Wednesday, September 30, 2026

सर्च की बदलती प्रकृति और डिजिटल मीडिया की मुश्किलें

 

इंटरनेट के शुरुआती दौर की उस क्रांतिकारी संकल्पना को याद कीजिए जिसने समूचे ज्ञान-जगत को एक साझे लोकतांत्रिक सूत्र में पिरो दिया था—'हाइपरलिंक' । 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली ने जब वर्ल्ड वाइड वेब की नींव रखी, तो हाइपरलिंक केवल कंप्यूटर कोड का एक टुकड़ा नहीं था; वह ज्ञान के विकेंद्रीकरण, डिजिटल खुलेपन और एक-दूसरे के बौद्धिक श्रम को सम्मान देने का जीवंत माध्यम था। दशकों तक किसी भी सर्च इंजन की भूमिका एक विनम्र 'ट्रैफिक पुलिस' जैसी रही। उपयोगकर्ता अपनी जिज्ञासा लेकर आता, सर्च इंजन उसे संबंधित समाचार पत्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और मूल वेबसाइटों के पते (नीले हाइपरलिंक) दिखाता, और पाठक एक क्लिक के जरिए उस मूल स्रोत के दरवाजे तक पहुँच जाता। इसी आपसी लेन-देन पर आधुनिक डिजिटल पत्रकारिता, स्वतंत्र मीडिया और ओपन-वेब (Open Web) की पूरी आर्थिकी टिकी हुई थी।लेकिन आज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सर्च के आक्रामक गठजोड़ ने इंटरनेट की इस मूल आत्मा को कुचल दिया है। गूगल और बिंग जैसे टेक दिग्गजों ने सर्च इंजन को 'रास्ता दिखाने वाले गाइड' से बदलकर 'सर्वज्ञानी प्रकाशक' बना दिया है। 'एआई ओवरव्यूज' और ऑटोमेटेड उत्तरों के प्रसार ने खोज की प्रकृति को ही 'जीरो-क्लिक सर्च' (Zero-Click Search) में तब्दील कर दिया है। यानी अब पाठक का सवाल गूगल के पन्ने पर ही मशीनी सारांश के जरिए हल हो जाता है। पाठक को उस मूल अखबार या पत्रकार की वेबसाइट पर जाने की आवश्यकता ही नहीं बचती| यह केवल सर्च एल्गोरिदम का तकनीकी बदलाव नहीं है; यह स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता की आर्थिक जड़ों को सुखा देने वाला ढांचागत संकट है।

ऑडियंस रिसर्च फर्म स्पार्कटोरो और डेतोस) के क्लिकस्ट्रीम पैनल अध्ययन के अनुसार, अमेरिका और यूरोपीय संघ में गूगल पर होने वाले कुल सर्च में से लगभग 58.5% से 60% सर्च 'जीरो-क्लिक' में समाप्त हो जाते हैं। 1,000 अमेरिकी सर्च में से औसतन केवल 360 क्लिक और यूरोपीय संघ में 374 क्लिक ही ओपन-वेब की स्वतंत्र वेबसाइटों तक पहुँच पाते हैं। बाकी सारे क्लिक या तो गूगल के अपने उत्पादों (यूट्यूब, मैप्स, ऐड्स) में सिमट जाते हैं या यूजर बिना किसी वेबसाइट पर गए सत्र समाप्त कर देता है।

प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, जब सर्च पन्ने पर एआई सारांश प्रकट होता है, तो सामान्य वेब-परिणामों पर क्लिक करने की संभावना आधी रह जाती है। जिन सर्च पेजों पर एआई सारांश नहीं था, वहाँ 15% यूजर्स ने किसी लिंक पर क्लिक किया; लेकिन एआई सारांश वाले पेजों पर यह घटकर मात्र 8% रह गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि एआई ओवरव्यू के भीतर जो स्रोत संदर्भ के रूप में उद्धृत होते हैं, उन पर केवल 1% यूजर्स ही क्लिक करते हैं। वहीं, अहरिफ्स) के अध्ययन बताते हैं कि एआई ओवरव्यूज के कारण शीर्ष रैंकिंग वाले पेजों के सीटीआर में 58% तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है।

