Tuesday, January 16, 2018

कुछ खोकर कुछ पाना

कभी कभी लिखना  कितना कुछ मुश्किल हो जाता है.अब मुझे ही देखिये कई  दिन से इस लेख के लिए विषय तलाश रहा हूं पर कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है.कभी कभी ऐसा होता है कि विचारों की भरमार होती है पर उस वक्त मैं उनको उतनी तवज्जो नहीं देता और फिर वे उड़ जाते हैं फिर कभी न आने के लिए और आज मुझे उनकी जरुरत है पर अब मैं उनको खो चुका हूं शायद याद करना इसी को कहते हैं.खोने पाने की इसी  उधेड़बुन में मुझे समझ में आया कि जिंदगी में पाने से ज्यादा खोना जरूरी है क्योंकि तब आप अपने आस पास की चीजों की ज्यादा कद्र करते हैं. जीवन में कुछ चीजों की कमी हो तो उनके प्रति हमारी ललक बनी रहती है. बचपने में मुझे कहानियां पढ़ने का बड़ा शौक था वो भी परियों की मैं चाहता था कि काश कोई परी मेरे जीवन में भी हो जो मेरी सारी परेशानियों को दूर कर दे. जब बड़ा हुआ तो यह समझ में आया कि परी जैसी कोई चीज तो होती ही नहीं अगर कोई परी मेरे जीवन में आ गई होती तो शायद किसी परी को पाने की चाह मेरे मन में है वो खत्म हो गई होती.अब सोचिये जिंदगी के किसी मोड पर अगर मुझे कोई परी सही में मिल जायेगी तो मुझे कितनी खुशी मिलेगी,पर उस खुशी को महसूस करने के लिए मुझे उसकी कमी का एहसास होना भी जरूरी है.खुशी की पहचान वही कर सकता है जिसने दुःख झेला हो,जिंदगी की कद्र वही कर सकता है जिसने मौत को महसूस किया होकिसी को पाने के एहसास को वही समझ सकता है जिसने जिंदगी में किसी को खोया हो. रोना ज़रूरी है उससे ज़्यादा जितना ज़रूरी होता है हंसना जीने के लिएकहना ज़रूरी है उससे ज़्यादा जितना ज़रूरी होता है अक्सर खामोश रहना,चलना ज़रूरी है उससे ज़्यादा जितना ज़रूरी है गुमशुदा राहों पर रुक कर इंतज़ार करनामैं ज़रूरी हूँ खुद के लिए उससे ज़्यादा जितना ज़रूरी हैं  आप सब मेरे लिए. तो असल में जिंदगी की वो चीजें जो आपके लिए परेशानियों का कारण बनती हैं वो असल में ये वो चीजें हैं जिनसे रूबरू होकर आप जिंदगी का असली लुत्फ़ उठा सकते हैं.
छुट्टियों का मजा तो तभी है जब आप व्यस्त हों अगर आप खाली हैं तो रोज ही छुट्टी है पर क्या आप उन दिनों को एन्जॉय कर पाएंगेनहीं कर पाएंगे क्योंकि आपके पास कोई काम नहीं है.  अगर आपके साथ बहुत बुरा हो रहा है तो अच्छा भी होगा भरोसा रखिये.ऐसा हमारी आपकी सबकी जिन्दगी में होता है .जिन्दगी पाने  का नाम नहीं बल्कि खोने का नाम है  जहाज़ सबसे सुरक्षित पानी के किनारे होता है लेकिन उसे तो समुद्र  के लिए तैयार किया गया होता है भले ही असली दुनिया में परियां न होती हों पर उनके सपने अभी भी मुझे आते हैं.इसलिए आपके आस पास जो भी है चाहे वो रिश्ते हों या चीजें उनकी कद्र कीजिये क्योंकि जिंदगी में आपने कुछ भी पाया है वो जरुर कुछ खो कर पाया होगा.
प्रभात खबर में 16/01/18 को प्रकाशित 

Thursday, January 11, 2018

अब वीडियो ऑनलाईन रिव्यू बदलेगा ई शॉपिंग कारोबार को

ऑनलाईन रिव्यू आज किसी भी उत्पाद या सामग्री की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को जांचने का एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं वो चाहे होटलों का चुनाव हो या फिर ऑनलाईन शॉपिंग करते वक्त सैकड़ों विकल्पों के बीच अपने  मनपसंद उत्पाद का चुनाव वैसे भी भारत में ऑनलाईन शॉपिंग का कारोबार तेजी से फ़ैल रहा है पर देश में ऑनलाईन खरीद का कोई इतिहास न होने से नए लोग इंटरनेट के माध्यम से चीजें खरीदने में थोडा हिचकते है  |ऐसे में लोगों के  लिए पूर्व में उस सेवा या उत्पाद का उपयोग कर चुके लोगों द्वारा लिखी गयी समीक्षाएं एवं टिप्पणियां भावी उपभोक्ताओं  के लिए मददगार साबित होती हैंइ-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से खरीददारी करने का सबसे बड़ा फायदा लोगों को उत्पादों पर मिलने वाली छूट के अलावा अन्य उपभोक्ताओं द्वारा  खरीदे गए उन्हीं सामानों के बारे में अपनी राय भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |ये टिप्पणियां एवं समीक्षाएं नए उपभोक्ताओं को सेवा या उत्पाद की खरीद  में मदद करती हैं








