Friday, November 8, 2013

ताकि बनी रहे रिश्तों में गर्माहट

अच्छा आपकी कभी कोई चीज खोयी है.हाँ खोयी तो होगी ही और उसके खोने का गम भी हुआ होगा.अच्छा कभी आपने सोचा कि हम किस चीज से ज्यादा डरते हैं सोचिये सोचिये जी हाँ कुछ खोने से चाहे वो लोग हों रिश्ते हों या चीजें पर ये एक ऐसा दर्द है जिसे जिंदगी के किसी न किसी मोड पर सबको भोगना ही पड़ता है.देखिये जिंदगी हैं इतना कुछ डेली सिखाती है पर हम ध्यान नहीं देते.खोना बुरा है पर अगर हम कुछ खोयेंगे नहीं तो पाने के सुख का एहसास नहीं कर पायेंगे और जो चीजें हमारे आस पास हैं उनकी कीमत नहीं समझ पायेंगे.अब जिंदगी का सबसे बड़ा सच तो मौत है. अरे हम थोड़ी न कह रहे हैं फिल्म मुकद्दर का सिकंदर ये गाना तो आप सबको याद ही होगा “जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी मौत महबूबा है मेरी साथ लेकर जायेगी”.फिर भी हम हैं कि मानते नहीं एक दम दिल है कि मानता नहीं टाईप भाई आप सबको खोने के दुःख का एहसास है पर जो चीजें हमारे पास हैं क्या हम उनकी कद्र करते हैं चीजों से मेरा मतलब सिर्फ मेटीरियल्सटिक नहीं है. वो आपने सुना तो  होगा न टेकेन फॉर ग्रांटेड वो हम अपने करीबी रिश्तों पर कितना मजबूती से एप्लाई कर देते हैं.अरे वो तो मेरा दोस्त है और न जाने क्या क्या पर जरा सोचिये जब ये रिश्ते न होंगे वो इंसान न होगा तब आप कैसा महसूस करेंगे.यानि जो तेरा है वो तेरा है और जो मेरा है वो मेरा है फिर रिश्ता चलेगा क्या? यानि रिश्ते भी लेन देन पर ही चलते हैं.भले ही वो लेन देन मेटीरियल्सटिक न हो पर आप किसी रिश्ते में तभी रहते हैं जब आपको कुछ अच्छा लगता है और फिर क्या उस एहसास को जीने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं तो ये टू वे प्रोसेस हुआ न. अब आप अगर ये मान कर चलें कि ये तो उसका फ़र्ज़ है क्यूंकि वो तो आपका फलां है तो आपको क्या लगता है कि रिश्ता चलेगा बिलकुल नहीं वो ढोया जाएगा .हम तो भैया जिंदगी से ही सीखते हैं ठण्ड या तो मौसम में अच्छी लगती है या दिमाग में बाकी सब जगह तो गर्मी का ही बोलबाला है तो रिश्ते गर्मी के एहसास  से ही चलते हैंजिससे अपनेपन की इनर्जी मिलती है तो  उनको टेकेन फॉर ग्रांटेड नहीं लिया जा सकता है और अगर आप ऐसा  किसी रिश्ते के साथ  कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप जल्दी ही फिर कुछ खोने वाले हैं जिसका दर्द आपको जीवन भर परेशान करेगा  मेटीरियल्सटिक चीजें खोती हैं तो उनका सबस्टीयूट मार्केट में मिल जाएगा पर अगर आपने कोई रिश्ता खोया तो उसका सबस्टीयूट किसी दूकान बाजार में नहीं मिलेगा. हम थोड़ी न कह रहे हैं अरे ये गाना भी तो यही कह रहा है कि “जिंदगी के सफर में बिछड जाते हैं जो मुकाम वो फिर नहीं आते” साईंस ने बहुत तरक्की कर ली है पर खोये हुए रिश्ते और बिछड़े लोग दुबारा जीवन में उसी रूप में नहीं आते आप फिर मेरी बात नहीं मानेंगे तो हम कहाँ कह रहे हैं रहीम दास जी ने लिखा था “रहिमन धागा प्रेम का मत तोडो चटकाय,टूटे से फिर न जुड़े,जुड़े गाँठ पड़ जाए”मौसम में ठंडी का मजा लीजिए पर रिश्तों की गर्मी को बचा कर रखिये पर ये कहना जितना आसान करना उतना ही मुश्किल रिश्तों की गर्मी पर अक्सर ईगो की ठंडक हावी हो जाती है और हम नफा नुकसान देखने लग जाते है अब किसी रिश्ते में ऐसा हो रहा है तो उनको खो ही जाने दीजिए पर जिनकी आपको कद्र है बगैर शर्तों को उनको रोक लीजिए मना लीजिए क्यूंकि क्या पता कल हो न हो क्या पता कल वो लोग ही खो जाएँ जिनसे आप कह सकें तुस्सी न जाओ तो मौसम में ठण्ड का पूरा लुत्फ़ उठाइये पर मुझे भरोसा दिलाइये कि आप अपने रिश्तों में अपने पन के एहसास को गर्म रखेंगे जिससे जाड़े की वो सुहानी शाम आपको याद रहेगी.
आई नेक्स्ट में 08/11/13 को प्रकाशित 

