Friday, August 21, 2026

एप की 'ब्लू टिक ' वाली डिजिटल बेगार


भ्यता का विकास कितना अजीब है! जिस डाकिए की चिट्ठी का इंतज़ार कभी महबूब के खत की तरह होता था, वह पहले ईमेल के 'इनबॉक्स' में तब्दील हुआ और अब सिमटकर हमारी पैंट की दाईं जेब में धड़कने वाले एक हरे रंग के ऐप—'व्हाट्सऐप' में कैद हो चुका है ।

मूल विचार कितना मासूम था! जब यह चैट ऐप आया था, तो मकसद था दोस्तों को 'Hi' भेजना, परिवार के ग्रुप में सुबह-सुबह 'गुड मॉर्निंग' के साथ उगते हुए सूरज और गेंदे के फूलों की फोटो सरकाना या फिर छुट्टियों की तस्वीरें साझा करना । औपचारिक संवाद के लिए तो हमारी सभ्यता ने बड़ी नफ़ासत से 'ईमेल' की खोज की थी—जहाँ एक लिखित रिकॉर्ड रहता था, भाषा में एक औपचारिक शराफ़त होती थी और सबसे बढ़कर, दफ़्तर से बाहर निकलते ही लैपटॉप बंद करने के साथ काम का अंत हो जाता था ।
लेकिन भारत जैसे अति-उत्साही देश में हमने तकनीक को सिर्फ अपनाया नहीं, उसका 'रायता' फैला दिया है । आज स्थिति यह है कि ईमेल को ठंडे बस्ते में डालकर दफ़्तर का पूरा कार्यभार व्हाट्सऐप ग्रुप्स के हवाले कर दिया गया है । अब दफ़्तर आठ घंटे की कोई जगह नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली एक 'डिजिटल चौपाल' है ।
पश्चिमी देशों में श्रम कानूनों और सामाजिक मर्यादा की एक स्पष्ट सीमा रेखा है । वहाँ शाम ६ बजे के बाद बॉस अगर कर्मचारी को ईमेल भी भेजे, तो वह उम्मीद नहीं करता कि उसका जवाब तुरंत मिले । सप्ताहांत  पर काम का मैसेज भेजना लगभग एक सामाजिक अपराध माना जाता है । लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ रविवार की रात ९ बजे व्हाट्सऐप ग्रुप पर एक बजता हुआ नोटिफिकेशन  किसी तुग़लकी फ़रमान से कम नहीं होता ।
यहाँ कर्मचारी के सामने दो ही रास्ते छोड़े गए हैं: या तो आप लगातार 'मोबाईल-ऑन' मोड में रहें, अपनी चाय की चुस्की, परिवार के साथ बिताए पल और निजी जीवन को भूल जाएँ; या फिर संदेश न देखने/जवाब न देने पर अगले दिन दफ़्तर में 'गैर-जिम्मेदार' होने का उलाहना और बॉस की त्योरियां झेलें। यह एक ऐसी 'डिजिटल बेगार' है, जिसकी कोई ओवरटाइम फीस नहीं मिलती ।
'ब्लू टिक' का यह डर मानसिक सेहत को किस कदर दीमक की तरह चाट रहा है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंसान अब वॉशरूम जाते हुए भी फोन साथ ले जाता है—इस डर से कि कहीं कोई 'अति-महत्वपूर्ण' मैसेज छूट न जाए! हमने सहज अनौपचारिक संवाद के लिए बने एक साधन को एक ऐसे औजार में बदल दिया है जो हमारी निजता (Privacy) पर हर पल हमला कर रहा है ।
व्हाट्सऐप ने हमें गति तो दी है, लेकिन हमारा 'ठहराव' छीन लिया है । शायद समय आ गया है कि हम दफ़्तरी संस्कृति में इस 'व्हाट्सऐप अतिक्रमण' पर लगाम लगाएँ और ईमेल की उस सुसज्जित, अनुशासित दुनिया की तरफ लौटें, जहाँ काम और निजी ज़िंदगी के बीच एक सम्मानजनक दूरी हुआ करती थी । 

प्रभात खबर में21/08 /2026 को प्रकाशित लेख 

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