Tuesday, September 8, 2026
समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाईन चुप्पी'
Wednesday, August 26, 2026
सुविधा के नाम पर उपभोक्ताओं का आर्थिक दोहन
आज डिजिटल बाज़ार में एक ही समय, एक ही उड़ान, एक ही होटल के कमरे या एक ही कैब रूट के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग कीमतें दिखाई जा रही हैं। तकनीकी भाषा में जिसे अब तक ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ कहकर पेश किया जाता था, वह अब असल में ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ (निगरानी-आधारित मूल्य निर्धारण) का खतरनाक रूप ले चुका है। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का वह अदृश्य डाका है, जो उपभोक्ता के निजी डेटा, उसकी मजबूरी और मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का विश्लेषण करके उसकी जेब से अधिकतम संभव पैसा खींच रहा है।
पारंपरिक अर्थशास्त्र में डायनेमिक प्राइसिंग का मतलब था मांग और आपूर्ति के संतुलन के आधार पर कीमतों का घटना या बढ़ना—जैसे त्योहारों पर टिकट महंगे होना या ऑफ-सीजन में होटल सस्ते होना। लेकिन अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन द्वारा रेखांकित ‘सर्विलांस प्राइसिंग’ इससे कहीं आगे की व्यवस्था है। जुलाई 2024 में फेडरल ट्रेड कमीशन ने आठ वैश्विक कंपनियों को आदेश जारी कर यह जांच शुरू की कि कंपनियाँ किस तरह उपभोक्ता के व्यक्तिगत डेटा—लोकेशन, सर्च हिस्ट्री, वित्तीय स्थिति और डिजिटल व्यवहार—का इस्तेमाल कर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग कीमतें तय कर रही हैं।
इसमें एल्गोरिदम केवल बाज़ार की सामूहिक मांग नहीं देखता, बल्कि व्यक्तिगत उपभोक्ता की प्रोफाइल का एक्स-रे करता है। जब कोई उपभोक्ता कैब बुक करता है, हवाई टिकट खोजता है या ऑनलाइन राशन ऑर्डर करता है, तो एआई बैकएंड पर कुछ ही मिलीसेकंड्स में कई पैमानों की गणना करता है:
- डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम: बुकिंग ₹1.5 लाख के प्रीमियम फोन से हो रही है या बजट एंड्रॉयड डिवाइस से?
- स्थान और परिवेश: यूजर किसी पॉश इलाके में खड़ा है या सामान्य रिहायशी क्षेत्र में?
- तात्कालिकता :क्या फोन की बैटरी 5% बची है या बाहर तेज बारिश हो रही है?
- सर्च पैटर्न: उपभोक्ता ने पिछले 24 घंटों में उसी रूट या उत्पाद को कितनी बार सर्च किया है?
इन सभी पैमानों को मिलाकर एआई उपभोक्ता की 'पे करने की अधिकतम क्षमता' तय करता है और स्क्रीन पर वही कीमत दिखाता है, जो उसकी विवशता का अधिकतम दोहन कर सके।
मध्यम वर्ग पर प्रहार: आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में मध्यम वर्ग अपनी दैनिक जरूरतों, यात्रा और खान-पान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह निर्भर हो चुका है, इसलिए यह आर्थिक शोषण सबसे गहरा है।
- कैब और राइड-हेलिंग: भारत के प्रमुख उपभोक्ता मंच 'लोकलसर्कल्स' के राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक ऐप टैक्सी उपयोगकर्ताओं ने डार्क पैटर्न्स और अनुचित मूल्य वृद्धि का अनुभव किया है। इनमें 59 प्रतिशत ने 'ड्रिप प्राइसिंग' (अंतिम भुगतान पर छिपी हुई फीस जोड़ना) और 86 प्रतिशत ने 'बेट एंड स्विच' (कम प्रतीक्षा समय दिखाकर बाद में लंबा इंतजार कराना) की शिकायत की। इसके अलावा, एक ही समय पर अलग-अलग फोन मॉडल्स से एक ही रूट के किराए में 15 से 30 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