  डिजिटल कंटेंट नेक्स्ट और मीडिया ट्रैफ़िक विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक समाचार संस्थानों के सर्च रेफ़रल ट्रैफ़िक में औसतन 25% से 45% तक की सीधी गिरावट आई है। सूचनात्मक खोजों (में जीरो-क्लिक की दर 65% से 70% तक पहुँच चुकी है, जिसका सीधा असर स्वतंत्र मीडिया घरानों के डिजिटल विज्ञापन राजस्व पर पड़ा है।पत्रकारिता की यह त्रासदी एक गहरे अंतर्विरोध पर खड़ी है। सिलिकॉन वैली के एआई मॉडल्स और एल्गोरिदम खुद रिपोर्टिंग नहीं करते। वे किसी बाढ़ में कमर तक पानी में उतरकर ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं कर सकते, न ही किसी सरकारी दफ्तर में बैठकर घोटालों की फाइलों की पड़ताल कर सकते हैं। एआई केवल वही जानता है जो पत्रकारों और लेखकों ने अपने बौद्धिक श्रम, समय और जोखिम भरे संसाधनों से तैयार किया है।सर्च इंजनों के एआई क्रॉलर्स समाचार पोर्टलों की सामग्री को सेकंडों में खंगालते हैं, उसका सार-संक्षेप तैयार करते हैं और उसे अपने ही सर्च इंटरफेस पर सजा देते हैं। पाठक को त्वरित उत्तर मिल जाता है, सर्च इंजन उस पन्ने पर अपने विज्ञापन चलाकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमाते हैं, लेकिन जिस पत्रकार ने वह तथ्य जुटाया था, उसे बदले में मिलता है—शून्य ट्रैफ़िक, शून्य क्लिक और शून्य विज्ञापन राजस्व।यदि कोई प्रकाशक इस डिजिटल लूट से बचने के लिए अपनी वेबसाइट के robots.txt कोड के जरिए एआई बॉट्स को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो सर्च इंजन उसे मुख्य सर्च इंडेक्स से ही बाहर करने की अप्रत्यक्ष धमकी देते हैं। यह सामग्री निर्माताओं के सामने एक क्रूर विकल्प है: या तो अपनी सामग्री लुटने दीजिए, या फिर डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अदृश्य हो जाइए।

इस 'जीरो-क्लिक' संस्कृति की सबसे घातक मार भारत जैसे विशाल देश की भाषाई और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रही है। बड़े वैश्विक मीडिया कॉर्पोरेशंस तो फिर भी पेड-सब्सक्रिप्शन, सम्मेलनों या ब्रांड गठबंधनों के जरिए कुछ हद तक टिक सकते हैं; लेकिन टियर-2, टियर-3 शहरों और कस्बों में स्वतंत्र रूप से चलने वाले डिजिटल पोर्टल्स और भाषाई पत्रकारों का क्या होगा? वे पूरी तरह से ओपन-वेब ट्रैफ़िक और डिजिटल विज्ञापनों पर निर्भर हैं।जब खोज इंजन ही पाठक को अपनी चहारदीवारी के भीतर रोक लेगा, तो स्थानीय न्यूज़ रूम्स में पत्रकारों की छँटनी होगी, खोजी पत्रकारिता का बजट खत्म होगा और अंततः पूरा समाज 'न्यूज़ डेज़र्ट' (समाचार-विहीन क्षेत्र) में तब्दील हो जाएगा। जब ज़मीन से नए तथ्य जुटाने वाले हाथ ही नहीं बचेंगे, तो भविष्य में यह एआई किसे खंगालेगा? क्या यह खुद अपने ही पैदा किए मशीनी कचरे को बार-बार रीसाइकल कर समाज को परोसता रहेगा?इस असंतुलन को रोकने के लिए कोई नियामक संस्था हो अब समय की मांग यही है |ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक 'न्यूज़ मीडिया बार्गेनिंग कोड' और कनाडा के 'ऑनलाइन न्यूज़ एक्ट' की तर्ज पर भारत में भी अविलंब एक विधायी ढांचा बनाया जाए। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ भारतीय मीडिया घरानों के कंटेंट के एआई इस्तेमाल पर पारदर्शी राजस्व साझा करें।अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और यूरोपीय संघ की अदालतों द्वारा सर्च एकाधिकार पर चलाए जा रहे मुकदमों से सीख लेते हुए भारतीय नियामकों को सर्च इंजनों को 'मध्यवर्ती' से 'प्रकाशक' बनने की मनमानी पर रोक लगानी होगी।एआई सारांशों में केवल नाममात्र के सूक्ष्म फुटनोट देने के बजाय पाठकों को मूल रिपोर्ट तक ले जाने वाले स्पष्ट और बड़े हाइपरलिंक्स को अनिवार्य किया जाए।सर्च इंजन और मूल प्रकाशक के बीच का संबंध सहजीविता पर आधारित था—एक को सामग्री मिलती थी, दूसरे को पाठक। 'जीरो-क्लिक' सर्च और अनियंत्रित एआई समरी ने इस नाजुक संतुलन को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह लड़ाई केवल मीडिया कंपनियों के बैलेंस शीट की नहीं है; यह एक स्वतंत्र, विविध और तथ्यपरक सार्वजनिक विमर्श को ज़िंदा रखने की लड़ाई है। यदि समाज और शासन ने सूचना के इस एकाधिकारवादी दोहन पर समय रहते लगाम नहीं लगाई, तो बहुत जल्द इंटरनेट कॉरपोरेट सारांशों का एक ऐसा बंद कमरा बनकर रह जाएगा—जहाँ सूचनाएँ तो अनंत होंगी, लेकिन सच की स्वतंत्र गवाही हमेशा के लिए मौन हो चुकी होगी।

