Thursday, December 30, 2010

For happier times

प्रिय मित्र साल २०११
आखिर तुम आ ही गए और मेरे जाने का वक्त आ ही गया पर चलने से पहले कुछ बातें तुम से बाँट लूँ वैसे तुम आते ही व्यस्त हो जाओगे खुशियाँ मानाने में तो मैंने सोचा चलने से पहले एक चिट्ठी तुम्हारे लिए लिख दूँ मित्र मैंने एक साल में जीवन के कई रंग देखे कुछ अच्छे थे कुछ बुरे कई जगह मुझे इस बात का पछतावा हुआ कि मैं बेहतर कर सकता था पर चीजें देर से समझ में आयीं अब देखो न ये ३ जी स्पेक्ट्रम अगर आ गया होता तो कमुनिकेसन कितना फास्ट हो गया होता लेकिन मेरे रहते तो ये हो न सका वैसे जब भी हम कोई नया काम सम्हालते हैं तो लोगों से हमें बहुत उम्मीदें रहती हैं और हमें लगता है कि ये खुशियाँ ऐसी ही रहेंगी पर वास्तव में ऐसा होता नहीं जब मैं आया था तो लोगों ने खूब खुशियाँ मनाई और मैंने भी इनका खूब आनंद लिया लेकिन धीरे धीरे खुशियाँ कम हुईं और लोगों की अपेक्षाएं बढ़ने लगीं मैं कुछ पूरी कर पाया और कुछ नहीं शिक्षा और बुनियादी ढाँचे पर काम हुआ लोग डेवलपमेंट इस्सुएस पर अवेयर हुए .महिला आरक्षण पर हम लोग एक कदम आगे बढे पर अभी मंजिल नहीं मिली .जो काम मैंने शुरू किया उसे तुम्हें आगे बढ़ाना है हमारा देश यूथ के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा देश है आज का यूथ ज्यादा स्मार्ट और अवेयर है पर उसकी एनर्जी को सही डायरेक्सन देने की जरुरत है इसका अगर ख्याल रहोगे तो परेशानी कम होगी .
तुम जब आओगे तो खूब खुशियाँ मनाओगे ठीक भी है पर ये मत भूल जाना कि ये साल तुम्हारे लिए अवसर भी लाएगा और चुनोतियाँ भी अगर चुनोतियों को अवसर में बदल लोगे तो तुम्हारी जय  होगी फ़ूड सिक्यूरिटी और हेल्थ इन्सुरेंस पर लोगों को तुमसे बहुत उम्मीदें हैं अगर ऐसा हो पाया तो देश में कोई भूख से नहीं मरेगा और बीमार होने पर अच्छी देखभाल होगी .जब मैं छोटा था तो मुझे लगता था कि मैं सही हूँ और जो बड़े लोग कहते हैं वो सही नहीं है  या शायद वे  मुझे समझते नहीं पर उम्र के इस मुकाम पर आकार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं गलत था जो भी मुझसे बड़े मेरे लिए कहते थे वो सही थे पर मेरे पास अनुभवों को वो खजाना नहीं था कि मैं उनकी बातों को समझ सकूँ हो सकता तुम्हें मेरी बातें समझ में न आ रही हों या बुरी लग रही  हों पर दोस्त जब जिंदगी सिखाती है तो अच्छा ही सिखाती है अब ये तुम्हारे ऊपर है तुम मेरी बात को ठोकर खा कर  समझो या पहले से ही जान लो कहाँ सम्हल कर चलना है ,मैंने अपनी जिंदगी में यही सीखा है लोगों को साथ ले कर चलो सुनो सबकी इस छोटे से जीवन में मुझे लगता है कमसे कम ये काम तो हम कर ही सकते हैं खुशियों को सर पर न चढ़ने दें आखिर एक दिन तुम्हें भी जाना है तो सकारात्मक सोच के साथ काम करोगे तो ठीक रहेगा इस बार अयोध्या का फैसला मेरे लिए बड़े तनाव का वक्त था पर मैंने सोचा कि इस बार बहुत से चीजें बदल चुकी हैं हम आगे बढ़ चुके हैं बस इस सोच के साथ मैं आगे बढ़ता रहा और सब शांति से बीत गया दुनिया तो बहुत तेजी से बदल रही है कल मैं नया था आज पुराना हो गया हूँ ऐसा तुम्हारे साथ भी होगा इस लिए ये अपने आने वाले कल को सोच कर अपना आज मत खराब मत कर लेना अगर कुछ गलत हो भी जाए तो उसे इस सोच के साथ एक्स्सेपट करना कि चलो कुछ तजुर्बा ही हुआ जिसे तुम आगे आने वाली पीढ़ी को बता सको .हमारी सभ्यता इसी तरह विकसित हुई है और आगे भी होती रहेगी .तुम आ रहे हो और मैं जारहा हूँ मैं इस आने जाने के प्रोसेस को नोर्मल्ली ले रहा हूँ तुम अगर आने वाले वक्त को इस तरह लोगे तो अपनी एनर्जी का सही इस्तेमाल कर पाओगे.तुम्हें ये पत्र लिखना तो सिर्फ एक बहाना था जिसे मैं तुमसे अपनी बात कह सकूँ क्योंकि बात से बात चलती है तो अंत में इस बात को हमेशा ध्यान रखना लोगों की बात सुनते रहना और अपनी बात रखते चलना ये प्रोसेस बन्द मत करना मैं थोडा बहुत अगर सफल रहा तो यही कारण था कि मैंने हमेशा लोगों को सुना.इस उम्मीद के साथ मैं चलता हूँ कि आने वाले साल में तुम खुद भी खुश रहोगे और लोगों को खुश रखोगे
अलविदा
बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ
तुम्हारा दोस्त
२०१०
आई नेक्स्ट में ३० दिसंबर २०१० को प्रकाशित 

