Thursday, September 5, 2019

शिक्षा संग बदल गए शिक्षकों के मायने

अंगरेजी की एक कहावत है Teaching is the one profession that creates all other profession.मतलब शिक्षा देना एक ऐसा व्यवसाय है जो बाकी के व्यव्स्याओं को जन्म देता है .शिक्षकों के बिना किसी भी आदर्श समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है .पिछले सत्तर सालों में देश में बहुत कुछ बदला है उसमें से एक हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक भी हैं .आज शिक्षक दिवस के बहाने ये समझने की कोशिश की जाए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक कितने बदल गए और इंटरनेट एक नया शिक्षक बन कर उभरा है जो औपचारिक या अनौपचारिक  रूप से  बहुतों को शिक्षित कर रहा है .ब्लैक बोर्ड की जगह व्हाईट बोर्ड आ गए है .चाक की जगह मार्कर आ गए है . जहाँ पहले गुरुकुल प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा दी जाती थी वहीँ आज ई लर्निग का चलन आ चुका है. घर बैठे सात समुंदर पार के शिक्षक भी हमारे शैक्षणिक विकास में सहयोग दे रहे हैं.बाईजु जैसे एप हमारे मोबाईल में शिक्षकों को ले आये हैं . गूगल के चैरिटी संगठन Google.org ने भारत में टीचर ट्रेनिंग और ऑनलाइन एजुकेशनल कंटेंट तैयार करने के लिए 20 करोड़ अनुदान देने की घोषणा की है। संगठन 2 साल में 5 लाख शिक्षकों तक पहुंच बनाने के लिए 'TheTeacherApp' को 6.7 करोड़ और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर काम करने वाले सेंट्रल स्क्वेयर फाउंडेशन को 13.3 करोड़ अनुदान देगा. 
21वीं सदी तकनीकी की सदी  है। यह हर उस चीज का स्वागत कर रही है जो तकनीकी के विकास में सहायक है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हैई लर्निंग। ई-लर्निंग यानी शिक्षा देने का इलेक्ट्रानिक तरीका. ई-लर्निंग का सबसे पहला प्रयोग वर्ष 1960 में अमेरिका में देखा गया था। जहां शिकागो में यूनिवर्सिटी ऑफ लीनियोस में क्लासरूम के सभी कंप्यूटर्स को एक सर्वर से कनेक्ट किया गया था। सभी छात्र उस कंप्यूटर को एक्सेस कर लेक्चर सुन सकते थे। यह प्रयोग बहुत ही कामयाब रहा और इसके बाद इस तरह के प्रयोग अक्सर देखने को मिले।  ई-लर्निंग के बढ़ते साधनों से अब सीखना-सिखाना काफी आसान हो गया है. स्कूलकॉलेजदफ्तर हो या घरइन नए साधनों से लोग सीखने या अपने कौशल को बेहतर बनाने में मदद ले रहे हैं. ई टेक्नोलॉजी की बदौलत कई तरह के लर्निंग मोबाइल बन रहे हैं. टिन कैन जैसे ई-लर्निंग ऐप्स के साथ अब छात्रों को तुरंत  पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने के लिए माइक्रो-क्लासेस  के रूप में पढ़ाई की सामग्री भेजी जा सकती है. ओपन एजुकेशन रिसोर्सेज (ओईआर) टीचिंग और लर्निंग के मकसद से विकसित किया जाता है और मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है. यह डिजिटाइज्ड सामग्री ओपन डेवलपमेंट की सुविधा देती है. ओईआर में विशेष एजुकेशन कोर्स और विषयडिजिटाइज्ड टेक्स्टबुकवीडियो और अन्य सामग्री शामिल हैं जिनका इस्तेमाल पढ़ाई के लिए किया जा सकता है. शिक्षा को एमओओसी (मैसिवली ओपन ऑनलाइन कोर्सेज) ने लोकप्रिय बनाया है. इस तरह की लर्निंग सोशल लर्निंग का मार्ग प्रशस्त कर रही हैजहां विषयों को लेकर कम्युनिटीज बना ली जाती हैं. छात्र दुनिया भर में दूसरे छात्रों के साथ संबंधित विषय पर चर्चा करते हैं और अपनी जानकारी का आदान-प्रदान करते हैं. 
आज से कुछ साल पहले शायद यह अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था कि तकनीक शिक्षा के क्षेत्र में भी इतनी क्रांति आ सकती है। लेकिन यह संभव हुआ और आज ई लर्निंग का जिस प्रकार तेजी से विस्तार हो रहा है वह हम सबके सामने है। आज जब इंटरनेट और मोबाइल हर जगह और हर किसी के हाथ में उपलब्ध है तो इस सेवा को मुहैया कराया जा सकता है। जहां कहीं इंटरनेट केबल नहीं है वहां मोबाइल तो उपलब्ध है ही। यही वजह है कि आज भारत में ई-लर्निंग की चर्चाएं गर्म हैं। सरकार से लेकर निजी संस्थान और गैर  सरकारी संस्थान भी इस दिशा में बेहतर प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार द्वारा कम कीमत में आकाश टैबलेट का वितरण किया गया था। इसके बाद तो मानो कम रेंज के टैबलेट की बाढ़ सी आ गई। इतना ही नहींटैबलेट लोगों के हाथों में आने के साथ ही कई कंपनियों ने कंटेंट के क्षेत्र में भी बेहतर काम किया है और आज ई-लर्निंग के लिए ढेर सारी एप्लिकेशन और किताबें ऑन लाइन उपलब्ध हैं। आज भारतीय बाजार में न सिर्फ आरंभिक स्तर में टैबलेट उपलब्ध हैं बल्कि स्मार्टफोन भी आम उपभोक्ता के बजट में आ चुका है। 
तकनीक ने हमारे जीने के तरीके को ही बदल दिया है। दैनिक कार्यों को आसान बनाने में इसने प्रमुख भूमिका अदा की है। इसके माध्यम से आज हर चीज हमारी पहुँच में है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में भी तकनीकी के आने से नया बदलाव आया है। मोबाइल तकनीक के माध्यम से शिक्षा को एक नई दिशा और दशा देने की कोशिश की जा रही है.परंतु हमारे देश की ये कड़वी सच्चाई यह भी है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की अुनपस्थिती तथा बुनियादी शैक्षणिक ढांचे में बहुत कमी है। आज उच्च गुणंवत्ता वाली शिक्षा के लिये अधिक फीस देनी पड़ती हैजो सामान्य वर्ग के लिये एक सपना होती है। लिहाज़ा एक बहुत बड़ा बच्चों का वर्ग उचित शिक्षा के अभाव में रास्ता भटक जाता है. शिक्षासेवाभाव के दायरे से निकलकर आर्थिक दृष्टी से लाभ कमाने की ओर जा रही  है। जबकी शिक्षकों की जिम्मेदारी तो इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनको  बच्चों के सामने ऐसा आदर्श बनकर प्रस्तुत होना होता हैजिसका अनुसरण करके छात्र/छात्राओं का शैक्षणिक विकास ही नही बल्कि  नैतिक विकास भी हो. देश में प्रतिभावान विद्यार्थियों की कोई कमी नही है जरूरत है उन्हे तराशने और मूल्य आधारित शिक्षा के प्रकाश से आगे बढाने  की.
दैनिक जागरण /आइ नेक्स्ट में 05/09/19 को प्रकाशित 