- विमानन और होटल बुकिंग: लोकलसर्कल्स के 1.24 लाख से अधिक प्रतिक्रियाओं वाले अखिल भारतीय सर्वे के मुताबिक, 80 प्रतिशत हवाई यात्रियों ने बुकिंग के अंतिम चरण में छिपी हुई अतिरिक्त फीस का सामना किया। वहीं 56 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने "केवल 2 सीटें बची हैं" जैसी झूठी तात्कालिकता का सामना किया, जो उन्हें घबराहट में महंगा टिकट खरीदने पर मजबूर करती है।
- क्विक कॉमर्स और 'लॉयल्टी पेनल्टी': ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स में एक ही समय पर नियमित खरीदारों को नए ग्राहकों की तुलना में 10 से 25 प्रतिशत तक अधिक कीमतें दिखाई जाती हैं। इसे 'लॉयल्टी पेनल्टी' कहा जाता है—यानी जो उपभोक्ता किसी ऐप का जितना आदी हो चुका है, एल्गोरिदम उससे उतना ही अधिक मुनाफा वसूलता है।
पारंपरिक बाज़ार में उपभोक्ता को वस्तु के सामान्य मूल्य की जानकारी होती थी, लेकिन सर्विलांस प्राइसिंग स्क्रीन को एक अभेद्य 'ब्लैक बॉक्स' बना देती है। बराबर में बैठे दो यात्रियों को कभी यह पता नहीं चलता कि एक ही सेवा के लिए उनसे अलग-अलग शुल्क क्यों लिया गया।
यह स्थिति भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 और केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी 'डार्क पैटर्न रेगुलेशन, 2023' के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन करती है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने अपनी ई-कॉमर्स मार्केट स्टडी में स्पष्ट कहा था कि प्लेटफॉर्म्स द्वारा डेटा के आधार पर किए जाने वाले गैर-पारदर्शी डिस्काउंट और मूल्य निर्धारण से स्वस्थ बाज़ार प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। यह न केवल आम उपभोक्ता की जेब पर डाका है, बल्कि अंतिम सेवा प्रदाताओं (जैसे कैब चालक या रेस्टोरेंट संचालक) के मुनाफे को भी प्लेटफॉर्म्स की झोली में डालने का माध्यम है।
तकनीक और नवाचार का स्वागत होना चाहिए, लेकिन सुविधा के नाम पर उपभोक्ता की चौबीसों घंटे निगरानी और आर्थिक दोहन की छूट नहीं दी जा सकती।यदि कोई प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत व्यवहार या एआई एल्गोरिदम के आधार पर कीमत तय कर रहा है, तो स्क्रीन पर स्पष्ट डिस्क्लेमर और आधार मूल्य प्रदर्शित करना अनिवार्य होना चाहिए. 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' के तहत ऐसे सख्त नियम बनाए जाएं जो कंपनियों को यूजर के लोकेशन, डिवाइस प्रकार या सर्च फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल कीमत बढ़ाने के लिए करने से रोकें। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण जिसका मुख्य कार्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाना और कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले 'डार्क पैटर्न्स' (धोखाधड़ी वाली डिजिटल तकनीकों) पर नकेल कसना है और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जो भारत का प्रमुख बाज़ार नियामक है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि बाज़ार में स्वस्थ और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। इन दोनों प्राधिकरणों को स्वतंत्र साइबर व डेटा विशेषज्ञों के जरिए ई-कॉमर्स, कैब और ट्रेवल ऐप्स के मूल्य निर्धारण एल्गोरिदम का नियमित ऑडिट कराना चाहिए।
तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम और पारदर्शी बनाना था, न कि नागरिक की हर डिजिटल गतिविधि पर नज़र रखकर मुनाफा निचोड़ना। यदि सर्विलांस प्राइसिंग के इस चक्रव्यूह पर समय रहते कड़ा नीतिगत अंकुश नहीं लगाया गया, तो मध्यम वर्ग अपनी मेहनत की कमाई को एल्गोरिदम के गुप्त दांव-पेंचों में गंवाता रहेगा।
