Wednesday, October 26, 2011

Reality bites common man

भारत में इस वक्त त्योहारों की धूम है वहीं टीवी पर रियल्टी शो का बोलबाला है टेलीविजन पर जब धारावाहिकों की शुरुवात हुई थी तो किसी ने नहीं सोचा था कि धीरे धीरे ये बुद्धू बक्सा  हम सबके जीवन को किस हद तक प्रभावित करने वाला है ड्राईंग रूम में दबे पाँव घुसने वाला टीवी आज शान से हमारे बेडरूम में बैठा है और ऐसा ही कुछ हुआ इसमें प्रसारित कार्यक्रमों के कंटेंट में भारत का पहला सोप ऑपेरा हम लोग एक मध्यम वर्गीय परिवार के संघर्ष की कहानी थी जिसे घर के सब लोग साथ बैठ कर देखा करते थे ,हम लोग से शुरू हुआ ये सफर आज भी जारी है पर इसके रूप बदल गए हैं जो हमें इमोशनल अत्याचार से लेकर राखी के इन्साफ और ऐसे ना जाने कितने रूपों में दिखते हैं जिन्हें आजकल हम रीयल्टी शो के नाम से जानते हैं मैं थोडा तफसील से आपको बताता हूँ भारत के पहले रियलिटी शो का श्रेय अंताक्षरी कार्यक्रम को प्राप्त है। 3 सितम्बर 1993 को शुरू हुए इस शो के करीब 600 एपीसोड दर्शकों तक पहुंचे और हजारों प्रतिभागियों ने इसमें हिस्सा लिया.आपको ये भी बताता चलूँ सफलता की नयी इबारत लिखने वाले इन रीयल्टी शो का इतिहास मात्र दो दशक पुराना है इनकी शुरुवात संगीत आधारित कार्यकर्मों से हुई पर 2001 में कौन बनेगा करोड़पति ने इसमें एक नया आयाम जोड़ते हुए दुनिया को ये दिखाया कि भारत में सामान्य ज्ञान को भी टेलीविजन से जोड़ा जा सकता है और ये प्रयोग ख़ासा सफल रहा फिर तो सच का सामनाराखी का स्वयंवरइंडियाज गॉट टैलेंटइस जंगल से मुझे बचाओखतरों के खिलाडीनच बलिएइंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा,बार्नविटा क्विज कांटेस्टरोडीजस्प्लिटसविलाझलक दिखलाजाएक्स फैक्टरजस्ट डांसलिटिल चैंप्सरतन का रिश्ताकॉमेडी का महामुकाबलास्टंट मानियालव लॉक अप जैसे कार्यक्रमों का सिलसिला ही चल पड़ा . बिग बॉस जैसे शो ने तो जैसे खेल के सारे नियम ही बदल दिए .कई रीयल्टी शो पर अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप भी लगे पर फिलहाल हर साल एक नए सीजन के साथ अनेक रीयल्टी शो हमारे सामने आ रहे हैं और दर्शक भी इन्हें स्वीकार कर रहे हैं रीयल्टी शो आज ज्ञान देने के अलावा शादियाँ करवा रहे हैं ,लोगों के झगड़े सुलझा रहे हैं हाँ वे आपका सामना सच से भी करा रहे हैं .पारिवारिक धारावाहिकों में प्रयोगधर्मिता गायब सी हो गयी है जिससे दर्शक एक खालीपन महसूस कर रहे थे और इस खालीपन को बखूबी भरा है जीवन की वास्तविक परिस्थियों में रचे बसे इस कार्यक्रमों ने जिसमे नायक या नायिका और कथानक जिंदगी के आस पास के ना होकर बल्कि वास्तविक ही होते हैं .दूरदर्शन के एकाधिकार के खत्म होने के बाद सैकड़ों  सेटेलाईट चैनलों ने दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई पर एक वक्त के बाद धारावाहिकों में वही सास बहू की कहानी या दो परिवारों के संघर्ष की दास्तान जैसे विषय घूम फिर के हमारे सामने आते रहे यही वक्त था जब भारत में टेलीविजन इंटरैक्टिव हो रहा था यानि मोबाईल  क्रांति ने दर्शकों को  एस एम् एस के रूप में ऐसी ताकत दे दी थी जिससे वो किसी भी धारावाहिक के बारे में अपनी राय सीधे चैनल को भेज सकते थे यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एस एम् एस की इस ताकत के पीछे व्यवसायिक उद्देश्य भी थे क्योंकि टेलीविजन के कार्यक्रमों में भेजा जाने वाला एस एम् एस सामन्य एस एम् एस से कई गुना महंगा पड़ता है जिसका एक हिस्सा कार्यक्रम निर्माताओं या चैनल के पास जाता है .रीयल्टी शो की इस कहानी में सब कुछ अच्छा है ऐसा भी नहीं संगीत और गेम शो जैसे कार्यक्रमों को छोड़कर ज्यादतर कार्यक्रम शहरी इलीट क्लास को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं जिसमे ग्लैमर का तडका टीवी और सिनेमा के कलाकार लगते हैं जिससे वो हमारे आस पास के होकर भी हमारे नहीं होते हैं पर वक्त बदलते देर नहीं लगती जब सिलसिला शुरू हुआ है तो हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि रीयल्टी शो के कार्यक्रमों में भी बदलाव आएगा और ये संगीत और गेम शो के अलावा अन्य  विषयों में आम आदमी को आगे लायेंगे और आप भी तो यही चाहते हैं .क्यों मैं सही कह रहा हूँ न .
आई नेक्स्ट में 26 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित 

