Thursday, February 19, 2026

डिजिटल पीढ़ी का विरोधाभास

 इस तेजी से डिजिटल होती संस्कृति में हमारी पीढ़ी एक बड़े विरोधाभास से जूझ रही है। यूँ कहने को तो हम इंसानी सभ्यता की सबसे ज्यादा कनेक्टेड पीढ़ी हैं लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा अकेली है। ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया, रील्स की शोर-शराबे वाली दुनिया ने हमें अंदर से थका दिया है। इसी थकान और तनाव से बचने के लिए आज की जेन जी पीढ़ी ने एक नया तरीका ढूंढ लिया है जिसे बेड रॉटिंग कहते हैं। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है इसका अर्थ उतना ही सीधा है। इसका मतलब है जानबूझकर घंटों या दिनभर बिस्तर पर पड़े रहना और निष्क्रिय गतिविधियों में लिप्त रहना जैसे फोन स्क्रॉल करना, फिल्म देखना या बस लेटे रहना। हालांकि जेन जी इसे सेल्फ केयर यानी आत्म देखभाल का नया और क्रांतिकारी तरीका बताते हैं। भारत में हैशटैग बेड रॉटिंग पर आज लाखों व्यूज इस बात का सबूत है कि अब यह आदत भारतीय युवाओं के जीवन में भी गहरी पैठ बना रही है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में तनाव या बर्नआउट से लड़ने का एक कारगर तरीका है या फिर अपने जीवन से मुँह मोड़ लेना एक खतरनाक बहाना जो व्यक्ति को अवसाद और निष्क्रियता के अंधेरे कुएँ में धकेल रहा है।

बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया , जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बेड रॉटिंग के पीछे कई कारण हैं, एक ओर बदलती जीवनशैली और बढ़ता तनाव इसका एक कारण है वहीं दूसरी ओर छात्रों के बीच हसल कल्चर भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी की मनोचिकित्सक निकोले होलिंग्सहेड बताती है कि हमारा समाज हमेशा से खुद को व्यस्त करने और अत्यधिक उत्पादक होने पर जोर देता है। ऐसे में उस सामाजिक दबाव को  जो हर पल कुछ न कुछ उत्पादक करने के लिए मजबूर करता है, को आज के युवा खारिज कर रहे हैं।

लेकिन इसके पीछे एक जटिल और गंभीर समस्या भी उभर रही है। मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओं, तनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावट, बेचैनी, अवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भारत और दुनियाभर में मानसिक स्वास्थ्य के आंकड़े चिंताजनक हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार से ग्रसित हैं वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर करीब 21 आत्महत्याएं होती हैं जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। साल 2024 में आई विश्व खुशहाली रिपोर्ट में भारत ने 118वां स्थान प्राप्त किया था जो कि मानसिक चिंता को दर्शाता है।

हाल ही में ऑस्ट्रैलिया की एक मनोवैज्ञानिक संस्था जीएम5 की ओर से तेलंगाना और कर्नाटक के स्कूली छात्रों का सर्वेक्षण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक 24 प्रतिशत छात्रों में किसी न किसी तरह की मानसिक संकट के लक्षण मिले वहीं 6 से 10 प्रतिशत ऐसे छात्र मिले जो गंभीर या अति गंभीर श्रेणी में आते हैं जिन्हे तत्काल सहायता की आवश्यकता है। ऐसा ही एक रिपोर्ट रिसर्च संस्था सेपियंस लैब की ओर से भी जारी की गई । जिसमें कोविड महामारी के बाद 18-24 साल के भारतीय युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की जुड़ी समस्याओं  का उल्लेख था। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में इस आयु वर्ग का औसत एमएचक्यू यानी मेंटल हेल्थ क्वोशियंट 28 था जो 2023 में गिरकर 20 हो गया साथ ही ज्यादातर युवाओं में किसी न किसी प्रकार की मानसिक समस्या मिली। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में साल 2024 में सामने आये एक बहुराष्ट्रीय शोध के मुताबिक दुनियाभर के किशोर प्रतिदिन औसतन 8 से 10 घंटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग करने, वीडियो गेम खेलने जैसी गतिहीन गतिविधियों में बिता रहे हैं।

हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है , कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीप, स्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकर, मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइन, दोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइन, जैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा है, जो कभी शांत नहीं होता, अंतहीन फीड्स, नेटफ्लिक्स, असीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।

कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता है, लेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बेड रॉटिंग से न्यूरोट्रांसमीटर्स विशेषकर डोपामिन और सेरोटोनिन के स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इनकी कमी से मोटिवेशन में गिरावट, उदासी, और ऊर्जा की कमी महसूस होती है , जो व्यक्ति को और निष्क्रिय बनाती है, और अंत में यह एक दुष्चक्र हो जाता है जिससे उदासी और बढ़ जाती है और उदासी से निष्क्रियता । पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलना, शारीरिक क्रियाएं करना, दोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजाय, किताबें पढ़ना, संगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। और यदि कोई इस चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा है तो किसी मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से बात करने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थ, उत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।
दैनिक जागरण में 19/02/2026  को प्रकाशित लेख 

Wednesday, February 18, 2026

स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की दीवारे

 

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।
शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।

आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
अमर उजाला में 18/02/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, February 11, 2026

रियल एक्सप्रेशन की जरूरत

ए साल में आप सब जरुर खुशियों के साथ टैग हो गए होंगे,खुशियों के साथ हैंग आउट जारी होगा और चिली वेदर में चिलेक्स कर रहे होंगें.  अब चूँकि नया साल है तो मैंने सोचा क्यूँ न आपके साथ एक नयी भाषा में बात की जाए जिसे जेन ज़ी  ज्यादा बेहतर समझती है . जेन जी के लोग हमारी पीढ़ी से की मामले में अलग हैं जैसे उन्होंने इंटरनेट के साथ अपनी आँखें खोलीं |वे इंस्टा रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के साथ पाले बढ़े.तरह तरह के मोबाईल के बारे जानना और चलाना उनके लिए बच्चों  का खेल है पर हम लोगों को सब सीखना पड़ा. उन्ही एप की दुनिया में तरह-तरह  के मेसेजिंग एप हैं. जिनमें प्रमुख हैं चैटिंग एप जैसे व्हाट्स एप। जब मैं ये लेख लिख रहा था तभी मुझे किसी व्हाट्स एप ग्रुप में यह चुटकुला पढ़ने को मिला. “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन :३०  एमक्यों दिखाता हैहा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है. यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा लोगों से हो जायेगी तो समस्या आयेगी ही. क्योंकि एक ओर मोबाईल नेट  क्रांति ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है.  वहीं कहीं हम बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस दौड़ में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए जैसी रेस में शामिल हो जाते हैं । इस दौड़ में जेन जी सबसे आगे हैं इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये. हंसी आये या ना आये हा हा लिख कर कोई स्माईली बना दो.  सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं पर क्या आप वाकई खुश हैं क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँअक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की रियल प्रॉब्लम का सल्यूशन ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड यानि जेन जी  के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं कि नहीं.  दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या फिर आप इमोशनली वीक है.  

मेरे जेन ज़ी मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं चैटिंग करने के लिए उम्र पडी है.  ये टाईम कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये.  

 प्रभात खबर में 11/02/2026 को प्रकाशित 

Monday, January 26, 2026

युवाओं के सपनों को उड़ान डे रहे हैं देश के स्टार्ट अप्स

 

स्टार्टअप इंडिया आज सिर्फ एक सरकारी योजना नहींबल्कि आम भारतीय युवाओं के सपनों और हौसलों का प्रतीक बन चुका है। साल 2016 में शुरू हुई इस पहल ने बीते दस वर्षों में देश की सोच और काम करने के तरीके को बदल दिया है। .उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) की ‘स्टार्टअप इंडिया वार्षिक मान्यता रिपोर्ट’. के अनुसारसाल 2025 में करीब 44 हजार नए स्टार्टअप पंजीकृत हुएजो अब तक किसी एक साल में सबसे बड़ी संख्या है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2026 तक भारत में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की कुल संख्या दो लाख से ज्यादा हो चुकी है.  यह साफ दिखाता है कि अब देश में नौकरी मांगने की बजाय नौकरी देने की सोच तेज़ी से मजबूत हो रही है.

