Wednesday, August 5, 2026

डिजीटल निर्भरता से जुड़े संकट

 
भारत की डिजिटल रूपांतरण की यात्रा ने जहाँ एक ओर आर्थिक समावेशन के नए द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर 'डिजिटल निर्भरता' (Digital Dependency) के रूप में एक जटिल मनो-सामाजिक संकट को भी जन्म दिया है। वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (indiabudget.gov.in) के नवीनतम अध्याय 'डिजिटल इंडिया और सामाजिक प्रभाव' में इस विषय पर गहन चिंता व्यक्त की गई है। स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है। कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही है, जो न खाया जा सकता है, न पिया जा सकता है, और न ही सूंघा जा सकता है। लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान अपने में सिमट रहा है।नतीजतन, हमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है।
अकादमिक शब्दावली में, डिजिटल निर्भरता केवल तकनीकी उपयोग की अधिकता नहीं है, बल्कि यह एक 'बाध्यकारी व्यवहारिक विकार' है। एक शोध के अनुसार, जब डिजिटल उपकरणों की अनुपस्थिति व्यक्ति में चिंता और कार्यात्मक शिथिलता (पैदा करने लगे, तो यह 'निर्भरता' की श्रेणी में आता है|भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2014 के 25 करोड़ से बढ़कर वर्तमान में लगभग 97 करोड़ हो चुकी है। भारतीयों द्वारा 2024 में स्मार्टफोन पर बिताए गए 1 लाख करोड़ घंटे हमारी श्रम उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। हालांकि डिजिटल अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान 13.42% तक पहुँच गया है, लेकिन इसके साथ ही 'डिजिटल फटीग' के कारण कार्यबल की मानसिक स्वास्थ्य लागत भी बढ़ी है।
डिजिटल निर्भरता के पीछे 'चॉइस आर्किटेक्चर' और सोशल मीडिया का 'एल्गोरिथमिक डिज़ाइन' एक प्रमुख कारक है। टेक कंपनियाँ 'डोपामाइन-लूप' और 'इनफिनिट स्क्रॉल' जैसे मनोवैज्ञानिक साधनों का उपयोग करती हैं। यह विशेष रूप से 15–24 वर्ष के युवाओं के संज्ञानात्मक विकास को बाधित कर रहा है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Attention Span) में लगातार  गिरावट देखी गई है। निम्हान्स SHUT क्लिनिक और Nielsen के 2025 के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों के 82% से अधिक युवा (15–24 वर्ष) 'डिजिटल व्यसन' के किसी न किसी स्तर से प्रभावित हैं। इसमें से लगभग 35% 'गंभीर' (Severe) श्रेणी में हैं, जो इंटरनेट के बिना अत्यधिक बेचैनी और शारीरिक तनाव महसूस करते हैं। डिजिटल निर्भरता का यह संकट अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत के 55% इंटरनेट उपभोक्ता अब गाँवों में बसते हैं। विडंबना यह है कि जहाँ ग्रामीण भारत में डिजिटल बुनियादी ढांचा तेजी से पहुँचा है, वहीं 'डिजिटल साक्षरता' का अभाव है। बिजनेस टुडे और इंटरनेट एंड मोबाईल एसोसिएशन के शोध बताते हैं कि ग्रामीण युवा दिन के औसतन 6 घंटे 'शॉर्ट वीडियो' और ऑनलाइन सट्टेबाजी में गँवा रहे हैं। यह स्थिति न केवल ग्रामीण उत्पादकता को बाधित कर रही है, बल्कि उचित परामर्श केंद्रों के अभाव में एक विशाल आबादी को मानसिक अवसाद की ओर धकेल रही है।
