Wednesday, February 11, 2026

रियल एक्सप्रेशन की जरूरत

ए साल में आप सब जरुर खुशियों के साथ टैग हो गए होंगे,खुशियों के साथ हैंग आउट जारी होगा और चिली वेदर में चिलेक्स कर रहे होंगें.  अब चूँकि नया साल है तो मैंने सोचा क्यूँ न आपके साथ एक नयी भाषा में बात की जाए जिसे जेन ज़ी  ज्यादा बेहतर समझती है . जेन जी के लोग हमारी पीढ़ी से की मामले में अलग हैं जैसे उन्होंने इंटरनेट के साथ अपनी आँखें खोलीं |वे इंस्टा रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के साथ पाले बढ़े.तरह तरह के मोबाईल के बारे जानना और चलाना उनके लिए बच्चों  का खेल है पर हम लोगों को सब सीखना पड़ा. उन्ही एप की दुनिया में तरह-तरह  के मेसेजिंग एप हैं. जिनमें प्रमुख हैं चैटिंग एप जैसे व्हाट्स एप। जब मैं ये लेख लिख रहा था तभी मुझे किसी व्हाट्स एप ग्रुप में यह चुटकुला पढ़ने को मिला. “कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है... अगर तुम  १०:३० बजे ही सो जाती है तो तुम्हारे  व्हाट्सएप्प पर "लास्ट सीन :३०  एमक्यों दिखाता हैहा हा और मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी असल में नए नए मोबाईल एप हमारी जिन्दगी में किस तरह असर डाल रहे हैं इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है. यारी दोस्ती करना अच्छी बात है पर यारी दोस्ती जब ज्यादा लोगों से हो जायेगी तो समस्या आयेगी ही. क्योंकि एक ओर मोबाईल नेट  क्रांति ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है.  वहीं कहीं हम बैकवर्ड न घोषित कर दिए जाएँ इस दौड़ में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं वो सबके सब हमारे मोबाईल पर होने चाहिए जैसी रेस में शामिल हो जाते हैं । इस दौड़ में जेन जी सबसे आगे हैं इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशन लेस कर दिया कि हमें अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्नीकल एक्सप्रेशन यानि इमोजीस के गुलाम बन गये. हंसी आये या ना आये हा हा लिख कर कोई स्माईली बना दो.  सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं पर क्या आप वाकई खुश हैं क्यूँ अब मैं थोडा सा हंस लूँअक्सर हम चैट पर यही कर रहे होतें वर्च्युल चैटिंग में हम जीवन की रियल प्रॉब्लम का सल्यूशन ढूंढने लग गए हैं .हमारी फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे क्यूंकि कोई न कोई चैटिंग एप हर कूल डूड यानि जेन जी  के मोबाईल में रहता है और इससे कोई भी ,कभी भी आपको संदेसा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं कि नहीं.  दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी,चैटिंग एप और कुछ न बताएं तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी ख़ास एप पर कितने एक्टिव हैं अगर इससे बचना है तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. ये तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या फिर आप इमोशनली वीक है.  

मेरे जेन ज़ी मामले और भी हैं ज्यादा चैटिंग ये बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं चैटिंग करने के लिए उम्र पडी है.  ये टाईम कुछ पाने का ,कुछ कर दिखाने का है.बात जिन्दगी की हो या रिश्तों की हम जितने सिलेक्टिव रहेंगे उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है,जो आपके अपने है उन्हें वर्च्युल एक्सप्रेशन नहीं रीयल एक्सप्रेशन की जरुरत है.ईमोजीस आँखों को अच्छी लगती हैं पर जरुरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं उन्हें दिल से जोडिये नहीं तो एक वक्त ऐसा आएगा जब आप होंगे और आपकी तन्हाई मोबाईल की फोनबुक भरी होगी पर दिल की गलियां सूनी होंगीं तो अपने अपनों से मिलने जुलने का सिलसिला बनाये रखिये.  

 प्रभात खबर में 11/02/2026 को प्रकाशित 

Monday, January 26, 2026

युवाओं के सपनों को उड़ान डे रहे हैं देश के स्टार्ट अप्स

 

स्टार्टअप इंडिया आज सिर्फ एक सरकारी योजना नहींबल्कि आम भारतीय युवाओं के सपनों और हौसलों का प्रतीक बन चुका है। साल 2016 में शुरू हुई इस पहल ने बीते दस वर्षों में देश की सोच और काम करने के तरीके को बदल दिया है। .उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) की ‘स्टार्टअप इंडिया वार्षिक मान्यता रिपोर्ट’. के अनुसारसाल 2025 में करीब 44 हजार नए स्टार्टअप पंजीकृत हुएजो अब तक किसी एक साल में सबसे बड़ी संख्या है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2026 तक भारत में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की कुल संख्या दो लाख से ज्यादा हो चुकी है.  यह साफ दिखाता है कि अब देश में नौकरी मांगने की बजाय नौकरी देने की सोच तेज़ी से मजबूत हो रही है.

स्टार्टअप्स ने न केवल रोजगार सृजन किया है बल्कि युवाओं को आत्मनिर्भरता और नवाचार की ओर प्रेरित किया है.  सामाजिक दृष्टि से यह आंदोलन ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच अवसरों की खाई को कम कर रहा हैमहिलाओं की भागीदारी बढ़ा रहा है और तकनीकी समाधान से शिक्षास्वास्थ्य व पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला रहा है.

