Friday, June 19, 2026

बिना इंटरनेट वाला बचपन

 

बचपन की यादें खिड़की से आती उस ठंडी हवा की तरह होती हैं, जो तपती गर्मी में भी सुकून दे जाती हैं। आज जब जून के महीने में स्कूल बंद हैं, तो हर तरफ सन्नाटा दिखाई देता है। बच्चे अपने-अपने कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर मोबाइल, टैबलेट या गेमिंग कंसोल पर उंगलियां सरका रहे होते हैं। इस नजारे को देखकर अक्सर मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है और दिल में एक ही सवाल उठता है—"यूँ होता तो क्या होता?" अगर आज भी हमारे पास वही पुराना, बिना इंटरनेट वाला बचपन होता, तो आज की पीढ़ी का जीवन कैसा होता?हमारे समय में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक अलग ही उत्साह होता था। न हमारे पास स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया। तब हमारी छुट्टियां सिर्फ लूडो, कैरम,व्यापार(खेल ) और कॉमिक्स के सहारे बीत जाती थीं। 'चाचा चौधरी', 'साबू', 'बिल्लू' और 'पिंकी' के पन्नों में जो दुनिया छिपी थी, वह आज के किसी भी थ्री-डी गेम से कहीं ज्यादा चमकीली  थी।
उस समय किसी तरह का कोई 'डिस्ट्रेक्शन' (भटकाव) नहीं था। आज की पीढ़ी को हर पांच मिनट में एक नोटिफिकेशन चाहिए, लेकिन हमें सिर्फ अपनी अगली बारी का इंतजार रहता था।वो अभाव के दिन थे न बाजार न ही घर चीजों से भरे नहीं थे |हर चीज में बचत की आदत हमारे बचपने का अंग रहे |
आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि खुशियों को जीने से ज्यादा, उन्हें दूसरों को दिखाने की होड़ मची है। कहीं घूमने जाना हो, कुछ अच्छा खाना हो या बस घर में बैठकर समय बिताना हो—जब तक उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर 'फिल्टर' लगाकर पोस्ट न कर दी जाए, तब तक वह खुशी अधूरी मानी जाती है। यह लोभ बिलकुल भी नहीं था कि हम सबको बताएं कि हम क्या कर रहे हैं। हमारी खुशियां सार्वजनिक नहीं, बल्कि बेहद निजी हुआ करती थीं। अगर हमने कैरम में कोई बेहतरीन शॉट मारा या लूडो में लगातार तीन छक्के ले आए, तो वह खुशी सिर्फ उस कमरे में बैठे चार दोस्तों या भाई-बहनों के बीच की होती थी। उसे दुनिया भर से 'लाइक्स' और 'कमेंट्स' बटोरने की जरूरत नहीं थी।
आज की फिल्टर वाली पीढ़ी शायद कभी यह समझ ही न पाए कि एक ऐसी भी दुनिया थी जहां चीजों को जबरदस्ती बेहतर या चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की जाती थी। हमारे समय में जो जैसा होता, हम उसी से दिल लगा लेते थे।
गली में किसी पुराने, खराब टायर को लकड़ी के टुकड़े से मारते हुए मीलों दौड़ाने में जो लुत्फ था, वह आज की महंगी रीमोट-कंट्रोल कार में भी नहीं है। खेलते समय जब लेदर या कॉर्क की गेंद नाली में गिर जाती थी, तो खेल रुकता नहीं था। उसे नाली से निकालकर बस सूखी मिट्टी से रगड़ कर साफ मान लेने का एक अनोखा हुनर हमारे पास था। न कीटाणुओं का डर था और न ही सैनिटाइजर की जरूरत। सब कुछ कितना सादा, स्पष्ट और वास्तविक था।
मेरी मां अक्सर कहा करती हैं कि खुशियां जितनी व्यक्तिगत होती हैं, उतनी ही सुरक्षित रहती हैं; उन्हें सबको बता  देने से नजर लग जाती है। मां के जमाने में इंटरनेट नहीं था, इसलिए वे और उनके दौर के लोग इस बात को गहराई से समझते थे कि असल आनंद दूसरों के दिखावे में नहीं, बल्कि अपनों के साथ उस पल को महसूस करने में है।
आज की पीढ़ी 'वर्चुअल' (आभासी) दुनिया में इतनी खो चुकी है कि उसे असली रिश्तों की गर्माहट का अहसास ही नहीं है। वे इंस्टाग्राम के फिल्टर्स में चेहरे को तो सुंदर बना लेते हैं, लेकिन बचपन के उस असली, बेफिक्र और धूल-मिट्टी से सने चेहरे की मासूमियत खो चुके हैं।बेशक इंटरनेट ने हमें दुनिया भर की जानकारियां और सुविधाएं दी हैं, लेकिन इसके बदले में उसने हमसे हमारा वह सादा और सच्चा बचपन छीन लिया। काश, आज का बचपन भी थोड़ा सादा, थोड़ा बिना फिल्टर वाला और थोड़ा और 'व्यक्तिगत' हो पाता!

प्रभात खबर में 19/06/2026 को प्रकाशित लेख

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