Friday, October 23, 2026
गति बढ़ी, पर यात्रा की आत्मा पीछे छूट गई
Tuesday, October 6, 2026
मानवीय कन्धों का विकल्प नहीं बन सकती मशीन
पारंपरिक रूप से 'अकेलेपन' को केवल एक मानसिक अवस्था माना जाता था, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में यह सबसे तेजी से बढ़ते व्यवसायिक बाजार में तब्दील हो चुका स्टैटिस्टा और ऐपफिगर्स के इन-ऐप परचेज (App Store व Google Play)आंकड़ों के अनुसार, एआई कंपैनियन ऐप्स पर वैश्विक उपभोक्ता खर्च के मामले में अमेरिका (≈30.5%) के बाद भारत लगभग 24.3% हिस्सेदारी के साथ दुनिया में दूसरे पायदान पर है। यह आंकड़ा साबित करता है कि भारतीय युवा केवल इन ऐप्स को डाउनलोड ही नहीं कर रहे, बल्कि मशीनी रिश्तों के लिए अपनी जेब से भारी रकम भी चुका रहे हैं। ग्रैंड व्यू रिसर्च के अनुसार, वैश्विक एआई कंपैनियन मार्केट का मूल्यांकन 2024-2025 में तेज़ी से बढ़ते हुए 30% से 31% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से आगे बढ़ रहा है। इसमें एशिया-प्रशांत सबसे तेज़ क्षेत्र है, जहाँ भारत और चीन डाउनलोड्स और यूजर एडॉप्शन में सबसे आगे|रेड लैब और अन्य अध्ययनों के अनुसार, भारत के महानगरों में रहने वाले 30% से 43% शहरी युवा नियमित रूप से अकेलेपन और अलगाव का अनुभव करते हैं।
निमहांस (NMHS रिपोर्ट) के अनुसार, भारतीय वयस्कों में कुल मानसिक रुग्णता की व्यापकता 10.6% है, जो बड़े मेट्रो शहरों में बढ़कर लगभग 13.5% तक पहुँच जाती है।इस बाज़ार में 'रेप्लिका' 'कैरेक्टर एआई' और 'नॉमी' जैसे प्लेटफॉर्म्स तेजी से पैठ बना रहे हैं। अकेले 'कैरेक्टर एआई' के पास 2 करोड़ से अधिक मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, जिनमें बड़ा हिस्सा युवाओं का है।यह बाज़ार इंसानी रिश्तों के एक बेहद नाज़ुक पहलू का मुद्रीकरण करता है|वास्तविक मानवीय रिश्तों में मतभेद, असहमति, त्याग और भावनात्मक निवेश की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, एआई बॉट्स को इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि वे:चौबीसों घंटे बिना किसी शर्त के तुरंत उपलब्ध रहते हैं।यूजर की किसी भी बात पर असहमति नहीं जताते।यूजर के अहंकार और पूर्वाग्रहों को लगातार सकारात्मक प्रतिपुष्टि देते हैं।इस रिश्ते को नाम दिया जाता है 'घर्षण-रहित आत्मीयता|कंपनियाँ पहले मुफ्त चैट के जरिए यूजर को भावनात्मक रूप से इन बॉट्स पर निर्भर बनाती हैं। इसके बाद 'रोमांटिक मोड', 'वॉइस कॉल्स' और 'अनलिमिटेड चैट' जैसी सुविधाओं के लिए भारी सब्सक्रिप्शन फीस वसूली जाती है।
यह मानवीय अकेलेपन का विशुद्ध तकनीकी दोहन है।भारतीय समाज के ताने-बाने पर कृत्रिम घनिष्ठता के गंभीर प्रभाव दिखने लगे हैं| जिसका दुष परिणाम सहनशीलता और संवाद का ह्रास लगातार 'हाँ-में-हाँ' मिलाने वाले एल्गोरिदम के आदी होने के बाद युवा वास्तविक जीवन में किसी की आलोचना, असहमति या सामान्य पारिवारिक तकरार भी नहीं झेल पाते।