जहाँ भारत प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा के डिजिटलीकरण पर जोर दे रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश अब तकनीक के शुरुआती उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं।यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट  2024-25 (unesco.org) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि स्कूलों में स्मार्टफोन और टैबलेट का अनियंत्रित उपयोग सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के बजाय बच्चों की एकाग्रता और भावनात्मक स्थिरता को कम कर रहा है। भारत में जिस 'वन डिवाइस पर चाइल्ड' या 'स्मार्ट क्लासरूम' के मॉडल को सफलता माना जा रहा है, वैश्विक विशेषज्ञ इसे एक ऐसा प्रयोग मान रहे हैं जो पश्चिम में पहले ही विफल साबित हो चुका है। भारत "तकनीकी समाधानवाद" के जाल में फंसकर शिक्षा के मानवीय और संज्ञानात्मक पहलुओं को नजरअंदाज कर रहा है। विडंबना यह है कि भारत एक ऐसे 'डिजिटल प्रयोग' को बड़े पैमाने पर लागू कर रहा है जिसे विकसित देश पहले ही विफल मानकर त्याग चुके हैं। यह 'डिजिटल पुश' शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के नाम पर कहीं हमारे युवाओं की सोचने-समझने की मौलिक क्षमता को ही तो दांव पर नहीं लगा रहा?
स्वास्थ्य मंत्रालय की Tele-MANAS हेल्पलाइन (telemanas.mohfw.gov.in) ने 2022 से अब तक 20 लाख से अधिक कॉल प्राप्त की हैं , जिनमें डिजिटल तनाव एक प्रमुख कारक के रूप में उभरा निम्हान्स (NIMHANS )का SHUT (Service for Healthy Use of Technology) क्लिनिक (nimhans.ac.in) अब भारत में डिजिटल डिटॉक्स और व्यवहारिक सुधार का प्रमुख केंद्र बन गया है।
इसी उपचारात्मक पहल के तहत ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 के माध्यम से सरकार ने सट्टेबाजी आधारित एल्गोरिदम को विनियमित करने का प्रयास किया है, ताकि युवाओं को वित्तीय और मानसिक जोखिमों से बचाया जा सके। अब वह समय आ गया है जब हमें इंटरनेट को महज़ एक तकनीकी उपकरण मानना छोड़कर इसके गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों पर व्यापक विमर्श करना होगा। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की चेतावनी और वैश्विक देशों के अनुभवों से स्पष्ट है, डिजिटल निर्भरता कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान केवल डेटा की गति कम करने या विज्ञापनों को रोकने से हो जाएगा। यह एक व्यवहारिक संकट है, जो हमारी चेतना की गहराई तक पैठ बना चुका है।
एक 'विकसित भारत' और मानसिक रूप से सशक्त समाज के निर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकारों, नीति-निर्माताओं या ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 जैसे कानूनों पर नहीं छोड़ी जा सकती। सरकारें बुनियादी ढांचा दे सकती हैं, सुरक्षा नियम बना सकती हैं और Tele-MANAS (telemanas.mohfw.gov.in) जैसे हेल्पलाइन केंद्र खोल सकती हैं, लेकिन डिजिटल संयम का संस्कार अंततः व्यक्ति और परिवार को ही विकसित करना होगा।
हमें यह समझना होगा कि तकनीक का 'स्वामी' बनना है या उसका 'दास', यह चुनाव हमारा है। परिवारों को 'स्क्रीन-फ्री' संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा।जहां मोबाईल के बगैर भी जीवन को महसूस किया जा सके |
अंततः, डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात में नहीं मापी जानी चाहिए कि हमारे पास कितने जीबी डेटा या कितने करोड़ स्मार्टफोन हैं, बल्कि इस बात में मापी जानी चाहिए कि उस तकनीक का उपयोग करने वाला मस्तिष्क कितना स्वतंत्र, एकाग्र और रचनात्मक है। यदि हम अपनी सोचने की मौलिक क्षमता को तकनीक के एल्गोरिदम के हवाले कर देंगे, तो हम एक 'स्मार्ट' देश तो बन सकते हैं, लेकिन एक 'प्रबुद्ध' राष्ट्र कभी नहीं।
दैनिक जागरण में 05/08/2026 को प्रकाशित 
 