 डीपीआईआईटी और वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त आकलन. के अनुसार आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। नैसकॉम (NASSCOM) और ट्रैक्शन की ‘भारतीय तकनीकी स्टार्टअप परिदृश्य रिपोर्ट’. के आंकड़े बताते हैं कि देश में 120 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियां मौजूद हैं.  यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब दुनिया भर में निवेश की रफ्तार धीमी रहीजिसे ‘फंडिंग विंटर’ कहा गया। इसके बावजूद भारतीय स्टार्टअप्स ने लागत नियंत्रणमुनाफे और स्थिर बिजनेस मॉडल पर ध्यान देकर निवेशकों का भरोसा बनाए रखा.

 इस स्टार्टअप आंदोलन की सबसे अहम बात इसका भौगोलिक विस्तार है। डीपीआईआईटी की ‘राज्यों की स्टार्टअप रैंकिंग रिपोर्ट’. के अनुसारभारत के लगभग 50 प्रतिशत स्टार्टअप अब टियर-2 और टियर-3 शहरों से आ रहे हैं। जयपुरइंदौरलखनऊअहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर अब सिर्फ उपभोक्ता नहींबल्कि नवाचार के केंद्र बनते जा रहे हैं। छोटे शहरों के युवा स्थानीय समस्याओं—जैसे खेतीशिक्षास्वास्थ्य और लॉजिस्टिक्स—के लिए तकनीक आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि स्टार्टअप इंडिया ने उद्यमिता को वास्तव में लोकतांत्रिक बना दिया है.

 महिला उद्यमिता के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। .‘भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाएं रिपोर्ट (WISER)’. के अनुसारभारत के करीब 45 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला संस्थापक या निदेशक शामिल है। यह आंकड़ा बीते पांच वर्षों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि महिलाएं अब केवल फैशन या शिक्षा तक सीमित नहीं हैंबल्कि फिनटेकहेल्थ-टेकमैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी नेतृत्व कर रही हैं। इसी वजह से भारत महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाने लगा है.

रोजगार के मोर्चे पर स्टार्टअप्स का प्रभाव और भी गहरा है। डीपीआईआईटी की ‘स्टार्टअप प्रभाव रिपोर्ट’. के अनुसारस्टार्टअप्स अब तक सीधे तौर पर 21 लाख से अधिक नौकरियां पैदा कर चुके हैं। वहीं .नीति आयोग की ‘भारत में गिग इकॉनमी और भविष्य का कार्य’ रिपोर्ट. बताती है कि गिग इकॉनमी तेजी से फैल रही है और आने वाले वर्षों में करोड़ों युवाओं को लचीले रोजगार के अवसर मिलेंगे। आज गिग वर्क सिर्फ डिलीवरी सेवाओं तक सीमित नहीं हैबल्कि इसमें आईटी प्रोफेशनल्सडिजाइनर्सकंटेंट क्रिएटर्स और कंसल्टेंट्स भी शामिल हैं।ये स्टार्ट अप इंडिया का ही कमाल है कि गिग एकोनॉमी स्टार्ट अप इंडिया के साथ मिलकर एक नए भारत का निर्माण कर रही है.

 तकनीक के क्षेत्र में 2025 खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप-टेक का साल रहा। .नैसकॉम–जिनोव की ‘डीप-टेक स्टार्टअप रिपोर्ट’. के अनुसारबड़ी संख्या में नए स्टार्टअप एआईस्पेस-टेकरोबोटिक्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी में काम कर रहे हैं। .इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ‘इंडिया एआई मिशन प्रगति रिपोर्ट’. के मुताबिकसरकार ने स्टार्टअप्स को कंप्यूटिंग पावर और डेटा तक आसान पहुंच दी हैजिससे भारतीय भाषाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप तकनीकी समाधान तैयार किए जा रहे हैं.

 सरकारी नीतियों ने इस पूरे सफर को मजबूती दी है। .वित्त मंत्रालय और डीपीआईआईटी की ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस सुधार रिपोर्ट’. बताती है कि एंजेल टैक्स जैसी बाधाओं को हटाया गया और नियमों को सरल किया गया। वहीं .गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) की वार्षिक रिपोर्ट. के अनुसारस्टार्टअप्स ने सरकारी प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों करोड़ रुपये का कारोबार किया है। इसके अलावा .स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना और क्रेडिट गारंटी योजना पर डीपीआईआईटी की प्रगति रिपोर्ट. यह दिखाती है कि पूंजी की कमी अब अच्छे विचारों के रास्ते में बड़ी बाधा नहीं रही.

