Monday, March 7, 2022

सामरिक हथियार बनी सूचनाएं


 युक्रेन और रूस में युद्ध जारी है और सारी दुनिया की निगाहें इन दो देशों की तरफ हैं पर युद्ध सिर्फ रूस और युक्रेन के बीच में नहीं चल रहा है एक और युद्ध भी है जो चल रहा है साइबर मैदान में जिसे हम सूचना युद्ध के नाम से जानते हैं|जहाँ इंटरनेट और मीडिया कम्पनियों के सहारे छवि निर्माण की होड़ मची है |एक तरफ है अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देश जो ये मानते है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन सारी दुनिया के लिए खतरा हैं |वही दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति पुतिन सारी दुनिया को यह समझाने में लगे हैं कि रूस का गौरव   सर्वोपरि है | तथ्य यह भी है कि युद्ध अपने आप में खुद समस्या है और इससे किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता लेकिन जनमत निर्माण सिर्फ कुछ ओपीनियन लीडर्स के भरोसे इंटरनेट के दौर में नहीं छोड़ा जा सकता |पहले यह समझते है कि रूस ने यूक्रेन पर हमला क्यों किया साल 2014 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था. उस वक़्त रूस समर्थित विद्रोहियों ने देश के पूर्वी हिस्से में एक अच्छे खासे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया थाउस वक़्त से लेकर आज तक इन विद्रोहियों की यूक्रेन की सेना से भिड़ंत लगातार जारी हैदोनों देशों के बीच टकराव टालने के लिए मिन्स्क का शांति समझौता भी हुआलेकिन उसके बाद भी टकराव ख़त्म नहीं हुआ|पुतिन का मानना  है कि इसी वजह से वो सेना को यूक्रेन में हमला करने  को मजबूर हैदूसरी  संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने रूस द्वारा यूक्रेन के अलगाववादी राज्यों में 'शांति कायमकरने के उद्देश्य से सेना भेजने के तर्क को सिरे से खारिज किया है|

फरवरी के आख़िरी हफ्ते में ट्विटर ने बताया कि रूस में इसकी वेबसाइट को प्रतिबंधित किया जा रहा है। ट्विटर ने ट्वीट कर बताया, 'हम इस बात से अवगत हैं कि रूस में कुछ लोगों के ट्विटर अकाउंट को बंद किया जा रहा है ओर हम सर्विस को सबकी पहुंच के दायरे में रखने व इसे सुरक्षित रखने के लिए काम कर रहे हैं। इससे पहले फेसबुक ने रूस की स्थानीय मीडिया पर यूक्रेन में इसके सैन्य कार्रवाई पर विज्ञापन चलाने को लेकर रोक लगाई थी।  इसके जवाब में रूस ने फेसबुक के इस्तेमाल पर पाबंदीलगा दी । दरअसल यूक्रेन में रूसी सैन्य कार्रवाई के बाद फेसबुक ने रूस समर्थित मीडिया संस्थानों के विभिन्न अकाउंट पर रोक लगा दी थी। रूस की सरकारी संचार एजेंसी 'रोसकोमनादजोरने फेसबुक पर ‘रूसी नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता’ के उल्लंघन का आरोप लगाया।वहीं गूगल ने रशिया टुडे और स्पुतनिक के यूट्यूब चैनल को ब्लॉक कर दिया है। इससे पहले मेटा(फेसबुक ) ने भी पूरे यूरोपीय संघ में रूसी राज्य मीडिया आउटलेट आरटी और स्पुतनिक को ब्लॉक किया है।इस सारे घटनाक्रम में कुछ मुद्दे विचारणीय है जब कोई दो देश युद्ध कर रहे हैं तो सूचनाओं में इंटरनेट का एल्गोरिदम महत्वपूर्ण  हो जाता है|2018 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में फर्जी जनमत निर्माण में कई सोशल मीडिया कम्पनियों की भूमिका पर सवाल उठे थे |किसी युद्ध में हम जब किसी देश के बारे में राय बनाते हैं |उसमें मीडिया की बड़ी भूमिका होती खासकर इंटरनेट की |ज़रा याद कीजिये |2003 में अमेरिकी नेत्रत्व में गठबंधन देशों की सेनाओं ने ईराक पर कुछ इसी तरह से हमला किया था जैसा आज रूस ने यूक्रेन में किया हैऐसा ही तर्क अमेरिकी सेना ने ईराक हमले के वक्त दिया था |इराक में जन तबाही करने वाले हथियारों के ज़खीरे को लेकर जो भी फैसले लिए गए और इन्हें जिस तरह से पेश किया उसे किसी भी तरह से तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है|बाद के घटनाक्रम ने इस तथ्य को सिद्ध ही किया कि ईराक पर हमला एक गठबंधन देशों की भूल थी |तब सोशल मीडिया का जन्म नहीं हुआ था और सूचना का मुक्त प्रवाह पश्चिमी चश्मे से ही देखा जाता था और सद्दाम हुसैन का पक्ष दुनिया के सामने वही आया जो पश्चिमी मीडिया ने दिखाया|इंटरनेट ने खेल भले ही पलट दिया हो लेकिन यहाँ फिर एल्गोरिद्म महत्वपूर्ण हो उठता है | अमेरिका का इतिहास बताता है कि वो ऐसी नीतियां बनाता है जो उसके व्यवसायिक हितों की पूर्ति करे और ऐसी संस्थाओं का संरक्षण करता है जो उसके हित लाभ के साधन में मदद करे |तस्वीर का एक रुख विकिलीक्स से जुड़ा है|बात भले छोटी हो पर इसके निहितार्थ बड़े हैंविकिलीक्स का जन्म ही इंटरनेट की ताकत और विस्तार के कारण हुआ और इस पर सबसे बड़ी चोट अमेरिका ही ने पहुंचाई |विकिलीक्स के द्वारा जारी किये गए सैकड़ों गोपनीय कूटनीतिक संदेशो से सारी दुनिया अमेरिका के दोहरे रवैये को जान गयी वहीं इस खुलासे से वेब पत्रकारिता को नया आयाम मिला आमतौर पर समाचार पोर्टल टीवी और अखबार की सामग्री से ख़बरें बनाते थे पर मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार वेब से आयी सामग्री टीवी और अख़बारों की ख़बरों का आधार बनीरूस यूक्रेन युद्ध  को रोकने की दिशा में अमेरिकाजर्मनीब्रिटेन समेत तमाम देश  रूस और उसके सहयोगियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रहे हैं और उसी के साथ जनमत बनाने का खेल भी चल रहा है | कूटनीति में कोई भी फैसले दो दूनी चार नहीं होते और कोई भी पक्ष पूरी तरह से दोषी या निर्दोष नहीं होता है |यह साल 2003 नहीं जब दुनिया के कुछ ताकतवर राष्ट्र एक अनाम रिपोर्ट पर एक देश को युद्ध में झोंक देते हैं |

