Tuesday, July 13, 2021

सौगत और मैं राजौरी यात्रा प्रथम भाग(यात्रा संस्मरण )


यात्राएं मुझे हमेशा सुकून देती हैं एक ऐसी ही  यात्रा पिछले दिनों हुई मैं बड़ा पेशोपेश में हूँ पहले उस व्यक्ति के बारे में बताऊँ जिसके लिए यात्रा की गयी या जगह के बारे में जहाँ यात्रा की गयी |मैं कोशिश करता हूँ कि आपको बारी बारी से दोनों का वर्णन मिलता रहे तो जम्मू कश्मीर के बारे में सबने सुना होगा खासकर  अपने नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण और  लंबे समय  तक आतंकवाद से पीड़ित राज्य के रूप में |जब जम्मू कश्मीर घूमने की बात  होती है तो दो चार जगह ही ध्यान में आती है एक वैष्णोदेवी और दूसरा श्रीनगर के आस पास का इलाका, एक आम मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तानी होने के नाते मुझे भी कश्मीर के पर्यटक स्थलों के बारे में उतनी जानकारी नहीं थी| मैं दो बार जम्मू गया जा चुका था लेकिन वो बहुत साल पहले की बात है पर उसके आगे ना कभी सोचा और ना कभी मौका लगा पर पिछले पांच सालों से मैं लगातार वहां जाने के बारे में सोच रहा था पर मौका हाथ नहीं लग रहा था वहाँ जाने का कारण बहुत सीधा था अपने एक पुराने मित्र से मिलना जिससे एक दर्द का रिश्ता था सौगत नाम है उसका मैंने कभी उसके ऊपर एक पैरोडी भी बनाई थी हम होंगे कामयाब की तर्ज पर सौगत है बिस्वास पूरा है बिस्वास हा हा तो सौगत बिस्वास उनका पूरा नाम है| तो जम्मू कश्मीर जाने का प्रयोजन यूँ हुआ कि सौगत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (आई .ए. एस )हैं और जब से वे जम्मू कश्मीर पहुंचे तब से ना जाने कितनी बार आने को कह चुके थे वैसे भी सौगत से आख़िरी मुलाक़ात को लगभग पांच साल बीत चुके थे |
सौगत और मैं साल 2006 फरवरी 
  इस यात्रा पर निकालने से पहले मैं आप सबको अपनी और सौगत की कहानी बताना चाहता हूँ क्यूँ सौगत खास रहा मेरे लिए कुछ चीजें तो सौगत खुद नहीं जानता जो पहली बार इस ब्लॉग को पढ़ कर जानेगा तो पहले सौगत पुराण ,सौगत बिस्वास से मेरी मुलाक़ात 23 दिसंबर 1999 को पहली बार जौनपुर में हुई| मैं अपनी पहली नौकरी में नया नया था जाड़े के दिन एक लंबा लड़का हमारे विभाग के कमरे मे दाखिल हुआ और बोला  मैं यहाँ अपनी ज्वाईनिंग  देने आया हूँ चूँकि हमारा और सौगत का चयन एक साथ पूर्वांचल विश्वविद्यालय में हुआ था और मैं पहले कार्यभार ग्रहण कर चुका था तो मुझे सारी प्रक्रिया की जानकारी थी| मैंने उसकी मदद की और दिन भर साथ रहे अगले दिन से विश्वविद्यालय में जाड़े की छुट्टी हो जाने वाली थी और सौगत के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था मैं विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में रह रहा था तो सौगत ने मुझे एक अनोखा ऑफर दिया कि  उस  रात मैं उसके साथ उस होटल में रुक जाऊं अगले दिन मुझे लखनऊ और उसे दिल्ली लौटना था| मैं थोडा हिचक रहा था अभी उसको जाने हुए मुझे ६ घंटे भी नहीं हुये और वो इतना बेतकल्लुफ हो रहा था वो मेरी हिचक को समझ गया पर जो जवाब उसने दिया वो अप्रत्याशित था ओए मैं दूसरे टाईप का आदमी नहीं हूँ तू रुक सकता है मेरे साथ हा हा खैर उस रात ना तो मुझे नींद पडी और ना ही सौगत सोया|दो कारण  एक तो वो जौनपुर का काफी घटिया होटल था  दूसरा हम दोनों उस शहर के लिए नए थे तो क्या सारी रात हम बातें करते रहें जामिया एम् सी आर सी का पढ़ा सौगत मुझे एक नयी दुनिया का लग रहा था विषय पर उसका अद्भुत ज्ञान था उस पर दिल्ली का एक्सपोजर अद्भुत कॉकटेल उस दिन से जो साथ शुरू हुआ वो आज तक जारी है| हम् नौकरियां भले ही बदल रहे थे पर एक दूसरे से संपर्क हमेशा बना रहा उसी रात उसने अपने एक सपने को मुझसे हल्का सा बांटा था कि वो आई ए एस बनना चाहता है और इसलिए वो दिल्ली को छोड़कर जौनपुर जैसी छोटी जगह नौकरी करने को तैयार हो गया|मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि मानसिक रूप से मैं अभी भी सौगत के सामने कॉलेज का बच्चा ही था जिसे बाहर की दुनिया और उसकी मक्कारी के बारे में ज्यादा पता नहीं था, वहीं सौगत संतुलित था उसके दिल में क्या चल रहा है कोई नहीं जान सकता और मैं क्या करूँगा सारा विश्वविद्यालय जानता था ऐसे शुरू हुआ नयी नौकरी का सफर बहुत से लोग वहाँ मिले सब ही नए थे पर जो मानसिक मेल सौगत और पंकज के साथ हुआ वो किसी और के साथ ना हो पाया (पंकज की कहानी फिर कभी ) और ये बात सारा विश्वविद्यालय जान गया कि मुकुल इन दोनों से आगे नहीं देखता |ये अलग बात है कि सौगत ने संतुलन बनाये रखा और  अपने आप को बाहर ऐसी किसी छवि में नहीं बाँधा शाम को अक्सर होने वाली परिचर्चा में सौगत और पंकज मुझे अक्सर ये समझाया करते थे कि सबसे मिला करो पर जब तक मैं जौनपुर में रहा ऐसा कर नहीं पाया जिसका साथ नहीं पसंद है उनके साथ मैं औपचारिक संबंध भी ठीक से नहीं निभा पाया पर जिंदगी जैसे जैसे आगे बढ़ी प्रोफेशनलिज्म के नाम पर ये मक्कारी मैं भी सीख गया और चेहरे पर मुखौटा डालना आ गया |