 कुल मिलाकर, 2025 में दर्ज हुए ये हजारों स्टार्टअप सिर्फ आंकड़े नहीं हैंबल्कि उस बदलते भारत की तस्वीर हैं जो आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अलग-अलग सरकारी और उद्योग रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि स्टार्टअप इंडिया अब एक स्थायी और निर्णायक आंदोलन बन चुका है। चुनौतियां जरूर हैंलेकिन उद्योग संवर्धन विभागनीति आयोग और नैसकॉम जैसे संस्थानों के आकलन साफ संकेत देते हैं कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ने में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक मजबूत आधार बनने जा रहा है। मोबाईल क्रांति होने के साथ अब आने वाले दशक में इसमे वृद्धि होने की संभावना है आंकड़े बताते है की आने वाले वक्त में इससे भारतीय एप बाजार में बड़ा परिवर्तन होगा और कंप्यूटर शिक्षा में नवाचार बढ़ने से और स्टार्ट अप कम्पनियों को वित्त के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ेगा .जाहिर है भारतीय एप के डिजीटल प्लेटफार्म पर बढ़ती संख्या देश की बड़ी आबादी का जहाँ जीवन आसान करेगी वहीं विकसित  भारत का सपना जल्दी ही हकीकत का रूप लेगा. 

प्रभात खबर में 26/01/2026 को प्रकाशित 

Friday, January 9, 2026

सिंथेटिक कंटेन्ट और डिजिटल भरोसा


आज के तकनीकी दौर में रोजाना हमारी स्क्रीन पर कंटेंट की बाढ़ आई रहती हैन्यूज फीड की सुर्खियाँ हो या चमकदार तस्वीरें और वीडियोजपहली नजर में सब कुछ उतना ही वास्तविक और विश्वस्नीय लगता है जितना होना चाहिए लेकिन कुछ ही समय में हमारे दिमाग में एक सवाल कौंधता है कि यह जो मैं देख रहा हूँक्या यह सचमुच किसी इंसान ने बनाया हैया यह सब एआई द्वारा निर्मित है। यह वही मोड़ है जहाँ सिंथेटिक कंटेंट की शुरुआत होती हैसिंथेटिक कंटेंट यानी एआई द्वारा निर्मित कंटेंट जो दिखने में असली लगता है लेकिन वह पूर्ण रूप से एआई जेनरेटेड होता है । शायद यही कारण है कि आज इंटरनेट पर मिलने वाली हर सूचना के साथ एक हल्का सा शक भी जुड़ गया है। जहाँ एक ओर एआई ने कंटेंट बनाने की प्रक्रिया को बेहद सरल बना दिया है। अब कुछ ही मिनटों में लेखफोटो और वीडियो तैयार हो जाते हैं। वहीं दूसरी ओर इस सहजता ने हमारे डिजिटल भरोसे की नींव को हिला दिया है। परिणामस्वरूप हम ऐसे युग में पहुँच चुके हैंजहाँ भ्रमअविश्वास और अनिश्चितता का माहौल आम हो गया है। 

डीपफेक अब एक शरारत नहीं बल्कि राजनीतिक हेरफेर और वित्तीय धोखाधड़ी का एक शक्तिशाली हथियार बन चुका है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में  चुनावों के दौरान नेताओं के नकली वीडियो और ऑडियो का वायरल होना आम बात हो गई है। हाल ही संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव फिल्म एक्टर मनोज बाजपेयी का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह आरजेडी के समर्थन में बयान देते नजर आ रहे थेपड़ताल करने पर मालूम चला यह वीडियो एआई जेनरेटेड हैऔर एक्टर को सफाई तक पेश करनी पड़ी। पिनड्रॉप की 2025 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक डीपफेक और वॉयस-क्लोनिंग आधारित धोखाधड़ी के मामलों में 1,300 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है वहीं वेबसाइट साई-टेक टुडे द्वारा संकलित आँकड़े बताते हैं कि 2023 में जहाँ लगभग 5 लाख डीपफेक मौजूद थेवहीं 2026 तक इनकी संख्या बढ़कर 80 लाख तक पहुँचने का अनुमान है। 2021 में यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की का एक डीपफेक वीडियो वायरल किया गया था जिसमें वे सैनिकों को रूस के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दे रहे थेइसी तरह इंडोनेशिया के पूर्ण राष्ट्रपति सहारतो की मृत्यु के बाद उनका एक नकली भाषण डीपफेक के रूप में बनाया गया था। ब्लैकबर्ड एआई नामक संस्था के अध्ययन के मुताबिक 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान 75 प्रतिशत वोटर्स को राजनीतिक डीपफेक कंटेंट मिला और वहीं 25 प्रतिशत यूजर्स ने उसे सच भी समझ लिया। भारतीय मीडिया में ऐसी कई खबरें आई जिनमें चुनावी रैली के दौरान पीएम मोदी गरबा नृत्य करते नजर आ रहे थेबाद में जांच में ये साबित हुआ कि ये एआई जनित डीपफेक वीडियो है।