Monday, October 28, 2013

अपने ही घर में नज़रअंदाजी झेल रहे बुजुर्ग

जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया का दूसरा बड़ा देश होने के नाते भारत की आबादी पिछले 50 सालों में हर 10 साल में 20 फीसदी की दर से बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 1 अरब 20 करोड़ से भी अधिक रहीजो दुनिया की कुल जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत है। इस आबादी में आधे लोगों की उम्र 25 से कम है पर इस जवान भारत में   बूढ़े लोगों के लिए भारत कोई सुरक्षित जगह नहीं है,टूटते पारिवारिक मूल्यएकल परिवारों में वृद्धि  और उपभोक्तावाद की आंधी में घर के बूढ़े कहीं पीछे छूटते चले जा रहे हैं|'द ग्लोबल एज वॉच इंडेक्सने दुनिया के 91 देशों में बुज़ुर्गों के जीवन की गुणवत्ता का अध्ययन के अनुसार बुज़ुर्गों के लिए स्वीडन दुनिया में सबसे अच्छा देश है और अफगानिस्तान सबसे बुरा,इस इंडेक्स में चोटी के20 देशों में ज़्यादातर पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमरीका के हैंसूची में  भारत 73वें पायदान पर है| वृद्धावस्था में सुरक्षित आय और स्वास्थ्य जरूरी है|उम्र का बढ़ना एक अवश्यंभावी प्रक्रिया है| इस प्रक्रिया में व्यक्ति का शारीरिकमानसिक एवं सामाजिक बदलाव होता है| पर भारत जैसे देश  में जहाँ मूल्य और संस्कार के लिए जाना जाता है वहां ऐसे आंकड़े चौंकाते नहीं हैरान करते हैं कि इस देश में बुढ़ापा काटना क्यूँ मुश्किल होता जा रहा है |बचपने में एक कहावत सुनी थी बच्चे और बूढ़े एक जैसे होते हैं इस अवस्था में सबसे ज्यादा समस्या अकेलेपन के एहसास की ,भारतीय समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा |डब्लूएचओ के अनुमानित आंकड़े के अनुसार भारत में वृद्ध लोगों की आबादी 160 मिलियन (16 करोड़) से बढ़कर सन् 2050में 300 मिलियन (30 करोड़) 19 फीसद से भी ज्यादा आंकी गई है. बुढ़ापे पर डब्लूएचओ की गम्भीरता की वजह कुछ चैंकाने वाले आंकड़े भी हैं. जैसे 60 वर्र्ष की उम्र या इससे ऊपर की उम्र के लोगों में वृद्धि की रफ्तार 1980 के मुकाबले दो गुनी से भी ज्यादा है| 80 वर्ष से ज्यादा के उम्र वाले वृद्ध सन 2050 तक तीन गुना बढ़कर 395 मिलियन हो जाएंगे| अगले वर्षों में ही 65 वर्ष से ज्यादा के लोगों की तादाद वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तादाद से ज्यादा होगी. सन् 2050 तक देश में 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की तुलना में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी. और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि अमीर देशों के लोगों की अपेक्षा निम्न अथवा मध्य आय वाले देशों में सबसे ज्यादा वृद्ध होंगें. पुराने ज़माने के संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार लेते जा रहे हैं जिससे भरा पूरा रहने वाला घर सन्नाटे को ही आवाज़ देता है बच्चे बड़े होकर अपनी दुनिया बसा कर दूर निकल गये और घर में रह गए अकेले माता –पिता चूँकि माता पिता जैसे वृद्ध भी अपनी जड़ो से क्त कर गाँव से शहर आये थे इसलिए उनका भी कोई अनौपचारिक सामजिक दायरा उस जगह नहीं बन पाता जहाँ वो रह रहे हैं तो शहरों में यह चक्र अनवरत चलता रहता है गाँव से नगर, नगर से महानगर वैसे इस चक्र के पीछे सिर्फ एक ही कारण होता है बेहतर अवसरों की तलाश ये बात हो गयी शहरों की पर ग्रामीण वृद्धों का जीवन शहरी वृद्धों के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में और ज्यादा मुश्किल है वहीं अकेलापन तो रहता ही है |बेटे बेटियां बेहतर जीवन की आस में शहर चले गए और वहीं के होकर रह गयें गाँव में माता –पिता से रस्मी तौर पर तीज त्यौहार पर मुलाक़ात होती हैं कुछ ज्यादा ही उनकी फ़िक्र हुई थी उम्र के इस पड़ाव पर एक ही इलाज है उन वृद्धों को उनकी जड़ों से काट कर अपने साथ ले चलना |ये इलाज मर्ज़ को कम नहीं करता बल्कि और बढ़ा देता है |जड़ से कटे वृद्ध जब शहर पहुँचते हैं तो वहां वो दुबारा अपनी जड़ें जमा ही नहीं पाते औपचारिक सामजिकता के नाम पर बस अपने हमउम्र के लोगों से दुआ सलाम ऐसे में उनका अकेलापन और बढ़ जाता है |इंटरनेट की आदी यह पीढी दुनिया जहाँ की खबर सोशल नेटवर्किंग साईट्स लेती है पर घर में बूढ़े माँ बाप को सिर्फ अपने साथ रखकर वो खुश हो लेते हैं कि वह उनका पूरा ख्याल रख रहे हैं पर उम्र के इस मुकाम पर उन्हें बच्चों के साथ की जरुरत होती है पर बच्चे अपनी सामाजिकता में व्यस्त रहते हैं उन्हें लगता है कि उनकी भौतिक जरूरतों को पूरा कर वो उनका ख्याल रख रहे हैं पर हकीकत में वृद्ध जन यादों और अकेलेपन के भंवर में खो रहे होते हैं | महत्वपूर्ण ये है कि बुढ़ापे में विस्थापन एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता है मनुष्य यूँ ही एक सामाजिक प्राणी नहीं है पर सामाजिकता बनाने और निभाने की एक उम्र होती है|विकास की इस दौड़ में अगर हमारी जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा यूँ ही बिसरा दिया जा रहा है तो ये यह प्रवृति एक बिखरे हुए समाज का निर्माण करेगी |

