसरशिप का सहारा लिया जाता है। यूरोपीय डिजिटल राइट्स (EDRi) जैसी डिजिटल राइट्स वॉचडॉग संस्थाओं के शोध दर्शाते हैं कि बड़े टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों को बचाने के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े की-वर्ड्स की 'रीच' को बैकएंड से ही दबा देते हैं। इसमें यूज़र के अकाउंट को ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी रीच को शून्य कर दिया जाता है। यूज़र को लगता है कि वह स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा है, पर वास्तव में उसकी आवाज़ को एक तकनीकी पिंजरे में कैद कर दिया जाता है जहाँ कोई दूसरा उसे सुन ही नहीं पाता। यह 'सूचना साम्राज्यवाद' का सबसे सूक्ष्म और हिंसक स्वरूप है।
अभिव्यक्ति को कुचलने वाली यह अदृश्य सेंसरशिप किसी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा रही, बल्कि यह सिलिकॉन वैली के वैश्विक तकनीकी एकाधिकारों की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसी कारण, वैश्विक स्तर पर तकनीकी नियंत्रण और नैतिकता को लेकर चिंताएं केवल अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाएं भी इस तकनीकी निरंकुशता को नियंत्रित करने के विकल्प तलाश रही हैं। सिलिकॉन वैली की कुछ गिने-चुने तकनीकी एकाधिकारों ने वैश्विक विमर्श को इस कदर जकड़ लिया है कि तकनीकी मंचों द्वारा फैलाए जा रहे ध्रुवीकरण और व्यावसायिक अंधाधुंधता से आज वैश्विक संस्थाएं भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूनेस्को द्वारा लगातार 'एथिक्स ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Ethics of AI) पर वैश्विक नियम जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी अब यह बहस तेज है कि क्या यूरोपीय संघ के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट' (EU AI Act) जैसे कड़े कानूनी मानदंडों और तकनीकी नैतिकता के अंतर्निहित सिद्धांतों के बिना इस बेलगाम तकनीक को इंसानी नियंत्रण के दायरे में वापस लाया जा सकता है? जब तक एआई और एल्गोरिदम के विकास में नैतिक मानदंडों और सामाजिक सुरक्षा को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल शक्तिशाली देशों और वैश्विक कंपनियों के हितों को साधने वाला 'डिजिटल रंगभेद' ही बनी रहेगी।
इस वैश्विक विमर्श के आलोक में, भारत जैसे समाज को यह गहराई से समझना होगा कि जो तकनीक ऊपरी तौर पर जितनी आकर्षक और तटस्थ दिखाई देती है, उसके नेपथ्य में उतने ही गहरे व्यावसायिक और वैचारिक हित छिपे होते हैं। तकनीकी निर्भरता के इस दौर में भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि कोई भी एल्गोरिदम या तकनीक कभी 'न्यूट्रल' या निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा अपने निर्माता के आर्थिक लाभ और राजनीतिक दृष्टिकोण से संचालित होती है। यदि हमें इंटरनेट को इस 'अदृश्य डिजिटल पिंजरे' और वैचारिक रंगभेद से मुक्त कराना है, तो मात्र भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (DPDP Act) जैसे विनियामक कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए हमें तकनीकी कंपनियों के बैकएंड कोड्स की सार्वजनिक ऑडिटिंग, स्वदेशी डेटा संप्रभुता और एआई प्रणालियों में सामाजिक न्याय के अंतर्निहित सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक के इस उपभोगवादी और दमनकारी तंत्र के सामने मूक दर्शक या केवल 'उपभोक्ता' बनने के बजाय, एक सचेत, प्रश्नकर्ता और प्रतिरोधी 'डिजिटल नागरिक' की भूमिका का निर्वाह करें।
अमर उजाला में 25/06/2026 को प्रकाशित लेख
Friday, June 19, 2026
बिना इंटरनेट वाला बचपन
बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!
