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Sunday, September 10, 2023

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज


 लक्ष्मण ने बसाया था नवाबों ने संवारा 

 लखनऊ फ़िदा है तुझ पर ये नन्हा   सा  दिल हमारा |

गोमती के किनारे बसती है एक राहगुज़र,

 इन्ही राहों से निकलें हैं  हमारे सपने करते हैं सफ़र  ।

तुझे सोचने पर धडकता है मेरा दिल 

तहजीब और तमीज के इस शहर को भूलना बड़ा  मुश्किल |

ये मनाता है कभी ईद तो कभी दीवाली 

ये शहर नहीं होता कभी उम्मीद से खाली |

चिकनकारी की कढाई  और दशहरी की बातें, 

ये है लखनऊ की निशानियाँ  और उनकी रवायतें ।

इसके  सीने पर गुजरते हुए  तांगों की आवाज़,

 वो भीगती हुई मिट्टी की खुशबू और खुशी का आगाज़ |

ये शहर है लखनऊ, जिसकी दास्ताँ हैं अनमोल,

यहाँ की गलियों में छुपे  है अदबी  शायरी के बोल  

क़ैफियत से भरी हर जगह और  जिन्दादिली का राज  , 

लखनऊ, तुझसे ही सीखा है मैंने जीने का अंदाज ||


लखनऊ पर एक कविता 

Wednesday, May 9, 2018

जांचो और परखो का एक नया प्रयोग

ऑनलाईन रिव्यू आज किसी भी उत्पाद या सामग्री की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को जांचने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं वो चाहे होटलों का चुनाव हो या फिर ऑनलाईन शॉपिंग करते वक्त सैकड़ों विकल्पों के बीच अपने  मनपसंद उत्पाद का चुनाव वैसे भी भारत में ऑनलाईन शॉपिंग का कारोबार तेजी से फ़ैल रहा है | पर देश में ऑनलाईन खरीद का कोई इतिहास न होने से नए लोग इंटरनेट के माध्यम से चीजें खरीदने में थोडा हिचकते है  |ऐसे में लोगों के  लिए पूर्व में उस सेवा या उत्पाद का उपयोग कर चुके लोगों द्वारा लिखी गयी समीक्षाएं एवं टिप्पणियां भावी उपभोक्ताओं  के लिए मददगार साबित होती हैं| इ-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से खरीददारी करने का सबसे बड़ा फायदा लोगों को उत्पादों पर मिलने वाली छूट के अलावा अन्य उपभोक्ताओं द्वारा  खरीदे गए उन्हीं सामानों के बारे में अपनी राय भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |ये टिप्पणियां एवं समीक्षाएं नए उपभोक्ताओं को सेवा या उत्पाद की खरीद  में मदद करती हैं| समस्त ऑनलाईन सामान बेचने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को अपनी बात कहने का मौका देती हैं| उपभोक्ता भी धीरे-धीरे इस मौके का इस्तेमाल अवसर की तरह करने लगे हैं आमतौर पर ऑनलाईन ई कॉमर्स साईट पर लिखी जाने वाली समीक्षाएं लिखित रूप में ही होती रहीं हैं पर पिछले तीन सालों में इंटरनेट के परिद्रश्य में काफी बदलाव आया है |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | अमेजन जैसी ऑनलाईन शॉपिंग कम्पनी ने उपभोक्ताओं के रुख को भांपते हुए ऑनलाईन रिव्यू की दुनिया में एक नए तरह के प्रयोग की शुरुआत करने जा रहा है ऑनलाइन सम्बंधित शोध करने वाली एक संस्था एल 2 के अनुसार आने वाले समय में अमेज़न अपने उपभोक्ताओं को वीडियो के माध्यम से भी समीक्षाएं देने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है | अमेज़न ने लगभग अपने बीस  लाख व्यापार सहयोगियों को इस परीक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है|इस  योजना का पहला चरण दिसंबर के अंत तक शुरू  होने की उम्मीद है| जिसमें उपभोक्ता  टिप्पणियां एवं समीक्षाएं वीडियो के माध्यम से भी अमेज़न पर भेज सकेंगेइस फीचर को जोड़ने के पीछे अमेज़न का सीधा उद्देश्य खरीददारों को अपनी वेबसाइट पर रखना और उन्हें यू ट्यूब  जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों की ओर पलायन करने से रोकना है|इसी साल अक्टूबर में अमेज़न को "सामग्री-आधारित कीमत कटौती एवं प्रोत्साहन" के लिए एक पेटेंट भी मिला है| पेटेंट के अनुसार किसी इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में उपभोक्ताओं को ऑडियो, वीडियो या इंटरैक्टिव सामग्री को ग्रहण करने का विकल्प दिया जा सकता है ताकि उन्हें छूट या अन्य लाभ दिए जा सकें। उदाहरण  के लिए यदि कोई उपभोक्ता अमेज़न के विवरण वाले पेज पर जाकर किसी उत्पाद की समीक्षा करने वाले वीडियो को देखता है तो जैसे जैसे वह वीडियो आगे बढ़ता जायेगा उत्पाद के दाम काम होते जाएंगे|यानि  अधिक समय तक विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ता को अधिक छूट मिलेगी| अमेज़न का पेटेंट यह भी सुनिश्चित कर देगा की कि  कोई भी अन्य ऑनलाइन रिटेलर इस तरह की सुविधा अपने ग्राहकों को नहीं दे पायेगा | इस पेटेंट के साथ ही अमेज़न ने यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, जैसी कंपनियों के विज्ञापन व्यपार में भी सेंध लगाने की कोशिश की है| अब उपभोक्ताओं को अपने समय की कीमत का वास्तविक अर्थों में सही मूल्य मिलेगा और कीमत  को उपभोक्ताओं के व्यवहार से जोड़ने से कंपनी के प्रति वफादार उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि होगी |जिससे ऑनलाइन रिटेलर ज्यादा समय तक  उपभोक्ताओं को अपनी वेबसाइट पर रोक पाएंगे|चीजों को देखकर और लोगों से राय लेकर खरीदने की सहज मानवीय भारतीय प्रवृत्ति है|भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में लोग कम पढ़े लिखे हैं पर इंटरनेट डाटा की कम कीमतों के कारण मोबाईल इंटरनेट उनकी पहुँच में है |वे ऑनलाईन शॉपिंग या तो करते नहीं या करते वक्त भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि किस उत्पाद को खरीदा जाए |उनके लिए यह सुविधा  जहाँ उन्हें ऑनलाईन शॉपिंग प्लेटफोर्म से जोड़ने का एक माध्यम बन सकती है वहीं  ई शॉपिंग कारोबार को और ज्यादा प्रमाणिक एवं सुहाना बना सकती है |तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि प्रायोजित समीक्षाओं के दौर में प्रायोजित वीडियो समीक्षाओं के आने का भी खतरा है जो लोगों के भ्रम को बढ़ा सकता है |  हालाँकि अभी यह कहना कठिन है कि अमेज़न द्वारा उठाये गए इस कदम का इ-कॉमर्स के क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा पर इतना तो तय है कि इससे इस क्षेत्र में हलचल मचना तय है और यह हलचल  उपभोक्ताओं के लिए  कम दामों की सौगात लेकर आएगी|
निवाड़ टाईम्स में 09/05/2018 को प्रकाशित लेख 

