Tuesday, May 12, 2026

जीवन के संघर्ष का हमराही है गमछा

गर्मियां आ गयी वो भी पूरी शिद्दत से, बात गर्मी की हो तो शरीर को गर्मी से बचाने की पहली जरुरत टोपी होती है लेकिन टोपी एक शहरी अवधारणा ग्रामीण भारत जिस वस्त्र का उपयोग करता है उसे हम गमछे के नाम से जानते हैं . भारत की विविधता में गमछा कई नामों से जाना जाता है। उत्तर भारत में इसे अंगोछाअसम में गमोछाऔर दक्षिण भारत में अंगवस्त्रम कहते हैं। कहीं यह साफी है तो कहीं तुवालु। नाम चाहे जो भी होयह सूती वस्त्र अपनी सुगमता और बहुमुखी उपयोग के कारण हर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।इसे उदारीकरण का असर कहें या शहरी होने की चाह गमछा तौलिये के मुकाबले शहरों में पिछड़ा सा लगता है.इसे इस तरह से कह सकते हैं  तौलिए और गमछे की तुलना दरअसल दो संस्कृतियों की तुलना है—एक जो दिखावे के भारीपन से दबी हैऔर दूसरी जो सादगी के हल्केपन में उड़ रही है।तौलिया एक ऐसा सामान है जिसे 'रखरखावकी बीमारी है। इसे इस्तेमाल करने के बाद सुखाना एक प्रोजेक्ट है। अगर धूप न मिलेतो यह दो दिन में ही ऐसी गंध छोड़ने लगता है जैसे किसी पुराने पुस्तकालय की सीलन भरी किताबें हों। तौलिया अहंकारी होता हैवह केवल बदन पोंछने का काम करेगावह भी तब जब आप उसे सम्मानपूर्वक स्टैंड पर टांगें। आप तौलिए से अपनी स्कूटी साफ नहीं कर सकतेन ही इसे सिर पर पगड़ी की तरह बांधकर लू से बच सकते.गमछा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहींबल्कि एक चलता-फिरता स्विस आर्मी नाइफ है। 

इसके उपयोगों की सूची इतनी लंबी है कि इस पर शोध पत्र लिखा जा सकता है।सुरक्षा कवच: चिलचिलाती धूप में यही गमछा हेलमेट के नीचे पसीने का दुश्मन बनता है और चेहरे पर लपेट लिया जाए तो 'डाकूलुक के साथ-साथ लू से भी बचाता है।बाजार गए और थैला भूल गएकोई बात नहीं। गमछे के दो कोनों में गांठ लगाइए और देखिए कैसे यह दो किलो आलू और एक किलो टमाटर का बोझ हंसते-हंसते उठा लेता है.गाँव की पगडंडियों पर जब प्यास लगेतो इसी गमछे की चार परतें पानी छानने के काम आती हैं।किसी पार्क की बेंच गंदी हो या बस की सीट पर धूल होगमछा बिछाइए और 'महाराजाकी तरह विराजमान हो जाइए।आज की दुनिया 'सस्टेनेबिलिटीऔर 'ईको-फ्रेंडलीहोने का ढोंग कर रही हैलेकिन गमछा जन्मजात पर्यावरण प्रेमी है। तौलिए को धोने के लिए आपको बाल्टी भर पानी और ढेर सारे डिटर्जेंट की जरूरत पड़ती हैक्योंकि उसकी घनी बुनाई मैल को पकड़ कर बैठ जाती है। 

इसके विपरीतगमछा 'मिनिमलिस्टहै। आधा बाल्टी पानी और एक बार साबुन की टिकिया उस पर फिरा दी जाएतो वह चमक उठता है।सबसे बड़ी बात इसके सूखने की रफ्तार है। पंखे की हवा में भी यह दस मिनट में सूखकर तैयार हो जाता है। तौलिए की तरह इसे 'ड्रायरकी जरूरत नहीं पड़ती। इसका मतलब है—कम पानीकम बिजली और कम प्रदूषण। जब गमछा पुराना हो जाता हैतब भी वह हार नहीं मानता। वह 'पोछेके रूप में पदोन्नत होकर घर की सफाई करता है और अंत में मिट्टी में मिलकर विलीन हो जाता है। यह 'जीरो वेस्टजीवनशैली का असली ब्रांड एंबेसडर है।वहीं तौलिया आपको आलसी बनाता है। नहाने के बाद भारी तौलिए में लिपटे रहना एक सामंती सुख दे सकता हैलेकिन गमछा आपको फुर्ती देता है। गमछा कंधे पर होतो इंसान काम करने के लिए तैयार रहता है। यह श्रम की पहचान है। एक तरफ तौलिया है जो फाइव स्टार होटलों के सफेद कमरों में शोभा बढ़ाता हैऔर दूसरी तरफ गमछा है जो खेत की मेड़ से लेकर ऑफिस की कुर्सी तक हर जगह अपनी जगह बना लेता है।

अंत मेंयदि हम उपयोगितापर्यावरण और बहुमुखी प्रतिभा के तराजू पर तौलिए और गमछे को तौलेंतो गमछे का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। तौलिया एक जरूरत हो सकती हैलेकिन गमछा एक संस्कार है। यह हमें बताता है कि जीवन की जटिलताओं को सुलझाने के लिए किसी भारी-भरकम समाधान की नहींबल्कि एक हल्के और लचीले व्यवहार की जरूरत है।इसलिएअगली बार जब आप किसी मॉल में महंगे आयातित तौलिए को देखेंतो मुस्कुराइए और अपने कंधे पर रखे उस दो मीटर के सूती जादू को सहलाइएजो न केवल आपका बदन सुखाता हैबल्कि आपकी संस्कृति को भी जिंदा रखता है। तौलिया सिर्फ नहाने के बाद का साथी हैपर गमछा जीवन के हर संघर्ष का हमराही है।

