Wednesday, February 9, 2022

जाड़ों का मौसम और यादों का पिटारा


 बहुत ठण्ड है. ऐसे मौसम को आप भी एन्जॉय कर रहे होंगे.सारी दुनिया में ठण्ड की चर्चा है,कोहरा,धुंध और ढेर सारी ठण्ड.यूँ तो ऐसे भी जाड़े का मौसम बहुत खास होता है खाने पीने से लेकर पहनने और घूमने का असली लुत्फ़ तो जाड़े में ही आता है. दिन छोटे और रातें बड़ी हों तो कहने ही क्या.      जाड़े का हमारे जीवन से और गहरा  रिश्ता है.जी हाँ वो रिश्ता है यादों का,यूँ तो यादों का कोई मौसम नहीं होता पर जाड़े के मौसम में जब माहौल सर्दी का हो तो यादें जी उठती हैं. साउथ हैम्पटन विश्वविद्यालय द्वारा कराई गई रिसर्च के अनुसार  दिल को गर्माहट देने वाली यादें हमें ठंड सहने की क्षमता देती हैं और हम शारीरिक रूप से गर्म महसूस करते हैं.अब समझे आप कि जाड़ा दूसरे मौसम से क्यूँ अलग है.वैसे भी आजकल की फास्ट लाईफ में किसी के पास इतनी फुर्सत कहाँ है कि थोडा थम कर सुस्ताया जाए और जिंदगी का लुत्फ़ लिया जाए .

लेकिन  जाड़े का ये मौसम हमें  रुक कर  सोचने के लिए  मजबूर कर ही देता है.वैसे भी यादों के बगैर जीवन का कोई मतलब ही नहीं होगा.इंसान एक सोशल एनीमल है जो बगैर रिश्ते बनाये रह ही नहीं सकता और जब रिश्ते बनेंगे तो यादें भी होंगी. रिश्ते नाम के लिए नहीं बनाये जाते बल्कि एहसास  के लिए बनाये जाते हैं वो एहसास ही तो है जो किसी आम से रिश्ते को ख़ास बना देता है. क्या आप किसी ऐसे शख्स को जानते हैं जिसके पास यादों का कोई खज़ाना न हो.सोचिये जरा कि जाड़े की सुबह,दोपहर और शाम से हम सबकी कितनी सुहानी यादें जुडी हैं. वो कोहरे में डूबी अलसाई सुबह हो जब बिस्तर छोड़ने का मन नहीं करता, या गुनगुनी धूप में नहाई दोपहर जिसकी याद अभी तक आपके दिल में ताज़ा है, या फिर वो सुहानी शाम जब आप पहली बार किसी से मिले थे.मौसम में भले ही ठंडक थी पर दिल किसी के साथ के एहसास से दहक रहे थे.

आपकी यादें भले ही मेरी यादों से अलग हों पर उनका एहसास सबको एक सा ही होता है. बीता वक्त तो अब लौट कर नहीं आ पायेगा पर बीती यादों को वो एहसास हमें अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करेगा.कोई कितना भी अकेला क्यूँ हो न पर उसके साथ हमेशा कुछ बीती यादें जरुर होती हैं. तो अगली बार फीलिंग लोनली का स्टेटस अपडेट करने से पहले जरा एक बार सोचियेगा क्या वाकई आप अकेले हैं? आपके साथ कितनी यादें हैं उनमें से कुछ मीठी यादों को अपने आप से ही चुरा लीजिए और आँखें बंद कर खो जाइए अपनी दुनिया में. विश्वास जानिये ये पल जिंदगी को बेहतर बनाने का हौसला देंगे और इन सब के लिए जाड़े के मौसम से भला और कुछ क्या हो सकता है. लोग घरों में बंद हों सड़कें वीरान सब तरफ सन्नाटा आप हों और आप की तन्हाई.

वैसे भी बहुत दिन हुए जब आपने किसी याद को जी भर के नहीं जीया तो इस जाड़े को जीने के लिए किसी पुरानी याद को फिर से जीया जाए क्यूंकि ये जाड़ा भी हर जाड़े की तरह चला जाएगा आपको हर बार की तरह एक नयी याद देकर. पर जाड़े की इन यादों से अपने तन मन को गरम रखियेगा क्यूंकि गर्मियां आते ही आपको जाड़े की याद आनी शुरू हो जायेगीतो इससे पहले ये सर्दियाँ आपकी यादों के एल्बम का हिस्सा बन जाएँ इनको जी लीजिए.

 प्रभात खबर में 09/02/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, February 2, 2022

जनता के साथ सरकारें भी दुविधा में ,किस राह चलें

 


इस देश में दो ही चीज आम होते हुए भी ख़ास हैं|पहला “आम चुनाव” और दूसरा “आम बजट” जिससे देश के आम आदमी का जीवन प्रभावित होता है| देश का बजट आ चुका है, विद्वान लोग बताएंगे कि बजट कितना बेहतर है पर मैंने जबसे होश सम्हाला है एक आम आदमी के नजरिये से एक चीज हमेशा हुई |चीजें सस्ती और महंगी होने के अलावा, हर बजट के बाद जिस पार्टी  की सरकार होती है  वो उसे क्रांतिकारी बताती है तो विपक्षी पार्टी उसे निराशाजनक बताते हैं|ये खेल लगातार चलता आ रहा है भले ही सरकार बदलती रही हो|भारत जैसे विविधता वाले देश में जनता के सामान्य व्यवहार का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। सरकारों के ऊपर जहाँ लोक लुभावन योजनाएं चलाने की मजबूरी रहती है वहीं दूसरी ओर  देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने का दायित्व भी। आज देश की बहुसंख्यक जनता के साथ -साथ देश को नेतृत्व देने वाली सरकारें भी दुविधा में है की वो किस राह चलें|हर बार की तरह से इस बार भी कुछ लोग बजट से प्रसन्न होंगे और कुछ  लोग निराश|

बजट वो साल भर का लेखा जोखा होता है जहाँ सरकार अपने आय और व्यय का लेखा जोखा देश के सामने रखती है |सरकार कोई व्यवसाई नहीं है |उसकी  आमदनी का स्रोत हमारे आपके जैसे करोड़ों लोग होते हैं |जो विभिन्न करों के रूप में सरकार को आमदनी कराते हैं और बदले में उम्मीद करते हैं कि सरकार हमारा ध्यान रखे, स्कूल बनाये अस्पताल खोले| सरकारे ये करती भी हैं पर सरकारी संस्थाओं के प्रति एक देश  के नागरिक जैसा भाव क्या हमारा होता है?बहुत साल पहले एक हास्य कविता सुनी थी कि रेलवे राष्ट्रीय सम्पति है और ट्रेन के डिब्बे से बल्ब चुरा के अपना हिस्सा घर ले जा रहा हूँ |नतीजा सरकार के उपर सुविधाओं पर ज्यादा खर्च करने का बोझ  और यात्रियों को ज्यादा परेशानी | कोई भी सामान खरीदते वक्त किसी तरह टैक्स न देने की जुगत लगाना  भी कुछ इसी तरह का मामला है | 

इतने बड़े देश का बजट तभी सबकी इच्छाएं पूरी कर पायेगा जब सरकार की जेब भरी होगी और वो आपके उपर से टैक्स की लगाम कम करेगी पर यह तभी होगा जब हम सरकारी संपत्तियों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति वाले भाव से देखते हुए उनका रखरखाव करें |

दैनिक जागरण में 02/02/2022 को प्रकाशित 

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