Monday, March 26, 2018

मोबाईल स्क्रीन अब एक हकीकत है

लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है | यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही हैएक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैंवे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालंकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |

बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | टेलीफोन कम्पनी टेलीनॉर द्वारा समर्थित वेब वाईस द्वारा  किये गए एक शोध में यह तथ्य निकल कर आया कि एक शहरी भारतीय बच्चा औसत रूप में कम से कम चार घंटे इंटरनेट पर बिता रहा है जिसमें सबसे ज्यादा संख्या मोबाईल इंटरनेट की है|2017 के अंत तक दस करोड़ चौंतीस लाख (134 मिलीयन )भारतीय बच्चे इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे| कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियोनेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है | ब्लू व्हेल गेम को खेलने के दौरान हुई बच्चों की मौतों ने मोबाईल इंटरनेट का बच्चों द्वारा कैसा और कितना इस्तेमाल होना चाहिए इस बहस को चर्चा में ला दिया है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |व्हाट अबाउट द चिल्ड्रेन (वॉच) संस्था का मानना  है कि बच्चों को कुर्सियों पर बैठाना और स्ट्रैप लगा देना या फिर स्मार्टफोन और टैबलेट देना खेलने के लिएये सब बच्चों के लिए घातक साबित हो रहे हैं|

