Monday, September 23, 2013

सरकारी आंकड़ों का सके लिए उपलब्ध होना

इंटरनेट पर सूचनाएं और आंकड़े खोजना और उनका विश्लेषण करना  कभी मुश्किल नहीं रहा पर जब आंकड़े भारत से सम्बन्धित हों तो किसी एक  अधिकृत स्रोत पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जहाँ देश से सम्बन्धित सारे  आंकड़े विश्वसनीय तरीके से प्राप्त किये जा सकें|आंकड़ों तक जनता की सर्वसुलभता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आंकड़ा भागिता और अभिगम्यता नीति (एन डी एस ए पी )2012 का निर्माण किया गया  जिसके अनुसार    आंकड़ा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था सरकार के विभिन्न उपक्रमों में संयोजन के हिसाब से उपर्युक्त नहीं है| इसी दिशा में राष्ट्रीय आंकड़ा भागिता और अभिगम्यता नीति को ध्यान में रखते हुए data.gov.in वेबसाईट का निर्माण किया गया है जहाँ सरकार के समस्त विभागों के गैर संवेदनशील आंकड़ों का संग्रहण किया जा रहा है| माना जाता है कि आंकड़ों तक आम जन की पहुँच से प्रशासन में पारदर्शिता बढेगी  और उनके  तार्किक विश्लेषण से  देश में हो रहे सामाजिक आर्थिक बदलाव पर नजर रखते हुए  योजनाएं बन सकेंगी |सूचना क्रान्ति के युग में भी अब तक सरकार आंकड़ों की अधिकृत  मालिक बनी हुई थी पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र का घोषणा पत्र भी कहता है कि राज्य सूचना को व्यापक रूप से उपलब्ध करा जनजागरूकता और भागीदारी में सुविधा प्रदान कर्रेंगे, सरकार की इस  पहल से भारत की डिजीटल तस्वीर बदलने की उम्मीद की जा रही है.data.gov.in वेबसाईट नेशनल इन्फोर्मेटिक्स सेंटर द्वारा विकसित की गयी है|इस वक्त इस साईट पर सरकार के इक्यावन विभाग के चार हजार अड़सठ डाटा सेट उपलब्ध हैं,भविष्य में इसमें विभिन्न राज्यों और संघ शासित केन्द्रों के आंकड़े भी शामिल किये जायेंगे |स्मार्ट फोन पर इंटरनेट के प्रयोग की अधिकता को देखते हुए इस वेबसाईट में कई तरह के एप भी विकसित किये जा रहे हैं जिन्हें डाउनलोड  कर उनका इस्तेमाल किया जा सकता जैसे किसी शहर के पिनकोड को जानने के लिए बस एक एप अपने फोन या कंप्यूटर में डाउनलोड करना है यह वेबसाईट काफी इंटरेक्टिव है लोगों से प्राप्त सुझाव को वेबसाईट में लगातार जगह दे जा रही है वहीं विभिन्न क्षेत्रों की कम्युनिटी पेज भी हैं जहाँ आप ब्लॉग के माध्यम से अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और सम्बन्धित विषयों के विभिन्न एप् डाउनलोड कर सकते हैं यदि आपने कोई एप बनाया है तो उसे सबके साथ साझा भी कर सकते हैं जैसे कृषि समुदाय के पेज पर भारत की समस्त मंडियों के कृषि उत्पाद की कीमत जानने और उनका तुलनात्मक आंकलन करने वाला एप मौजूद है|सूचना अधिकार कानून के बढते इस्तेमाल और लोगों में सूचना प्राप्त करने की बढ़ती प्रवृत्ति में  यह वेबसाईट सरकारी प्राधिकारणों पर सूचना देने के बढते दबाव को कम करने में सहायक सिद्ध हो सकती है| छ भागों में विभाजित इस वेबसाईट में लोगों को नए विचार साझा करने और जनउपयोगी एप बनाने के लिए कंटेस्ट का पेज भी है|अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह पहल क्रमशः2009 और 2010 में की जा चुकी है इन देशों के मुकाबले भारत के  इस प्रयोग  को सफल बनाने के लिए अभी कई कसौटियों पर खरा जाना है |इस प्रयोग की सफलता एप के अधिकाधिक निर्माण और ज्यादा से ज्यादा  लोगों तक उनको साझा किये जाने  पर निर्भर करेगी|हिन्दी के साथ  विभिन्न क्षेत्रीय भाषाई संस्करण अगर जोड़ दिए जाएँ तो ऐसे प्रयास निश्चित रूप से क्रांतिकारी साबित होंगे फिलहाल देश के आंकड़ों को जनता तक पहुँचने का एक पड़ाव तो पार हो ही चुका है |
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 हिन्दुस्तान में 23/09/13 को प्रकाशित 