स्टार्टअप्स ने न केवल रोजगार सृजन किया है बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भरता और नवाचार की ओर प्रेरित किया है.  सामाजिक दृष्टि से यह आंदोलन ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच अवसरों की खाई को कम कर रहा हैमहिलाओं की भागीदारी बढ़ा रहा है और तकनीकी समाधान से शिक्षास्वास्थ्य व पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला रहा है.

 डीपीआईआईटी और वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त आकलन. के अनुसार आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। नैसकॉम (NASSCOM) और ट्रैक्शन की ‘भारतीय तकनीकी स्टार्टअप परिदृश्य रिपोर्ट’. के आंकड़े बताते हैं कि देश में 120 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां मौजूद हैं.  यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब दुनिया भर में निवेश की रफ्तार धीमी रहीजिसे ‘फंडिंग विंटर’ कहा गया। इसके बावजूद भारतीय स्टार्टअप्स ने लागत नियंत्रणमुनाफे और स्थिर बिजनेस मॉडल पर ध्यान देकर निवेशकों का भरोसा बनाए रखा.

 इस स्टार्टअप आंदोलन की सबसे अहम बात इसका भौगोलिक विस्तार है। डीपीआईआईटी की ‘राज्यों की स्टार्टअप रैंकिंग रिपोर्ट’. के अनुसारभारत के लगभग 50 प्रतिशत स्टार्टअप अब टियर-2 और टियर-3 शहरों से आ रहे हैं। जयपुरइंदौरलखनऊअहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर अब सिर्फ उपभोक्ता नहींबल्कि नवाचार के केंद्र बनते जा रहे हैं। छोटे शहरों के युवा स्थानीय समस्याओं—जैसे खेतीशिक्षास्वास्थ्य और लॉजिस्टिक्स—के लिए तकनीक आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि स्टार्टअप इंडिया ने उद्यमिता को वास्तव में लोकतांत्रिक बना दिया है.

 महिला उद्यमिता के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। .‘भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाएं रिपोर्ट (WISER)’. के अनुसारभारत के करीब 45 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला संस्थापक या निदेशक शामिल है। यह आंकड़ा बीते पांच वर्षों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि महिलाएं अब केवल फैशन या शिक्षा तक सीमित नहीं हैंबल्कि फिनटेकहेल्थ-टेकमैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी नेतृत्व कर रही हैं। इसी वजह से भारत महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाने लगा है.

रोजगार के मोर्चे पर स्टार्टअप्स का प्रभाव और भी गहरा है। डीपीआईआईटी की ‘स्टार्टअप प्रभाव रिपोर्ट’. के अनुसारस्टार्टअप्स अब तक सीधे तौर पर 21 लाख से अधिक नौकरियां पैदा कर चुके हैं। वहीं .नीति आयोग की ‘भारत में गिग इकॉनमी और भविष्य का कार्य’ रिपोर्ट. बताती है कि गिग इकॉनमी तेजी से फैल रही है और आने वाले वर्षों में करोड़ों युवाओं को लचीले रोजगार के अवसर मिलेंगे। आज गिग वर्क सिर्फ डिलीवरी सेवाओं तक सीमित नहीं हैबल्कि इसमें आईटी प्रोफेशनल्सडिजाइनर्सकंटेंट क्रिएटर्स और कंसल्टेंट्स भी शामिल हैं।ये स्टार्ट अप इंडिया का ही कमाल है कि गिग एकोनॉमी स्टार्ट अप इंडिया के साथ मिलकर एक नए भारत का निर्माण कर रही है.

 तकनीक के क्षेत्र में 2025 खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप-टेक का साल रहा। .नैसकॉम–जिनोव की ‘डीप-टेक स्टार्टअप रिपोर्ट’. के अनुसारबड़ी संख्या में नए स्टार्टअप एआईस्पेस-टेकरोबोटिक्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी में काम कर रहे हैं। .इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ‘इंडिया एआई मिशन प्रगति रिपोर्ट’. के मुताबिकसरकार ने स्टार्टअप्स को कंप्यूटिंग पावर और डेटा तक आसान पहुंच दी हैजिससे भारतीय भाषाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तकनीकी समाधान तैयार किए जा रहे हैं.