समस्त ऑनलाईन सामान बेचने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को अपनी बात कहने का मौका देती हैंउपभोक्ता भी धीरे-धीरे इस मौके का इस्तेमाल अवसर की तरह करने लगे हैं आमतौर पर ऑनलाईन ई कॉमर्स साईट पर लिखी जाने वाली समीक्षाएं लिखित रूप में ही होती रहीं हैं पर पिछले तीन सालों में इंटरनेट के परिद्रश्य में काफी बदलाव आया है |इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है | |गूगल के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल  देश से वीडियो अपलोड होने की संख्या में नब्बे प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और वीडियो देखने के समय में अस्सी प्रतिशत का इजाफा हुआ है |तथ्य यह भी यूट्यूब पर वीडियो देखने के समय में इजाफा स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या के साथ हुआ है | वीडियो कंटेंट को पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि देश में इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार बार कंटेंट को बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |अमेजन जैसी ऑनलाईन शॉपिंग कम्पनी ने उपभोक्ताओं के रुख को भांपते हुए ऑनलाईन रिव्यू की दुनिया में एक नए तरह के प्रयोग की शुरुआत करने जा रहा है ऑनलाइन सम्बंधित शोध करने वाली एक संस्था एल 2 के अनुसार आने वाले समय में अमेज़न अपने उपभोक्ताओं को वीडियो के माध्यम से भी समीक्षाएं देने की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ रहा है |अमेज़न ने लगभग अपने बीस  लाख व्यापार सहयोगियों को इस परीक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है|इस  योजना का पहला चरण दिसंबर के अंत तक शुरू  होने की उम्मीद है| जिसमें उपभोक्ता  टिप्पणियां एवं समीक्षाएं वीडियो के माध्यम से भी अमेज़न पर भेज सकेंगेइस फीचर को जोड़ने के पीछे अमेज़न का सीधा उद्देश्य खरीददारों को अपनी वेबसाइट पर रखना और उन्हें यू ट्यूब  जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों की ओर पलायन करने से रोकना है|इसी साल अक्टूबर में अमेज़न को "सामग्री-आधारित कीमत कटौती एवं प्रोत्साहन" के लिए एक पेटेंट भी मिला है| पेटेंट के अनुसार किसी इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में उपभोक्ताओं को ऑडियोवीडियो या इंटरैक्टिव सामग्री को ग्रहण करने का विकल्प दिया जा सकता है ताकि उन्हें छूट या अन्य लाभ दिए जा सकें। उदाहरण  के लिए यदि कोई उपभोक्ता अमेज़न के विवरण वाले पेज पर जाकर किसी उत्पाद की समीक्षा करने वाले वीडियो को देखता है तो जैसे जैसे वह वीडियो आगे बढ़ता जायेगा उत्पाद के दाम काम होते जाएंगे|यानि  अधिक समय तक विज्ञापन देखने वाले उपभोक्ता को अधिक छूट मिलेगीअमेज़न का पेटेंट यह भी सुनिश्चित कर देगा की कि  कोई भी अन्य ऑनलाइन रिटेलर इस तरह की सुविधा अपने ग्राहकों को नहीं दे पायेगा | इस पेटेंट के साथ ही अमेज़न ने यूट्यूबफेसबुकइंस्टाग्रामजैसी कंपनियों के विज्ञापन व्यपार में भी सेंध लगाने की कोशिश की हैअब उपभोक्ताओं को अपने समय की कीमत का वास्तविक अर्थों में सही मूल्य मिलेगा और कीमत  को उपभोक्ताओं के व्यवहार से जोड़ने से कंपनी के प्रति वफादार उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि होगी |जिससे  ऑनलाइन रिटेलर ज्यादा समय तक  उपभोक्ताओं को अपनी वेबसाइट पर रोक पाएंगे|चीजों को देखकर और लोगों से राय लेकर खरीदने की सहज मानवीय भारतीय प्रवृत्ति है|भारत जैसे देश में जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में लोग कम पढ़े लिखे हैं पर इंटरनेट डाटा की कम कीमतों के कारण मोबाईल इंटरनेट उनकी पहुँच में है |वे ऑनलाईन शॉपिंग या तो करते नहीं या करते वक्त उत्पाद को लेकर  भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि किस उत्पाद को खरीदा जाए क्योंकि वो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं और जो पढ़े लिखे लोग अपने रिव्यू लिखते हैं वो ज्यादातर भारतीय भाषाओँ में न होकर अंग्रेज़ी में होते हैं ऐसे में वीडियो रिव्यू की यह सुविधा उनके उत्पाद के चुनाव को लेकर  हुई भ्रम की दुविधा को खतम कर देगी  |और दूसरी ओर उनके लिए यह सुविधा  जहाँ उन्हें ऑनलाईन शॉपिंग प्लेटफोर्म से जोड़ने का एक माध्यम बन सकती है वहीं  ई शॉपिंग कारोबार को और ज्यादा प्रमाणिक एवं सुहाना बना सकती है |तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि प्रायोजित समीक्षाओं के दौर में प्रायोजित वीडियो समीक्षाओं के आने का भी खतरा है जो लोगों के संशय  को बढ़ा सकता है |  हालाँकि अभी यह कहना कठिन है कि अमेज़न द्वारा उठाये गए इस कदम का इ-कॉमर्स के क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा पर इतना तो तय है कि इससे जहाँ ओर इंटरनेट पर वीडियो की बादशाहत और बढ़ेगी और  उपभोक्ताओं के लिए  कम दामों में बेहतर सामानों की सौगात भी मिलेगी |