दूसरा पैरा-सोशल पराधीनता जिसमें तकनीकी खराबी या सर्वर डाउन होने पर जब चैटबॉट का व्यवहार बदलता है, तो उपयोगकर्ताओं में वास्तविक ब्रेकअप जैसा गहरा अवसाद और मानसिक आघात देखा जा रहा है। तीसरा पारिवारिक व वैवाहिक संस्था से विमुखता मेट्रो शहरों में कई युवा विवाह, डेटिंग और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से बचकर 'शून्य-जोखिम' वाले एआई साथियों को प्राथमिकता देने लगे हैं और चौथा है निजता और भावनात्मक आंकड़ों का संकट: उपयोगकर्ता इन ऐप्स से अपनी सबसे अंतरंग असुरक्षाएं और निजी बातें साझा करते हैं। भारत के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' में डेटा सुरक्षा की बात तो है, लेकिन इस भावनात्मक डेटा की प्रोफाइलिंग को रोकने के लिए अभी कोई विशिष्ट विनियामक ढांचा नहीं है।इसलिए जरूरी है कि 'इंडिया एआई मिशन' और नियामक संस्थाओं को इसके सामाजिक-मानसिक दुष्प्रभावों पर कड़े कदम उठाने होंगे जिसमें अनिवार्य डिस्क्लेमर आवश्यक है केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को एआई कंपैनियन ऐप्स पर स्पष्ट चेतावनी अनिवार्य करनी चाहिए कि 'यह एक मशीनी सिमुलेशन है और वास्तविक मानवीय संबंधों का विकल्प नहीं है।'इसके अतिरिक्त युवाओं को भावनात्मक रूप से बांधकर वित्तीय दोहन करने वाले 'सब्सक्रिप्शन ट्रैप्स' पर कड़ा प्रतिबंध लगे।अकेलेपन का समाधान तकनीक नहीं, समाज है। नगर नियोजन में सामुदायिक केंद्रों, सार्वजनिक पार्कों और पुस्तकालयों को बढ़ावा देना होगा जहाँ लोग भौतिक रूप से मिल सकें।
इंसानियत का विकास एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करने, संघर्षों को सुलझाने और स्पर्श की गर्माहट से हुआ है। जब हम 'अपनेपन' जैसी बुनियादी ज़रूरत को भाषा मॉडल के हवाले कर देते हैं, तो हम सुविधा तो पा लेते हैं लेकिन अपनी मानवीय संवेदना को खो देते हैं। मशीनी बुद्धिमत्ता हमें सुविधा दे सकती है, लेकिन वह उस इंसानी कंधे का विकल्प कभी नहीं बन सकती जिस पर सिर रखकर रोया जा सके।
आज के विज्ञापन स्मृतियों का हिस्सा क्यों नहीं बन पाते
शाम के ठीक आठ बजे बैठक के लकड़ी वाले कैबिनेट का शटरनुमा दरवाज़ा खुलता था और दूरदर्शन की परिचित धुन के साथ पूरा घर एक जादुई सम्मोहन में बंध जाता था। उस दौर में धारावाहिक और फ़िल्में तो अपनी जगह थीं, लेकिन कार्यक्रमों के बीच आने वाले विज्ञापनों की भी अपनी एक अलग दुनिया थी |जिसमें अचानक एक धुन बजती—“वाशिंग पाउडर निरमा...” और घर के कई सदस्य अनायास उसके अगले शब्द गुनगुनाने लगते। फिर कभी पर्दे पर एक छोटी बच्ची आती और मासूमियत से पुकार उठती—“आई लव यू, रसना!” ये महज़ व्यावसायिक संदेश नहीं थे। वे उस दौर के बैठक, परिवार, बचपन और शाम के एक साझा अनुभव का हिस्सा बन चुके थे। भारतीय विज्ञापन इतिहास के दस्तावेजी अध्ययन रेखांकित करते हैं कि निरमा का जिंगल और रसना का यह संवाद विज्ञापनों की सीमा लांघकर जनमानस की लोकप्रिय भाषा का अंग बन गए थे। उनकी धुनें संक्षिप्त थीं, शब्द सहज थे और वे बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के दोहराए जा सकते थे।लेकिन आज टीवी स्क्रीन की जगह हथेली में सिमटे स्मार्टफोन ने ले ली है। दूरदर्शन और केबल टीवी के उस अपेक्षाकृत साझा आँगन से निकलकर हम यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंचों की अधिक व्यक्तिगत स्क्रीन पर आ खड़े हुए हैं। दृश्य पहले से कहीं अधिक चटख हैं, वीडियो की गति तेज है और विज्ञापन ऑनलाइन व्यवहार के अलग-अलग संकेतों के आधार पर अत्यधिक व्यक्तिगत बनाए जा रहे हैं। विज्ञापन अब हमारे सामने पहले से कहीं अधिक संख्या में आते हैं। लेकिन एक बुनियादी सवाल बना हुआ है—क्या वे आज भी हमारी स्मृति में उसी तरह बस पाते हैं, जैसे कभी निरमा, रसना, कैडबरी या फेविकोल के विज्ञापन बस गए थे?