Friday, September 20, 2013

प्रीपेड मोबाईल सी होती हमारी लाईफ

क्या हुआ सुबह सुबह मोबाईल में बैलेंस खत्म हो गया,नेट पैक रिचार्ज करवाना भूल गए अब ई पेपर कैसे पढ़ें.उफ़ जीवन में कितने मसले हैं भाई लोगों जिंदगी बहुत तेजी से बदल रही है तो प्रीपेड पोस्टपेड और मोबाईल  जैसे कॉन्सेप्ट हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं पर ये सब मैं आपको क्यूँ बता रहा हूँ.गुड़ क्वेशचन आपको सोल्यूशन चाहिए प्रोब्लम तो सबके साथ है.कभी आपने सोचा हमारी जिंदगी प्रीपेडमोबाईल  ही तो है हम इसका जितना ख्याल रखेंगे वो उतना ही ज्यादा चलेगी.आप नहीं समझे अरे भाई जमाना बहुत तेजी से बदल रहा है.अब शुद्ध घी की बात करने वाले देश में हमने रोमांस को वो भी शुद्ध वाला देशी बना दिया है.शादियाँ प्लान की जाती है और इसका बिजनेस बहुत तेजी से फ़ैल रहा है और फैमली प्लानिंग तो आप सबने सुना होगा.इस दुनिया में अब सबकुछ प्लान किया जा रहा है और प्लानिंग पर खासा जोर है.अब देखिये आपको पता होता है कि महीने में आपका मोबाईल और नेट पैक का कितना खर्चा आप उसी हिसाब से रीचार्ज करवाते हैं जहाँ आपकी प्लानिंग गड़बड़ाती है बैलेंस निल हो जाता है तब हम  भगवान से लेकर किस्मत को ना जाने कितना कोसते हैं पर गलती तो हमारी ही है ना,सोचिये  अगर आप स्टूडेंट हैं तो नेट पैक का यूज पढ़ने के लिए करेंगे ना कि डीफरेंट एप्प पर चैटिंग करते हुए अपना नेट पैक खत्म करेंगे मतलब आपकी प्लानिंग गडबड है.माना कि आप पढते हुए भी अपनी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड से जुड़े रहना चाहते हैं तो कोई सेम नेटवर्क वाला फ्री प्लान ले लीजिए पर एक ही वक्त में आपको कई सारे लोगों से बात करनी है और इसके लिए आपको कई मोबाईल चाहिए तो आपकी प्लानिंग गडबड है क्यूंकि अभी आप पढ़ रहे हैं और आपका ये शौक आपको अपने ऑब्जेक्टिव को अचीव करने से डिस्ट्रेक्त करेगा जब आप कमाने लग जाएँ जितने चाहें मोबाईल रखें कोई आपको रोकने नहीं आएगा .मुझे पता है आप बहुत समझदार हैं तो नो ज्ञान हम फ़िर लौट आते हैं जिंदगी पर वो भी प्रीपेड जिंदगी अरे भाई हमारी जिंदगी भी  तो प्रीपेड मोबाईल जैसी है.हमने अपने लिए जितने सपने देखे हैं अगर उनको पूरा करना है तो उतनी ही शिद्दत से मेहनत करनी पड़ेगी क्यूंकि वो कहावत तो अब पुरानी हो गयी कि जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा अब तो जितना बैलेंस होगा उतनी ही बात होगी.सपने जितने बड़े होंगे मेहनत उतनी ज्यादा करनी पड़ेगी अगर ऐसा नहीं करेंगे तो जैसे बैलेंस खत्म होने पर बात बीच में कट जाती है वैसी ही आप अपने सपने को हकीकत का जामा नहीं पहना पायेंगे.अच्छा कई बार ऐसा होता है कि आपके मोबाईल में बैलेंस भी होता है और बैटरी चार्ज फ़िर भी कॉल कनेक्ट नहीं होती तो क्या आप जिससे बात करना चाहते हैं उसको फोन नहीं करते है.ना आप फ़िर से कोशिश करते हैं और तब तक कोशिश करते हैं जब तक बात ना हो जाए तो आपकी प्लानिंग सही है फ़िर भी आप असफल हो रहे हैं तो इसका मतलब नहीं है कि आप प्रयास करना छोड़ देंगे बल्कि धीरज के साथ तब तक कोशिश करेंगे जब तक आपको सफलता ना मिल जाए.आपके पास बहुत अच्छा टच वाला थ्री जी मोबाईल है पर उसमें बैलेंस नहीं है तो वो बेकार है यानि बैलेंस के साथ मोबाईल का मेंटीनेंस भी जरूरी है तो इस प्रीपेड लाईफ में अपने शरीर का ध्यान रखना भी जरूरी है अब अब बीमार शरीर के साथ आप अपने सपने कैसे पूरे करेंगे तो लाईफ में एक अनुशासन रखिये समय से सोइए और समय से जागिये तो नो लेट नाईट चैट और नो एक्सेस ईटिंग और ना ही स्लिम रहने के चक्कर में डाइटिंग अरे भाई मोबाईल की बैटरी को ज्यादा चार्ज करेंगे तो क्या होगा और कम चार्ज करेंगे तो क्या होगा.समझ गए ना मैं क्या कह रहा हूँ.क्यूँ मैं बातें अच्छी करता हूँ न. अरे मैंने अपने मोबाईल को चार्ज कर रखा है और उसमें बैलेंस भी है फ़िर आपसे बात करने की कोशिश नहीं छोड़ता और देखिये ना हर महीने आप से बात करके ही मानता हूँ.
आई नेक्स्ट में 20/09/13 को प्रकाशित 

