Tuesday, July 28, 2026

हमारा दिमाग खाली हो रहा है

 सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी संचय करने की प्रवृत्ति रही है। पहले गुफाओं में चित्र बने,अन्न को सहेजा सभ्यता का निर्माण हुआ|इंसान ने घर बनाना शुरू किया   फिर कागज़ पर इतिहास लिखा गया और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में हमने सब कुछ ‘कम्प्यूटर और हार्ड ड्राइव’ में सेव करना शुरू कर दिया। 'Ctrl + S' सिर्फ एक कमांड नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान को सुरक्षित रखने का हमारा डिजिटल रक्षा कवच बन गया था लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जनरेटिव एआई (जैसे ChatGPT, Claude, Gemini) के आगमन ने इस मानवीय आदत पर एक ऐसा प्रहार किया है, जिसकी चिंता  समाजशास्त्रियों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों सभी को  है । जब मनुष्य अपनी बनाई चीज़ों को सहेजना बंद कर देता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ऐतिहासिक निरंतरता से कट जाता है। सभ्यताएं केवल निर्माण से नहीं, बल्कि संचय और संरक्षण से जीवंत रहती हैं।

 तकनीक की दुनिया में सहेजने की यह घटती आदत कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की रिपोर्ट भी इस बात को साबित करती हैं। माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन की मई 2024 की 'वर्क ट्रेंड इंडेक्स' रिपोर्ट बताती है कि आज दुनिया के 75% से ज्यादा दफ्तरी कामकाजी लोग  अपने रोज के काम, कोडिंग और रिसर्च के लिए सीधे एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर हमारे व्यवहार पर पड़ा है। साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई (Kaspersky) ने साल 2015-2016 के अपने एक बड़े शोध में इस आदत को 'डिजिटल विस्मृति' (Digital Amnesia) का नाम दिया था। इस रिसर्च के मुताबिक, 64% से ज्यादा लोगों का मानना है कि इंटरनेट पर जब हर जानकारी चौबीसों घंटे मौजूद है, तो वे उसे अपने कंप्यूटर या दिमाग में सहेजने की मेहनत छोड़ चुके हैं। इसे विज्ञान में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहते हैं, यानी दिमाग पर जोर डालने और डेटा सुरक्षित रखने का काम इंसानों ने पूरी तरह मशीनों को सौंप दिया है। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हम चीज़ों को संभालकर रखने के पुराने दौर से निकलकर, हर चीज़ को तुरंत पा लेने  के एक ऐसे नए दौर में आ चुके हैं जहाँ हम पूरी तरह तकनीक के भरोसे हैं।

पिछले दो दशकों तक किसी भी डिजिटल क्रिएटर, लेखक, कोडर या छात्र के लिए सबसे बड़ा डर था— डेटा का खो जाना। बिजली गुल होने या सिस्टम क्रैश होने के डर से उंगलियां अनैच्छिक रूप से हर दो मिनट में 'Ctrl + S' दबा देती थीं। यह इस बात का प्रतीक था कि हम अपने द्वारा बनाए गए या खोजे गए कंटेंट के मालिक थे और उसे भविष्य के लिए सहेजना हमारी ज़िम्मेदारी थी।

आज जनरेटिव एआई ने इस पूरी प्रक्रिया को बदल दिया है। अब कोई कोडर अपने कोड की लाइब्रेरी सेव नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि अगली बार ज़रूरत पड़ने पर एआई कुछ ही सेकंड में नया और बेहतर कोड लिख देगा। लेखक अपने रफ ड्राफ्ट सहेज कर नहीं रखते, और छात्र अपने रिसर्च नोट्स का बैकअप नहीं लेते। जब ज्ञान 'ऑन-डिमांड' (मांग पर) उपलब्ध हो, तो उसे सहेजने की मेहनत कौन करे? तकनीक की भाषा में इसे 'एल्गोरिद्मिक री-जेनरेशन' कहा जाता है, जहाँ संचय की आवश्यकता ही समाप्त हो रही है।

इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय असर बेहद गहरा है। 

  साल 2011 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बेट्सी स्पैरो द्वारा 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक प्रसिद्ध शोध में पहली बार 'गूगल इफेक्ट' को दुनिया के सामने रखा गया था, जिसमें शोधकर्ताओं ने ये निष्कर्ष निकाला था कि जब लोगों को पता होता है कि जानकारी इंटरनेट पर आसानी से मिल जाएगी, तो हमारा दिमाग जानकारी को याद रखने के बजाय 'यह कहाँ मिलेगी' उस रास्ते को याद रखता है।

