आज डिजिटल बाज़ार में एक ही समय, एक ही उड़ान, एक ही होटल के कमरे या एक ही कैब रूट के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग कीमतें दिखाई जा रही हैं। तकनीकी भाषा में जिसे अब तक ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ कहकर पेश किया जाता था, वह अब असल में ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ (निगरानी-आधारित मूल्य निर्धारण) का खतरनाक रूप ले चुका है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का वह अदृश्य डाका है, जो उपभोक्ता के निजी डेटा, उसकी मजबूरी और मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का विश्लेषण करके उसकी जेब से अधिकतम संभव पैसा खींच रहा है।
पारंपरिक अर्थशास्त्र में डायनेमिक प्राइसिंग का मतलब था मांग और आपूर्ति के संतुलन के आधार पर कीमतों का घटना या बढ़ना—जैसे त्योहारों पर टिकट महंगे होना या ऑफ-सीजन में होटल सस्ते होना। लेकिन अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन द्वारा रेखांकित ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ इससे कहीं आगे की व्यवस्था है। जुलाई 2024 में फेडरल ट्रेड कमीशन ने आठ वैश्विक कंपनियों को आदेश जारी कर यह जांच शुरू की कि कंपनियाँ किस तरह उपभोक्ता के व्यक्तिगत डेटा—लोकेशन, सर्च हिस्ट्री, वित्तीय स्थिति और डिजिटल व्यवहार—का इस्तेमाल कर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कीमतें तय कर रही हैं।
इसमें एल्गोरिदम केवल बाज़ार की सामूहिक मांग नहीं देखता, बल्कि व्यक्तिगत उपभोक्ता की प्रोफाइल का एक्स-रे करता है। जब कोई उपभोक्ता कैब बुक करता है, हवाई टिकट खोजता है या ऑनलाइन राशन ऑर्डर करता है, तो एआई बैकएंड पर कुछ ही मिलीसेकंड्स में कई पैमानों की गणना करता है:
- डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम: बुकिंग ₹1.5 लाख के प्रीमियम फोन से हो रही है या बजट एंड्रॉयड डिवाइस से?
- स्थान और परिवेश: यूजर किसी पॉश इलाके में खड़ा है या सामान्य रिहायशी क्षेत्र में?
- तात्कालिकता :क्या फोन की बैटरी 5% बची है या बाहर तेज बारिश हो रही है?
- सर्च पैटर्न: उपभोक्ता ने पिछले 24 घंटों में उसी रूट या उत्पाद को कितनी बार सर्च किया है?
इन सभी पैमानों को मिलाकर एआई उपभोक्ता की 'पे करने की अधिकतम क्षमता' तय करता है और स्क्रीन पर वही कीमत दिखाता है, जो उसकी विवशता का अधिकतम दोहन कर सके।
मध्यम वर्ग पर प्रहार: आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में मध्यम वर्ग अपनी दैनिक जरूरतों, यात्रा और खान-पान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है, इसलिए यह आर्थिक शोषण सबसे गहरा है।
- कैब और राइड-हेलिंग: भारत के प्रमुख उपभोक्ता मंच 'लोकलसर्कल्स' के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक ऐप टैक्सी उपयोगकर्ताओं ने डार्क पैटर्न्स और अनुचित मूल्य वृद्धि का अनुभव किया है। इनमें 59 प्रतिशत ने 'ड्रिप प्राइसिंग' (अंतिम भुगतान पर छिपी हुई फीस जोड़ना) और 86 प्रतिशत ने 'बेट एंड स्विच' (कम प्रतीक्षा समय दिखाकर बाद में लंबा इंतजार कराना) की शिकायत की। इसके अलावा, एक ही समय पर अलग-अलग फोन मॉडल्स से एक ही रूट के किराए में 15 से 30 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