Thursday, September 19, 2013

अंधेर भले ना हो देर बहुत है

अपराध का कोई चरित्र नहीं होता है- अपराध समाजविरोधी वह क्रिया है जो समाज और विधि द्वारा निर्धारित आचरण का उल्लंघन या उसकी अवहेलना है। भारतीय समाज भी अपराधों से अछूता नहीं है। पिछले कुछ सालों में हमारे यहां बलात्कार की घटनाओं में काफी इजाफा हुआ है। बढ़ते बलात्कार सामजिक समस्या के साथ साथ कानूनी समस्या भी हैं। किसी भी सभी समाज में अपराधों के बढ़ने का मतलब है न्याय व्यवस्था पर ज्यादा भार, खासकर भारत जैसे देश में जहां न्यायालयों पर जरूरत से ज्यादा बोझ का असर न्याय में देरी के रूप में सामने आ रहा है। मुकदमों की त्वरित सुनवाई के लिए सरकार ने विशेष मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन की घोषणा की है। बलात्कार के बढ़ते मामलों का बोझ फास्ट ट्रैक अदालतों पर भी पड़ रहा है क्योंकि मुकदमों की संख्या में वृद्धि हो रही है। महिलाएं मुखरता से अपने साथ हुई ज्यादती को अब बयान कर रही हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित होने के कुछ दिन पूर्व दिल्ली में बलात्कार के चौदह सौ मामले सुनवाई का इंतजार कर रहे थे। अगस्त के मध्य तक, ये आंकड़ा बढ़कर 1,670 हो गया। पर तथ्य यह भी है कि औसत मुकदमे में लगने वाला समय कई सालों से घटकर लगभग 8-10 महीने रह गया है। हालांकि निराशाजनक बात यह है कि अपराध साबित होने की दर नहीं बढ़ी है । 2012 में दिल्ली के विभिन्न न्यायालयों ने बलात्कार के 547 मुकदमों की सुनवाई पूरी की, जिनमें 204 पुरु षों पर अपराध सिद्ध हुए, इस तरह अपराध के साबित होने की दर 37 प्रतिशत रही। इस साल जून तक, फास्ट ट्रैक न्यायालयों में 299 मुकदमों की सुनवाई हुई, जिनमें से 95 पुरुषों पर अपराध साबित हुआ, यानी अपराध साबित होने की दर 32 प्रतिशत रही। राजस्थान, जहां फास्ट ट्रैक न्यायालय 2005 से स्थापित हैं वहां बलात्कार जैसे मामलों में अपराध साबित होने की दर करीब पचीस प्रतिशत है। बलात्कार के अतिरिक्त अन्य अपराधों में पकड़े गए लोग भी अदालतों में इंतजार ही कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 में तीन करोड़ से ज्यादा लोग गंभीर अपराधों में मुकदमों पर निर्णय का इंतजार कर रहे थे। देश के कानून मंत्रालय का कहना है कि इनमें से एक-चौथाई मुकदमे पांच साल से भी पुराने मामलों से जुड़े थे, इनमें से करीब एक लाख बलात्कार के मामले थे। 2012 में महज 15 हजार से भी कम बलात्कार के मुकदमों की सुनवाई पूरी हुई। भारतीय न्याय आयोग की सन् 1984 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारत में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 10 न्यायाधीश थे। सन् 2007 तक आते-आते यह संख्या घट कर मात्र छह रह गई, जबकि इसी वक्त बांग्लादेश में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर न्यायाधीशों की संख्या 12 थी। हालांकि अप्रैल 2013 तक भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 13 हो गई थी, परंतु यह संख्या भारतीय न्याय आयोग द्वारा जारी 120वीं रिपोर्ट में प्रस्तावित संख्या 50 से लगभग चार गुना कम है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में 60 लाख से भी अधिक सं™ोय अपराधों के मामले दर्ज किए गए। यदि ऊपर दिए गए इन दोनों आंकड़ों को हम मिलकर देखें तो यह साफ नजर आता है कि स्थिति कितनी चिंताजनक है। सरकार ने 2001 और 2011 के बीच करीब 1,500 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए। लेकिन कोर्ट व्यवस्था से गुजरने वाले मामलों के लिए सरकारी वकीलों और न्यायाधीशों की संख्या अपर्याप्त है। देश की अदालतों में 2 करोड़ 60 