जनरेटिव एआई के दौर में यह 'गूगल इफेक्ट' अब 'एआई एम्नेशिया' (AI Amnesia) या डिजिटल विस्मृति में बदल चुका है। हम फोन नंबर याद रखने की आदत पहले ही खो चुके थे, अब हम विचारों के तार्किक ढांचे को भी याद रखना छोड़ रहे हैं।जब हम किसी चीज़ को 'सेव' करते हैं, तो हम उसे एक श्रेणी (Folder) देते हैं, जो हमारे मस्तिष्क में एक न्यूरल पाथवे बनाती है। सेव न करने का मतलब है कि हम उस ज्ञान के साथ अपना मानसिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं।सब कुछ तात्कालिक और क्षणभंगुर हो गया है। जो चीज़ सहेजी नहीं जाती, वह मस्तिष्क के लिए भी अस्थायी हो जाती है।

जब हमने 'सेव' करना छोड़ दिया, तो हमने अनजाने में अपने ज्ञान का मालिकाना हक भी छोड़ दिया। पुराना डेटा जो हम सेव करते थे, वह हमारा व्यक्तिगत इतिहास था। उसमें हमारी कमियां, हमारे सुधार और हमारी मौलिक सोच के निशान थे।

आज हम जो कुछ भी लिख रहे हैं या बना रहे हैं, वह सीधे एआई के सर्वरों पर जा रहा है। यदि कल को ये एआई टूल्स सशुल्क (Paid) हो जाते हैं या इनका सर्वर डाउन हो जाता है, तो हमारे पास अपने काम का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। यह ज्ञान की एक नई औपनिवेशिकता है, जहाँ हमारा व्यक्तिगत बौद्धिक डेटा कुछ चुनिंदा सिलिकॉन वैली की कंपनियों के नियंत्रण में है । हम इतिहास के सबसे बड़े 'कंटेंट क्रिएटर' तो बन गए हैं, लेकिन हमारे पास अपना खुद का कोई 'आर्काइव' (संग्रह) नहीं है।

यह सच है कि तकनीक हमारे काम को आसान बनाती है और समय बचाती है। एआई ने हमें उत्पादकता की एक नई अंधी रफ़्तार दी है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंप्यूटर की 'रैंडम एक्सेस मेमोरी'  की तरह यदि मनुष्य भी केवल तात्कालिक प्रोसेसिंग पर निर्भर हो जाएगा, तो उसकी दीर्घकालिक बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाएगी। जो मानव सभ्यता के विकास का मूल आधार है |

'Ctrl + S' केवल एक तकनीकी शॉर्टकट नहीं था, वह हमारी चेतना का एक हिस्सा था जो कहता था— "यह विचार मूल्यवान है, इसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।" यदि हम पूरी तरह से डिजिटल विस्मृति के इस प्रवाह में बह गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास जानकारी तो असीमित होगी, लेकिन उनका अपना कोई मौलिक और संचित इतिहास नहीं होगा। समय आ गया है कि हम तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी सहेजने और याद रखने की मूल मानवीय प्रवृत्ति को एआई के हाथों में गिरवी न रखें।

 अमर उजाला में 28/07/2026 को प्रकाशित 

Wednesday, July 15, 2026

डाक टिकटों के झरोखों से दुनिया देखना

 

आज सुबह अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से पुरानी किताबों को हटा रहा था, तो अचानक धूल से सनी एक डायरी नीचे आ गिरी । यह कोई साधारण डायरी नहीं थी, बल्कि मेरी 'स्टैम्प कलेक्शन बुक' (डाक टिकट संग्रह पुस्तिका) थी । पन्ने पलटे तो देखा कि आखिरी डाक टिकट संभवतः सन् 1994 में लगाया गया था । उसे छूते ही बीते वक्त की एक सोंधी सी महक कमरे में तैर गई । मन स्मृतियों के उस गलियारे में चला गया जहाँ जीवन स्क्रीन की रफ़्तार से नहीं, बल्कि सब्र और सुकून के सुरों में ढला था ।