पश्चिमी मीडिया के इस नजरिये का शिकार भारत भी रहा है |साल 2012 में असम में हुई समस्या और भारत के कई शहरो से उत्तर पूर्व के निवासियों का पलायन हुआ | सरकार ने इसके लिए इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर फ़ैली अफवाहों और भडकाऊ तस्वीरों को दोषी माना और कार्यवाही करते हुए 245 वेबसाइट-वेब पन्नों को ब्लॉक कर दिया गया|आश्चर्यजनक रूप से तेजी दिखाते हुए सरकार के इस  फैसले के बाद अमरीकी विदेश मंत्रालय की तत्कालीन प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड ने बयान दिया  कि अमरीका इंटरनेट की आजादी के पक्ष में हैभारत  सरकार से निवेदन किया कि वो मूलभूत अधिकारोंकानून और मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखे|

भारत को मानवाधिकार और इंटरनेट की आजादी का पाठ पढाने वाले इस बयान को जरा इन आंकड़ों के संदर्भ में पढ़ें तो एक बार फिर अमेरिका का व्यवसायिक नजरिया स्पष्ट हो जाएगा | सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था विकास केंद्रित हुई है|  आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने में इन्टरनेट की भूमिका में  अमेरिका के व्यवसायिक हित सम्मिलित हैं ,इंटरनेट के अस्तित्व में आने से इस पर हमेशा अमेरिकी सरकारकंपनियोंऔर प्रयोगकर्ताओं  का अधिपत्य  रहा है लेकिन अब इसमें तेजी से बदलाव आ रहा है जिसका केंद्र भारत और ब्राजील जैसे देश शामिल हैंजहाँ इंटरनेट तेजी से फल फूल रहा है जिसमे बड़ी भूमिका फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवकिंग साईट्स निभा रही है |सोशल नेटवर्किंग साईट्स के प्रभाव का आंकलन करते वक्त हम इसके व्यवसायिक पक्ष को  दरकिनार नहीं कर सकते |जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था में अपना अहम योगदान दे रही हैं क्योंकि सभी बड़ी सफल सोशल नेटवर्किंग साईट्स का उद्गम अमेरिका ही है फेसबुक का मतलब महज सोशल नेटवर्किंग नहीं है बल्कि  ये विज्ञापन ,मीडिया और नए रोजगार के निर्माण से भी सम्बन्धित है | फेसबुक को अन्य देशों की क्षेत्रीय सोशल नेटवर्किंग साइट जैसे दक्षिण कोरिया में सिवर्ल्डजापान की मिक्सीरूस में वोकांते से कड़ी टक्कर  मिल रही सूचना क्रांति ने लोगों के  मूलभूत अधिकारों,और मानवाधिकारों को एक बड़े बाजार में तब्दील कर दिया है|यह भी सूचना क्रांति का एक पक्ष है |

 दैनिक जागरण में 07/03/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, February 9, 2022

जाड़ों का मौसम और यादों का पिटारा


 बहुत ठण्ड है. ऐसे मौसम को आप भी एन्जॉय कर रहे होंगे.सारी दुनिया में ठण्ड की चर्चा है,कोहरा,धुंध और ढेर सारी ठण्ड.यूँ तो ऐसे भी जाड़े का मौसम बहुत खास होता है खाने पीने से लेकर पहनने और घूमने का असली लुत्फ़ तो जाड़े में ही आता है. दिन छोटे और रातें बड़ी हों तो कहने ही क्या.      जाड़े का हमारे जीवन से और गहरा  रिश्ता है.जी हाँ वो रिश्ता है यादों का,यूँ तो यादों का कोई मौसम नहीं होता पर जाड़े के मौसम में जब माहौल सर्दी का हो तो यादें जी उठती हैं. साउथ हैम्पटन विश्वविद्यालय द्वारा कराई गई रिसर्च के अनुसार  दिल को गर्माहट देने वाली यादें हमें ठंड सहने की क्षमता देती हैं और हम शारीरिक रूप से गर्म महसूस करते हैं.अब समझे आप कि जाड़ा दूसरे मौसम से क्यूँ अलग है.वैसे भी आजकल की फास्ट लाईफ में किसी के पास इतनी फुर्सत कहाँ है कि थोडा थम कर सुस्ताया जाए और जिंदगी का लुत्फ़ लिया जाए .

लेकिन  जाड़े का ये मौसम हमें  रुक कर  सोचने के लिए  मजबूर कर ही देता है.वैसे भी यादों के बगैर जीवन का कोई मतलब ही नहीं होगा.इंसान एक सोशल एनीमल है जो बगैर रिश्ते बनाये रह ही नहीं सकता और जब रिश्ते बनेंगे तो यादें भी होंगी. रिश्ते नाम के लिए नहीं बनाये जाते बल्कि एहसास  के लिए बनाये जाते हैं वो एहसास ही तो है जो किसी आम से रिश्ते को ख़ास बना देता है. क्या आप किसी ऐसे शख्स को जानते हैं जिसके पास यादों का कोई खज़ाना न हो.सोचिये जरा कि जाड़े की सुबह,दोपहर और शाम से हम सबकी कितनी सुहानी यादें जुडी हैं. वो कोहरे में डूबी अलसाई सुबह हो जब बिस्तर छोड़ने का मन नहीं करता, या गुनगुनी धूप में नहाई दोपहर जिसकी याद अभी तक आपके दिल में ताज़ा है, या फिर वो सुहानी शाम जब आप पहली बार किसी से मिले थे.मौसम में भले ही ठंडक थी पर दिल किसी के साथ के एहसास से दहक रहे थे.