Sunday, December 26, 2010

उम्मीदें बढ़ाने वाले वर्ष का खबरनामा


साल २०१० जा रहा है लेकिन मीडिया के लिए ये वर्ष कई मायनों में अनोखा रहा कई मुद्दों पर मीडिया को अपनी पीठ थपथपाने का मौका भी मिला तो कुछ मौकों पर उसकी विश्वसनीयता पर संकट भी उठता दिखा एक तरफ राष्ट्र मंडल खेल , आदर्श सोसायटी भूआवंटन घोटालों को सबकी नज़र में लाने का श्रेय उसे मिला वहीं साल के अंत में २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नीरा राडिया के साथ लोब्ब्यिंग के खेल में कई दिग्गज मीडिया हस्तियों के सामने आने के बाद मीडिया को भी शर्मसार होना पड़ा लेकिन तथ्य यह भी है कि मीडिया से जुड़े कई लोगों के नाम होने के बावजूद इतने बड़े घोटाले को बेनकाब करने का श्रेय भी मीडिया को ही जाता है इस व्यवसाय में बढ़ती प्रर्तिस्पर्धा का उजला पक्ष यही रहा कि खबर दबाई नहीं जा सकती .अयोध्या विवाद में समाचार पत्रों और चैनलों ने जिस जिम्मेदारी का परिचय दिया वो ये बताता है कि हमारा मीडिया धीरे धीरे ही सही पर परिपक्व हो रहा है .मीडिया एक विषय के रूप में लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बिंदु बना और हर समस्या में मीडिया की भूमिका को भी देखा जाने लग गया शायद यही कारण रहा कि पहली बार भारतीय सिनेमा में मीडियाको केंद्र में रखते हुए फिल्मों का निर्माण पहली बार  हुआ
 की  को केंद्र बिंदु रखते हुए फ़िल्में बनीं ,रण जहाँ मीडिया के परदे के पीछे की हलचलों और मीडिया के पूंजी उन्मुखी होते रुख की बात करती है वहीं पीपली लाइव किसान और पत्रकार दोनों के दर्द को सामने लाती है विज्ञापनों की बात करें तो वर्ष २०१० को इंडियन रेलवे और आईडिया जैसे नवाचारी विज्ञापनों के लिए याद किया जाएगा .भारतीय  रेल का विज्ञापन जिसमे कई लोग एक कड़ी के रूप में जुड़ते है काफी प्रभावशाली रहा देश का मेल इंडियन रेल जैसी टैग लाइन के साथ इंडियन रेलवे के नेटवर्क को बखूबी दिखाया गया कैडबरी का शुभ् आरम्भ भी लोगों द्वारा खूब पसंद किया गया .एक नयी प्रवर्ति जो तेजी से उभर कर सामने आयी है वो मीडिया पर नज़र रखने वाले वेब पोर्टल का सामने आना इनके कामों को फेसबुक और ट्विट र जैसी सोसल नेट वर्किंग साईट की सहायता से और तेजी मिली यानी दुनिया भर के ऊपर नज़र रखने वाले लोगों के ऊपर भी एक नए मीडिया का उदय हुआ .मीडिया पर सेंसर शिप के लिए उठती आवाजों के बाद आखिर मीडिया के ही कुछ लोगों ने आगे आकर इसके नीति निर्देशक सिद्धांत निर्धारित किये .वहीं इंटर नेट और ब्लोग्स ने मुख्या धारा की मीडिया पर लगातार कोड बरसाने का काम किए .संतोषजनक बात यह रही कि इस कोड़े की फटकार का प्रतिकार न करके सुधार के प्रयास किये गए .