Monday, January 22, 2018

लखनऊ के दिल में एलयू धड़कता है

हम सब के दिल में एक लखनऊ धडकता है पर लखनऊ के दिल में लखनऊ विश्वविद्यालय धड़कता है क्योंकि इस पूरे शहर में एक ही ऐसी जगह है जिसके साथ पूरे लखनऊ का नाम जुड़ा है |जल्दी ही हमारा यह प्यारा विश्वविद्यालय सौ साल का हो जाएगा ,भारत में कम ही ऐसे विश्वविद्यालय हैं जिनके पास सौ साल से ज्यादा की शैक्षिक विरासत है और उनके नाम के साथ एक पूरे शहर की विरासत जुड़ी हुई हो  लखनऊ विश्वविद्यालय उनमें से एक है |इसके बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है वैसे अधिकारिक तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई की शुरुआत जुलाई 17 ,1921 से शुरू हुई पर उससे काफी पहले ही लखनऊ में उच्च शिक्षा की अलख कैनिंग कॉलेज के रूप में जगाई जा चुकी थी |जिसकी स्थापना में अवध के तालुकेदारों का विशेष योगदान रहा जिन्होंने लार्ड कैनिंग की स्मृति में 27 फ़रवरी 1864  को लखनऊ में कैनिंग कालेज के  नाम से एक विद्यालय स्थापित करने के लिए पंजीकरण कराया। 1 मई 1864 को कैनिंग कालेज का औपचारिक उद्घाटन अमीनुद्दौला पैलेस में हुआ। शुरुआत  में 1867 तक कैनिंग कालेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध किया गया। उसके बाद1888 में इसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्धता दे दी गयी । सन 1905 में प्रदेश सरकार ने गोमती की उत्तर दिशा में लगभग नब्बे  एकड़ का भूखण्ड कैनिंग कालेज को स्थानांतरित किया गया जिसे बादशाहबाग के नाम से जाना जाता है। वास्तव से यह अवध के नवाब नसीरूद्दीन हैदर का निवास स्थान था ।उन्हीं दिनों महमूदाबाद के नवाब मोहम्मद अली मोहम्मद खान ,खान बहादुर ने उन दिनों के प्रसिद्द अखबार पायनियर में “लखनऊ विश्वविद्यालय” की स्थापना को लेकर एक लेख लिखा जिसने उन दिनों संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर का ध्यान अपनी ओर खींचा और दस नवम्बर 1919  को इस विषय पर एक सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता हरकोर्ट बटलर ने की जिसमें लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना का खाका खींचा गया | धीरे –धीरे लखनऊ विश्वविद्यालय ने आकार लेना शुरू किया शुरुआती दौर में तीन महाविद्यालय इसके अधीन लाये गए जिनमें किंग जोर्ज मेडिकल कॉलेज (अब किंग जोर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी ),कैनिंग कॉलेज (अब लखनऊ विश्वविद्यालय मुख्य  परिसर ) और आई टी कॉलेज जोड़े गए | माननीय श्री ज्ञानेन्द्र नाथ चक्रवर्ती लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपतिमेजर टी० एफ० ओ० डॉनेल प्रथम कुल सचिव और श्री ई० ए० एच० ब्लंट प्रथम कोषाध्यक्ष नियुक्त हुए। विश्वविद्यालय कोर्ट की पहली बैठक 21 मार्च 1921 को हुई। अगस्त से सितम्बर 1921 के मध्य कार्य परिषद (एक्जीक्यूटिव काऊंसिल) तथा अकादमिक परिषद(एकेडेमिक काउन्सिल ) का गठन किया गया। सन 1922 में पहला दीक्षान्त समारोह आयोजित किया गया। सन 1991 से लखनऊ विश्वविद्यालय का द्वितीय परिसर सीतापुर रोड पर प्रारम्भ हुआजहाँ अभी  में विधि,इंजीनियरिंग  तथा प्रबंधन की कक्षाएँ चलती  हैं।
इतिहास का सबक जाने बगैर भविष्य की सुनहरी बुनियाद नहीं रखी जा सकती ,मेरे जैसे लाखों विद्यार्थियों के भविष्य की  तस्वीर संवार चुका यह विश्वविद्यालय पिछले कुछ वर्षों से आर्थिक तंगी जूझने के बावजूद  से आज भी अपने काम में तल्लीनता से लगा है |आज भी जब गुजरे वक्त में यहाँ से पढ़ा कोई विद्यार्थी झांकता है तो अपनी जिन्दगी के बीते हसीं पलों का बड़ा हिस्सा लखनऊ विश्वविद्यालय के गलियारों से ही निकलता है |वो चाहे मिल्क्बार कैंटीन में दोस्तों के साथ लगे कहकहे हों या फिर जब जीवन में पहली बार मंच पर चढ़ने का मौका मिला हो |बहुत कुछ याद आता है वो पीजी ब्लॉक के कमरे हों या टैगोर पुस्तकालय के सामने का लॉन जब किताबों से ऊबे तो सामने प्रकृति की गोद में जा बैठे |वो नहर जो साल के बारह महीने न बहती हो पर उसके किनारे बैठे  कर न जाने कितने लोगों की तकदीर अपनी मंजिल तक पहुँच गयी | मालवीय हाल जहाँ याद दिलाता है कि हम किस महान परम्परा के वाहक है वहीं एपी सेन हाल कई सारी कलातमक अभिरुचियों का गवाह हमारी यादों में है | वे सम्मानित शिक्षक जिनका नाम आज भी तालीम की दुनिया में बड़े अदब से लिया जाता है |प्रो॰ टी. एन. मजूमदारप्रो॰ डी. पी. मुखर्जी,प्रो॰ कैमरॉनप्रो॰ बीरबल साहनीप्रो॰ राधाकमल मुखर्जीप्रो॰ राधाकुमुद मुखजीप्रो॰ सिद्धान्तआचार्य नरेन्द्र देवजैसे शिक्षकों पर हमें हमेशा गर्व रहेगा कि कभी वे इस विश्वविद्यालय का हिस्सा रहे थे |
टैगोर पुस्तकालय भारत ही नहीं दुनिया के समर्द्ध पुस्तकालयों में से एक है जिसका वास्तु  अमेरिकन वास्तुकार वाल्टर बरले ग्रिफिन ने डिजाइन किया था | बरले ग्रिफिन ने ऑस्टेलिया का केनबरा शहर भी डिज़ाइन किया था और उनकी योजना इस पुस्तकालय के साथ एक क्लोक टावर बनाने  की भी थी पर इससे पहले ही उनका निधन हो गया |टैगोर में कई हस्तलिखित भोजपत्र पांडुलिपियाँ भी संरक्षित हैं | ओंकारा’, ‘मैंमेरी पत्नी और वो’ एवं फिल्म कहाँ कहाँ से गुजर गया’ की शूटिंग लखनऊ विश्वविद्यालय के परिसर में हो चुकी है |
भारत के उत्कृष्ट पुरस्कारों में से 2 पद्म विभूषणपद्मभूषणएवं 18 पद्मश्री पुरुस्कारों के साथ-साथ बी० सी० राय और शान्तिस्वरूप भट्नागर पुरुस्कार भी यहाँ के छात्रों ने प्राप्त किये हैं।  ऐसे ही कुछ चेहरे हैं जिनका ज़िक्र किया जाना जरुरी है सबसे पहले तो नीति आयोग के अध्यक्ष डॉ राजीव कुमार उनके बाद सूची बहुत लम्बी हो सकती थी इसलिए बस कुछ चुनिन्दा लोग ही इनमें शामिल किये जा रहे हैं :
राजनीति : भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा, पूर्व राज्यपाल - श्री सुरजीत सिंह बरनाला (तमिलनाडु), श्री सैयद सिब्ते रजी (झारखंड) , आरिफ मोहम्मद खानराजनीतिज्ञ, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज़फर अली नकवी, के. सी. पन्तभूतपूर्व केंद्रीय मंत्री एवं उपाध्यक्ष योजना विभाग, श्री हरीश रावत ,पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड,  के अतिरिक्त वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में ये कुछ चेहरे लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त हैं : प्रो दिनेश शर्मा ,उपमुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश सरकार , श्री ब्रजेश पाठक ,विधि मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार ,श्रीमती स्वाति सिंह ,मंत्री स्वतंत्र प्रभार उत्तरप्रदेश सरकार ,श्री आशुतोष टंडन ,मंत्री उत्तरप्रदेश सरकार,श्री सुरेश खन्ना ,मंत्री उत्तरप्रदेश सरकार,श्री महेंद्र सिंह ,मंत्री उत्तरप्रदेश सरकार
पत्रकारिता एवं साहित्य  : सय्यद सज्जाद ज़हीरराजनीतिज्ञकविलेखक श्री (स्व ) विनोद मेहता ,श्री नवीन जोशी ,श्री अम्बरीश कुमार ,श्री हरजिंदर साहनी ,श्री अमिताभ श्रीवास्तव ,श्री अकू श्रीवास्तव ,श्री आशुतोष शुक्ल ,श्री सुधीर मिश्र ,श्री राहुल कँवल , श्री प्रतीक त्रिवेदी, श्री आलोक जोशी ,
क्रिकेट :सुरेश रैना ,आर पी सिंह ,
संगीत :मालिनी अवस्थी ,अनूप जलोटा ,धर्मेन्द्र जय नारायण
लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के आजीवन  मानद सदस्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ,लालबहादुर शास्त्री ,खान अब्दुल गफ्फार खान ,मोरारजी देसाई एवं इंदिरा गांधी जैसे नेता शामिल हैं और इनके दिए हुए सहमतिपत्र आज विश्वविद्यालय की धरोहर का हिस्सा हैं |
आज आठ संकायों के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में करीब सैंतीस हजार विधार्थियों को शिक्षित तो कर रहा है पर उसे इन्तजार है अपने गौरवशाली अतीत के लौटने का ,क्या उसके पूर्व विद्यार्थी सुन रहे हैं |
नवभारत टाईम्स लखनऊ में 22/01/2018 को प्रकाशित 