Thursday, June 11, 2026
एआई में बढ़ते निवेश से बदलता परिदृश्य
Saturday, May 23, 2026
ए आई अवतार और स्मृतियों का कारोबार
ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म 'ग्रैंड व्यू रिसर्च' (होराईजन डाटा बुक ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 'एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग' और 'डिजिटल लेगेसी सर्विसेज' (जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है) का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। साल 2023 में भारतीय बाजार का कुल आकार 1,737.1 मिलियन डॉलर था। रिपोर्ट का अनुमान है कि यह बाजार 7.4% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ते हुए साल 2030 तक 2,820.20 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। इस अभूतपूर्व वृद्धि दर के साथ भारत इस क्षेत्र में एशिया-पैसिफिक का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बन चुका है।ये मामला सिर्फ बाजार का नहीं बल्कि इसके अनेक मनोवैज्ञानिक और विधिक पहलू भी हैं |जिन पर लोगों का ध्यान काम जा रहा है |
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद 'शोक मनाना' एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इंसान पहले रोता है, तड़पता है, इनकार की स्थिति से गुजरता है और अंत में उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। लेकिन 'ग्रीफ टेक' इंसान को शोक की पहली अवस्था यानी 'इनकार' में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।
जब आपके पास एक ऐसा 'घोस्ट बॉट' या डिजिटल क्लोन हो जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी हूबहू आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो मानव मस्तिष्क कभी उस मृत्यु को स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यह तकनीक इंसान को एक अंतहीन अवसाद और 'अवास्तविक दुनिया' में धकेल सकती है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु को एक महायात्रा माना गया है। जहां 'तर्पण', 'श्राद्ध' और 'अंतिम संस्कार' के जरिए मृत आत्मा को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और उसकी स्मृतियों को दिल में एक पवित्र धरोहर के रूप में सहेजा जाता है। लेकिन एआई तकनीक मृत व्यक्ति को एक 'इंटरैक्टिव प्रोडक्ट' में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक हमें अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है जो वास्तव में हमारी मानवीय गरिमा को तहस नहस कर सकती है भारत का 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' मुख्य रूप से जीवित नागरिकों के डेटा अधिकारों की बात करता है। लेकिन मृत व्यक्ति के व्यक्तिगत के आंकड़ों का कैसा और कहाँ तक इस्तेमाल हो सकता है ?क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी 'डिजिटल आत्मा' को फिर से बनाने का अधिकार टेक कंपनियों या उनके परिवार को होना चाहिए, यह बड़ा सवाल है|
मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी मृत व्यक्ति के 'डिजिटल अवतार' के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो किन परिस्थितियों में उनका डिजीतल अवतार बनाया जा सकता है । यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में 'प्रोजेक्ट दिसंबर' और 'सीयांस एआई' जैसी कंपनियां सस्ते में चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं।जो चैट जी पी टी जैसे मॉडल्स पर चलता है। और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है।इनका उद्देश्य उद्देश्य शोक में मदद करना है, लेकिन इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डेटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा।