कैसे मोबाईल स्क्रीन हावी हो रही है हमारे जीवन में

लम्बे समय तक  स्क्रीन का मतलब घरों में सिर्फ टीवी ही  होता था पर आज उस स्क्रीन के साथ एक और स्क्रीन हमारी जिन्दगी का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन गयी है वो है हमारे स्मार्ट फोन की स्क्रीन जहाँ मनोरंजन से लेकर समाचारों तक सब कुछ मौजूद है | यह मोबाईल स्क्रीन अभिभावकों के लिए एक अंतहीन गुस्से का कारण बन रही हैएक तरफ बच्चे मोबाईल चाहते हैं दूसरी तरफ अभिभावक भले ही मोबाईल के लती बन चुके हैं और यह जानते हुए भी कि मोबाईल इंटरनेट में बहुत सी अच्छी चीजें बच्चों के लिए हैंवे उन्हें देना भी चाहते हैं और नहीं भी ,यह सब मिलकर भारतीय घरों में  मानसिक द्वन्द का एक ऐसा वातावरण रच रहे हैं जिससे हर परिवार पीड़ित  है | हालंकि माध्यमों के चुनाव को लेकर भारतीय घरों में यह द्वन्द नया नहीं है पहले रेडियो सुनने फिर टीवी जब घर घर पहुंचा तो ऐसा ही कुछ टेलीविजन के साथ हुआ कि टेलीविजन बच्चों को बिगाड़ देगा उन्हें ज्यादा टीवी नहीं देखना चाहिए ऐसी बहसें हर घर की कहानी हुआ करती थी पर मोबाईल स्क्रीन  की कहानी इन सब माध्यमों से अलग है |यह एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है जिसके साथ फोन और कैमरा लगा हुआ है जो हमारी जेब में आ जाता है या यूँ कहें यह हमें व्यस्त रहने के लिए उकसाता है और फिर हमारे व्याकुलता के स्तर को बढ़ाता है और अंत में हमें अपना लती (व्यसनी )बना देता है |
बच्चों के मामले में यह स्थिति और गंभीर होती है क्योंकि मोबाईल एक माध्यम के रूप में  ज्यादा व्यक्तिगत और मांग पर उपलब्ध कंटेंट प्रदान करता है जो अंतर वैयक्तिक सम्बन्धों की गतिशीलता  को प्रभावित करता है अतः इससे दूर हो पाना किसी के लिए भी मुश्किल होता है | टेलीफोन कम्पनी टेलीनॉर द्वारा समर्थित वेब वाईस द्वारा  किये गए एक शोध में यह तथ्य निकल कर आया कि एक शहरी भारतीय बच्चा औसत रूप में कम से कम चार घंटे इंटरनेट पर बिता रहा है जिसमें सबसे ज्यादा संख्या मोबाईल इंटरनेट की है|2017 के अंत तक दस करोड़ चौंतीस लाख (134 मिलीयन )भारतीय बच्चे इंटरनेट से जुड़ चुके होंगे| कोलोरेडो विश्वविद्यालय,अमेरिका  के एक शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत बच्चे (पांच साल से सत्रह साल की उम्र वाले )मोबाईल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं जिससे वे देर से सो रहे हैं और  उनकी नींद की गुणवत्ता  प्रभावित हो रही है नतीजा बच्चों की नींद और  एकाग्रता में कमी के रूप में सामने आता है|मोबाईल स्क्रीन से निकलने वाले  प्रकाश की  तरंग दैर्ध्य और गुणवत्ता,शरीर की आन्तरिक घड़ी और नींद लेने की प्रक्रिया पर असर डालती है जो शरीर के मेलाटोनिन हार्मोन को कम करता है यह हार्मोन ही हमारे शरीर को बताता है कि यह नींद लेने का समय है।स्क्रीन पहले की तुलना में लगातार छोटे होते जा रहे हैं इसलिए उनका इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता जा रहा है इसलिए बच्चों के लिए उनका इस्तेमाल ज्यादा आसान है जिस वक्त उन्हें सोना चाहिए वे मोबाईल पर वीडियो देख रहे होते हैं |मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बचपन और किशोरवस्था में अच्छी नींद का आना मोटापे के खतरे को कम करता है और बच्चों के संज्ञानात्मक व्यवहार को बेहतर करता है | इंटरनेट पर वीडियो देखे जाने की सुविधा का आगमन और अमेजन प्राईम वीडियोनेट फ्लिक्स और यूट्यूब  जैसे वीडियो आधारित इंटरनेट चैनलों के आ जाने से स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय वीडियो कार्यक्रमों के लिए हमारी दिनचर्या का मोहताज नहीं रहा ,जब जिसको जैसे मौका मिले वो अपने मनपसन्द कार्यकर्मों का लुत्फ़ उठा सकता है,यह सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं भी ला रही है और इसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं जो देर रात तक अपने मनपसन्द कार्यक्रम मोबाईल पर देख रहे हैं | यह अलग बात है कि हम मोबाईल स्क्रीन के मोह में ऐसे बंधे हैं कि इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे हैं कि हमारे बच्चे भी मोबाईल स्क्रीन के चंगुल में फंसते  जा रहे हैं जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है | ब्लू व्हेल गेम को खेलने के दौरान हुई बच्चों की मौतों ने मोबाईल इंटरनेट का बच्चों द्वारा कैसा और कितना इस्तेमाल होना चाहिए इस बहस को चर्चा में ला दिया है |भारत में इस माध्यम के इस्तेमाल का बहुत ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है एक ही वक्त में माता –पिता और बच्चे साथ -साथ इसके प्रयोग से परिचित हो रहे हैं |इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है और उसमें बच्चे भी शामिल हैं |मोबाईल स्क्रीन अब हमारे जीवन की सच्चाई है तो इससे काटकर हम अपने बच्चों को बड़ा नहीं कर पायेंगे तो इसके संतुलित इस्तेमाल का तरीका उन्हें सीखाया जाए उनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों के खेल से लेकर पढने के अभ्यास तक का उचित सम्मिश्रण होना चाहिए |अब वक्त आ चुका है जब हमें तकनीक और उस पर उपलब्ध कंटेंट को अलग –अलग देखना सीखना होगा क्योंकि तकनीक कोई गलत या खराब नहीं होती उसके इस्तेमाल का तरीका सही या खराब होता है |जाहिर है जब माता पिता का अपने बच्चों के साथ विश्वास का सम्बन्ध कायम  नहीं होगा तब तक वे  अपने बच्चों को मोबाईल के इस्तेमाल का सही तरीका नहीं सिखा पायेंगे|इस दिशा में इंटरनेट प्रदान करने वाली कम्पनियों को भी पहल करनी चाहिए जैसे कि सोते वक्त वाई-फाई राउटर अपने आप बंद हो जाए या उनमें चिल्ड्रेन मोड का एक विकल्प दिया जाए | इस तरह की व्यवस्था हो किबच्चों द्वारा ज्यादा इस्तेमाल किये जा रहे एप रात में  न चले जैसे छोटे कदम बच्चों के मोबाईल इंटरनेट को व्यवस्थित कर सकते हैं |   
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Monday, January 8, 2018