आपकी यादें भले ही मेरी यादों से अलग हों पर उनका एहसास सबको एक सा ही होता है. बीता वक्त तो अब लौट कर नहीं आ पायेगा पर बीती यादों को वो एहसास हमें अपने आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करेगा.कोई कितना भी अकेला क्यूँ हो न पर उसके साथ हमेशा कुछ बीती यादें जरुर होती हैं. तो अगली बार फीलिंग लोनली का स्टेटस अपडेट करने से पहले जरा एक बार सोचियेगा क्या वाकई आप अकेले हैं? आपके साथ कितनी यादें हैं उनमें से कुछ मीठी यादों को अपने आप से ही चुरा लीजिए और आँखें बंद कर खो जाइए अपनी दुनिया में. विश्वास जानिये ये पल जिंदगी को बेहतर बनाने का हौसला देंगे और इन सब के लिए जाड़े के मौसम से भला और कुछ क्या हो सकता है. लोग घरों में बंद हों सड़कें वीरान सब तरफ सन्नाटा आप हों और आप की तन्हाई.

वैसे भी बहुत दिन हुए जब आपने किसी याद को जी भर के नहीं जीया तो इस जाड़े को जीने के लिए किसी पुरानी याद को फिर से जीया जाए क्यूंकि ये जाड़ा भी हर जाड़े की तरह चला जाएगा आपको हर बार की तरह एक नयी याद देकर. पर जाड़े की इन यादों से अपने तन मन को गरम रखियेगा क्यूंकि गर्मियां आते ही आपको जाड़े की याद आनी शुरू हो जायेगीतो इससे पहले ये सर्दियाँ आपकी यादों के एल्बम का हिस्सा बन जाएँ इनको जी लीजिए.

 प्रभात खबर में 09/02/2022 को प्रकाशित 

Wednesday, February 2, 2022

जनता के साथ सरकारें भी दुविधा में ,किस राह चलें

 


इस देश में दो ही चीज आम होते हुए भी ख़ास हैं|पहला “आम चुनाव” और दूसरा “आम बजट” जिससे देश के आम आदमी का जीवन प्रभावित होता है| देश का बजट आ चुका है, विद्वान लोग बताएंगे कि बजट कितना बेहतर है पर मैंने जबसे होश सम्हाला है एक आम आदमी के नजरिये से एक चीज हमेशा हुई |चीजें सस्ती और महंगी होने के अलावा, हर बजट के बाद जिस पार्टी  की सरकार होती है  वो उसे क्रांतिकारी बताती है तो विपक्षी पार्टी उसे निराशाजनक बताते हैं|ये खेल लगातार चलता आ रहा है भले ही सरकार बदलती रही हो|भारत जैसे विविधता वाले देश में जनता के सामान्य व्यवहार का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। सरकारों के ऊपर जहाँ लोक लुभावन योजनाएं चलाने की मजबूरी रहती है वहीं दूसरी ओर  देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने का दायित्व भी। आज देश की बहुसंख्यक जनता के साथ -साथ देश को नेतृत्व देने वाली सरकारें भी दुविधा में है की वो किस राह चलें|हर बार की तरह से इस बार भी कुछ लोग बजट से प्रसन्न होंगे और कुछ  लोग निराश|

बजट वो साल भर का लेखा जोखा होता है जहाँ सरकार अपने आय और व्यय का लेखा जोखा देश के सामने रखती है |सरकार कोई व्यवसाई नहीं है |उसकी  आमदनी का स्रोत हमारे आपके जैसे करोड़ों लोग होते हैं |जो विभिन्न करों के रूप में सरकार को आमदनी कराते हैं और बदले में उम्मीद करते हैं कि सरकार हमारा ध्यान रखे, स्कूल बनाये अस्पताल खोले| सरकारे ये करती भी हैं पर सरकारी संस्थाओं के प्रति एक देश  के नागरिक जैसा भाव क्या हमारा होता है?बहुत साल पहले एक हास्य कविता सुनी थी कि रेलवे राष्ट्रीय सम्पति है और ट्रेन के डिब्बे से बल्ब चुरा के अपना हिस्सा घर ले जा रहा हूँ |नतीजा सरकार के उपर सुविधाओं पर ज्यादा खर्च करने का बोझ  और यात्रियों को ज्यादा परेशानी | कोई भी सामान खरीदते वक्त किसी तरह टैक्स न देने की जुगत लगाना  भी कुछ इसी तरह का मामला है | 

इतने बड़े देश का बजट तभी सबकी इच्छाएं पूरी कर पायेगा जब सरकार की जेब भरी होगी और वो आपके उपर से टैक्स की लगाम कम करेगी पर यह तभी होगा जब हम सरकारी संपत्तियों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति वाले भाव से देखते हुए उनका रखरखाव करें |

दैनिक जागरण में 02/02/2022 को प्रकाशित 

Friday, January 21, 2022

ऑनलाईन चुनाव की राह में बाधाएं


   