प्रभात खबर में 30/09/2026 को प्रकाशित लेख 


Thursday, September 17, 2026

वर्षा से मन मयूर नहीं नाचता ,डर सताता है

 

मौसम पहले मन के मिज़ाज से आते थे, अब वे मौसम विभाग की चेतावनियों और प्रदूषण सूचकांक के डरावने आंकड़ों के साथ दाखिल होते हैं। हमारे देखते-देखते जाड़ा, गर्मी और बरसात—तीनों ऋतुएं हमारे तथाकथित 'विकास' की वेदी पर कुर्बान हो चुकी हैं। अब मौसम बदलते नहीं, बल्कि जीवन की लय को झकझोर कर रख देते हैं। कुदरत का जो चक्र कभी जीवन को सहजता और ठहराव देता था, वह अब कंक्रीट के जंगलों और इंसानी आपाधापी में उलझकर दम तोड़ रहा है।
याद कीजिए, कभी गर्मियों की दोपहर का अपना एक अलग सुकून होता था। छत पर शाम को पानी का छिड़काव, खस की भीनी खुशबू, नानी के हाथ का बना आम का पना और आंगन में बिछे बिस्तरों पर तारों को गिनते हुए सो जाना। आज गर्मी का मतलब है पचास डिग्री की झुलसाती लू, तपती डामर की सड़कें और कंक्रीट के कमरों को ठंडा करने के लिए दीवारों पर चौबीसों घंटे हांफते हुए एयर कंडीशनर। हमने हरियाली काटकर जो कंक्रीट के टावर खड़े किए हैं, वे अब आग की भट्ठी की तरह दहकते हैं।
जाड़ा कभी धूप की गुनगुनाहट, तिल-गुड़ की मिठास और मां के हाथ से बुने रंग-बिरंगे स्वेटरों का नाम था। सुहानी धूप में बैठकर मूंगफली के छिलके बिखेरना और देर तक बतियाना जाड़े की रूह हुआ करता था। आज जाड़ा आते ही सूर्य देवता विकास के काले धुएं के पीछे गुम हो जाते हैं। आसमान में कोहरा नहीं, जहरीला स्मॉग तैरता है। बच्चे धूप में खेलने के बजाय एयर प्यूरीफायर वाले कमरों में कैद हो जाते हैं और सांसों की हिफाजत के लिए स्कूलों में ताले लटक जाते हैं। सर्दी अब ठिठुरन का मौसम नहीं, फेफड़ों का संकट बन चुकी है।
रही बात बरसात की, तो वह कभी मिट्टी की पहली सौंधी महक और बेपरवाह बचपन की कागज़ी कश्तियों का त्योहार थी। अब नदियों के पेट और तालाबों को पाटकर बनी पॉश कॉलोनियों में बारिश केवल जलभराव, गाड़ियों के जाम और सीवर के उफनने का खौफ लाती है। बादल बरसते हैं तो मन में कोई मयूर नहीं नाचता, बल्कि यह डर सताता है कि कल दफ्तर कैसे पहुंचेंगे।
इस सारी तबाही की जड़ में है हमारी अंधी रफ्तार। सबको बहुत जल्दी है—जल्दी आगे निकलने की, जल्दी मकान की किस्तें चुकाने की, जल्दी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ने की। इस दौड़ में हमने जीने का ठहराव खो दिया और अपनी छोटी-छोटी मासूम खुशियों को मोबाइल की छह इंच की चमकती स्क्रीन में गिरवी रख दिया।
आज इंसान आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को छूने से कतराता है कि कहीं कपड़े न मैले हो जाएं, तबीयत न बिगड़ जाए। मगर वही इंसान बालकनी में खड़े होकर पानी की चंद बूंदों के साथ पंद्रह सेकंड की रील जरूर शूट करता है। मिट्टी से जुड़ने, बारिश में बेधड़क भीगने और ठंड की धूप को बदन पर महसूस करने का जो सच्चा मानवीय सुख था, वह अब सोशल मीडिया के 'लाइक्स' और 'व्यूज' के बाज़ार में बिक गया है। असली बारिश में भीगने की जगह अब भीगने की रील देखना ज़्यादा तसल्ली देता है।
हमने प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया, उसका हर्जाना अब हमारी आत्मा चुका रही है। मौसमों से उनका मूल सौंदर्य छीनकर हमने खुद को डिजिटल पिंजरों में बंद कर लिया है। जब तक हम रुककर सांस नहीं लेंगे और कुदरत के साथ फिर से रिश्ता नहीं जोड़ेंगे, तब तक मौसम सिर्फ कैलेंडर की तारीखें बनकर रह जाएंगे—बिना किसी एहसास और बिना किसी खुशबू के।
प्रभात खबर में 17/09/2026 को प्रकाशित लेख 