Tuesday, September 3, 2019

जब मौन बोलता है

आपने कभी सन्नाटे की आवाज सुनी है क्या सुनी तो जरुर होगी पर समझ नहीं पाए होंगे . यूँ तो अधिकता  किसी भी चीज की बुरी होती है, पर  लोग बिना बोले बहुत कुछ कह जाते हैं और कुछ लोग दिन भर बोलने के बाद भी मतलब का कुछ भी नहीं कह  पाते.वो गाना तो आपने भी सुना होगा न बोले तुम न मैंने कुछ कहा,तो भैया ये तो सिद्ध हुआ कि बगैर बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है मगर कैसे बोलने का काम हमारी जबान ही नहीं करती बल्कि आँखों से लेकर पैर तक हमारे सभी अंग बोलते है .दुनिया के बहुत से अभिनेताओं की खासियत यही रही है कि वे अपनी आँखों से बहुत कुछ कह देते हैं. प्रख्यात अभिनेता चार्ली चैपलिन को ही  लेंजिन्होंने अपनी मूक  फिल्मों के माध्यम से सालों तक  लोगों का मनोरंजन किया. कई बार ज्यादा बोलने से शब्द अपना अर्थ खो देते हैं, अरे अब आई लव यू को ही लीजिये. फिल्मों में इस शब्द का इतना इस्तेमाल हुआ की  अब मैं 'रील लाईफ' या 'रीयल लाईफ'  में ये शब्द सुनता हूँ, तो बस बेसाख्ता हंसी आ जाती है.प्यार एक फीलिंग  है उसे एक शब्द में बाँधा या समेटा नहीं जा सकता. वैसे फीलिंग से याद आया. फीलिंग भी आजकल बिजली के बल्ब जैसी हो गयी है अचानक आती है और अचानक चली भी जाती है.जानते हैं ऐसा क्यूँ होता है ?
चलिए मैं समझाता हूँ आपको,हम कुछ भी कहते हैं तो उससे पहले सोचते हैं ये बात अलग है की ये प्रोसेस इतना जल्दी होता है कि हमें पता ही नहीं पड़ता कि जो कुछ हम फटाफट बोले जा रहे हैं वो पहले हमारा दिमाग सोच रहा है. उस सोच को शब्दों का लबादा ओढ़ा कर जब हम फीलिंग के साथ एक्सप्रेस करते हैं तो सुनने वाले पर असर होता है.लेकिन ये जरुरी भी नहीं की हर फीलिंग को एक्सप्रेस करने के लिए आपके पास शब्द हों ही तब क्या किया जाए ? जैसे खीज या फ्रस्टेशन.आप गुस्सा हैं तो चीख चिल्लाकर  आप अपना गुस्सा निकाल सकते  हैं, लेकिन  आप खीजे हुए हैं तो क्या बोलेंगे और जो कुछ भी बोलेंगे उसका मतलब सामने वाला समझेगा भी कि  नहीं,क्या पता और तब काम आता है मौन,मौन यानि साइलेंस.
चुप्पी या सन्नाटा हमेशा कायरता की निशानी नहीं होती है.ये तो भावनाओं की भाषा होती है जो आप शब्दों से नहीं बोल सकते वो आप अपने मौन से बोल सकते हैं. वैसे भी पर्सनाल्टी डेवेलपमेंट के इस युग में हमें बोलना जरुर सीखाया जाता है पर चुप रहना नहीं. वैसे भी जब मौन बोलता है तो उसकी आवाज भले ही देर में सुनायी दे पर बहुत दूर तक सुनायी देती है.हम अपनी लाइफ से जब बोर हो जाते हैं तो अपने आस पास के शोर शराबे से दूर भागने का मन करता है.किसी  से भी बात नहीं  करना चाहते. तो क्या आपने ऐसे समय में भी खुद को  एकांत  में रखा है.
 अगर ऐसे समय में हम कहीं  बिलकुल  शांत जगह पर बैठ जायें तो हम बिना ·कुछ  कहे सुने खुद से ही बातें करने लगते हैं और फिर अपने आप ही हमें हमारी समस्याओं का समाधान सूझने लगता है.प्यार मुहब्बत के किस्सों में तो खामोशी से प्यार पैदा होने की बातें अक्सर होती रहती हैं. एक  बात साफ है कि हम बगैर बोले अपनी फीलिंग्स को एक्सप्रेशन दे सकते हैं  और ऐसे एक्सप्रेशन बहुत ख़ास होते हैं. रिश्तों ·की  गर्माहट तो खामोशियों ·के  दौरान होने वाले संचार से ही समझी जा सकती हैं.किसी ने क्या खूब कहा  कि खामोशियां मुस्कुराने लगी .... तन्हाईयां गुनगुनानी लगीं..
 प्रभात खबर में 03/09/2019 को प्रकाशित 