 
कोरोना काल ने ,मानव सभ्यता के बदलाव की तस्वीर को एक झटके में बदल दिया |मानव सभ्यता में इतना बड़ा बदलाव इससे पहले आग पानी और पहिये की खोज के बाद ही आये थे फिर इंटरनेट ने तस्वीर बदली और समाज में बहुत सी क्रांतिकारी घटनाएँ घटीं और ऑन लाइन का दौर आ गया पर अभी भी बहुत से लोग इंटरनेट से दूर थे क्योंकि उनके पास उन कामों के लिए परम्परागत विकल्प थे जिससे इंटरनेट से मानव सभ्यता का चेहरा जितनी तेजी से बदलना चाहिए था वो गति नहीं थी |लेकिन कोरोना वायरस के कारण उत्पन्न हुई परिस्थितयों ने अचानक ही कई सारे बदलाव कर दिए |घर और ऑफिस का अंतर मिट गया बहुत से पुराने रोजगार हमेशा के लिए अतीत हो रहे वहीं कई नए क्षेत्रों में रोजगार का सृजन हो रहा है  जिसमें सिर्फ कंप्यूटर और इंटरनेट का ही राज होगा|इस सारी प्रक्रिया से देश की राजनीतिक प्रक्रिया भी अछूती नहीं रही |देश के इतिहास में पहली बार कोरोना के कारण उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चुनाव आयोग ने रैली पर रोक 22 जनवरी तक लगा रखी है| आयोग ने राजनीतिक दलों को इंडोर मीटिंग के लिए 300 लोग अधिकतम या हाल की 50 प्रतिशत कैपिसिटी तक छूट दी है। कोरोना काल से पहले शायद ही किसी ने कभी कल्पना की हो कि पांच प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी हो पर कोइ भी चुनावी रैली भौतिक  रूप से न हो रही हो |उधर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वह कोरोना के खतरे को देखते हुए ऑनलाइन वोटिंग कराए। ऑनलाईन वोटिंग के पक्ष में कई तरह के तर्क दिए जाते हैं कि देश का धन और मानव श्रम बचेगा |चुनाव प्रक्रिया और गतिशील हो जायेगी |चुनाव में चुनाव आयोग, प्रशासन के सभी अंगों की सहायता लेता है जिससे प्रशासन के दैनिक कार्य चुनाव तक या तो बाधित रहते हैं या उनकी गति धीमी हो जाती है |ऑनलाईन वोटिंग पर्यावरण के लिहाज से भी अनुकूल होगी |

वैसे ई वोटिंग कोई नयी अवधारणा  नहीं है। कई  कंपनियां किसी मुद्दे पर जनता की सीधी  राय जानने के लिए एप का सहारा लेती हैं। ऐसे में बिना बिना कतार में लगे या फिर अपना समय खर्च किए बिना आसानी से देश में वोटिंग क्यों नहीं की जा सकती है। वैसे भी जब वर्चुयल  रैलियां हो रही हैं तो ऑनलाइन वोटिंग क्यों नहीं हो सकती।इंटरनेट के ज़माने से ही पूर्व देश  में पोस्टल वोटिंग का प्रावधान रहा है। जो लोग सेना में हैं या बाहर भारतीय दूतावासों में काम करते हैंवे इस अधिकार का उपयोग करते हैं। पोस्टल वोटिंग और ई-वोटिंग में अंतर सिर्फ इतना  है कि पोस्टल वोटिंग में चुनाव तिथि के सात दिन पहले तक वोट भेजने की अनुमति होती है जबकि ई-वोटिंग में उसी दिनउसी समय वोटिंग संभव हो जाती है|

सिद्धांत में ऑनलाईन वोटिंग की अवधारणा बहुत लुभावनी लगती है पर भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में  ऑनलाईन वोटिंग की राह में कई बाधाएं है|कुछ तकनीकी है और कुछ सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक |चुनावों की सार्थकता तभी है जब वे पूरी तरह निष्पक्ष हों और इस प्रक्रिया में शामिल सभी दलों का इस पर भरोसा हो पर ऑनलाईन वोटिंग में इस बात की गारंटी कोइ नहीं ले सकता |ऑनलाइन वोटिंग के लिए कंप्यूटर सिस्टम और एप्लिकेशन की जरुरत होगी जिसमें बग और त्रुटियां हो सकती है और जैसे ही यह पूरा सिस्टम इंटरनेट पर आएगा पूरी दुनिया के भारत विरोधी हैकर सक्रिय  हो उठेंगेइसके अतिरिक्त चुनाव की सुरक्षा के लिहाज से यह भी एक जटिल मुद्दा है कि कोई भी कंप्यूटर या सिस्टम ऐसा नहीं है जिसे हैक नहीं किया जा सकता। वोटिंग एक निजी और गुप्त प्रक्रिया मानी जाती है पर ऑनलाईन वोटिंग में इस पूरी प्रक्रिया को गोपनीय बनाये रखना बड़ी चुनौती है |एक ऐसा देश जहाँ चुनाव प्रक्रिया में धन और बाहुबल  की प्रधानता रहती है |ऑनलाईन वोटिंग में इसके माध्यम से इसे प्रभावित किया जा सकता है |दूसरी बात यह है कि यदि किन्ही कारणों से कोइ हैकर सिस्टम को हैक कर लेता है तो यह बात सार्वजनिक हो जाने का खतरा बना रहेगा तो किस व्यक्ति ने किस उम्मीदवार या किस पार्टी को वोट दिए हैं तो इससे मतदाता का नाम और उसकी पहचान सार्वजनिक हो जाएगी और इससे उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।इस तथ्य को समझने के लिए अक्सर लोगों के क्रेडिट कार्ड नम्बर और फोन नम्बर सार्वजनिक हो जाने की खबरों के माध्यम से समझा जा सकता है |ऑनलाईन वोटिंग में इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती कि मतदाताओं की पहचान गुप्त रखी जायेगी |

