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Wednesday, June 28, 2017

स्मार्टफोन ने कम कर दिए साइबर चोरी के रास्ते

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब लोग ब्रांडेड कंप्यूटर खरीदने  की बजाय उसे एसेम्बल करवाना ज्यादा पसंद करते थे और ज्यादातर कंप्यूटर सोफ्टवेयर पाइरेटेड होते थे |धीरे –धीरे तकनीक ने पैठ बनाई और लोग भी जागरूक हुए वहीं सोफ्टवेयर निर्माताओं ने भी जेनुइन सॉफ्टवेयर खरीदने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए अपने सोफ्टवेयर की कीमतें कम कीं | एंटी पाइरेसी तकनीक बनाने वाली कम्पनी मूसो के एक शोध के मुताबिक सारी दुनिया में पाइरेसी साईट पर जाने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले छ प्रतिशत की गिरावट आयी है |इसका एक कारण नेटफ्लिक्स जैसी वीडियो कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाईट का आना भी है जो दुनिया के चार देशों को छोड़कर हर जगह अपनी सेवाएँ दे रही हैं और दूसरा हॉट स्टार जैसे वीडियो एप की सफलता है |  
सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है |मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के पुनरुत्पाद से है जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है |इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है जिससे मुनाफा बढ़ा है |भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है |पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर टोरेंट वेबसाईट पर विश्वव्यापी रोक लगने से अब भारत में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं |ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं |सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज –रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है |ऑडियो –वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार –बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं | मुसो की ही रिपोर्ट के मुताबिक पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है जिसका कुल पाइरेसी में योगदान लगभग बत्तीस   दशमलव पांच प्रतिशत है दूसरे नम्बर पर पब्लिक टोरेंट उसके बाद वेब डाउनलोड ,प्राइवेट टोरेंट और स्ट्रीम रिपर्स शामिल हैं |भारत जैसे देश जो पाइरेसी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं वहां नेट की उपलब्धता का विस्तार पाइरेसी की समस्या को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं कर सकता पर कम जरुर करेगा क्योंकि भारत में डेस्कटॉप के मुकाबले स्मार्टफोन की संख्या लगातार बढ़ रही है |रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व में ऑनलाइन पाइरेसी शामिल चौसठ प्रतिशत लोग डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से  पाइरेसी साईट पर जाते हैं वहीं मोबाईल फोन से इन साईट्स पर जाने वाले लोगों की संख्या मात्र पैंतीस प्रतिशत है |
हिन्दुस्तान में 28/06/17 को प्रकाशित लेख 

Saturday, April 8, 2017

स्मार्टफोन और हमारा सामाजिक अर्थशास्त्र

भारत सचमुच विचित्रताओं का देश है। जहां पूरी दुनिया में स्मार्टफोन की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं भारत में फीचर फोन अब भी लोगों की पहली पसंद हैं, जो 2-जी नेटवर्क पर काम करते हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नोकिया अपने सस्ते फीचर फोन 3310 के साथ भारत में पुन: वापसी कर रही है, ताकि वह उन भारतीय ग्राहकों को लुभा सके, जो महंगे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते। सिंगापुर, ताईवान व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जहां 2-जी नेटवर्क को अलविदा कह दिया है, वहीं भारत में 2-जी नेटवर्क के सहारे साधारण फीचर फोन कम कीमत, ज्यादा बैटरी लाइफ, संगीत सुनने की सुविधा व बेसिक इंटरनेट सेवा के साथ भारत में लोगों को ऑनलाइन जोड़ रहा है।फीचर फोन से तात्पर्य उन मोबाइल फोन से है, जिनका प्रयोग वॉयस कॉलिंग और टेक्स्ट मैसेज के लिए किया जाता है। इसके अलावा इनमें बेसिक मल्टीमीडिया सुविधा होती है, जिससे ऑडियो-वीडियो सुविधाओं का आनंद उठाया जा सकता है। ये बहुत कम कीमत में उपलब्ध हैं। वहीं पर स्मार्टफोन इंटरनेट आधारित हैं, जो बात करने के अलावा इंटरनेट की दुनिया में एप सुविधाओं के साथ असीमित विकल्प देते हैं। ये फीचर फोन के मुकाबले महंगे होते हैं और इनकी परिचालन कीमत भी महंगी होती है। ये टच स्क्रीन सुविधा पर चलते हैं।
वैसे भी, शहरों में देखा गया है कि आजकल लोग दो फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं- साधारण फीचर फोन बात करने के लिए और इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए स्मार्टफोन। आंकड़ों की रोशनी में यह तथ्य ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। मोबाइल मार्केटिंग एसोशिएशन व मार्केट रिसर्च फर्म कन्टर आईएमआरबी के देश के आठ शहरों में किए गए शोध से यह निष्कर्ष निकला है कि फीचर फोन धारकों में से मात्र 15 प्रतिशत उपयोगकर्ता अपनी अगली फोन खरीद में अपने फोन को स्मार्टफोन में बदलना चाहते हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, इस वक्त 85 प्रतिशत शहरी भारतीय मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहा है, पर इनमें से 56 प्रतिशत फीचर फोन ही इस्तेमाल कर रहे हैं। फीचर फोन की बढ़ती लोकप्रियता का बड़ा कारण भारतीय परिस्थितियों में इनका एक औसत भारतीय के लिए सस्ता होना, दूसरा बिजली की कम उपलब्धता और स्मार्टफोन की बैटरी का जल्दी से खर्च होना है, जिससे उनको बार-बार चार्ज करना पड़ता है। वहीं फीचर फोन की बैटरी एक बार चार्ज करने के बाद लंबे समय तक चलती है।
फीचर फोन पुश बटन पर चलते हैं, जिसको चलाने के लिए किसी तरह की विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होती है। यहां फोन का मतलब बातें करना और मैसेज भेजना भर है। अशिक्षा की वजह से इंटरनेट की बेसिक सुविधाओं का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। लोगों के फीचर फोन पर इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग न करने की एक बड़ी वजह इंटरनेट पर अब भी क्षेत्रीय भाषाओं में उतना कंटेंट नहीं है, जितना अंग्रेजी में है, और भारत का बड़ा तबका अब भी अशिक्षित है। इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में है, जबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं में, जो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं, इंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैं, वह उल्लेखनीय जरूर है, मगर भारत की भाषाओं में जैसी विविधता है, वह इंटरनेट में नहीं दिखती। आज 40 करोड़ भारतीय अंग्रेजी भाषा की बजाय हिंदी भाषा की ज्यादा समझ रखते हैं, लिहाजा भारत में इंटरनेट को तभी गति मिल सकती है, जब इसकी अधिकतर सामग्री हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में हो।स्मार्टफोन टच सक्रीन सुविधा से युक्त होते हैं। इनको चलाने के लिए थोडे़ अभ्यास की जरूरत पड़ती है। जाहिर है, तकनीक की सुलभता ही लोगों को उसके इस्तेमाल के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि इसके पीछे प्रयोगकर्ता की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भी काफी जिम्मेदार होती है। इसलिए फीचर फोन से स्मार्र्टफोन की तरफ एक आम भारतीय तब ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, जब उसके आस-पास की परिस्थितियां बदलेंगी।
हिन्दुस्तान में 08/04/17 को प्रकाशित 