संचार माध्यमों में आयी क्रांति से इंटर नेट मीडिया की आवक तेज हुई .इस वर्ष के बड़े खुलासों में इस ऑनलाइन मीडिया की बड़ी भूमिका रही .वैश्विक स्तर पर विकिलिक्स के खुलासों ने तो बवंडर ही मचा डाला .विकिलीक्स के खुलासों ने दुनिया के दादा अमेरिका को बहुत शर्मसार किया .विकिलीक्स के इस पर्दाफास से एक नया परिद्रश्य भी उभरा और वेब मीडिया की अपनी पहचान भी बननी शरू हुई .ऐसा पहली बार हुआ जब किसी वेब साईट की खबर को अखबारों ने प्रमुखता से छापा और इलेक्टोनिक मीडिया ने भी उसे खूब तवज्जो दी.
भारतीय मीडिया से सीधे तौर पर कोई ताल्लुक न रखने वाली नीरा राडिया मीडिया के बदनुमा चेहरे के रूप में सामने आयी और मीडिया के कई स्वनामधन्य स्तंभों की नींव हिला दी.इस बवंडर में यू पी ए गठबंधन सरकार में मंत्री रहे ए राजा को अपनी कुर्सी छोडनी पडी .बिहार विधान सभा चुनावों में पैड न्यूज़ को लेकर इस बार भी हो हल्ला मचा पर समाचार पत्रों ने अपनी विश्वसनीयता बरक़रार रखने के लिए बाकायदा अपने समाचार पत्रों में विज्ञापन छाप कर पेड न्यूज़ से परहेज़ करने की घोषणा की .
ऑन लाइन मीडिया पर लोगों के बढते रुझान के कारण कई समाचार पत्रों ने अपने ऑन लाइन संस्करण लांच किये ब्लोगिंग ने भारतीय मीडिया के क्षेत्र में जो बड़ा परिवर्तन किया उसने सिटिज़न जर्नलिस्म की अवधारणा को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया इसमें एक बड़ा हाथ तेजी से सस्ते होते मल्टी मीडिया मोबाईल का भी है जिसकी सहायता से कोई भी स्टिंग कर सकता है .अगर आप कुछ कहना चाह रहे तो दुनिया में बहुत से लोग आपकी बात सुनने को तैयार हैं इसका एहसास इस साल लोगों को शिद्दत से हुआ .फिल्मों के मामले में छोटे बजट की और लीक से हटकर बेहतर फिल्मों में लव सेक्स और धोखा इश्किया वेलडन अब्बा तेरे बिन लादेन फंस गया रे ओबामा आशाएं ने अपनी पहचान स्थापित की वहीं काएट्स गुज़ारिश और रावण जैसी फिल्मों को बड़े नामों के बावजूद नकार दिया गया .साल के चर्चित गानों में मंहगाई डायन मुन्नी बदनाम शीला की जवानी और धन्नों जैसे
 गाने लोगों की जबान पर चढ़े .रिअलिटी टीवी पर बिग बॉस और कौन बनेगा करोड पति का जलवा रहा ,रहा करोड पति में अमिताभ ने अपना पुराना जादू चलाया बिग बॉस पर अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप भी लगे .कलर्स चैनल ने एक अभिनव प्रयोग करते हुए समाज की हर कुरीतियों को अपने सीरिअल का विषय बनाया .बालिका वधु से शुरू हुआ ये सफर प्रथा  तक जारी रहा. साल का तो अंत हो रहा है पर भारतीय मीडिया में एक नए युग का सूत्र पात हो रहा है सूचना प्रौधिगिकी के बढते कदम से आज का मीडिया ज्यादा इंटर एक्टिव हुआ आने वाले साल में ३जी तकनीक से मीडिया का चेहरा और भी बदल जाने की उम्मीद है
डॉ. मुकुल श्रीवास्तव

 दैनिक हिन्दुस्तान के संपादकीय पृष्ठ पर २६ दिसंबर को प्रकाशित 

Monday, December 6, 2010

अरे ये खुशबू कहाँ से आयी ......

