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Wednesday, October 24, 2007

अनवर भाई यानी हमारे आर्यभट

अनवर भाई यानी हमारे आर्यभट यूं तो हमारी मुलाक़ात बहुत पुरानी है लेकिन उनकी बहुमुखी प्रतिभा का मुज़हयारा तो वापस लखनऊ आकर हुआ अनवर भाई हमेशा में और मेरी तन्हाई के साथ अपने कमरे में मिलते किसी भी काम के जितने पोस्सीबल एंगल हो सकते हैं वो सारे अनवर भाई मुझे अक्सर बताते । ना जाने क्यों उनोहने विभाग से एक अनचाही दूरी बना ली थी या बन गयी थी लेकिन मुझे ये लगता था की ये काम को सिलसिलेवार करने के आदी थे और फिर काम धीरे -धीरे ठीक होना शुरू हुआ .ये तो दुनिआवी बातें हो गयी उनकी शाख्शियत का जो हिस्सा मुझे प्रभावित करता है उनका कम बोलना और अपने काम से मतलब रखना
जिन्दगी से बड़ा शिक्षक कोई नही हो सकता है ये बातें किसी विश्विद्यालय में नहीं सिखाई जा सकती हैं जिन्दगी खुद आपको सिखा जाती है अगर आप की नीयत साफ है और काम करने के लगन है तो दुनिया की कोई ताकत आपको बढ़ने से रोक नही सकती लेकिन प्रयास ईमानदारी से होना चहिये । शिखर पर चढ़ने में वक्त लगता है और रास्ता आपको बताता है कि जिन्दगी कितनी मुश्किल है लेकिन फिर भी हम जीने का हौसला नहीं छोड़ ते
हैं । अनवर भाई जिन्दगी अपनी शर्तों में जीने में यकीन करते हैं समय के पाबन्द हैं आप काम उनपर छोड़ सकते हैं । उनोहने भी मेरी तरह कंप्यूटर किसी से सीखा नही है लेकिन उनके कंप्यूटर ज्ञान के आगे बडे- बडे महारथी पानी माँग जाते हैं लेकिन इसका प्रदर्शन वो कभी नहीं करते
शायद यही बात उनेह दूसरों से अलग करती है किसी से कोई शिकवा -शिक़ायत नही बस आप काम दीजिए हाँ यदि विभाग से बाहर का काम है तो वो अपनी फ़ीस के बारे में एकदम सचेत है लेकिन पैसे का लालच बिल्कुल नहीं
दुनिया में हम तरह तरह के लोगों से मिलते हैं और उनको हम अपने नज़रिए से परखने की कोशिश करते हैं ये नज़रिया गलत भी हो सकता है ।
चलिए अब चलता हूँ फिर किसी नए किस्से से जिन्दगी को समझने का प्रयास किया जाएगा॥

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