गाँव कनेक्शन साप्ताहिक 27/10/13 के अंक में प्रकाशित 

Friday, October 25, 2013

बुराई के बिना अच्छाई का क्या वजूद

दीपावली आ रही है पर मैं आप को याद क्यूँ दिला रहा हूँ,आप की समझदारी पर मुझे हमेशा भरोसा रहा है.हम तो आपको कुछ और याद दिला रहे हैं अच्छा ये तो आप सब जानते हैं कि दीपावली रात का त्यौहार है पर जरा गौर करिये हम जब दीपावली के बारे में किसी से पूछते हैं तो क्या कहते हैं अरे दीपावली किस दिन है. ट्विस्ट कहानी में यहीं है जब रात का त्यौहार है तो दिन की बात क्यूँ ? तो दीपावली के बहाने ही सही  मैंने जरा सा रात के बारे में सोचा तो न जाने क्या क्या याद आया, वैसे याद से कुछ आपको याद आया क्या ?भाई याद का सीधा कनेक्शन रात से है.जब आप मन से अकेले होते हैं तो कितना कुछ याद आता है. रात के सन्नाटे में मन के किसी कोने से कितनी यादें निकल पड़ती हैं. रात अपने आप में एक फीलिंग है सुबह का इंतज़ार करते हुए रात काटना और बात है लेकिन रात को जीते हुए रात काटना बिल्कुल अलग मामला  है. हमारे जीवन में रात और दिन की सेम इम्पोर्टेंस है पर जब भी हम लाईफ की बात करते हैं तो बात सिर्फ दिन की होती है.फेसबुक हम सब की जिंदगी का हिस्सा है तो आपने ऐसे कई लोगों की प्रोफाईल को देखा होगा जिनके हजारों मैं फॉलोवर्स हैं और मन मैं कसक उठी होगी कि काश हमारी प्रोफाईल मैं भी कुछ ऐसा मामला होता पर जो लोग आगे बढते हैं उसमें उनकी मेहनत और डेडीकेशन के अलावा उनके बहुत सारे फौलोवार्स का भी कंट्रीब्यूशन होता है.बात समझे दिन इसलिए दिन है क्यूंकि रात है.सिंपल समझिए वो फेमस  लोग जो दिन की तरह चमकते हैं उनके पीछे हमारे जैसे कई फालोवर रात की तरह होते हैं. सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर लोगों के फौलोवर्स बनने की बजाय कुछ ऐसा करें कि लोग आपको फोलो करें.मैं बात को थोडा और सिंपल करता हूँ जब हम काले रंग के बारे में जानेगे तभी तो ये जान पायेंगे कि कौन कितना गोरा है.यानि इस जीवन में सबकी अपनी अपनी युटिलिटी है और कोई भी वेस्ट नहीं है.मैंने कहीं पढ़ा था बुराई कि सबसे बड़ी अच्छाई ये है कि वो बुराई है तो अगर कोई आगे बढ़ रहा है और आप उस जगह नहीं पहुँच पा रहें तो फ्रस्टेट न हों,अपने आप को पहचाने हो सकता हो आप उस काम के लिए बने न हों और वो काम करें जिसके लिए आप बने हों. जैसे रात, दिन नहीं हो सकती और दिन, रात नहीं. भाई इस फेस्टिव सीजन में मैं अपनी बात को फेस्टिवल के थ्रू ही कहूँगा तब शायद आप मुझे समझें तो मामला यूँ है कि आप होली में  पटाखे छुडाएं तो लोग आपको क्या कहेंगे पागल तो कोई भी काम शुरू करते जोश के साथ होश का भी इस्तेमाल करें महज इसलिए कि आजकल इसका बड़ा क्रेज है ,इसमें पैसा बहुत है जैसी बातों को ध्यान में रखकर कोई काम मत शुरू कर दीजिए. जिस तरह सारे दिन एक जैसे नहीं होते हैं और उसी तरह से सारी रातें भी एक जैसी नहीं होती हैं किसी रात आप अपने किसी अज़ीज़ दोस्त की पार्टी में नाच गा रहे होतें तो किसी रात आप बिस्तर पर स्ट्रेस के कारण जगते हुए काट देते हैं और किसी रात आप ऐसा खूबसूरत सपना देखते हैं कि सुबह होने ही नहीं देना चाहते हैं.सबसे इम्पोर्टेंट हमारी जिंदगी में बहुत सारे ऐसे लोग है जिनका हमारी सफलता में योगदान होता है तो उनको भी नहीं भूलना चाहिए याद है न रात है तभी तो दिन है,तो दीपावली आपने हर साल मनाई होगी इस साल दीपावली की रात अपने उन दोस्तों के साथ मनाई जाए जो आपकी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हैं. अब तो आप मान ही लीजिए कि दीपावली तभी तक प्रकाश का त्यौहार है जब तक इस धरती पर अँधेरा है क्यूंकि कोई दिन में कोई पटाखे नहीं फोड़ता तो कैसा लगा आपको दीपावली का रात कनेक्शन
आई नेक्स्ट में 25/10/14 को प्रकाशित 