ओएल का मेढक मंदिर

भारत मंदिरों का देश है |हर जगह के मंदिर अपने इतिहास और विरासत को समेटे हुए हैं पर अभी भी देश में ऐसे कई मंदिर हैं जिनके बारे में लोग कम जानते हैं |ऐसा ही एक मंदिर है लखीमपुर-खीरी जिले के ओयल कस्‍बे में जिसे भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर माना जाता  है।जिसे मुझे देखने का सौभाग्य अचानक ही मिला |
ओएल का प्रसिद्द मेढक मंदिर 
हम कर्तनिया वन्य अभ्यारण से घूम कर लखनऊ लौट रहे थे |रास्ते में चाय नाश्ते के लिए हमारी गाडी लखीमपुर-खीरी और सीतापुर की सीमा पर रुकी और मैंने आदतन लोगों से पूछा इस जगह क्या ख़ास है ?लोगों ने बताया यहाँ मेढक मंदिर है,मेढक मंदिर !!मैंने आश्चर्य से पूछा ,हाँ यहीं करीब है आप जरुर जाइए |साल का आखिरी दिन था सोचा गया चलो देखा जाए |लोगों से रास्ता पूछते ही जैसे ही हम वहां पहुंचे एक विशाल मंदिर दूर से दिख रहा था एक मेढक के ऊपर बना हुआ शिव मंदिर हालंकि जब हम वहां पहुंचे तो लोगों की भारी भीड़ थी पर वह भीड़ मंदिर में दर्शन करने वालों की नहीं बल्कि किसी भोजपुरी फिल्म की शूटिंग देखने वालों की थी|वहीं रहने वाले रोहित ने बताया यहाँ शिवरात्रि और दीपावली को ही भीड़ होती है बाकी दिन ज्यादा लोग नहीं आते क्योंकि यह तांत्रिक मंदिर है और शिव की पूजा तांत्रिक रूप में की जाती है  |
खड़े हुए नंदी :फोटो साभार  गूगल इमेजेस 
वैसे
मेंढक मंदिर जिस ओयल कस्‍बे में है, उसका अपना एक  ऐतिहासिक महत्‍व है। ओयल शैव संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र था और यहां के राजा  भगवान शिव के उपासक थे। चाहमान वंश के राजा बख्श सिंह ने इस मंदिर का निर्माण 1860-1870 के मध्य कराया था। मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी। मेढक के शरीर पर बने इस मंदिर के चारों  कोनों  पर एक –एक गुम्बद है और बीच में शिव मंदिर |इस शिव मंदिर की एक और ख़ास बात है यहाँ शिव जी का वाहन नंदी बैल खड़ा हुआ है जबकि अन्य शिव मंदिरों में नंदी शिवलिंग के सामने बैठे हुए दिखते हैं वैसे जब हम वहां थे हमें इस तथ्य का पता नहीं था इसलिए फोटो के लिए गूगल का सहारा लेना पड़ा |
मेढक मंदिर का पिछ्ला हिस्सा 
मेंढक मंदिर 38 मीटर लंबाई, 25 मीटर चौड़ाई में निर्मित एक मेंढक की पीठ पर बना हुआ है। मेंढक का मुख तथा अगले दो पैर उत्तर की दिशा में हैं। मेंढक का मुख दो मीटर लंबा, डेढ़ मीटर चौड़ा तथा एक मीटर ऊंचा है। इसके पीछे का भाग 2 मीटर लंबा तथा 1.5 मीटर चौड़ा है, जबकि पिछले पैर दक्षिण दिशा में हैं। मेंढक की उभरी हुई गोलाकार आंखें तथा मुख का भाग बड़ा जीवंत प्रतीत होता है। मंदिर का छत्र भी आम मंदिरों से थोड़ा अलग तांत्रिक रूप देता है जिस पर हिरन जैसे जानवर के कई मुंड लगे हुए हैं |
मंदिर की दीवार पर उकेरी कला 
मंदिर भूतल से करीब तीस फीट ऊपर है और यहीं एक कुआं भी है जिसमें आज भी मीठा पानी निकलता है और भक्त मंदिर में जल चढाने के लिए यहाँ से पानी निकालते हैं |वैसे तो यहाँ कई कहानियां हमें बताई गयीं कि यहाँ एक भूल भुलैया है जहाँ कोई नहीं जाता अब वहां ताला लगा है |मुझे बताया गया कि इस रास्ते का प्रयोग पहले राज परिवार के सदस्य पूजा करने के लिए करते थे |हमने भी इस अनोखे मंदिर में कुंए से जल निकालकर पूजा की और ऊपर वाले को शुक्रिया कहा जिसने अनायास ऐसे मन्दिर को देखने का मौका दिया |