Thursday, January 11, 2018

अब वीडियो ऑनलाईन रिव्यू बदलेगा ई शॉपिंग कारोबार को

ऑनलाईन रिव्यू आज किसी भी उत्पाद या सामग्री की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को जांचने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं वो चाहे होटलों का चुनाव हो या फिर ऑनलाईन शॉपिंग करते वक्त सैकड़ों विकल्पों के बीच अपने  मनपसंद उत्पाद का चुनाव वैसे भी भारत में ऑनलाईन शॉपिंग का कारोबार तेजी से फ़ैल रहा है पर देश में ऑनलाईन खरीद का कोई इतिहास न होने से नए लोग इंटरनेट के माध्यम से चीजें खरीदने में थोडा हिचकते है  |ऐसे में लोगों के  लिए पूर्व में उस सेवा या उत्पाद का उपयोग कर चुके लोगों द्वारा लिखी गयी समीक्षाएं एवं टिप्पणियां भावी उपभोक्ताओं  के लिए मददगार साबित होती हैंइ-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से खरीददारी करने का सबसे बड़ा फायदा लोगों को उत्पादों पर मिलने वाली छूट के अलावा अन्य उपभोक्ताओं द्वारा  खरीदे गए उन्हीं सामानों के बारे में अपनी राय भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |ये टिप्पणियां एवं समीक्षाएं नए उपभोक्ताओं को सेवा या उत्पाद की खरीद  में मदद करती हैं