Wednesday, October 23, 2013

डेंगू से निपटने की चुनौती

डेंगू भारत में एक महामारी का रूप लेता जा रहा। डेंगू मच्छरों द्वारा फैलाया जाने वाला एक विषाणुजनित संक्रामक रोग है जिसके लक्षण फ्लू के लक्षणों से मिलते-जुलते हैं और कई मामलों में यह जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है। डेंगू विषाणु से संक्रमित होने के बाद संक्रमित व्यक्ति रोग का वाहक हो जाता है जिससे उसके आस-पास के लोगों में इसके फैलने का खतरा बढ़ जाता है। चूंकि डेंगू के लक्षण फ्लू के लक्षणों से काफी मिलते-जुलते हैं अतः कई बार इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। इसका अभी तक कोई टीका नहीं है।  तमाम सरकारी दावों के बावजूद हर साल डेंगू से प्रभावित होने वाले लोगों का आंकड़ा पिछले साल की अपेक्षा बढ़ता जा रहा है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आधिकारिक आंकड़ें वास्तविक आंकड़ों की तुलना  में काफी कम हैं क्योंकि इनमें सिर्फ वही  मामले गिने जाते हैं जिसमें मरीज इलाज़ कराने के लिए सरकारी अस्पतालों में जाते हैं, और जिनकी पुष्टि सरकारी प्रयोगशालाओं द्वारा होती है । डेंगू महामारी के बारे में आसियान देशों में जागरुकता फैलाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन आसियान के सदस्य देशों के साथ मिलकर प्रतिवर्ष 14 जून को आसियान डेंगू दिवस के रूप में मानता है।उष्णकटिबंधीय बीमारियों के विशेषज्ञ डॉ स्कॉट हैलस्टीड का मानना है कि भारत में हर वर्ष अनुमानतः लगभग तीन करोड़ सत्तर लाख लोग इस डेंगू फैलाने वाले वाइरस से संक्रमित होते हैं जिनमें से तकरीबन मात्र 2 लाख 27 हज़ार 500 लोग ही इलाज़ करने के लिए अस्पतालों में भर्ती होते हैं। आंकड़ों को कम करके प्रस्तुत किए जाने की प्रवृत्ति से  डेंगू की विकरालता  का वास्तविक स्तर समझ पाने में समस्या आती है जिससे  इससे निपटने के लिए जिस स्तर की व्यापक तैयारी की जानी चाहिए वह नहीं होती  नतीजा डेंगू से होने वाली मौतों में वृद्धि। भारत मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली इस घातक बीमारी का केंद्र बनता जा रहा है। स्वास्थ्य प्रबंधन के अभाव में इसने खतरनाक  रूप धर लिया है और पिछले  कुछ वर्षों में डेंगू बच्चों में बीमारी और उनकी असमय मृत्यु का एक प्रमुख कारक बनकर उभरा है। 1970 से पूर्व केवल 9 देशों ने डेंगू को महामारी के रूप में झेला था। परंतु 21 वीं सदी के पहले दशक तक आते आते तकरीबन 100 देशों में इस बीमारी ने अपने पाँव पसार लिए हैं। आंकड़ो भारत में डेंगू के फैलाव की कहानी खुद कह रहे हैं| इस वर्ष तीस सितम्बर तक पूरे देश में डेंगू से अब तक 109 मौतें दर्ज़ की गई हैं जबकि 38,000 से ज्यादा मामले दर्ज किये गए | भारत में हर साल डेंगू और उसके कारण मृत्यु की संख्या बढ़ती जा रही है स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इस साल डेंगू से दक्षिण भारत  के राज्य  सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। केरल में डेंगू के 7,000 मामले और 23 मौतेंआंध्र प्रदेश में 5,680 से ज्यादा मामले और 12 मौतेंउड़ीसा में 5,012 मामले और पांच मौतें और तमिलनाडु में 4, 294 मामले दर्ज़ किए गएयहां किसी की डेंगू से मौत नहीं हुई गुजरात और महाराष्ट्र में भी डेंगू के क्रमश: 2,600 से ज्यादा मामले मौतें दर्ज़ किये गये । स्वास्थ्य जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर व्यवस्था ना होने के कारण डेंगू भारत जैसे तमाम अल्पविकसित देशों के लिए एक ऐसी स्वास्थ्य  चुनौती बनता जा रहा है|जिस पर अगर ध्यान न दिया गया तो नतीजे भयावह होंगें|  जरुरत जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर करने की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डेंगू सामन्यतः शहरी गरीब इलाकों, उपनगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक प्रभावित करता है पर  उष्ण कटिबबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय देशों के समृद्ध क्षेत्रों में भी इसका काफी प्रभाव पड़ता है। पिछले 50 वर्षों में डेंगू के मामलों में 30 गुना इजाफा हुआ है और प्रतिवर्ष 5 से 10 करोड़ लोग इस बीमारी का शिकार होते हैं।तस्वीर का एक और रुख लोगों के नजरिये और साफ़ सफाई के प्रति जागरूकता का न होना भी है डेंगू जैसी बीमारियाँ तब फैलती हैं जब हम अपने आस पास की जगहों की पर्याप्त सफाई नहीं करते और जलभराव को होने देते हैं|भारत में कूड़ा प्रबंधन जैसी अवधारणायें अभी कागज़ में ही हैं व्यवहार में कुछ ठोस नहीं हुआ है|हमारे महानगर पर्याप्त रूप से गंदे हैं और इसके लिए सबको प्रयास करना होगा|डेंगू का कोई इलाज़ नहीं है। सुरक्षा एवं सावधानी ही इससे निपटने का एकमात्र रास्ता है यही है की इन्हें फैलाने वाले मच्छरों को न पनपने दिया जाये। ठोस कूड़े का सही से निस्तारण, पानी के भंडारण की उचित व्यवस्था तथा पानी को जमा होने से रोकना ही वह प्रमुख कदम हैं जिनके द्वारा हम डेंगू फैलाने वाले मच्छरों को फैलने से रोक सकते हैं।
 अमर उजाला में 23/10/13 को प्रकाशित 