Tuesday, July 28, 2026

हमारा दिमाग खाली हो रहा है

 सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी संचय करने की प्रवृत्ति रही है। पहले गुफाओं में चित्र बने,अन्न को सहेजा सभ्यता का निर्माण हुआ|इंसान ने घर बनाना शुरू किया   फिर कागज़ पर इतिहास लिखा गया और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में हमने सब कुछ ‘कम्प्यूटर और हार्ड ड्राइव’ में सेव करना शुरू कर दिया। 'Ctrl + S' सिर्फ एक कमांड नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान को सुरक्षित रखने का हमारा डिजिटल रक्षा कवच बन गया था लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जनरेटिव एआई (जैसे ChatGPT, Claude, Gemini) के आगमन ने इस मानवीय आदत पर एक ऐसा प्रहार किया है, जिसकी चिंता  समाजशास्त्रियों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों सभी को  है । जब मनुष्य अपनी बनाई चीज़ों को सहेजना बंद कर देता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाता है। सभ्यताएं केवल निर्माण से नहीं, बल्कि संचय और संरक्षण से जीवंत रहती हैं।

 तकनीक की दुनिया में सहेजने की यह घटती आदत कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की रिपोर्ट भी इस बात को साबित करती हैं। माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन की मई 2024 की 'वर्क ट्रेंड इंडेक्स' रिपोर्ट बताती है कि आज दुनिया के 75% से ज्यादा दफ्तरी कामकाजी लोग  अपने रोज के काम, कोडिंग और रिसर्च के लिए सीधे एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर हमारे व्यवहार पर पड़ा है। साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई (Kaspersky) ने साल 2015-2016 के अपने एक बड़े शोध में इस आदत को 'डिजिटल विस्मृति' (Digital Amnesia) का नाम दिया था। इस रिसर्च के मुताबिक, 64% से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी चौबीसों घंटे मौजूद है, तो वे उसे अपने कंप्यूटर या दिमाग में सहेजने की मेहनत छोड़ चुके हैं। इसे विज्ञान में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहते हैं, यानी दिमाग पर जोर डालने और डेटा सुरक्षित रखने का काम इंसानों ने पूरी तरह मशीनों को सौंप दिया है। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हम चीज़ों को संभालकर रखने के पुराने दौर से निकलकर, हर चीज़ को तुरंत पा लेने  के एक ऐसे नए दौर में आ चुके हैं जहाँ हम पूरी तरह तकनीक के भरोसे हैं।

पिछले दो दशकों तक किसी भी डिजिटल क्रिएटर, लेखक, कोडर या छात्र के लिए सबसे बड़ा डर था— डेटा का खो जाना। बिजली गुल होने या सिस्टम क्रैश होने के डर से उंगलियां अनैच्छिक रूप से हर दो मिनट में 'Ctrl + S' दबा देती थीं। यह इस बात का प्रतीक था कि हम अपने द्वारा बनाए गए या खोजे गए कंटेंट के मालिक थे और उसे भविष्य के लिए सहेजना हमारी ज़िम्मेदारी थी।

आज जनरेटिव एआई ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कोई कोडर अपने कोड की लाइब्रेरी सेव नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि अगली बार ज़रूरत पड़ने पर एआई कुछ ही सेकंड में नया और बेहतर कोड लिख देगा। लेखक अपने रफ ड्राफ्ट सहेज कर नहीं रखते, और छात्र अपने रिसर्च नोट्स का बैकअप नहीं लेते। जब ज्ञान 'ऑन-डिमांड' (मांग पर) उपलब्ध हो, तो उसे सहेजने की मेहनत कौन करे? तकनीक की भाषा में इसे 'एल्गोरिद्मिक री-जेनरेशन' कहा जाता है, जहाँ संचय की आवश्यकता ही समाप्त हो रही है।

इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय असर बेहद गहरा है। 

  साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो द्वारा 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक प्रसिद्ध शोध में पहली बार 'गूगल इफेक्ट' को दुनिया के सामने रखा गया था, जिसमें शोधकर्ताओं ने ये निष्कर्ष निकाला था कि जब लोगों को पता होता है कि जानकारी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगी, तो हमारा दिमाग जानकारी को याद रखने के बजाय 'यह कहाँ मिलेगी' उस रास्ते को याद रखता है।

