आमतौर पर सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), आदि को सामान्य जनमानस के विचारों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि सोशल मीडिया सही मायने में एक ऐसा मीडिया है, जो किसी भी तरह के दबाव से मुक्त है। पिछले कुछ समय से जनमत के निर्माण में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन सूचना साम्राज्यवाद के इस दौर में इंटरनेट भी सूचना के मुक्त प्रवाह का विकल्प बनकर नहीं उभर पा रहा है। यह एक ऐसे मायाजाल का निर्माण करता है जिसमें सब कुछ वास्तविक लगते हुए भी वास्तविक नहीं लगता है। इस मायाजाल की जड़ें केवल वैचारिक नियंत्रण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका सबसे हिंसक प्रहार समाज के सबसे कमजोर और असुरक्षित तबके पर हो रहा है, जिसकी पुष्टि वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं के दस्तावेज़ भी करते हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की हालिया 'सुरक्षा और तकनीक' रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर की सरकारें और सीमा सुरक्षा बल अब प्रवासियों की पात्रता तथा आयु की जांच के लिए 'एआई फेशियल रिकग्निशन' तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू कर रहे हैं। इन रिपोर्टों में यह प्रमाणित किया गया है कि ये ब्लैक-बॉक्स एल्गोरिदम अश्वेतों, महिलाओं और प्रवासियों के प्रति जन्मजात रूप से पूर्वाग्रही हैं, जो बड़े पैमाने पर मानवीय बहिष्करण को जन्म दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर प्रवासियों को अलग-थलग करने वाला यह तकनीकी पूर्वाग्रह जब भारत के भीतर प्रवेश करता है, तो यह यहाँ सदियों से मौजूद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों के साथ मिलकर और अधिक हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। इसका परिणाम यह होता है कि पहले से ही मुख्यधारा से कटे हुए समाज के हिस्से इस डिजिटल ढांचे में और पीछे छूटते चले जाते हैं।
भारतीय संदर्भ में यह एल्गोरिद्मिक रंगभेद सामाजिक और भौगोलिक विभाजनों को और गहरा कर रहा है। देश में इंटरनेट उपयोग में लैंगिक असमानता गहरी बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और GSMA Mobile Gender Gap Report के अनुसार, पुरुषों में इंटरनेट उपयोग दर लगभग 57% है, जबकि महिलाओं में यह केवल 33% है। मोबाइल इंटरनेट उपयोग में भी महिलाएँ पुरुषों से लगभग 50% पीछे हैं। इसके अलावा, डिजिटल कौशल में पुरुषों की भागीदारी 22.78% है, जबकि महिलाओं की केवल 13.91%। यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुँच में लैंगिक असमानता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनी हुई है। इस संरचनात्मक अंतर के कारण एल्गोरिदम पर अंग्रेजी और कुछ गिने-चुने शहरी केंद्रों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, जिसके चलते ग्रामीण भारत और क्षेत्रीय विमर्शों को एल्गोरिदम 'ट्रेंडिंग' की मुख्यधारा से बाहर कर देता है।
पहुंच और कौशल का यह लैंगिक व क्षेत्रीय अंतर जब एक ओर आम नागरिक को हाशिए पर धकेलता है, तो वहीं दूसरी ओर जो लोग इस डिजिटल स्पेस के भीतर मौजूद हैं, उनके लिए यह वर्चुअल दुनिया एक गहरे अविश्वास और असुरक्षा का मैदान बन जाती है। मुख्यधारा का विमर्श अब सत्य और असत्य के बीच के भेद को ही समाप्त करने पर आमादा है, जिसके पीछे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अनियंत्रित विकास काम कर रहा है। डिजिटल स्पेस में अब सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025 और 2026 के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित भ्रामक सामग्री और डीपफेक आज वैश्विक लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। एआई टूल्स का दुरुपयोग करके किसी भी व्यक्ति या विचार की सामाजिक हैसियत और गरिमा को पल भर में नष्ट किया जा सकता है।