तीसरी और मुख्य बात भले ही इंटरनेट  का विस्तार लगभग पूर देश में हो गया है,लेकिन इसकी अच्छी स्पीड  और भरोसेमंद सेवा अभी भी हर जगह उपलब्ध नहीं है। आबादी के एक बड़े तबके के पास अभी भी  इंटरनेट की सुविधा नहीं है। बच्चों की ऑनलाइन कक्षाओं  के दौरान यह समस्या देश भर में देखी गई। चीन के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट उपभोक्ताओं वाला देश है |राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा शिक्षा पर किये गए शोध से प्राप्त आंकड़ों के हिसाब से देश में केवल सत्ताईस प्रतिशत परिवार ही ऐसे हैं जहाँ किसी एक सदस्य के पास इंटरनेट की सुविधा है किसी व्यक्ति के पास मोबाइल फोन का होना ‘डिजिटल’ होने का प्रमाण नहीं है। यहाँ तक कि यदि कोई व्यक्ति स्मार्टफोन का उपयोगकर्त्ता हैतो भी वह स्वयं को ‘डिजिटल सेवी’ नहीं कह सकता हैजब तक कि उसके पास इंटरनेट कनेक्टिविटी न हो और वह इंटरनेट पर प्रासंगिक और समय पर जानकारी प्राप्त करना न जानता हो। ऑनलाईन चुनाव के परिप्रेक्ष्य में यह एक बड़ी चुनौती होने वाली है यूनिसेफ की मार्च 2021 में आई रिपोर्ट के अनुसार  COVID-19 महामारी से पहले भारत में केवल एक चौथाई घरों (24 प्रतिशत) के पास इंटरनेट की सुविधा थी|  टेलीकम्यूनिकेशन इन्फ़्रास्ट्रक्चर के मामले में  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी आंकड़े काफ़ी सोचनीय  हैंयूएन द्वारा जारी ई-गवर्नमेंट रिपोर्ट 2020 के मुताबिक़टेलीकम्यूनिकेशन इन्फ़्रास्ट्रक्चर इंडेक्स में भारत की स्थिति औसत से भी नीचे हैइस इंडेक्स में हम 0.2 अंक पीछे हैं | ICRIER और थिंक टैंक LIRNEAsia की ओर से डिजिटल पॉलिसी पर केंद्रित एक नए नेशनल सैंपल सर्वे से कोविड के दौरान डिजिटल कनेक्टिविटी में चालीस प्रतिशत  की बढ़ोतरी हुई  लेकिन डिवाइस की कमीखराब सिग्नल और इस तरह की पढ़ाई महंगी होने की वजह से ज्यादातर बच्चे  रिमोट एजुकेशन का लाभ लेने से वंचित रह गए| 13 करोड़ लोग 2020-21 के दौरान ऑनलाइन हुएइससे देश में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ कर 47 करोड़ तक पहुंच गई भले ही यह रिपोर्ट बच्चों की शिक्षा पर हो इससे यह जरुर पता चलता है कि इंटरनेट के मामले में देश को अभी लंबा रास्ता तय करना है |

भारत में लिंग अंतराल दुनिया में सबसे अधिक है। जब यह मोबाइल उपयोग के स्वामित्त्व में तब्दील हो जाता हैतो यह लिंग अंतराल और अधिक हो जाता है। भारत में लगभग सोलह प्रतिशत महिलाएँ ही मोबाइल इंटरनेट से जुड़ी हैं। जो डिजिटलीकरण की दिशा में लैंगिक विभेद का स्पष्ट रेखांकन करता है और चुनाव के व्यापक दर्शन की अवहेलना करता है |पारम्परिक रूप से चुनाव में किसी के लिंग के आधार पर मतदान करने में भेद नहीं किया जा सकता |ऑनलाईन वोटिंग होने से महिलओं समेत समाज के सभी वंचित तबकों को निर्भय होकर वोटिंग करने की सहूलियत मिलेगी इसकी गारंटी नहीं ली जा सकती है देश में 2019 के लोकसभा चुनाव में 6500 करोड़ रुपये खर्च किये गए और प्रति व्यक्ति चुनाव में बहत्तर रूपये खर्च आया |ऑनलाईन वोटिंग में खर्च के एक बड़े हिस्से को कम किया जा सकता है |

तस्वीर का दूसरा पहलु यह है कि देश बैलेट  पेपर से ई वी एम् मशीन तक चुनाव प्रक्रिया में बहुत से ठोस नवाचार देख चुका है |जबकि जर्मनीअमेरिकाब्रिटेनफ्रांसजापानऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के सभी विकसित लोकतंत्र में कागज पर बने मतपत्र पर ही राष्ट्रीय चुनावों के लिए मतदान होते हैं और भारत को भी ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए. इसके कोई मजबूत तर्क नहीं है.अगर समस्या है तो इसका हल भी होगा देश को चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए ई वी एम् से आगे  देखना होगा पर यह काम एक दिन या एक झटके में नहीं हो सकता है |यह एक प्रक्रिया जिसको पूरा होने में बहुत वक्त लगेगा|इसकी शुरुआत अब प्रारंभ  हो जानी चाहिए|देश ने कोविड काल से बहुत सी चीजों को हाइब्रिड मोडल में आगे बढ़ता देखा है जिसमें कुछ लोग ऑनलाईन जुड़ते हैं कुछ ऑफ लाइन |देश में चुनाव प्रक्रिया हाइब्रिड मोड में करवाने के विकल्प तलाशे जाने चाहिए |कोरोना के बहाने ही सही पर इस दिशा  में बहस लगातार चलती रहनी चाहिए |

 दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 21/01/2022 को प्रकाशित 




 