 प्रभात खबर में 12/05/2026 को प्रकाशित लेख 

 


Saturday, May 2, 2026

ओ टी टी ने बदल दी डबिंग की दुनिया

 एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

आज का युवा कोरियन ड्रामास्पेनिश थ्रिलर और हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्में भारतीय घरों में उतनी ही सहजता से देखी जा रही हैं जितनी कभी हिंदी धारावाहिक देखे जाते थे। इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फिल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फिल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

 

भारत जैसे विशाल और भाषाई रूप से विविध मनोरंजन बाज़ार में क्षेत्रीय भाषाओं की बढ़ती माँग ने इस उद्योग की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब कंटेंट किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया। उदाहरण के तौर परसाल 2024 में नेटफ्लिक्स ने अपने कंटेंट को दुनिया भर में 34 से अधिक भाषाओं में डब कियाजिनमें भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। 2025 में डिज़्नी हॉटस्टार और जियोसिनेमा के विलय के बाद बने ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ हॉटस्टार ने भी बहुभाषी रणनीति को अपनी विस्तार नीति का केंद्र बनाया। जो क्रिकेट जैसे बड़े लाइव इवेंट्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों और वेब सीरीज़ तककंटेंट को हिंदी के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध करा रहा है।

भारत का ओटीटी बाजार पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पीडब्लूसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत का ओटीटी बाजार ने जहाँ 17 हजार करोड़ का आंकड़ा पार किया था वहीं 2028 में यह लगभग दोगुना होकर करीब 35 हजार करोड़ पहुँचने का अनुमान है। इस वृद्धि के पीछे सस्ते डेटा पैक्सबढ़ती इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्थानीय भाषाओं में कंटेंट का उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं। ऑर्मैक्स द्वारा प्रकाशित आईबीईएफ रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में भारत में ओटीटी उपयोगकर्ताओं की संख्या करीब 60 करोड़ पहुँच गई है जिनमें 14 करोड़ से अधिक पेड़ सब्सक्रिप्शन भी शामिल हैं। वहीं संस्था 6डब्लूरिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का डबिंग बाजार भी ओटीटी की गति से विस्तार कर रहा है, 2025-31 तक भारत का डबिंग बाजार 10 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

वहीं ओटीटी और बहुभाषी रिलीज की बढ़ती माँग का सबसे प्रत्यक्ष लाभ डबिंग आर्टिस्ट्स को मिला है। ग्लोबल ग्रोथ इंसाइट की फिल्म डबिंग मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में डबिंग का वैश्विक बाजार करीब 4 बिलियन डॉलर पहुँच गया है जो साल 2033 तक 7 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत में भी पोस्टप्रोडक्शन और डबिंग सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही हैजिसके कारण डबिंग आर्टिस्ट्स के लिए अवसर और पारिश्रमिक दोनों में वृद्धि हुई है। इस बदलाव ने उन्हें न केवल स्थिर रोजगार और बेहतर पैकेज दिया हैबल्कि उनके पेशेवर सम्मान और प्रसिद्धि में भी बढ़ोतरी की है।

 
ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं। आज का मनोरंजन केवल देखने का माध्यम नहींबल्कि एक वैश्विक संवादसांस्कृतिक पुल और रचनात्मक साझा अनुभव का प्रतीक बन चुका है। यही ओटीटी और डबिंग की असली ताकत और भविष्य की संभावनाएं हैं।

 दैनिक जागरण में 02/05/2026 को प्रकाशित 

Monday, April 27, 2026

नया गेमिंग नियम: डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास

 