 सरकारी नीतियों ने इस पूरे सफर को मजबूती दी है। .वित्त मंत्रालय और डीपीआईआईटी की ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस सुधार रिपोर्ट’. बताती है कि एंजेल टैक्स जैसी बाधाओं को हटाया गया और नियमों को सरल किया गया। वहीं .गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) की वार्षिक रिपोर्ट. के अनुसारस्टार्टअप्स ने सरकारी प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों करोड़ रुपये का कारोबार किया है। इसके अलावा .स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना और क्रेडिट गारंटी योजना पर डीपीआईआईटी की प्रगति रिपोर्ट. यह दिखाती है कि पूंजी की कमी अब अच्छे विचारों के रास्ते में बड़ी बाधा नहीं रही.

 कुल मिलाकर, 2025 में दर्ज हुए ये हजारों स्टार्टअप सिर्फ आंकड़े नहीं हैंबल्कि उस बदलते भारत की तस्वीर हैं जो आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अलग-अलग सरकारी और उद्योग रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि स्टार्टअप इंडिया अब एक स्थायी और निर्णायक आंदोलन बन चुका है। चुनौतियां जरूर हैंलेकिन उद्योग संवर्धन विभागनीति आयोग और नैसकॉम जैसे संस्थानों के आकलन साफ संकेत देते हैं कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ने में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक मजबूत आधार बनने जा रहा है। मोबाईल क्रांति होने के साथ अब आने वाले दशक में इसमे वृद्धि होने की संभावना है आंकड़े बताते है की आने वाले वक्त में इससे भारतीय एप बाजार में बड़ा परिवर्तन होगा और कंप्यूटर शिक्षा में नवाचार बढ़ने से और स्टार्ट अप कम्पनियों को वित्त के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ेगा .जाहिर है भारतीय एप के डिजीटल प्लेटफार्म पर बढ़ती संख्या देश की बड़ी आबादी का जहाँ जीवन आसान करेगी वहीं विकसित  भारत का सपना जल्दी ही हकीकत का रूप लेगा. 

प्रभात खबर में 26/01/2026 को प्रकाशित 

Friday, January 9, 2026

सिंथेटिक कंटेन्ट और डिजिटल भरोसा


आज के तकनीकी दौर में रोजाना हमारी स्क्रीन पर कंटेंट की बाढ़ आई रहती हैन्यूज फीड की सुर्खियाँ हो या चमकदार तस्वीरें और वीडियोजपहली नजर में सब कुछ उतना ही वास्तविक और विश्वस्नीय लगता है जितना होना चाहिए लेकिन कुछ ही समय में हमारे दिमाग में एक सवाल कौंधता है कि यह जो मैं देख रहा हूँक्या यह सचमुच किसी इंसान ने बनाया हैया यह सब एआई द्वारा निर्मित है। यह वही मोड़ है जहाँ सिंथेटिक कंटेंट की शुरुआत होती हैसिंथेटिक कंटेंट यानी एआई द्वारा निर्मित कंटेंट जो दिखने में असली लगता है लेकिन वह पूर्ण रूप से एआई जेनरेटेड होता है । शायद यही कारण है कि आज इंटरनेट पर मिलने वाली हर सूचना के साथ एक हल्का सा शक भी जुड़ गया है। जहाँ एक ओर एआई ने कंटेंट बनाने की प्रक्रिया को बेहद सरल बना दिया है। अब कुछ ही मिनटों में लेखफोटो और वीडियो तैयार हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर इस सहजता ने हमारे डिजिटल भरोसे की नींव को हिला दिया है। परिणामस्वरूप हम ऐसे युग में पहुँच चुके हैंजहाँ भ्रमअविश्वास और अनिश्चितता का माहौल आम हो गया है। 