Wednesday, January 19, 2022

एक लाईक और वोट का फर्क


 ठण्ड के इस   मौसम में  देश के पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा ने राजनीति के  मौसम में गर्मी बढ़ा दी है. कोविड के कारण जब राजनीतिक रैलियों पर रोक है|ऐसे में डिजीटल मीडिया जंग का नया मैदान बना है.जहाँ हमारी आपकी सोशल मीडिया फीड राजनीतिक नारों से भरी हुई है.  ऐसे में हम या आप कोई  भी राजनीति  से बच नहीं सकता.वैसे सोशल मीडिया की भी अपनी एक राजनीति है. जो हमारे देश के लोकतंत्र की राजनीति से किसी तरह अलग नहीं है.वैसे आपका भी किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर एक  एकाउंट होगा.  आपने कभी गौर किया कि आपकी फीड पर क्या होता हैवैसे भी गूगल  की इस दुनिया में ज्ञान यूँ ही कोई लेना नहीं चाहता.जैसे फेसबुक दोस्त कई तरह के होते उसी तरह वोटर भी कई तरह के होते हैं.कुछ ऐसे जो सोचते हैं कि हमारे एक वोट से क्या होता हैसरकार किसी की भी बने वो किसी को भी वोट देते हैं.हमारे कुछ फेसबुक दोस्त में से भी कुछ ऐसे ही  प्रोफेशनल लाइकर्स होते हैं.जो हर एक चीज को लाईक करेंगे. आप कुछ भी शेयर कीजिये. वो आयेंगे और लाईक करके चले जायेंगेआप भी ऐसे दोस्तों को धीरे धीरे गंभीरता से  लेना छोड़ देते हैं,और नए लाइकर्स पर ध्यान देना शुरू कर देते हैंपर ये प्रोफेशनल लाइकर्स आपकी फीड पर लाईक बढ़ा देते हैं. भले ही आपके द्वारा शेयर किया कंटेंट इस लायक न हो.  तो वोट करते वक्त सिलेक्टिव बनिए क्योंकि  यूँ ही किसी को भी वोट देने से जैसे बेकार फीड हिट हो जाती हैउसी तरह गलत आदमी चुनाव जीत जाता हैतो दोस्त  आपके एक लाईक और एक वोट से फर्क पड़ता है.वोटिंग के दिन कुछ लोग छुट्टी मनाते हैं और वोट देने नहीं जातेअब जरा अपने फेसबुक के मित्रों को याद करिए उनमें से कुछ ऐसे होंगे .जो सबकी फीड पर नजर तो रखते हैं पर न तो लाईक करते हैं और न ही कमेन्टऐसे ही लोग वोटिंग के दिन वोट नहीं करतेसब कुछ जानते समझते हुए भी वे अपनी जिम्मेदारियां नहीं समझतेअगर आपने  फेसबुक एकाउंट बनाया है तो कुछ एक्टीविटी भी करिए, और वोटिंग लिस्ट में आपका नाम है तो वोट देने जरुर जाइए.बात धीरे फ़ैल रही है कि छोटी -छोटी बातें कितना बड़ा असर रखती हैं.

आपने गौर किया होगा जब आप कुछ शेयर करते हैं तो कुछ लोग सार्वजनिक रूप से  उस स्टेटस अपडेट को न तो लाईक करते हैं न कमेन्ट. पर मेसेज बॉक्स में आ के बड़ी मीठी -मीठी बातें करते हैं. इधर आपकी चैट की बत्ती जली नहीं कि इनका हेलो हाय शुरू हो गया.आप भी जल्दी जान जाते हैं कि इनकी मीठी -मीठी बातों का मकसद आपसे कोई काम निकलवाना होता पर ये सार्वजनिक रूप से लोगों को  बताना नहीं चाहते कि वो आपसे जुड़े हुए हैं .आप खुद सोचिये आप क्या इतने फ्री हैं कि यूँ ही किसी से चैट करते हैं और अगर करते हैं तो आप इमोशनली कमज़ोर हैं. ऐसे लोग उन नेताओं की तरह होते हैं. जो डबल फेस्ड होते हैं इन्हें आपसे तब तक मतलब होता है जब तक चुनाव नहीं होते, उसके बाद छू मंतर. तो किसी भी राजनीतिक दल  के  झूठे वायदों पर यूँ ही आँख मूँद कर भरोसा मत कीजिये. थोडा अपनी अक्ल लगाइए क्योंकि  बात करना और अपनी बात पर खरा उतरना दो अलग अलग बातें हैं. जब आप सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर समझदारी दिखाते हैं तो जब बात देश और गवर्नेन्स की हो तो आपको समझदार होना ही पड़ेगा.तो अब फैसला आप कीजिये कि आप कैसे वोटर हैं.

प्रभात खबर में 19/01/2022 को प्रकाशित 

 

 

Tuesday, January 11, 2022

उपभोक्ता का डाटा में बदल जाना

 

साल 2019 में कैलिफोर्निया के गर्वनर गेविन न्यूसम ने अमेरिका में एक डाटा डिविडेंड बिल प्रस्तुत किया था |जिसमें उपभोक्ताओं के निजी डाटा से पैदा हुई सम्पति का बंटवारा उपभोक्ताओं के साथ किये जाने की मांग की गयी थी  | इंसान का एक डाटा (आंकड़े )में परिवर्तित हो जाना अपने समय की सबसे विलक्षण घटना है  और आज इससे मूल्यवान कोई चीज नहीं है |अब तो इन्फोमोनिक्स का युग आ चूका है जो आंकड़ों से जुड़ा है |डाटा आज की सबसे बड़ी पूंजी है यह डाटा का ही कमाल  है कि गूगल और फेसबुक जैसी अपेक्षाकृत नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|डाटा ही वह इंधन है जो अनगिनत कम्पनियों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं |वह चाहे तमाम तरह के एप्स हो या विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स सभी उपभोक्ताओं  के लिए मुफ्त हैं |असल मे जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है |वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डाटा के बदले मिल रही है |इनमे से अधिकतर कम्पनियां उपभोक्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए  गए आंकड़ों को सम्हाल पाने में असफल रहती हैंजिसका परिणाम लागातार आंकड़ों की चोरी और उनके  दुरूपयोग के मामले सामने आते रहते हैं |साल 2020 में फेसबुक ने लगभग  छियासी बिलियन डॉलर और गूगल ने एक सौ इक्यासी  बिलियन डॉलर विज्ञापन से कमाए |