जनरेटिव एआई के दौर में यह 'गूगल इफेक्ट' अब 'एआई एम्नेशिया' (AI Amnesia) या डिजिटल विस्मृति में बदल चुका है। हम फोन नंबर याद रखने की आदत पहले ही खो चुके थे, अब हम विचारों के तार्किक ढांचे को भी याद रखना छोड़ रहे हैं।जब हम किसी चीज़ को 'सेव' करते हैं, तो हम उसे एक श्रेणी (Folder) देते हैं, जो हमारे मस्तिष्क में एक न्यूरल पाथवे बनाती है। सेव न करने का मतलब है कि हम उस ज्ञान के साथ अपना मानसिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं।सब कुछ तात्कालिक और क्षणभंगुर हो गया है। जो चीज़ सहेजी नहीं जाती, वह मस्तिष्क के लिए भी अस्थायी हो जाती है।

जब हमने 'सेव' करना छोड़ दिया, तो हमने अनजाने में अपने ज्ञान का मालिकाना हक भी छोड़ दिया। पुराना डेटा जो हम सेव करते थे, वह हमारा व्यक्तिगत इतिहास था। उसमें हमारी कमियां, हमारे सुधार और हमारी मौलिक सोच के निशान थे।

आज हम जो कुछ भी लिख रहे हैं या बना रहे हैं, वह सीधे एआई के सर्वरों पर जा रहा है। यदि कल को ये एआई टूल्स सशुल्क (Paid) हो जाते हैं या इनका सर्वर डाउन हो जाता है, तो हमारे पास अपने काम का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। यह ज्ञान की एक नई औपनिवेशिकता है, जहाँ हमारा व्यक्तिगत बौद्धिक डेटा कुछ चुनिंदा सिलिकॉन वैली की कंपनियों के नियंत्रण में है । हम इतिहास के सबसे बड़े 'कंटेंट क्रिएटर' तो बन गए हैं, लेकिन हमारे पास अपना खुद का कोई 'आर्काइव' (संग्रह) नहीं है।

यह सच है कि तकनीक हमारे काम को आसान बनाती है और समय बचाती है। एआई ने हमें उत्पादकता की एक नई अंधी रफ़्तार दी है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंप्यूटर की 'रैंडम एक्सेस मेमोरी'  की तरह यदि मनुष्य भी केवल तात्कालिक प्रोसेसिंग पर निर्भर हो जाएगा, तो उसकी दीर्घकालिक बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाएगी। जो मानव सभ्यता के विकास का मूल आधार है |

'Ctrl + S' केवल एक तकनीकी शॉर्टकट नहीं था, वह हमारी चेतना का एक हिस्सा था जो कहता था— "यह विचार मूल्यवान है, इसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।" यदि हम पूरी तरह से डिजिटल विस्मृति के इस प्रवाह में बह गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें।

 अमर उजाला में 28/07/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, July 15, 2026

डाक टिकटों के झरोखों से दुनिया देखना

 

आज सुबह अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से पुरानी किताबों को हटा रहा था, तो अचानक धूल से सनी एक डायरी नीचे आ गिरी । यह कोई साधारण डायरी नहीं थी, बल्कि मेरी 'स्टैम्प कलेक्शन बुक' (डाक टिकट संग्रह पुस्तिका) थी । पन्ने पलटे तो देखा कि आखिरी डाक टिकट संभवतः सन् 1994 में लगाया गया था । उसे छूते ही बीते वक्त की एक सोंधी सी महक कमरे में तैर गई । मन स्मृतियों के उस गलियारे में चला गया जहाँ जीवन स्क्रीन की रफ़्तार से नहीं, बल्कि सब्र और सुकून के सुरों में ढला था ।