Wednesday, September 21, 2011

आशा


निराशा के घोर बादलों ने
जब डाला मेरे मस्तिष्क पर डेरा
मेरे स्वप्नों के छीना बन कर लुटेरा
चिंता करती जब मुझे हताश
खत्म होती जब जीवन की आस
महकती हवा देती तब मुझको सन्देश
जीवन के कुछ सुखद क्षण हैं शेष
सुख दुःख तो जीवन में आते जाते हैं
सुखी वहीं हैं "नादान" जो दुःख सह जाते हैं
इसी उम्मीद पर जीता मेरा मन
कभी तो पूरे होंगे मेरे स्वप्न
(साल था 1995 पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए ये कविता दिखी )

Tuesday, September 6, 2011

Reel Life Wisdom


अन्ना के आंदोलन ने देश के सोये हुए मध्यम वर्ग को एक नयी  तरीके की राजनैतिक चेतना का एहसास कराया .मैं कोई राजनैतिक लेक्चर देने नहीं जा रहा .मैं तो बस उस माध्यम की शक्ति का एहसास आप सबको कराना चाहता हूँ जो हमारे जीवन में असर तो डालता है पर हम मानने को तैयार नहीं होते जी हाँ फ़िल्में जरा याद कीजिये अन्ना के समर्थन में हो सकता हो आपने भी कैंडल मार्च निकाला हो कुछ याद आया ये कैंडल मार्च का आइडिया ‘रंग दे बसन्ती’ फिल्म ने हमें दिया कि हाँ हम भी दुनिया बदल सकते हैं .फ़िल्में समाज का आईना होती हैं इस विषय पर मतभेद हो सकते हैं पर कोई भी फिल्म अपने वक्त और समाज से कट कर नहीं बन सकती आप इस तथ्य से असहमत हो सकते हैं पर इसे ख़ारिज नहीं कर सकते हाल ही आयी फिल्म आरक्षण इसका ताजा उदाहरण  है मुद्दा यह महत्वपूर्ण नहीं है कि फिल्म आरक्षण समर्थक है या विरोध में पर इसी बहाने आरक्षण जैसे मुद्दे पर सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर लंबी लंबी बहस चलीं थोडा सा पीछे चलते हैं आज की यंगिस्तानी पीढ़ी महात्मा गाँधी को केवल राष्ट्र पिता के रूप में जानती थी उनका दर्शन क्या था हू केयर्स लेकिन फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने समाज को गांधीगीरी का एक नया मंत्र दिया ,फिल्म के बहाने ही सही गाँधी जी का दर्शन दुबारा जाना समझा गया .हम अपनी फिल्मों को भले ही बहुत गम्भीरता से न लेते हों लेकिन सामाजिक परिवर्तन में इनकी एक बड़ी भूमिका रही है .लोगों की मानसिकता एक दिन में नहीं बदलती उसके लिए लगातार प्रयास की जरुरत होती है और ये काम फिल्मों के द्वारा बेहतरीन तरीके से होता है .मनोरंजन उद्योग के फलने फूलने से हम लगातार टीवी और उसी बहाने फिल्मों के संपर्क में रहते हैं . समाज की हर छोटी बड़ी समस्या पर जहाँ फ़िल्में बनी हैं वहीं फिल्मों ने हमें विरोध के नए प्रतीक दिए हैं .एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती पर जब ‘धारावी’ फिल्म बनी तो लोगों को एहसास हुआ कि वहां पर रहने वाले लोगों का जीवन कितना मुश्किल है उनके जीवन स्तर को बेहतर करने का सरकारी प्रयास तेजी से इसी फिल्म के बाद हुआ .हमें आजादी मिले ज्यादा वक्त नहीं हुआ थाजब देश के कई हिस्सों में दस्यु आतंक सर चढ  कर बोल रहा था और तब आयी ‘जिस देश में गंगा बहती है(1960)’ डाकुओं की समस्या  और उनके पुनर्वास पर बनी कुछ अच्छी फिल्मों में से एक है .हमारे समाज और उसमे होने वाली घटनाएँ हमेशा फिल्मों के केंद्र में रही हैं .ऑनर किलिंग पर अभी आयी फिल्म ‘खाप’ हो या राजनीति का सच बयान करती फिल्म ‘राजनीति’ हो .फिल्मों के लिहाज से हर दशक अपने समय का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है..आजादी से पहले जब छुआ छूत पर बात करना मुश्किल था ‘अछूत कन्या’ जैसीफिल्म ने बड़े सार्थक तरीके से इस समस्या को लोगों के सामने रखा इसी कड़ी में कुछ और नाम सुजाता ,अंकुर ,पार सद्गति  ,दीक्षा ,समर जैसी फिल्मों के भी हैं जो समय के सच को बयान करती हैं .हम फिल्मों के असर से बच नहीं सकते आप ‘पीपली लाईव’ को भूले नहीं होंगे एक साथ देश के किसानों की समस्या और इलेक्टोनिक मीडिया की नौटंकी पर करारा व्यंग्य .ऐसा संयोग और विषय के साथ न्याय कम ही फ़िल्में कर पातीं हैं .हमारी फ़िल्में बदली हैं और बदल रही हैं और साथ साथ दुनिया भी तो अब हमारे भी बदलने का वक्त आ गया है तो शुरुवात आजसे ही क्यों न की जाए .