देश बदला दुनिया बदली इसी के साथ सभ्यता के लिए सबसे जरूरी मनोरंजन के भी तौर तरीके बदले |फिर खेल भी कहाँ पिछड़ने वाले थे |जब सब डिजिटल हो रहा है तो खेल क्यों न हो ?पर मामला इतना सा भर नहीं है |इंटरनेट के मौद्रिकीकरण ने खेलों को भी नहीं छोड़ा और जब डिजिटल खेलों के साथ धन जुड़ा वहीं से मामला गंभीर हो गया |लंबे इंतजार के बाद  1 मई 2026 की तारीख एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है। इसी दिन से देश में 'ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026' (PROG Rules) लागू हो रहे हैं। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि उस जटिल डिजिटल भूलभुलैया को सुलझाने का प्रयास है जिसमें भारत का युवा और निवेश जगत पिछले एक दशक से उलझा हुआ था। 10 साल की लंबी वैधता वाले गेमिंग सर्टिफिकेट और बिना पैसे वाले खेलों को पंजीकरण से मुक्ति देने जैसे प्रावधानों के साथ सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 'नियंत्रण' से अधिक 'नियमन' पर भरोसा कर रही है। इस नियमन की सबसे बड़ी उपलब्धि 'कौशल' (Skill) और 'किस्मत' (Chance) के बीच के सदियों पुराने विवाद को तकनीकी रूप से परिभाषित करना सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. के.आर. लक्ष्मणन बनाम तमिलनाडु राज्य जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कोई भी खेल 'कौशल का खेल' तब कहलाता है जब उसमें खिलाड़ी की मानसिक योग्यता, रणनीति, निर्णय लेने की क्षमता और अनुभव जीत का मुख्य आधार होते हैं।
इसके विपरीत, 'किस्मत का खेलवह है जहाँ परिणाम पूरी तरह से भाग्य या संयोग पर निर्भर करता हैजैसे सट्टेबाजी या लॉटरी। नए नियम इस अंतर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सख्ती से लागू करते हैं। सरकार ने 'रियल मनी गेमिंगके उन रूपों को प्रतिबंधित कर दिया है जो सट्टेबाजी (Betting) के करीब थेजबकि 'ई-स्पोर्ट्सऔर कौशल आधारित खेलों को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया है। यह स्पष्टता निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण थीक्योंकि बिना परिभाषा के करोड़ों का निवेश हमेशा जोखिम में रहता था।
भारत में गेमिंग अब केवल समय बिताने का साधन नहींबल्कि एक विशाल आर्थिक शक्ति है। ल्युमिकाई (Lumikai) की प्रतिष्ठित वार्षिक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग 2023-24' है के अनुसारभारत का गेमिंग बाजार वर्तमान में लगभग 3 बिलियन डॉलर का मूल्य रखता है। विदित  हो कि यह उद्योग 28% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है। जो 2028 तक 5 बिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को छू लेगा।
भारत में वर्तमान में लगभग 50 करोड़ से अधिक गेमर्स हैंजिनमें से एक बड़ा हिस्सा 'इन-गेमखरीदारी के जरिए राजस्व में योगदान दे रहा है। यह वृद्धि केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैयह भारत को वैश्विक सॉफ्टवेयर और एनीमेशन हब बनाने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
हालांकि आलोचक ये मानते हैं कि इन नियमों के आने में थोड़ी देर हुई जिसका फायदा उठाया कर देश के लाखों युवाओं और किशोरों को सट्टे की लत लगी और ये लोग रातों रात अमीर बनने  के सपने देख कर इस तरह के खेलों के आदी हो गए जिनमें पैसा शामिल राहत था |, लेकिन इसके पीछे की जटिलताओं को समझना आवश्यक है। देरी के मुख्य रूप से तीन कारण बताए जा सकते हैं
पहला ये है कि  भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'जुआ और सट्टेबाजीराज्य सूची (State List) का विषय है। कर्नाटकतमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने जब अपनी सीमाओं में गेमिंग पर प्रतिबंध लगायातो मामला अदालतों में पहुँचा। केंद्र सरकार को एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था जो राज्यों की शक्तियों का सम्मान करे और पूरे देश के लिए एक समान डिजिटल ढांचा भी प्रदान करे। दूसरा कारण है तकनीकी अस्पष्टता मतलब  पारंपरिक खेलों के विपरीतऑनलाइन गेम्स के एल्गोरिदम इतने जटिल होते हैं कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जीत कौशल से हुई है या सॉफ्टवेयर द्वारा नियंत्रित 'किस्मतसे। सरकार को विशेषज्ञों की समितियों और तकनीकी ऑडिटर्स की एक फौज तैयार करनी पड़ी जो इन दावों की पुष्टि कर सकें।तीसरा है आर्थिक और सामाजिक संतुलन साधना  एक तरफ 28% GST लगाने का आर्थिक दबाव था और दूसरी तरफ युवाओं में गेमिंग की लत (Gaming Disorder) से जुड़ी सामाजिक चिंताएं। सरकार एक ऐसा कानून चाहती थी जो न तो उद्योग का गला घोंटे और न ही समाज की युवा पीढी को  जोखिम में डाले।
नए नियमों के तहतएक बार किसी गेम को उसकी श्रेणी (कौशल या मनोरंजन) के आधार पर सर्टिफिकेट मिल जाता हैतो वह दस  साल तक वैध रहेगा। यह गेम डेवलपर्स को एक दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है। सबसे राहत की बात छोटे डेवलपर्स और छात्रों के लिए है, बिना वित्तीय लेनदेन वाले खेलों (Social & Casual Games) को अनिवार्य पंजीकरण की कतार से बाहर रखा गया है। इससे कॉलेज कैंपस और छोटे स्टार्टअप्स में 'इनोवेशनकी लहर आएगी।      उपभोक्ता सुरक्षा के लिए  आयु सत्यापन (Age Verification) और खर्च की सीमा तय करने जैसे फीचर्स से छात्रों और बच्चों पर गेमिंग के दुष्प्रभाव कम होंगे।विदेशी निवेश (FDI) में  स्पष्ट नियमों के कारण अब वैश्विक गेमिंग कंपनियाँ भारत में अपने सर्वर और ऑफिस स्थापित करने में संकोच नहीं करेंगी।पांच  बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह में ग्राफिक्स डिजाइनर्सकोडिंग एक्सपर्ट्स और डेटा एनालिस्ट्स के लिए लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
मई से लागू होने वाले ये नियम भारतीय गेमिंग जगत की 'शुद्धिका काम करेंगे। भारत अब गेमिंग के क्षेत्र में केवल एक 'उपभोक्ता' (Consumer) नहींबल्कि एक 'नियामकऔर 'निर्माता' (Creator) के रूप में उभर रहा है। यह नियमों और विकास का वह संतुलित संगम हैजिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी।
 प्रभात खबर में 27 अप्रैल 2026 को प्रकाशित लेख


Friday, April 24, 2026

ए आई के नक़्शे में भारत

 