Saturday, December 30, 2017

साल 2018 भी 'आधार' का होगा

हर साल के अंत में  इस बात आंकलन अकादमिकों और पत्रकारों  द्वारा किया जाता  है कि सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देश ने क्या खोया और क्या पाया मकसद सिर्फ यह होता है कि आगे बढ़ने के क्रम में हमें यह पता हो कि हम कहाँ से चले थे और कितना आगे जाना है |कोई भी देश सभ्यता इसी तरह फलता फूलता और आगे बढ़ता है |जो अतीत से सबक नहीं लेता उसकी जगह भविष्य में नहीं होती |बात जब आंकलन की होती है तो आंकड़ों का जिक्र आना स्वाभाविक है तो  इस मायने से साल 2017 आधार कार्ड के आंकड़ों और विभिन्न सरकारी/गैर सरकारी  योजनाओं से उसे जोड़े जाने के कारण याद किया जायेगासही मायने में अगर हम देखे तो आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी सरकार के पास अपने नागरिकों के व्यवस्थित बायोमेट्रिक आंकड़े उपलब्ध हैं |आंकड़े का मतलब सटीकता और इसी बात को ध्यान में रखते हुए धीरे धीरे ही सही सरकार ने  मोबाईल,बैंक खाते,बीमा पॉलिसी ,जमीन की रजिस्ट्री से लेकर आयकर सभी को आधार से जोड़ने का काम शुरू किया आंकड़े इस बात की पुष्टि करते है कि भारत में निम्न आय वर्ग के लोगों के पास बेहतर पहचान दस्तावेज नहीं होते|जगह बदलने पर ऐसे लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का फायदा सिर्फ वैध पहचान पत्र न होने से नहीं मिल पाता|आधार कार्ड योजना से इस बात पर भी बल मिलता है कि भारत में बढते डिजीटल डिवाईड को आंकड़ों को डिजीटल करके और उसी अनुसार नीतियां बना कर पाटा जा सकता है तकनीक सिर्फ साधन संपन्न लोगों का जीवन स्तर नहीं बेहतर कर रही है|एक अरब पच्चीस करोड़ की जनसँख्या  वाले  देश में केवल 6.5 करोड़ लोगों के पास पासपोर्ट और लगभग बीस  करोड़ लोगों के पास ड्राइविंग लाइसेंस है  ऐसे में आधार उन करोड़ों लोग के लिए उम्मीद  लेकर आया है जो सालों से एक पहचान कार्ड चाहते थेभ्रष्टाचार एक सच है और इसे सिर्फ कानून बना के नहीं रोका जा सकता  बल्कि तकनीक के इस्तेमाल और पारदर्शिता को बढ़ावा देकर समाप्त किया जा सकता है |देश में सौ  करोड़ से ज्यादा लोगों के पास आधार है।भारत में 73.96 करोड़ (93 प्रतिशत) वयस्कों के पास और 5-18 वर्ष के 22.25करोड़ (67 प्रतिशत) बच्चों के पास और वर्ष से कम आयु के 2.30 करोड़ (20 प्रतिशत) बच्चों के पास आधार है तो देश में पिछले एक साल पहचान का सबसे बड़ा स्रोत आधार कार्ड बन कर उभरा है |भारत जैसे विविधता वाले देश में यदि लोगों का जीवन स्तर बेहतर करके देश की मुख्यधारा में लाने के लिए यह जरुरी है कि सरकार के पास सटीक सूचनाएं हों जिससे वह सरकारी नीतियों का वास्तविक आंकलन कर उन योजनाओं को और जनोन्मुखी बना सके |आयकर दाताओं की संख्या के आंकड़े अपने आप में काफी