इस सवाल का उत्तर केवल पुरानी यादों की भावुकता में नहीं तलाशा जा सकता। असल कहानी बदलते माध्यम, ध्यान की बदलती आर्थिकी और विज्ञापनों की संरचनात्मक भाषा की है।पारंपरिक टेलीविजन प्रसारण का एक बड़ा लाभ यह था कि दर्शक के पास विकल्प सीमित थे। विज्ञापन शुरू हुआ तो वह प्रसारण प्रवाह का स्वाभाविक हिस्सा था। आज डिजिटल मंचों पर दर्शक के पास लगातार विकल्प मौजूद हैं—वीडियो को स्क्रॉल करना, दूसरा वीडियो चुनना या विज्ञापन बंद कर देना। यूट्यूब के आधिकारिक नियमों के अनुसार, स्किप होने वाले इन-स्ट्रीम विज्ञापनों के मामले में यही पाँच सेकंड दर्शक के शुरुआती ध्यान के लिए एक महत्वपूर्ण सीमा बन जाते हैं। हालाँकि डिजिटल माध्यम पर बिना स्किप होने वाले और बंपर विज्ञापनों जैसे अन्य प्रारूप भी मौजूद हैं, लेकिन स्किप का विकल्प मिलते ही दर्शक और विज्ञापन का रिश्ता बदल जाता है। टीवी पर दर्शक विज्ञापन को प्रवाह के साथ देख रहा था; डिजिटल स्क्रीन पर वह कई बार इसे अपनी मुख्य सामग्री तक पहुँचने की राह में एक रुकावट के रूप में भी देखने लगता है।
इसके साथ ही विज्ञापन की संवेदी पहचान में भी बड़ा बदलाव आया है। पुराने दौर के विज्ञापनों की एक बड़ी ताकत उनकी ध्वनि-पहचान थी। धुन सुनते ही उत्पाद का नाम जेहन में उभर आता था। आज मोबाइल-केंद्रित देखने की आदतों ने विज्ञापन की रचनात्मक भाषा को बदल दिया है। छोटे स्क्रीन और तेज स्क्रॉलिंग वाले माहौल में दृश्य संकेत, शुरुआती हुक और संक्षिप्त संदेश पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। कई बार ध्वनि के बजाय केवल दृश्यों के सहारे बात कहनी पड़ती है।
पारिवारिक सामूहिकता की जगह व्यक्तिगत स्क्रीन का आना भी एक विचारणीय पहलू है। टेलीविजन का अनुभव लंबे समय तक परिवार और समाज के साझा विमर्श से जुड़ा रहा। एक ही विज्ञापन पर पूरा परिवार साथ प्रतिक्रिया देता था, जिससे वह बातचीत का हिस्सा बनता था। डिजिटल माध्यम का अनुभव अपेक्षाकृत अधिक बिखरा हुआ है। एक ही कमरे में बैठे अलग-अलग लोग अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न विज्ञापन देख रहे होते हैं। जब किसी अनुभव में सामूहिकता और सामाजिक चर्चा का अभाव होता है, तो उसका सामूहिक स्मृति का हिस्सा बनना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है।
यह पूरी खींचतान वस्तुतः विज्ञापन पर दर्शक के ध्यान टिकने की भी है। मीडिया शोध संस्था 'ल्यूमेन रिसर्च' के क्रॉस-मीडिया ध्यान विश्लेषण में तीस सेकंड के टीवी विज्ञापनों के लिए आँखों का औसत ठहराव लगभग 13.8 सेकंड पाया गया, जबकि पंद्रह सेकंड के यूट्यूब विज्ञापनों के लिए यह औसत ठहराव लगभग 4.9 सेकंड रहा। यह अंतर संकेत देता है कि इन दो माध्यमों में विज्ञापन पर दर्शक के दृश्य ध्यान का पैटर्न अलग है और डिजिटल वीडियो विज्ञापन को अपेक्षाकृत कम समय में ध्यान आकर्षित करना पड़ता है।हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं कि माध्यम ही सब कुछ तय करता है। वैश्विक शोध फर्म 'नीलसन' के एक विश्लेषण में जब एक ही ब्रांड के ब्रांडेड कंटेंट और सामान्य प्री-रोल विज्ञापनों की तुलना की गई, तो उसमें शामिल ब्रांडेड कंटेंट का औसत रिकॉल 86 प्रतिशत, जबकि प्री-रोल का 65 प्रतिशत पाया गया। यह तथ्य बताता है कि समस्या केवल स्क्रीन के माध्यम की नहीं है; कहानी, प्रस्तुति और सामग्री का प्रारूप भी इस बात को गहराई से प्रभावित करते हैं कि कोई संदेश दर्शक को कितना याद रहता है।