जाड़ों का मौसम मुझे हमेशा पसंद  रहा है उसके पीछे मेरे पास ज्यादा कारण नहीं वैसे आप चाहे तो कई कारण बता सकते हैं जैसे इस मौसम में काम करने की क्षमता बढ़ जाती है ,साग सब्जियों की ज्यादा वैरायटी उपलब्ध होती है ,ठण्ड में क्राईम कम हो जाता है अब आप इसे यूँ समझे जितने मुंह उतनी बातें पर मेरे पास ठण्ड को पसंद करने का एक अनोखा कारण है मुझे अपने बचपन से ही फूलों पत्तियों पर गिरी ओस बहुत अच्छी लगती है और इस द्रश्य को देखने और महसूस करने का सबसे अच्छा मौसम है जाड़ा कुहरे में फूलों पर गिरी ओस न  जाने कितने क्रियटिव लोगों का इन्स्पीरेसअन बनी है और मुझे भी इन्स्पैएर किया है बचपन में जब हम जाड़े की शामों में  सैर पर निकलते थे तो चारों ओर फूल ही फूल दिखते  थे   फूल अपने आप में इस दुनियाकी सबसे खूबसूरत कृतियों  में से एक हैं प्रकृति के इस अनोखे रूप को महसूस करने हिंदी फिल्म के गीतकारों ने अपने अपने तरीके से महसूस किया है अब जब बात फूलों की छिड़ ही गयी है तो कुछ याद आया अरे नहीं याद आया तो सुनिए ये गाना फिर छिड़ी रात, बात फूलों की,रात है या बारात फूलों की (बाजार )कुदरत का अनमोल तोहफा हैं फूल। फूल न होते, तो दुनिया इतनी रंगीन नहीं होती। फूल ही हैं, जो हमें करवाते हैं नजाकत और नफासत का एहसास। जितने कोमल फूल होते हैं उतनी ही कोमल होती हैं हमारी भावनाएं देखिये एक भाई अपनी बहन के लिए प्यार जताने के लिए क्या गा रहा है फूलों का तारों का सबका कहना है एक हजारों में मेरी बहना है” (हरे राम हरे कृष्णा) .जरा सोचिए फूलों से हमारा कितना गहरा रिश्ता है इंसान के पैदा होने से लेकर उसके मरने तक हर खुशी हर गम में फूल हमारा साथ देते हैं इस सीख के साथ जिंदगी कैसी भी हो खूबसूरत तो हैं न खुशबू दिखती नहीं पर महसूस की जा सकती है पर उसके लिए नाक का होना जरूरी है उसी तरह जिंदगी में खुशियाँ हर मोड पर  बिखरी है पर क्या हम उन खुशियों को खोजना जानते हैं  .फूल कोमलता ,शांति और प्यार का प्रतीक होते हैं जहाँ प्यार शांति , का जिक्र होगा वहां फूलों का जिक्र होना लाजिमी है फिर हम भी तो ये ही चाहते हैं एक ऐसी दुनिया हो जहाँ चारों ओर शांति हो प्यार हो तो जब फूल खिलते हैं तो दिल भी खिल जाता है , एक प्यारा सा गाना रोटी फिल्म का जो मेरी ही बात की तस्दीक कर रहा है फूलों के साथ दिल भी खिल जाते बाबूजब फूलों की बात चली है तो गुलाब का जिक्र होगा ही उसे फूलों का राजा यूँ ही तो नहीं कहा जाता और गानों में सबसे ज्यादा इसी फूल का जिक्र हुआ है लाल गुलाब जहाँ प्यार का प्रतीक है वहीं सफ़ेद गुलाब मैत्री और शांति का . प्यार की कोमल भावनाओं को व्यक्त करता हुआ  कुछ ऐसी कहानी बयान कर रहा है ये गाना  फूल गुलाब का लाखों हजारों में एक चेहरा जनाब का (बीवी हो तो ऐसी ) बचपन की शरारतों के बाद जब हम जवान होते हैं तो हमारे जेहन में कुछ सपने होते हैं कुछ उम्मीदें होती हैं इन्ही सपनों में एक सपना अपने घर का भी होता और घर जब फूलों के शहर में हो तो क्या कहना देखो मैंने देखा है एक सपना फूलों के शहर में है घर अपना” (लव स्टोरी ) पर अगर आपको सपने में फूल ही फूल दिखें तो ऐसे ख्वाब को क्या कहेंगे चलिए मैं आपको गाना ही बता देता हूँ देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाह में गुल खिले हुए” (सिलसिला ) पर फूल सिर्फ कोमल ही नहीं होता अगर आपकी इस कोमलता का सम्मान नहीं करेंगे तो ये अंगारा भी बन सकता है फूल कभी जब बन जाए अंगारा” (फूल बने अंगारे ) जिंदगी में हर चीज़ की अपनी अहमियत होती है और ये बात रिश्तों पर भी लागू होती है फूल को बढ़ने के लिए खाद पानी की जरुरत होती है रिश्तों को संबंधों की गर्मी और अपनेपन के एहसास की तो जाड़ों  के इस मौसम मे गर्मी का एहसास करने के लिए गर्म कपडे पहनने के अलावा  कुछ फूलों के पेड़ लगाइए, नए रिश्ते बनाइये पुराने रिश्तों पर जम गयी गर्द को झाडिये क्योंकि रिश्ते भी फूलों की तरह नाजुक होते हैं .आइये महसूस करते हैं अपने आसपास बिखरी हुई फूलों की खुशबू रिश्तों में बसी अपने पन  की महक और जाड़े के मौसम में इठलाते फूलों की सरगोशियाँ हमारी राह तक रही हैं .जाड़े का स्वागत अगर महकते हुए और महकाते हुए किया जाए तो इससे अच्छा भला और क्या हो सकता है .
आई नेक्स्ट में ६ दिसंबर को प्रकाशित 