विश्वसनीयता के इस संकट की भयावहता का अंदाज़ा महज़ कुछ सैद्धांतिक चेतावनियों से नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहे विस्फोटक आंकड़ों से लगाया जा सकता है। Resemble.AI की रिपोर्ट (2025) के अनुसार डीपफेक सामग्री की मात्रा में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। 2019 में जहाँ केवल 14,000 डीपफेक वीडियो मौजूद थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 8 मिलियन तक पहुँच गई — यानी लगभग 571 गुना वृद्धि। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 की तीसरी तिमाही तक हर तिमाही में औसतन 2,031 डीपफेक घटनाएँ दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 1,500% अधिक है। तकनीक की यह हिंसक बाढ़ जहां एक तरफ भ्रामक विमर्शों को जन्म देती है, वहीं दूसरी तरफ यदि कोई सचेत नागरिक इन बाधाओं को पार करके अपनी स्वतंत्र असहमति या प्रतिरोध दर्ज कराना चाहता है, तो इस तंत्र के पास उसकी आवाज़ को घोंटने के लिए और भी सूक्ष्म, अदृश्य हथकंडे मौजूद हैं।
इन बाधाओं को पार करके कोई यूजर अगर अपनी असहमति दर्ज कराता है तो उसके 'शैडो-बैनिंग' किये जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। वर्चुअल मंचों पर वैचारिक विरोध को दबाने के लिए 'शैडो-बैनिंग' जैसी अदृश्य सेंसरशिप का सहारा लिया जाता है। यूरोपीय डिजिटल राइट्स (EDRi) जैसी डिजिटल राइट्स वॉचडॉग संस्थाओं के शोध दर्शाते हैं कि बड़े टेक प्लेटफॉर्म अपने व्यावसायिक हितों और विज्ञापनों को बचाने के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या सामाजिक आंदोलनों से जुड़े की-वर्ड्स की 'रीच' को बैकएंड से ही दबा देते हैं। इसमें यूज़र के अकाउंट को ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी रीच को शून्य कर दिया जाता है। यूज़र को लगता है कि वह स्वतंत्र है और लोकतांत्रिक चर्चा का हिस्सा है, पर वास्तव में उसकी आवाज़ को एक तकनीकी पिंजरे में कैद कर दिया जाता है जहाँ कोई दूसरा उसे सुन ही नहीं पाता। यह 'सूचना साम्राज्यवाद' का सबसे सूक्ष्म और हिंसक स्वरूप है।
अभिव्यक्ति को कुचलने वाली यह अदृश्य सेंसरशिप किसी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा रही, बल्कि यह सिलिकॉन वैली के वैश्विक तकनीकी एकाधिकारों की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसी कारण, वैश्विक स्तर पर तकनीकी नियंत्रण और नैतिकता को लेकर चिंताएं केवल अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्थाएं भी इस तकनीकी निरंकुशता को नियंत्रित करने के विकल्प तलाश रही हैं। सिलिकॉन वैली की कुछ गिने-चुने तकनीकी एकाधिकारों ने वैश्विक विमर्श को इस कदर जकड़ लिया है कि तकनीकी मंचों द्वारा फैलाए जा रहे ध्रुवीकरण और व्यावसायिक अंधाधुंधता से आज वैश्विक संस्थाएं भी चिंतित हैं। यही कारण है कि यूनेस्को द्वारा लगातार 'एथिक्स ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Ethics of AI) पर वैश्विक नियम जारी किए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी अब यह बहस तेज है कि क्या यूरोपीय संघ के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट' (EU AI Act) जैसे कड़े कानूनी मानदंडों और तकनीकी नैतिकता के अंतर्निहित सिद्धांतों के बिना इस बेलगाम तकनीक को इंसानी नियंत्रण के दायरे में वापस लाया जा सकता है? जब तक एआई और एल्गोरिदम के विकास में नैतिक मानदंडों और सामाजिक सुरक्षा को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक यह तकनीक केवल शक्तिशाली देशों और वैश्विक कंपनियों के हितों को साधने वाला 'डिजिटल रंगभेद' ही बनी रहेगी।
इस वैश्विक विमर्श के आलोक में, भारत जैसे समाज को यह गहराई से समझना होगा कि जो तकनीक ऊपरी तौर पर जितनी आकर्षक और तटस्थ दिखाई देती है, उसके नेपथ्य में उतने ही गहरे व्यावसायिक और वैचारिक हित छिपे होते हैं। तकनीकी निर्भरता के इस दौर में भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि कोई भी एल्गोरिदम या तकनीक कभी 'न्यूट्रल' या निष्पक्ष नहीं होती। वह हमेशा अपने निर्माता के आर्थिक लाभ और राजनीतिक दृष्टिकोण से संचालित होती है। यदि हमें इंटरनेट को इस 'अदृश्य डिजिटल पिंजरे' और वैचारिक रंगभेद से मुक्त कराना है, तो मात्र भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (DPDP Act) जैसे विनियामक कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए हमें तकनीकी कंपनियों के बैकएंड कोड्स की सार्वजनिक ऑडिटिंग, स्वदेशी डेटा संप्रभुता और एआई प्रणालियों में सामाजिक न्याय के अंतर्निहित सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक के इस उपभोगवादी और दमनकारी तंत्र के सामने मूक दर्शक या केवल 'उपभोक्ता' बनने के बजाय, एक सचेत, प्रश्नकर्ता और प्रतिरोधी 'डिजिटल नागरिक' की भूमिका का निर्वाह करें।
अमर उजाला में 25/06/2026 को प्रकाशित लेख