डिजिटल विज्ञापन का एक बड़ा हिस्सा आज परफॉर्मेंस मार्केटिंग और मापने योग्य तात्कालिक नतीजों—दृश्यता, क्लिक, सहभागिता या रूपांतरण—पर केंद्रित है। तकनीक यह तो तुरंत माप लेती है कि कितने लोगों ने विज्ञापन देखा, कितनों ने लिंक दबाया और कितनों ने खरीदारी की। लेकिन तात्कालिक प्रतिक्रिया को मापना आसान है, जबकि किसी धुन, संवाद या कहानी का वर्षों तक स्मृति में बने रहना बिल्कुल अलग तरह की मानवीय और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि आज के विज्ञापन याद रहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें यादगार बनने के लिए किस तरह के वातावरण में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। पुराने दौर में विज्ञापन सीमित चैनलों और साझा देखने के अनुभव के बीच आते थे। एक मधुर धुन, सरल शब्द और बार-बार दोहराव उन्हें परिवार और बातचीत का हिस्सा बना सकते थे। आज डिजिटल मंचों पर वही विज्ञापन कुछ ही क्षणों में बदलती स्क्रीन, स्क्रॉल और अनेक विकल्पों के बीच अपना स्थान बनाने की कोशिश करता है।
एल्गोरिद्म हमारे व्यवहार और प्राथमिकताओं के संकेतों को पढ़ सकता है, लेकिन किसी विज्ञापन के हमारे निजी अनुभव और सामाजिक स्मृति से जुड़ने की जटिल प्रक्रिया को पूरी तरह माप पाना आसान नहीं है। इसलिए डिजिटल युग में विज्ञापन की चुनौती केवल दर्शक तक पहुँचना नहीं, बल्कि उसके ध्यान से आगे बढ़कर उसकी स्मृति तक पहुँचना है।भले ही जनमाध्यमों के लिए बनाए जाने वाले विज्ञापन सामूहिकता को संबोधित करते हैं पर आज के विज्ञापनों का दर्शक तकनीक के बढ़ते दौर में बहुत अकेला होता जा रहा है |एल्गोरिदम की दुनिया में व्यक्तिवाद हावी है|
तकनीक विज्ञापन को अधिक व्यक्तिगत, तेज और मापने योग्य बना सकती है; लेकिन उसे यादगार बनाने के लिए आज भी भाषा, कहानी, संगीत और मानवीय संवेदना और सामूहिकता की जरूरत होती है। आज की इंटरनेट की दुनिया में यही सामूहिकता गायब है |
Monday, October 5, 2026
डिजिटल आर्थिकी में साइबर सुरक्षा कवच
डिजिटल भारत की कहानी जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसके साथ एक दूसरी कहानी भी लगभग उसी गति से फैल रही है। यह कहानी साइबर ठगी की है। कभी जेब काटने के लिए अपराधी को आपके पास आना पड़ता था, अब उसे आपकी जेब तक पहुंचने की भी जरूरत नहीं। एक फोन कॉल, एक संदेश, एक फर्जी लिंक, एक नकली वेबसाइट या वीडियो कॉल के जरिए वह आपके बैंक खाते तक पहुंचने की कोशिश कर सकता है। अपराध का स्थान बदल गया है, तरीका बदल गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपराधी और पीड़ित के बीच की भौतिक दूरी लगभग अप्रासंगिक हो गई है।भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार आर्थिक अवसरों और सुविधा का बड़ा माध्यम बना है। लेकिन इसी डिजिटल विस्तार ने अपराधियों के लिए भी संभावनाओं का नया संसार खोल दिया है। समस्या केवल यह नहीं कि साइबर ठगी के मामले बढ़ रहे हैं। असली चिंता यह है कि ठग अब तकनीक के साथ मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे केवल पासवर्ड या ओटीपी नहीं मांगते, वे डर पैदा करते हैं, लालच देते हैं, भरोसा पैदा करते हैं और कई बार पीड़ित को इतना मानसिक दबाव में डाल देते हैं कि वह स्वयं अपने खाते से रकम अपराधी के खाते में पहुंचा देता है।