 इस कंटेंट की बढ़ती बाढ़ ने एक नये शब्द सूचना प्रदूषण को जन्म दिया हैजहाँ इंटरनेट पर मौजूद डेटा का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब मशीन द्वारा निर्मितनिम्न गुणवत्ता वाला और अप्रामाणिक है। यूनेस्को के मुताबिक सिंथेटिक मीडिया के अंतर्गत चेहरे की नकल करना (फेस स्वैप)लिप-सिंक या आवाज की नकल (वॉयस क्लोनिंग ) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा हैइसके साथ ही भाषा मॉडल जैसे चैटजीपीटीजैमिनी जो एक प्रॉम्ट से लेखसंवाद या छवियाँ तैयार कर सकते हैं का उपयोग बड़ी मात्रा में किया जा रहा है। ये जेनरेटिव एआई कंटेंट जेनरेटिव एडवर्सेरियल नेटवर्क पद्धित का उपयोग करते हैं। इनकी मदद से चित्रवीडियो और आवाज पूरी तरह से नए सिरे से बनाई जाती हैदूसरी ओर मीडियो को बदलकर उसे तोड़ मरोड़ कर हूबहू नकल तैयार की जाती है। यह सब इतना य़थार्थपूर्ण हो गयाहै कि एक सामान्य श्रोता या दर्शक के लिए असली और नकली में फर्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। इसके साथ ही आर्थिक धोखाधड़ी के मामलों में भी इस तरह के सिंथेटिक मीडिया का उपयोग भरपूर हो रहा हैसाल 2024 में ऐसे कई मामले सामने आये जिसमें वॉयस क्लोनिंग के जरिए जालसाजों ने महिलाओंबुजुर्गों और नौजवानों से पैसे ऐंठ लिए। हाल ही में हैदराबाद की 72 वर्षीय महिला को उसके रिश्तेदार की आवाज में वॉयस क्लोनिंग करके करीब 2 लाख रूपये ठगने का मामला सामने आया था। मैक्फी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हुए एआई आधारित फेक वॉयस कॉल स्कैम में करीब 83 प्रतिशत लोगों शिकार हुए लोगों ने आर्थिक नुकसान उठाया वहीं इनमें 48 प्रतिशत से अधिक लोगों का नुकसान पचास हजार से भी अधिक रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि करीब 69 प्रतिशत लोगों को असली और एआई क्लोन आवाज में फर्क करना मुश्किल लगता है।

 वहीं अब इस तरह के सिंथेटिक कंटेंट ने अदालतों के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी हैपहले जहाँ डिजिटल सबूतों को मजबूत और भरोसेमंद माना जाता था वहीं अब वे संदेह के घेरे में हैं। 2024 में गार्टनर की ओर से जारी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि 2027 तक दुनियाभर के कोर्ट में पेश किए जाने वाले डिजिटल सबूतों में 30 प्रतिशत से अधिक सामग्री एआई-छेड़छाड़ वाली हो सकती है। यानी अदालतों को अब हर फोटोवीडियो और ऑडियो की भी बारीकी से जाँच करनी पड़ेगीक्योंकि पहली नजर में असली और नकली में फर्क करना अब मुश्किल हो गया है। कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए एआई फोरेंक्सिक्स यूनिट बनाने का फैसला लिया है ताकि डिजिटल टैंपरिंग को पकड़ा जा सके। इसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में भी सिंथेटिक एआई कंटेंट ने स्कूलों और कॉलेजों के लिए नई मुसीबत पैदा कर दी है। हाल ही में टर्नट्रिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉलेज असाइनमेंट में एआई जनित कंटेंट तेजी से बढ़ा है। हालांकि कई विश्वविद्यालयों ने एआई डिटेक्शन टूल अपनाए हैं मगर विशेषज्ञ बताते हैं कि ये उन्नत मॉडल्स इन टूल्स को भी धोखा देने में कामयाब हो जाते हैं। मिनटों में निबंधरिसर्च पेपर और प्रोजेक्ट होने वाली दुनिया में असली मेहनत और विश्लेषण कौशल कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

 सिंथेटिक कंटेंट का एक बड़ा खतरा अब सर्टिफिकेटडिग्री और पहचान-पत्र जैसे संवेदनशील दस्तावेजों पर भी मंडराने लगा है। एआई की मदद से मिनटों में फेक अनुभव-पत्रनकली डिग्री या ट्रेनिंग सर्टिफिकेट तैयार किए जा सकते हैंजो देखने में इतने असली लगते हैं कि पहली जांच में पकड़ में ही नहीं आते। हाल ही में भारतीय रेलवे में भी एक चौंकाने वाला मामला सामने आयाजहाँ यात्री एआई-जनरेटेड फर्जी ट्रेन टिकट के साथ यात्रा करते हुए पकड़े गए। टिकट पर QR कोड से लेकर पूरा लेआउट तक इतना असली दिख रहा था कि शुरुआती जांच में किसी को शक तक नहीं हुआलेकिन वेरिफिकेशन में पूरा खेल खुल गया। यह घटनाएँ कोई एक-दो मामले नहींबल्कि उस बड़े खतरे की स्पष्ट आहट हैं जिसकी ओर हम तेजी से बढ़ रहे हैं। एक ऐसी दुनियाजहाँ असली और नकली में फर्क करना मुश्किल होता जाएगा और हम धीरे-धीरे हर दस्तावेज़हर प्रमाण और हर पहचान पर शक करने को मजबूर हो जाएंगे।