समस्त ऑनलाईन सामान बेचने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को अपनी बात कहने का मौका देती हैंउपभोक्ता भी धीरे-धीरे इस मौके का इस्तेमाल अवसर की तरह करने लगे हैं आमतौर पर ऑनलाईन ई कॉमर्स साईट पर लिखी जाने वाली समीक्षाएं लिखित रूप में ही होती रहीं हैं पर पिछले तीन सालों में इंटरनेट के परिद्रश्य में काफी बदलाव आया है |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | |गूगल के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल  देश से वीडियो अपलोड होने की संख्या में नब्बे प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और वीडियो देखने के समय में अस्सी प्रतिशत का इजाफा हुआ है |तथ्य यह भी यूट्यूब पर वीडियो देखने के समय में इजाफा स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या के साथ हुआ है | वीडियो कंटेंट को पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि देश में इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार बार कंटेंट को बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |अमेजन जैसी ऑनलाईन शॉपिंग कम्पनी ने उपभोक्ताओं के रुख को भांपते हुए ऑनलाईन रिव्यू की दुनिया में एक नए तरह के प्रयोग की शुरुआत करने जा रहा है ऑनलाइन सम्बंधित शोध करने वाली एक संस्था एल 2 के अनुसार आने वाले समय में अमेज़न अपने उपभोक्ताओं को वीडियो के माध्यम से भी समीक्षाएं देने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है |अमेज़न ने लगभग अपने बीस  लाख व्यापार सहयोगियों को इस परीक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है|इस  योजना का पहला चरण दिसंबर के अंत तक शुरू  होने की उम्मीद है| जिसमें उपभोक्ता  टिप्पणियां एवं समीक्षाएं वीडियो के माध्यम से भी अमेज़न पर भेज सकेंगेइस फीचर को जोड़ने के पीछे अमेज़न का सीधा उद्देश्य खरीददारों को अपनी वेबसाइट पर रखना और उन्हें यू ट्यूब  जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों की ओर पलायन करने से रोकना है|इसी साल अक्टूबर में अमेज़न को "सामग्री-आधारित कीमत कटौती एवं प्रोत्साहन" के लिए एक पेटेंट भी मिला है| पेटेंट के अनुसार किसी इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में उपभोक्ताओं को ऑडियोवीडियो या इंटरैक्टिव सामग्री को ग्रहण करने का विकल्प दिया जा सकता है ताकि उन्हें छूट या अन्य लाभ दिए जा सकें। उदाहरण  के लिए यदि कोई उपभोक्ता अमेज़न के विवरण वाले पेज पर जाकर किसी उत्पाद की समीक्षा करने वाले वीडियो को देखता है तो जैसे जैसे वह वीडियो आगे बढ़ता जायेगा उत्पाद के दाम काम होते जाएंगे|यानि  अधिक समय तक विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ता को अधिक छूट मिलेगीअमेज़न का पेटेंट यह भी सुनिश्चित कर देगा की कि  कोई भी अन्य ऑनलाइन रिटेलर इस तरह की सुविधा अपने ग्राहकों को नहीं दे पायेगा | इस पेटेंट के साथ ही अमेज़न ने यूट्यूबफेसबुकइंस्टाग्रामजैसी कंपनियों के विज्ञापन व्यपार में भी सेंध लगाने की कोशिश की हैअब उपभोक्ताओं को अपने समय की कीमत का वास्तविक अर्थों में सही मूल्य मिलेगा और कीमत  को उपभोक्ताओं के व्यवहार से जोड़ने से कंपनी के प्रति वफादार उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि होगी |जिससे  ऑनलाइन रिटेलर ज्यादा समय तक  उपभोक्ताओं को अपनी वेबसाइट पर रोक पाएंगे|चीजों को देखकर और लोगों से राय लेकर खरीदने की सहज मानवीय भारतीय प्रवृत्ति है|भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में लोग कम पढ़े लिखे हैं पर इंटरनेट डाटा की कम कीमतों के कारण मोबाईल इंटरनेट उनकी पहुँच में है |वे ऑनलाईन शॉपिंग या तो करते नहीं या करते वक्त उत्पाद को लेकर  भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि किस उत्पाद को खरीदा जाए क्योंकि वो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और जो पढ़े लिखे लोग अपने रिव्यू लिखते हैं वो ज्यादातर भारतीय भाषाओँ में न होकर अंग्रेज़ी में होते हैं ऐसे में वीडियो रिव्यू की यह सुविधा उनके उत्पाद के चुनाव को लेकर  हुई भ्रम की दुविधा को खतम कर देगी  |और दूसरी ओर उनके लिए यह सुविधा  जहाँ उन्हें ऑनलाईन शॉपिंग प्लेटफोर्म से जोड़ने का एक माध्यम बन सकती है वहीं  ई शॉपिंग कारोबार को और ज्यादा प्रमाणिक एवं सुहाना बना सकती है |तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि प्रायोजित समीक्षाओं के दौर में प्रायोजित वीडियो समीक्षाओं के आने का भी खतरा है जो लोगों के संशय  को बढ़ा सकता है |  हालाँकि अभी यह कहना कठिन है कि अमेज़न द्वारा उठाये गए इस कदम का इ-कॉमर्स के क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा पर इतना तो तय है कि इससे जहाँ ओर इंटरनेट पर वीडियो की बादशाहत और बढ़ेगी और  उपभोक्ताओं के लिए  कम दामों में बेहतर सामानों की सौगात भी मिलेगी |