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी शब्द मात्र  नहींबल्कि 'चतुर्थ औद्योगिक क्रांति' (Industry 4.0) का मुख्य स्तंभ बन चुका है। हाल ही में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) रिपोर्ट 2025 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसारभारत 92% AI एडॉप्शन दर  के साथ विश्व के अग्रणी देशों की सूची में पहले स्थान  पर है। यह आंकड़ा  न केवल भारत की डिजिटल शक्ति  को दर्शाता हैबल्कि वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी देता है।रिपोर्ट के अनुसार भारत (92%) ने स्पेन (78%) और ब्राजील (76%) जैसे उभरते बाजारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (64%) और जापान (51%) जैसे तकनीकी रूप से परिपक्व देश ए आई  एडॉप्शन की इस दौड़ में पिछड़ रहे हैं।उल्लेखनीय है कि यहाँ 'एडॉप्शनका अर्थ केवल ए आई के परिचय से नहींबल्कि सक्रिय उपयोग से है (कम से कम सप्ताह में कई बार)।भारत की इस बढ़त के पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं |जिसमें सबसे प्रमुख है भारत की विशाल युवा आबादी 'डिजिटल नेटिवहै।संज्ञानात्मक लचीलापन (Cognitive Flexibility) युवाओं में अधिक होता हैजिससे वे नई जटिल तकनीकों को शीघ्र आत्मसात कर लेते हैं और भारत इसमें अपवाद नहीं है|दूसरा है लीपफ्रॉगिंग (Leapfrogging) की प्रवृत्ति मतलब भारत ने कई पारंपरिक चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल समाधानों को अपनाया है।
 ये उसी तरह का मामला है जैसे भारत ने लैंडलाइन फोन  के युग को छोड़कर सीधे मोबाइल क्रांति कीवैसे ही अब वह पारंपरिक सॉफ्टवेयर से सीधे AI-इंटीग्रेटेड सिस्टम की ओर बढ़ रहा है।तीसरा कारण: भारतीय श्रम बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का होना है। यहाँ AI को 'जॉब रिप्लेसमेंटके बजाय 'जॉब एनहांसमेंटटूल के रूप में देखा जा रहा हैजिससे व्यक्तिगत उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि होने की सम्भावना है।भारत की 'नंबर 1' रैंकिंग केवल उपयोग तक सीमित नहीं हैबल्कि यह 'AI रेडीनेस' (AI तत्परता) को भी रेखांकित करती है। भारत सरकार का 'IndiaAI' मिशननेशनल स्ट्रैटेजी फॉर  एआई   और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों जैसे IITs और विश्वविद्यालय स्तर पर  एआई   पाठ्यक्रमों का समावेश इस तत्परता को आधार प्रदान कर रहा है। भारत मेंनीति आयोग का कहना है कि एआई को अपनाने से 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 957 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हो सकती है और देश की वार्षिक विकास दर में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। भारत ने भी नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए राष्ट्रीय रणनीतिनामक एक चर्चा पत्र के माध्यम से एआई पारिस्थितिकी तंत्र को गति देने की अपनी रणनीति शुरू की है। भारत दुनिया का सबसे सस्ता और सबसे बड़ा डेटा उपभोक्ता है।  एआई   को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा ही ईंधन है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है |जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है

जापान और अमेरिका जैसे देशों में निम्न एडॉप्शन दर के पीछे 'संस्थागत जड़ताऔर 'सख्त नियामक ढांचे'  उत्तरदायी हैं। जिसमें  ए आई लिए जरुरी आवश्यक आंकड़ों की पूर्ति के लिए सख्त नियम हैं और वहां की जनसंख्या अपने आंकड़ों के लिए ज्यादा सजग है|दूसरा  वहाँ डेटा गोपनीयता (Privacy) और कॉपीराइट कानूनों की जटिलता ने तकनीक के मुक्त प्रसार को धीमा किया हैजबकि भारत में 'ओपन-सोर्स कल्चरऔर नवाचार के प्रति उदार दृष्टिकोण ने इसे गति दी है।आने वाले समय में भारत को भी ऐसे कई सवालों से दो चार होना पड़ेगा |सबसे जरुरी है कि भारत का ए आई इस्तेमाल में स्वरुप कैसा होगा?जिसे क्रियेटर बनाम कंज्यूमर के नजरिये से समझा जा सकता है | दुनिया में हुई  'सोशल मीडिया क्रांति' (2004-2015) के दौरान भारत एक 'इनोवेटर' (बनाने वाला) के बजाय केवल 'कंज्यूमर' (उपयोगकर्ता) बनकर रह गया था|ए आई के आने के बाद यह बहस भी जोरो पर थी क्या वैसी ही गलती कहीं भारत दुबारा तो नहीं दोहरा देगा |भारत केवल वैश्विक AI मॉडल्स जैसे चैट जी पी टी, गूगल जेमिनी,को-पाइलेट का उपभोक्ता बना रहेगाया हम अपने खुद  के 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स' (LLMs) विकसित कर पाएंगे? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है |

हमें एल्गोरिथमिक बायस (Bias) और डेटा संप्रभुता पर शोध की ज्यादा आवश्यकता है। एल्गोरिथमिक बायस डेटा में छिपे सामाजिक पूर्वाग्रहों को दोहराता हैजिससे ए आई द्वारा भेदभावपूर्ण निर्णय संभव हैं जिसमें भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी राज्य में कोई बात सही होती वहीं दूसरे राज्य या संस्कृति में हो सकता है वो सही बात गलत हो ऐसे में ए आई कई तरह की गलतियां कर सकता है । वहींडेटा संप्रभुता यह सुनिश्चित करती है कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं और कानूनों के अधीन रहे। इन पर शोध अनिवार्य है ताकि तकनीक निष्पक्ष हो और डिजिटल उपनिवेशवाद से बचा जा सके।भारत अब डिजिटल विभाजन  के दूसरी ओर नहींबल्कि केंद्र में खड़ा है। 92% एडॉप्शन रेट इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था भविष्य की चुनौतियों के लिए न केवल तैयार हैबल्कि उन्हें आकार देने में सक्षम है। भारत का यह ' एआई   मोमेंटउसे आने वाले दशकों में उसे  वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बिंदु बनाएगा या नहीं इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना होगा |