Sunday, November 21, 2010

Wednesday, November 17, 2010

गुस्सा तो जीवन का हिस्सा है

खुश रहो न यार , छोडो न यार सब चलता है , गुस्साने से क्या होगा ये कुछ ऐसी सीख हैं जो जिंदगी के किसी न किसी मोड पर आपको जरुर मिली होगी चलिए थोड़ी देर ये मानकर देखते हैं कि ये सब बातें सही हैं मतलब गुस्साने से कोई फायदा नहीं होता ज्यादा गुस्सा शरीर के लिए नुकसानदायक होता है गुस्सा क्या है? गुस्सा एक साइकोलोजिकल स्टेट ऑफ माईंड, जब हम अपने आस पास की चीजों और व्यवहार से संतुष्ट नहीं होते हैं तब गुस्सा आता है अब जरा मेडिकल साइंस की बात कर ली जाए गुस्सा आना आपके नोर्मल होने की निशानी है पर ज्यादा गुस्सा आना ठीक नहीं है लेकिन अगर आपको गुस्सा आता ही नहीं है तो ये गुस्सा आने से ज्यादा खतरनाक है गुस्सा दबाना शरीर और दिमाग पर बुरा इफेक्ट डालता है जिससे नींद कम हो जाती है  गुस्से को दबाने का शरीर और मन, दोनों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। नींद नहीं आती, थकान होती है, एकाग्रता कम होती है और इन सबका परिणाम अवसाद, चिंता और अनिद्रा के रूप में सामने आ सकता है जिनसे कई गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं पर गुस्से के कई पोसिटिव अस्पेक्ट भी है बात न तो नयी और न ही अनोखी हाँ बस जरा सा नजरिया बदला है .इस दुनिया में बहुत कुछ बुरा है पर जो कुछ अच्छा है या हो रहा है वो कुछ लोगों के गुस्से के कारण ही है जो स्टेटस-को मेंटेन नहीं रखना चाहते हैं जो गलत बात के आगे झुकना नहीं चाहते हैं आइये देखते हैं गुस्सा किस तरह दुनिया और समाज को बदल रहा है अब जरा उन दिनों को याद करिये जब आपके घर में टीवी नहीं था और आपको पड़ोसी के घर टीवी देखने जाना पड़ता था तब कैसा लगता था  बहुत गुस्सा आता था न लेकिन आपके गुस्से ने घर वालों को एहसास कराया कि घर में टी वी की जरुरत है .आइये थोडा पीछे चलते हैं बात महात्मा गाँधी की साऊथ अफ्रीका में उन्हें इसलिए ट्रेन से उतार दिया जाता है कि वो एक हिन्दुसतानी हैं उन्हें भी गुस्सा आया था पर इस गुस्से को व्यक्त करने का तरीका उनका थोडा अलग रहा नॉन वायलेंस का इस्तेमाल करके उन्होंने देश को आज़ाद कराने की कोशिश की जिसमें वो कामयाब भी रहे .अक्सर गुस्से का सम्बन्ध संतुष्टि के स्तर से जुड़ा होता है अब अगर आप संतुष्ट हो गए तो जो चीजें हमें मिली हैं हम उन्हें वैसे ही स्वीकार कर लेंगे फिर न विकास की कोई गुंजाईश होगी और न बदलाव की पर इसका मतलब ये मत निकालिए कि हमें बेवजह गुस्सा करने का हक मिल गया है कई बार गुस्सा हमारी सोच के गलत होने के कारण भी आता है जिस चीज को आप पसंद नहीं करते अगर आप वही दूसरों के साथ कर रहे हैं तो इसका मतलब आपकी सोच सही नहीं है ऐसे में आप के द्वारा यूँ ही लोगों पर सिस्टम पर गुस्सा करना गलत है इसलिए गुस्सा  करते वक्त अपने दिमाग को खुला रखिये अगर आपका दिमाग कह रहा है कि आप सही हैं तो बिलकुल आपको गुस्सा करने का हक है ऐसे में अपने गुस्से को निकालिए पर हाँ सभ्यता से गुस्से में आपको कुछ भी करने या बोलने का हक नहीं मिल जाता आपके बॉस ने आपको डाटा आप बॉस का कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो ऑटो वाले पर अपना गुस्सा निकाल दिया ये सही तरीका नहीं है अपने एंगर का मैनजमेंट सही तरीके से अगर आप कर पायेंगे तो आपको लगेगा कि दुनिया को बेहतर बनाने में आपका योगदान दूसरों से कहीं ज्यादा होगा क्या कहेंगे आप इस गुस्से के किस्से पर .............
आई नेक्स्ट में १७ नवंबर को प्रकाशित 