प्रभात खबर में 26/08/2026 को प्रकाशित
Tuesday, August 25, 2026
मशीनों की चौपाल बनता इंटरनेट
एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक 'औसत' निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है ।इस मशीनी कचरेके ढेर में किसी नए लेखक का मौलिक विचार, किसी पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या किसी विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा जब तक वह इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा |असल में अब इंसान नहीं बोट्स इंटरनेट चला रहे हैं |साइबर सुरक्षा फर्म Imperva द्वारा जारी वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6% हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। यानी इंटरनेट पर आधी से अधिक गतिविधियाँ इंसानों की हैं ही नहीं। इसमें से 32% ट्रैफिक "बैड बोट्स" का है जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपीय संघ की कानून प्रवर्तन एजेंसी यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुमान लगाया गया है कि 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है।'न्यूज़गार्ड' के हालिया अध्ययन से खुलासा हुआ है कि इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों "एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म" वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इंसानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।
'डेड इंटरनेट थ्योरी' केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है, यह समाज में एक गहरे अविश्वास को जन्म दे रही है ।जब इंटरनेट पर दिखने वाली आधी तस्वीरें, वीडियो और टेक्स्ट सिंथेटिक (एआई निर्मित) हैं, तो आम नागरिक का 'सत्य' पर से भरोसा उठने लगता है ।किसी भी प्रामाणिक घटना को आसानी से "एआई-जनरेटेड" या डीपफेक कहकर खारिज किया जा सकता है ।सभ्यताएँ केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक विश्वास और ऐतिहासिक संचय से चलती हैं ।यदि इंटरनेट का उपयोग केवल बोट्स द्वारा बोट्स को जानकारी परोसने के लिए होने लगेगा, तो मानव समाज अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाएगा ।हम एक ऐसे युग में पहुँच जाएंगे जहाँ जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन सत्य की पहचान करना नामुमकिन हो जाएगा ।सभ्यता का कोई भी विकास इंसानी चेतना की कीमत पर नहीं होना चाहिए ।'डेड इंटरनेट थ्योरी' हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल पर लगाम नहीं लगाई, तो हमारी डिजिटल दुनिया जल्द ही एक मृत और यांत्रिक मरुस्थल बनकर रह जाएगी ।
इस संकट से निपटने का रास्ता तकनीक को बंद करना नहीं, बल्कि "मानवीय प्रामाणिकता" को प्राथमिकता देना है ।मीडिया संस्थानों, प्रकाशकों और पाठकों को अब एआई-जनरेटेड सस्ते कंटेंट के बजाय हाड़-मांस के इंसान द्वारा लिखे गए मौलिक, शोधपरक और संवेदनात्मक लेखन का सम्मान करना होगा ।इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इंसान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा ।
Friday, August 21, 2026
एप की 'ब्लू टिक ' वाली डिजिटल बेगार
Thursday, August 13, 2026
स्क्रीन पर दिखती हिन्दी में भाषा का सौन्दर्य नहीं