ए आई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा चढ़ा कर या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें मजाक, अश्लील समाग्री , और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं |वैसे भी मृत व्यक्ति खुद को बचा नहीं सकता। उस की "डिजिटल छवि" को तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। इससे पहले कि यह समस्या गंभीर हो यह नीति नियंताओं की जिम्मेदारी है कि केवल कानूनी स्तर पर 'मरणोपरांत भूल जाने के अधिकार' को कड़ाई से परिभाषित किया जाए, बल्कि एक संवेदनशील समाज के रूप में हम यह भी समझें कि अपनों को खोने का दर्द सहना और उन्हें सम्मान के साथ विदा करना ही इंसान होने की पहली शर्त है। स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी लगती हैं न कि कोडिंग के जरिए कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए 'डिजिटल भूतों' में ।
Tuesday, May 12, 2026
जीवन के संघर्ष का हमराही है गमछा
इसके
उपयोगों की सूची इतनी लंबी है कि इस पर शोध पत्र लिखा जा सकता है।सुरक्षा कवच: चिलचिलाती धूप में यही गमछा हेलमेट के नीचे पसीने का दुश्मन बनता है
और चेहरे पर लपेट लिया जाए तो 'डाकू' लुक के साथ-साथ लू से भी बचाता है।बाजार गए और थैला भूल गए? कोई बात नहीं। गमछे के दो कोनों में गांठ लगाइए और देखिए कैसे यह दो
किलो आलू और एक किलो टमाटर का बोझ हंसते-हंसते उठा लेता है.गाँव की पगडंडियों पर
जब प्यास लगे, तो इसी गमछे की चार परतें पानी छानने
के काम आती हैं।किसी पार्क की बेंच गंदी हो या बस की सीट पर धूल हो, गमछा बिछाइए और 'महाराजा' की तरह विराजमान हो जाइए।आज की दुनिया 'सस्टेनेबिलिटी' और 'ईको-फ्रेंडली' होने का ढोंग
कर रही है, लेकिन गमछा जन्मजात पर्यावरण प्रेमी
है। तौलिए को धोने के लिए आपको बाल्टी भर पानी और ढेर सारे डिटर्जेंट की जरूरत
पड़ती है, क्योंकि उसकी घनी बुनाई मैल को पकड़
कर बैठ जाती है।
इसके
विपरीत, गमछा 'मिनिमलिस्ट' है। आधा बाल्टी
पानी और एक बार साबुन की टिकिया उस पर फिरा दी जाए, तो वह चमक उठता है।सबसे बड़ी बात इसके सूखने की रफ्तार है। पंखे की हवा
में भी यह दस मिनट में सूखकर तैयार हो जाता है। तौलिए की तरह इसे 'ड्रायर' की जरूरत नहीं
पड़ती। इसका मतलब है—कम पानी, कम बिजली और कम
प्रदूषण। जब गमछा पुराना हो जाता है, तब भी
वह हार नहीं मानता। वह 'पोछे' के रूप में पदोन्नत होकर घर की सफाई करता है और अंत में मिट्टी में
मिलकर विलीन हो जाता है। यह 'जीरो वेस्ट' जीवनशैली का असली ब्रांड एंबेसडर है।वहीं तौलिया आपको आलसी बनाता है।
नहाने के बाद भारी तौलिए में लिपटे रहना एक सामंती सुख दे सकता है, लेकिन गमछा आपको फुर्ती देता है। गमछा कंधे पर हो, तो इंसान काम करने के लिए तैयार रहता है। यह श्रम की पहचान है। एक तरफ
तौलिया है जो फाइव स्टार होटलों के सफेद कमरों में शोभा बढ़ाता है, और दूसरी तरफ गमछा है जो खेत की मेड़ से लेकर ऑफिस की कुर्सी तक हर जगह
अपनी जगह बना लेता है।
अंत
में, यदि हम उपयोगिता, पर्यावरण और बहुमुखी प्रतिभा के तराजू पर तौलिए और गमछे को तौलें, तो गमछे का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। तौलिया एक जरूरत हो सकती है, लेकिन गमछा एक संस्कार है। यह हमें बताता है कि जीवन की जटिलताओं को
सुलझाने के लिए किसी भारी-भरकम समाधान की नहीं, बल्कि एक हल्के और लचीले व्यवहार की जरूरत है।इसलिए, अगली बार जब आप किसी मॉल में महंगे आयातित तौलिए को देखें, तो मुस्कुराइए और अपने कंधे पर रखे उस दो मीटर के सूती जादू को सहलाइए, जो न केवल आपका बदन सुखाता है, बल्कि आपकी संस्कृति को भी जिंदा रखता है। तौलिया सिर्फ नहाने के बाद
का साथी है, पर गमछा जीवन के हर संघर्ष का हमराही
है।
प्रभात खबर में 12/05/2026 को प्रकाशित लेख