Sunday, October 31, 2010

मीडिया को पढ़ने वाले ,मीडिया को पढाने वाले(हिन्दुस्तान सम्पादकीय )

                                                                      सीबीएसई ने अपने पाठ्यक्रम में ११ वीं और १२ वीं के छात्रों के लिए मीडिया का पाठ्यक्रम देने की बात कही. यह पाठ्यक्रम अगले सत्र से शुरू हो जायेगा. आम तौर देखा जाये तो इसमें कोई नई बात नहीं है. अन्य पाठ्यक्रमों  की तरह यह भी पढाया जायेगा पर जरा गौर करने पर इसके बड़े निहितार्थ निकलते हैं भारत में मीडिया शिक्षण का विकास ऊपर से नीचे की ओर हुआ यानि यह पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों से होते हुए स्कूल  तक पहुंचा है एक विषय के रूप में इतने वक्त में समय का पूरा पहिया घूम गया इसे समय की मांग कहा जाए या शिक्षा को बाजारोन्मुखी बनाना इसका आंकलन किया जाना अभी बाकी है  आजादी के बाद देश में तकनीकी दक्षता के लोगों की ज़रुरत को पूरा करने के लिए आई आई टी  जैसे संस्थान  खोले गए. इन संस्थानों से निकले लोगों की बदौलत हमने देश की बुनियादी संरचना सुधारी साथ ही विश्व में अपने आइटी पेशेवरों के माध्यम से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया . इसी तरह बेहतर प्रबंधन कर्मियों के लिए स्थापित किये गए आई आई एम् संस्थानों ने भी देश और दुनिया  को बेहतरीन पेशेवर प्रबंधक दिए , पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है देश में रोजगार परक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आई टी आई और पोलीटेक्निक जैसे संस्थान खोले गए जहाँ कई रोजगार परक पाठ्यक्रम चलाये गए पर वे संतोषजनक परिणाम न दे सके . वर्तमान में मीडिया पाठ्यक्रम भारत के लगभग हर विश्व विद्यालय में चलाये जा रहे हैं इसके अतिरिक्त सैकड़ों की तादाद में निजी संस्थान भी देश के भावी पत्रकारों की पौध को तैयार करने में लगे हैं फिर भी आमतौर पर ये माना जाता है आज के जनमाध्यमों ने अपनी विश्वसनीयता खोयी जबकि आज प्रशिक्षित पत्रकारों का युग है और जनसंचार एक विषय के रूप में स्थापित हो चुका है फिर भी विश्वसनीयता का संकट है .विभिन्न संस्थानों से डिग्री धारी पत्रकार तो निकल रहे हैं पर जब वे नौकरी की तलाश में मीडिया संस्थानों में पहुँचते हैं तो अपने आपको एक अलग ही दुनिया में पाते हैं जहाँ उस   ज्ञान का कोई महत्व नहीं है जो उन्होंने अपने संस्थानों में सीखा है .सी बी एस ई द्वारा शुरू किये गए इस पाठ्यक्रम के बहाने ही सही पर अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी मीडिया शिक्षा प्रणाली  पर एक बार फिर गौर करें .इंटर स्तर पर मीडिया शिक्षण की शुरुवात के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है की इस से छात्रों में संचार कौशल तथा जनमाध्यमों के प्रति उनकी समझ बढ़ेगी इसमें कोई शक नहीं है स्कूल स्तर पर मीडिया शिक्षण का फैलाव होने से लोगों में मीडिया के प्रति फैले हुए कई दुराग्रहों को दूर करने में मदद मिलेगी आजकल ये फैशन सा चल पड़ा है हर समस्या के लिए मीडिया को दोषी ठहरा देना .हमारी  शिक्षा प्रणाली में संचार कौशल सिखाने  के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं थी यह प्रयास शायद इस खालीपन को भर पाने  में सहायक होगा अक्सर विद्यार्थी अपने आपको ठीक तरह से व्यक्त न कर पाने के कारण रोजगार की दौड में पिछड़ जाते हैं.इसके अतिरिक्त यह पाठ्यक्रम उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी सहायक होगा .