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। इनमें से कुछ मामले पचास साल से भी ज्यादा पुराने हैं। साफ है कि हमारी न्यायपालिका मुकदमों के अतिशय भार से दबी हुई है। उदाहरण के लिए एक अमेरिकी कोर्ट में सालाना केवल दस हजार के करीब मुकदमे आते हैं जबकि हमारे उच्चतम न्यायालय में लगभग 5500 मुकदमे प्रतिमाह दर्ज होते हैं। पिछले वर्ष तिहाड़ में बंद 12,194 कैदियों में से 73.5 प्रतिशत अपने मुकदमे की सुनवाई शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2010 तक देश के 2.4 लाख कैदियों में 65.1 प्रतिशत अपने मुकदमों के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे और 1,659 कैदी यानी कुल कैदियों की संख्या के 0.7 प्रतिशत , बगैर मुकदमा शुरू हुए पिछले पांच सालों से जेल में थे। न्याय मिलने में लेटलतीफी की इस समस्या का कोई त्वरित समाधान नहीं है, पर जो समाधान हमारे पास हैं हम उन्हें भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं या नहीं करना चाह रहे हैं। हमारे देश के अधिकतर न्यायालय लगभग एक महीने के ग्रीष्मकालीन अवकाश पर रहते हैं, जबकि माननीय उच्चतम न्यायालय इससे कहीं अधिक पैंतालीस दिन के ग्रीष्मकालीन अवकाश पर रहता है। हालांकि भारतीय न्याय व्यवस्था में अवकाशकालीन न्यायालयों का प्रावधान है, पर वे अत्यंत ही महत्वपूर्ण मुकदमों को छोड़कर और किसी मुकदमें के लिए नहीं हैं। ग्रीष्मकालीन अवकाश की व्यवस्था हमें अपनी अन्य कई व्यवस्थाओं की ही तरह अंग्रेजों से विरासत में मिली है। नियमानुसार माननीय उच्चतम न्यायालय को 185 और उच्च न्यायालयों को 210 दिन कार्य करना चाहिए, पर आमतौर पर यह संख्या कम ही रहती है। मसलन, एक आंकड़े के अनुसार पिछले वर्ष मद्रास उच्च न्यायालय में केवल 155 दिन कार्य हुआ। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि न्यायाधीशों का कार्य अत्यंत ही संवेदनशील होता है और देश में न्यायाधीशों की संख्या कम होने के कारण उन पर आवश्यकता से अधिक बोझ है। मुकदमों की संख्या बढ़ने और उनके सालों घिसटने में कुछ लोगों का अपना स्वार्थ भी होता है। इसके पीछे ज्यादातर यह मानसिकता काम कर रही होती है कि मुकदमे में लगने वाले समय और होने वाले खर्च से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोग हालात से समझौता कर मुकदमा या तो बीच में छोड़ कर हार मान लेंगे या अदालत के बाहर कोई राजीनामा कर ही लेंगे। हालांकि तथ्य यह भी है कि अगर न्यायाधीश मुकदमों के लिए अनावश्यक तारीख मांगने वाले पक्ष की मंशा को भांप लेते हैं तो वे अपने विवेक से उन्हें रोक सकते हैं। पर मौजूदा स्थिति में इस अधिकार का इस्तेमाल कम ही होता दिखता है। अगर देश में न्याय व्यवस्था की स्थिति बदलनी है और जेलों को सही मायने में सुधार गृह की तरह बनाना है तो न्यायालयों में तेजी से फैसले करने वाले न्यायाधीशों को प्रोत्साहित करने और आदतन मुकदमों को लटकाने वाली व्यवस्था को हतोत्साहित करने के लिए कुछ प्रावधान होने चाहिए। इसमें कोई संशय नहीं है कि देश की अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम किया जाना बहुत जरूरी है। हालांकि न्यायतंत्र से जुड़े अति संवेदनशील मुद्दे पर निर्णय इतनी आसानी से नहीं लिया जा सकता, पर अब वह वक्त आ गया है जब हमें गंभीरता से इस बात को समझना पड़ेगा कि मुकदमों का त्वरित निपटारा जहां लोगों को तुरंत न्याय दिलवाएगा, वहीं जेलों को ऐसे विचाराधीन कैदियों की संख्या से छुटकारा मिलेगा जिनको अभी ये पता ही नहीं कि वे दोषी हैं भी या नहीं। तभी हमारी जेलें सही मायने में सुधार गृह बन पाएंगी।
राष्ट्रीय सहारा में 19/09/13 को प्रकशित 