आज की सोशल मीडिया वाली पीढ़ी जब पूछती है कि "आपकी हॉबी क्या है?" तो उनका आशय ऑनलाइन गेमिंग, नेटफ्लिक्स बिंज-वॉचिंग या रील्स स्क्रॉलिंग से होता है । लेकिन हमारे दौर में शौक का मतलब वर्चुअल दुनिया के 'लाइक और व्यूज' बटोरना नहीं, बल्कि भौतिक रूप से जिंदगी को जीना और महसूस करना होता था । तब हम बड़े गर्व से कहते थे—"डाक टिकट इकट्ठा करना।"
सच तो यह है कि इंटरनेट ने सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान नहीं किया, बल्कि हमारे जीवन के उन तमाम खूबसूरत और रचनात्मक शौकों को भी चुपचाप लील लिया, जो कभी हमारी शख्सियत का अहम हिस्सा हुआ करते थे ।
सोशल मीडिया के इस शोर-शराबे वाले युग से पहले, हम देश और दुनिया को इंटरनेट या गूगल से नहीं, बल्कि डाक टिकटों और पुराने सिक्कों के झरोखे से देखा करते थे । उन अभावों के दिनों में भी जेनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) के चक्कर इस उम्मीद में लगा लेते थे कि देखें आज कौन सा नया डाक टिकट आया है । जेबें खाली होती थीं, इसलिए खिड़की से टिकट खरीद तो नहीं पाते थे, लेकिन दोस्तों की दरियादिली और चिट्ठियों से उतरे टिकट ही हमारे संग्रह की जागीर बनते थे । लिफाफे से भाप देकर टिकट उतारना किसी वैज्ञानिक प्रयोग जैसा रोमांचक था । आज कूरियर और ईमेल के इनबॉक्स ने टिकट संग्रह के उस पूरे रोमांच को ही दफ़न कर दिया है ।हम उन दिनों बहुत सी चीजें बस यूं ही किया करते थे वो यूज एण्ड थ्रो का जमाना नहीं था |हमारी पीढ़ी के लोग सब सहेज लेना चाहते थे चाहे वो शौक हो या यादें वो भी बगैर किसी कारण से |अब देखिए न इंटरनेट और स्पॉटिफ़ाई (Spotify) ने संगीत को हमारे अँगूठों पर ला दिया है, लेकिन इसने ऑडियो कैसेट इकट्ठा करने और सहेजने के उस दीवाने शौक को मार डाला। अपनी पसंदीदा फिमों के गानों की खुद 'मिक्सिंग' करवाकर कैसेट तैयार करवाना और जब रील फंस जाए तो पेंसिल डालकर उसे धीरे-धीरे री-वाइंड करना—यह केवल एक शौक नहीं, संगीत से रिश्ता जोड़ने का हमारा तरीका था। इसी तरह शनिवार की शाम वीसीआर किराये पर लाना और पड़ोसियों को इकट्ठा करके फिल्म देखना एक त्योहार जैसा शौक था, जिसे आज ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के 'अकेलेपन' ने पूरी तरह खत्म कर दिया है।
चिट्ठियाँ लिखने और मीलों दूर बैठे किसी अनजान 'पेन-फ्रेंड' (पत्र-मित्र) से दोस्ती निभाने का शौक हमारी पीढ़ी की सबसे खूबसूरत याद है । हम पंद्रह-पंद्रह दिन एक अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड के आने का इंतजार करते थे । उस इंतज़ार में एक रूहानी सुकून था। आज वॉट्सऐप के इंस्टेंट 'ब्लू टिक' ने संदेशों की गति तो बढ़ा दी, लेकिन शब्दों के भीतर की उस गर्माहट और हाथ की लिखावट के अहसास को सुखा दिया ।
इसी तरह, मशहूर हस्तियों, शिक्षकों या दोस्तों से उनकी ऑटोग्राफ बुक में कुछ पंक्तियाँ लिखवाना और उनके हस्ताक्षर सहेजना एक लोकप्रिय शौक था। आज उसकी जगह 'सेल्फी' के ठंडे और बेजान पिक्सल्स ने ले ली है।
नब्बे के दशक तक, गर्मियों की दोपहर में किराये की दुकान से दो रुपये में 'राज कॉमिक्स', 'डायमंड कॉमिक्स' या 'चाचा चौधरी' लाकर छुपकर पढ़ना हर बच्चे का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था । उन पन्नों की महक और तस्वीरों की रंगीन दुनिया हमें कल्पनाओं के असीमित ब्रह्मांड में ले जाती थी। आज वह कॉमिक्स कल्चर, किताबों की छोटी दुकानें और पुस्तकालयों का ठहराव 'पीडीएफ संस्कृति', रील्स और किंडल स्क्रीन के सामने पूरी तरह दम तोड़ चुका है ।
आज की पीढ़ी अपनी हॉबी की भी १५ सेकंड की रील बना देती है । वहाँ शौक को जीने का संतोष नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने और 'लाइक्स' बटोरने का एक अदृश्य सामाजिक दबाव है । सोचता हूँ, अगर हमारे ज़माने में सोशल मीडिया या इंटरनेट होता, तो क्या हम इन शौकों को इतनी शिद्दत से जी पाते? शायद नहीं। हमारे समय के शौक हमें 'सब्र', 'तटस्थता' और 'एकाग्रता' सिखाते थे।
खैर, जो बीत जाता है वो बीत ही जाता है; वक्त के पहिये को पीछे नहीं घुमाया जा सकता । डिजिटल क्रांति ने हमें आधुनिक और चौबीसों घंटे 'कनेक्टेड' तो बना दिया, लेकिन बदले में हमसे हमारी रचनात्मकता और हमारे वो मासूम शौक छीन लिए जो हमें एक संवेदनशील इंसान बनाते थे । अलमारी में बंद वह पुरानी स्टैम्प बुक और धूल खाती डायरियाँ आज केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट के मायाजाल में फँसने से पहले के उस बेहद खूबसूरत, धीमे और ठहर कर जीने वाले दौर का जीवंत दस्तावेज़ हैं ।
प्रभात खबर में 15/07/2026  को प्रकाशित 