Tuesday, March 21, 2017

नेट न्युट्र्लटी के लिए खतरा बनकर आया ऐड ब्लॉकिंग

माध्यम कोई भी हो जब तक उसे विज्ञापन का साथ नहीं मिलता तब तक उसका विस्तार सम्भव नहीं है|माध्यमों की प्रगति का यह सफर टीवी अखबार से होते हुए आज इंटरनेट तक पहुँच गया है और अब हम इंटरनेट विज्ञापनों के साथ जीना सीख ही रहे हैं पर बाजार इंटरनेट के माध्यम से कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा लेना चाहता है|असल में कंटेंट की दृष्टि से  टीवी और अखबार के मुकाबले इंटरनेट अपने चरित्र में ज्यादा लचीला है  इसलिए इंटरनेट विज्ञापनों से भर उठा है अन्य माध्यमों की तरह इंटरनेट पर विज्ञापनों का नियमन करना लगभग असंभव है लेकिन भारत जहाँ इंटरनेट क्रांति का अगुआ बन कर उभर रहा है वहीं भारतीय उपभोक्ता इंटरनेट पर विज्ञापनों के इस्तेमाल में  जागरूक उपभोक्ता बन कर भी उभर रहे हैं| पेजफेयर संस्था द्वारा एक अध्ययन में  पाया गया कि, मार्च  2016  तक भारत में 122  मिलियन भारतीय स्वतंत्र रूप से मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग का इस्तेमाल कर रहे थे| भारत जैसा विकासशील देश, ऐड ब्लॉकिंग उपयोग के सन्दर्भ में, दुनिया में  दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन पहले स्थान पर है | जहाँ  दिसम्बर 2015 में 275 मिलियन लोग सारी दुनिया में मोबाइल ऐड ब्लॉकर तकनीक का इस्तेमाल  कर रहे थे, वहीँ दिसम्बर 2016 में यह आंकड़ा  बढ़कर  615 मिलियन हो गया जिनमें बासठ 62 प्रतिशत लोग अर्थात 380 मिलियन लोग यह तकनीक मोबाइल में इस्तेमाल कर रहे थे |यनि सारी दुनिया में यह बढ़त तीस प्रतिशत रही |
ऐड ब्लॉकिंग एक प्रकार का सॉफ्टवेर है जो मोबाइल, डेस्कटॉप स्मार्ट फ़ोन तथा टेबलेट आदि डिजिटल उपकरणों पर वेबपेज और वेबसाइट आदि के द्धारा  आने वाले अनचाहे विज्ञापनों, पॉपअप और स्पैम को रोकता है |
वेब सर्फिंग करते वक्त हमारे स्मार्टफोन पर अचानक कई ऐसे अनचाहे विज्ञापन आ जाते हैं जिनका हमारी खोज रुचियों से कोई लेना देना नहीं होता है |यह अनुभव मानसिक रूप से कष्टदायी और आर्थिक रूप से डाटा और धन का नाश करने वाला होता है जिसमें हमारी अनुमति के बगैर हमें अनावश्यक विज्ञापन झेला दिए जाते हैं |
ऑनलाइनलाइन विज्ञापन के इस संसार में दो तरह विज्ञापन प्रदाता होते हैं पहले जिनके प्लेटफोर्म  का इस्तेमाल करते हुए ऑनलाइन विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे फेसबुक,गूगल और यूट्यूब आदि जो खुद कोई कंटेंट नहीं बनाते और दूसरों के कंटेंट का इस्तेमाल करते हुए अपनी पाठक /दर्शक संख्या बढ़ाते हैं |दूसरे हमारी डिवाईस में किसी और उत्पाद के साथ आ जाते हैं इसमें कुछ मेल वायर और स्पाई वायर भी हो सकते हैं जो किसी डिवाईस और डाटा के लिए हानिकारक होते हैं |ऐसे विज्ञापन जो उपभोक्ता की परोक्ष स्वीकृति के बगैर आ जाते हैं ज्यादा कष्टप्रद होते हैं क्योंकि यह इंटरनेट पर हमारे काम में बाधा डालते हैं इनका स्थान और वक्त निश्चित नहीं होता और ये अस्वाभाविक लगते हैं क्योंकि इनके लिए उपभोक्ता मानसिक रूप से तैयार नहीं होता | ऐड ब्लॉकिंग ब्राउज़र से पेज स्पीड मे काफी तेज़ी आ जाती है क्योंकि अनावश्यक कंटेंट पहले ही ब्लॉक कर दिया जाता है और इसी रणनीति के तहत मोबाईल फोन बनाने वाली कम्पनियों ने एड ब्लॉकर सॉफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियों के साथ समझौता करना शुरू कर दिया है इससे वे उन्हीं कम्पनियों के विज्ञापन अपने फोन पर दिखाएंगी जिनसे उनका करार है पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है |एड ब्लॉकर के ज्यादा इस्तेमाल से ऑनलाईन विज्ञापनों से होने वाली आय पर असर पड़ेगा जिसमें वीडियो गेम बनाने वाली कम्पनियां प्रमुखता से प्रभावित हो रही हैं|दूसरा खतरा  नेट न्युट्र्लटी को है जिसमें सूचना सम्बन्धी विज्ञापन आते हैं  जो भी समाग्री इन्टरनेट पर अपलोड होगी, कोई ज़रूरी नहीं कि वह  उपभोक्ता के  सर्च करने पर देखी ही  जा सके, कारण मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग,वह  केवल उन्हीं विज्ञापन साइट्स को प्रदर्शित करेगा जिन कम्पनियों  का टाईअप मोबाइल ब्राउज़र से हो चुका है, मोबाइल ब्राउज़र द्वारा ऐड ब्लॉकिंग के चलते केवल टाईअप साइट्स ही प्रदर्शित होगी | वहीँ  बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा जो बिना किसी शुल्क के मुफ्त  में  इन्टरनेट और सोशल मीडिया के द्वारा  अपने प्रोडक्ट का प्रचार कर रहे था वो इससे महरूम रह जायेगे, और यह तकनीकी बदलाव नेट नेट न्युट्र्लटी को खत्म कर सकती है | इस मौक़े का फायद गूगल जैसी सर्च इंजन और सोशल मीडिया उठाने साइट्स के लिए तैयार है |
हिन्दुस्तान में 21/03/17 को प्रकाशित लेख 