अमर उजाला में 24/04/2026 को प्रकाशित 

 

Tuesday, April 14, 2026

इंटरनेट थका रहा है जेन ज़ी को

 


यूँ कहने को तो हम इंसानी सभ्यता की सबसे ज्यादा कनेक्टेड पीढ़ी हैं लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा अकेली है। ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया, रील्स की शोर-शराबे वाली दुनिया ने हमें अंदर से थका दिया है। इसी थकान और तनाव से बचने के लिए आज की जेन जी पीढ़ी ने एक नया तरीका ढूंढ लिया है जिसे बेड रॉटिंग कहते हैं। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है इसका अर्थ उतना ही सीधा है। इसका मतलब है  जानबूझकर घंटों या दिनभर बिस्तर पर पड़े रहना और निष्क्रिय गतिविधियों में लिप्त रहना जैसे फोन स्क्रॉल करना, फिल्म देखना या बस लेटे रहना। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में तनाव या बर्नआउट से लड़ने का एक कारगर तरीका है या फिर अपने जीवन से मुँह मोड़ लेना एक खतरनाक बहाना जो व्यक्ति को अवसाद और निष्क्रियता के अंधेरे कुएँ में धकेल रहा है।

बेड रॉटिंग शब्द का पहली बार इस्तेमाल 2023 में एक अमेरिकी टिकटॉक यूजर ने अपने वीडियो में किया था। देखते-देखते यह शब्द जेन जी शब्दावली का हिस्सा हो गया जो हफ्ते में एक दिन बेड रॉटिंग करके एंटी प्रोडेक्टिविटी और सेल्फ केयर जीवन शैली को अपनाने लगे। दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक भी युवाओं की इस प्रवृत्ति के प्रति अपनी दिलचस्पी जाहिर कर रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक इसे सिर्फ आराम नहीं बल्कि एक तरह के इमोशनल शटडॉउन की तरह भी देखते हैंजहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओंतनाव और जिम्मेदारियों से बचने के लिए बिस्तर को एक सुरक्षित किले की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जिससे मानसिक थकावटबेचैनीअवसाद जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

हालांकि भारत में बेड रॉटिंग को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार ट्रैंड बना हुआ है कुछ युवा इसके लिए एक्सटेंशन ऑफ द स्लीपस्लीप वीकेंड या वीकेंड कोमा जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं। आज कल छुट्टियाँ घूमने फिरने या परिवार के साथ वक्त बिताने का समय नहीं रहीं बल्कि बिस्तर पर पड़े रहने का बहाना बन गई हैं । आज की जेन-ज़ी पीढ़ी अपने कमरे की चारदीवारी में सिमटकरमोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन के सामने पूरा दिन बिताना ज्यादा सहज महसूस करती है। खाना ऑर्डर करना हो तो ऑनलाइनदोस्तों से बात करनी हो तो ऑनलाइनजैसे वास्तविक दुनिया से जुड़ने की उनकी इच्छा धीरे-धीरे मिटती जा रही हो। दरअसल आज का युवा सूचनाओं के ऐसे महासागर में जी रहा हैजो कभी शांत नहीं होताअंतहीन फीड्सनेटफ्लिक्सअसीमित कंटेंट यह सब मिलकर डिजिटल ओवरस्टिम्यूलेशनका माहौल बनाते हैं। जिससे दिमाग को कभी आराम नहीं मिलता और बिस्तर एक आरामदायक ठिकाना बन जाता है। वहीं सोशल मीडिया पर सेल्फ केयर की गलत व्याख्या से इसे और अधिक बल मिलता है।

 कभी-कभार भले बिस्तर पर आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा कर सकता हैलेकिन एक नियमित आदत से गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पर इसका ये मतलब नहीं है कि हमें आराम नहीं करना चाहिए। तनावपूर्ण जीवन से एक ब्रेक लेना और खुद को रिचार्ज करना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि इसके साथ घर के बाहर निकलनाशारीरिक क्रियाएं करनादोस्तों या परिवार के लोगों से बात करना भी उतना ही जरूरी है। आखिर में हमें एक संतुलन की आवश्यकता है जहाँ हम बिस्तर पर लेटकर फोन स्क्रॉल करने के बजायकिताबें पढ़नासंगीत सुनना या मेडिटेशन जैसी चीजें भी कर सकते हैं। इससे व्यक्ति में निष्क्रियता कम और सक्रियता बढ़ेगी। तभी हम अपनी युवा पीढ़ी को एक स्वस्थउत्पादक और खुशहाल भविष्य दे पाएंगे।

 

प्रभात खबर में 14/04/2026 को प्रकाशित 

Friday, March 27, 2026

रचनात्मक प्रक्रिया में हिस्सेदारी

 

पिछले कुछ दशकों में डिजिटल तकनीक ने मानव जीवन के तकरीबन हर क्षेत्र को प्रभावित किया है, इस कड़ी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई ने अभूतपूर्व गति से विकास करते हुए न केवल तकनीकी परिवर्तन को तेज किया है, बल्कि आज यह डिजिटल युग की अगुवाई करने वाली केंद्रीय शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है। एआई अब केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक संरचनाओं को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति बन गया है। विशेष रूप से फिल्म निर्माण, पत्रकारिता, फोटोग्राफी और सॉफ्टवेयर उद्योग में इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो चला है।