कुछ दिनों पहले बनारस के एक अस्सी घाट के किनारे बैठे दो बुजुर्गों की बातचीत पर मेरा ध्यान गया। एक ने गहरी सांस लेकर कहा, "अब तो लंका फतह कइके ही लौटब, चाहे जे होए!" यह महज एक वाक्य नहीं था, इसमें एक खास इलाकाई जिद, रामायण का सांस्कृतिक संदर्भ और भोजपुरी-अवधी मिश्रित हिंदी का वह अनूठा रस था जिसे कोई भी भारतीय तुरंत समझ जाता। उत्सुकतावश, मैंने उसी समय अपनी जेब से स्मार्टफोन निकाला और सिलिकॉन वैली के एक सबसे आधुनिक 'लार्ज लैंग्वेज मॉडल' (LLM) यानी एआई टूल को यही वाक्य सौंप दिया। एआई ने पलक झपकते ही इसका हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद किया: "Now I will return only after conquering Sri Lanka, whatever happens!" मैं स्तब्ध रह गया। मशीनी बुद्धि ने 'लंका फतह' का शाब्दिक अर्थ तो निकाल दिया, लेकिन वह उस मुहावरे के पीछे छिपे सांस्कृतिक मर्म, संघर्ष के गौरव और भाषाई आत्मा को पूरी तरह मार चुका था। एआई के लिए 'लंका' केवल एक भौगोलिक देश था, हमारी साझा चेतना का मुहावरा नहीं। यह दृश्य आज भारत के हर कोने, हर भाषा और हर डिजिटल स्क्रीन पर घटित हो रहा है। हम अनजाने में एक ऐसे भाषाई संकट की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ हमारी बोलियाँ, मुहावरे और लोकोक्तियाँ सिलिकॉन वैली के सर्वरों में बैठकर तय किए जा रहे 'औसत ज्ञान' की बलि चढ़ रही हैं।ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि चैटजीपीटी या क्लॉड जैसी एआई तकनीकें हिंदी में बहुत धाराप्रवाह लिख रही हैं। लेकिन जब आप इसकी तह में जाएंगे, तो पाएंगे कि यह हिंदी असल में 'हिंदी' है ही नहीं; यह अंग्रेजी सोच का देवनागरी लिपि में किया गया एक यांत्रिक और बेजान अनुवाद है।
तकनीकी भाषा में इसे 'क्रॉस-लीगल इंटरफेरेंस' और 'डेटा इमबैलेंस' कहा जाता है। W3Techs के वेब प्रौद्योगिकी सर्वेक्षणों के अनुसार, इंटरनेट की शीर्ष 1 करोड़ वेबसाइटों में 50% से 60% सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध है, जबकि हिंदी का योगदान मात्र 0.1% से भी कम है । वहीं, यूनेस्को और कॉमन क्रॉल (Common Crawl) के वैश्विक डेटासेट दर्शाते हैं कि संपूर्ण इंटरनेट के लिखित डेटाबेस का 99% से अधिक हिस्सा गैर-भारतीय भाषाओं के नियंत्रण में है, जिससे भारतीय भाषाओं की कुल डिजिटल हिस्सेदारी 1% से भी कम रह जाती है ।वर्ष 2026 के हालिया भाषाई अध्ययनों के अनुसार, दुनिया के सबसे उन्नत एआई मॉडल्स (जैसे GPT-5 श्रेणी के मॉडल) जब हिंदी सहित 11 प्रमुख भारतीय भाषाओं पर टेस्ट किए गए, तो सांस्कृतिक और प्रासंगिक सटीकता के मामले में उनका स्कोर मात्र 45% के आसपास रहा|यूनेस्को (UNESCO) की 'एथिक्स ऑफ एआई' रिपोर्ट ने आगाह किया है कि पश्चिमी एआई मॉडल्स दुनिया भर की स्थानीय भाषाओं का 'डिजिटल विलोपन' कर रहे हैं, क्योंकि वे हर भाषा को एक समान सांचे में ढालने की कोशिश
प्रकाशन उधयोग एक नए संकट से जूझ रहा है. नए लेखकों के आलेख व्याकरण के दृष्टिकोण से तो एकदम शुद्ध होते हैं, लेकिन उनमें कोई 'आत्मा' या मौलिक गंध नहीं होती। ऐसा लगता है जैसे किसी रोबोट ने शब्दों को तरतीब से सजा दिया हो। कारण साफ है— युवा पीढ़ी अपनी भाषा को समृद्ध करने के लिए प्रेमचंद, रेणु, अज्ञेय या रामचंद्र शुक्ल को नहीं पढ़ रही, बल्कि वह चैटजीपीटी की स्क्रीन से भाषा सीख रही है।जब भाषा से उसके मुहावरे, उसकी लोकोक्तियाँ और उसकी स्थानीय गंध गायब हो जाती है, तो वह केवल संवाद का साधन रह जाती है, संस्कृति का संवाहक नहीं। मुहावरे समाज के सैकड़ों वर्षों के सामूहिक अनुभव और बुद्धिमत्ता से बनते हैं। जब एआई इन मुहावरों को 'अप्रासंगिक' या 'अनुवाद से बाहर' मानकर छोड़ देता है, तो हम अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कटने लगते हैं।इस संकट का समाधान तकनीक का बहिष्कार नहीं, बल्कि तकनीक का 'लोकाचार' (Localization) है।
Wednesday, August 5, 2026
डिजीटल निर्भरता से जुड़े संकट