Tuesday, September 3, 2013

जिन्दगी के सरप्राईज़ टेस्ट

एक गाना सुना था कभी जिंदगी इम्तिहान लेती है हमने तो कोर्स का इम्तिहान सुना था पर जिंदगी इम्तिहान लेती है तो जरुर कोई टीचर भी होगा जो हमें जिंदगी का इम्तिहान देना सिखाता होगा पर हम उसे उसका ड्यू कभी नहीं देते क्यूंकि हमें पता ही नहीं होता कि हम किससे क्या सीख रहे हैं.क्यूँ डूड एक डिफरेंट पर्सपेक्टिव दिख रहा है ना अब जब एक्स्जाम की बात चल पडी है तो एक सवाल है ,जिंदगी में सबसे अहम क्या होता दिमाग लड़ाइये कुछ समझ में नहीं आ रहा है चलिए मैं आपकी मदद करता हूँ जिंदगी में सबसे अहम होता है लगातार सीखते जाना यही एक चीज है जो हमें आगे आगे बढाती है.जिस दिन हमें ये लग गया कि हम सब जान गए उसी दिन से हमारा खात्मा शुरू हो जाता है और हम जिससे भी सीखते हैं वो हमारी जिंदगी का मास्टर हो जाता है.अच्छा सोचिये आप जिंदगी में जितने भी लोगों से इम्प्रेस हुए हैं उनसे आपने जरुर कुछ सीखा होगा.सीखने के लिए उसे टीचर होना जरूरी नहीं जिंदगी में हमें ना जाने कितने लोग मिलते हैं जो बगैर कहे हमें बहुत कुछ सीखा कर चला जाते हैं और हमें कभी पता ही नहीं चलता.कोर्स की पढ़ाई से जिंदगी की पढ़ाई बहुत मुश्किल होती है और इस पढ़ाई का ना तो कोई फिक्स्ड सेलेबस होता है ना ही कोई फिक्स्ड टीचर अब देखिये ना अगर आपसे कहा जाए कि आपको प्यार करना किसने सीखाया तो आप किस टीचर का नाम लेंगे मम्मी की प्यार भरी लोरियाँ या पापा का प्यार भरा स्पर्श या वो दोस्त जिसे आप कब का अपने दिल से निकाल चुके हैं पर वो है कि आज भी इस आप के इन्तजार में है.हम अक्सर स्मार्ट बनते है कि हम तो डूड हैं जिसके पाले में जायेंगे उसे भारी कर देंगे पर हमारे आस पास ऐसे बहुत से मिंटू और चिंटू जैसे लोग हैं जिन्हें बगैर स्वार्थ हमारी मदद करना अच्छा लगता है ये वही लोग हैं जिनसे हमें अपने डूड होने का एहसास होता है.एहसास से याद आया हम डेली कितना कुछ कितने लोगों से सीख रहे होते हैं पर ये एहसास नहीं करते.उस दोस्त को याद कीजिये जिससे आपने बगैर किसी कारण से पांच महीने से बात नहीं की और गलती भी आप की है फ़िर भी वो शांति से इन्तजार कर रहा है कि कभी आप उसके अपनत्व और धैर्य को समझेंगे,कितनी सहजता से वो आपको जिंदगी का पाठ पढ़ा रहा है पर आप है कि समझते ही नहीं, तो हम बस उन्हीं टीचर्स को याद रखते हैं जिन्होंने कोर्स का सिलेबस पढाया होता पर जिंदगी का सिलेबस जो आपको अनगिनत लोगों द्वारा सिखाया जा रहा है उन पर भी गौर कीजिये वो दोस्त हैं ,रिश्तेदार हैं और कई बार तो बहुत से लोग बगैर किसी रिश्ते में बंधे हमें सीखा कर चले जाते हैं फ़िर कभी ना आने के लिए.कोर्स का एक्स्जाम साल में एक या दो बार होता है पर जिंदगी तो रोज सरप्राईज़ टेस्ट लेती है. अब मुझे देखिये कहने को तो मास्टर हूँ पर हर दिन अपने स्टुडेंट्स से सीखता हूँ क्यूंकि उनके होने से मैं हूँ. मैं उनके कोर्स का टीचर हूँ पर मेरे जिंदगी के टीचर वो सब हैं जिनके साथ रहकर मैं जिंदगी को समझ पाता हूँ.जिंदगी में सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं होता है पर जो कुछ भी होता है उसे कैसे बेहतर बनाये जाए ये तो जिंदगी का टीचर ही सीखा सकता है,पर ऐसे लोग कौन हैं जरुरत है उनको पहचानने की कि ऐसे कौन लोग हैं जो आपका भला चाहते है और जो भला चाहते हैं वो हमेशा मीठी मीठी बातें नहीं करेंगे.असल में जो आपकी कद्र करते हैं उनकी कद्र कीजिये आप अपने आप जिंदगी की पढ़ाई में अव्वल आने लग जायेंगे पर ध्यान रखिये जिंदगी की पढ़ाई कोर्स की पढ़ाई से ज्यादा मुश्किल है तो आज के दिन मैं अपने छात्रों का शुक्रिया करूँगा जिन्होंने मुझे जिंदगी की पढ़ाई करने में मदद की .
हैप्पी टीचर्स डे
आई नेक्स्ट में 03/09/13 को प्रकशित 