कुछ बयान कर देते है आयकर विभाग के आंकड़ों के हिसाब से साल 2014-15 में  देश में मात्र 24.4लाख लोगों ने अपनी वार्षिक  आय दस लाख  रुपये से ऊपर बताई  देश की आबादी सवा सौ  करोड़ से अधिक है लेकिन  आयकर  रिटर्न भरने वालों की संख्या मात्र 3.65 करोड़ थी|जबकि पिछले पांच साल में औसतन पचीस लाख नई कार वार्षिक रूप से खरीदी जाती है और सरकार आयकर चोरी रोकने में नाकाम इसलिए रहती है क्योंकि उसके पास लोगों के ब्योरे नहीं है पर आधार के बैंक और आयकर से जुड़ने से आने वाले  साल में निश्चित रूप से आयकर दाताओं की संख्या बढ़ेगी और कर चोरी मुश्किल होगी क्योंकि आपकी आय व्यय का लेखा जोखा सरकार  के पास होगा |केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में बयासी प्रतिशत राशन कार्ड आधार से जोड़े जा चुके हैं और पिछले चार वर्षों में दो करोड़ पचहत्तर लाख राशन कार्ड रद्द किये जा चुके है जो जाहिर है फर्जी नामों से बने थे |सरकार प्रतिवर्ष 17500 करोड़ रुपये की सब्सिडी सस्ते अनाज के लिए जरुरतमंदों को देती है पर राशन कार्ड की अनिवार्यता के पहले इसमें से ज्यादातर अनाज जरुरतमंदों को न मिलकर कालाबाजारी के जरिये  वापस बाजार में आ जाता था |सरकार के लाख प्रयास के बाद भी लोग भूखे पेट सो रहे थे पर अब ऐसा नहीं है |अनाज जरुरत मंदों तक पहुँच रहा है |ऐसा ही कुछ हाल मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों का भी था जिनको या तो कम मजदूरी मिलती थी या फर्जी नामों से मनरेगा का भुगतान हो जाता था |लेकिन आधार और उसके आंकड़ों से जुडी कुछ चिंताएं भी हैं जिनमें सबसे बड़ी चिंता निजता के अधिकार को लेकर है क्योंकि सरकार लोगों की बायोमेट्रिक पहचान जुटा रही हैजिसके डाटा बेस की सुरक्षा एक बड़ा सवाल है अक्सर लोगों के आधार कार्ड से जुडी जानकारियों के लीक होने की खबर  सुर्खियाँ बनती हैं सरकार जिस तरह से विभिन्न डाटा बेस के आंकड़ों को आपस में जोड़ रही हैउससे आंकड़ों के चोरी होने और लोगों की निजता भंग होने का ख़तरा बढ़ा हैसरकार ख़ुद भी ये मान चुकी है कि लगभग  चौंतीस हज़ार सर्विस प्रदाताओं को या तो काली सूची में डाल दिया  गया है या फिर उनको सेवा देने से निलंबित किया जा चुका हैजो सही  प्रक्रिया का इस्तेमाल न करते हुए फर्जी आधार बना रहे थे |गौर तलब बात है कि आधार कार्ड का मुख्य उद्देश्य ही फर्ज़ी पहचान को ख़त्म करना थापर  सरकार ख़ुद ही अब तक पच्चासी  लाख लोगों की नकली पहचान को रद्द कर चुकी है|फ़िलहाल हर बीतते वक्त के साथ देश में आधार नंबर धारकों की संख्या बढ़ रही है और देश के निवासियों को पहचान मिल रही है पर उसी तेजी से अगर  सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिले तो साल 2018 भी आधार का ही होगा |
आई नेक्स्ट में 30/12/17 को प्रकाशित 