Tuesday, October 8, 2013

हर लाईक बहुत कुछ कहता है

मौसम में ठंडक आनी शुरू हो गयी है लेकिन ये महीना रिश्तों के लिहाज से गर्म रहेगा.अरे भाई  त्योहारों का मौसम जो आ गया है बकरीद ,दशहरा और उसके बाद दीपावली तो यारों दोस्तों से खूब मिलना जुलना होगा.पर एक समस्या है आजकल सब व्यस्त हैं तो हो सकता है कि  कुछ लोग छूट जाएँ जिनसे मुलाकात ना हो पाए पर आपको भी पता है उसके लिए टेंशन लेने की जरुरत नहीं अरे फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स हैं ना उसपर तो मिलना जुलना होता ही रहता है ना. बस उन दोस्तों को  अपनी याद दिलाने के लिए आपको ज्यादा मेहनत तो करनी नहीं है बस उनके अपडेट या फोटो ग्राफ  को लाईक कर देना है.वैसे लाईक से याद आया ये लाईक भी कमाल की चीज है न सुबह सुबह जब मैं फेसबुक खोलता हूँ तो मेरी न्यूस फीड भरी होती है तस्वीरों और अपडेट से,जिनमें  कुछ जाने पहचाने होते हैं तो कुछ बिलकुल अनजाने, जो जाने पहचाने होते हैं उनकी तस्वीरों और फोटोग्राफ को लाईक करके मैं उनको अपनी याद दिला देता हूँ और जो अनजाने होते हैं उनके अपडेट को लाईक कर एक नए रिश्ते की शुरुवात कर देता हूँ फ़िर जो अनजाने हैं वो जाने पहचाने कब लगने लग जाते हैं मुझे तो पता नहीं पड़ता.अच्छा एक बात बताइए क्या आपके साथ ऐसा होता है ?क्या कहा हाँ, डूड यही तो लाईफ है कितना कुछ कॉमन हैं हम सबमें पर हम हैं कि ध्यान ही नहीं देते, अब देखिये ना कम्युनिकेशन की नयी स्टाईल डेवेलप हो रही है हम बिना बोले कितना कुछ बोल रहे हैं वो भी माउस की एक क्लिक से वैसे आपने गौर भी किया होगा कि लाईक का सिम्बल कितना मोटीवेशनल है (Y)यूँ समझ लीजिए ये जादू की वर्चुअल झप्पी है अब जरूरी नहीं है कि हम हर एक मित्र से गले मिलकर उसे ये एहसास दिलाएं कि वो हमारे लिए खास है उसके बगैर जिंदगी में कुछ कमी सी रहती है,फ़िर दोस्त भी तो खाली नहीं बैठा होगा हमेशा आपकी सेंटी टॉक झेलने के लिए तो आसान तरीका है ना मेसेज बॉक्स में जा के बगैर कुछ कहे एक सिम्बल भेजने का बस अब इस सिम्बल में कितना कुछ शामिल है प्यार, मोटीवेशन, इंस्पीरेशन अब ये हमारे ऊपर है कि इन फीलिंग्स में से अपने लिए क्या चुनते हैं.हमारी जिंदगी में मोटे तौर पर सिचुएयेशन एक जैसी ही आती हैं अब उनमे से कोई अपने लिए अपार्चुनिटी देख कर विनर बन जाते हैं तो कई स्थितियों को कोसते हुए जीवन भर वीक बने रह जाते हैं.अपने आस पास देखिये ऐसे कई विनर लूजर मिल जायेंगे,तो हर लाईक का मतलब लाईक ही नहीं होता है.इस बात को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए और हर बात को लाईक नहीं करना चाहिए आपको भी तो रोज ना जाने कितने इन्वीटेशन मिलते होंगे कि फलां पेज को लाईक करो पर आप हर पेज को तो नहीं लाईक करते हैं तो लाईफ में सिचुयेशन सबको भले ही एक जैसी लगीं पर चोइसेज तो हमारी ही होती हैं कि हमें जिंदगी से क्या चाहिए तो नो युअर लिमिटेशंस् समझाता हूँ अब ये लाईक वाला मामला वहीं काम करेगा जब आपके फेसबुक फ्रेंड के  लिमिटेड फ्रेंड हों जो रिश्ते बनाने और निभाने में यकीन रखता हो या पर्सनली आप उसके  बेस्ट फ्रैंड में से एक हों पर ऐसे लोग जो फेसबुक पर सिर्फ दोस्ती करने आते हैं निभाने नहीं उनके स्टेटस को लाईक करने से कोई फायदा नहीं होगा क्यूंकि वहाँ ऐसी पूरी उम्मीद है कि आप उनके लिए हमेशा अनजाने ही बने रहेंगे तो लाईफ में आगे बढ़ने के लिए उसी प्रोफेशन को चुनें जिसके लिए आप बने हों,जिसमे आपको मजा आता हो, किसी के दबाव में या किसी को सफल देख कर उसके जैसा बनने की कोशिश तब तक ना करें जब तक कि आपका उस प्रोफेशन में इंटरेस्ट ना हो,कुछ समझे क्या वैसे भी मैंने कुछ समझाया तो नहीं सिर्फ आपको एक लाईक की कहानी सुनायी,क्यूंकि हर लाईक बहुत कुछ कहता है और हाँ त्योहारों के मौसम में नए दोस्त जरुर बनाइये पर पुराने को मत भूल जाइए क्यूंकि यही वो लोग हैं जिनके लाईक का कभी आप इन्तजार किया करते थे.
आई नेक्स्ट में 08/10/13 को प्रकाशित 