Thursday, August 29, 2013

आंकड़े होंगे आगे की पत्रकारिता का आधार

वाशिंगटन पोस्ट अख़बार के बिकने की ख़बर की घोषणा के बाद से ही अमरीकी मीडिया में अखबारों के भविष्य को लेकर बहस  जारी है  भारत के लिए भी यह बड़ा सबक है अखबारों को जो हाल आज अमेरिका में है वो आने वाले सालों में भारत का भी होगा|इंडियन रीडरशिप सर्वे के चौथी तिमाही के रिपोर्ट के अनुसार भारत के शीर्ष दस हिंदी दैनिकों की औसत पाठक संख्या में 6.12 प्रतिशत की गिरावट आयी है वहीं अंग्रेजी दैनिकों में गिरावट की दर 4.75 प्रतिशत रही.पत्रिकाओं में यह गिरावट सबसे ज्यादा 30.15 प्रतिशत रही|बढ़ता डिजीटलीकरण और सूचना क्रांति ने अखबारों की दुनिया बदल दी है| पत्रकारिता के जिस रूप से हम परिचित हैं वह दिन-प्रतिदिन बदलता जा रहा है जब विभिन्न वेबसाईट  और वेब न्यूज़ पोर्टल पल-पल खबरें अपडेट कर रहे हैं तो समाचार पत्रों की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।कल के अखबार की खबरें यदि पाठक आज ही इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कर सकता है तो फिर कल के अखबार की जरूरत ही क्या है पर भारत के संदर्भ में जहाँ निरक्षरों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है और अखबारों से नए पाठक जुड रहे हैं स्थिति अमेरिका जितनी गंभीर नहीं पर चुनौती कोई भी क्यूँ ना हो अपने साथ अवसर भी लाती है भारत के अखबारों का कंटेंट और उसके प्रस्तुतीकरण का तरीका भी तेजी  से बदल रहा है प्रिंट और डिजीटल दोनों का तालमेल हो रहा है|इस बदलाव में बड़ी भूमिका आंकड़े निभा रहे हैं वो चाहे पाठकों की प्रष्ठभूमि को जानकर उसके अनुसार सामग्री को प्रस्तुत करना हो या समाचार या लेखों में आंकड़ों को शीर्ष भूमिका में रखकर कथ्य को इन्फो ग्राफिक्स की सहायता से दर्शनीय और पठनीय बना देना |अखबार के डिजीटल संस्करण इन आंकड़ों के बड़े स्रोत बन रहे हैं| वर्ल्ड वाइड वेब के जनक सर टिम बरनर्स ली का ये कथन कि ‘डाटा (आंकड़ों) का विश्लेषण ही पत्रकारिता का भविष्य है’ | विकिलीक्स और सूचना के अधिकार के इस दौर में जहां लाखों आंकड़ें हर उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध हैं जो वास्तव में उनके  बारे में जानने का इच्छुक है वहाँ उन आंकड़ों को समाचार रूप में प्रस्तुत करना एक चुनौती है।आंकड़ा पत्रकारिता, पत्रकारिता का वह स्वरूप है जिसमें विभिन्न प्रकार के आंकड़ों का विश्लेषण करके उन्हें समाचार का रूप दिया जाता है। विकिलीक्स और सूचना के अधिकार के इस दौर में जहां लाखों आंकड़ें हर उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध हैं जो वास्तव में उनके  बारे में जानने का इच्छुक है वहाँ उन आंकड़ों को समाचार रूप में प्रस्तुत करना एक चुनौती है। एक बात जो पत्रकारों और पत्रकारिता के पक्ष में जाती है वह यह है कि भले ही आंकड़ें सबके अवलोकन के लिए उपलब्ध हैं पर उनका विश्लेषण कर उनसे अर्थपूर्ण तथ्य के लिए अखबार अभी भी एक विश्वसनीय जरिया हैं|वेबसाईट और पोर्टल पर समाचार का संक्षिप्त या सार रूप ही दिया जाता है क्यूंकि डिजीटल पाठक सरसरी तौर पर सूचनाओं की जानकारी चाहते हैं जिससे वे अपडेट रहे हैं वहीं दूसरी ओर कम्प्यूटर स्क्रीन और स्मार्ट फोन की स्क्रीन भी तथ्यों के प्रस्तुतीकरण में एक बड़ी बाधा बनती है और शायद इसीलिये आंकड़ों का बेहतरीन विश्लेषण अखबार के पन्नों में होता है जहाँ पढ़ने के लिए माउस के कर्सर या टच स्क्रीन को सम्हालने जैसी कोई तकनीकी समस्या नहीं होती है |