वर्तमान में एआई का इस्तेमाल केवल डेटा विश्लेषण या ऑटोमेशन तक सीमित नहीं है बल्कि यह रचनात्मक प्रक्रियाओं का भी हिस्सा बन चुका है । फिल्म निर्माण में पटकथा लेखन से लेकर विजुअल इफेक्ट्स तक, फोटोग्राफ जेनरेशन से लेकर संपादन तक, एआई नई संभावनाओं का द्वारा खोल रहा है।  ओपन एआई के सोरा-2, गूगल का वियो 3.1 जैसे एआई मॉडल सिनेमाई स्तर की वीडियो जेनरेशन में सक्षम हो रहे हैं। साल 2024 में आई हॉलीवुड फिल्म हियर में एआई के इस्तेमाल ने दर्शकों को चौंका दिया था, जिसमें एआई का उपयोग करके टॉम हैंक्स और रॉबिन राइट जैसे कलाकारों को कम उम्र का दिखाया गया था। इसके अलावा टॉप गन मैवरिक फिल्म में अभिनेता वाल किलमर की आवाज को एआई वॉयस क्लोनिंग की मदद से पुननिर्मित किया गया था, क्योंकि उनकी वास्तविक आवाज बीमारी के कारण प्रभावित हो चुकी थी। भारतीय संदर्भ में भी एआई के प्रयोग के उदाहरण सामने आने लगे हैं। फिल्म रांझनाके री-रिलीज़ के दौरान निर्देशक आंनद राय ने एआई की सहायता से फिल्म के अंतिम दृश्य में परिवर्तन कर अभिनेता धनुष के चरित्र को जीवित दिखाया। यह उदाहरण दर्शाता है कि एआई अब न केवल तकनीकी सुधार बल्कि कथा और भावनात्मक संरचना में भी हस्तक्षेप करने में सक्षम हो चुका है।
सामान्यत:फिल्म निर्माण को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया जाता है, प्री-प्रोडक्शन, प्रोडक्शन और पोस्ट प्रोडक्शन। एआई के रचनात्मक इस्तेमाल ने इन तीन चरणों में कुछ परिवर्तन किये हैं, प्री-प्रोडक्शन वह चरण होता है जहाँ पटकथा लेखन, पात्रों का विकास, स्टोरीबोर्ड इत्यादि बनाने का काम किया जाता है। पहले यह प्रक्रिया काफी समय लेने वाली और श्रमसाध्य होती थी लेकिन अब एआई आधारित उपकरण इस कार्य को तेज और अधिक व्यवस्थित बना रहे हैं। इसके अतिरिक्त डिजिटल स्टोरीबोर्डिंग टूल्स के माध्यम से निर्देशक शूटिंग से पहले ही फिल्म के दृश्यात्मक ढाँचे को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। फिल्म निर्माण के दौरान कैमरा संचालन, लाइटिंग, और एडिटिंग जैसे कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। एआई संचालित कैमरा सिस्टम और ड्रोन तकनीक ने एक प्रक्रियाओं को अधिक सटीक और कुशल बना दिया है। ऑटोमेटेड कैमरा ट्रैकिंग, फेस रिकग्निशन और आइडेंटिफिकेशन जैसी तकनीकों के माध्यम से कैमरा स्वयं ही विषय के अनुसार अपनी स्थिति समायोजित कर सकता है। और जटिल दृश्यों की शूटिंग पहले की तुलना में अधिक सरल और कम लागत वाली हो गई है। प्रोडक्शन वह क्षेत्र है जहाँ एआई का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है, संपादन, कलर ग्रेडिंग, साउंड मिक्सिंग और विजुअल इफेक्ट्स जैसे कार्य अब एआई की सहायता से तेजी से किये जा सकते हैं। विशेष रूप से टेक्स्ट-टू-वीडियो और जेनरेटिव एआई मॉडल ने फिल्म निर्माण में एक नया अध्याय जोड़ा है। इन तकनीकों की मदद से मंहगे सेट, बड़े स्टूडियो और विशाल वीएफएक्स टीमों पर निर्भरता कम हो सकती है। दिग्गज मार्केटिंग फर्म डेलॉयट के 18वीं डिजिटल मीडिया ट्रेंड सर्वे के अनुसार 22 प्रतिशत अमेरिकी जनता ने माना कि जेनरेटिव एआई इंसानों की तुलना में अधिक रोचक टीवी शो या फिल्में लिख सकता है।