Saturday, January 7, 2017

इंटरनेट पर कमज़ोर क्यों है आवाज की ताकत

तस्वीरों की दौड़ में हमने आवाज को लगभग भुला ही दिया है। स्मार्टफोन ने देश में इंटरनेट प्रयोग के आयाम जरूर बदले हैं और इसके साथ सोशल नेटवर्किंग ने हमारे संवाद व मेल-मिलाप का तरीका भी बदल दिया है। इसमें यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव जैसे फीचर बहुत लोकप्रिय हुए हैं। इन सबके साथ हमने इंटरनेट को वीडियो का ही माध्यम समझ लिया है और ऑडियो यानी ध्वनि को नजरंदाज कर दिया गया है। भारत में अगर आप अपने विचार अपनी आवाज के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, तो आपको इंटरनेट पर खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। व्यवसाय के रूप में जहां यू-ट्यूब के वीडियो चैनल भारत में काफी लोकप्रिय हैं, वहीं ध्वनि का माध्यम अभी जड़ें जमा नहीं पाया है, जबकि बाकी दुनिया में ऑडियो का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है।
इंटरनेट पर ऑडियो फाइल को शेयर करना पॉडकास्ट के नाम से जाना जाता है। पॉडकास्ट दो शब्दों से मिलकर बना है, प्लेयेबल ऑन डिमांड (पॉड) और ब्रॉडकास्ट से। नीमन लैब के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2016 में अमेरिका में पॉडकास्ट (इंटरनेट पर ध्वनि के माध्यम से विचार या सूचना देना) के उपयोगकर्ताओं यानी श्रोताओं की संख्या में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। वहां इस माध्यम पर विज्ञापनों द्वारा होने वाली कमाई में पिछले वर्ष लगभग 48 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और वर्ष 2020 तक इसके लगातार 25 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की उम्मीद है। इस वृद्धि दर से वर्ष 2020 तक पॉडकास्टिंग से होने वाली आमदनी पांच सौ मिलियन डॉलर के करीब पहुंच जाएगी। पॉडकास्टिंग की शुरुआत हालांकि एक छोटे माध्यम के रूप में हुई थी, पर अब यह एक संपूर्ण डिजिटल उद्योग का रूप धारण करता जा रहा है। अमेरिका की सबसे बड़ी पॉडकास्टिंग कंपनी एनपीआर की सालाना आमदनी लगभग दस मिलियन डॉलर के करीब है। भारत में पॉडकास्टिंग के जड़ें न जमा पाने के कारण हैं ध्वनि के रूप में सिर्फ फिल्मी गाने सुनने की परंपरा और श्रव्य की अन्य विधाओं से परिचित ही नहीं हो पाना। इसके अलावा भारत में ज्यादातर एफएम स्टेशन एक जैसी ही सामग्री श्रोताओं को परोसते हैं। उन्हें समाचार प्रसारण का अधिकार भी नहीं प्राप्त है, जबकि पॉडकास्टिंग को मीडिया के श्रव्य विकल्प के रूप में देखने की आवश्यकता है। भारत जैसे देशों में, जहां इंटरनेट की स्पीड काफी कम होती है, वीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकती है।
इस वक्त भारत में दो प्रमुख पॉडकास्ट सेवाएं नियमित रूप से प्रसारित की जा रही हैं, जिनमें इंडसवॉक्स और ऑडियोमैटिक काफी लोकप्रिय हैं, पर ये भारतीय भाषाओं में नहीं हैं। ऑडियोमैटिक ने अपनी शुरुआत के एक साल में एक लाख नियमित श्रोता जुटा लिए हैं। इंडसवॉक्स म्यूजिक स्ट्रीमिंग साइट सावन पर उपलब्ध है। स्मार्टफोन की उपलब्धता के अनुपात में इनके श्रोता अभी काफी कम हैं। शहरी भारत में औसत रूप से एक व्यक्ति 46 मिनट सफर करता है और यह समय लगातार बढ़ रहा है। इस समय उसके पास आमतौर पर कुछ सुन सकने का ही विकल्प होता है। संगीत (ज्यादातर फिल्मी) के अलावा अन्य सामग्री उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए वह केवल संगीत सुनने को ही मजबूर होता है।
भारत के मामले में एक बात तय मानी जाती है कि पॉडकास्टिंग यहां विज्ञापन आधारित ही होगी। कुछ भी मनपसंद सुनने के लिए पैसे खर्च करने की परंपरा यहां नहीं है। एफएम चैनल चलाने वाली कंपनियां लंबे समय से कोशिश कर रही हैं कि सरकार से उन्हें समाचार व करेंट अफेयर्स के कार्यक्रम प्रसारित करने की इजाजत मिले। लेकिन सरकार उन्हें यह इजाजत नहीं दे रही। इन कंपनियों के लिए पॉडकास्टिंग एक ज्यादा अच्छा विकल्प हो सकती है। भारत जैसे देश में ऑडियो व्यवसाय के लिए संभावनाएं कितनी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि एक समय तक पड़ोसी नेपाल में निजी क्षेत्र को एफएच चैनल चलाने की इजाजत नहीं थी। वहां उन्हें न सिर्फ इसकी इजाजत मिली, बल्कि एफएम पर समाचार के प्रसारण का अधिकार भी मिल गया। आज नेपाल में सैकड़ों एफएम चैनल हैं और ज्यादातर सफल हैं। भारत इस मंजिल को पॉडकास्टिंग के जरिये भी पा सकता है।
हिन्दुस्तान में 07/01/2016 में प्रकाशित 

Wednesday, November 23, 2016

सोशल मीडिया से ताज़ा ख़बरों की दस्तक

ऐसे समय में, जब फेसबुक समेत सोशल मीडिया के लगभग सभी माध्यम झूठी और फर्जी खबरों की समस्या से जूझ रहे हैं, कुछ ऐसा भी हो रहा है, जो बहुत उम्मीद बंधाता है। इस साल अगस्त में जब फेसबुक ने लाइव फीचर शुरू किया था, तो किसी ने नहीं सोचा था कि कैसे फेसबुक में लाइव वीडियो फीचर का यह छोटा-सा ‘आइकन’ भारत को सिटिजन जर्नलिज्म की अगली पीढ़ी में ले जाने वाला है और टीवी पत्रकारिता के तौर-तरीके पर गहरा असर डालने वाला है। इस वक्त जब पूरा देश नोट बदलने के लिए एटीएम या बैंक के बाहर लाइन में लगा है, स्थिति की गंभीरता को दिखाने के लिए महज तस्वीरों से ही नहीं, बल्कि इस लाइव वीडियो का भी सबसे सटीक इस्तेमाल हो रहा है। अखबारों, टीवी चैनलों ने भी इस अवसर का फायदा उठाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। नए नोट पाने या पुराने नोट निपटाने के लिए लाइन में लगे लोगों को दिखाने और उनकी प्रतिक्रिया को समझने के लिए फेसबुक लाइव फीचर एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी दौरान, नमक की कमी को लेकर फैली अफवाह को खत्म करने में भी लोगों ने इस फीचर का बखूबी इस्तेमाल किया, जिससे स्थिति खराब नहीं होने पाई।
फेसबुक का यह फीचर प्रयोगकर्ताओं को रियल टाइम में सीधे प्रसारण की सुविधा देता है। यह ठीक है कि पहले लोगों ने मजे के लिए लाइव होना शुरू किया, मगर धीरे-धीरे इसमें गंभीरता आनी शुरू हो गई है। इस फीचर के मानक गढ़ने और सीखने में फेसबुक के भारतीय उपयोगकर्ताओं ने ज्यादा वक्त नहीं लगाया। जो यह भी बताता है कि देश नए मीडिया के प्रयोग के तौर-तरीके बहुत जल्दी आत्मसात कर रहा है। जिसे हम डिजिटल इंडिया कहते हैं, वह भले ही एक सरकारी प्रयास और नारा है, लेकिन सच यह है कि देश की युवा पीढ़ी डिजिटल बदलावों और औजारों को लेकर काफी सहज हो चुकी है। अब नए बदलाव की राह इसी सहजता से निकलेगी।
भारत में इस समय 15 करोड़ से ज्यादा लोग फेसबुक का उपयोग कर रहे हैं। अब आगे इस संख्या को लगातर बढ़ाते रहना फेसबुक की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी ही चुनौती देश में सक्रिय सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म की भी है। शोध बताते हैं कि लोगों का समाचार पाने का तरीका सोशल मीडिया के आने के बाद बदला है और वे समाचारों के लिए टीवी की बजाय सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ओर रुख कर रहे हैं। फेसबुक के पास टेक्स्ट, तस्वीरें और वीडियो शेयर करने की व्यवस्था पहले से ही थी, पर लाइव वीडियो फीचर ने इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है। सिटिजन जर्नलिज्म की अवधारणा में जिस गति की कमी सोशल मीडिया साइट्स में महसूस की जा रही थी, उसको लाइव वीडियो ने भर दिया है। उम्मीद की जा रही है कि इसका असर हमारे समाचार टीवी चैनलों पर भी जल्द दिखेगा।
यह भी मुमकिन है कि खबरों को पाने का उनका सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया ही बन जाए। ओबी वैन से सीधा प्रसारण बहुत जल्द ही इतिहास हो जाने वाला है। असल में, यही एक ऐसा तत्व है, जो एक आम इंटरनेट प्रयोगकर्ता के पास नहीं था, इसलिए उसकी निर्भरता समाचार और सूचना पाने के लिए टीवी पर थी। अभी तक की तकनीकी व्यवस्था में सीधे प्रसारण के कारण टीवी ज्यादा विश्वसनीय था, पर अब वह दूरी भी खत्म हो गई है। इस बीच भारत में लगातार स्मार्टफोन की संख्या बढ़ती जा रही है, जो इस बात का द्योतक है कि फेसबुक का यह फीचर अभी और ज्यादा लोकप्रिय होगा और लोगों को अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए टीवी चैनल जैसे महंगे माध्यम की जरूरत नहीं होगी। उनके पास खुद का अपना माध्यम होगा।
बेशक इसके रास्ते में कई बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा इंटरनेट की गति है। 4जी तकनीक का विकास और विस्तार इसकी गति को कितना तेज कर सकता है? इससे भी बड़ी चुनौती नागरिक पत्रकारिता के नाम पर सामग्री की भरमार की है। सोशल मीडिया इस अराजकता से निकलकर सुगठित रूप में कैसे निखरेगा, यह कोई नहीं जानता। फिर इसे विश्वसनीयता कायम करने के लिए भी संघर्ष करना होगा।
हिन्दुस्तान में 23/11/16 को प्रकाशित 