डीपफेक अब एक शरारत नहीं बल्कि राजनीतिक हेरफेर और वित्तीय धोखाधड़ी का एक शक्तिशाली हथियार बन चुका है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में  चुनावों के दौरान नेताओं के नकली वीडियो और ऑडियो का वायरल होना आम बात हो गई है। हाल ही संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव फिल्म एक्टर मनोज बाजपेयी का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह आरजेडी के समर्थन में बयान देते नजर आ रहे थेपड़ताल करने पर मालूम चला यह वीडियो एआई जेनरेटेड हैऔर एक्टर को सफाई तक पेश करनी पड़ी। पिनड्रॉप की 2025 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक डीपफेक और वॉयस-क्लोनिंग आधारित धोखाधड़ी के मामलों में 1,300 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है वहीं वेबसाइट साई-टेक टुडे द्वारा संकलित आँकड़े बताते हैं कि 2023 में जहाँ लगभग 5 लाख डीपफेक मौजूद थेवहीं 2026 तक इनकी संख्या बढ़कर 80 लाख तक पहुँचने का अनुमान है। 2021 में यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की का एक डीपफेक वीडियो वायरल किया गया था जिसमें वे सैनिकों को रूस के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दे रहे थेइसी तरह इंडोनेशिया के पूर्ण राष्ट्रपति सहारतो की मृत्यु के बाद उनका एक नकली भाषण डीपफेक के रूप में बनाया गया था। ब्लैकबर्ड एआई नामक संस्था के अध्ययन के मुताबिक 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान 75 प्रतिशत वोटर्स को राजनीतिक डीपफेक कंटेंट मिला और वहीं 25 प्रतिशत यूजर्स ने उसे सच भी समझ लिया। भारतीय मीडिया में ऐसी कई खबरें आई जिनमें चुनावी रैली के दौरान पीएम मोदी गरबा नृत्य करते नजर आ रहे थेबाद में जांच में ये साबित हुआ कि ये एआई जनित डीपफेक वीडियो है।

 इस कंटेंट की बढ़ती बाढ़ ने एक नये शब्द सूचना प्रदूषण को जन्म दिया हैजहाँ इंटरनेट पर मौजूद डेटा का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब मशीन द्वारा निर्मितनिम्न गुणवत्ता वाला और अप्रामाणिक है। यूनेस्को के मुताबिक सिंथेटिक मीडिया के अंतर्गत चेहरे की नकल करना (फेस स्वैप)लिप-सिंक या आवाज की नकल (वॉयस क्लोनिंग ) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा हैइसके साथ ही भाषा मॉडल जैसे चैटजीपीटीजैमिनी जो एक प्रॉम्ट से लेखसंवाद या छवियाँ तैयार कर सकते हैं का उपयोग बड़ी मात्रा में किया जा रहा है। ये जेनरेटिव एआई कंटेंट जेनरेटिव एडवर्सेरियल नेटवर्क पद्धित का उपयोग करते हैं। इनकी मदद से चित्रवीडियो और आवाज पूरी तरह से नए सिरे से बनाई जाती हैदूसरी ओर मीडियो को बदलकर उसे तोड़ मरोड़ कर हूबहू नकल तैयार की जाती है। यह सब इतना य़थार्थपूर्ण हो गयाहै कि एक सामान्य श्रोता या दर्शक के लिए असली और नकली में फर्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। इसके साथ ही आर्थिक धोखाधड़ी के मामलों में भी इस तरह के सिंथेटिक मीडिया का उपयोग भरपूर हो रहा हैसाल 2024 में ऐसे कई मामले सामने आये जिसमें वॉयस क्लोनिंग के जरिए जालसाजों ने महिलाओंबुजुर्गों और नौजवानों से पैसे ऐंठ लिए। हाल ही में हैदराबाद की 72 वर्षीय महिला को उसके रिश्तेदार की आवाज में वॉयस क्लोनिंग करके करीब 2 लाख रूपये ठगने का मामला सामने आया था। मैक्फी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हुए एआई आधारित फेक वॉयस कॉल स्कैम में करीब 83 प्रतिशत लोगों शिकार हुए लोगों ने आर्थिक नुकसान उठाया वहीं इनमें 48 प्रतिशत से अधिक लोगों का नुकसान पचास हजार से भी अधिक रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि करीब 69 प्रतिशत लोगों को असली और एआई क्लोन आवाज में फर्क करना मुश्किल लगता है।