समाचार पत्र इस तरह की किसी तकनीकी सीमा से मुक्त हैं और चौबीस घंटे में एक बार पाठकों तक पहुँचने के कारण उनके पर्याप्त समय भी रहता है,जिससे आंकड़ों का बहुआयामी विश्लेषण संभव हो पाता है|त्वरित सूचना के इस युग में आंकड़ा आधारित  पत्रकारिता का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि महज़ सूचना या आंकड़ें उतने प्रभावशाली नहीं होते हैं जितना की उनका विश्लेषण और उस विश्लेषण द्वारा निकले गए वह परिणाम जो आम जनता की ज़िंदगी पर प्रभाव डालते हैं। बात चाहे खाद्य सुरक्षा बिल की हो या मनरेगा जैसी योजनाओं सभी में आंकड़ों का महत्वपूर्ण रोल रहा है सरकार अगर आंकड़ों की बाजीगरी कर रही है तो जनता को व्यवस्थित तरीके से आंकड़ा पत्रकारिता के जरिये  ही बताया जा सकता है कि ये असल में देश की तस्वीर कैसी बन रही है|इसमें को संशय नहीं कि भविष्य में हमारे पास जितने ज्यादा आंकड़े होंगे हम उतना ही सशक्त होंगे पर पाठकों को बोझिल आंकडो के बोझ से बचाना भी है और उन्हें सूचित भी करना है और इस कार्य में भारत में अभी भी समाचार पत्र अग्रणी हैं|
आंकड़ा  पत्रकारिता पाठकों अथवा दर्शकों को उनके महत्व की जानकारी प्राप्त करने में मदद करती है, एक ऐसी कहानी सामने  लाती है जो ध्यानयोग्य है और पहले से जनता की जानकारी में नहीं है और पाठकों को एक गूढ विषय को आसानी से समझने में मदद करती है। दुनिया के बड़े मीडिया समूहों जैसे द गार्डियन, ऑस्ट्रेलियन ब्रोडकास्टिंग कार्पोरेशन ने इसपर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है।माना जा रहा है कि वाशिंगटन पोस्ट ने वर्षों  से पंजीकरण द्वारा अपने पाठकों के बारे में जो आंकड़े जुटाएं है उसका इस्तेमाल कर अखबार अपनी लोकप्रियता और प्रसार दोनों बढ़ाएगा,यानि डिजीटल प्लेटफोर्म का इस्तेमाल अख़बारों की सामग्री को बेहतर करने के लिए  पाठकों की रुचियों और आवश्यकताओं को जानना जरूरी है और इसमें आंकड़ों का प्रमुख योगदान है| द गार्डियन ने तो अपने विशेष डेटा ब्लॉग के जरिये आडियन्स के बीच अच्छी ख़ासी पकड़ बना ली है। हालांकि की कुछ लोग यह भी मानते हैं की डेटा पत्रकारिता वास्तव में पत्रकारिता ही नहीं है पर यदि इसे थोड़ा करीब से देखा जाये तो किसी को भी इसे पत्रकारिता मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए। डेटा पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता से केवल इस माने में भिन्न है कि इसमें जानकारी जुटाने के लिए अधिक भाग दौड़ नहीं करनी पड़ती है पर आंकड़ों के अथाह सागर में से काम के आंकड़े निकालना भी कोई आसान काम नहीं है। डेटा पत्रकारिता के लिए समाचार का विशिष्ट होना आवश्यक है। इसके लिए आवश्यक है एक मजबूत संपादकीय विवरण जिसके पास आकर्षक ग्राफिक्स और चित्रों का समर्थन हो।  भारत इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण इसलिए है कि यहाँ स्थितियां अमेरिका जैसी नहीं है जहाँ इंटरनेट का साम्रज्य फ़ैल चुका है यहाँ डिजीटल और प्रिंट माध्यम दोनों साथ साथ बढ़ रहे हैं  वो भी एक दूसरे की कीमत पर नही दोनों को अपने दायरे हैं अगर प्रिंट के पाठक कम हो रहे हैं तो नए पाठकों जुड भी रहे हैं नए प्रिंट के पाठक जल्दी ही डिजीटल मीडिया के पाठक हो रहे हैं जिसमें ग्रामीण भारत बड़ी भूमिका निभा रहा है|तथ्य यह भी है की सूचना क्रांति के बढ़ते प्रभाव और सूचना के अधिकार जैसे  कानून के कारण आंकड़े तेजी से संकलित और संगठित किये जा रहे हैं वहां ख़बरों के असली नायक आंकड़े हैं जो पल पल बदलते भारत की वैसी ही तस्वीर आंकड़ों के रूप में हमारे सामने पेश कर रहे हैं तो अब समाचार तस्वीर के दोनों रुख के साथ साथ ये भी बता रहे हैं कि अच्छा कितना अच्छा है और बुरा कितना बुरा है |
राष्ट्रीय सहारा में 29/08/13 को प्रकाशित 