आज की सोशल मीडिया वाली पीढ़ी जब पूछती है कि "आपकी हॉबी क्या है?" तो उनका आशय ऑनलाइन गेमिंग, नेटफ्लिक्स बिंज-वॉचिंग या रील्स स्क्रॉलिंग से होता है । लेकिन हमारे दौर में शौक का मतलब वर्चुअल दुनिया के 'लाइक और व्यूज' बटोरना नहीं, बल्कि भौतिक रूप से जिंदगी को जीना और महसूस करना होता था । तब हम बड़े गर्व से कहते थे—"डाक टिकट इकट्ठा करना।"
सच तो यह है कि इंटरनेट ने सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान नहीं किया, बल्कि हमारे जीवन के उन तमाम खूबसूरत और रचनात्मक शौकों को भी चुपचाप लील लिया, जो कभी हमारी शख्सियत का अहम हिस्सा हुआ करते थे ।
सोशल मीडिया के इस शोर-शराबे वाले युग से पहले, हम देश और दुनिया को इंटरनेट या गूगल से नहीं, बल्कि डाक टिकटों और पुराने सिक्कों के झरोखे से देखा करते थे । उन अभावों के दिनों में भी जेनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) के चक्कर इस उम्मीद में लगा लेते थे कि देखें आज कौन सा नया डाक टिकट आया है । जेबें खाली होती थीं, इसलिए खिड़की से टिकट खरीद तो नहीं पाते थे, लेकिन दोस्तों की दरियादिली और चिट्ठियों से उतरे टिकट ही हमारे संग्रह की जागीर बनते थे । लिफाफे से भाप देकर टिकट उतारना किसी वैज्ञानिक प्रयोग जैसा रोमांचक था । आज कूरियर और ईमेल के इनबॉक्स ने टिकट संग्रह के उस पूरे रोमांच को ही दफ़न कर दिया है ।हम उन दिनों बहुत सी चीजें बस यूं ही किया करते थे वो यूज एण्ड थ्रो का जमाना नहीं था |हमारी पीढ़ी के लोग सब सहेज लेना चाहते थे चाहे वो शौक हो या यादें वो भी बगैर किसी कारण से |अब देखिए न इंटरनेट और स्पॉटिफ़ाई (Spotify) ने संगीत को हमारे अँगूठों पर ला दिया है, लेकिन इसने ऑडियो कैसेट इकट्ठा करने और सहेजने के उस दीवाने शौक को मार डाला। अपनी पसंदीदा फिमों के गानों की खुद 'मिक्सिंग' करवाकर कैसेट तैयार करवाना और जब रील फंस जाए तो पेंसिल डालकर उसे धीरे-धीरे री-वाइंड करना—यह केवल एक शौक नहीं, संगीत से रिश्ता जोड़ने का हमारा तरीका था। इसी तरह शनिवार की शाम वीसीआर किराये पर लाना और पड़ोसियों को इकट्ठा करके फिल्म देखना एक त्योहार जैसा शौक था, जिसे आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के 'अकेलेपन' ने पूरी तरह खत्म कर दिया है।
चिट्ठियाँ लिखने और मीलों दूर बैठे किसी अनजान 'पेन-फ्रेंड' (पत्र-मित्र) से दोस्ती निभाने का शौक हमारी पीढ़ी की सबसे खूबसूरत याद है । हम पंद्रह-पंद्रह दिन एक अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड के आने का इंतजार करते थे । उस इंतज़ार में एक रूहानी सुकून था। आज वॉट्सऐप के इंस्टेंट 'ब्लू टिक' ने संदेशों की गति तो बढ़ा दी, लेकिन शब्दों के भीतर की उस गर्माहट और हाथ की लिखावट के अहसास को सुखा दिया ।
इसी तरह, मशहूर हस्तियों, शिक्षकों या दोस्तों से उनकी ऑटोग्राफ बुक में कुछ पंक्तियाँ लिखवाना और उनके हस्ताक्षर सहेजना एक लोकप्रिय शौक था। आज उसकी जगह 'सेल्फी' के ठंडे और बेजान पिक्सल्स ने ले ली है।
नब्बे के दशक तक, गर्मियों की दोपहर में किराये की दुकान से दो रुपये में 'राज कॉमिक्स', 'डायमंड कॉमिक्स' या 'चाचा चौधरी' लाकर छुपकर पढ़ना हर बच्चे का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था । उन पन्नों की महक और तस्वीरों की रंगीन दुनिया हमें कल्पनाओं के असीमित ब्रह्मांड में ले जाती थी। आज वह कॉमिक्स कल्चर, किताबों की छोटी दुकानें और पुस्तकालयों का ठहराव 'पीडीएफ संस्कृति', रील्स और किंडल स्क्रीन के सामने पूरी तरह दम तोड़ चुका है ।
आज की पीढ़ी अपनी हॉबी की भी १५ सेकंड की रील बना देती है । वहाँ शौक को जीने का संतोष नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने और 'लाइक्स' बटोरने का एक अदृश्य सामाजिक दबाव है । सोचता हूँ, अगर हमारे ज़माने में सोशल मीडिया या इंटरनेट होता, तो क्या हम इन शौकों को इतनी शिद्दत से जी पाते? शायद नहीं। हमारे समय के शौक हमें 'सब्र', 'तटस्थता' और 'एकाग्रता' सिखाते थे।
खैर, जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है; वक्त के पहिये को पीछे नहीं घुमाया जा सकता । डिजिटल क्रांति ने हमें आधुनिक और चौबीसों घंटे 'कनेक्टेड' तो बना दिया, लेकिन बदले में हमसे हमारी रचनात्मकता और हमारे वो मासूम शौक छीन लिए जो हमें एक संवेदनशील इंसान बनाते थे । अलमारी में बंद वह पुरानी स्टैम्प बुक और धूल खाती डायरियाँ आज केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट के मायाजाल में फँसने से पहले के उस बेहद खूबसूरत, धीमे और ठहर कर जीने वाले दौर का जीवंत दस्तावेज़ हैं ।
प्रभात खबर में 15/07/2026  को प्रकाशित 