 वहीं अब इस तरह के सिंथेटिक कंटेंट ने अदालतों के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी हैपहले जहाँ डिजिटल सबूतों को मजबूत और भरोसेमंद माना जाता था वहीं अब वे संदेह के घेरे में हैं। 2024 में गार्टनर की ओर से जारी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि 2027 तक दुनियाभर के कोर्ट में पेश किए जाने वाले डिजिटल सबूतों में 30 प्रतिशत से अधिक सामग्री एआई-छेड़छाड़ वाली हो सकती है। यानी अदालतों को अब हर फोटोवीडियो और ऑडियो की भी बारीकी से जाँच करनी पड़ेगीक्योंकि पहली नजर में असली और नकली में फर्क करना अब मुश्किल हो गया है। कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए एआई फोरेंक्सिक्स यूनिट बनाने का फैसला लिया है ताकि डिजिटल टैंपरिंग को पकड़ा जा सके। इसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में भी सिंथेटिक एआई कंटेंट ने स्कूलों और कॉलेजों के लिए नई मुसीबत पैदा कर दी है। हाल ही में टर्नट्रिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉलेज असाइनमेंट में एआई जनित कंटेंट तेजी से बढ़ा है। हालांकि कई विश्वविद्यालयों ने एआई डिटेक्शन टूल अपनाए हैं मगर विशेषज्ञ बताते हैं कि ये उन्नत मॉडल्स इन टूल्स को भी धोखा देने में कामयाब हो जाते हैं। मिनटों में निबंधरिसर्च पेपर और प्रोजेक्ट होने वाली दुनिया में असली मेहनत और विश्लेषण कौशल कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

 सिंथेटिक कंटेंट का एक बड़ा खतरा अब सर्टिफिकेटडिग्री और पहचान-पत्र जैसे संवेदनशील दस्तावेजों पर भी मंडराने लगा है। एआई की मदद से मिनटों में फेक अनुभव-पत्रनकली डिग्री या ट्रेनिंग सर्टिफिकेट तैयार किए जा सकते हैंजो देखने में इतने असली लगते हैं कि पहली जांच में पकड़ में ही नहीं आते। हाल ही में भारतीय रेलवे में भी एक चौंकाने वाला मामला सामने आयाजहाँ यात्री एआई-जनरेटेड फर्जी ट्रेन टिकट के साथ यात्रा करते हुए पकड़े गए। टिकट पर QR कोड से लेकर पूरा लेआउट तक इतना असली दिख रहा था कि शुरुआती जांच में किसी को शक तक नहीं हुआलेकिन वेरिफिकेशन में पूरा खेल खुल गया। यह घटनाएँ कोई एक-दो मामले नहींबल्कि उस बड़े खतरे की स्पष्ट आहट हैं जिसकी ओर हम तेजी से बढ़ रहे हैं। एक ऐसी दुनियाजहाँ असली और नकली में फर्क करना मुश्किल होता जाएगा और हम धीरे-धीरे हर दस्तावेज़हर प्रमाण और हर पहचान पर शक करने को मजबूर हो जाएंगे।

 कई देश और कंपनियाँ अब इस समस्या को गंभीरता से लेकर कार्रवाई में जुट गई हैं। भारत सरकार ने हाल में ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे एआई निर्मित फोटो/वीडियो पर स्पष्ट लेबल लगाने के आदेश दिए हैंड्रॉफ्ट गाइ़डलाइन्स के मुताबिक  AI-जेनरेटेड चित्रों या वीडियो में कम से कम 10% हिस्सा मार्कर लगाना होगा ताकि दर्शक पहचान सकें कि यह असली नहीं है । इसके साथ ही बॉलीवुड सितारे भी अपने नाम-शब्द व छवि के बिना अनुमति के उपयोग पर अदालत का रूख कर रहे हैंजिससे भविष्य में डीपफेक निर्मातओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की गुंजाइश बढ़ी है। इसके अतिरिक्त तकनीकी तौर पर भी चेहरों की सूक्ष्म हरकतोंस्वर मापदंडों को पहचानने वाले डीपफेक डिटेक्शन टूल विकसित किये जा रहे हैं। इन तकनीकों के साथ डिजिटल साक्षरता को बढ़ाना उतना ही आवश्यक हैइंटरनेट यूजर्स को फर्जी खबरो,वीडियो और इमेज की पहचान करनी सीखनी चाहिए और संदिग्ध सामग्री मिलने पर उसे रिपोर्ट करना चाहिए। कुल मिलाकर मीडिया प्लेटफॉर्मसरकार और समाज जब ये तीनों मिलकर सतर्क रहेंगे तभी हम इस सूचना प्रदूषण के युग में सच को ढूंढ पायेंगे। 