Monday, October 31, 2016

अब आपकी मुट्ठी में है मनोरंजन की दुनिया



कल तक स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का अहम् हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों का सारा खजाना  मौजूद है रही सही कसर फेस्वुक लाईव फीचर ने पूरी कर दी है | ऑनलाईन मनोरजन उद्योग भारत में बगैर हलचल के तेजी से पैर पसार रहा है | मनोरंजन के लिए हमारी निर्भरता का प्राथमिक माध्यम  टेलीविजन पिछड़ रहा  है |समाचारों के मामले में हमारी निर्भरता टीवी और समाचार पत्रों पर कम हुई है और इसकी जगह विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पहले ही ले चुके हैं पर मनोरजन के क्षेत्र में टीवी की बादशाहत बरकरार रही पर इसको असली टक्कर इंटरनेट में 4 जी तकनीक और डाटा पैक के साथ मनोरंजन के विभिन्न एप से मिलनी शुरू हो गयी है |शुरुआत यूट्यूब के वीडियो से हुई |आज लगभग छ करोड़ भारतीय (60 मिलीयन ) महीने में अडतालीस घंटे यूट्यूब पर वीडियो देखने में बिताते हैं |ये इस ओर इशारा करता है कि भारतीय दर्शकों की मनोरंजन जरूरतों को टीवी अकेले पूरा करने में अक्षम है दूसरा अपनी मनोरंजन जरूरतों को पूरा करने के लिए दर्शक टेलीविजन की  बंधी बंधाई समय सारिणी  से निजात चाहता है |यानि पसंद का कंटेंट दर्शकों के पसंद के समय के हिसाब से |गूगल के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल  देश से वीडियो अपलोड होने की संख्या में नब्बे प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और वीडियो देखने के समय में अस्सी प्रतिशत का इजाफा हुआ है |तथ्य यह भी यूट्यूब पर वीडियो देखने के समय में इजाफा स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या के साथ हुआ है | मनोरंजन उद्योग से जुड़े हुए सभी बड़े समूह अपने यूट्यूब चैनल के साथ मैदान में मौजूद हैं |भारतीय वीडियो देखना बहुत पसंद कर रहे हैं आंकड़े भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं |2015 के आंकड़ों के मुताबिक यूट्यूब भारत के कुल स्मार्टफोन उपभोक्ता मे से साठ प्रतिशत यूट्यूब के एप का नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं और कुल छाछट प्रतिशत उपभोक्ता नियमित रूप से इंटरनेट पर यूट्यूब के इतर वीडियो देखते हैं साल 2014 में यह आंकड़ा उनचास प्रतिशत था |आंकड़ों का विश्लेषण करते वक्त हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तब 4जी तकनीक देश में शुरू हुई नहीं थी |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | डिजीटल विज्ञापनों पर बढ़ता खर्च भी इसी तथ्य को इंगित कर रहा है साल 2015 में जहाँ इन पर 6010 करोड़ रुपये खर्च किये गये जिसके साल 2020 तक करीब चार गुना 25,520 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है |
हिन्दुस्तान में 31/10/16 को प्रकाशित 