 कई देश और कंपनियाँ अब इस समस्या को गंभीरता से लेकर कार्रवाई में जुट गई हैं। भारत सरकार ने हाल में ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे एआई निर्मित फोटो/वीडियो पर स्पष्ट लेबल लगाने के आदेश दिए हैंड्रॉफ्ट गाइ़डलाइन्स के मुताबिक  AI-जेनरेटेड चित्रों या वीडियो में कम से कम 10% हिस्सा मार्कर लगाना होगा ताकि दर्शक पहचान सकें कि यह असली नहीं है । इसके साथ ही बॉलीवुड सितारे भी अपने नाम-शब्द व छवि के बिना अनुमति के उपयोग पर अदालत का रूख कर रहे हैंजिससे भविष्य में डीपफेक निर्मातओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की गुंजाइश बढ़ी है। इसके अतिरिक्त तकनीकी तौर पर भी चेहरों की सूक्ष्म हरकतोंस्वर मापदंडों को पहचानने वाले डीपफेक डिटेक्शन टूल विकसित किये जा रहे हैं। इन तकनीकों के साथ डिजिटल साक्षरता को बढ़ाना उतना ही आवश्यक हैइंटरनेट यूजर्स को फर्जी खबरो,वीडियो और इमेज की पहचान करनी सीखनी चाहिए और संदिग्ध सामग्री मिलने पर उसे रिपोर्ट करना चाहिए। कुल मिलाकर मीडिया प्लेटफॉर्मसरकार और समाज जब ये तीनों मिलकर सतर्क रहेंगे तभी हम इस सूचना प्रदूषण के युग में सच को ढूंढ पायेंगे। 