आई नेक्स्ट ६ सितम्बर २०११ को प्रकशित 

Tuesday, August 23, 2011

अभी भी परदे के पीछे हैं दलित


हाल ही में आई प्रकाश झा की वहुचर्चित फिल्म आरक्षण ने एक बार फिर से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस छेड़ दी है. फिल्म में आरक्षण को लेकर प्रकाश झा ने एक नजरिया प्रस्तुत करने की कोशिश की है. आरक्षण पर चलरही बहस में किसी न किसी रूप में एक बार फिर से दलितों और उनके अधिकारों को लेकर एक बहस चल निकली है पर इस बार बहस का मुद्दा ललित कलाएं हैं आमतौर पर साहित्य संगीत और कलाओं में दलित प्रतिनिधित्व कम मिलता है साहित्य में दलित साहित्यकारों ने इस निर्वात को भरने की कोशिश की है पर
हिंदी फिल्मों में अभी भी सार्थक दलित हस्तक्षेप का इन्तिज़ार है . आरक्षण फिल्म के बहाने ही सही पर अब इस मुद्दे पर गौर करने की जरूरत है कि हमारी फिल्मों में दलित और दलितों से जुड़े मुद्दे किस तरह से गायब हैं.अगर बॉलीबुड की फिल्मों का अवलोकन करें तो साफ पता चलता है कि किस तरह से फिल्मों में जातीय वर्चस्व गहराई से बैठा हुआ है. हमारी फिल्में मीडिया की कल्टीवेशन थ्योरी के अनुरूप कैसे बार बार एक ही विचारधारा का संदेश हमारे मस्तिष्क में ठूंस रही हैं. कलाएं समाज से जन्म लेती हैं और अंतत: समाज को प्रभावित करती हैं. हिन्दी फिल्में भी कहीं से इसका अपवाद नहीं हैं हिन्दी फिल्मों के इतिहास में समाज में होते हुए सांस्कृतिक परिवर्तनों को पकड़ा जा सकता है किन्तु  यह अलग बात है कि ये परिवर्तन फिल्मों में ज्यों के त्यों नहीं आये जाहिर है कथानक के साथ लेखक और निर्देशक की सोच भी उसमे जुड गयी .यूँ तो फिल्मों को समाज का ही प्रतिबिंब माना  जाता रहा है. इस लिहाज से देखा जाए तो समाज और साहित्य में जैसा भेदभाव दलितों के साथ हुआ वहीं फिल्मों में भी बदस्तूर जारी रहा. लंबे समय तक फ़िल्में रामायण और महाभारत की कहानियों के इर्द गिर्द बनती और हिट होती रहीं जहाँ सब कुछ अच्छा और सुहाना था अंत में सत्य की जीत होती है और असत्य पराजित होता है नायक अपने नायकत्व के कारण कुछ गलत कर ही नहीं सकता और खलनायक कभी सही हो ही नहीं सकता पर जीवन में सब कुछ स्याह और सफ़ेद के आईने से नहीं देखा जाता पर फ़िल्में बरसों से इसे आईने से समाज को आइना दिखाती आयी हैं .
फिल्मों के नाम से ही पता पड़ता है कि सवर्ण मानसिकता की गुलामी से अभी हमारा हिंदी सिनेमा बाहर नहीं निकला है मि.सिंह vs मिसेज मित्तल (२०१० ), मित्तल v/s मित्तल (२०१० ) , रोकेट सिंह सेल्स मैन ऑफ दा इयर (२००९ ), सिंह इस किंग (२००८ ), मंगल पांडे (२००५ ), भाई ठाकुर (२००० ), अर्जुन पंडित (१९७६, १९९९ )क्षत्रिय (१९९३ ), राजपूत (१९८२) ,जस्टिस चौधरी (१९८३),पंडित और पठान (१९७७ ) ये कुछ उदाहरण हैं जो बता रहे हैं कि हमारे फिल्मकारों के दिमाग में क्या चल रहा होता है चलिए सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर इन सारे नामों को स्वीकार कर लिया जाए फिर भी क्या कारण है कि दलित ,दुसाध ,मंडल पासवान जैसी दलित जातियों के नाम पर फिल्म नहीं बनती क्या दलित हमारे समाज का हिस्सा नहीं हैं ,अगर हैं तो वो फिल्मों में क्यों नहीं दिखते और अगर दिखते भी हैं तो हमेशा की तरह पीड़ित सताए हुए इसका क्या अर्थ निकला जाए या तो धरातल पर सामजिक परिवर्तन के नाम पर कुछ ठोस नहीं हुआ है और अगर हुआ है तो भी हम इसे सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हो स्वीकार नहीं पाए हैं तथ्य यह भी है कि राजनैतिक रूप से दलित लामबंद होकर उभर रहे हैं और उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है जो सरकारों की तकदीर बना बिगाड़ सकते हैं लेकिन एक औडिएंस के रूप में उनकी इच्छाओं ,अपेक्षाओं और जरूरतों को महत्व नहीं दिया जा रहा है
सिनेमा में क्या दिखाया जा रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि कैसे दिखाया जा रहा है यह महत्वपूर्ण है और इसी से दिखाने वाले की मानसिकता का पता चलता है यूँ तो उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली संख्या में ऐसी कई फिल्मे में हैं जिनका कथानक आधार दलित रहे हैं जिनके नाम की महज़ चर्चा करना सिर्फ स्थान की बर्बादी ही होगी पर दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाला हमारा फिल्म उद्योग  देश की सबसे बड़ी आबादी को कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है ये सवाल जरुर विचारणीय है . कहते हैं सिनेमा बदल रहा है बदल तो रहा है नयी तकनीक तेजी से आ रही है फिल्मों के डिजीटल प्रिंट धड़ा धड रिलीज हो रहे हैं रोज नए मल्टीप्लेक्स खुल रहे हैं सिनेमा तो बदल रहा है एक चीज जो नहीं बदल रही है वह है सिनेमा का जातिगत स्वरुप अपने आप को प्रगतिशील कहने वाला मुंबई फिल्म उद्योग हमेशा सवर्णों पर मेहरबान रहा है आजादी के बाद सोचिये कितने दलित अभिनेता फिल्म में आये हैं या उन्हें मौके मिले है.अछूतकन्या,सुजाता,अंकुर,पार .सद्गति,दीक्षा,समर जैसे कुछ अपवाद नामों को छोड़ दें तो हिंदी सिनेमा जाति प्रथा पर प्रहार करता कभी नज़र नहीं आया.हमेशा की तरह हमारी फ़िल्में टैलेंट की क़द्र करती हैं और दलित टैलेंटेड नहीं होते अन्यथा क्या कारण है कि फिल्मों की दुनिया में कुछ परिवारों का राज चलता है उसके बाद अगर किसी के लिए जगह बचती है तो वो भद्र कुलीन सवर्ण जातियों के लोग ही होते हैं. फिल्म के कथानक में भी दलित पात्रों को विकसित होने का पूरा मौका नहीं दिया जाता उन्हें जिंदगी में जो कुछ भी हासिल हो रहा है उसके लिए उनकी उधम शीलता नहीं बल्कि लोगो की दया और भगवान के आशीर्वाद का महत्त्व ज्यादा होता है इस तरह हमारा फिल्म मीडिया एक सवर्ण एजेंडा सेटिंग सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है.सिर्फ तकनीक के बेहतर हो जाने से फिल्म उद्योग का भला नहीं होने वाला है कथानक के साथ होने वाले प्रयोगों के लिहाज़ से हिंदी फिल्म जगत को अभी एक लंबा रास्ता तय करना है .
23/08/11 को अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित 