Monday, September 2, 2019

शौक से ज्यादा एक बीमारी है ये एडिक्शन

अगर आप सोशल मीडिया प्रयोगकर्ता हैं तो आप दिन भर में कई बार ऐसी तस्वीरों से वाबस्ता होंगे जब लोग अजीब अजीब चेहरों के साथ खुद ही अपनी तस्वीरें पोस्ट करते दिखेंगे यह क्रिया अगर आज से ज्यादा नहीं दस साल पहले हो रही होती तो ऐसे लोगों को आप किसी मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह देते पर आज यह एक सामान्य प्रक्रिया है जिसे हम सेल्फी लेना कहते हैं और इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है .समाजशास्त्रीय नजरिये किसी चिंतक ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक ऐसा वक्त आएगा जब इंसान इतना अकेला पड़ जाएगा कि उसे अपनी तस्वीरें खुद ही खींचनी पड़ेंगी इसका एक विश्लेषण यह भी हो सकता है कि ऐसा समाज आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा की और अग्रसर है जब इंसान सिर्फ कहने को एक सामाजिक प्राणी भर बचा है सच यह है कि वह परले दर्जे के एक आत्मकेंद्रित जैविक रूप से मानव  में तब्दील होता जा रहा है .जी हाँ यह सेल्फी युग है और इसकी  एक सबसे बड़ी चुनौती है कि यह लोगों को आत्मकेंद्रित बना  रही है जिसमें स्मार्ट फोन का बड़ा योगदान है हम भले ही हर वक्त दुनिया से जुड़े हों पर अपने आस पास से बेखबर हैं .इसी आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति का एक रूप है सेल्फी” मतलब खुद से अपने आप की तस्वीर लेना .यह प्रयोग ज्यादातर लोग अपने स्मार्ट फोन से करते हैंविचित्र भाब भंगिमा बनाये हुए  लोगों से दुनिया भर की सोशल नेटवर्किंग साईट्स भरी हुई हैं और यह रोग तेजी से फैलता जा रहा है.औसतन दुनिया भर की सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर पचास मिलीयन सेल्फी पोस्ट की चर्चा की जा रही है .सेल्फी शब्द चर्चा में तब आया जब साल 2013 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को वर्ड ऑफ़ दा ईअर के खिताब से नवाजा पर शोध के मुताबिक़ सेल्फी शब्द का प्रयोग साल 2002 में एक ऑस्ट्रेलियन इंटरनेट फोरम में किया गया पर इसके प्रयोग को गति स्मार्ट फोन के बढ़ते इस्तेमाल के बाद मिली पर भारत जैसे देश में सेल्फी इन दिनों एक नकारात्मक वजह से चर्चा में है कंटेंट ट्रैकर साईट प्राईसनोमिक्स के एक शोध के अनुसार दुनिया भर में सेल्फी खींचते वक्त होने वाली मौतों में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है यह शोध इंटरनेट पर साल 2014-15 में रिपोर्ट किये गए आंकड़ों पर आधारित है इस दौरान सारी दुनिया में सेल्फी खींचते कुल छियालीस मौतें हुईं जिसमें अकेले भारत में उन्नीस मौतें हुईं वहीं इसी अवधि में भारत से ज्यादा आबादी वाले देश चीन में सिर्फ एक मौत रिपोर्ट हुई .इन मौतों में मरने वाले व्यक्तियों में से  पचहत्तर प्रतिशत की औसत आयु इक्कीस वर्ष से कम थी  अमेरिकन साइकेट्रिक एसोसिएशन के मुताबिकअगर आप दिन में तीन से ज्यादा सेल्फी लेते हैंतो यकीनन आप मानसिक रूप से बीमार हैं और इस बीमारी को सेल्फीटिस का नाम दिया। वास्तव में यह उस बीमारी का नाम हैजिसमें व्यक्ति पागलपन की हद तक अपनी फोटो लेने लगता है और उसे सोशल मीड़िया पर पोस्ट करने लगता है।टाइम मैगजीन ने सेल्फी स्टिक को साल 2014 का सबसे बढ़िया अविष्‍कार बताया था। अप्रैल 2015 में समाचार एजेंसी पीटीआई की एक खबर के मुताबिक सेल्फी स्टिक का अविष्‍कार 1980 के दशक में हुआ था। यूरोप की यात्रा पर गए एक जापानी फोटोग्राफर ने इस तरकीब को जन्म दिया। वो अपनी पत्नी के साथ किसी भी फोटो में आ ही नहीं पाते थे। एक बार उसने अपना कैमरा किसी बच्चे को दिया और वो लेकर भाग गया। इस दर्द ने एक्सटेंड़र स्टिक का जन्म दियाजिसका साल 1983 में पेटेंट कराया गया और आज के दौर में इसे सेल्फी स्टिक कहा जाने लगा। बार बार सेल्फी लेने से लोग सेल्फी एल्बो जैसी बीमारी से पीड़ित हो सकते है .क्योंकि  – बार सेल्फी लेने से व्यक्ति की कोहनी बार –बार मुडती है जिससे सेल्फी एल्बो होने का खतरा रहता है .
भले ही भारत जैसे विशाल देश  के अनुपात में सेल्फी से होने वाली मौतों का आंकड़ा अन्य दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों से काफी कम है पर यह आंकड़ा कई सवाल खड़े करता है कि अब वक्त आ गया है जब स्मार्ट फोन हमारे समाजीकरण का अहम् हिस्सा बन चुके हैं तो इनके प्रयोग का मानकीकरण किया जाए और लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जाए कि तकनीक का आविष्कार मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हुआ है न कि उसे और जटिल बनाने के लिएसंकट इसलिए भी गहरा है क्योंकि  स्मार्ट फोन का ज्यादा इस्तेमाल युवा पीढी कर रही है जो इसके   प्रथम उपभोक्ता भी  हैं और उन्हें इसके इस्तेमाल का कोई तरीका विरासत में नहीं मिला है और परिणाम ज्यादा सेल्फी लेने का शौक और कुछ अनूठा करने के चक्कर में उससे होने वाली दुर्घटना.मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं ज्यादा सेल्फी लेना मनोविकार का लक्षण हैं जिसमें व्यक्ति आत्मुघद्ता का शिकार रहता हैमनोचिकित्सकों ने सेल्फियो को तीन भागों में बांटा है। दिन भर में तीन सेल्फी लेना और उसे सोशल मीडिया में पोस्ट न करना। इसे बॉर्डर लाइन सेल्फीटिस कहा गया है। दूसरे स्टेज पर एक्यूट आते हैंजो उतनी तस्वीरें खींच सोशल मीडिया पर डालते हैं। तीसरे पर क्रोनिक आते हैं। यह प्रक्रिया छह बार से भी अधिक करते हैं।  स्मार्ट फोन लोगों को जोड़ने के लिए है न कि लोगों से कट कर अपने में सिमटे रहने के लिए .मी ,माई और आई फोन जैसी सोच हमें आत्मकेंद्रित बना कर सामूहिकता से काटती है जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं है . हम पर हावी होता यह मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा भविष्य छोड़ जाएगा इसका फैसला होना बाकी है .
दैनिक जागरण /आईनेक्स्ट में 02/09/2019 को प्रकाशित 