 दैनिक जागरण में 09/01/2026 को प्रकाशित 

Thursday, January 8, 2026

एआइ से सतर्क रहने की भी आवश्यकता है


 
मैं जो बोलू हाँ तो हाँ मैं जो बोलू ना तो ना मैं जो बोलू हाँ तो हाँ मैं जो बोलू ना तो ना… 197में आई फिल्म प्रियतमा  का यह मशहूर गीत आज के इस तकनीकी दौर की एक डरावनी हकीकत बन रहा है। क्या हो अगर आपके पास एक ऐसा सलाहकार है जो आपकी हर बात से सहमत है। वह आपकी हर राय को सही ठहराता हैआपके हर नैतिक संदेह को सही होने का प्रमाण पत्र देता है। पहली नजर में यह सुखद लग सकता है मगर गहराई में सोचें तो यह इंसान को उसके बौद्धिक पतन की ओर ले जा सकता है। दुर्भाग्य से एआई विशेष रूप से एलएलएम मॉडल्स तेजी से इसी वास्तविकता की ओर बढ़ रहे हैं। हाल ही में स्टैंडफोर्ड और कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। प्रकाशित ताजा शोध में सामने आया है कि एआई सिस्टम इंसानों की तुलना में 50 प्रतिशत से भी अधिक चापलूस होते हैं। चैटजीपीटीजैमिनीग्रोक समेत 11 से अधिक एआई सिस्टम पर किये गए इस शोध में पाया गयाकि ये मॉडल्स अक्सर वही बात करते हैं जो लोग सुनना चाहते हैं। आसान भाषा में समझे को एआई आपकी नजरों में अच्छा बनने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेश करता है। शोधकर्ताओं ने इस व्यवहार को एआई साइकोफैंसी या एआई चापलूसी का नाम दिया है।
 हालांकि पहली नजर में एआई का चापलूसी व्यवहार किसी तरह की तकनीकी खामी लग सकता हैमगर विशेषज्ञ इसे एक सचेत डिजाइन का परिणाम बताते हैंजो हमारे मनोविज्ञान के साथ खिलवाड़ कर रहा है। हमारे दिमाग में यह सवाल भी खड़ा होता हैकि आखिर एक मशीन को चापलूसी करने की क्या जरूरत हैउसे कौन सा हमसे प्रमोशन चाहिए या कौन सा चुनाव लड़ना है। असल में यह सब सिखाने के तरीके का नतीजा है। इन एआई मॉडल्स को अक्सर इंसानों द्वारा दिए गए फीडबैक से सिखाया जाता हैइसे तकनीकी भाषा में आरएलएचएफ कहते हैं। आसान शब्दों में समझे तो जब एआई जवाब देता है तो इंसानी परीक्षक उसे रेटिंग देते हैं। अगर एआईव्यक्ति के सवालों का रूखा जवाब दे या कहे आप गलत हो तो लोग उसे खराब रेटिंग देते हैं। और वहीं एआई अगर प्यार सेचापलूस बातें करे तो उसे अच्छी रेटिंग मिलती है। बस फिर क्या मशीन को भी उतनी अक्ल आ गई कि फाइव स्टार रेटिंग चाहिए तो मालिक की हाँ में हाँ मिलाते रहो । क्योंकि एआई को सच बोलने का इनाम नहीं मिलता बल्कि आपको खुश रखने का इनाम मिलता है।
 साथ ही इसके पीछे कंपनियों का बढ़ता मुनाफा भी एक कारण है। गूगलमेटाओपनएआई जैसी बड़ी कंपनियाँ चाहती हैं कि आप उनके मॉडल्स पर अधिक से अधिक समय बिताएँ। आप खुद सोचिए आप किस दोस्त के पास बार-बार जाना पसंद करेंगेजो हर बात पर आपकी गलतियाँ निकालता हो याजो ये कहे जो तुम कहो वही सही है।
जाहिर है हम दूसरे वाले के पास जाएंगे। एआई कंपनियाँ इसी मनोविज्ञान का फायदा उठा रही हैं। एक ऐसा चैटबॉट जो आपको वैलिडेट करता होवह आपको अपना आदी बना लेता है। ग्रैंड व्यू रिसर्च के मुताबिक साल 2024 में एलएलएम मॉडल्स का राजस्व करीब 6 बिलियन डॉलर था जो 2030 में बढ़कर करीब 35 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। इसके साथ ही कंसल्टिंग फर्म बेन एंड कपंनी के मुताबिक 2030 तक एआई की वैश्विक माँग को पूरा करने के लिए करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता है। ऐसे में कंपनियाँ अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए इंसान से उसकी सबसे कीमती चीज यानी समय चाहती है। वेबसाइट आर्जिव पर प्रकाशित एक प्रीप्रिंट अध्ययन के मुताबिक 85 प्रतिशत एआई यूजर्स प्रतिदिन चैटजीपीटी या अन्य किसी एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यूथ की आवाज और वाईएलएसी की एक सर्वे में पाया गया कि किशोर और युवा तनाव या अकेलापन दूर करने के लिए एआई का भावनात्मक समर्थन लेते हैं।