कैसे मोबाईल स्क्रीन हावी हो रही है हमारे जीवन में

लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है | यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही हैएक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैंवे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालंकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |
बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | टेलीफोन कम्पनी टेलीनॉर द्वारा समर्थित वेब वाईस द्वारा  किये गए एक शोध में यह तथ्य निकल कर आया कि एक शहरी भारतीय बच्चा औसत रूप में कम से कम चार घंटे इंटरनेट पर बिता रहा है जिसमें सबसे ज्यादा संख्या मोबाईल इंटरनेट की है|2017 के अंत तक दस करोड़ चौंतीस लाख (134 मिलीयन )भारतीय बच्चे इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे| कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियोनेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है | ब्लू व्हेल गेम को खेलने के दौरान हुई बच्चों की मौतों ने मोबाईल इंटरनेट का बच्चों द्वारा कैसा और कितना इस्तेमाल होना चाहिए इस बहस को चर्चा में ला दिया है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |मोबाईल स्क्रीन अब हमारे जीवन की सच्चाई है तो इससे काटकर हम अपने बच्चों को बड़ा नहीं कर पायेंगे तो इसके संतुलित इस्तेमाल का तरीका उन्हें सीखाया जाए उनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों के खेल से लेकर पढने के अभ्यास तक का उचित सम्मिश्रण होना चाहिए |अब वक्त आ चुका है जब हमें तकनीक और उस पर उपलब्ध कंटेंट को अलग –अलग देखना सीखना होगा क्योंकि तकनीक कोई गलत या खराब नहीं होती उसके इस्तेमाल का तरीका सही या खराब होता है |जाहिर है जब माता पिता का अपने बच्चों के साथ विश्वास का सम्बन्ध कायम  नहीं होगा तब तक वे  अपने बच्चों को मोबाईल के इस्तेमाल का सही तरीका नहीं सिखा पायेंगे|इस दिशा में इंटरनेट प्रदान करने वाली कम्पनियों को भी पहल करनी चाहिए जैसे कि सोते वक्त वाई-फाई राउटर अपने आप बंद हो जाए या उनमें चिल्ड्रेन मोड का एक विकल्प दिया जाए | इस तरह की व्यवस्था हो किबच्चों द्वारा ज्यादा इस्तेमाल किये जा रहे एप रात में  न चले जैसे छोटे कदम बच्चों के मोबाईल इंटरनेट को व्यवस्थित कर सकते हैं |   
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Tuesday, December 5, 2017

बदलती पहाडी आबो हवा

डूबा हुआ राजमहल 
पिछले  दिनों टिहरी की यात्रा पर था मकसद उस डूबे शहर को देखना  जिसके ऊपर अब भारत का सबसे बड़ा  बाँध बना दिया गया है जहाँ कभी टिहरी शहर था वहां अब बयालीस किलोमीटर के दायरे में फ़ैली झील है जहाँ तरह –तरह के वाटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी उपलब्ध है |गर्मियों में जब बाँध का पानी थोडा कम हो जाता है तो दौ साल तक आबाद रहे टिहरी शहर के कुछ हिस्से दिखते हैं |कुछ सूखे हुए पुराने पेड़ और टिहरी के राजमहल के खंडहर|एक पूरा भरा पूरा शहर डूबा दिया गया जो कालखंड के विभिन्न हिस्सों में बसा और फला फूला और उसके लगभग पन्द्रह किलोमीटर आगे फिर पहाड़ काटे गए एक नया शहर बसाने के लिए जिसे अब नयी टिहरी के नाम से जाना जाता है और जानते हैं ये सब क्यों किया गया विकास के नाम पर ,बिजली के लिए हमें बांधों की जरुरत है |वैसे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून जो टिहरी से लगभग एक सौ बीस  किलोमीटर दूर है वहां अभी भी बिजली जाती है जबकी टिहरी बाँध को चालू हुए दस साल हो गए हैं |आखिर कितने विकास की हमें जरुरत है और इस विकास की होड़ कहाँ जाकर रुकेगी |
जलते पहाड़ 
बिजली की रौशनी में दमकता नया  टिहरी

मुझे बताया गया कि टिहरी में बनने वाली बिजली का बड़ा  हिस्सा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को जाता है जहाँ ऐसी बहुमंजिला इमारतें हैं जहाँ दिन में रौशनी के लिए भी बिजली की जरुरत पड़ती है |असल में यही विकास है पहले जंगल काटो फिर वहां एक इमारत बनाओ जहाँ दिन में रौशनी के लिए बिजली चाहिए |कमरे हवादार मत बनाओ और उसको आरामदेह बनाने के लिए एसी लगाओ और इस सारी प्रक्रिया को हमने विकास का नाम दिया है |खैर टिहरी के आधे डूबे हुए राजमहल को देखते हुए मेरे मन में यही सब सवाल उठ रहे थे क्योंकि जल जंगल जमीन की बात करने वाले विकास विरोधी समझे जाते हैं |मैं टिहरी उत्तर भारत की चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए आया था पर मेरे गेस्ट हाउस में एसी लगा हुआ मैं रात में प्राक्रतिक हवा की चाह में भ्रमण पर निकल पड़ा रात के स्याह अँधेरे में दूर पहाड़ों पर आग की लपटें दिख रही थीं |जंगलों में आग लगी है साहब जी मेरी तन्द्रा को तोडती हुई आवाज गेस्ट  हाउस के चौकीदार की थी | कैसे ? अब गर्मी ज्यादा पड़ने लग गयी है बारिश देर से होती है इसलिए सूखे पेड़ हवा की रगड़ से खुद जल पड़ते हैं वैसे कभी –कभी पुरानी घास को हटाने के लिए लोग खुद भी आग लगा देते हैं और हवा से आग बेकाबू हो जाती है तो पहाड़ जल उठते हैं |मेरी एक तरफ जंगलों में लगी आग थी जिससे पहाड़ चमक रहे थे और दूसरी तरफ टिहरी बाँध की बिजली  से जगमगाता नया टिहरी शहर विकास की आग में दमक रहा था मैं अपने कमरे में थोड़ी ठण्ड की चाह में लौट रहा था जहाँ एसी लगा था | 
प्रभात खबर में 05/12/2017 को प्रकाशित 