 दैनिक जागरण में 09/01/2026 को प्रकाशित 

Thursday, January 8, 2026

एआइ से सतर्क रहने की भी आवश्यकता है


 
मैं जो बोलू हाँ तो हाँ मैं जो बोलू ना तो ना मैं जो बोलू हाँ तो हाँ मैं जो बोलू ना तो ना… 197में आई फिल्म प्रियतमा  का यह मशहूर गीत आज के इस तकनीकी दौर की एक डरावनी हकीकत बन रहा है। क्या हो अगर आपके पास एक ऐसा सलाहकार है जो आपकी हर बात से सहमत है। वह आपकी हर राय को सही ठहराता हैआपके हर नैतिक संदेह को सही होने का प्रमाण पत्र देता है। पहली नजर में यह सुखद लग सकता है मगर गहराई में सोचें तो यह इंसान को उसके बौद्धिक पतन की ओर ले जा सकता है। दुर्भाग्य से एआई विशेष रूप से एलएलएम मॉडल्स तेजी से इसी वास्तविकता की ओर बढ़ रहे हैं। हाल ही में स्टैंडफोर्ड और कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। प्रकाशित ताजा शोध में सामने आया है कि एआई सिस्टम इंसानों की तुलना में 50 प्रतिशत से भी अधिक चापलूस होते हैं। चैटजीपीटीजैमिनीग्रोक समेत 11 से अधिक एआई सिस्टम पर किये गए इस शोध में पाया गयाकि ये मॉडल्स अक्सर वही बात करते हैं जो लोग सुनना चाहते हैं। आसान भाषा में समझे को एआई आपकी नजरों में अच्छा बनने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेश करता है। शोधकर्ताओं ने इस व्यवहार को एआई साइकोफैंसी या एआई चापलूसी का नाम दिया है।
 हालांकि पहली नजर में एआई का चापलूसी व्यवहार किसी तरह की तकनीकी खामी लग सकता हैमगर विशेषज्ञ इसे एक सचेत डिजाइन का परिणाम बताते हैंजो हमारे मनोविज्ञान के साथ खिलवाड़ कर रहा है। हमारे दिमाग में यह सवाल भी खड़ा होता हैकि आखिर एक मशीन को चापलूसी करने की क्या जरूरत हैउसे कौन सा हमसे प्रमोशन चाहिए या कौन सा चुनाव लड़ना है। असल में यह सब सिखाने के तरीके का नतीजा है। इन एआई मॉडल्स को अक्सर इंसानों द्वारा दिए गए फीडबैक से सिखाया जाता हैइसे तकनीकी भाषा में आरएलएचएफ कहते हैं। आसान शब्दों में समझे तो जब एआई जवाब देता है तो इंसानी परीक्षक उसे रेटिंग देते हैं। अगर एआईव्यक्ति के सवालों का रूखा जवाब दे या कहे आप गलत हो तो लोग उसे खराब रेटिंग देते हैं। और वहीं एआई अगर प्यार सेचापलूस बातें करे तो उसे अच्छी रेटिंग मिलती है। बस फिर क्या मशीन को भी उतनी अक्ल आ गई कि फाइव स्टार रेटिंग चाहिए तो मालिक की हाँ में हाँ मिलाते रहो । क्योंकि एआई को सच बोलने का इनाम नहीं मिलता बल्कि आपको खुश रखने का इनाम मिलता है।
 साथ ही इसके पीछे कंपनियों का बढ़ता मुनाफा भी एक कारण है। गूगलमेटाओपनएआई जैसी बड़ी कंपनियाँ चाहती हैं कि आप उनके मॉडल्स पर अधिक से अधिक समय बिताएँ। आप खुद सोचिए आप किस दोस्त के पास बार-बार जाना पसंद करेंगेजो हर बात पर आपकी गलतियाँ निकालता हो याजो ये कहे जो तुम कहो वही सही है।
जाहिर है हम दूसरे वाले के पास जाएंगे। एआई कंपनियाँ इसी मनोविज्ञान का फायदा उठा रही हैं। एक ऐसा चैटबॉट जो आपको वैलिडेट करता होवह आपको अपना आदी बना लेता है। ग्रैंड व्यू रिसर्च के मुताबिक साल 2024 में एलएलएम मॉडल्स का राजस्व करीब 6 बिलियन डॉलर था जो 2030 में बढ़कर करीब 35 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। इसके साथ ही कंसल्टिंग फर्म बेन एंड कपंनी के मुताबिक 2030 तक एआई की वैश्विक माँग को पूरा करने के लिए करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता है। ऐसे में कंपनियाँ अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए इंसान से उसकी सबसे कीमती चीज यानी समय चाहती है। वेबसाइट आर्जिव पर प्रकाशित एक प्रीप्रिंट अध्ययन के मुताबिक 85 प्रतिशत एआई यूजर्स प्रतिदिन चैटजीपीटी या अन्य किसी एआई चैटबॉट का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यूथ की आवाज और वाईएलएसी की एक सर्वे में पाया गया कि किशोर और युवा तनाव या अकेलापन दूर करने के लिए एआई का भावनात्मक समर्थन लेते हैं।
 लेकिन ये चैटबॉट्स हमारे दिमाग के साथ क्या खेल खेल रहे हैंहमें यह समझना बहुत जरूरी है। मसलन अगर आपने गुस्से में अपने परिवार में किसी को कुछ बुरा-भला कह दियाऔर आपके मन में थोड़ा संदेह है कि शायद आपने गलत किया। जब आप एआई से इस बारे में पूछते हैं तो वह कहता है कि गुस्सा आना तो स्वाभाविक हैशायद आपके परिवार वालों ने ही आपको यह करने पर मजबूर किया हो। फिर क्या हमे क्लीन चिट मिल गई । यानी मशीन अब इंसानी रिश्तों को खत्म रखने की ताकत रख रही है। ब्रूकिंग्स की एक रिपोर्ट के मुतााबिक एआई चापलूसी से कई तरह के सामाजिक और नैतिक खतरें सामने आये हैं। हम पहले से ही सोशल मीडिया पर अपनी पसंद की चीजें देखते के आदी हो चुके हैं और एआई इस इको चैंबर को और भी संकरा बना रहा है। यह एक तरह के डिजिटल ब्रेनवॉश की तरह भी काम कर सकता है। मसलन एआई को पता है कि आपको कैसे खुश करना हैंतो अगर उसे कोई उत्पाद आपको बेचना हो तो वह धीरे-धीरे आपको कोई प्रोडेक्ट खरीदनेकिसी विचारधारा से जुड़ने के लिए भी मना सकता है। हालांकि दुनियाभर में बढ़ रही चिंताओं को लेकर अब कंपनियों ने भी इस पर  कदम उठाने की पहल की है। इस साल मई में चैट जीपीटी ने अपना जीपीटी 4o अपडेट को वापस लिया और मॉडल की चापलूसी कम करने के लिए एक प्रशिक्षण आधारित उपाय भी लागू किये। हालांकि जब तक कंपनियाँ पूरी तरह से यह काम नहीं करती तब तक यह जिम्मेदारी हमारे ऊपर है।
 हमें यानी आम यूज़र्स को अपनी अक्ल का इस्तेमाल बंद नहीं करना चाहिए। हमें यह याद रखना होगा कि चैटजीपीटी या कोई भी एआई कोई ज्ञानी महात्मा नहीं है। वह एक सॉफ्टवेयर है जो शब्दों का खेल खेल रहा है। जब भी एआई आपकी बहुत ज्यादा तारीफ करे या आपको किसी गलत काम के लिए भी सही ठहराएतो आपके कान खड़े हो जाने चाहिए। आपको खुद से सवाल पूछना चाहिए कि "क्या यह सच बोल रहा है या सिर्फ मुझे खुश कर रहा है?" साथ ही हमें यह समझना ज़रूरी है कि हम तकनीक का इस्तेमाल अपनी मदद के लिए कर रहे हैंन की तकनीक की गुलामी करने के लिए ।

प्रभात खबर में 08/01/2026 को प्रकाशित 

Tuesday, January 6, 2026

भाषा की दीवारें ढहा रही डबिंग की क्रांति

 


एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

आज का युवा कोरियन ड्रामास्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फ़िल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फ़िल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

 

भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर परसाल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब कियाजिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म जियोहॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तककंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।

 

भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्सबढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्टप्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही हैजिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया हैबल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।

 

ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहींबल्कि एक वैश्विक संवादसांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएँ हैं।

अमर उजाला में 06/01/2026 को प्रकाशित 

Monday, December 15, 2025

सोशल मीडिया पर प्रतिबन्ध नहीं, जागरूकता जरुरी

 

इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है. इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो लीअब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है. कई देशों के न्यूरो वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिकलोगों पर इंटरनेट और डिजिटल डिवाइस से लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं. मुख्य रूप से इन शोधों का केंद्र युवा पीढ़ी पर नई तकनीक के संभावित प्रभाव की ओर झुका हुआ हैक्योंकि वे ही इस तकनीक के पहले और सबसे बड़े उपभोक्ता बन रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया है. यह एक ऐतिहासिक कदम है जिसने दुनिया भर का ध्यान खींचा है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब कई देशों में सरकारें नाबालिगों को ऑनलाइन कंटेंट और साइबरबुलिंग से बचाने के लिए नियम बना रही हैं. पिछले साल पास हुए कानून के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुकइंस्टाग्रामकिकरेडिटस्नैपचैटथ्रेड्सटिकटॉकएक्सयूट्यूब अगर 16 साल से कम उम्र के ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के अकाउंट हटाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाते हैं तो उनपर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (3.29 करोड़ यूएस डॉलर) तक का जुर्माना लग सकता है.हालांकि मेटाटिकटॉक और एक्स जैसी कंपनियों को इस बैन लिस्ट में रखा गया है वहीं स्ट्रीमिंग वेबसाइट यूट्यूब को इस बैन से छूट दी गई है. कानून में तर्क दिया गया है कि चूंकि स्कूलों में यूट्यूब का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है इस लिए इसे बैन से अलग रखा गया है. भारत में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कुछ लोग इस तरह के कदमों की मांग कर रहे हैंलेकिन क्या भारत में सोशल मीडिया पर बैन करना वास्तव में इस समस्या का हल है?बैन किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता .भारत के कुछ राज्यों में शराबबंदी लागू है पर इससे वहां शराब की तस्करी बढ़ गयी और नशे की समस्या खत्म नहीं हुई .

 दरअसल तकनीक ने पिछले कुछ बरसों में हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है. आज स्मार्टफोनटैबलेट समेत अन्य डिजिटल डिवाइस आज हर व्यक्ति की जीवन शैली का हिस्सा है. कम्यूनिटी बेस्ड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकर सर्कल्स के एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक भारत  में 60 प्रतिशत बच्चे रोजाना 3 घंटे से अधिक सोशल मीडिया एप्स का इस्तेमाल करते हैं. वहीं किशोरों में यह आंकड़ा और अधिक है. आज भारत में सोशल मीडिया का प्रभाव काफी गहरा है. सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के लिए आज न केवल मनोरंजन का स्रोत है बल्कि एक शैक्षिक उपकरण के रूप में भी सामने आ रहा है. फेसबुकएक्सलिंक्डिइन जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों और किशोरों को नए रूप में अध्ययन सामग्री प्रदान करने के लिए विचारों और अभिव्यक्ति को स्थापित करने का एक मौका पेश करते हैं. उदाहरण के तौर पर यूट्यूबइंस्टाग्राम प्लेटफॉर्म बच्चों को उनकी रचनात्मकता विकसित करने और शिक्षा से जुड़े लेक्चर्सशॉर्ट वीडियो प्रदान करते हैंजो उनके लिए काफी उपयोगी साबित होता है. भारत जैसे देश में जहाँ तकनीक पहले आ रही है उसके इस्तेमाल करने का तरीका बंद में बन रहा है .इसे यूँ कहें मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब दो पीढी एक साथ किसी तकनीक के इस्तेमाल करने का तरीका एक साथ सीख रहे हैं .सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल का तरीका न माता पिता को पता और न ही बच्चों को .बढ़ते शहरीकरण ने संयुक्त परिवारों को खत्म सा कर दिया .एकल परिवार में माता पिता दोनों व्यस्त हैं तो बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाईल पकड़ा दिया जाता है .बच्चे घर से बाहर खेलने जा नहीं पाते क्योंकि खेल के मैदान या पार्क हैं ही नहीं .नतीजा सोशल मीडिया और मोबाईल का अनियंत्रित इस्तेमाल .भारत ऐसे ही दुश्चक्र का सामना कर रहा है .जिसका असर  मानसिक स्वास्थ्यपढ़ाई और सामाजिक जीवन पर नकारात्मक असर के रूप में पड़ता  है. लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है. शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है.नतीजतनहमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैजहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता हैवर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है. वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैंजिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं. और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलतातो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है.

हालांकि सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय इसे सीमित करना एक अधिक व्यावहारिक और संतुलित विकल्प हो सकता है. बच्चों और किशोरों को डिजिटल साक्षरता और सुरक्षा के विषय में प्रशिक्षित किया जाना चाहिएताकि वे सोशल मीडिया का उपयोग सकारात्मक और सुरक्षित तरीके से कर सकें. येल मेडिसिन की एक रिपोर्ट के सुझाव के  मुताबिक बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग सोने से एक घंटे पहले बंद कर देना चाहिए और इसका उपयोग केवल शैक्षिक या रचनात्मक उद्देश्यों के लिए होना चाहिए. इसके साथ हीमाता-पिता को बच्चों के लिए ऐसी योजना बनानी चाहिएजिसमें गोपनीयता सेटिंग्सअजनबियों से बचने और साइबर बुलिंग को रिपोर्ट करने की जानकारी भी शामिल हो .डिजिटल युग में यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है , इसे नजर अंदाज करना छात्रों के साथ एक बेईमानी की तरह होगा कि आप उन्हें वर्चुअल दुनिया से काट दें .छात्र सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर इस्तेमाल अपनी शिक्षा और करियर को पंख दे सकते हैं.
प्रभात खबर में 15/12/2025 को प्रकाशित 