अकादमिक शब्दावली में, डिजिटल निर्भरता केवल तकनीकी उपयोग की अधिकता नहीं है, बल्कि यह एक 'बाध्यकारी व्यवहारिक विकार' है। एक शोध के अनुसार, जब डिजिटल उपकरणों की अनुपस्थिति व्यक्ति में चिंता और कार्यात्मक शिथिलता (पैदा करने लगे, तो यह 'निर्भरता' की श्रेणी में आता है|भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2014 के 25 करोड़ से बढ़कर वर्तमान में लगभग 97 करोड़ हो चुकी है। भारतीयों द्वारा 2024 में स्मार्टफोन पर बिताए गए 1 लाख करोड़ घंटे हमारी श्रम उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। हालांकि डिजिटल अर्थव्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान 13.42% तक पहुँच गया है, लेकिन इसके साथ ही 'डिजिटल फटीग' के कारण कार्यबल की मानसिक स्वास्थ्य लागत भी बढ़ी है।
डिजिटल निर्भरता के पीछे 'चॉइस आर्किटेक्चर' और सोशल मीडिया का 'एल्गोरिथमिक डिज़ाइन' एक प्रमुख कारक है। टेक कंपनियाँ 'डोपामाइन-लूप' और 'इनफिनिट स्क्रॉल' जैसे मनोवैज्ञानिक साधनों का उपयोग करती हैं। यह विशेष रूप से 15–24 वर्ष के युवाओं के संज्ञानात्मक विकास को बाधित कर रहा है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Attention Span) में लगातार गिरावट देखी गई है। निम्हान्स SHUT क्लिनिक और Nielsen के 2025 के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, देश के शहरी क्षेत्रों के 82% से अधिक युवा (15–24 वर्ष) 'डिजिटल व्यसन' के किसी न किसी स्तर से प्रभावित हैं। इसमें से लगभग 35% 'गंभीर' (Severe) श्रेणी में हैं, जो इंटरनेट के बिना अत्यधिक बेचैनी और शारीरिक तनाव महसूस करते हैं। डिजिटल निर्भरता का यह संकट अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत के 55% इंटरनेट उपभोक्ता अब गाँवों में बसते हैं। विडंबना यह है कि जहाँ ग्रामीण भारत में डिजिटल बुनियादी ढांचा तेजी से पहुँचा है, वहीं 'डिजिटल साक्षरता' का अभाव है। बिजनेस टुडे और इंटरनेट एंड मोबाईल एसोसिएशन के शोध बताते हैं कि ग्रामीण युवा दिन के औसतन 6 घंटे 'शॉर्ट वीडियो' और ऑनलाइन सट्टेबाजी में गँवा रहे हैं। यह स्थिति न केवल ग्रामीण उत्पादकता को बाधित कर रही है, बल्कि उचित परामर्श केंद्रों के अभाव में एक विशाल आबादी को मानसिक अवसाद की ओर धकेल रही है।
जहाँ भारत प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा के डिजिटलीकरण पर जोर दे रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश अब तकनीक के शुरुआती उपयोग को हतोत्साहित कर रहे हैं।यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनीटरिंग रिपोर्ट 2024-25 (unesco.org) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि स्कूलों में स्मार्टफोन और टैबलेट का अनियंत्रित उपयोग सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के बजाय बच्चों की एकाग्रता और भावनात्मक स्थिरता को कम कर रहा है। भारत में जिस 'वन डिवाइस पर चाइल्ड' या 'स्मार्ट क्लासरूम' के मॉडल को सफलता माना जा रहा है, वैश्विक विशेषज्ञ इसे एक ऐसा प्रयोग मान रहे हैं जो पश्चिम में पहले ही विफल साबित हो चुका है। भारत "तकनीकी समाधानवाद" के जाल में फंसकर शिक्षा के मानवीय और संज्ञानात्मक पहलुओं को नजरअंदाज कर रहा है। विडंबना यह है कि भारत एक ऐसे 'डिजिटल प्रयोग' को बड़े पैमाने पर लागू कर रहा है जिसे विकसित देश पहले ही विफल मानकर त्याग चुके हैं। यह 'डिजिटल पुश' शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के नाम पर कहीं हमारे युवाओं की सोचने-समझने की मौलिक क्षमता को ही तो दांव पर नहीं लगा रहा?