वहीं पारंपरिक फोटोग्राफी के क्षेत्र में भी एआई आधारित सॉफ्टवेयर हजारों तस्वीरों में सबसे उपयुक्त तस्वीरों का चयन स्वत कर सकते हैं, साथ ही तस्वीरों के रंग, लाइटिंग और संरचना को स्वचलित रूप से सुधार भी सकते हैं। इससे फोटोग्राफर्स का समय भी बचता है और वे रचनात्मक पहलुओं पर अधिक ध्यान दे सकते हैं। आज कल स्मार्टफोन कैमरों में एआई आधारित कम्यूटेशनल फोटोग्राफी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसके माध्यम से कम रोशनी में भी स्पष्ट तस्वीरें ली जा सकती हैं और अत्यधिक जूम के बावजूद चित्र की गुणवत्ता बनी रहती है। इसके अतिरिक्त जेनरेटिव एडिटिंग तकनीक के माध्यम से तस्वीरों में किसी भी चीज को जोड़ा या हटाया जा सकता है जो पहले एक लंबी एडिटिंग प्रक्रिया का हिस्सा होता था।
एआई के विकास ने रोजगार के क्षेत्र में भी नई बहस को जन्म दिया है। एक ओर यह कई पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर नए प्रकार के कौशल और पेशों को जन्म दे रहा है। साथ ही प्रॉम्ट इंजीनियरिंग, डेटा विश्लेषण जैसे नए कौशल तेजी से उभर रहे हैं। पारंपरिक सॉफ्टवेयर्स का उपयोग किसी विशेष कार्य को पूरा करने के लिए किया जाता था उदाहरण के लिए फोटो एडिटिंग के लिए एक सॉफ्टवेयर, डेटा विश्लेषण के लिए दूसरा और संचार के लिए तीसरा लेकिन एआई के विकास के साथ यह मॉडल बदल रहा है। साथ ही पारंपरिक सॉफ्टवेयर में यूजर्स को जटिल इंटरफेस और कमांड्स सीखने पड़ते थे लेकिन एआई आधारित सिस्टम पर हम अपनी भाषा के माध्यम से निर्देश दे सकते हैं। यूजर को बस अपनी आवश्यकता बतानी है और एआई उसे झट से कर देगा। साल 2025 में आई माइक्रोसॉफ्ट को-पॉयलट यूसेज रिपोर्ट के अनुसार एआई अब नेचुरल लैंग्वेज यूजर इंटरफेस की ओर बढ़ रहा है, यानि आप बस एआई से कह सकते हैं, पिछले महीने की बिक्री का विश्लेषण करो और चार्ट बनाओ और बिना एक्सेल के जटिल फार्मुले जाने ये काम मिनटों में हो जाएगा।
हालांकि एआई के प्रसार से लोगों में रचनात्मकता और ध्यान व्यवहार पर खासा फर्क पड़ रहा है। शोधकर्ता सिबेल एयदोगान की किताब निगेटिव इफेक्ट्स ऑफ एआई ऑन ह्यूमन क्रियेटिव एबिलिटी के अनुसार एआई के तुरंत सुझाव और समाधान मिलने पर लोग जटिल समस्या से बचने लगते हैं, जिससे उनकी गहरी समझ और आलोचनात्मक सोच कम हो सकती है। नतीजन मानव रचनात्मकता पर असर होता है। कई विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि एआई पर हमारी बढ़ती निर्भरता धीरे-धीरे क्रिएटिव डिपेंडेंसी बना सकती है, अर्थात कलाकार अपने मूल विचार पैदा करने की क्षमता खो सकते हैं। वहीं एआई के दौर में कॉपीराइट कानून पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है, आज सबसे बड़ा सवाल है कि आर्टिस्ट कौन है, वर्तमान कॉपीराइट कानून के मानव रचनाकार को ही लेखक या क्रियेटर मानता है। भारतीय कॉपीराइट कानून के मुताबिक कोई भी रचना तब तक स्वामित्व योग्य नहीं है जब तक उसके मूल में कोई मानव न हो। यदि कोई कार्य पूरी तरह से एआई द्वारा तैयार किया गया है तो वह पेटेंट या कॉपीराइट अधिनियम के दायरे में नहीं आएगा। हालांकि ब्रिटेन में ऐसी रचनाओं में सिस्टम सेटअप करने वाले व्यक्ति को रचनाकार माना जाता है। इसी के चलते इन सीमाओं के बीच सह निर्माण या को-क्रिएशन की अवधारणा उभर रही है, यानी कला में अब मानव और मशीन दोनों की साझेदारी पर बल दिया जा रहा है। वहीं भारत समेत कई देशों ने एआई जनित मीडिया के लेबलिंग और पारदर्शिता पर कदम बढ़ाए हैं, भारत सरकार के प्रस्तावित नियमों के मुताबिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एआई से बनाए गए फोटो, ऑडियो और वीडियो पर स्पष्ट रूप से एआई जनित टैग चिह्नित करना होना। साथ ही कलाकारों के अधिकार सुरक्षित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं, कलाकारों की बिना अनुमति के उनके चित्र या आवाज का एआई के जरिए उपयोग करने पर कड़े प्रावधान किये जा रहे हैं।
एआई आज तकनीकी विकास के एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व कर रहा है,जहाँ उसकी उपस्थिति केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह रचनात्मक प्रक्रियाओं का सक्रिय भागीदार बन चुका है। विभिन्न क्रिएटिव क्षेत्रों में उसकी बढ़ती दखल इस बात का संकेत है कि भविष्य का सृजनात्मक परिदृश्य मानव और मशीन के संयुक्त प्रयासों पर आधारित होगा। एक ओर जहाँ एआई ने कार्यों को अधिक तेज, सटीक और किफायती बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसने कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति के नए आयाम भी खोल दिए हैं। इसके बावजूद, रोजगार के बदलते स्वरूप, नैतिक सीमाओं और कॉपीराइट से जुड़े प्रश्नों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।। आगे बढ़ते हुए अत: हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई मानव रचनात्मकता का प्रतिस्थापन नहीं बल्कि विस्तारक है।
दैनिक जागरण में 27/03/2026 को प्रकाशित लेख 

Thursday, March 26, 2026

युवाओं की पसंद बनते माईक्रो ड्रामा

 