Thursday, July 9, 2026

डिजीटल क्रांति का नया अध्याय

 सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।

 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।

तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।

लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?

 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।
 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

दैनिक जागरण में 09 /07 /2026  को प्रकाशित लेख 

Thursday, June 25, 2026

एल्गोरिदम की दुनिया का दूसरा पहलू

 बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब इंटरनेट ने भारतीय समाज में दस्तक दी, तब इसे सामाजिक समता और लोकतांत्रिक चेतना का सबसे बड़ा मुक्तिदाता माना गया था। मुख्यधारा के समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं का यह तर्क था कि जो समता भारतीय समाज सदियों के जातिगत, वर्गीय और भौगोलिक विभाजनों के कारण वास्तविक धरातल पर प्राप्त नहीं कर सका, वह यह आभासी दुनिया पलक झपकते ही दे देगी। कल्पना यह भी थी कि एक रेहड़ी-पटरी वाले और देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट अधिकारी की आवाज़ को डिजिटल मंचों पर बिना किसी संस्थागत दबाव के समान महत्व मिलेगा। लेकिन आज, न्यू मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में सच्चाई इस मीठी कल्पना के ठीक विपरीत खड़ी है। भारतीय इंटरनेट अब एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक स्पेस नहीं, बल्कि एक ऐसा 'अदृश्य डिजिटल पिंजरा' बन चुका है जो बैकएंड एल्गोरिदम, डेटा-मोनोपॉली और एआई के ज़रिए एक नई सामाजिक-आर्थिक वर्गीय व्यवस्था को जन्म दे रहा है। इसे हम "एल्गोरिद्मिक रंगभेद" (Algorithmic Apartheid) या "डिजिटल अछूतों का निर्माण" कह सकते हैं, जहाँ यूज़र को बिना बताए उसकी रीच, रोज़गार और सामाजिक हैसियत को एक गुप्त कोड से नियंत्रित किया जा रहा है।