स्वास्थ्य मंत्रालय की Tele-MANAS हेल्पलाइन (telemanas.mohfw.gov.in) ने 2022 से अब तक 20 लाख से अधिक कॉल प्राप्त की हैं , जिनमें डिजिटल तनाव एक प्रमुख कारक के रूप में उभरा निम्हान्स (NIMHANS )का SHUT (Service for Healthy Use of Technology) क्लिनिक (nimhans.ac.in) अब भारत में डिजिटल डिटॉक्स और व्यवहारिक सुधार का प्रमुख केंद्र बन गया है।
इसी उपचारात्मक पहल के तहत ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 के माध्यम से सरकार ने सट्टेबाजी आधारित एल्गोरिदम को विनियमित करने का प्रयास किया है, ताकि युवाओं को वित्तीय और मानसिक जोखिमों से बचाया जा सके। अब वह समय आ गया है जब हमें इंटरनेट को महज़ एक तकनीकी उपकरण मानना छोड़कर इसके गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों पर व्यापक विमर्श करना होगा। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की चेतावनी और वैश्विक देशों के अनुभवों से स्पष्ट है, डिजिटल निर्भरता कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान केवल डेटा की गति कम करने या विज्ञापनों को रोकने से हो जाएगा। यह एक व्यवहारिक संकट है, जो हमारी चेतना की गहराई तक पैठ बना चुका है।
एक 'विकसित भारत' और मानसिक रूप से सशक्त समाज के निर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकारों, नीति-निर्माताओं या ऑनलाइन गेमिंग (रेगुलेशन) एक्ट 2025 जैसे कानूनों पर नहीं छोड़ी जा सकती। सरकारें बुनियादी ढांचा दे सकती हैं, सुरक्षा नियम बना सकती हैं और Tele-MANAS (telemanas.mohfw.gov.in) जैसे हेल्पलाइन केंद्र खोल सकती हैं, लेकिन डिजिटल संयम का संस्कार अंततः व्यक्ति और परिवार को ही विकसित करना होगा।
हमें यह समझना होगा कि तकनीक का 'स्वामी' बनना है या उसका 'दास', यह चुनाव हमारा है। परिवारों को 'स्क्रीन-फ्री' संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा।जहां मोबाईल के बगैर भी जीवन को महसूस किया जा सके |
अंततः, डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात में नहीं मापी जानी चाहिए कि हमारे पास कितने जीबी डेटा या कितने करोड़ स्मार्टफोन हैं, बल्कि इस बात में मापी जानी चाहिए कि उस तकनीक का उपयोग करने वाला मस्तिष्क कितना स्वतंत्र, एकाग्र और रचनात्मक है। यदि हम अपनी सोचने की मौलिक क्षमता को तकनीक के एल्गोरिदम के हवाले कर देंगे, तो हम एक 'स्मार्ट' देश तो बन सकते हैं, लेकिन एक 'प्रबुद्ध' राष्ट्र कभी नहीं।
Tuesday, July 28, 2026
हमारा दिमाग खाली हो रहा है
तकनीक की दुनिया में सहेजने की यह घटती आदत कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की रिपोर्ट भी इस बात को साबित करती हैं। माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन की मई 2024 की 'वर्क ट्रेंड इंडेक्स' रिपोर्ट बताती है कि आज दुनिया के 75% से ज्यादा दफ्तरी कामकाजी लोग अपने रोज के काम, कोडिंग और रिसर्च के लिए सीधे एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर हमारे व्यवहार पर पड़ा है। साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई (Kaspersky) ने साल 2015-2016 के अपने एक बड़े शोध में इस आदत को 'डिजिटल विस्मृति' (Digital Amnesia) का नाम दिया था। इस रिसर्च के मुताबिक, 64% से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी चौबीसों घंटे मौजूद है, तो वे उसे अपने कंप्यूटर या दिमाग में सहेजने की मेहनत छोड़ चुके हैं। इसे विज्ञान में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहते हैं, यानी दिमाग पर जोर डालने और डेटा सुरक्षित रखने का काम इंसानों ने पूरी तरह मशीनों को सौंप दिया है। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हम चीज़ों को संभालकर रखने के पुराने दौर से निकलकर, हर चीज़ को तुरंत पा लेने के एक ऐसे नए दौर में आ चुके हैं जहाँ हम पूरी तरह तकनीक के भरोसे हैं।