Thursday, December 4, 2025

हमेशा ऑन लाइन रहने की कीमत

 

डिजिटल संचार जहाँ एक ओऱ संवाद को तात्कालिक और सुलभ बना रहा हैवहीं दूसरी ओर यह हमारी निजी और कामकाजी जिंदगी की सीमाओं को धुंधला कर रहा है। मसलन व्हाट्सएपमेटा के स्वामित्व वाला मैसेजिंग एप्लिकेशन आज वैश्विक संचार का पर्याय बन गया है। स्टैस्टिका के आंकड़ों के मुताबिक विश्वभर में करीब 2.7 अरब और भारत में 50 करोड़ से अधिक लोग इस एप का इस्तेमाल करते हैं। यह अब मात्र व्यक्तिगत चैट तक सीमित नहीं रहा  है बल्कि एक व्यावसायिक पारिस्थितिकी तंत्र बन चुका है। हालांकि हमें इस सुविधा की एक कीमत चुकानी पड़ रही है। हमेशा ऑन रहने की संस्कृति ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ काम के घंटे अनिश्चित हो गये हैं। दफ्तर का समय खत्म होने के बाद भी व्हाट्सएप पर बॉस या सहकर्मियों के मैसेज आना आम बात हो गई है और अनजाने में ये तात्कालिकता और हर समय उपलब्ध रहने की प्रवृत्ति लोगों में तनावचिंता और बर्नआउट का एक प्रमुख कारण बन रही है। अब काम केवल वो जगह नहीं रह गई जहाँ आप रोज 9 से 5 जाते हैं बल्कि एक ऐसी गतिविधि हो गई है जिसे आप लगातार करते हैं।

 अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट भी इस बात पर प्रकाश डालती है कि डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने वाले कर्मचारी न केवल अधिक घंटे काम करते हैंबल्कि अपने काम और जीवन के बीच संघर्ष का अनुभव करते हैं। व्हाट्सएप 'डिजिटल प्रेजेंटिज्मनाम की इस नई घटना को जन्म देता है जहाँ कर्मचारी दफ्तर में न होने पर भी ऑनलाइन उपलब्ध रहने के लिए मजबूर महसूस करते हैं। यह ईमेल प्रवृत्ति के ठीक विपरीत है जहाँ कर्मचारी को सोचने और जवाब देने के लिए पर्याप्त समय मिलता था। व्हाट्सएप का 'ब्लू टिकऔर 'लास्ट सीनफीचर इस दबाव को और बढ़ा देता हैजिससे एक अलिखित अपेक्षा पैदा होती है कि संदेश देख लिया गया है तो उसका तुरंत जवाब भी दिया जाना चाहिए।

 इसके साथ ही वाह्ट्सएप जैसे इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर  बातचीत में इमोजीस्टिकर और शब्दों को छोटा करके बोलना आम है। चूंक लिखित चैट में चेहरे के भावआवाज का भार और शारीरिक संकेत नहीं मिलते हैं तो पाठक को बहुत कुछ अनुमान लगाना पढ़ता है। एक बॉस द्वारा भेजा गये साधारण अंगूठे का इमोजी के कर्मचारी कई अर्थ निकाल सकता हैजिससे उसे संदेश के मूल को समझने के लिए अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा लगती है। एक औपचारिक ईमेल के माध्यम से किये गए अतिरिक्त काम के अनुरोध करना आसान होता हैलेकिन वहीं अनुरोध अगर व्हाट्एप पर एक अनौपचारिकमैत्रीपूर्ण संदेश के रूप में आता है तो उसे मना करना असभ्य लग सकता है। एटलैसिएन की रिपोर्ट बताती है कि अस्पष्ट ईमेल या चैट की वजह से हर साल कर्मचारी औसतन 40 घंटे बर्बाद कर देते हैं।

 हमारा मस्तिष्क एक समय में एक ही कार्य पर  गहराई से ध्यान केंद्रित करने के लिए बना हैलेकि व्हाट्सएप हमें लगातार कोड स्विचिंग के लिए मजबूर करता हैएक पल में ऑफिस का कोई महत्वपूर्ण काम वहीं  दूसरे पल फैमिली ग्रुप पर  व्यक्तिगत चैट। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध से पता चलता है कि निरंतर मल्टीटास्किंग हमारी कार्यशील मेमोरी  को कमजोर करती है और अंतत: बर्नआउट की ओऱ ले जाती है। यूँ तो ये घटना वैश्विक है लेकिन भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक आर्थिक कारक इसे कही अधिक गंभीर चुनौती बना देते हैं।

 हालांकि अब समय आ गया है जब लोगों और कंपनियों को इसके समाधान की दिशा में सक्रियता से काम करना होगा। कंपनियों को एक विस्तृत कम्यूनिकेश चार्टर या नीति बनाने कि आवश्यकता है जिसमें यह स्पष्ट रूप से परिभाषित हो कि किस संचार के लिए कौन सा प्लेटफॉर्म उपयोग किया जाए। साथ ही अपेक्षित प्रतिक्रिया का समयटाइम को डिस्कनेक्ट इसकी भी नीतियाँ बनाई जानी आवश्यक है।

प्रभात खबर में 04/12/2025 को प्रकाशित 

 

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