Monday, November 6, 2017

विचार मंथन से आशंका और उम्मीदों का जन्म

विमर्श के कई आयाम होते हैं और हर विमर्श नए विचार  का स्वागत बाँहें फैला करे यह जरुरी तो नहीं है ,पर यह यह संवादी की खूबसूरती ही है कि अभिव्यक्ति के इस आयोजन में  मौका तो था विधाओं के छूटते सिरे पर विमर्श का पर इस विमर्श से जो नए विचार निकले उनमें जहाँ ज्ञान की गंगोत्री थी तो कुछ आशंकाएं भी कुछ चिंता थी तो आने वाला वक्त आज से बेहतर होगा ऐसी एक उम्मीद भी |इस रिपोर्ट को लिखते वक्त मेरे बगल एक युवा बैठा था जो लगातार मंच पर बैठे वक्ताओं के बारे में पूछ ताछ कर रहा था |मुझे ख़ासा गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसके सवालों के बीच मैं मंच पर हो रहे वार्तालाप के सिरे को खो दे रहा था |शायद उसका साहित्य से कोई लेना देना न हो पर मैंने उसे डानटा नहीं वो डेढ़ घंटे के इस सत्र में पूरी तल्लीनता से मंच पर मुद्दे को समझने की कोशिश करता रहा |आज भले ही उसे कुछ ख़ास समझ न आया हो पर उसकी जिज्ञासा ने मुझे यह उम्मीद जरुर दी कि संवादी जैसे कार्यक्रम आज के युवाओं में साहित्य के संस्कार के बीज जरुर बो जायेंगे |अगली बार शायद जब मैं उससे मिलूं तो वह सब कुछ न सही थोडा बहुत साहित्य के बारे में जरुर जान गया होगा |बहरहाल विधाओं के छूटते सिरे के बहाने साहित्य की उन विधाओं के बारे में चर्चा हो रही थी जो आजकल लुप्त सी होती जा रही हैं कारण कुछ भी हो सकता है तकनीक का बढ़ता प्रयोग ,उदारीकरण या इंसान का इस मशीनी दुनिया में लगातार अकेले होते जाना |इस चर्चा में भाग ले रहे थे अपनी अपनी साहित्यिक विधाओं के माहिर डॉ विनय कुमार ,डॉ सच्चिदानन्द जोशी, डॉ अजय सोडानी और मनीषा कुलश्रेष्ठ जबकि इस महत्वपूर्ण विषय के संचालन का शानदार दायित्व निभाया लीलाधर मंडलोई  ने |
बात शरू हुई हिन्दी  साहित्य  की विभिन्न विधाओं में आजकल क्या चल रहा है और बात का सिरा पकड़ा डॉ विनय कुमार ने दिनकर को याद करते हुए कि भावनाओं की मरोड़ से छंद पैदा होते हैं और इसी मरोड़ से साहित्य की अन्य विधाएं भी पैदा होती हैं स्रष्टि की शुरुआत में भावनाएं थी विचार नहीं इसलिए कविताएँ फिर समय बढ़ा विचार आये जिससे कहानियां निकलीं फिर उपन्यास और अन्य  विद्याएं |मशीनों ने जीवन की रफ़्तार बढ़ाई तो हमारी इच्छाएं भी तेजी से बढीं पर जब किसी भी चीज की रफ़्तार बढ़ती है तो परिदृश्य छूटने लगते हैं और ऐसा ही साहित्य की छूटती विधाओं के साथ हुआ ,पत्र लेखन की जगह अब ई मेल और व्हाट्स एप ने ले लिया है पर पत्र लिखने के अंत में जो हस्ताक्षर का कमिटमेंट हुआ करता था |अब वह गायब है |डॉ सचिदानंद ने कहा तकनीक केन्द्रित जीवन ने हमारे जीवन की गोलाइयों को खत्म कर दिया है |प्रकृति का संगीत सुनने की बजाय हम तकनीक का संगीत सुन रहे हैं |साहित्य का फ़ॉर्मेट बदल गया है |अखबारों की इस प्रव्रत्ति पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा भाव शब्द नाप के व्यक्त नहीं किये जा सकते |
डॉ अजय सोडानी ने कहा समाज का साहित्य पर असर पड़ता है पर साहित्य का समाज पर नहीं बल्कि व्यक्ति पर प्रभाव होता है |इस वक्त का समाज दो मनोविकार से ग्रस्त है पहला विकास का कि जो कुछ पुराना या उपलब्ध है उसे हटाकर नया बनाना है हम मानव सृजित प्रकृति में रहना चाहते हैं दूसरा समयाभाव हम हर चीज की जल्दीबाजी में और अगर ऐसा होगा तो कहानियां तीन सौ शब्दों में लिखी जायेंगी और कविताओं में से लय गायब हो जायेगी |
मनीषा कुलश्रेष्ठ ने माना उनके देखते देखते रेखाचित्र ,ललित निबंध ,पत्र लेखन धूमिल पड़ते गए और ब्लॉग पोर्टल की नई दुनिया ने जन्म ले लिया |विधाएं पग डंडियाँ हैं जो समय के साथ कुछ फॉर लेन  हो गयीं कुछ पर खर पतवार जम गयीं पर विधा एक ऐसी दादी है जो चाहती है कि सब अपने अपने घर बसा लें पर त्योहारों पर घर जरुर लौटें अगर ऐसा होता रहेगा तो विद्याएं आगे बढ़ती रहेंगी |
दैनिक जागरण में 06/11/2017 को प्रकाशित 