मजेदार तथ्य यह है कि फेसबुक कोई भी उत्पाद नहीं बनाता है और इसकी आमदनी का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है और आप क्या विज्ञापन देखेंगे इसके लिए आपको जानना जरुरी है |यही से आंकड़े महत्वपूर्ण हो उठते हैं | 25 मई2018 को यूरोपीय संघ के नेतृत्व में जीडीपीआर (जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन) को पूरी तरह से लागू किया और इस तरह यूरोपीय संघ (इयू) में डाटा प्रोटेक्शन कानूनों की दिशा में एक मील का पत्थर स्थापित किया गया . जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) एक नियंत्रण व्यवस्था है जिसके तहत समूचे यूरोपीय संघ में नागरिकों के डाटा प्रोटेक्शन अधिकारों को मजबूत बनाया गया है और इसे मानकीकृत‍ किया गया है | इसके तहत माना जाता है कि उपभोक्ता ही आंकड़ों का असली स्वामी या मालिक है | इस कारण से संगठन को उपभोक्ता से स्वीकृति लेनी पड़ती है तभी उपभोक्ता के आंकड़ों का प्रयोग किया जा सकता है या फिर उपभोक्ता से स्वीकृति मिलने के बाद ही आंकड़ों को समाप्त किया जाता है .  निजी जानकारियों को सुरक्षित रखने और इसके  गलत इस्तेमाल को रोकने  के लिए सरकार ने 11 दिसंबर 2019 को लोकसभा में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल पेश किया था इस पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी रिपोर्ट सदन के समक्ष नवम्बर 2021 में रख दी है जिस पर आगे चर्चा होनी है |जिस तरह इंटरनेट की इस दुनिया में आंकड़े महत्वपूर्ण हो चले हैं इस बिल के कानून बनने में अभी वक्त है |देश में जिस तेजी से इंटरनेट का विस्तार हुआ उस तेजी से हम अपने निजी आंकडे (फोन ई मेल आदि) के प्रति जागरूक नहीं हुए हैं परिणाम तरह तरह के एप मोबाईल में भरे हुए जिनको इंस्टाल करते वक्त कोई यह नहीं ध्यान देता कि एप को इंस्टाल करते वक्त किन –किन चीजों को एक्सेस देने की जरुरत है |यदि किसी उपभोक्ता ने मौसम का हाल जानने के लिए कोई एप डाउनलोड किया और एप ने उसके फोन में उपलब्ध सारे कॉन्टेक्ट तक पहुँचने की अनुमति माँगी तो ज्यादातर लोग बगैर यह सोचे की मौसम का हाल बताने वाला एप कांटेक्ट की जानकारी क्यों मांग रहा है उसकी अनुमति दे देंगे |

अब उस एप के निर्मताओं के पास किसी के मोबाईल में जितने कोंटेक्ट उन तक पहुँचने की सुविधा मिल जायेगी|यानि एप डाउनलोड करते ही उपभोक्ता आंकड़ों में तब्दील हुआ फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है |यह भी उल्लेखनीय है कि डेटा चुराने के लिए बहुत से फर्जी एप गूगल प्ले स्टोर पर डाल दिए जाते हैं और गूगल भी समय समय  पर ऐसे एप को हटाता रहता है पर ओपन प्लेटफोर्म होने के कारण जब तक ऐसे एप की पहचान होती है तब तक फर्जी एप निर्माता अपना काम कर चुके होते हैं |ग्रोसरी स्टोर और कई तरह के क्लब जब कोई उपभोक्ता वहां से कोई खरीददारी करता है या सेवाओं का उपभोग करता है तो वे उपभोक्ताओं के आंकड़े ले लेते हैं लेकिन उन आंकड़ों पर उपभोक्ताओं पर कोई अधिकार नहीं रहता है |उपभोक्ता अधिकारों के तहत अभी आंकड़े नहीं आये हैं |किसी भी उपभोक्ता को ये नहीं पता चलता है कि उसकी निजी जानकारियों का (आंकड़ों )किस तरह इस्तेमाल होता है और उससे पैदा हुई आय का भी उपभोक्ता को कोई हिस्सा नहीं मिलता |आंकड़ों की दुनिया में भी वर्ग संघर्ष का दौर शुरू हो गया है किसी के निजी आंकड़ों की कीमत उसकी इंटरनेट पर कम उपस्थिति से तय होती है यानि अगर आप कई तरह की सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर हैं तो आपका डाटा यूनिक नहीं रहेगा लोगों के निजी डाटा सिर्फ कम्पनियों के प्रोडक्ट को बेचने में ही मदद नहीं कर रहे बल्कि  यह आंकड़े हमें  भविष्य के समाज के लिए तैयार भी कर रहे हैं जिसमें एआई यनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक बड़ी भूमिका निभाने वाला है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर विज्ञान की वह शाखा है जो कंप्यूटर के इंसानों की तरह व्यवहार करने की धारणा पर आधारित है जो  मशीनों की सोचनेसमझनेसीखनेसमस्या हल करने और निर्णय लेने जैसी संज्ञानात्मक कार्यों को करने की क्षमता पर कार्य करता है पर भविष्य का भारतीय समाज कैसा होगा यह इस मुद्दे पर निर्भर करेगा कि अभी हम अपने निजी आंकड़ों के बारे में कितने जागरूक है |

अमर उजाला में 11/01/2022 में प्रकाशित 

Thursday, December 23, 2021

कार्यक्षेत्र में घटती महिलाओं की हिस्सेदारी

 