आमतौर पर सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), आदि को सामान्य जनमानस के विचारों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि सोशल मीडिया सही मायने में एक ऐसा मीडिया है, जो किसी भी तरह के दबाव से मुक्त है। पिछले कुछ समय से जनमत के निर्माण में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन सूचना साम्राज्यवाद के इस दौर में इंटरनेट भी सूचना के मुक्त प्रवाह का विकल्प बनकर नहीं उभर पा रहा है। यह एक ऐसे मायाजाल का निर्माण करता है जिसमें सब कुछ वास्तविक लगते हुए भी वास्तविक नहीं लगता है। इस मायाजाल की जड़ें केवल वैचारिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सबसे हिंसक प्रहार समाज के सबसे कमजोर और असुरक्षित तबके पर हो रहा है, जिसकी पुष्टि वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं के दस्तावेज़ भी करते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की हालिया 'सुरक्षा और तकनीक' रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर की सरकारें और सीमा सुरक्षा बल अब प्रवासियों की पात्रता तथा आयु की जांच के लिए 'एआई फेशियल रिकग्निशन' तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। इन रिपोर्टों में यह प्रमाणित किया गया है कि ये ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिदम अश्वेतों, महिलाओं और प्रवासियों के प्रति जन्मजात रूप से पूर्वाग्रही हैं, जो बड़े पैमाने पर मानवीय बहिष्करण को जन्म दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों को अलग-थलग करने वाला यह तकनीकी पूर्वाग्रह जब भारत के भीतर प्रवेश करता है, तो यह यहाँ सदियों से मौजूद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के साथ मिलकर और अधिक हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि पहले से ही मुख्यधारा से कटे हुए समाज के हिस्से इस डिजिटल ढांचे में और पीछे छूटते चले जाते हैं।

भारतीय संदर्भ में यह एल्गोरिद्मिक रंगभेद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों को और गहरा कर रहा है। देश में इंटरनेट उपयोग में लैंगिक असमानता गहरी बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और GSMA Mobile Gender Gap Report के अनुसार, पुरुषों में इंटरनेट उपयोग दर लगभग 57% है, जबकि महिलाओं में यह केवल 33% है। मोबाइल इंटरनेट उपयोग में भी महिलाएँ पुरुषों से लगभग 50% पीछे हैं। इसके अलावा, डिजिटल कौशल में पुरुषों की भागीदारी 22.78% है, जबकि महिलाओं की केवल 13.91%। यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुँच में लैंगिक असमानता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है। इस संरचनात्मक अंतर के कारण एल्गोरिदम पर अंग्रेजी और कुछ गिने-चुने शहरी केंद्रों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जिसके चलते ग्रामीण भारत और क्षेत्रीय विमर्शों को एल्गोरिदम 'ट्रेंडिंग' की मुख्यधारा से बाहर कर देता है।

पहुंच और कौशल का यह लैंगिक व क्षेत्रीय अंतर जब एक ओर आम नागरिक को हाशिए पर धकेलता है, तो वहीं दूसरी ओर जो लोग इस डिजिटल स्पेस के भीतर मौजूद हैं, उनके लिए यह वर्चुअल दुनिया एक गहरे अविश्वास और असुरक्षा का मैदान बन जाती है। मुख्यधारा का विमर्श अब सत्य और असत्य के बीच के भेद को ही समाप्त करने पर आमादा है, जिसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनियंत्रित विकास काम कर रहा है। डिजिटल स्पेस में अब सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 और 2026 के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित भ्रामक सामग्री और डीपफेक आज वैश्विक लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। एआई टूल्स का दुरुपयोग करके किसी भी व्यक्ति या विचार की सामाजिक हैसियत और गरिमा को पल भर में नष्ट किया जा सकता है।

विश्वसनीयता के इस संकट की भयावहता का अंदाज़ा महज़ कुछ सैद्धांतिक चेतावनियों से नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहे विस्फोटक आंकड़ों से लगाया जा सकता है। Resemble.AI की रिपोर्ट (2025) के अनुसार डीपफेक सामग्री की मात्रा में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। 2019 में जहाँ केवल 14,000 डीपफेक वीडियो मौजूद थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 8 मिलियन तक पहुँच गई — यानी लगभग 571 गुना वृद्धि। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 की तीसरी तिमाही तक हर तिमाही में औसतन 2,031 डीपफेक घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 1,500% अधिक है। तकनीक की यह हिंसक बाढ़ जहां एक तरफ भ्रामक विमर्शों को जन्म देती है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई सचेत नागरिक इन बाधाओं को पार करके अपनी स्वतंत्र असहमति या प्रतिरोध दर्ज कराना चाहता है, तो इस तंत्र के पास उसकी आवाज़ को घोंटने के लिए और भी सूक्ष्म, अदृश्य हथकंडे मौजूद हैं।