Saturday, November 4, 2017

महिलाओं के आने से राजनीति गंदा शब्द नहीं रह गया है

मौका था संवादी का और उत्सव अभिव्यक्ति का और मुद्दा आधी आबादी का “राजनीति ,महिला और सेक्स यह मुद्दे के प्रति सम्वेदनशीलता थी या जागरूकता पर महिलाओं से सम्बन्धित इस मुद्दे को सुनने वाले लोगों में पुरुष ज्यादा थे और माहौल में इतना सन्नाटा कि मानो कोई फिल्म चल रही हो |मंच पर थी प्रियंका चतुर्वेदी,प्रवक्ता कांग्रेस पार्टी  और पंखुरी पाठक,समाजवादी पार्टी  और संचालन का जिम्मा सम्हाल रखा था पत्रकार राखी बक्शी ने |बात शुरू हुई विषय के शीर्षक को लेकर कि राजनीति ,महिला और सेक्स क्यों हम पुरुषों के लेकर इस तरह की चर्चा क्यों नहीं करते? प्रियंका चतुर्वेदी का मानना था की अगर हम वाकई में समाज में बदलाव लाना चाहते हैं तो हमें राजनीति में आना ही पड़ेगा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि नीतियां राजनीतिज्ञ ही बनाते हैं और जब उन्होंने राजनीति में आने की सोची तो उन्हें बिलकुल अंदाजा नहीं था कि वे किस क्षेत्र में जा रही हैं |जिसमें चारित्रिक हत्या से लेकर ट्रोलिंग जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा |शुरुवात में वह डिप्रेशन में चली जाती थीं पर उन्हें लगा कि वे चुप नहीं बैठेंगी |बात राजनीति की हो या कोई और क्षेत्र भारत में महिलाओं को दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है और राजनीति में समस्या तब गंभीर हो जाती है जब आप किसी राजनैतिक परिवार से न आते हों |वैसे भी समाज में लोग लड़कियों के स्वतंत्र विचार और गुस्से को लोग स्वीकार नहीं करते और फिर वे आपके चरित्र के बारे में बातें करनी शुरू कर देते हैं |
पंखुरी पाठक का अनुभव भी कुछ ज्यादा अलग नहीं था वे अपनी पार्टी के मुखिया को यह श्रेय देती हैं कि अखिलेश यादव के समर्थन के बिना आज वहां नहीं होतीं जहाँ वह हैं |उनके पिता से शुरुआत में जब पूछा जाता कि उनकी बेटी क्या करती है तो उनके पास बताने के लिए कुछ नहीं होता था पर फिर भी उनके पिता ने उनका हौसला बनाये रखा |राजनीति में जितनी ज्यादा लड़कियां आयेंगी यह क्षेत्र अपने आप महिलाओं के लिए बेहतर होता जाएगा |किसी भी देश की राजनीति उसके समाज का आईना होती है और भारत भी इसमें अपवाद नहीं है पर महिलाओं को अपने हिस्से के हक के लिए लड़ना ही होगा और वो लड़ रही हैं इस पुरुषवादी समाज को एक बराबरी का समाज बनाने के लिए |यह देश की सारी महिलाओं की लड़ाई है |उन्हें भी सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है पर अब वे उसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लेतीं |
महिलायें में कम क्यों आती हैं इसका बड़ा सधा हुआ जवाब प्रियंका चतुर्वेदी का था समाज की समस्याएं अपनी जगह हैं पर राजनीति में न तो को जॉब सिक्योरटी है और न ही कोई निश्चित वेतन इनके अभाव में लड़कियां सुरक्षित विकल्प का रास्ता चुन लेती हैं इसलिए राजनीति के मुकाबले उन क्षेत्रों में जहाँ ये दोनों सुविधाएं मिलती हैं वहां लड़कियां बढ़ रही हैं |
पंखुरी का मानना था महिलाओं को हर कदम पर समाज को  इम्तिहान देना  पड़ता है और राजनीति अपवाद नहीं है खुबसूरत है तो क्यों खुबसूरत है और बदसूरत है तो उसकी अपनी अलग समस्याएं हैं मतलब आप बच नहीं सकतीं |
पर उम्मीद की किरण दोनों को दिखती है प्रियंका कहती हैं राजनीति में महिलाओं के आने से जहाँ अब राजनीति गन्दा शब्द नहीं रह गया है अब लोगों की राय बदल रही है |पंखुरी की राय भी कुछ ऐसी ही थी अब यदि सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया जाता है तो अब पुरुष भी उनके समर्थन में आगे आते हैं जो बता रहा है धीरे ही सही पर बदलाव की बयार बहनी शुरू हो गयी है |
दैनिक जागरण में 04/11/17 को प्रकाशित 

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