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Tuesday, August 27, 2019

लोगों को मानसिक बीमारियाँ देता इंटरनेट


इंटरनेट  ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो लीअब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है। कई देशों के न्यूरो वैज्ञानिक व मनोवैज्ञानिकलोगों पर इंटरनेट और डिजिटल डिवाइस से लंबे समय तक पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। मुख्य रूप से इन शोधों का केंद्र युवा पीढ़ी पर नई तकनीक के संभावित प्रभाव की ओर झुका हुआ हैक्योंकि वे ही इस तकनीक के पहले और सबसे बड़े उपभोक्ता बन रहे हैं। यह चर्चा भी देश भर में आम है कि स्मार्टफोन व इंटरनेट लोगों को व्यसनी बना रहा है। कहा जाता है कि मानव सभ्यता शायद पहली बार एक ऐसे नशे से सामना कर रही हैजो न खाया जा सकता हैन पिया जा सकता हैऔर न ही सूंघा जा सकता है। चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर के एक अध्ययन के मुताबिकइंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलाव पैदा कर सकती है। वी आर सोशल की डिजिटल सोशल ऐंड मोबाइल 2015 रिपोर्ट के मुताबिकभारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं के आंकड़े काफी कुछ कहते हैं। इसके अनुसारएक भारतीय औसतन पांच घंटे चार मिनट कंप्यूटर या टैबलेट पर इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। इंटरनेट पर एक घंटा 58 मिनटसोशल मीडिया पर दो घंटे 31 मिनट के अलावा इनके मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल की औसत दैनिक अवधि है दो घंटे 24 मिनट। इसी का नतीजा हैं तरह-तरह की नई मानसिक समस्याएं- जैसे फोमोयानी फियर ऑफ मिसिंग आउटसोशल मीडिया पर अकेले हो जाने का डर। इसी तरह फैडयानी फेसबुक एडिक्शन डिसऑर्डर। इसमें एक शख्स लगातार अपनी तस्वीरें पोस्ट करता है और दोस्तों की पोस्ट का इंतजार करता रहता है। एक अन्य रोग में रोगी पांच घंटे से ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में ही नष्ट कर देता है। इस वक्त भारत में 97.8 करोड़ मोबाइल और 14 करोड़ स्मार्टफोन कनेक्शन हैंजिनमें से 24.3 करोड़  इंटरनेट पर सक्रिय हैं और 11.8 करोड़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। 
लोगों में डिजिटल तकनीक के प्रयोग करने की वजह बदल रही है। शहर फैल रहे हैं और इंसान पाने में सिमट रहा है।नतीजतनहमेशा लोगों से जुड़े रहने की चाह उसे साइबर जंगल की एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैजहां भटकने का खतरा लगातार बना रहता है। भारत जैसे देश में समस्या यह है कि यहां तकनीक पहले आ रही है,और उनके प्रयोग के मानक बाद में गढ़े जा रहे हैं। कैस्परस्की लैब द्वारा इस वर्ष किए गए एक शोध में पाया गया है कि करीब 73 फीसदी युवा डिजिटल लत के शिकार हैंजो किसी न किसी इंटरनेट प्लेटफॉर्म से अपने आप को जोड़े रहते हैं। वर्चुअल दुनिया में खोए रहने वाले के लिए सब कुछ लाइक्स व कमेंट से तय होता है। वास्तविक जिंदगी की असली समस्याओं से वे भागना चाहते हैं और इस चक्कर में वे इंटरनेट पर ज्यादा समय बिताने लगते हैंजिसमें चैटिंग और ऑनलाइन गेम खेलना शामिल हैं। और जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलतातो उन्हें बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है। इससे निपटने का एक तरीका यह है कि चीन से सबक लेते हुए भारत में डिजिटल डीटॉक्स यानी नशामुक्ति केंद्र खोले जाएं और इस विषय पर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता फैलाई जाए। 
साल 2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया द्वारा किए गए रिसर्च में यह निष्कर्ष निकाला गया था की युवा पीढ़ी किसी भी सूचना को याद करने का तरीका बदल रही हैक्योंकि वह आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है। वे कुछ ही तथ्यों को याद रखते हैंबाकी के लिए इंटरनेट का सहारा लेते हैं। इसे गूगल इफेक्ट या गूगल-प्रभाव कहा जाता है।
इसी दिशा में कैस्परस्की लैब ने साल 2015 में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट से सभी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर शोध किया है। कैस्परस्की लैब ने ऐसे छह हजार लोगों की गणना कीजिनकी उम्र 16-55 साल तक थी। यह शोध कई देशों में जिसमें ब्रिटेनफ्रांसजर्मनी,इटलीस्पेन आदि देशों के 1,000 लोगों पर फरवरी 2015 में ऑनलाइन किया गया। शोध में यह पता चला की गूगल-प्रभाव केवल ऑनलाइन तथ्यों तक सीमित न रहकर उससे कई गुना आगे हमारी महत्वपूर्ण व्यक्तिगत सूचनाओं को याद रखने के तरीके तक पहुंच गया है। शोध बताता है कि इंटरनेट हमें भुलक्कड़ बना रहा हैज्यादातर युवा उपभोक्ताओं के लिएजो कि कनेक्टेड डिवाइसों का प्रयोग करते हैंइंटरनेट न केवल ज्ञान का प्राथमिक स्रोत हैबल्कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षित करने का भी मुख्य स्रोत बन चुका है।
इसे कैस्परस्की लैब ने डिजिटल एम्नेशिया का नाम दिया है। यानी अपनी जरूरत की सभी जानकारियों को भूलने की क्षमता के कारण किसी का डिजिटल डिवाइसों पर ज्यादा भरोसा करना कि वह आपके लिए सभी जानकारियों को एकत्रित कर सुरक्षित कर लेगा। 16 से 34 की उम्र वाले व्यक्तियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने माना कि अपनी सारी जरूरत की जानकारी को याद रखने के लिए वे अपने स्मार्टफोन का उपयोग करते है। इस शोध के निष्कर्ष से यह भी पता चला कि अधिकांश डिजिटल उपभोक्ता अपने महत्वपूर्ण कांटेक्ट नंबर याद नहीं रख पाते हैं।
एक यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल एम्नेशिया लगभग सभी उम्र के लोगों में फैला है और ये महिलाओं और पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है। ज्यादा प्रयोग के कारण डिजिटल डिवाइस से हमारा एक मानवीय रिश्ता सा बन गया हैपर तकनीक पर अधिक निर्भरता हमें मानसिक रूप से पंगु भी बना सकती है। इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही किया जाए।

 दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 27/08/19 को प्रकाशित 

Wednesday, August 21, 2019

फोटो और वीडियो से भरी नेट की दुनिया चाहे चेंज



स्मार्ट फोन ने देश में इंटरनेट प्रयोग के मानक जरूर बदले हैं पर वहां भी वीडियो और तस्वीरों की ही सामाज्य  है . इसमें यू-ट्यूब और फेसबुक लाइव जैसे फीचर बहुत लोकप्रिय हुए हैं. जिसका नतीजा अक्सर  इंटरनेट को वीडियो का ही माध्यम समझ लिया जाता है और आवाज  को नजरंदाज कर दियागया है। भारत में अगर आप अपने विचार अपनी आवाज के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना चाहते हैंतो आपको इंटरनेट पर खासी मेहनत करनी पड़ेगी। व्यवसाय के रूप में जहां इन्स्टाग्राम  वीडियो,फेसबुक वाच यू-ट्यूब के सैकड़ों वीडियो चैनल देश में काफी लोकप्रिय हैंवहीं आवाज  का माध्यम अभी भी जड़ें जमा नहीं पाया हैजबकि बाकी दुनिया में इंटरनेट पर ऑडियो का चलन जिसे पोडकास्ट कहा जाता है , काफी तेजी से बढ़ रहा है।इंटरनेट पर ऑडियो फाइल को साझा  करना पॉडकास्ट के नाम से जानाजाता है। पॉडकास्ट दो शब्दों के मिलन  से  बना हैजिसमें पहला हैं प्लेयेबल ऑन डिमांड (पॉड) और दूसरा ब्रॉडकास्ट । नीमन लैब के एक शोध  के अनुसारवर्ष 2016 में अमेरिका में पॉडकास्ट (इंटरनेट पर ध्वनि के माध्यम से विचार या सूचना देना) के प्रयोगकर्ताओं यानी श्रोताओं की संख्या में काफी  तेजी से वृद्धि हुई  है. जिसके  वर्ष 2020 तक लगातार पच्चीस  प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की उम्मीद है। इस वृद्धि दर से वर्ष 2020 तक पॉडकास्टिंग से होने वाली आमदनी पांच सौ मिलियन डॉलर के करीब पहुंच जाएगी। पॉडकास्टिंग की शुरुआत हालांकि एक छोटे माध्यम के रूप में हुई थीपर अब यह एक संपूर्ण डिजिटल उद्योग का रूप धारण करता जा रहा है। अमेरिका की सबसे बड़ी पॉडकास्टिंग कंपनी एनपीआर की सालाना आमदनी लगभग दस मिलियन डॉलर के करीब है.
भारत में पॉडकास्टिंग के जड़ें न जमा पाने के कारण हैं ध्वनि के रूप में सिर्फ फिल्मी गाने सुनने की परंपरा  और श्रव्य की अन्य विधाओं से परिचित ही नहीं हो पाना रहा है ।देश में आवाज के माध्यम के रूप में रेडियो ने टीवी के आगमन से पहले अपनी जड़ें जमा ली थीं पर भारत में रेडियो सिर्फ म्यूजिक रेडियो का पर्याय बनकर रह गया और टाक रेडियो में बदल नहीं पाया है . तथ्य यह भी है कि सांस्कृतिक रूप से एक आम भारतीय का सामाजीकरण  सिर्फ फ़िल्मी गाने और क्रिकेट कमेंट्री सुनते हुए होता है जिसकी परम्परा पारंपरिक रेडियो से शुरू होकर निजी ऍफ़ एम् स्टेशन होते हुए इंटरनेट की दुनिया तक पहुँची है .
निजी ऍफ़ एम् प्रसारण के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि यह परिद्रश्य बदलेगा जैसे निजी टेलीविजन समाचार चैनलों के आने से देश में समाचारों को परोसने का तरीका एकदम से बदल गया पर निजी ऍफ़ एम् स्टेशन पर समाचारों की रोक के कारण एकबार फिर देश म्यूजिक रेडियो की राह पर निकल पड़ा ,जहाँ दिन रात संगीत परोसा जा रहा है और विचारों की कहीं कोई जगह नहीं है .जबकि पॉडकास्टिंग को मीडिया के श्रव्य विकल्प के रूप में देखने की आवश्यकता है. भारत जैसे देशों मेंजहां इंटरनेट की स्पीड काफी धीमी होती हैवीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकतीहै।उल्लेखनीय है कि इंटरनेट पर ध्वनि रूप में अपने विचार प्रसारित करने की कोई रोक नहीं है पर फिर भी ज्यादातर निजी ऍफ़ एम् स्टेशन विभिन्न सोशल मीडिया प्लेट फॉर्म पर या तो गाने सुना रहे हैं या फिर मजाकिया वीडियो बनाकर अपना श्रोता आधार बढ़ा रहे हैं . सरकार ने सिर्फ रेडियो समाचारों के प्रसारणों पर रोक लगाई है आप जो रेडियो पर नहीं कह पा रहे हैं तो उसके लिए  इंटरनेट   को जरिया बनाया जा सकता है पर यहाँ  एक खतरा है .इंटरनेट  पर कुछ कहने के लिए विचार होने चाहिए और निजी एफएम के  रेडियो जॉकी या तो विचार शून्यता  के  शिकार हैं या  वे यथास्थिति से संतुष्ट हैं .तर्क यह भी दिया जाता है कि निजी रेडियो संस्थान किसी भी मुद्दे पर अपने फेसबुक पेज से किसी वैचारिक विमर्श की इजाजत नहीं देते  हैं . पोडकास्ट किसी भी विचार या विषय पर किया जा सकता है जो राजनीति से लेकर खेल और कारोबार से लेकर फैशन जैसे अनगिनत मुद्दों से जुड़ा हो सकता है.भारत जैसे भाषाई विविधता वाले देश में जहाँ निरक्षरता अभी भी मौजूद है . पॉडकास्ट लोगों तक उनकी ही भाषा में संचार करने का एक सस्ता और आसान विकल्प हो सकता है .प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात कार्यक्रम का पॉडकास्ट काफी लोकप्रिय है . पॉडकास्ट की सबसे बड़ी खूबी है इसकी ग्लोबल रीच यानि अगर आप कुछ ऐसा सुना रहे हैं जो लोग सुनने चाहते हैं तो किसी चैनल के लोकप्रिय होते देर नहीं लगेगी .
इस वक्त भारत में दो प्रमुख पॉडकास्ट सेवाएं नियमित रूप से प्रसारित की जा रही हैंजिनमें इंडसवॉक्स और ऑडियोमैटिक काफी लोकप्रिय हैंपर ये भारतीय भाषाओं में नहीं हैं। ऑडियोमैटिक ने अपनी शुरुआत के एक साल में एक लाख नियमित श्रोता जुटा लिए हैं। इंडसवॉक्स म्यूजिक स्ट्रीमिंग साइट सावन  पर उपलब्ध है। स्मार्टफोन की उपलब्धता के अनुपात में इनके श्रोता अभी काफी कम हैं। भारत के सन्दर्भ  में एक बात तय मानी जाती है कि पॉडकास्टिंग यहां विज्ञापन आधारित ही होगी। कुछ भी मनपसंद सुनने के लिए पैसे खर्च करने की परंपरा देश में फिलहाल  नहीं है. इन कंपनियों के लिए पॉडकास्टिंग एक ज्यादा अच्छा विकल्प हो सकती है। गूगल ने भारत में पॉडकास्ट में संभावनाएं देखते हुए पॉडकास्ट क्रियेटर प्रोग्राम शुरू किया है जिसमें चुने हुए लोगों को पॉडकास्ट की आवश्यक ट्रेनिंग के अलावा वित्तीय मदद भी दी जायेगी .पिछले साल गूगल ने अपना एंडरायड एप भी प्ले स्टोर पर लांच किया है .भारत जैसे देश में ध्वनि  व्यवसाय के लिएसंभावनाएं कितनी हैंइसका अंदाजा इस बात से लग सकता है कि देश में भले ध्वनि समाचारों के लिए आकाशवाणी का एकाधिकार है .सरकार इस एकाधिकार को निकट भविष्य में प्राइवेट रेडियो ऍफ़ एम् के साथ साझा करने के मूड में नहीं दिखती ऐसे में रेडियो का विचार क्षेत्र व्यवसाय के रूप में एकदमखाली पड़ा है .पॉडकास्ट उस खालीपन को भरकर देश के ध्वनि उद्योग में क्रांति कर सकता है और रेडियो संचारकों को अपनी बात नए तरीके से कहने का विकल्प दे सकती है .
दैनिक जागरण /आई नेक्स्ट में 21/08/19 को प्रकाशित 