Friday, January 29, 2016

इंटरनेट से बदलती हिन्दुस्तान की तस्वीर

भले ही भारत की बहुसंख्यक आबादी इंटरनेट से दूर है, बावजूद भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या दस करोड़ से ऊपर हो जाना अपने आप में बड़ा बदलाव है। इतनी तो दुनिया के कई विकसित देशों की आबादी नहीं होगी। दस करोड का यह आंकड़ा भारत की डिजिटल साक्षरता का भी आंकड़ा है यानी इतने लोग कार्य, व्यापार व अन्य जरूरतों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते है। पिछले तकरीबन एक दशक से भारत को किसी और चीज ने उतना नहीं बदला, जितना इंटरनेट ने बदल दिया है। रही-सही कसर इंटरनेट आधारित फोन यानी स्मार्टफोन ने पूरी कर दी। स्मार्टफोन उपभोक्ताओं के लिहाज से भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। आईटी क्षेत्र की एक अग्रणी कंपनी सिस्को ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2019 तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 65 करोड़ हो जाएगी। सिस्को के मुताबिक वर्ष 2014 में मोबाइल डेटा ट्रैफिक 69 प्रतिशत तक बढ़ा। साथ ही वर्ष 2014 में विश्व में मोबाइल उपकरणों एवं कनेक्शनों की संख्या बढ़कर 7.4 बिलियन तक पहुंच गई। स्मार्टफोन की इस बढ़त में 88 प्रतिशत हिस्सेदारी रही और उनकी कुल संख्या बढ़कर 439 मिलियन हो गई।इंटरनेट मुख्यत: कंप्यूटर आधारित तकनीक रही है, पर स्मार्टफोन के आगमन के साथ ही यह धारणा तेजी से खत्म होने लग गई। जिस तेजी से मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वह साफ इशारा है कि भविष्य में इंटरनेट आधारित सेवाएं कंप्यूटर नहीं बल्कि मोबाइल को ध्यान में रखकर उपलब्ध कराई जाएंगी। भविष्य की इंटरनेट तकनीक एप आधारित होगी जिसके केंद्र में होगा मोबाइल इंटरनेट। विश्व के सबसे अधिक लोकप्रिय सर्च इंजन गूगल ने मोबाइल इंटरनेट की इस बढ़ती ताकत को ध्यान में रखते हुए अपने खोज परिणामों में परिवर्तन करना शुरू कर दिया है। इसका मकसद मोबाइल से आने वाले खोज अनुरोधों में उन वेबसाइटों को प्राथमिकता देने का है जो कि मोबाइल उपकरणों के लिहाज से उपयुक्त हैं।यानी ऐसी वेबसाइट जो बड़े भारीभरकम शब्दों, भारी सॉफ्टवेयर जैसे फ्लैश आदि का इस्तेमाल नहीं करती हैं, वे खोज परिणामों में पहले दिखेंगी और वे वेबसाइट जिनका आकार मोबाइल के स्क्रीन के आकार के लिहाज से अनुपयुक्त है, वे सर्च परिणामों में काफी बाद में आएंगीं। इस बदलाव से कई वेबसाइटों का वरीयता क्रम बदल जाएगा। विश्वभर के स्मार्टफोन उपभोक्ताओं में से 89प्रतिशत इंटरनेट पर कुछ भी खोजने के लिए गूगल सर्च इंजन का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में इस नए तरीके के लागू होने से मोबाइल द्वारा इंटरनेट इस्तेमाल करने में काफी सुविधा हो जाएगी। माना यह जा रहा है कि इस रणनीति से गूगल की आमदनी में बढ़ोत्तरी होने की संभावना है, क्योंकि यदि उपभोक्ताओं को मोबाइल पर वेबसाइटों को देखने में आसानी होगी तो उनकी विज्ञापन देखने की भी संभावना भी अधिक हो जाएगी।इस नए बदलाव के साथ गूगल मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से होने वाली उसकी आय में पिछले कुछ समय में जो गिरावट आई है उसे थामना चाहता है और ज्यादा से ज्यादा लोगों को मोबाइल इंटरनेट से जोड़ना चाहता है। भारत के लिए यह रास्ता महत्वपूर्ण इसलिए हो सकता है क्योंकि मोबाइल हैंडसेट अकेला ऐसा माध्यम है जिससे देश की आबादी के एक बड़े हिस्से तक पहुंचा जा सकता है। यह अकेला ऐसा माध्यम है जो शहरों और कस्बों की सीमा लांघता हुआ तेजी से दूरदराज के गांवों तक पहुंच भी गया है। इसके साथ ही देश में कंप्यूटर के मुकाबले मोबाइल पर इंटरनेट सुविधा हासिल करने वालों की संख्या भी बढ़ चुकी है। लोगों के लिए तो यह कई तरह की सुविधाएं हासिल करने का महत्वपूर्ण माध्यम है ही, साथ ही सरकार के लिए भी यह महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इससे लोग रोजमर्रा की छोटी से छोटी खोज भी गूगल के जरिये करेंगे। भारत जैसे देश में जहां मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल बेतहाशा बढ़ा है, वहां ऐसी सुविधा लोगों को मोबाइल इंटरनेट से जुड़ने के लिए और ज्यादा प्रेरित करेगी।सूचना क्रांति का शहर-केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजीटल डिवाइड को बढ़ावा दे रहा है। भारत की अमीर जनसंख्या का बड़ा तबका शहरों में रहता है जो सूचना प्रौद्योगिकी का ज्यादा इस्तेमाल करता है। उदारीकरण के पश्चात देश में एक नए मध्यम वर्ग का विकास हुआ जिसने उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को प्रेरित किया। इसका परिणाम सूचना प्रौद्योगिकी में इस वर्ग के हावी हो जाने के रूप में भी सामने आया। देश की शेष सत्तर प्रतिशत जनसंख्या न तो इस प्रक्रिया का लाभ उठा पा रही है और न ही सहभागिता कर पा रही है। पर हमें इस तथ्य  को भी नहीं भूलना चाहिए कि यहां इंटरनेट की आधारभूत संरचना विकसित देशों के मुकाबले काफी पिछड़ी है और इंटरनेट के बाजारीकरण की कोशिशें जारी हैं। ऐसे में सरकार का डिजिटल इंडिया बनाने का यह प्रयास आम उपभोक्ताओं के इंटरनेट सर्फिंग समय को कितना सुहाना बनाएगा, इसका फैसला अभी होना है। फिर कड़वी सचाई यह भी है कि तकनीक के इस डिजिटल युग में हम अब भी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत समस्याओं के उन्मूलन में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। गौरतलब है कि सूचना तकनीक का इस्तेमाल मानव संसाधन की बेहतरी के लिए बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ने में असफल रहा है। इसकी एक मिसाल भ्रष्टाचार उन्मूलन के मोर्चे पर मिलती है। माना जाता रहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाएगा और इसके जरिए भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी। पर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की नई रिपोर्ट हमारी आंखें खोल देती है जिसमें भारत को 176 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में 94 पायदान पर रखा गया है।
हिन्दुस्तान युवा में 24/01/16 को प्रकाशित 

Sunday, October 4, 2015

इंटरनेट ने बदल दी मानव सभ्यता की दुनिया

इंटरनेट शुरुवात में किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह एक ऐसा आविष्कार बनेगा जिससे मानव सभ्यता का चेहरा हमेशा के लिए बदल जाएगा | आग और पहिया के बाद इंटरनेट ही वह क्रांतिकारी कारक जिससे मानव सभ्यता के विकास को चमत्कारिक गति मिली|इंटरनेट के विस्तार के साथ ही इसका व्यवसायिक पक्ष भी विकसित होना शुरू हो गया|प्रारंभ में इसका विस्तार विकसित देशों के पक्ष में ज्यादा पर जैसे जैसे तकनीक विकास होता गया इंटरनेट ने विकासशील देशों की और रुख करना शुरू किया और नयी नयी सेवाएँ इससे जुडती चली गयीं  |
इंटरनेट एंड मोबाईल एसोसिएशन ऑफ़ इण्डिया की नयी रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्रीय भाषाओँ के प्रयोगकर्ता सैंतालीस प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं जिनकी संख्या संख्या साल 2015 के अंत तक 127 मिलीयन हो जाने  की उम्मीद है | भारत सही मायने में कन्वर्जेंस की अवधारणा को साकार होते हुए देख रहा है, जिसका असर तकनीक के हर क्षेत्र में दिख रहा है। इंटरनेट मुख्यता कंप्यूटर आधारित तकनीक रही है पर स्मार्ट फोन के आगमन के साथ ही यह धारणा तेजी से ख़त्म होने लग गयी और जिस तेजी से मोबाईल पर इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है वह साफ़ इशारा कर रहा है की भविष्य में इंटरनेट आधारित सेवाएँ कंप्यूटर नहीं बल्कि मोबाईल को ध्यान में रखकर उपलब्ध कराई जायेंगी|हिंदी को शामिल करते हुए इस समय इंटरनेट की दुनिया बंगाली ,तमिल, कन्नड़ ,मराठी ,उड़िया , गुजराती ,मलयालम ,पंजाबी, संस्कृत,  उर्दू  और तेलुगु जैसी भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा देती है आज से दस वर्ष पूर्व ऐसा सोचना भी गलत माना जा सकता था पर इस अन्वेषण के पीछे भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं के बड़े आकार का दबाव काम कर रहा था भारत जैसे देश में यह बड़ा अवसर है जहाँ मोबाईल इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या विश्व में अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा है । इंटरनेट  हमारी जिंदगी को सरल बनाता है और ऐसा करने में गूगल का बहुत बड़ा योगदान है। आज एक किसान भी सभी नवीनतम तकनीकों को अपना रहे हैं, और उन्हें सीख भी  रहे हैं, लेकिन इन तकनीकों को उनके लिए अनुकूलित बनाना जरूरी है जिसमें भाषा का व कंटेंट का बहुत अहम मुद्दा है।इसलिए भारत में हिन्दी और भारतीय भाषाओं  में इंटरनेट के विस्तार पर बल दिया जा रहा है 
गूगल के आंकड़ों के मुताबिक, अभी देश में अंग्रेजी भाषा समझने वालों की संख्या 19.8 करोड़ है, और इसमें से ज्यादातर लोग इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। तथ्य यह भी है कि भारत में इंटरनेट बाजार का विस्तार इसलिए ठहर-सा गया है, क्योंकि सामग्रियां अंग्रेजी में हैं। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में है, जबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है, और दुनिया के मात्र 21 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी की समझ रखते हैं। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं में, जो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं, इंटरनेट सामग्री क्रमशः 0.8 और 0.1 प्रतिशत ही उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति, आशाओं और अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैं, वह उल्लेखनीय जरूर है, मगर भारत की भाषाओं में जैसी विविधता है, वह इंटरनेट में नहीं दिखती।आज 400 मिलियन भारतीय अंग्रेजी भाषा की बजाय हिंदी भाषा की ज्यादा समझ रखते हैं लिहाजा भारत में इंटरनेट को तभी गति दी जा सकती है, जब इसकी अधिकतर सामग्री हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में हो।आज जानकारी का उत्तम स्रोत कहे जाने वाले प्रोजेक्ट विकीपिडिया पर तकरीबन पेज 22000 हिंदी भाषा में हैं ताकि भारतीय यूजर्स इसका उपयोग कर सकें। भारत में लोगों को इंटरनेट पर लाने का सबसे अच्छा तरीका है उनकी पसंद का कंटेंट बनाना यानि कि भारतीय भाषाओं को लाना|वैश्विक परामर्श संस्था मैकेंजी का एक नया अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में इंटरनेट 100 अरब डॉलर का योगदान देगा, जो 2011 के 30 अरब डॉलर के योगदान के तीन गुने से भी ज्यादा होगा। अध्ययन यह भी बताता है कि अगले तीन साल में भारत दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ताओं को जोड़ेगा। इसमें देश के ग्रामीण इलाकों की बड़ी भूमिका होगी। मगर इंटरनेट उपभोक्ताओं की यह रफ्तार तभी बरकरार रहेगी, जब इंटरनेट सर्च और सुगम बनेगा। यानी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को इंटरनेट पर बढ़ावा देना होगा, तभी गैर अंग्रेजी भाषी लोग इंटरनेट से ज्यादा जुड़ेंगे।गूगल पिछले 14 सालों से‘सर्च’(खोज ) पर काम कर रहा है। यह सर्च भविष्य में सबसे ज्यादा मोबाइल के माध्यम से किया जाएगा। विश्व भर में लोग अब ज्यादातर मोबाइल के माध्यम से इंटरनेट चला रहे हैं। बढते स्मार्ट फोन के प्रयोग ने सर्च को और ज्यादा स्थानीयकृत किया है वास्तव में खोज ग्लोबल से लोकल हो रही है जिसका आधार भारत में तेजी से बढते मोबाईल इंटरनेट प्रयोगकर्ता हैं जो अपनी खोज में स्थानीय चीजों को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं|
ये रुझान दर्शाते हैं कि भारत नेट युग की अगली पीढ़ी में प्रवेश करने वाला है जहाँ सर्च इंजन भारत की स्थानीयता को ध्यान में रखकर खोज प्रोग्राम विकसित करेंगे और गूगल ने स्पीच रेकग्नीशन टेक्नीक पर आधारित वायस सर्च की शुरुवात की है जो भारत में सर्च के पूरे परिद्रश्य को बदल देगी|स्पीच रेकग्नीशन टेक्नीक लोगों को इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए किसी भाषा को जानने की अनिवार्यता खत्म कर देगी वहीं बढते स्मार्ट फोन हर हाथ में इंटरनेट पहले ही पहुंचा रहे हैं|