देश में महिलाओं की श्रमिक सहभागिता दर (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट ) जो पूरे विश्व के अनुपात में वैसे ही बहुत कम है |उसमें और तेजी से गिरावट आई है |बेन एंड कम्पनी और गूगल की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट पन्द्रह से चौबीस उम्र की महिलाओं में सबसे ज्यादा है| लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट के अनुसार रोजगार में महिलाओं की संख्या लगातार कम हो रही है | |उल्लेखनीय है कि श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR) 16-64 वर्ष आयु के लोगों की कार्याश्रम हिस्सेदारी को दर्शाता है, जो वर्तमान में कार्यरत हैं या रोज़गार की तलाश कर रहे हैं| अध्यनरत किशोर, ग्रहणी अथवा 64 वर्ष आयु से अधिक के व्यक्ति इस में सम्मिलित नहीं हैं| इसी रिपोर्ट के अनुसार मई –अगस्त 2019 में लैंगिक रूप अनुपात में महिलाओं पर बेरोजगारी की मार ज्यादा पड़ रही है|इसी समय में जहाँ शहरी पुरुषों में बेरोजगार की दर छ  प्रतिशत हैं वहीं चौबीस प्रतिशत शहरी महिलायें बेरोजगार है |ग्रामीण क्षेत्र में भी पुरुषों में बेरोजगारी का औसत छ  है वहीं पंद्रह प्रतिशत महिलायें बेरोजगार है |स्नातक दस प्रतिशत पुरुष बेरोजगार है वहीं महिलाओं में यह प्रतिशत पैंतीस है | महिलाओं की श्रमिक सहभागिता दर (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट )1990 में पैंतीस प्रतिशत थी जो साल 2018 में गिरकर सत्ताईस प्रतिशत हो गयी जो कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से काफी बेहतर है जहाँ यह आंकडा इसी समय में चौदह प्रतिशत से बढ़कर पच्चीस प्रतिशत पहुंचा पर भारत अभी भी बांग्लादेश ,नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों से पीछे है |

ग्लोबल इकोनोमिक फोरम द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 में 156 देशों की सूची में भारत एक सौ चालीसवें  स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार  महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर में बहुत तेजी से गिरावट हुई है। महिला श्रमबल भागीदारी दर 24.8 प्रतिशत से गिर कर 22.3 प्रतिशत रह गई। पेशेवर और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका घटकर 29.2  प्रतिशत हो गई है। वरिष्ठ और प्रबंधक पदों पर केवल 14.6 प्रतिशत महिलाएँ हैं। केवल 8.9 प्रतिशत कंपनियाँ ही ऐसी हैं जहाँ शीर्ष प्रबंधक पदों पर महिलाएँ अपना योगदान दे रही हैं।
लैंगिक समानता बढाने के लिए यदि अभी से प्रयास नहीं किये गए तो पुरुष और महिलाओं के बीच आर्थिक समृद्धि और रोजगार की खाई भारत में चिंताजनक रूप से बढ़ेगी|वर्तमान रुझानों के अनुसार आने वाले वर्षों में चालीस  करोड़ नौकरियों की आवश्यकता अकेले महिलाओं को है|तस्वीर का दूसरा पक्ष रोजगार में तकनीक पर बढ़ती निर्भरता है |महिलाऐं ज्यादातर प्रशासनिक एवं सूचना विश्लेषण जैसे रोजगार में प्रमुख भूमिका निभाती हैं परन्तु अब इन क्षेत्रों में कृत्रिम बुधिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और तकनीक  के बढ़ते दायरे  ने महिलाओं की अधिकता वाले रोज़गार के इस क्षेत्र को खतरे में डाल दिया है|जैसे –जैसे रूटीन किस्म की नौकरियों में  ऑटोमेशन बढेगा इससे सबसे ज्यादा दबाव महिलाओं पर बढ़ेगा, जिसका परिणाम महिलाओं में  उच्च बेरोज़गारी दर के रूप में सामने आएगा |वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार देश की जनसँख्या में महिलाओं की संख्या अडतालीस प्रतिशत है लेकिन देश की आर्थिक वृद्धि का लाभ महिलाओं को उतना नहीं मिल पाया |शिक्षा में ग्रामीण और शहरी दोनों महिलाओं की तादाद बढ़ रही है लेकिन फिर भी वे रोजगार में उतना योगदान नहीं दे रही हैं उसके लिए कुछ सामाजिक सांस्कृतिक कारक भी जिम्मेदार हैं |पुरुषों के लिए ज्यादा शिक्षा का मतलब बेहतर रोजगार में ज्यादा सहभागिता लेकिन महिलाओं के लिए ऐसा हमेशा नहीं होता है |यदि पति बेहतर कमाता है तो महिलाओं को काम करने की क्या जरुरत वाली मानसिकता भी एक बड़ी बाधा है |
देश में हर साल 239,000 लडकियों की म्रत्यु पांच वर्ष की उम्र के पहले ही हो जाती है |अस्सी प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले पैंसठ प्रतिशत महिलायें ही साक्षर हैं | सरकार ने महिलाओं को उद्यमी बनाने के लिए 2011 में विश्व बैंक के समर्थन से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (अब दीनदयाल अन्त्योदय- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन )शुरू किया जिसमें अब तक पचास मिलीयन  महिलाओं को स्वयम सहायता समूहों और उनकेउच्च महासंघों से जोड़ा गया है | इन समूहों ने विभिन्न वाणिज्यिक बैंकों से लगभग $ 30 बिलियन का लाभ उठाया है।ऐसी स्थिति  में नए रोज़गार के अवसरों को पैदा करना आज की जरुरत  है| जिसके लिए  अधिक से अधिक महिलाओं को उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित करना ही दीर्द्कालिक समाधान होगा न कि उन्हें सामान्य किस्म के रोजगार के लिए प्रेरित करना,नवाचार ही एक  ऐसा क्षेत्र है जहाँ भविष्य की महिला उद्यमीयों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए ज्यादा रोजगार सृजित किया जा सकता है क्योंकि महिलायें किसी महिला अधिकारी के नेतृत्व में ज्यादा सहजता से काम कर पाएंगी |महिला उद्यमियों की संख्या भी वैसे ही कम है  |इसमें सरकार की एक बड़ी भूमिका होगी जो महिलाओं को नवाचार के लिए प्रेरित करे वहीं उनके स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश बढ़ाने के ठोस प्रयास करने होंगे |महिलाओं के बीच उद्यमशीलता का विकास करके भारत की अर्थव्यवस्था को जहाँ गति दी जा सकती है वहीं भारतीय  समाज को लैंगिक रूप से बराबरी वाले समाज में परिणत करके दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है |
अमर उजाला के सम्पादकीय  पेज पर 23/12/2021 को प्रकाशित 

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