 पत्रकारिताफिल्मरेडियो,मल्टीमीडिया ,विज्ञापन और जनसंपर्क जैसे विषयों के रूप में उन्हें नए क्षेत्रों का ज्ञान होने से वे अपने भविष्य की रूप रेखा बेहतर तरीके से बना पायेंगे पर  मीडिया शिक्षा में कुछ और भी चुनौतियाँ हैं सिद्धांत और व्यवहार में अक्सर अंतर आ जाता है स्नातक और स्नाकोत्तर स्तर पर मीडिया शिक्षा योग्य शिक्षकों के अभाव से जूझ रही है .विश्वविद्यालय अनुदान आयोग मीडिया शिक्षा को अन्य पारम्परिक पाठ्यक्रमों की तरह ही देखता है, कोई भी छात्र जब मीडिया  विषय का चुनाव करता है तो उसके दिमाग में एक मात्र लक्ष्य पत्रकारिता  या इस से जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोजगार पाना होता है पर विश्व विद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी ) की गाईड लाइन मीडिया  शिक्षकों से  ये अपेक्षा करती है कि वे शोधपत्र लिखेंगे तथा मीडिया शोध को बढ़ावा देंगे जैसा कि अन्य विषयों में होता है यह बाध्यता शिक्षकों की व्यक्तिगत पदोनात्ति में भी लागू होती है अधिकारिक तौर पर किसी भी विश्वविद्यलय में मीडिया शिक्षक बनने की योग्यता का आधार यू जी सी की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट ) है इस परीक्षा में चयन का आधार किताबी ज्ञान और विश्लेषण शक्ति होती है इस स्थिति में ज्यादातर शिक्षक व्यावहारिक ज्ञान में दक्ष नहीं होते हैं और उनके द्वारा दी गयी शिक्षा में सिद्धांत और प्रयोग का सही मिश्रण नहीं होता और इसीलिये हमारे मीडिया संस्थान मीडिया बाजार की मांग के अनुरूप प्रोफेसनल तैयार नहीं कर पा रहे हैं .
और वहीं भारत के भावी पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले संस्थानों के ज्यादातर शिक्षक मीडिया को अपना सक्रिय योगदान नहीं दे पाते हैं सिद्धांत और व्यवहार का यह अंतर छात्रों की गुणवत्ता पर असर डालता है  मीडिया के उच्च मानदंडों की प्राप्ति के लिए यह जरूरी है कि ऐसी पहल का स्वागत किया जाए पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया अपने आप में एक व्यापक शब्द और विषय है इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से सिर्फ तकनीकी ज्ञान की अपेक्षा नहीं की जाती उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि उनमे देश दुनिया की बेहतर समझ भी हो जिसके लिए अन्य विषयों का भी ज्ञान आवश्यक है समाज , राजनीति , अर्थशास्त्र ,संस्कृति को समझे बगैर कोई भी अच्छा जन संचारक नहीं हो सकता  भारत में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के फैलाव ने इसमें बहुत सारा ग्लैमर दे दिया है और छात्र सिर्फ तकनीक को समझ कर तुरंत  पत्रकार होना चाहता है यह एक बड़ा कारण है कि नयी पीढ़ी की जो पौध आज इस क्षेत्र में आ रही है उसमे गंभीरता का अभाव दिखता है इसलिए यह आवश्यक है की  पत्रकरिता  के पाठ्यक्रमों में बौद्धिक विषयों और अन्य सामयिक मुद्दों को ज्यादा जगह दी जानी चाहिए.भारत में मीडिया शिक्षण अभी भी दोराहे पर है जिसमे शोध और व्यवसायिकता का संतुलन नहीं कायम हो पाया है दूसरी ओर लगातार बदलती तकनीक ने इस विषय में बदलाव की गति को बहुत तेज कर दिया है . स्कूल स्तर पर इस  पाठ्यक्रम की शुरुवात ने एक अच्छा संकेत तो दिया है पर यह बदलाव मीडिया की उच्चशिक्षा को कितना बदल पाता है इसका फैसला समय को करना है .
*हिन्दुस्तान में दिनांक ३१ अक्टूबर २०१०  को प्रकशित 


       