हिन्दुस्तान युवा में 04/10/15 को प्रकाशित लेख 

Monday, September 28, 2015

डिजिटल लत से बढ़ता मनोरोग का खतरा

डिजिटल इंडिया के बढ़ते कदमों के साथ यह चर्चा भी देश भर में आम है कि स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है। कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही है, जो न खाया जा सकता है, न पिया जा सकता है, और न ही सूंघा जा सकता है। चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर के एक अध्ययन के मुताबिक, इंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलाव पैदा कर सकती है। वी आर सोशल की डिजिटल सोशल ऐंड मोबाइल 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के आंकड़े काफी कुछ कहते हैं। इसके अनुसार, एक भारतीय औसतन पांच घंटे चार मिनट कंप्यूटर या टैबलेट पर इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। इंटरनेट पर एक घंटा 58 मिनट, सोशल मीडिया पर दो घंटे 31 मिनट के अलावा इनके मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल की औसत दैनिक अवधि है दो घंटे 24 मिनट। इसी का नतीजा हैं तरह-तरह की नई मानसिक समस्याएं- जैसे फोमो, यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट, सोशल मीडिया पर अकेले हो जाने का डर। इसी तरह फैड, यानी फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डर। इसमें एक शख्स लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करता है और दोस्तों की पोस्ट का इंतजार करता रहता है। एक अन्य रोग में रोगी पांच घंटे से ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में ही नष्ट कर देता है। इस वक्त भारत में 97.8 करोड़ मोबाइल और 14 करोड़ स्मार्टफोन कनेक्शन हैं, जिनमें से 24.3 करोड़  इंटरनेट पर सक्रिय हैं और 11.8 करोड़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। 
लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है।नतीजतन, हमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है। भारत जैसे देश में समस्या यह है कि यहां तकनीक पहले आ रही है, और उनके प्रयोग के मानक बाद में गढ़े जा रहे हैं। कैस्परस्की लैब द्वारा इस वर्ष किए गए एक शोध में पाया गया है कि करीब 73 फीसदी युवा डिजिटल लत के शिकार हैं, जो किसी न किसी इंटरनेट प्लेटफॉर्म से अपने आप को जोड़े रहते हैं। वर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है। वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैं, जिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं। और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलता, तो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है। इससे निपटने का एक तरीका यह है कि चीन से सबक लेते हुए भारत में डिजिटल डीटॉक्स यानी नशामुक्ति केंद्र खोले जाएं और इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाई जाए। 


हिंदुस्तान में 28/09/15 को प्रकाशित 

Friday, September 18, 2015

सास -बहू धारावाहिकों के लिए खतरे की घंटी

टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के कारोबार की अगली कड़ी ज्यादा दिलचस्प होने वाली है। धारावाहिकों की दुनिया अभी तक सूचना तकनीक के बदलावों से अछूती है। हमारी दुनिया में जितनी तेजी से सब कुछ बदला है, उतनी तेजी से टीवी धारावाहिक नहीं बदले। सास-बहू को देखने की हमारी मजबूरी पहले जैसी ही बनी रही। शायद इसलिए कि इन धारावाहिकों के सामने किसी और विजुअल माध्यम की कोई चुनौती नहीं थी। दर्शकों को जो दिखाया जा रहा था, उसे देखने का कोई विकल्प न था। लेकिन अब इंटरनेट ने इन धारावाहिकों को चुनौती देना शुरू कर दिया है।

इंटरनेट के लिए ही धारावाहिक बनाने वाले द वाइरल फीवर  के टीवीएफ को इंटरनेट मूवी डाटाबेस (आईएमडीबी) की दुनिया के 250 धारावाहिकों में जगह दी है। आईएमडीबी दुनिया भर के टीवी शो को दर्शकों के वोट के आधार पर रेटिंग देता है। टीवीएफ को अमेरिका के प्रमुख इंटरनेट धारावाहिकों द डेली शो, सूट्स आदि के मुकाबले 43वां स्थान मिला। दुनिया भर में ऐसे धारावाहिकों के निर्माण में तेजी आई है, जो टीवी नहीं, इंटरनेट पर आते हैं। इसकी शुरुआत साल 1992 में अमेरिका के साउथ पार्क  के साथ हुई थी, यह चलन अब भारत में भी जोर पकड़ रहा है। सही मायने में इंटरनेट धारावाहिकों के लिए भारत में यह सही वक्त भी है। पिछले कुछ साल में टीवी देखने का ढर्रा काफी बदला है। दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश के दर्शकों की मांग को पूरा करने के लिए ज्यादातर पारिवारिक कहानियां हैं, जिनमें युवाओं की कोई रुचि नहीं। वैसे भी आजकल कम से कम शहरों में पूरा परिवार एक साथ बैठकर टीवी नहीं देखता। स्माार्टफोन और कंप्यूटर ने हमारी इन आदतों को बदल दिया है। नई पीढ़ी की दुनिया अब मोबाइल और लैपटॉप में है, जो अपना ज्यादा वक्त इन्हीं साधनों पर बिताते हैं। जहां कोई कभी भी अपने समय के हिसाब से इन धारावाहिकों को देख सकता है। इंटरनेट के धारावाहिक कंटेंट के स्तर पर युवाओं की आशा और अपेक्षाओं की पूर्ति करते हुए नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। पिचर्स की हर कड़ी को लगभग डेढ़ करोड़ बार देखा गया है, जिसके और बढ़ने की संभावना है।