पिछले दो दशकों तक किसी भी डिजिटल क्रिएटर, लेखक, कोडर या छात्र के लिए सबसे बड़ा डर था— डेटा का खो जाना। बिजली गुल होने या सिस्टम क्रैश होने के डर से उंगलियां अनैच्छिक रूप से हर दो मिनट में 'Ctrl + S' दबा देती थीं। यह इस बात का प्रतीक था कि हम अपने द्वारा बनाए गए या खोजे गए कंटेंट के मालिक थे और उसे भविष्य के लिए सहेजना हमारी ज़िम्मेदारी थी।
आज जनरेटिव एआई ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कोई कोडर अपने कोड की लाइब्रेरी सेव नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि अगली बार ज़रूरत पड़ने पर एआई कुछ ही सेकंड में नया और बेहतर कोड लिख देगा। लेखक अपने रफ ड्राफ्ट सहेज कर नहीं रखते, और छात्र अपने रिसर्च नोट्स का बैकअप नहीं लेते। जब ज्ञान 'ऑन-डिमांड' (मांग पर) उपलब्ध हो, तो उसे सहेजने की मेहनत कौन करे? तकनीक की भाषा में इसे 'एल्गोरिद्मिक री-जेनरेशन' कहा जाता है, जहाँ संचय की आवश्यकता ही समाप्त हो रही है।
इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय असर बेहद गहरा है।
साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो द्वारा 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक प्रसिद्ध शोध में पहली बार 'गूगल इफेक्ट' को दुनिया के सामने रखा गया था, जिसमें शोधकर्ताओं ने ये निष्कर्ष निकाला था कि जब लोगों को पता होता है कि जानकारी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगी, तो हमारा दिमाग जानकारी को याद रखने के बजाय 'यह कहाँ मिलेगी' उस रास्ते को याद रखता है।
जनरेटिव एआई के दौर में यह 'गूगल इफेक्ट' अब 'एआई एम्नेशिया' (AI Amnesia) या डिजिटल विस्मृति में बदल चुका है। हम फोन नंबर याद रखने की आदत पहले ही खो चुके थे, अब हम विचारों के तार्किक ढांचे को भी याद रखना छोड़ रहे हैं।जब हम किसी चीज़ को 'सेव' करते हैं, तो हम उसे एक श्रेणी (Folder) देते हैं, जो हमारे मस्तिष्क में एक न्यूरल पाथवे बनाती है। सेव न करने का मतलब है कि हम उस ज्ञान के साथ अपना मानसिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं।सब कुछ तात्कालिक और क्षणभंगुर हो गया है। जो चीज़ सहेजी नहीं जाती, वह मस्तिष्क के लिए भी अस्थायी हो जाती है।
जब हमने 'सेव' करना छोड़ दिया, तो हमने अनजाने में अपने ज्ञान का मालिकाना हक भी छोड़ दिया। पुराना डेटा जो हम सेव करते थे, वह हमारा व्यक्तिगत इतिहास था। उसमें हमारी कमियां, हमारे सुधार और हमारी मौलिक सोच के निशान थे।
आज हम जो कुछ भी लिख रहे हैं या बना रहे हैं, वह सीधे एआई के सर्वरों पर जा रहा है। यदि कल को ये एआई टूल्स सशुल्क (Paid) हो जाते हैं या इनका सर्वर डाउन हो जाता है, तो हमारे पास अपने काम का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। यह ज्ञान की एक नई औपनिवेशिकता है, जहाँ हमारा व्यक्तिगत बौद्धिक डेटा कुछ चुनिंदा सिलिकॉन वैली की कंपनियों के नियंत्रण में है । हम इतिहास के सबसे बड़े 'कंटेंट क्रिएटर' तो बन गए हैं, लेकिन हमारे पास अपना खुद का कोई 'आर्काइव' (संग्रह) नहीं है।
यह सच है कि तकनीक हमारे काम को आसान बनाती है और समय बचाती है। एआई ने हमें उत्पादकता की एक नई अंधी रफ़्तार दी है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंप्यूटर की 'रैंडम एक्सेस मेमोरी' की तरह यदि मनुष्य भी केवल तात्कालिक प्रोसेसिंग पर निर्भर हो जाएगा, तो उसकी दीर्घकालिक बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाएगी। जो मानव सभ्यता के विकास का मूल आधार है |
'Ctrl + S' केवल एक तकनीकी शॉर्टकट नहीं था, वह हमारी चेतना का एक हिस्सा था जो कहता था— "यह विचार मूल्यवान है, इसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।" यदि हम पूरी तरह से डिजिटल विस्मृति के इस प्रवाह में बह गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें।
अमर उजाला में 28/07/2026 को प्रकाशित