Wednesday, October 20, 2010

जो महका दे जीवन



पिछले दिनों मैंने जिंदगी का एक नया रंग देखा और हमेशा की तरह उसे फिल्मों की तरह जोड़ दिया हुआ यूँ कि करीब १९ साल के बाद अपने पुराने स्कूल जाना हुआ बगैर किसी कारण बस दिल ने कहा चलो और मैं चला गया वहाँ मुझे अपना एक सबसे प्यारा मित्र मिला जिसे मैंने पिछले १९ साल से नहीं देखा था और न बात की थी  ये अलग बात है कि वो स्कूल के दिनों का मेरा सबसे अच्छा दोस्त था अजय मोगरा  फेस बुक पर जाने से कुछ ही दिन पहले उसने मुझे खोज लिया और जब मैं वहां पहुंचा तो इंसाने रिश्ते का एक नया रंग देखा वो था दोस्ती मुझे लगा ही नहीं कि हम कभी बिछड़े भी थे  और ये फासला १९ साल का हो चुका था उसका प्यार और अपनत्व के आगे मुझे अपने का रिश्ते फीके से लगे . जिंदगी में हमारे पैदा होते ही ज्यादातर रिश्ते हमें बने बनाये मिलते हैं और उसमे अपनी चोइस का कोई मतलब ही  नहीं रहता लेकिन दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता होता है जिसे हम अपनी लाइफ में खुद बनाते हैं  फिर दोस्ती की नहीं हो जाती है दोस्ती तो हो जाती है तो आज बात फिल्म और दोस्ती की फिल्मों ने इश्क ,प्यार और मोहब्बत के बाद किसी मुद्दे पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है वो दोस्ती है “जाने तू या जाने न”  “रॉक ऑन , 'दिल चाहता है' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों में दोस्ती को ही मुख्य आधार बनाया गया है पर दोस्तों को दुवा देता  ये गाना जब आप सुनेंगे तो निश्चित ही आपको अपने सबसे अच्छे दोस्त की याद आ ही जायेगी  एहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों (फिल्म :गबन ) इस दुनिया में शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जो अपने दोस्तों का एहसान न मानता हो क्या कहेंगे आप दोस्ती यानी एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें प्यार, तकरार, इजहार, इंकार, स्वीकार जैसे सभी भावों का मिक्सचर है जब दोस्ती पर गानों की बात चली है तो सबसे ज्यादा चर्चित गाना शोले का ही हुआ “ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे ,छोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे” दोस्ती है ही रिश्ता ऐसा न इसके लिए न समाज की स्वीकृति चाहिए और न ही मान्यताओं और परम्पराओं का सहारा तभी तो कहा गया है बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा (दोस्ताना )  जरा सोचिये बगैर दोस्ती के हमारा जीवन कैसा होता आफिस ,स्कूल , सिनेमा हाल , रेस्टोरेंट बगैर दोस्तों के कैसे लगते अगर नहीं समझ पा रहे हों तो अपने स्कूल का पहला दिन याद कीजिये जब आपका कोई दोस्त नहीं था या किसी दिन अकेले कोई फिल्म देखने चले जाइए और उसके बाद कहीं बाहर अकेले खाना कहिये फिल्म खुदगर्ज़ का ये गाना शायद इसी विचार को आगे बढ़ा रहा है “दोस्ती का नाम जिंदगी”, पर कभी ऐसा भी हो सकता है कि आपको दोस्ती करनी पड़ती है तो उस मौके के लिए भी गाना है “हम से तुम दोस्ती कर लो ये हसीं गलती कर लो “ (नरसिम्हा )
पर जिंदगी में रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं होते और ये बात दोस्ती पर भी लागू होती है कभी दोस्तों के चुनाव में भी गलती हो जाती है या गलतफहमियों से दोस्तों से दूरी हो जाती है और तब जो होता उसको बयां करता है ये गाना “दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है” (आखिर क्यों ) खैर हर रिश्ता कभी भी एक जैसा नहीं होता और वो बात दोस्ती पर भी लागू होती है  फिर आजकल की भागती दौडती दुनिया में अक्सर इस बात को दोष दिया जाता है कि इस से रिश्तों की संवेदनाएं खतम हो रही हैं पर एक रिश्ता तेज रफ़्तार  दुनिया में आज भी बचा हुआ है वो है दोस्ती क्योंकि ये कुछ मांग नहीं करता दोस्त , दोस्त होते हैं ये शिकायत हो सकती है कि समय की कमी है पर जब दोस्त मिलते हैं तो दोस्ती फिर से जवान हो जाती है तो चलिए किसी दोस्त को याद करते हैं एक एस ऍम एस करके या किसी सोसल नेट वोर्किंग साईट पर जाकर उसे हेल्लो बोलते हैं .
आई नेक्स्ट में २० अक्टूबर को प्रकाशित 

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