Wednesday, September 30, 2026
सर्च की बदलती प्रकृति और डिजिटल मीडिया की मुश्किलें
ऑडियंस रिसर्च फर्म स्पार्कटोरो और डेतोस) के क्लिकस्ट्रीम पैनल अध्ययन के अनुसार, अमेरिका और यूरोपीय संघ में गूगल पर होने वाले कुल सर्च में से लगभग 58.5% से 60% सर्च 'जीरो-क्लिक' में समाप्त हो जाते हैं। 1,000 अमेरिकी सर्च में से औसतन केवल 360 क्लिक और यूरोपीय संघ में 374 क्लिक ही ओपन-वेब की स्वतंत्र वेबसाइटों तक पहुँच पाते हैं। बाकी सारे क्लिक या तो गूगल के अपने उत्पादों (यूट्यूब, मैप्स, ऐड्स) में सिमट जाते हैं या यूजर बिना किसी वेबसाइट पर गए सत्र समाप्त कर देता है।
प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, जब सर्च पन्ने पर एआई सारांश प्रकट होता है, तो सामान्य वेब-परिणामों पर क्लिक करने की संभावना आधी रह जाती है। जिन सर्च पेजों पर एआई सारांश नहीं था, वहाँ 15% यूजर्स ने किसी लिंक पर क्लिक किया; लेकिन एआई सारांश वाले पेजों पर यह घटकर मात्र 8% रह गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एआई ओवरव्यू के भीतर जो स्रोत संदर्भ के रूप में उद्धृत होते हैं, उन पर केवल 1% यूजर्स ही क्लिक करते हैं। वहीं, अहरिफ्स) के अध्ययन बताते हैं कि एआई ओवरव्यूज के कारण शीर्ष रैंकिंग वाले पेजों के सीटीआर में 58% तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है।
डिजिटल कंटेंट नेक्स्ट और मीडिया ट्रैफ़िक विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक समाचार संस्थानों के सर्च रेफ़रल ट्रैफ़िक में औसतन 25% से 45% तक की सीधी गिरावट आई है। सूचनात्मक खोजों (में जीरो-क्लिक की दर 65% से 70% तक पहुँच चुकी है, जिसका सीधा असर स्वतंत्र मीडिया घरानों के डिजिटल विज्ञापन राजस्व पर पड़ा है।पत्रकारिता की यह त्रासदी एक गहरे अंतर्विरोध पर खड़ी है। सिलिकॉन वैली के एआई मॉडल्स और एल्गोरिदम खुद रिपोर्टिंग नहीं करते। वे किसी बाढ़ में कमर तक पानी में उतरकर ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं कर सकते, न ही किसी सरकारी दफ्तर में बैठकर घोटालों की फाइलों की पड़ताल कर सकते हैं। एआई केवल वही जानता है जो पत्रकारों और लेखकों ने अपने बौद्धिक श्रम, समय और जोखिम भरे संसाधनों से तैयार किया है।सर्च इंजनों के एआई क्रॉलर्स समाचार पोर्टलों की सामग्री को सेकंडों में खंगालते हैं, उसका सार-संक्षेप तैयार करते हैं और उसे अपने ही सर्च इंटरफेस पर सजा देते हैं। पाठक को त्वरित उत्तर मिल जाता है, सर्च इंजन उस पन्ने पर अपने विज्ञापन चलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमाते हैं, लेकिन जिस पत्रकार ने वह तथ्य जुटाया था, उसे बदले में मिलता है—शून्य ट्रैफ़िक, शून्य क्लिक और शून्य विज्ञापन राजस्व।यदि कोई प्रकाशक इस डिजिटल लूट से बचने के लिए अपनी वेबसाइट के robots.txt कोड के जरिए एआई बॉट्स को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो सर्च इंजन उसे मुख्य सर्च इंडेक्स से ही बाहर करने की अप्रत्यक्ष धमकी देते हैं। यह सामग्री निर्माताओं के सामने एक क्रूर विकल्प है: या तो अपनी सामग्री लुटने दीजिए, या फिर डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अदृश्य हो जाइए।