Friday, July 29, 2011

एफ एम् पर खबरों से क्यों डरती है सरकार



कैबिनेट ने एफ एम् रेडियो के तृतीय चरण के लाइसेंस की नीलामी की अनुमति दे दी है इस चरण में 227 शहरो में 839 नए एफ एम् रेडियो स्टेशन खुलेंगे . हालांकि यूँ तो आकाशवाणी के प्राथमिक चैनल की पहुँच लगभग सम्पूर्ण भारत पर है पर गुणवत्ता के मामले में एफ एम् का मुकाबला ये प्राथमिक चैनल नहीं कर सकते. भारत में एफ एम् की शुरुवात 1972 में तत्कालीन मद्रास केंद्र से की थी पर लागत की अधिकता के कारण इस प्रयोग को पूरे भारत में प्रोत्साहित नहीं किया गया नब्बे के दशक में आकाशवाणी ने देश के चार बड़े शहरो में एफ एम् सेवा प्रारम्भ की बाद में निजी प्रसारकों के इस क्षेत्र में उतरने से यह क्षेत्र एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया लगभग बारह सौ करोड रुपये का यह बाजार 2015 तक दुगुना हो जाएगा . एफ एम् रेडियो के तृतीय चरण के लाइसेंस एफ एम् रेडियो को भारत के लगभग पच्चासी प्रतिशत आबादी तक पहुंचा देंगे
दिक्कत यह है कि सभी निजी एफ एम् स्टेशन अपने प्रसारण का इस्तेमाल मात्र मनोरंजन के लिए ही कर सकेंगे इसका कारण सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा लगाई गयी बंदिश है.टेलीविजन से खबर देने के मामले में दूरदर्शन का एकाधिकार ना जाने कब का टूट गया लेकिन रेडियो में आकाशवाणी का एकाधिकार अभी तक कायम है .टेलीविजन में तो ये हाल है कि अगर दूसरे चैनल उपलब्ध हो तो को दूरदर्शन के समाचार देखना नहीं चाहता. उम्मीद की जा रही थी कि एफ एम् रेडियो के विस्तार के तृतीय चरण में निजी प्रसारकों को समाचार प्रसारित करने की छूट दे दी जायेगी पर सरकार ने इतनी रियायत दी है कि जो रेडियो स्टेशन ऑल इंडिया रेडियो के समाचार बुलेटिन का प्रसारण करना चाहता हैं, उन्हें ऐसा करने की इजाज़त होगी.सरकार के इस कदम का मतलब है कि रेडियो समाचारों की दुनिया में आकाशवाणी का प्रभुत्व कायम रहेगा
जाहिर है कि सरकार रेडियो के मामले में कोई बदलाव नहीं चाहती वह यही चाहती है कि रेडियो श्रोता उन्हीं ख़बरों को जाने सुने जो वह लोगों को बताना चाहती है .संचार क्रांति के इस युग में इस तरह का बेसिर पैर का सेंसर किसी की भी समझ से परे है .नेपाल जैसे छोटे से पड़ोसी देश ने एफ एम् को ख़बरों के लिए खोल दिया है .अगर हमारे यहाँ भी एफ एम् पर ख़बरों की इजाजत दी जाती है तो वह क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक अच्छा अवसर होगा.रेडियो एक सस्ता साधन है बशर्ते सरकार इसके महत्व को समझे और ख़बरों व सूचनाओं पर सरकारी एकाधिकार की सोच से मुक्त हो ,मौजूदा रवैया किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उचित नहीं . 
दैनिक हिन्दुस्तान में २९ जुलाई को प्रकाशित 

