Thursday, March 19, 2026

कंटेंट क्रियेशन से रोजगार के अवसर

 


हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार यूट्यूब भारत में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा रोजगार देने वाला प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है, जिसने टीसीएस, विप्रो, इनफोसिस और रिलायंस जैसी बड़ी पारंपरिक कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया है; ऑक्सफोर्ड इकॉनॉमिक्स की रिपोर्ट बताती है कि यूट्यूब से जुड़ी क्रिएटिव इकॉनमी ने पिछले साल भारतीय जीडीपी में 16000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया और 9.3 लाख से ज्यादा पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर रोजगार पैदा किया, हालांकि यह रोजगार सीधे सैलरी वाली नौकरियों के रूप में नहीं बल्कि “पूर्णकालिक समतुल्य” स्वरोजगार के रूप में है, जिसमें लाखों स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स, वीडियो एडिटर, कैमरा ऑपरेटर, सोशल मीडिया मैनेजर और डिजिटल गिग वर्कर्स शामिल हैं, क्योंकि यूट्यूब खुद किसी को नौकरी पर नहीं रखता बल्कि एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है। वहीं यूट्यूब की अपनी रिपोर्ट के अनुसार 63 प्रतिशत क्रिएटर्स के लिए यह उनकी आय का मुख्य स्रोत है, जबकि इस पूरे इकोसिस्टम से स्वास्थ्य सेवाएँ, मार्केटिंग एजेंसियाँ, पीआर फर्में और तकनीकी उपकरण बनाने-बेचने वाली कंपनियाँ भी सीधे या परोक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं।

हालांकि इस व्यवस्था में नौकरी की अस्थिरता बहुत अधिक है। यहाँ नियमित वेतन, कर्मचारी सुविधाएँ या सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं होती। लोगों की आय एल्गोरिदम, विज्ञापन नीति या प्लेटफॉर्म के फैसलों से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए यूट्यूब की कोई भी नई नीति या एल्गोरिदम बदलाव एक वीडियो क्रिएटर की आय को अचानक से कम भी कर सकते हैं। 2023 में आई लिंकट्री और कंवर्टकिट की ग्लोबल क्रियेटर इकॉनमी पर आई एक रिपोर्ट में सामने आया कि वैश्विक स्तर पर 85 प्रतिशत से अधिक क्रियेटर स्थिर पूर्णकालिक आय नहीं कमा पाते हैं और ज्यादातर की आय, प्रायोजक, विज्ञापन और यूट्यूब मॉडल पर निर्भर होती है। इसी वजह से कई पूर्णकालिक कंटेंट क्रिएटर्स पहले दो साल के भीतर बर्नआउट महसूस करने लगते हैं। हर दिन नए वीडियो बनाना, दर्शकों के कमेंट्स का दबाव और लगातार कुछ करते रहने की रणनीति से बर्नआउट की स्थिति हो जाती है। वहीं नौकरियों के दावे को देखें तो यूट्यूब का पारंपरिक भारतीय कंपनियों से आगे निकलना सीधे-सीधे सही नहीं है। टीसीएस, रिलायंस, इंफोसिस जैसी कंपनियाँ कर्मचारी को एक वेतन पर रखती है, वहीं ऑक्सफोर्ड इकॉनॉमिक्स मॉडल यूट्यूब पर काम कर रहे लोगों को एफटीई के तौर पर देखता है, जिसका अर्थ है कि एक तरफ कंपनियाँ स्थायी कर्मचारियों को काम में लेती हैं वहीं दूसरी ओर यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर्स, फ्रीलांसर और सप्लाई-चेन के विविध श्रमिकों को मिलाकर एक आंकड़ा पेश करता है। वहीं यह बात भी गौर करने वाली है कि यू्ट्यूब के माध्यम से युवा अपनी प्रतिभा, कौशल के जरिये दर्शकों तक पहुँचकर आमदनी कमा पा रहे हैं। जिससे पारंपरिक नौकरियों पर निर्भरता भी कम हुई है। कई ग्रामीण व छोटे शहरों के लोग खेती, शिक्षा, शिल्प आदि विषयों पर वीडियो बनाकर पैसे कमा रहे हैं।