Monday, September 30, 2013

अवैध खनन द्वारा नदियों से खिलवाड़

रोटी कपड़ा और मकान के संकट से जूझते एक आम भारतीय के लिए पर्यावरण या उससे होने वाला नुकसान अभी भी कोई मुद्दा नहीं है और अवैध बालू खनन भी एक ऐसा ही मामला है जो हमें महज एक कानूनी मसला लगता है। बालू के अवैध खनन के पीछे एक बड़ा कारण इसका भारी होना भी है जिसके कारण बालू को दूर तक ले जाना मुश्किल होता है। इसलिए निर्माण कंपनियां आसपास के इलाकों से बालू निकालने को प्राथमिकता देती हैं। बालू का इस्तेमाल कंक्रीट में मिलाने और ईटें बनाने के लिए किया जाता है। हालांकि सरकार ने बालू खनन के लिए लाइसेंस की व्यवस्था की है, पर मांग बहुत ज्यादा है जिससे लाइसेंस व्यवस्था को लगातार अनदेखा कर अवैध खनन को बढ़ावा मिलता है। बगैर ज्यादा लागत के ये बहुत मुनाफे वाला सौदा है लेकिन अंधाधुंध और अनियंत्रित बालू उत्खनन से नदी के किनारों का घिसाव होता है जिसका परिणाम जैविवविधता के नुकसान के रूप में सामने आता है। किनारे कटने से वहां पनपने वाली वनस्पतियां नष्ट होती हैं और वहां पलने वाले जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास समाप्त होता है। इसके परिणामस्वरूप नदी के पानी को धारण करने और नदी को दोबारा जल मुहैया कराने वाली व्यवस्था को हानि पहुंचती है। पर अंधाधुंध विकास के चक्कर में इसकी परवाह किसे है क्योंकि विकास का आकलन आर्थिक नजरिए से किया जाता है। यही कसौटी भी है और यही परिणाम भी। उपभोक्तावाद ने हमें इतना अधीर कर दिया है कि विकास का मापदंड सिर्फ भौतिकवादी चीजें और पैसा ही रह गया है। पक्के निर्माण के बढ़ते चलन और प्रकृति प्रदत्त चीजों पर निर्भरता कम होने का परिणाम है बढ़ता शहरीकरण। आज गांव सिमट रहे हैं और शहर भर रहे हैं। चूंकि गांवों में अभी भी आधारभूत ढांचे का अभाव है इसलिए आर्थिक रूप से थोड़ा-बहुत हर ग्रामीण शहर में बसने के सपने देखता है या शहर की तरह गांव में पक्का घर का निर्माण चाहता है। और यह प्रक्रिया आवास निर्माण उद्योग में क्रांति ला रही है और पक्के निर्माण विकसित होने की निशानी माने जा रहे हैं। देश की तरक्की के लिए विकास जरूरी है पर अनियोजित विकास, समस्याएं ही बढ़ाएगा जिसकी कीमत आज नहीं तो कल हम सबको चुकानी ही पड़ेगी। 2009 में निर्माण उद्योग ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में 8.9 प्रतिशत का योगदान दिया, जो 2005 के 7.4 प्रतिशत से ज्यादा है। योजना आयोग के अनुसार अगर देश को लगातार बढते रहना है तो 31 मार्च 2017 को खत्म होने वाले वित्त वर्ष में अवसंरचना क्षेत्र में निवेश को जीडीपी का दस प्रतिशत करना होगा, जो पहले पांच साल के आठ प्रतिशत से ऊपर होगा। भारत भले ही गांवों का देश हो, पर आज पूरे देश में शहरीकरण की बयार बह रही है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक कुल 121 करोड़ की आबादी में से 37.71 करोड़ लोग शहरो में रहते हैं। भविष्य में इस तस्वीर की बहुत तेजी से बदलने की संभावना है। अनुमान के मुताबिक शहरीकरण की वर्तमान दर 31.1 प्रतिशत है जो 2030 तक चालीस प्रतिशत हो जाएगी। बढ़ता शहरीकरण रीयल एस्टेट और आवास जैसे क्षेत्रों में मांग बढ़ा रहा है। आंकड़े के अनुसार पिछले दस सालों में आवास क्षेत्र में बत्तीस प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। जैसे- जैसे भारत का शहरीकरण बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे मकानों वाली भूमि का आकार बढ़ता जाएगा। यह 2005 के आठ अरब वर्ग मीटर से बढ़कर 2030 तक 41 अरब वर्ग मीटर तक फैल सकता है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए अगले पांच सालों में एक ट्रिलियन डॉलर सार्वजनिक और निजी निवेश की जरूरत होगी। यह निवेश सड़कों, विमानपत्तन और नौकरियों में होगा। अगर ये अनुमानित निवेश हो जाता है, तो बालू जैसे अवसंरचना में लगने वाले कच्चे माल की मांग तीन गुना तक बढ़ जाएगी और बालू आपूर्तिकर्ताओं पर बेतहाशा दबाव बढ़ेगा और ये दबाव कहीं न कहीं अवैध बालू खनन को बढ़ावा देगा। बात जब निर्माण की होती है तब हम सीमेंट के बारे में सोचते हैं। लेकिन सीमेंट तो मात्र जोड़ने वाला एक पदार्थ है, निर्माण का मुख्य अवयव है बालू और पत्थर या ईट। बालू का कोई और सस्ता सुलभ विकल्प न होने का कारण उसका अवैध खनन होता है जिसकी कीमत हमारी नदियां चुकाती हैं। उत्तराखंड हादसा हुए अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता जिसने हमें चेताया। पर इस चेतावनी को समझने के लिए हजारों लोगों को अपनी जान देनी पड़ी, सैकड़ों घायल हुए और बेघर भी। बालू का अवैध खनन मैदानी क्षेत्रों के पर्यावरण को कितनी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है इसका वास्तविक आकलन होना अभी बाकी है, पर हम जिस तरह अपने पर्यावरण से खेल रहे हैं वह वास्तव में एक खतरनाक खेल है। कानून में बड़े खनिजों जैसे कोयले, हीरे अथवा सोने के विपरीत रेत को ‘लघु खनिज’ कहा जाता है। कानूनन पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में खनन लीज के लिए पर्यावरण संबंधी अनुमति लेना आवश्यक है। हालांकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अपने दिए एक आदेश में अब पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्र में भी खनन को केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय या संबंधित राज्य के पर्यावरण प्रभाव आंकलन प्राधिकरण से अनुमति को अनिवार्य कर दिया है। खान और खिनज (विकास और नियामक) एक्ट 1957 (मई 2012 में संशोधित) के मुताबिक रेत खनन करने वालों को राज्य के प्राधिकारियों से एक लाइसेंस लेना होता है और बालू की मात्रा के मुताबिक शुल्क देना होता है। यह बिक्री दाम का करीब आठ प्रतिशत हो सकता है। बगैर अनुमति बालू खोदने की सजा दो साल तक की जेल या 25 हजार रुपए का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। अवैध रेत खनन को रोकने को लेकर समस्या यह है कि निर्माण में बालू के ज्यादा विकल्प नहीं हैं और जो विकल्प हैं भी वे बालू के मुकाबले महंगे हैं। पर्यावरण जागरूकता के अभाव में और ‘जरा-सा बालू निकालने से नदी कौन-सी सूख जाएगी’ वाली मानसिकता नदियों के प्रवाह तंत्र को प्रभावित करके पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रही है। अब समय आ गया है कि पर्यावरण की दृष्टि के अनुकूल बालू का कोई ऐसा विकल्प ढूंढा जाए जिससे अवैध बालू खनन पर रोक लगे और अवैध बालू जैसे लघु खनिजों से संबंधित कानूनों को और कड़ा किया जाए। हमें अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों से सबक लेना होगा जिन्होंने समय रहते अपने पर्यावरण संबंधी कानूनों को कड़ा किया और यह भी सुनिश्चित किया कि इन कानूनों का कड़ाई से पालन हो।