Thursday, July 9, 2026

डिजीटल क्रांति का नया अध्याय

 सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।

 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।

तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।

लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?

 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।सूचना के वैश्विक इतिहास में 'न्यू मीडिया' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' का ये मिलन  महज एक तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रों का आम आदमी की हथेली की ओर विस्थापन भी  है। आज जब हम सूचना समाज की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि भारत में यह क्रांति 'डिजिटल डिवाइड' को पाटते हुए 'भाषाई न्याय' की ओर बढ़ रही है |वास्तविकता यह है कि न्यू मीडिया अब भारत के उस अंतिम व्यक्ति का स्वर बन रहा है, जो दशकों से सूचना के तंत्र में मूक दर्शक बना हुआ था। इस सशक्तिकरण के पीछे 'एआई' की वह मूक भूमिका है जिसे हम 'भाषाई समावेशन' कहते हैं। है।भाषाई न्याय से तात्पर्य सुचना तकनीकी का लाभ उठाने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा के  ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है| भारत इस मौन क्रांति का नायक बन कर उभर रहा है | गूगल के नवीनतम शोध बताते हैं कि भारत में वॉयस सर्च (Voice Search) की वृद्धि दर वैश्विक औसत से 270 प्रतिशत अधिक है। वॉयस सर्च और क्षेत्रीय फॉण्ट के इस अनूठे मिश्रण ने इंटरनेट को भारत में 'अति-स्थानीय' (Hyper-local) बना दिया है, जहाँ अब साक्षरता या टाइपिंग की कुशलता सूचना प्राप्त करने में बाधक नहीं रही।
 IAMAI-Kantar 2024 की रिपोर्ट इस विस्थापन को प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार भारत के 82.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 44.2 करोड़ हो चुकी है, जो शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गति से बढ़ रही है। यह डेटा इस पारंपरिक धारणा को ध्वस्त करता है कि तकनीक केवल शहरी संभ्रांत वर्ग की बपौती है।
तकनीक की इसी भाषाई सुगमता ने उस 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  को जन्म दिया है, जिसने जनसंचार  का चेहरा बदल दिया है। जब डिजिटल फॉण्ट और एआई ने स्थानीय बोलियों की बाधा को खत्म किया, तो इसका सीधा परिणाम 'हाइपर-लोकल' कंटेंट  के विस्फोट के रूप में सामने आया। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट (जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, यूट्यूब के रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Creative Ecosystem) ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में यूट्यूब के रचनात्मक तंत्र ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक मूल्य जोड़ा है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश में लगभग 9,30,000 पूर्णकालिक समकक्ष (Full-time equivalent) रोजगार के अवसरों का भी समर्थन किया है। यह बताता  है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जीविकोपार्जन का एक गंभीर और सशक्त माध्यम बन चुका है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब तकनीक ने आम आदमी को उसकी अपनी भाषा का गौरव लौटाया, तो वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि एक स्वावलंबी 'सूचना-उद्यमी' बन गया। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) के आंकड़े देश में एक बड़े डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 24.1 GB डेटा की औसत खपत यह प्रमाणित करती है कि इंटरनेट अब केवल शहरी विलासिता नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की जीवनरेखा बन चुका है। इस डेटा उपयोग का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्थानीय सामग्री (Local Content) के निर्माण और उपभोग में व्यय हो रहा है। ।वही दूसरी ओर लाखों ऐसी देशी प्रतिभाओं के हुनर को सामने ला रहा है जो कल तक अनजान थी|कोई खांना बनाने के तरीके बता रहा है कोई यात्राएं कर रहा है|परम्परागत नजरिये से इसे यूँ भी कह सकते हैं कि कोई बगैर कुछ किये भी बहुत कुछ कर रहा है | केपीएमजी (KPMG) और गूगल की इंडियन लैंग्वेजेस—डिफाइनिंग इंडियाज़ इंटरनेट" रिपोर्ट इस बात का पुख्ता प्रमाण पेश करती है कि भारत के डिजिटल भविष्य की भाषा अंग्रेजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषाएँ हैं।
लेकिन इस भाषाई और स्थानीय सशक्तिकरण के ठीक समानांतर एक बड़ी चुनौती खड़ी है—बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार (Corporate Monopoly)। हम अपनी भाषा में अपनी स्थानीय समस्याओं पर बोल तो सकते हैं, लेकिन जिस 'मंच' पर हम यह संवाद कर रहे हैं, उस पर कुछ मुट्ठी भर वैश्विक कंपनियों का अदृश्य नियंत्रण है। यह 'डिजिटल सामंतवाद' का एक नया स्वरूप है, जहाँ हमारे स्थानीय डेटा और हमारी राय को विदेशी 'एल्गोरिदम' के जरिए नियंत्रित किया जाता है। चुनौती यह है कि जब तकनीक का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो हमारी 'भाषाई संप्रभुता' हमेशा जोखिम में रहती है।निक कौल्ड्री और यूलिसेस मेजियास ने अपनी पुस्तक " द कॉस्ट्स ऑफ कनेक्शन: हाउ डेटा इज़ कोलोनाइज़िंग ह्यूमन लाइफ एंड एप्रोप्रिएटिंग इट फॉर कैपिटलिज्म " में विस्तार से बताया है कि कैसे बड़ी टेक कंपनियां हमारे डेटा को उसी तरह नियंत्रित कर रही हैं जैसे पुराने समय में औपनिवेशिक शक्तियां संसाधनों को करती थीं। हम अपनी भाषा का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन उसका आर्थिक लाभ और डेटा का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथ में है जो मुनाफे को जन-सरोकार से ऊपर रखती हैं। यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र डिजिटल लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, या हम केवल एक वैश्विक कॉर्पोरेट पिंजरे में अपनी स्थानीय भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?
 न्यू मीडिया और एआई की यह जुगलबंदी केवल तब तक सार्थक है जब तक यह आम आदमी की 'सूचनात्मक संप्रभुता' को कॉर्पोरेट एकाधिकार से सुरक्षित रखती है। भविष्य का भारत वही होगा जहाँ तकनीक का व्याकरण केवल विदेशी सर्वरों पर नहीं, बल्कि भारतीय संवेदनाओं और स्थानीय नियंत्रण के साथ विकसित होगा। अंततः, इस पूरी प्रक्रिया की सार्थकता इसी में है कि तकनीक उस आम आदमी के जीवन में कितनी पारदर्शिता और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करती है, जो आज डिजिटल क्रांति के इस नए अध्याय का असली नायक बनकर उभरा है। भारतीय भाषाएं अब वैश्विक इंटरनेट पर केवल जीवित नहीं हैं, बल्कि वे अग्रणी भूमिका में हैं, जो भविष्य के 'ग्लोबल' इंटरनेट को 'लोकल' बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।

दैनिक जागरण में 09 /07 /2026  को प्रकाशित लेख 

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