Friday, December 22, 2017

सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती है कूड़ा प्रबंधन

किसी भी देश के विकास के पैमाने को अगर सामान्य नजरिये से समझना हो जिसमें अकादमिक गंभीरता न हो तो आप वहां प्लास्टिक के इस्तेमाल और कूड़ा प्रबन्धन पर नजर डालें आपको समझ आ जायेगा कि वह देश विकसित है या विकासशील .यूरोप और अमेरिका विकास के पैमाने पर विकसित हैं तो वे प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करते हैं और उनका कूड़ा प्रबन्धन विकासशील देशों के मुकाबले बहुत बेहतर स्थिति में है .भारत कोई अपवाद नहीं है विकासशील देशों में आने के नाते हमारी हालत अन्य विकास शील देशों जैसी ही है जो जल्दी विकसित होने की चाह में प्लास्टिक और पौलीथीन का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं और फिर उनसे निकले कूड़े का कोई उचित प्रबन्धन नहीं है .आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ ही कूड़े की समस्या मानव सभ्यता के समक्ष आयी .जब तक यह प्रव्रत्ति प्रकृति सापेक्ष थी परेशानी की कोई बात नहीं रही क्योंकि ऐसे कूड़े को प्रकृति आसानी से पचा लेती थी  पर इंसान जैसे जैसे प्रकृति को चुनौती देता गया और विज्ञान आगे बढ़ता गया कई ऐसे कूड़े मानव सभ्यता के सामने आये जिनको प्रकृति अपने में समाहित नहीं कर सकती और  कूड़ा प्रबंधन एक गंभीर समस्या में तब्दील होता गया क्योंकि मानव ऐसा कूड़ा छोड़ रहा था जो प्राकृतिक तरीके से समाप्त  नहीं होता या जिसके क्षय में पर्याप्त समय लगता है और उसी बीच कई गुना और कूड़ा इकट्ठा हो जाता है जो इस प्रक्रिया को और लम्बा कर देता है जिससे कई तरह के प्रदुषण का जन्म होता है और साफ़ –सफाई की समस्या उत्पन्न होती है .भारत ऐसे में दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहा है एक प्रदूषण और दूसरी स्वच्छता की . पिछले एक दशक  में भारतीय रहन सहन में पर्याप्त बदलाव आये हैं और लोग प्लास्टिक की बोतल और प्लास्टिक में लिपटे हुए उत्पाद सुविधाजनक होने के कारण ज्यादा प्रयोग करने लग गए हैं .केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2014-15 में 51.4 मिलीयन टन ठोस कूड़ा निकला जिसमें से इक्यानबे प्रतिशत इकट्ठा कर लिया गया जिसमें से मात्र सत्ताईस प्रतिशत का निस्तारण किया गया शेष तिहत्तर प्रतिशत कूड़े को डंपिंग साईट्स में दबा दिया गया इस ठोस कूड़े में बड़ी मात्रा पौलीथीन की है जो जमीन के अंदर जमीन की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर उसे प्रदूषित कर रही है .  वेस्ट टू एनर्जी  रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक  शोध के मुताबिक  भारत में अपर्याप्त कूड़ा  प्रबन्धन  बाईस तरह की बीमारियों का वाहक बनता है .कूड़े में  पौलीथीन एक ऐसा ही उत्पाद है जिसका भारत जैसे विकासशील देश में बहुतायत से उपयोग होता है पर जब यह पौलीथीन कूड़े में तब्दील हो जाती है तब इसके निस्तारण की कोई ठोस योजना हमारे पास नहीं है .लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में भारत सरकार  ने बताया देश में पंद्रह हजार टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा होता है जिसमें से छ हजार टन उठाया नहीं जाता है और वह ऐसे ही बिखरा रहता है . भारत सरकार की “स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट” के अनुसार  देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है . इस रिपोर्ट में भारतीय आंकड़ा सर्वेक्षण कार्यालय (एन एस एस ओ ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है .ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं है जिसमें मानव मल भी शामिल है . देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है आंकड़ों के मुताबिक़ देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है.यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है.यह एक गम्भीर समस्या है क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है .प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है जिसका असर देश के मानव संसधान पर भी पड़ता है .गाँवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों ऐसे ही में डाल देते हैं .शहरों की हालत गाँवों से थोड़ी बेहतर है जहाँ 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ़ किये जाते हैं .देश के तैंतालीस प्रतिशत शहरी वार्ड में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने की सुविधा उपलब्ध है . कूड़ा और मल का अगर उचित प्रबंधन नहीं हो रहा है तो भारत कभी स्वच्छ नहीं हो पायेगा .दिल्ली और मुंबई  जैसे भारत के बड़े महानगर वैसे ही जगह की कमी का सामना कर रहे हैं वहां कूड़ा एकत्र करने की कोई उपयुक्त जगह नहीं है ऐसे में कूड़ा किसी एक खाली जगह डाला जाने लगता है वो धीरे –धीरे कूड़े के पहाड़ में तब्दील होने लग जाता है और फिर यही कूड़ा हवा के साथ उड़कर या अन्य कारणों से साफ़ –सफाई को प्रभावित करता है जिससे पहले हुई सफाई का कोई मतलब नहीं रहा जाता .उसी कड़ी में ई कूड़ा भी शामिल है . ई-कचरा या ई वेस्ट एक ऐसा शब्द है जो तरक्की के इस प्रतीक के दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है वह पहलू है पर्यावरण की बर्बादी । भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग ४ लाख टन ई-कचरा उत्पन्न होता है. राज्यसभा सचिवालय द्वारा  'ई-वेस्ट इन इंडिया' के नाम से प्रकाशित एक दस्तावेज के अनुसार भारत में उत्पन्न होने वाले कुल ई-कचरे का लगभग सत्तर प्रतिशत केवल दस  राज्यों और लगभग साठ प्रतिशत कुल पैंसठ शहरों से आता है. दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में ई-कचरे के उत्पादन में मामले में महाराष्ट्र और तमिल नाडु जैसे समृृद्ध राज्य और मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर अव्वल हैं . एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का लगभग ९० प्रतिशत ई-कचरा असंगठित क्षेत्र केअप्रशिक्षित लोगों द्वारा निस्तारित किया जाता है.
आई नेक्स्ट में 22/12 /17 को प्रकाशित 