बीते कुछ समय में भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुँच बड़े पैमाने पर बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि यूट्यूब सबसे उपयोगी प्लेटफॉर्म के रूप में सामने आया है। दूरदारज के गाँवों और छोटे शहरों के लोग अपनी भाषा में कंटेंट बना और देख रहे हैं। जिससे स्थानीय क्रिएटर्स को भी अवसर मिले हैं। साल 2024 में यूट्यूब इंडिया और स्मिथगिगर की एक रिपोर्ट में सामने आया कि 83 प्रतिशत जेन जी युवा स्वयं को कंटेंट क्रिएटर कहते हैं और 75 प्रतिशत का मानना है कि कंटेंट बनाना उनका वास्तविक करियर है। वहीं भारत की एक क्रिएटिव ऊर्जा ने अर्थव्यवस्था को भी खासा बल दिया है। यूट्यूब के सफल होने से कई अन्य उद्यम जैसे डिजिटल एजेंसियाँ, एड प्रोडक्शन स्टूडियो, मार्केटिंग सर्विसेज भी उभरे हैं जिससे कई नई इकोसिस्टम कंपनियों को रोजगार मिला है। वहीं यूट्यूब के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी परिवर्तन आया है, शैक्षणिक चैनलों की बहार आने से छात्र और ग्रामीण वर्ग इन चैनलों से सीख कर नए कौशल को आत्मसात कर रहा है। इसके साथ ही कई क्रिएटर्स शिक्षा सामग्री तैयार करके नए शिक्षक भी बन गए हैं। इन बदलावों का सबसे गहरा असर भारत के युवाओं पर देखा जा रहा है। आज की जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी पारंपरिक नौकरियों और पेशों से हटकर रचनात्मक, स्वतंत्र और डिजिटल-केंद्रित करियर की ओर बढ़ रही है। जहाँ पहले इंजीनियर, डॉक्टर या सरकारी नौकरी को ही “सफलता” का पैमाना माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में युवा यूट्यूब को एक संभावित करियर प्लेटफॉर्म के रूप में देख रहे हैं।

वहीं डाटा यह भी बताता है कि यूट्यूब की आय सरंचना बेहद असमान है, ग्लोबल क्रिएटर इकॉनमी की एक रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर 85 प्रतिशत से अधिक क्रिएटर्स पूर्णकालिक आय अर्जित नहीं कर पाते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि केवल 3 से 5 प्रतिशत क्रिएटर्स ही ऐसे हैं जिनकी आय नियमित, अधिक और लंबे समय तक एक जैसी होती है। वहीं अधिकांश क्रिएटर्स की आय अनियमित और कई बार बेहद कम या शून्य तक भी पहुँच जाती है। 2023 में साहतमने आई इंफ्लुएंसर मार्केटिंग की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर करीब 70 प्रतिशत क्रिएटर्स ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 100 अमेरिकी डॉलर यानि 8-9 हजार रुपये से भी कम रहती है।

यूट्यूब भारत में रोजगार के स्वरूप को बदलने वाला प्लेटफॉर्म जरूर बन चुका है, लेकिन इसे पारंपरिक अर्थों में “सबसे बड़ा नियोक्ता” कहना एक आंशिक और सतही निष्कर्ष होगा। यूट्यूब ने जहाँ एक ओर युवाओं, ग्रामीण आबादी और छोटे शहरों के लोगों को अपनी प्रतिभा, भाषा और कौशल के जरिए आमदनी के नए रास्ते दिए हैं, वहीं दूसरी ओर यह मॉडल अस्थिरता, अनिश्चित आय और सामाजिक सुरक्षा के अभाव से भी भरा हुआ है। यहाँ कुछ लोग बहुत सफल होते हैं, जबकि ज़्यादातर लोगों की कमाई कभी होती है, कभी नहीं। न तय सैलरी है, न नौकरी की गारंटी और न ही भविष्य की सुरक्षा। इसलिए यूट्यूब को एकमात्र करियर मानना जोखिम भरा हो सकता है। बेहतर यही है कि युवा इसे अपने हुनर दिखाने और अतिरिक्त आमदनी का साधन मानें, साथ ही पढ़ाई, दूसरे कौशल और वैकल्पिक करियर विकल्पों पर भी ध्यान दें। यूट्यूब एक मौका है, लेकिन जीवन की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ उसी पर टिका देना समझदारी नहीं होगी।

दैनिक जागरण में 19/03/2026 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, March 17, 2026