Thursday, July 21, 2011

इन्टरनेट ने बदल दी दुनिया



  दुनिया कितनी बदल गयी है सुना होगा आप सब ने और कहीं न कहीं महसूस भी किया होगा ह्यूमन सिविलाएजेशन का दौर जो रोटी कपडा और मकान से शुरू हुआ उसमे टाईम के साथ साथ न जाने कितनी चीजें जुडी पर हमारी बेसिक नीड्स इन्हीं के आस पास घूमती रहीं .हमारे राईट्स और ड्यूटीस का सारा संघर्ष रोटी कपडा और मकान का ही रहा है पर अब इसमें एक नया चेंज आया है वो है इन्टरनेट यू एन ओ  की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्टरनेट सेवा से लोगों को वंचित करना और ऑनलाइन सूचनाओं के मुक्त प्रसार में बाधा पहुँचाना मानवाधिकारों के उल्लघंन की श्रेणी में माना जाएगा यू एन के स्पेशल रेप्रेसेंतेटिव फ़्रैंक ला रू ने ये रिपोर्ट विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रसार  और संरक्षण के लिए तैयार की है.जरा सोचिये और किसी अधिकार ने हमारी जिंदगी इतनी तेजी से नहीं बदली है जितनी इन्टरनेट ने बदल दी है .बैंक में लगने वाली लाइन खतम हो गयी है गैस बुकिंग से लेकर ट्रेन और हवाई जहाज़ तक के टिकट नेट की मदद से खरीदे जा रहे हैं यानि हम कह सकते हैं कि इन्टरनेट आने वाले समय में संविधान सम्मत और मानवीय अधिकारों का एक प्रतिनिधि बन कर उभरेगा आज इन्टरनेट जिस तरह देश और दुनिया को चेंज कर रहा है कि अब इसके बगैर जीवन की कल्पना करना संभव नहीं पहले इंसान की मूलभूत आवयश्कता थी रोटी कपड़ा और मकान लेकिन अब इसमें इन्टरनेट को शामिल कर यू एन ओ ने एक प्रगतिशील कदम उठा कर इस धारणा को पुष्ट किया है कि ह्यूमन राय्ट्स एक डायनामिक कांसेप्ट है जैसे जैसे दुनिया बदलेगी ह्यूमन राय्ट्स का दायरा भी बढ़ेगा पर इसमें इन्टरनेट का शामिल होना इन्टरनेट की व्यापकता और इसकी
शक्ति को दर्शाता है. जापान में आयी सुनामी के समय लोगों तक हेल्प पहुँचाना या इजिप्ट में हुए सत्ता  परिवर्तन में इन्टरनेट ने अपनी  पावर को प्रूव तो किया है. इन्टरनेट ही इकलौता मीडियम है जो रेडियो न्यूज़ पेपर और टेलिविजन की तरह वन वे मीडियम न होकर मल्टी डायमेंशनल है. अन्य दूसरे मीडियम के इतर यह उन कंट्रीज में भी कारगर है जहाँ संचार साधनों को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं प्राप्त है. इस मीडियम में थाट्स का फ्लो रोकना या उन्हें प्रभावित करना उतना आसान नहीं होता. इससे स्वतंत्र विचारों का सम्प्रेषण अधिक आसानी से होता है.सिटीजन जर्नलिस्ट के कांसेप्ट को पुष्ट करने में इन्टरनेट का सबसे बड़ा योगदान है आप कुछ भी दुनिया के साथ शेयर सकते हैं बगैर किसी सेंसर के आपको अपनी बात जन जन तक पहुंचाने के लिए कोई इंतिजार नहीं करना है .एक तरह से देखें तो इन्टरनेट ने मॉस कम्युनिकेशन के सीनेरियो को पूरी तरह से बदल दिया है डेवलपमेंट को सोसायटी के अंतिम आदमी तक पहुंचाने के लिए एड्मिनिस्त्रशन का  करप्शन फ्री और ट्रांसपैरेंट होना जरूरी है और इस काम को और अधिक फास्ट करने में इन्टरनेट एक एफ्फेक्टिव मीडियम के रूप में उभरा है इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है .विकासशील देशों में भले ही इन्टरनेट अपने पैर तेजी से पसार रहा हो पर उसकी गति विकसित देशों के मुकाबले कम है आईटीयू के ही आंकड़ों के अनुसार विकसित देशों में हर तीसरा व्यक्ति इंटरनेट से जुड़ा है वहीं विकासशील देशों में पांच में से चार व्यक्ति अब भी इंटरनेट से दूर हैं. भारत जैसे देश में जहाँ आर्थिक असमानता ज्यादा है वहाँ डिजीटल डिवाइड की समस्या और ज्यादा  गंभीर हो जाती है लेकिन रोटी कपडा और मकान जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकता के साथ जुड़ने से  अब इन्टरनेट सेवाओं का विस्तार भी दुनिया की सरकारों की प्राथमिकता में रहेगा और जैसे जैसे सरकारें अपनी जनता को एक बेहतर जीवन उपलब्ध करती जायेंगी इन्टरनेट का विस्तार अपने आप होता जाएगा .यह कहना ठीक नहीं होगा कि इससे एक दिन में देश या दुनिया की तस्वीर बदल जायेगी पर एक शुरुवात तो हो ही गयी है
आई नेक्स्ट में १२ जुलाई को प्रकाशित 