    राष्ट्रीय सहारा में 30/09/13 को प्रकाशित 

Friday, September 27, 2013

उनकी भी सोचें जिन्हें भोजन नहीं मिलता

पर्यावरण एक चक्रीय व्यवस्था है। अगर इसमें कोई कड़ी टूटती है, तो पूरा चक्र प्रभावित होता है। पर विकास और प्रगति के फेर में हमने इस चक्र की कई कड़ियों से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है। पूंजीवाद के इस युग में कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती, इस सामान्य ज्ञान को हम प्रकृति के साथ जोड़कर न देख सके, जिसका नतीजा धरती पर अत्यधिक बोझ के रूप में सामने है, फिर वह चाहे जनसंख्या का हो या अनाज उत्पादन का। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर साल दुनिया भर में भोजन की बर्बादी से करीब सात सौ अरब डॉलर का नुकसान होता है। एफएओ द्वारा कराया गया यह अध्ययन अपनी तरह का पहला है, जिसमें पर्यावरण की दृष्टि से भोजन की बर्बादी के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
यह अध्ययन साफ तौर पर इंगित करता है कि हम अपनी जनसंख्या का पेट भरने के लिए जितना भोज्य पदार्थ हर वर्ष बनाते हैं, उसका लगभग एक तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है। आंकड़ों में यह हिस्सा लगभग एक अरब तीस करोड़ टन होता है। रिपोर्ट के अनुसार, भोजन की चौवन प्रतिशत बर्बादी उत्पादन, कटाई और भंडारण के वक्त होती है, जबकि छियालीस प्रतिशत बर्बादी वितरण और खपत के दौरान होती है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, हर दिन दुनिया के लगभग 87 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। यह महज खाद्य पदार्थों की बर्बादी नहीं है, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में शामिल सभी प्रकृति प्रदत्त अवयवों की बर्बादी होती है, वह चाहे ऊर्जा हो या पानी, सभी का दोहन होता है। पर उनका उपयोग नहीं होता, जिसका परिणाम पर्यावरण के ऊपर अतिरिक्त दबाव और असंतुलित विकास के रूप में सामने आता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां भुखमरी जैसी समस्या का हल करने के लिए सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून लाना पड़ा, वहां अनाज का भंडारण एक बड़ी चुनौती है। संसद को दिए गए एक जवाब के अनुसार, देश में हर साल 13, 309 करोड़ रुपये की फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं। इस आंकड़े में अगर गेहूं, चावल व अन्य अनाज की कीमत को भी जोड़ दी जाए, तो यह संख्या बढ़कर 44 हजार करोड़ रुपये हो जाती है। खाद्यान्न उत्पादन का बढ़ना तभी बेहतर माना जाएगा, जब लोग उसका उपयोग कर पाएं और हमारा मानव संसाधन बेहतर हो, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है, तो हम दोहरे संकट में हैं। एक ओर जहां हम ज्यादा खाद्यान्न पैदा कर धरती की उर्वरा शक्ति से खिलवाड़ कर रहे हैं, जिसमें पानी और ऊर्जा के लिए लकड़ी, कोयला व गैस जैसे अवयवों का अनियंत्रित दोहन भी शामिल है, वहीं इसका फायदा उन लोगों को नहीं हो रहा है, जिन्हें ज्यादा जरूरत है।
भारत में खाद्यान्न उत्पादन 2,510 लाख टन के साथ अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर है, पर ये आंकड़े महज दिल को बहलाने के लिए हैं, क्योंकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। योजना आयोग द्वारा 2012 में गठित सुमित्रा चौधरी समिति ने भी माना था कि देश को 613 टन भंडारण क्षमता की जरूरत है, जबकि मौजूदा क्षमता मात्र 290 टन की है, यानी मौजूदा अंतर 320 टन का है। इस समस्या के अन्य आयाम भी हैं। भारत जैसे देश में जहां खाद्य पदार्थों के संरक्षण और बचत को लेकर जागरूकता का अभाव है, वहीं शादी और अन्य सामाजिक आयोजनों में भोजन की बर्बादी आम है। आंकड़ों के आईने में एक बात तो साफ है कि प्रकृति सबका पेट भरने लायक खाद्यान्न पैदा करती है, पर हम उनका समान वितरण कर पाने में विफल रहे हैं, जिसका नतीजा अन्न की बर्बादी के रूप में सामने आ रहा है।
रिपोर्ट का मानना है कि यदि खाद्य पदार्थों की बर्बादी को हम कम कर पाने में सफल हो जाएं, तो गरीबी की समस्या से निपटा जा सकता है। नष्ट होते खाद्यान्न पर लगने वाले खर्च का निवेश कर आर्थिक रूप से बदहाल तबके का जीवन बेहतर किया जा सकता है, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। इसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करना होगा, सरकार जहां भंडारण और परिवहन से होने वाली खाद्यान्न की बर्बादी रोकने के लिए पहल कर सकती है, वहीं लोगों को भी अपनी आदतें बदलनी होंगी, ताकि भोजन की बर्बादी न हो।
अमर उजाला में 27/09/13 को प्रकाशित 

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