लंबी फीचर फिल्में और टीवी धारावाहिक धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं। आज का युवा सब कुछ शॉर्ट फॉर्म में चाहता है, चाहे मनोरंजन हो, भावनाएं हों या कहानियाँ। रील्स देखते-देखते उसकी ध्यान अवधि में लगातार गिरावट हो रही है, नतीजन घंटे भर के सीरियल पर गौर करना अब बड़ी चुनौती हो गई है। इस बदलते परिदृश्य को समझते हुए कंटेंट निर्माताओं ने हमारे सामने एक नया विकल्प पेश किया है, माइक्रो ड्रामा। यानी कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाने वाली कहानियाँ, जिनमें सस्पेंस भी है, इमोशन भी और क्लाइमेक्स भी।
माइक्रो ड्रामा जिसे लोग वर्टिकल माइक्रो वेब-सीरीज भी कहते हैंअसल में स्मार्टफोन के लिए बनी एक नई कंटेंट स्टाइल है। ये छोटे-छोटे एपिसोड होते हैंजिनकी समय अवधि 1-2 मिनट होती है। सबसे खास बात यह है कि ये वीडियो हॉरिजॉन्टल नहीं बल्कि पोर्ट्रेट मोड में बनाए जाते हैं ताकि इन्हें मोबाइल स्क्रीन पर आसानी से देखा जा सके। हर एपिसोड तेज रफ्तारडायलॉग्स और ट्विस्ट से भरा होता है। कि देखने वाले को अगली कड़ी देखने का मन हो जाए। अमेरिका और चीन जैसे देशों में यह नया कंटेंट फॉर्मेट बाजार का रूप ले चुका है। भारत में भी इस माइक्रो ड्रामा फॉर्मेट ने अपने पैर पसारने शुरु कर दिए हैं। वेन्चर इन्टेलिजेंस के आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में माइक्रो ड्रामा ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने करीब 28 मिलियन डॉलर की रकम जुटाई वहीं इस साल जुलाई तक ही 44 मिलियन डॉलर का निवेश हासिल किया है। इसी तरह रील टीवी,पॉकेट टीवी रील शॉर्टफ्लिकरील्स जैसे कई प्लेटफॉर्म भी इस नए शॉर्ट वीडियो फॉर्मेट में उतरे हैं। दिग्गज एंटरटेंनमेंट प्लेयर जैसे जीटीवीएफएमएक्स प्लेयर जैसे बड़े प्लेटफॉर्म भी इसमें काफी निवेश कर रहे हैं। जी ने हाल ही में अपने वर्टिकल एप बुलेट को लॉन्च किया है।
 
कंसल्टिंग फर्म बर्नस्टीन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों के इंटरनेट यूजर्स महीने में औसतन 35-40 जीबी डाटा का उपयोग करते हैं। जबकि मेट्रो शहरों में यह आंकड़ा 30 जीबी से भी कम है। ऐसे में माइक्रो ड्रामा बनाने वाले एप्स अपना ध्यान इन शहरों के लोगों पर ज्यादा कर रहे हैं। मसलन अलग-अलग भारतीय भाषासंस्कृति और ऐसी कहानियाँ जिससे कोई भी जुड़ जाए। इन ड्रामों में ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती हैकई बार ये पारंपरिक धारावाहिकों की तरह बिना तर्क और बे सिर-पैर के भी दिखाई देते हैं। जिससे छोटे शहरों और कस्बों में माइक्रो ड्रामा अच्छी लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि महिलाओं की हिस्सेदारी भी इसके दर्शक वर्ग में लगातार बढ़ रही है। दर्शक अक्सर बस या मेट्रो में सफर के दौरानबिस्तर पर सोने से पहले या छोटे-छोटे ब्रेक में इन्हें देखकर अपना खाली समय भरते हैं।
 
हालांकि ये माइक्रो ड्रामा बड़े बजटबड़े सेट या बड़े एक्टर्स के मोहताज नहीं होते हैं। बस अच्छी कहानी और कुछ ठीक-ठाठ कलाकारों से भी काम चल जाता है। फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने की राह देख रहे एक्टर्स-इंफ्लुएंसर्स के लिए भी यह एक अच्छा मंच है। साथ ही इसे बनाने में खर्च भी काफी कम होता है और शूटिंग भी जल्दी खत्म हो जाती है। इसलिए कंटेंट इडस्ट्री और प्लेटफॉर्म्स इस तरह के कंटेंट पर अच्छा खासा निवेश कर रहे हैं। अब तो इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर इन्फुलएंसर्स और कंटेंट क्रियेटर्स खुद का माइक्रो ड्रामा बना रहे हैं। वे अपने लंबे वीडियो को छोटे-छोटे क्लिप्स में काटकर हर क्लिप का अंत ऐसा रखते कि लगे अगले पार्ट में क्या होगा। इससे दर्शक खुद ही अगले पार्ट के लिए बेताब हो जाते है।
हालांकि माइक्रो ड्रामे की लोकप्रियता के साथ-साथ उनकी कंटेंट गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं। चूंकि प्रोडक्शन तेज और बजट कम होता हैतो कई बार कहानियाँ सतही और बिना मतलब की होती है। आलोचक कहते हैं इनमें कई बार इनमें विवादित और अश्लील कंटेंट का भी उपयोग होता है। अंत में माइक्रो ड्रामा न सिर्फ क्रिएटर्स और प्लेटफॉर्म्स के लिए नए अवसर खोल रहा है बल्कि दर्शकों की बदलती आदतों को भाँप कर मनोरंजन का नया फॉर्मेट भी परोस रहा है। छोटे एपिसोडतेज़ और सस्पेंस भरी कहानी और मोबाइल-फ्रेंडली डिजाइन ने इसे डिजिटल दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया है। साथ ही भविष्य में यह बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट्स का भी हिस्सा बन सकता है।
प्रभात खबर में 26/03/2026 को प्रकाशित 

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