Tuesday, September 8, 2026

समाज में भी फैल रही है 'ऑनलाईन चुप्पी'

 

बीते एक दशक में दुनिया ने जिस तीव्रता से डिजिटल क्रांति को अपनाया है, उसने मानव जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। इस तकनीकी युग में जहाँ सूचना तक पहुँच सरल हुई है, संवाद की भौगोलिक सीमाएँ सिमटी हैं और अभिव्यक्ति के नए मंच विकसित हुए हैं, वहीं इसके कुछ गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी सामने आए हैं। सोशल मीडिया, जो कभी वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देने वाले एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावशाली कारक के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। आज स्थिति यह है कि लोग पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन संवाद पहले से कहीं अधिक सतही हो गया है। सोशल मीडिया पर अब बातचीत कम और प्रतिक्रिया बढ़ गई है, हर मुद्दा पक्ष और विपक्ष में बंटा हुआ है, बीच के संवाद की जगह खाली हो गई है।

डेटा रिपोर्टल के मुताबिक 2025 तक सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या दुनिया में 5.24 अरब तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक आबादी का करीब 63 प्रतिशत है। वहीं सोशल प्रेस की एक रिपोर्ट की माने तो अब सोशल मीडिया केवल संवाद या संपर्क करने का एक माध्यम भर नहीं रह गया है बल्कि 34 प्रतिशत लोग इसका उपयोग समाचार पढ़ने और उससे भी अधिक लोग अपना खाली समय बिताने और मनोरंजन के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। आज का सोशल मीडिया भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से ज्यादा डाटा का बाजार बन गया है। हर क्लिक, हर लाइक, हर सेंकेंड बदलती स्क्रीन सब कुछ बेचा जा रहा है। और इस बाजार की मुद्रा है अटेंशन इकॉनॉमी। इस इकॉनमी में वही कंटेंट टिकता है जो चौंकाता है, डराता है या भावनाओं को उत्तेजित करता है। नतीजन हर घंटें हजारों पोस्ट, वीडियो, रील्स हमारे सामने से गुजर जाते हैं जिनमें गुणवत्ता से अधिक सतहीपन झलकता है। युवाओं में भी एक बड़ा वर्ग अब कंटेंट को सोचने के लिए बल्कि रिएक्ट करने के लिए देखता है। वहीं असहमति और आलोचना के डर से एक बड़ा वर्ग अब चुप्पी साध रहा है। यहीं से शुरु होती है एक डिजिटल त्रासदी, स्पाइरल ऑफ साइलेंस। दशकों पहले एक जर्मन समाजशास्त्री एलिजाबेथ न्यूमैन ने स्पाइरल ऑफ साइलेंस का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था जब लोगों को लगता है कि उनकी राय बहुमत से अलग है तो वे चुप रहना बेहतर समझते हैं।  