Thursday, July 14, 2011

इन्टरनेट पर अंकुश के खतरे

आज के दौर में विचारों के संप्रेषण का सबसे स्वतंत्र और द्रुतगामी माध्यम है इंटरनेट संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्टरनेट की सुविधा अब मानवाधिकारों की श्रेणी में आयेगी .यानि हम कह सकते हैं कि इन्टरनेट आने वाले समय में संविधान सम्मत और मानवीय अधिकारों का एक प्रतिनिधि बन कर उभरेगा दुनिया में इन्टरनेट ही एक ऐसा जन माध्यम है जो दुनिया भर की सरकारों के नियंत्रण से मुक्त है भारत के हिसाब से देखें तो यहाँ का मीडिया पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से मुक्त है फिर इन्टरनेट पर सेंसर का तो कोई सवाल ही नहीं उठता पर तस्वीर का एक दूसरा रुख भी है गूगल की 'ट्रांसपरेंसी रिपोर्टके मुताबिक़ छह महीनों में भारतीय  प्रशासन और यहाँ तक कि अदालतों की ओर से भी गूगल से कई बार कहा गया कि वे मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों की आलोचना करने वाले रिपोर्ट्सब्लॉग और वीडियो को हटा दें.
'ट्रांसपेरंसी रिपोर्टके अनुसार जुलाई 2010 से दिसंबर 2010 के बीच ऐसे सरसठ आवेदन आएजिन्हें गूगल ने नहीं माना.इन 67 आवेदनों में से छह अदालतों की ओर से आए और बाक़ी 61 प्रशासनिक विभागों से.रिपोर्ट के अनुसार ये आवेदन 282 रिपोर्ट्स को हटाने के बारे में थे. इनमें से 199 यू ट्यूब के वीडियो, 50 खोज के परिणामों, 30 ब्लॉगर्स से संबंधित थे.हालंकि गूगल ने इसके विवरण सार्वजनिक नहीं किये हैं लेकिन उसने माना कि कुल प्राप्त आवेदन में से बाईस प्रतिशत में उसने बदलाव किये हैं .गूगल की ट्रांसपेरंसी रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि दुनिया के ज़्यादातर देशों की न्याय प्रक्रिया से जुड़ी अलग-अलग एजेंसियाँ गूगल से उसकी सेवाएं इस्तेमाल करने वालों की जानकारी मांगती हैं.
इंटरनेट ने अपनी महत्ता को बार बार स्थापित  किया है चाहे जापान में आयी सुनामी के समय लोगों तक मदद पहुँचाना हो  या इजिप्ट में हुआ सत्ता  परिवर्तन इन्टरनेट ने अपनी  व्यापकता को सिद्ध किया है और एक जनमाध्यम के रूप में अपनी पहचान को स्थापित किया है . यह सर्व विदित तथ्य है कि तकनीक और विकास का सीधा सम्बन्ध रहा है कोई भी आविष्कार नयी तकनीक लाता है और शासक वर्ग हमेशा तकनीक को अपने कब्जे में रखना चाहता है इस तरह  तकनीक शक्ति का स्रोत बनी और उस पर नियंत्रण करने का साधन भी रही. 1456 में जब प्रेस का आविष्कार हुआ तो इसके जरिये व्यापक स्तर पर धर्म-प्रचार किया गया|गुटेनबर्ग की बाइबिल सर्वप्रथम छापे जाने वाली पुस्तक बनी.1561 में समाचारपत्रों का उदय हुआ जबकि भारत में इसकी शुरूवात 1774 से हुईवास्तविक रूप में सेंसर और अधिकारिक गोपनीयता अधिनयम जैसे कानून प्रेस को नियंत्रित करने के लिए ही बनाये गए थे फिर १९२० के दशक में रेडियो की शुरुवात हुई बाद में टेलीविजन आया पर इन सब पर सरकारी नियंत्रण १९९० के दशक तक बने रहे जब वैश्वीकरण और आर्थिक सुधारों की आड़ में सरकारों के ये समझ में आया कि उनका काम शासन करना है तब धीरे धीरे इन पर से शिकंजा ढीला किया गया पर इन्टरनेट इन सारे जनमाध्यमों में अपवाद रहा यह इकलौता माध्यम है जो रेडियो अखबार और टेलिविजन की तरह एकतरफा माध्यम न होकर बहुआयामी है. अन्य दूसरे माध्यमों के इतर यह उन देशों में भी कारगर है जहाँ संचार साधनों को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं प्राप्त है. इस माध्यम में विचारों का प्रवाह रोकना या उन्हें प्रभावित करना उतना आसान नहीं होता. इससे स्वतंत्र विचारों का सम्प्रेषण अधिक आसानी से होता है.