हालांकि इसके बावजूद इंटरनेट धारावाहिकों का उस गति से विस्तार नहीं हो पा रहा है, जिस गति से होना चाहिए। इसका बड़ा कारण यह है कि इससे कमाई का कोई निश्चित मॉडल अभी नहीं उभर सका है, विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा अभी भी टेलीविजन की झोली में चला जाता है। इंटरनेट धारावाहिक के निर्माता स्पॉन्सर का जुगाड़ करके अपना शो तैयार करते हैं। फिर ये अभी बड़े शहरों तक ही सीमित हैं और इंटरनेट की धीमी गति के चलते इन्हें देखना कोई बहुत अच्छा अनुभव भी नहीं होता। लेकिन इस सब को शुरुआती बाधाएं माना जा रहा है, हकीकत यही है कि टीवी निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।
हिन्दुस्तान में 18/09/15 को प्रकाशित लेख 

Thursday, August 20, 2015

नेटवर्क की मेमोरी में गुम हो रही यादाश्त

इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो ली, अब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है। कई देशों के न्यूरो वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिक, लोगों पर इंटरनेट और डिजिटल डिवाइस से लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। मुख्य रूप से इन शोधों का केंद्र युवा पीढ़ी पर नई तकनीक के संभावित प्रभाव की ओर झुका हुआ है, क्योंकि वे ही इस तकनीक के पहले और सबसे बड़े उपभोक्ता बन रहे हैं। साल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही है, क्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैं, बाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं। इसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है।
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया है। कैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना की, जिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गया। शोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया है। शोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा है, ज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिए, जो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैं, इंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत है, बल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका है।
इसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया है। यानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते है। इस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं।
एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है। ज्यादा प्रयोग के कारण डिजिटल डिवाइस से हमारा एक मानवीय रिश्ता सा बन गया है, पर तकनीक पर अधिक निर्भरता हमें मानसिक रूप से पंगु भी बना सकती है। इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही किया जाए।
हिन्दुस्तान में 20/08/15 को प्रकाशित 

Tuesday, August 4, 2015

ऑनलाइन शादियाँ ऐतबार का संकट

इंटरनेट ने लोक व लोकाचार के तरीकों को काफी हद तक बदल दिया है। बहुत-सी परंपराएं और बहत सारे रिवाज अब अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह प्रक्रिया इतनी तेज है कि नया बहुत जल्दी पुराना हो जा रहा है। विवाह तय करने जैसी सामाजिक प्रक्रिया पहले परिवार और यहां तक कि खानदान के बड़े-बुजुर्गों, मित्रों, रिश्तेदारों वगैरह को शामिल करते हुए आगे बढ़ती थी, अब उसमें भी ‘ई’ लग गया है। अब लोग मैट्रीमोनी वेबसाइट की सहायता से जोड़ियां ही नहीं बना रहे, शादियां भी रचा रहे हैं। देश की ऑनलाइन मैट्रीमोनी का कारोबार अगले तीन साल में 1,500 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार, वैवाहिक वेबसाइटों पर साल 2013 में 8.5 लाख प्रोफाइल अपलोड की गई, जिनकी संख्या साल 2014 में बढ़कर 19.6 लाख हो गई। यानी एक साल में 130 फीसदी का इजाफा।
सामाजिक रूप से देखें, तो जहां पहले शादी के केंद्र में लड़का और लड़की का परिवार रहा करता था, अब वह धुरी खिसककर लड़के व लड़की की इच्छा पर केंद्रित होती दिखती है। यह अच्छा भी है, क्योंकि शादी जिन लोगों को करनी है, उनकी सहमति परिवार में एक तरह के प्रजातांत्रिक आधार का निर्माण करती है, न कि उस पुरातन परंपरा के आधार पर, जहां माता-पिता की इच्छा ही सब कुछ होती थी। वर या वधू तलाशने के लिए दूर-दराज की जगहों की खाक छाननी पड़ती थी, जिसमें समय व पैसे की खासा बर्बादी होती थी और मानसिक तनाव अलग होता था। यही काम अब मैट्रीमोनिअल साइट व ऑनलाइन डेटिंग साइट कर रही हैं और वह भी बगैर किसी बिचौलिये के। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे पारदर्शिता आई है। इन वेबसाइटों पर आप सुविधाजनक रूप से प्रोफाइल सेट कर सकते हैं। अपनी तस्वीर डाल सकते हैं तथा अपनी पसंद से उन प्रोफाइल को चेक करके कदम बढ़ा सकते हैं। कई वेबसाइटों में चैटिंग की सुविधा है, जिसमें ऑनलाइन चैटिंग कर लड़का या लड़की एक-दूसरे को समझ सकते हैं।
लेकिन कुछ और तथ्यों पर गौर किया जाना भी जरूरी है। इन साइटों से हुई शादियों में धोखाधड़ी के कई मामले भी सामने आए हैं। दी गई जानकारी कितनी सही है, इसे जांचने का कोई तरीका ये साइट उपलब्ध नहीं करातीं। उनकी जिम्मेदारी लड़का-लड़की को मिलाने तक सीमित रहती है। हालांकि, झूठ बोलकर शादी कर लेने में नया कुछ नहीं, पर इंटरनेट के जरिये हुई शादियों के पीछे कोई सामजिक दबाव नहीं काम करता और गड़बड़ी की स्थिति में आप किसी मध्यस्थ को दोष देने की स्थिति में भी नहीं होते। और न कोई ऐसा होता है, जो बिगड़ी बात को पटरी पर लाने में मदद करे। हमारे पास ऐसे आंकड़े भी तो नहीं, जिनसे कहा जा सके कि धोखाधड़ी की घटनाएं पारंपरिक शादियों में ज्यादा होती थीं, या ऑनलाइन व्यवस्था में ज्यादा हो रही हैं। 
हिंदुस्तान में 04/08/15 को प्रकशित 