इन बाधाओं को पार करके कोई यूजर अगर अपनी असहमति दर्ज कराता है तो उसके 'शैडो-बैनिंग' किये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वर्चुअल मंचों पर वैचारिक विरोध को दबाने के लिए 'शैडो-बैनिंग' जैसी अदृश्य सेंसरशिप का सहारा लिया जाता है। यूरोपीय डिजिटल राइट्स (EDRi) जैसी डिजिटल राइट्स वॉचडॉग संस्थाओं के शोध दर्शाते हैं कि बड़े टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों को बचाने के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े की-वर्ड्स की 'रीच' को बैकएंड से ही दबा देते हैं। इसमें यूज़र के अकाउंट को ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी रीच को शून्य कर दिया जाता है। यूज़र को लगता है कि वह स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा है, पर वास्तव में उसकी आवाज़ को एक तकनीकी पिंजरे में कैद कर दिया जाता है जहाँ कोई दूसरा उसे सुन ही नहीं पाता। यह 'सूचना साम्राज्यवाद' का सबसे सूक्ष्म और हिंसक स्वरूप है।

अभिव्यक्ति को कुचलने वाली यह अदृश्य सेंसरशिप किसी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा रही, बल्कि यह सिलिकॉन वैली के वैश्विक तकनीकी एकाधिकारों की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसी कारण, वैश्विक स्तर पर तकनीकी नियंत्रण और नैतिकता को लेकर चिंताएं केवल अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाएं भी इस तकनीकी निरंकुशता को नियंत्रित करने के विकल्प तलाश रही हैं। सिलिकॉन वैली की कुछ गिने-चुने तकनीकी एकाधिकारों ने वैश्विक विमर्श को इस कदर जकड़ लिया है कि तकनीकी मंचों द्वारा फैलाए जा रहे ध्रुवीकरण और व्यावसायिक अंधाधुंधता से आज वैश्विक संस्थाएं भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूनेस्को द्वारा लगातार 'एथिक्स ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Ethics of AI) पर वैश्विक नियम जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी अब यह बहस तेज है कि क्या यूरोपीय संघ के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट' (EU AI Act) जैसे कड़े कानूनी मानदंडों और तकनीकी नैतिकता के अंतर्निहित सिद्धांतों के बिना इस बेलगाम तकनीक को इंसानी नियंत्रण के दायरे में वापस लाया जा सकता है? जब तक एआई और एल्गोरिदम के विकास में नैतिक मानदंडों और सामाजिक सुरक्षा को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल शक्तिशाली देशों और वैश्विक कंपनियों के हितों को साधने वाला 'डिजिटल रंगभेद' ही बनी रहेगी।

इस वैश्विक विमर्श के आलोक में, भारत जैसे समाज को यह गहराई से समझना होगा कि जो तकनीक ऊपरी तौर पर जितनी आकर्षक और तटस्थ दिखाई देती है, उसके नेपथ्य में उतने ही गहरे व्यावसायिक और वैचारिक हित छिपे होते हैं। तकनीकी निर्भरता के इस दौर में भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि कोई भी एल्गोरिदम या तकनीक कभी 'न्यूट्रल' या निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा अपने निर्माता के आर्थिक लाभ और राजनीतिक दृष्टिकोण से संचालित होती है। यदि हमें इंटरनेट को इस 'अदृश्य डिजिटल पिंजरे' और वैचारिक रंगभेद से मुक्त कराना है, तो मात्र भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (DPDP Act) जैसे विनियामक कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए हमें तकनीकी कंपनियों के बैकएंड कोड्स की सार्वजनिक ऑडिटिंग, स्वदेशी डेटा संप्रभुता और एआई प्रणालियों में सामाजिक न्याय के अंतर्निहित सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक के इस उपभोगवादी और दमनकारी तंत्र के सामने मूक दर्शक या केवल 'उपभोक्ता' बनने के बजाय, एक सचेत, प्रश्नकर्ता और प्रतिरोधी 'डिजिटल नागरिक' की भूमिका का निर्वाह करें।

 अमर उजाला में 25/06/2026 को प्रकाशित लेख 

Friday, June 19, 2026

बिना इंटरनेट वाला बचपन

 

बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली  थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता  देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!

प्रभात खबर में 19/06/2026 को प्रकाशित लेख

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