सिटीजन जर्नलिस्ट की अवधारणा को पुष्ट करने में इन्टरनेट का सबसे बड़ा योगदान है आप कुछ भी दुनिया के साथ बाँट सकते हैं बगैर किसी सेंसर के आपको अपनी बात जन जन तक पहुंचाने के लिए कोई इंतिजार नहीं करना है अन्य जनमाध्यमों की अपेक्षा इन्टरनेट की आजादी किसी देश की सरकारों की मोहताज नहीं रही आम तौर पर यही माना जाता रहा है .लेकिन गूगल की ट्रांसपेरंसी रिपोर्ट के बाद इन्टरनेट की स्वतंत्रता पर सवालिया निशाँ उठने लग गए हैं कि सरकारें इन्टरनेट पर अपना नियंत्रण चाहती हैं इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण यह है कि बीते समय में इन्टरनेट प्रतिरोध और असहमति दर्ज कराने के एक बड़े प्लेट फार्म के रूप में उभरा है और जिसमे बड़ी भूमिका निभायी है फेसबुक जैसी विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स ने  .इन्टरनेट ने ही जनमाध्यमों को वो ताकत दी कि मीडिया मैनेज करने  जैसे जुमले निरर्थक हो गए .ब्लॉग ने लोगों को वो ताकत दी कि हर शख्स अपने ब्लॉग के जरिये अपनी सोच ,जानकारियां विचार साझा कर सकता है .इस मामले में अमेरिका निरंकुश शासन वाले देशों में राजनीतिक विरोधियों को इंटरनेट की आज़ादी हासिल करने के लिए ढाई करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद कर दुनिया के अन्य देशों के लिए उदहारण प्रस्तुत रहा है . विकासशील देशों में भले ही इन्टरनेट अपने पैर तेजी से पसार रहा हो पर उसकी गति विकसित देशों के मुकाबले कम हैआईटीयू के आंकड़ों के अनुसार विकसित देशों में हर तीसरा व्यक्ति इंटरनेट से जुड़ा है वहीं विकासशील देशों में पांच में से चार व्यक्ति अब भी इंटरनेट से दूर हैं और शायद यही कारण है इन्टरनेट के इतने जबरदस्त विस्तार के बावजूद अनेक देशों की सरकारें इन्टरनेट को संदेह की नज़रों से देख रही हैं और चीन एक सबसे बड़ा उदहारण है .चीन भले ही दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो पर इन्टरनेट वहां हमेशा सरकारी सेंसर का शिकार रहा है और गूगल कोई अपवाद नहीं है .इन्टरनेट पर नियंत्रण या सेंसर के भयानक दुष्परिणाम हो सकते हैं , विकास के फल को समाज के अंतिम आदमी तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था का  भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी होना जरूरी है और इस काम को तेज गति से करने में इन्टरनेट एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है और जब व्यवस्था की बात होगी तो शासन और तंत्र घेरे में आयेंगे ही प्रेस और टीवी को तो अक्सर कानूनों का सहारा लेकर उनकी धार को कुंद करने की कोशिश की जाती रही है पर वेब मीडिया इस तरह की किसी भी कोशिश से अब तक बचा रहा है पर गूगल की इस रिपोर्ट के बाद ये लगता है कि भारत में वेब मीडिया को भी भविष्य में उन खतरों का सामना करना पड़ सकता है जिनसे वो अब तक मुक्त था .प्रजातंत्र में असहमति के लिए भी सहमति बनाना जरूरी होता है और ये काम जनमाध्यम ही करते हैं क्योंकि जब तक वैचारिक स्तर पर किसी भी मुद्दे पर सवाल जवाब नहीं होंगे तब तक एक स्वस्थ लोकमत का निर्माण नहीं होगा तो जरुरत है इन्टरनेट को एक ऐसे माध्यम के रूप में आगे बढ़ाने के लिए जहाँ हर असहमत व्यक्ति अपने उदगार रख सके अगर ऐसा हो सका तो जागेगा इंसान जमाना देखेगा .
अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर १४ जुलाई २०११ को प्रकशित 

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