Tuesday, December 5, 2017

बदलती पहाडी आबो हवा

डूबा हुआ राजमहल 
पिछले  दिनों टिहरी की यात्रा पर था मकसद उस डूबे शहर को देखना  जिसके ऊपर अब भारत का सबसे बड़ा  बाँध बना दिया गया है जहाँ कभी टिहरी शहर था वहां अब बयालीस किलोमीटर के दायरे में फ़ैली झील है जहाँ तरह –तरह के वाटर स्पोर्ट्स की सुविधा भी उपलब्ध है |गर्मियों में जब बाँध का पानी थोडा कम हो जाता है तो दौ साल तक आबाद रहे टिहरी शहर के कुछ हिस्से दिखते हैं |कुछ सूखे हुए पुराने पेड़ और टिहरी के राजमहल के खंडहर|एक पूरा भरा पूरा शहर डूबा दिया गया जो कालखंड के विभिन्न हिस्सों में बसा और फला फूला और उसके लगभग पन्द्रह किलोमीटर आगे फिर पहाड़ काटे गए एक नया शहर बसाने के लिए जिसे अब नयी टिहरी के नाम से जाना जाता है और जानते हैं ये सब क्यों किया गया विकास के नाम पर ,बिजली के लिए हमें बांधों की जरुरत है |वैसे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून जो टिहरी से लगभग एक सौ बीस  किलोमीटर दूर है वहां अभी भी बिजली जाती है जबकी टिहरी बाँध को चालू हुए दस साल हो गए हैं |आखिर कितने विकास की हमें जरुरत है और इस विकास की होड़ कहाँ जाकर रुकेगी |
जलते पहाड़ 
बिजली की रौशनी में दमकता नया  टिहरी

मुझे बताया गया कि टिहरी में बनने वाली बिजली का बड़ा  हिस्सा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को जाता है जहाँ ऐसी बहुमंजिला इमारतें हैं जहाँ दिन में रौशनी के लिए भी बिजली की जरुरत पड़ती है |असल में यही विकास है पहले जंगल काटो फिर वहां एक इमारत बनाओ जहाँ दिन में रौशनी के लिए बिजली चाहिए |कमरे हवादार मत बनाओ और उसको आरामदेह बनाने के लिए एसी लगाओ और इस सारी प्रक्रिया को हमने विकास का नाम दिया है |खैर टिहरी के आधे डूबे हुए राजमहल को देखते हुए मेरे मन में यही सब सवाल उठ रहे थे क्योंकि जल जंगल जमीन की बात करने वाले विकास विरोधी समझे जाते हैं |मैं टिहरी उत्तर भारत की चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए आया था पर मेरे गेस्ट हाउस में एसी लगा हुआ मैं रात में प्राक्रतिक हवा की चाह में भ्रमण पर निकल पड़ा रात के स्याह अँधेरे में दूर पहाड़ों पर आग की लपटें दिख रही थीं |जंगलों में आग लगी है साहब जी मेरी तन्द्रा को तोडती हुई आवाज गेस्ट  हाउस के चौकीदार की थी | कैसे ? अब गर्मी ज्यादा पड़ने लग गयी है बारिश देर से होती है इसलिए सूखे पेड़ हवा की रगड़ से खुद जल पड़ते हैं वैसे कभी –कभी पुरानी घास को हटाने के लिए लोग खुद भी आग लगा देते हैं और हवा से आग बेकाबू हो जाती है तो पहाड़ जल उठते हैं |मेरी एक तरफ जंगलों में लगी आग थी जिससे पहाड़ चमक रहे थे और दूसरी तरफ टिहरी बाँध की बिजली  से जगमगाता नया टिहरी शहर विकास की आग में दमक रहा था मैं अपने कमरे में थोड़ी ठण्ड की चाह में लौट रहा था जहाँ एसी लगा था | 
प्रभात खबर में 05/12/2017 को प्रकाशित 

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