इस 'जीरो-क्लिक' संस्कृति की सबसे घातक मार भारत जैसे विशाल देश की भाषाई और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रही है। बड़े वैश्विक मीडिया कॉर्पोरेशंस तो फिर भी पेड-सब्सक्रिप्शन, सम्मेलनों या ब्रांड गठबंधनों के जरिए कुछ हद तक टिक सकते हैं; लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और कस्बों में स्वतंत्र रूप से चलने वाले डिजिटल पोर्टल्स और भाषाई पत्रकारों का क्या होगा? वे पूरी तरह से ओपन-वेब ट्रैफ़िक और डिजिटल विज्ञापनों पर निर्भर हैं।जब खोज इंजन ही पाठक को अपनी चहारदीवारी के भीतर रोक लेगा, तो स्थानीय न्यूज़ रूम्स में पत्रकारों की छँटनी होगी, खोजी पत्रकारिता का बजट खत्म होगा और अंततः पूरा समाज 'न्यूज़ डेज़र्ट' (समाचार-विहीन क्षेत्र) में तब्दील हो जाएगा। जब ज़मीन से नए तथ्य जुटाने वाले हाथ ही नहीं बचेंगे, तो भविष्य में यह एआई किसे खंगालेगा? क्या यह खुद अपने ही पैदा किए मशीनी कचरे को बार-बार रीसाइकल कर समाज को परोसता रहेगा?इस असंतुलन को रोकने के लिए कोई नियामक संस्था हो अब समय की मांग यही है |ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक 'न्यूज़ मीडिया बार्गेनिंग कोड' और कनाडा के 'ऑनलाइन न्यूज़ एक्ट' की तर्ज पर भारत में भी अविलंब एक विधायी ढांचा बनाया जाए। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ भारतीय मीडिया घरानों के कंटेंट के एआई इस्तेमाल पर पारदर्शी राजस्व साझा करें।अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और यूरोपीय संघ की अदालतों द्वारा सर्च एकाधिकार पर चलाए जा रहे मुकदमों से सीख लेते हुए भारतीय नियामकों को सर्च इंजनों को 'मध्यवर्ती' से 'प्रकाशक' बनने की मनमानी पर रोक लगानी होगी।एआई सारांशों में केवल नाममात्र के सूक्ष्म फुटनोट देने के बजाय पाठकों को मूल रिपोर्ट तक ले जाने वाले स्पष्ट और बड़े हाइपरलिंक्स को अनिवार्य किया जाए।सर्च इंजन और मूल प्रकाशक के बीच का संबंध सहजीविता पर आधारित था—एक को सामग्री मिलती थी, दूसरे को पाठक। 'जीरो-क्लिक' सर्च और अनियंत्रित एआई समरी ने इस नाजुक संतुलन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह लड़ाई केवल मीडिया कंपनियों के बैलेंस शीट की नहीं है; यह एक स्वतंत्र, विविध और तथ्यपरक सार्वजनिक विमर्श को ज़िंदा रखने की लड़ाई है। यदि समाज और शासन ने सूचना के इस एकाधिकारवादी दोहन पर समय रहते लगाम नहीं लगाई, तो बहुत जल्द इंटरनेट कॉरपोरेट सारांशों का एक ऐसा बंद कमरा बनकर रह जाएगा—जहाँ सूचनाएँ तो अनंत होंगी, लेकिन सच की स्वतंत्र गवाही हमेशा के लिए मौन हो चुकी होगी।
प्रभात खबर में 30/09/2026 को प्रकाशित लेख
Thursday, September 17, 2026
वर्षा से मन मयूर नहीं नाचता ,डर सताता है
मौसम पहले मन के मिज़ाज से आते थे, अब वे मौसम विभाग की चेतावनियों और प्रदूषण सूचकांक के डरावने आंकड़ों के साथ दाखिल होते हैं। हमारे देखते-देखते जाड़ा, गर्मी और बरसात—तीनों ऋतुएं हमारे तथाकथित 'विकास' की वेदी पर कुर्बान हो चुकी हैं। अब मौसम बदलते नहीं, बल्कि जीवन की लय को झकझोर कर रख देते हैं। कुदरत का जो चक्र कभी जीवन को सहजता और ठहराव देता था, वह अब कंक्रीट के जंगलों और इंसानी आपाधापी में उलझकर दम तोड़ रहा है।
Tuesday, September 8, 2026
समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाईन चुप्पी'