Wednesday, August 14, 2019

पाइरेसी के शिकंजे में कसी वेब की दुनिया

भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत में लोग ब्रांडेड कंप्यूटर खरीदने  की बजाय उसे एसेम्बल करवाना ज्यादा पसंद करते थे और ज्यादातर कंप्यूटर सोफ्टवेयर पाइरेटेड होते थे .तब इंटरनेट ब्रोड्बैंड की बजाय डायल अप हुआ करता था और दुनिया इतनी सिमटी नहीं थी .कंप्यूटर सीडी पर महज गाने सुनने और फ़िल्में देखने का माध्यम भर हुआ करता था क्योंकि इंटरनेट पर आज जैसी इतनी सुविधाएं नहीं थी और न ही मोबाईल क्रांति हुई थी .इसका सबसे बड़ा फायदा पाईरेसी करने वाले लोगों ने उठाया और पाइरेटेड सीडी और डीवीडी का बाजार तेजी से फलने फूलने लग गया .तकनीक की ज्यादा भारतीयों को न होने के कारण लोगों ने पाइरेसी से उपलब्ध सामग्री का खूब लुत्फ़ उठाया .
धीरे धीरे तकनीक ने पैठ बनाई और लोग भी जागरूक हुए वहीं सोफ्टवेयर निर्माताओं ने भी जेनुइन सॉफ्टवेयर खरीदने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए अपने सोफ्टवेयर की कीमतें कम कीं एंटी पाइरेसी तकनीक बनाने वाली कम्पनी मूसो के एक शोध के मुताबिक सारी दुनिया में पाइरेसी साईट पर जाने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले छ प्रतिशत की गिरावट आयी है .इसका एक कारण नेटफ्लिक्स जैसी वीडियो कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाईट का आना भी है जो दुनिया के चार देशों को छोड़कर हर जगह अपनी सेवाएँ दे रही हैं और दूसरा हॉट स्टार,अमेजन प्राईम  जैसे वीडियो एप की सफलता है इंटरनेट के विस्तार के साथ ही इसका व्यवसायिक पक्ष भी विकसित होना शुरू हो गया.प्रारंभ में इसका विस्तार विकसित देशों के पक्ष में ज्यादा पर जैसे जैसे तकनीक विकास होता गया इंटरनेट ने विकासशील देशों की और रुख करना शुरू किया और नयी नयी सेवाएँ इससे जुडती चली गयीं  .इंटरनेट ने उम्र का एक चक्र पूरा कर लिया है। इसकी खूबियों और इसकी उपयोगिता की चर्चा तो बहुत हो लीअब इसके दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान जाने लगा है. 
सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्मसंगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है .मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के डुप्लीकेट रिप्रोडक्शन  से है जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है .इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है जिससे मुनाफा बढ़ा है .भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है .पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर टोरेंट वेबसाईट पर विश्वव्यापी रोक लगने से अब भारत में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं .ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं .सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है .ऑडियो वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है .यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं मुसो की ही रिपोर्ट के मुताबिक पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है जिसका कुल पाइरेसी में योगदान लगभग बत्तीस   दशमलव पांच प्रतिशत है दूसरे नम्बर पर पब्लिक टोरेंट उसके बाद वेब डाउनलोड ,प्राइवेट टोरेंट और स्ट्रीम रिपर्स शामिल हैं .बढ़ते स्मार्टफोन ने इंटरनेट का इस्तेमाल डेस्कटॉप से फोन केन्द्रित कर दिया है जो ज्यादा व्यक्तिगत माध्यम है और पाइरेटेड सामाग्री फोन पर डाउनलोड करने से वायरस के आ जाने के खतरे बढे हैं और लोग भी अब जागरूक हुए हैं .वे अब यह समझने लग गए हैं कि जरा से फायदे के चक्कर में अपने फोन की कई व्यक्तिगत गोपनीय जानकारी किसी हैकर को सौंपने को तैयार नहीं होते हैं .
भारत जैसे देश जो पाइरेसी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं वहां नेट की उपलब्धता का विस्तार पाइरेसी की समस्या को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं कर सकता पर कम जरुर करेगा क्योंकि भारत में डेस्कटॉप के मुकाबले स्मार्टफोन की संख्या लगातार बढ़ रही है .रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व में ऑनलाइन पाइरेसी शामिल चौसठ प्रतिशत लोग डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से  पाइरेसी साईट पर जाते हैं वहीं मोबाईल फोन से इन साईट्स पर जाने वाले लोगों की संख्या मात्र पैंतीस प्रतिशत है .
दैनिक जागरण /आईनेक्स्ट में 14/08/2019 को प्रकाशित 