यह स्थिति उस शुरुआती ख्याल से बिल्कुल उलट है, जिसके साथ सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया था।शुरुआत में यह माना गया था कि यह मंच आम आदमी की आवाज़ बनेगा। समाज में खुला संवाद होगा और विचारों का लोकतंत्रीकरण होगा। लेकिन आज एक अजीब सी विडंबना हमारे सामने आती है, दुनिया एक मंच पर तो आ गई लेकिन यह मंच संवाद से ज्यादा शोर में तब्दील हुआ दिखाई पड़ता है।

यह सिद्धांत आज सोशल मीडिया पर भी सटीक लागू हो रहा है।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाएँ, जिसे हम पहले पसंद या क्लिक कर चुके हैं। इसके चलते हमारे सामने वही विचार और ट्रेंड आते रहते हैं, जो पहले से लोकप्रिय हैं। इसी प्रक्रिया को फिल्टर बबल कहा जाता है—जहाँ उपयोगकर्ता एक सीमित दायरे में फँस जाते हैं और अलग-अलग दृष्टिकोण उनसे छिप जाते हैं।
इस माहौल में जब कोई असहमति व्यक्त करता है, तो अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप बहुत से लोग अपने विचार साझा करने से हिचकिचाने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर मौजूद तो रहते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते—सिर्फ पोस्ट पढ़ते हैं, रील्स देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।
उनके अंदर ये भावना आ जाती है कि उन्होंने कुछ लिखा तो वह ट्रेंड या लोकप्रिय नहीं होगा। धीरे-धीरे यह चुप्पी ऑनलाइन दुनिया के बाहर भी फैल रही है। दफ्तरों, कॉलेज और पारिवारिक चर्चाओं में भी लोग अपनी मौलिक राय व्यक्त करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि बहस की जगह प्रतिक्रियाएँ और केवल सहमति वाले विचार ही बने रहते हैं।
वेसलेयन यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि जो लोग सोशल मीडिया पर चुप रहते हैं वे अब असल जिंदगी में भी अपनी राय देने से कतराते हैं। अब बहुमत की राय वह नहीं है जो वे सोचते हैं बल्कि वह है जो प्लेटफॉर्म दिखाना चाहता है, एल्गोरिदम तय करता है कि कौन सी आवाज दिखेगी और कौन सी दब जाएगी।
आज हम ऐसे दो राहों पर खड़े हैं जहाँ तकनीक तो 2026 की है लेकिन हमारी सामाजिक समझ और मानसिक सुकून कई साल पीछे छूट गया है। वह सपना कि सोशल मीडिया लोगों के बीच दूरियाँ मिटाएगा आज एक डिजिटल भीड़ में बदल गया है जहाँ हम करोड़ों लोगों के बीच होते हुए भी अपनी बात कहने में असुरक्षित महसूस करते हैं। यह स्पाइरल ऑफ साइलेंस और एल्गोरिदम की बनाई दीवारे केवल हमारे फोन तक ही नहीं हमारे सोचने और बोलने पर भी प्रभाव डाल रही है। अंतत: यह जिम्मेदारी हम यूजर्स की है, अगर हमें इस डिजिटल जेल औऱ फूहड़ कंटेंट के जाल से बाहर निकलना है तो हमें मूक दर्शक बनना छोड़ना होगा। हमें एक ऐसे मंच का निर्माण करना है जहाँ संवाद में असहमति का भी सम्मान हो और अभिव्यक्ति का मतलब सिर्फ लाइक पाना न हो। वरना यह ग्लोबल विलेज केवल एक संख्या और स्क्रीन का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ लोग जुड़े तो रहेंगे लेकिन उनके बीच असली संवाद, समझ और रचनात्मकता लुप्त हो चुकी होगी। क्योंकि असली अभिव्यक्ति वही है जहाँ डर न हो और असली जुड़ाव वही है जहाँ मतभेद हों।
प्रभात खबर में 08/09/2026  को प्रकाशित 

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