Friday, July 24, 2015

ऑनलाइन विज्ञापनों में छिपे खतरे

                            नया मीडिया अपना कारोबार व इश्तिहार भी बढ़ा रहा है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन और आईएमआरबी इंटरनेशनल के एक संयुक्त शोध के अनुसार, मार्च 2015 में भारत में ऑनलाइन विज्ञापन का बाजार 3,575 करोड़ रुपये का हो चुका है, जो 2014 के आंकड़े से करीब 30 प्रतिशत ज्यादा है। ऑनलाइन विज्ञापन की इस बढ़त में भारत में स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या का बड़ा योगदान है। लेकिन विज्ञापनों का यह बढ़ता बाजार अपने साथ समस्याएं भी ला रहा है। भारत जैसे देश में यह समस्या ज्यादा गंभीर इसलिए हो जाती है, क्योंकि यहां इंटरनेट का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है, मगर नेट जागरूकता की खासी कमी है। भारत में इंटरनेट के ज्यादातर प्रयोगकर्ताओं के लिए यह एक नई चीज है और वे कुछ चालाक विज्ञापनदाताओं की चाल का शिकार भी बन जाते हैं।भारत में विज्ञापनों का नियमन करने वाले संगठन भारतीय विज्ञापन मानक परिषद, यानी एएससीआई ने भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत करने के लिए बाकायदा एक व्यवस्था बना रखी है। लेकिन इंटरनेट अन्य विज्ञापन माध्यमों जैसा नहीं है। इंटरनेट के विज्ञापनों पर नजर रखना कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम है, क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि भ्रामक विज्ञापन का शिकार बनने वाला भारत के किसी शहर में हो, जबकि विज्ञापनदाता सात समंुदर पार किसी दूसरे देश में। प्रिंट माध्यम के लिए तो इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी जैसी संस्था है, जो विज्ञापन एजेंसी को मान्यता देती है और किसी शिकायत पर वह  मान्यता खत्म भी कर सकती है।
                                  इंटरनेट के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
दूसरा पहलू डाटा के उपभोग से जुड़ा है। इंटरनेट पर जब भी कोई काम किया जाता है, तो कुछ डाटा खर्च होता है, जिसका शुल्क इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियां वसूलती हैं, पर किसी-किसी  वेबसाइट पर जाते ही उपभोक्ता से बगैर पूछे अचानक कोई वीडियो चलने लगता है, तो काम भी बाधित होता है और उपभोक्ता का कुछ अतिरिक्त डाटा भी खर्च होता है, जिसके पैसे तो उससे वसूल लिए जाते हैं, पर उस विज्ञापन को देखने या सुनाने के लिए उससे अनुमति नहीं ली जाती है। यू-ट्यूब के वीडियो में शुरुआती कुछ सेकंड आपको मजबूरी में देखने पड़ते हैं, जिसमें आपका अतिरिक्त डाटा खर्च होगा। निजता का मामला भी इसी से जुड़ा मुद्दा है। हम क्या करते हैं इंटरनेट पर, क्या खोजते हैं, इन सबकी जानकारी के हिसाब से हमें विज्ञापन दिखाए जाते हैं। अमेरिका की चर्चित संस्था नेटवर्क एडवर्टाइजिंग इनिशिएटिव (एनआईए) ने ऐसे मामलों के लिए भी संहिता बनाकर कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे उपभोक्ताओं को ऐसे विज्ञापनों को न देखने का विकल्प भी उपलब्ध कराएं। निजता की रक्षा के लिए भी यह जरूरी है। भारत में इंटरनेट का बाजार अभी आकार ले रहा है, इसलिए सतर्कता बरतने का यह सबसे सही समय है।
हिन्दुस्तान में 24/07/15 को प्रकाशित 

Wednesday, July 1, 2015

औरतों पर ज्यादा कहर बरपाती हैं आपदाएं

प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भ में आम धारणा यही  है कि इनमें हर किसी का बराबर नुकसान होता है यानि आपदा कम से कम लिंग के आधार पर भेद नहीं करती । पर जमीनी हकीकत कुछ और ही  है? आंकड़े तो कम से कम ऐसा नहीं मानते हैं। यह बात सामने आ चुकी है कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता  है। वर्ष  2007 में लंदन स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स और एसेक्स विश्वविद्यालया के शोधकर्ताओं द्वारा किए १४१ देशों में किए गए गए एक अध्ययन के अनुसार वर्ष १९८१ से लेकर वर्ष २००२ तक हुई प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से काफी अधिक थी। साथ ही इस शोध में यह तथ्य भी सामने आया कि जैसे-जैसे प्राकृतिक आपदा की विभीषिका बढ़ती गयी वैसे-वैसे पुरुष और महिला मृत्यु-दर के बीच का फासला भी बढ़ता गया। नेपाल में अभी हाल ही में आये भूकम्प के बाद से जो  ताज़ा आंकड़े मिले हैं उनके मुताबिक भीषण भूकंप से प्रभावित होने वाले तेरह लाख लोगों में से लगभग तिरपन प्रतिशत महिलाएं हैं। वैसे तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं है पर यह इतना नगण्य भी नहीं है कि इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाये। जैसे-जैसे स्थिति और साफ होती जाएगी इस खाई के और गहरा होने की संभावना है। एक्शन एड द्वारा विकसित विमेन रेजिलयेन्स इंडेक्स - एक मापदंड, जो किसी भी प्राकृतिक आपदा के दौरान किसी भी देश की महिलाओं की सुरक्षा और बचाव को लेकर किए गए उपायों की उपादेयता दर्शाता है - के अनुसार नेपाल को १०० में से सिर्फ ४५.२ अंक मिले हैं जबकि जापान के लिए यही आंकड़ा 80.6 है। पाकिस्तान को इस इंडेक्स ने १०० में से २७.८ अंक दिये हैं जबकि भारत को लगभग नेपाल बराबर ही रखा गया है।इस इंडेक्स के मुताबिक़ यदि कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो जापान के मुकाबले भारत ,पाकिस्तान और नेपाल में महिलाओं के प्रभावित होने  की संभावना ज्यादा है |
 आपदा के बाद के राहत और बचाव कार्यों के दौरान यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। वर्ष २००८ में हिन्द महासागर में आई सुनामी के दौरान महिलाओं की मृत्यु-दर पुरुषों की अपेक्षा चार  गुना अधिक थी। भूकंप या सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की स्थिति के अधिक ख़राब होने की कई वजहें हैं। इनमें सामाजिक एवं जैविक दोनों ही  प्रकार की वजहें शामिल हैं। उदाहरण के लिए वर्ष १९९३ में महाराष्ट्र में और वर्ष २००१ में गुजरात में भूकंपों के दौरान १०००० एवं २०००० लोग काल का ग्रास बने थे। इनमें महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत काफी अधिक थी। इसके पीछे यह तर्क यह है  कि भूकंप के वक़्त ज़्यादातर महिलाएं घरों के अंदर थीं जबकि पुरुष घरों से बाहर खुले स्थानों पर थे। तात्कालिक बचाव एवं राहत कार्यों के समाप्त हो जाने के बाद भी महिलाओं के प्रति भेदभाव खत्म नहीं होता है।वर्ष २००१ में गुजरात में आए भूकंप के दौरान विकलांग होने वाले लोगों की संख्या काफी ज्यादा थी। इनमें से ज़्यादातर महिलाएं थीं क्योंकि वे उस आपदा के वक़्त वे अपने-अपने घरों के अंदर थीं। इस प्रकार की आपदाओं के दौरान विकलांग हो जाने वाली महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है क्योंकि यदि वे विवाहित हैं और उनके पति जीवित बच जाते हैं तो वे उन्हें छोड़ सकते हैं। यदि वे अविवाहित हैं तो उनके विवाह में काफी कठिनाई आती है। जहां पर भी समाज का ढांचा पित्रासत्तात्मक अथवा पुरुष-प्रधान हैं वहाँ यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। इस प्रकार के समाजों में प्राकृतिक आपदाओं के बाद का वक़्त सबसे खतरनाक होता है क्योंकि उस वक़्त उनकी सुरक्षा का जो थोड़ा-बहुत ढांचा इस प्रकार के समाजों में होता है वह भी ध्वस्त हो चुका होता है। इस प्रकार आपदा के बाद महिलाओं का जीवन और भी दुश्वार हो जाता है। नेपाल की त्रासदी से सबक लेते हुए आने वाले समय में हमें आपदा प्रबंधन करते वक़्त महिलाओं की समस्यों एवं जरूरतों का खास खयाल रखना होगा। ऐसा करने से विश्व की आधी आबादी के प्रति हम अपने कर्तव्यों को पूर्ण कर पाएंगे। 
हिंदुस्तान में 01/07/15 को प्रकाशित 

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