Friday, August 9, 2019

इंटरनेट और निजता का मुद्दा

सोशल मीडिया पर आने से जिस तथ्य को हम नजरंदाज करते हैं वह है हमारी निजता का मुद्दा और हमारे दी जाने वाली जानकारी.जब भी हम किसी सोशल मीडिया से जुड़ते हैं हम अपना नाम पता फोन नम्बर ई मेल उस कम्पनी को दे देते है.असल समस्या यहीं से शुरू होती है .  इस तरह देश के सभी नागरिकों का आंकड़ा संग्रहण कर लिया गया .उधर इंटरनेट के फैलाव  के साथ आंकड़े बहुत महत्वपूर्ण हो उठें .लोगों के बारे में सम्पूर्ण जानकारियां को एकत्र करके बेचा जाना एक व्यवसाय बन चुका है और  इनकी कोई भी कीमत चुकाने के लिए लोग तैयार बैठे हैं .कई बार एक गलती  किसी कंपनी की उस लोकप्रियता  पर भारी पड़ जाती है जो उसने एक लंबे समय में अर्जित की होती है. पिछले साल  पहले कैंब्रिज एनालिटिका मामला सोशल नेटवर्किंग साईट  फेसबुक के लिए ऐसा ही रहा. इस कंपनी पर आरोप है कि इसने अवैध तरीके से फेसबुक के करोड़ों यूजरों का डेटा हासिल किया और इस जानकारी का इस्तेमाल अलग-अलग देशों के चुनावों को प्रभावित करने में किया. इनमें 2016 में हुआ अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भी शामिल  है. पिछले दिनों यह समाचार सुर्ख़ियों में रहा जिसमें यह खबर आई कियूएस फेडरल ट्रेड कमिशन (एफटीसी)सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक से बिलियन डॉलर यानी 35 हजार करोड़ रुपये वसूलने वाला है। यह जुर्माना किसी सोशल मीडिया कंपनी पर अब तक का लगने वाला सबसे बड़ा जुर्माना है। इससे पहले साल 2012 में गूगल पर भी 22 मिलियन डॉलर (154 करोड़ रुपये) का जुर्माना लग चुका है। एफटीसी ने निजता का उल्लंघन और यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल करने के लिए फेसबुक पर जुर्माना लगाने जा रहा है।  निजता से जुड़ा यह मामला भले ही अमेरिका का हो पर इसकी गूंज भारत में सुनाई दी |अभी यह मामला चल ही रहा था तो एक और खबर ने दुनिया में हलचल मचा दी कि न्यूज वेबसाइट ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अमेजनएपल व गूगल के कर्मचारी स्मार्ट स्पीकर और वॉयस असिस्टेंट एप के जरिए ग्राहकों की बातें सुन रहे हैं। हालांकि इन कंपनियों का दावा है कि वे अपना प्रोडक्ट अपडेट करने के लिए बातें रिकॉर्ड करते हैं।
अमेजन की टीम हाल ही लॉन्च एलेक्सा व ईको स्पीकर की वॉयस की रिकॉर्डिंग भी करती है। उसका कहना है कि ऐसा वे ग्राहकों की मंजूरी लेकर ही करते हैंताकि भाषा व उनके कमांड को ज्यादा बेहतर बना सकें। भारत में अभी आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस से लैस स्मार्ट स्पीकर में अमेजन का एलेक्सागूगल का असिस्टेंट व एपल का सीरी शामिल है। हाल में अमेजन एलेक्सा ने पोर्टलैंड की महिला व उनके पति की निजी बातें रिकॉर्ड की और पति के दोस्त को  भेज दी। महिला ने शिकायत की तो कंपनी ने जांच के बाद माफी मांगी।
दोनों ही मामले लोगों के डेटा और उनके निजता से जुड़े हुए हैं पर अपनी निजता के प्रति जैसी संवेदनशीलता अमेरिका और यूरोप के देशों में दिखती है |भारत के लोग उससे बेखबर हैं |मोबाईल क्रांति ने लोगों के हाथ में ऐसा यंत्र दे दिया जिससे कुछ भी निजी नहीं रह गया है |आप जैसे ही अपने मोबाईल को इंटरनेट से जोड़ते हैं |आपका कुछ भी निजी नहीं रहा जाता यह अलग बात है कि गूगल जैसी कम्पनियां बार –बार यह दावा करती हैं कि वे लोगों की निजता का ख्याल रखती हैं और उनके डेटा को किसी भी थर्ड पार्टी के साथ शेयर न किया जाता है |लेकिन तथ्य यह भी है किकिसी भी ऑनलाइन कम्पनी का विज्ञापन कारोबार तभी तेजी से बढेगा जब उसके पास ग्राहकों की गोपनीय जानकारी हो जिससे वह उनके शौक रूचि आदतों के हिसाब से विज्ञापन दिखा सकेगी वहीं साईबर अपराधियों की निगाह भी ऐसे आंकड़ों पर रहती है,पर ऐसी घटनाएँ न हों और अगर हों तो दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही हो ऐसा कोई भी प्रावधान अभी तक भारतीय संविधान मे नहीं किया गया है .अभी तक ऐसे किसी मामले को निजता के अधिकार के  हनन के तहत देखा जाता है .नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है. किसी नागरिक की आधार सूचना हो या कोई अन्य किस्म की डिजीटल सूचना- उन पर सेंध लगाने की कोशिश  अंततः नागरिक गरिमा ही नहींराष्ट्रीय संप्रभुता को भी ठेस पहुंचाएगी. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित समिति ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल का ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंप दिया है .इस बिल में “निजी” शब्द को परिभाषित किया गया है.इसके अतिरिक्त इसमें सम्वेदनशील निजी डाटा को बारह  भागों में विभाजित किया गया है.जिसमें पासवर्ड,वित्तीय डाटा,स्वास्थ्य डाटा,अधिकारिक नियोक्ता,सेक्स जीवन,जाति/जनजाति,धार्मिक ,राजनैतिक संबद्धता जैसे क्षेत्र जोड़े गए हैं.इस बिल को अगर संसद बगैर किसी संशोधन के पास कर देती है तो देश के प्रत्येक नागरिक को अपने डाटा पर चार तरह के अधिकार मिल जायेंगे .जिनमें पुष्टिकरण और पहुँच का अधिकारडाटा को सही करने का अधिकारडाटा पोर्टेबिलिटी और डाटा को बिसरा देने जैसे अधिकार शामिल हैं .इस समिति की  रिपोर्ट के अनुसार यदि इस बिल का कहीं उल्लंघन होता है तो सभी कम्पनियों और सरकार को स्पष्ट रूप से उन व्यक्तियों को सूचित करना होगा जिनके डाटा की चोरी या लीक हुई है कि चोरी या लीक हुए डाटा की प्रकृति क्या है ,उससे कितने लोग प्रभावित होंगे ,उस चोरी या लीक के क्या परिणाम हो सकते हैं और प्रभावित लोग जिनके डाटा चोरी या लीक हुए हैं वे क्या करें .ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति का डाटा चोरी या लीक हुआ है वह उस कम्पनी से क्षतिपूर्ति की मांग भी कर सकता है .फिलहाल यह बिल संसद की मंजूरी के इन्तजार में है,लेकिन सिर्फ़ कानून के बन जाने से सबकुछ ठीक हो जाएऐसा संभव नहीं है. इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना होगा. इस कानून का उद्देश्य  आम लोगों को यह जानकारी देना है कि आपका डाटा कौन ले रहा है और उसका इस्तेमाल कौन कर रहा है.क़ानून के तहत लोगों का निजी डेटा केवल पहले से बताए गए उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा. कंपनियों को यह बताना होगा कि वो डेटा की जानकारी कैसे और क्यों ले रहे हैं. कंपनियों को यूज़र्स का डेटा सुरक्षित करने की ज़रूरत है और अगर उनका डेटा लीक होता है तो उन्हें बताना होगा कि यह उनके लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है.भारत ने इस दिशा में काफी देर से ही एक सार्थक कदम उठाया है .इसके साथ ही लोगों को भी सोशल मीडिया के प्रयोग करते वक्त सावधानी बरतनी होगी कि उन्हें कितनी जानकारी लोगों को देनी है .वक्त बे वक्त चेक इन्स की जानकारी हो या घर से दूर छुट्टियाँ मनाने का मामला ,हमें यह बात हमेशा जहन में रखनी होगी इंटरनेट पर कुछ भी गोपनीय नहीं है .
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 09/08/2019 को प्रकाशित 

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