सीमित दृष्टि से बाहर निकली आज की डबिंग

 एक समय था जब डबिंग का मतलब केवल संवादों के शब्दशः अनुवाद से था। विदेशी फिल्मों या धारावाहिकों के संवाद हिंदी में बदले जाते थेपर उनमें भावसंदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अक्सर खो जाते थे। भाषा तो बदल जाती थीलेकिन पात्रों की आत्मासामाजिक संकेत और स्थानीय संवेदनाएँ अनुवाद की प्रक्रिया में फीकी पड़ जाती थीं। आज की डबिंग इस सीमित दृष्टि से बाहर निकल चुकी है। अब यह केवल भाषा परिवर्तन नहींबल्कि स्थानीयकरण और रचनात्मक पुनर्लेखन यानी ट्रांसक्रिएशन का माध्यम बन चुकी है। इस प्रक्रिया में केवल शब्द बदलना नहीं होताबल्कि भाव-रूप में री-क्रिएशन किया जाता है। उदहारण के तौर परयदि किसी अमेरिकन टीवी शो में कोई स्थानीय अंग्रेज़ी मुहावरा या चुटकुला है जिसे सीधे हिंदी में समझाया नहीं जा सकतातो उसे भारतीय संदर्भ में समतुल्य हंसी-मज़ाक या कहावत से बदला जाता हैताकि संस्कृति का रंग बना रहे। इसी प्रयास से आज के हिंदी डायलॉग में हिन्दी के लोक-गीतकहावतेंआलंकारिक भाषा और क्षेत्रीय हास्य तत्व शामिल किए जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक डबिंग अब केवल अनुवाद नहींबल्कि एक रचनात्मक स्थानिक अनुकूलन बन चुकी है।ऐसा नहीं है कि ओटीटी पर डबिंग केवल विदेशी कंटेंट को भारत में लोकप्रिय बना रही हैबल्कि यह भारतीय कंटेंट को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। सेक्रेड गेम्स ने ओटीटी पर भारतीय कंटेंट की वैश्विक यात्रा की शुरुआत कीजहाँ अंग्रेज़ीस्पैनिश और कोरियन जैसी भाषाओं में डब होकर इसने भारत की राजनीतिअपराध और सत्ता के जटिल यथार्थ को दुनिया के सामने रखा और उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभव के रूप में स्वीकृति मिली। इसके बाद दिल्ली क्राइम को मिला इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड इस बात का प्रमाण बना कि भारतीय सामाजिक यथार्थ वैश्विक दर्शकों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं आरआरआर ने विभिन्न भाषाओं में डब होकर ओटीटी के ज़रिए यह साबित कर दिया कि भाषा नहींबल्कि भावनात्मक भव्यता और कथा की ऊर्जा भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर पहुँचाने की असली ताकत है।

इस व्यापक बदलाव के केंद्र में सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म ही नहींबल्कि डबिंग का वह उभरता हुआ उद्योग भी हैजिसने वैश्विक कंटेंट को स्थानीय अनुभव में बदल दिया है। एक समय फिल्मों का डब होना एक लंबीमहंगी और जुझारू प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी फ़िल्म या सीरीज़ के रिलीज़ होने के महीनों बाद उसका डब वर्ज़न दर्शकों तक पहुँचता था। कई बार तो डबिंग की जगह उस कहानी को स्थानीय बाज़ार के हिसाब से पूरी तरह रूपांतरित कर किसी दूसरी भाषा में नई फ़िल्म के तौर पर रिलीज़ कर दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता था कि मूल फ़िल्म के कलाकारोंनिर्देशक और पूरी रचनात्मक टीम को न तो पूरा श्रेय मिल पाता था और न ही उनकी मूल पहचान दर्शकों तक पहुँचती थी। लेकिन ओटीटी और तेज़ डबिंग तकनीकों के आने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब फ़िल्में और वेब सीरीज़ एक साथ कई भाषाओं में डब होकर रिलीज़ होती हैंजिससे उनकी लोकप्रियता सीमाओं में नहीं बंधती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांतारा हैजिसने कन्नड़ में रिलीज़ होने के साथ ही हिंदी और अन्य भाषाओं में डब होकर देशभर में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

भारतीय युवा केवल अब केवल अपनी बोली-संस्कृति के इर्द गिर्द बने वीडियो कंटेंट तक सीमित नहीं है। वह देश-दुनिया की अन्य संस्कृतियोंभाषाओं में बने कंटेंट को भी बड़े चाव से देख रहे हैं।

ओटीटी और डबिंग की इस क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि अब भाषासीमा और संस्कृति किसी कहानी को देखने या समझने में बाधक नहीं हैं। दर्शक अब वैश्विक कहानियों को अपने घर की सहजता में अनुभव कर सकते हैं और कलाकार अपनी कला की उपस्थिति दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। यह सिर्फ तकनीकी परिवर्तन नहींबल्कि अनुभव और सांस्कृतिक आदानप्रदान का भी युग हैजहाँ एक ओर युवा कोरियनस्पैनिश और हॉलीवुड कंटेंट का आनंद ले रहे हैंवहीं भारतीय कहानियाँ भी बहुभाषी डबिंग के माध्यम से दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही हैं।

 प्रभात खबर में 17/03/2026  को प्रकाशित लेख 

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