Friday, June 23, 2023

बातचीत का सिकुड़ता दायरा

 


आज के दौर में विचारों के संप्रेषण का सबसे स्वतंत्र और द्रुतगामी माध्यम है इंटरनेट पर जैसे जैसे इसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है मानव संचार में शामिल मानवीयता की जगह  तकनीक लेती जा रही है जहाँ मानव चेहरा गायब है . यह समस्याओं को सुलझाने की बजाय बिगाड़ रही है |तथ्य यह भी है कि इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ हमें तकनीक से जोड़ने वाली और इंटरनेट पर कुछ न कुछ लिखने या पोस्ट करने वाली सभी प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साईट्स हो या हमारे जीवन को आसान बनाने वाली ऑन लाइन कम्पनिया जिनमें अर्बन कम्पनी से लेकर उबर जैसी टैक्सी आधारित सेवाएँ देने वाली कम्पनी शामिल हैं |

हम अधिकांश के बारे  में न तो ज्यादा कुछ जानते हैं और न ही हम तकनीक के सहारे मौखिक रूप से हम अपनी समस्या ,पीड़ा ,खुशी अपनी आवाज में भावों के साथ इन्हें प्रेषित कर सकते हैं | जो भी कहना है आप लिख कर कहिये और उसके बाद अगर उन कम्पनियों को लगेगा तो वो अपनी सुविधा के हिसाब से आप से बात कर सकती हैं | हमारी  लगभग हर जानकारीहम क्या पसंद करते हैंक्या नापसंद करते हैंक्या ख़रीदते हैं?कहाँ घूमने जाते हैंघर की , दोस्तों की तस्वीरें , विडियो सब फेसबुक और ट्विटर जैसी साईट्स  के पास है। एक संस्थागत तंत्र के रूप में सिवाय हेल्प,सपोर्ट  और रिपोर्ट अ पोस्ट  / पेज  / अकाउंट के अतिरिक्त इनका कोई सम्पर्क नहीं । 

वो चाहे आधुनिक युग का सबसे बड़ा सामाजिक नेटवर्क हो या अन्य ओनलाईन कम्पनियां यह सब कितना असामाजिक और  अमानवीय है |ये बात हमें डराती नहीं ये बात हमारी नींद भी नहीं उड़ाती। किसी शहर या राज्य में हम  डीएमएसपी को जानते हैं या वहाँ तक पहुँच सकते हैंबैंक में मैनेजर को , किसी कम्पनी में उसके सुपरवाइज़र को , स्कूल में प्रिन्सिपल को वैसे क्या फेसबुक या उबर में हम किसी तक पहुँच के या फोन द्वारा अपनी बात पहुंचा सकते हैं ? उसको फ़ोन या ईमेल कर सकते हैंनहीं आपको कोई शिकायत करनी हो , कोई जानकारी लेनी हो तो सिवाय कुछ प्री डिसायडेड एक तरफ़ा हेल्प  /कोंटेक्ट तंत्र के अलावा कुछ भी नहीं। कोई चेहरा नहीं जो सामने आकर आपकी शिकायत सुने , आपको तसल्ली दे।लिख कर बात कह पाने की एक अपनी सीमा है और उसकी अपनी चुनौतियाँ  है | इस कारण  से जो समस्या एक मिनट की बात से सुलझ सकती थी उसी समस्या के समाधान में घण्टों लगते हैं और इसके बाद भी कोई जरुरी नहीं है की समस्या सुलझे | अक्सर देखा गया है कि  ऐसे में झुंझलाया हुआ उपभोक्ता उन मुद्दों को ले कर सोशल मीडिया पर चला जाता है और छोटी सी बात का बतंगड़ बन जाता है |इसका मतलब लिखित सम्वाद की प्रक्रिया समस्या को और ज्यादा दुरूह बना रही है |इंटरनेट की तकनीक लोगों की समस्या समाधान के व्यवसाय को तेजी से बदल रही है |एड्रायेट मार्केट रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक़  साल 2017 में भारत में कॉल सेण्टर का बाजार  28.19 बिलियन डॉलर था और इसके 2025 तक 54.25 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाने की संभावना थी | परन्तु मार्किट लीडर्स के सेवा प्रदान करने के तरीके में बदलाव आने से इस रुझान में भी बदलाव आने की सम्भावना तेजी से बढ़ रही है | 

एक समय में रुझान ऐसे थे कि  कैसे ग्राहक सेवा में वेटिंग टाइम को कम से कम किया जाए परन्तु धीरे धीरे इसमें बदलाव की शुरुआत हुई और कॉल सेंटर की बजाय लोगों से अपनी समस्याएं लिख कर देने को प्रेरित किया जाने लगा  और यहाँ से मौखिक संचार की बजाय आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सहायता से लिखित संचार की ओर कम्पनियों का झुकाव बढ़ा | सेवा प्रदाता खास कर प्रमुख टेलीकॉम कंपनी ने कॉल सेण्टर में बात करने के पैसे चार्ज करने शुरू कर दिये और इसी चलन में आगे चल कर वर्तमान में बड़ी कंपनीओं ने इस मद में खर्च में कटौती करने की शुरवात कॉल सेण्टर एग्जीक्यूटिव की संख्या घटाने से शुरू कर दी है | भारत में भारत में कॉल सेण्टर की प्रति घंटा दर छ डॉलर से दस डॉलर के बीच है  जबकि विदेशों में यही  दर बीस डॉलर से तीस डॉलर प्रति घंटा है | ऐसे में लागत कम करने का आसान तरीका ये है कि लोगों की कॉल सेण्टर पर निर्भरता कम की जाए  |

 इसके लिये कई प्रकार के अच्छे और बुरे हथकंडे अपनाये जाते हैं जैसे की की कस्टमर की ज़्यदातर समस्याओं का समाधान FAQ के माध्यम से करना या आई वी आर एस  के विकल्प की तरफ प्रेषित करना | एक तरीका इस प्रकार का  भी होता है की कॉल सेण्टर के लिंक तक पहुँचने को इतना जटिल बना देना की कस्टमर उस तक पहुँच ही न पाए |  इंटरनेट पर ऐसे बहुत से शोध उपलब्ध है जिसमे कॉल सेण्टर एग्जीक्यूटिव के तनाव और उसके कारण और परिणामो का अध्धयन किया गया है पर बहुत खोजने पर भी ऐसे शोध ज्यादा नहीं मिलते जो यह बताते हो कि  समस्या को गलत तरीके से हैंडल करने पर लोगों  के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है और उसके क्या परिणाम होते हैं | ऑनलाईन कम्पनियों के अपने तर्क है कि उपभोक्ता ऐसी समस्याओं के लिए फोन करते हाँ जिनका निदान आसानी से वेबसाईट के हेल्प पेज पर मिल सकता है |उसके अतिरिक्त भद्दी और अश्लील काल्स अनावश्यक दबाव बढाते हैं जिससे इस व्यवसाय में लगे लोगों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जेनुइन लोग परेशान होते हैं | ऐसे समय में जब लोगों के पास लोगों से बात करने के अवसर सिमटते जा रहे हैं ऐसे में बात करके समस्या का समाधान निकालने के तरीके पर इन ऑनलाईन कम्पनियों   को विशेष ध्यान देना  चाहिए क्यूंकि कहते है न बात करने से ही बात बनती है | 

प्रभात खबर में 23/06/2023 को प्रकाशित 

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