- विमानन और होटल बुकिंग: लोकलसर्कल्स के 1.24 लाख से अधिक प्रतिक्रियाओं वाले अखिल भारतीय सर्वे के मुताबिक, 80 प्रतिशत हवाई यात्रियों ने बुकिंग के अंतिम चरण में छिपी हुई अतिरिक्त फीस का सामना किया। वहीं 56 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने "केवल 2 सीटें बची हैं" जैसी झूठी तात्कालिकता का सामना किया, जो उन्हें घबराहट में महंगा टिकट खरीदने पर मजबूर करती है।
- क्विक कॉमर्स और 'लॉयल्टी पेनल्टी': ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में एक ही समय पर नियमित खरीदारों को नए ग्राहकों की तुलना में 10 से 25 प्रतिशत तक अधिक कीमतें दिखाई जाती हैं। इसे 'लॉयल्टी पेनल्टी' कहा जाता है—यानी जो उपभोक्ता किसी ऐप का जितना आदी हो चुका है, एल्गोरिदम उससे उतना ही अधिक मुनाफा वसूलता है।
पारंपरिक बाज़ार में उपभोक्ता को वस्तु के सामान्य मूल्य की जानकारी होती थी, लेकिन सर्विलांस प्राइसिंग स्क्रीन को एक अभेद्य 'ब्लैक बॉक्स' बना देती है। बराबर में बैठे दो यात्रियों को कभी यह पता नहीं चलता कि एक ही सेवा के लिए उनसे अलग-अलग शुल्क क्यों लिया गया।
यह स्थिति भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी 'डार्क पैटर्न रेगुलेशन, 2023' के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करती है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने अपनी ई-कॉमर्स मार्केट स्टडी में स्पष्ट कहा था कि प्लेटफॉर्म्स द्वारा डेटा के आधार पर किए जाने वाले गैर-पारदर्शी डिस्काउंट और मूल्य निर्धारण से स्वस्थ बाज़ार प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। यह न केवल आम उपभोक्ता की जेब पर डाका है, बल्कि अंतिम सेवा प्रदाताओं (जैसे कैब चालक या रेस्टोरेंट संचालक) के मुनाफे को भी प्लेटफॉर्म्स की झोली में डालने का माध्यम है।
तकनीक और नवाचार का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सुविधा के नाम पर उपभोक्ता की चौबीसों घंटे निगरानी और आर्थिक दोहन की छूट नहीं दी जा सकती।यदि कोई प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत व्यवहार या एआई एल्गोरिदम के आधार पर कीमत तय कर रहा है, तो स्क्रीन पर स्पष्ट डिस्क्लेमर और आधार मूल्य प्रदर्शित करना अनिवार्य होना चाहिए. 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' के तहत ऐसे सख्त नियम बनाए जाएं जो कंपनियों को यूजर के लोकेशन, डिवाइस प्रकार या सर्च फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल कीमत बढ़ाने के लिए करने से रोकें। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण जिसका मुख्य कार्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाना और कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले 'डार्क पैटर्न्स' (धोखाधड़ी वाली डिजिटल तकनीकों) पर नकेल कसना है और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जो भारत का प्रमुख बाज़ार नियामक है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि बाज़ार में स्वस्थ और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। इन दोनों प्राधिकरणों को स्वतंत्र साइबर व डेटा विशेषज्ञों के जरिए ई-कॉमर्स, कैब और ट्रेवल ऐप्स के मूल्य निर्धारण एल्गोरिदम का नियमित ऑडिट कराना चाहिए।
तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम और पारदर्शी बनाना था, न कि नागरिक की हर डिजिटल गतिविधि पर नज़र रखकर मुनाफा निचोड़ना। यदि सर्विलांस प्राइसिंग के इस चक्रव्यूह पर समय रहते कड़ा नीतिगत अंकुश नहीं लगाया गया, तो मध्यम वर्ग अपनी मेहनत की कमाई को एल्गोरिदम के गुप्त दांव-पेंचों में गंवाता रहेगा।
प्रभात खबर में 26/08/2026 को प्रकाशित