Wednesday, August 21, 2013

राखी

राखी का त्यौहार निकट आया 
मेरा ह्रदय प्रसन्नता से भर आया 
मैं दौड कर पहुंचा मान के पास 
हर्षित मन से पूछा प्रश्न सोल्लास 
माँ "मेरे कौन बांधेगा राखी ?
मेरे इस प्रश्न पर छाई माँ के चेहरे पर उदासी
मैं उदासी का मतलब समझ गया
और मन मसोस कर रह गया
शायद भगवान को यही मंजूर था
मुझे बहन का प्यार पाना नामंजूर था
(साल 1990 था पर किस दिन लिखी थी याद नहीं ये कवि
ता ......

Sunday, August 18, 2013

खाद्य सुरक्षा तो देंगे पर साफ़ सफाई की नहीं


खाद्य सुरक्षा बिल पर उठा पटक जारी है इस अध्यादेश के कानून बन जाने के बाद देश भुखमरी की समस्या से निपट पायेगा और अपने मानव संसाधन को बेहतर बना पायेगा इस कार्यकर्म के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 75 प्रतिशत आबादी आएगी, जबकि शहरी क्षेत्र में इस विधेयक के दायरे में 50 प्रतिशत आबादी आएगी,जिसे सरकारबहुत कम दामों में चावल, गेहूं और दूसरे अनाज उपलब्ध करायेगी,लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि खाद्य  सब्सिडी भारत में और विशेषकर ग्रामीण इलाकों में खराब साफ-सफाई की समस्या को नज़रअंदाज़ करती है। भारत दुनिया का सबसे बड़े  खुले  शौचालय वाला देश है जहाँ दुनिया के लगभग साठ प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं और उनके  मल के उचित प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है ग्रामीण इलाके अभी भी खुले में शौच के लिए अभिशप्त है अंदाजा लगाया जा सकता है स्थिति कितनी शोचनीय जिसमे बांग्लादेश ,नेपाल ,पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशभी खुले शौचालय के मामले में हमसे बेहतर स्थिति में है |शौचालयों के न होने का अर्थ है  लोग खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं जिससे बच्चों में जीवाणु संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, जो छोटी आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है जिससे बच्चों के बढ़ने, विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को लेने  की क्षमता या तो कम हो जाती है या रुक जाती है, तो  इससे कोई असर  नहीं पड़ता कि उन्होंने कितना भोजन खाया है।कुपोषण एक स्वास्थ्य समस्या के साथ भारत के संदर्भ में एक सांस्कृतिक जटिलता भी है जहाँ खुले में शौच को सामजिक मान्यता  मिली हुई है पर इस मान्यता से कितनी तरह की स्वाश्य समस्याएं पैदा हो रही हैं इस ओर लोगों का ध्यान कम ही जाता है|यूनिसेफ कहता है कि भारत में 61.7 मिलियन बच्चे नाटे हैं, जो दुनियाभर में सबसे ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों  के हिसाब से पांच वर्ष से कम आयु के करीब 20 फीसदी बच्चे अपने कद के हिसाब से कमज़ोर अथवा काफी पतले हैं।इकॉनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकशित एक  पेपर में यूनिवर्सिटी ऑफ सूसेक्स और यूनिसेफ के ग्रेगोर वॉन मेडीज़ा ने कहा कि स्वच्छता और कम पोषण के बीच संबंध को व्यापक तौर पर अनदेखा किया जाता है, उन्होंने इसे ‘अंधा बिन्दु’ कहा है जिसको व्यापक संदर्भ में नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए|स्वच्छता के बारे में ना तो जागरूकता है और ना ही ये हमारी प्राथमिकता में है|वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर गगनदीप कांग, का  अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि रोगाणु बच्चों की अंतड़ियों को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं, जो फलत: कुपोषण की तरफ ले जाता है यानि सफाई और कुपोषण के बीच संबंध है हम कुपोषण की समस्या से सिर्फ खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करा कर नहीं लड़ सकते यानि सिर्फ स्वच्छता से लोग कुपोषित नहीं होगें और  ना ही सिर्फ  भोजन से प्रत्येक बच्चे का समुचित विकास हो सकता है। दोनों का उचित मिश्रण ज़रूरी है|दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के एक अतिथि प्रोफेसर डीन स्पीयर्स के शोध के मुताबिक जिन भारतीय ज़िलों में शौचालय हैं, वहां बौने बच्चों की संख्या कम है।2011 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि जिन भारतीय बच्चों को दस्त लगे हैं, उनमें करीब 80 फीसदी शौच करने के बाद साबुन से हाथ साफ नहीं करते| विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत  कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के कुपोषित होने की मुख्य वजह दस्त है। विश्व में प्रत्येक वर्ष इस उम्र वर्ग के 800,000 से ज्यादा बच्चों की दस्त से मृत्यु होती है,और  इनमें से एक चौथाई मौतें भारत में होती हैं| इसका सीधा सा मतलब  है कि स्वच्छता योजनाओं और खाद्य सुरक्षा पर संतुलित निवेश किया जाए और इस दोतरफा निवेशन से ही ग्रामीण भारत का मानव संसाधन बेहतर हो पायेगा|भारत के नन्हे बालको का भविष्य तभी सुरक्षित  है जब उनकी मुट्ठियाँ साफ़ और कीटाणु रहित होंगी| हैं। सरकार भोजन की उपलब्धता की गारंटी तो सुनिश्चित कर रही है पर वो भोजन कैसा होगा और किन पर्यावासों में उसका उपयोग किया जाएगा यह तथ्य पूरी तरह से नजरंदाज किया जा रहा है|
गाँव कनेक्शन साप्तहिक के 18/08/13के अंक में 

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