 लेकिन ये चैटबॉट्स हमारे दिमाग के साथ क्या खेल खेल रहे हैंहमें यह समझना बहुत जरूरी है। मसलन अगर आपने गुस्से में अपने परिवार में किसी को कुछ बुरा-भला कह दियाऔर आपके मन में थोड़ा संदेह है कि शायद आपने गलत किया। जब आप एआई से इस बारे में पूछते हैं तो वह कहता है कि गुस्सा आना तो स्वाभाविक हैशायद आपके परिवार वालों ने ही आपको यह करने पर मजबूर किया हो। फिर क्या हमे क्लीन चिट मिल गई । यानी मशीन अब इंसानी रिश्तों को खत्म रखने की ताकत रख रही है। ब्रूकिंग्स की एक रिपोर्ट के मुतााबिक एआई चापलूसी से कई तरह के सामाजिक और नैतिक खतरें सामने आये हैं। हम पहले से ही सोशल मीडिया पर अपनी पसंद की चीजें देखते के आदी हो चुके हैं और एआई इस इको चैंबर को और भी संकरा बना रहा है। यह एक तरह के डिजिटल ब्रेनवॉश की तरह भी काम कर सकता है। मसलन एआई को पता है कि आपको कैसे खुश करना हैंतो अगर उसे कोई उत्पाद आपको बेचना हो तो वह धीरे-धीरे आपको कोई प्रोडेक्ट खरीदनेकिसी विचारधारा से जुड़ने के लिए भी मना सकता है। हालांकि दुनियाभर में बढ़ रही चिंताओं को लेकर अब कंपनियों ने भी इस पर  कदम उठाने की पहल की है। इस साल मई में चैट जीपीटी ने अपना जीपीटी 4o अपडेट को वापस लिया और मॉडल की चापलूसी कम करने के लिए एक प्रशिक्षण आधारित उपाय भी लागू किये। हालांकि जब तक कंपनियाँ पूरी तरह से यह काम नहीं करती तब तक यह जिम्मेदारी हमारे ऊपर है।
 हमें यानी आम यूज़र्स को अपनी अक्ल का इस्तेमाल बंद नहीं करना चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि चैटजीपीटी या कोई भी एआई कोई ज्ञानी महात्मा नहीं है। वह एक सॉफ्टवेयर है जो शब्दों का खेल खेल रहा है। जब भी एआई आपकी बहुत ज्यादा तारीफ करे या आपको किसी गलत काम के लिए भी सही ठहराएतो आपके कान खड़े हो जाने चाहिए। आपको खुद से सवाल पूछना चाहिए कि "क्या यह सच बोल रहा है या सिर्फ मुझे खुश कर रहा है?" साथ ही हमें यह समझना ज़रूरी है कि हम तकनीक का इस्तेमाल अपनी मदद के लिए कर रहे हैंन की तकनीक की गुलामी करने के लिए ।

प्रभात खबर में 08/01/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, January 6, 2026

भाषा की दीवारें ढहा रही डबिंग की क्रांति

 


एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

आज का युवा कोरियन ड्रामास्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फ़िल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फ़िल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

 

भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर परसाल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब कियाजिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म जियोहॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तककंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।

 

भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्सबढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्टप्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही हैजिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया हैबल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।

 

ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहींबल्कि एक वैश्विक संवादसांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएँ हैं।

अमर उजाला में 06/01/2026 को प्रकाशित 

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