छुट्टियों के बाद सौगत ने मेरे बगल के मकान में कमरा ले लिया और हम साथ साथ विश्वविद्यालय आने जाने लग गए सौगत ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढ़ाई के निकलना चाहता था इसलिए दो साल बाद विश्वविद्यालय रहने चला गया क्योंकि आने जाने में बहुत समय लगता था पर इससे  हमारी जुगलबंदी में कोई कमी नहीं आई |पूर्वांचल का पत्रकारिता विभाग गुलजार रहने लगा हम अक्सर कुछ ना कुछ खुरापात किया करते थे वो कैमरा सम्हालता और मै कलम| सौगत के आई ए एस बन जाने से भले ही देश को योग्य अधिकारी मिल गया पर पत्रकारिता शिक्षा के लिए एक बड़ा नुक्सान हुआ अगर सौगत आज यहाँ होता तो व्यवहारिक पत्रकारिता शिक्षण का स्तर और बेहतर होता खैर क्या लिखूं क्या ना लिखूं समझ नहीं पा रहा हूँ कितनी शामें हमने साथ गुजारीं क्या बहसे हुआ करती थी |मैं एक श्रोता की हैसियत से काफी कुछ सीख रहा था| कितनी वाराणसी की यात्राएं हमने साथ की और उन यात्राओं में होने वाला
फन आज भी रोमांचित करता (जौनपुर में मनबहलाव की कोई जगह नहीं थी तो अक्सर हम वाराणसी का रुख करते थे )|एक शिक्षक के रूप में मैंने सौगत से बहुत कुछ सीखा तो दिन बीतते रहे जब तक मेरे पास स्कूटर नहीं था कई दिन हम बस और जीप में लटक कर विश्वविद्यालय पहुँचते थे फिर गाड़ी आ गयी पर कुछ चीजें मुझे सौगत की नहीं समझ नहीं आती थी वो हिसाब किताब बहुत किया करता था जिसमे मैं पहले भी कच्चा था और आज भी हूँ पर अंत में होता वही था जो वह चाहता वो मेरे स्कूटर से विश्वविद्यालय जाता था तो आने जाने के पैसे देता था फिर एक नया फोर्मूला निकाला कि एक दिन मेरी स्कूटर जायेगी और एक दिन उसकी मोटर सायकिल, दिन भर के खाने का हिसाब किताब लगा कर मुझे खास सौगतियन स्टाईल में बताया यार देख मैं दिन भर के तीस रुपैये से ज्यादा खाने पर नहीं खर्च कर सकता बसऔर ये अभिनव प्रयोग विभाग में भी  हो रहे थे एक दिन निर्णय लिया गया कि नुक्कड़ नाटक होगा अब छात्रों के लिए ये समस्या का विषय हो गया लोगों को ज्यादा इसके बारे में पता नहीं था पर चार दिन में प्ले बनकर तैयार हो गया और लोगों की पर्याप्त सराहना भी मिली | बहुत सारे खट्टे मीठे अनुभव होते रहे सौगत मोमबत्ती जलाये डटे रहते और अपने बिंदास स्वभाव के कारण चर्चा का केंद्र रहते हम एक शादी में बनारस गए और भाई साहब ने जींस कुर्ते के ऊपर कोट पहन लिया और पहुँच गए कोई अगर कुछ कहता भी तो जवाब तैयार क्या हुआ |बहुत सारे उतार चढावों के बीच सौगत ने सितम्बर 2003 में जौनपुर छोड़ दिया उसका चयन निफ्ट दिल्ली में हो गया था जौनपुर मुझे कभी रास आया नहीं था पर विभाग में उसके साथ से ऊर्जा मिलती थी पर अब वो जा रहा था खैर उसके परिवार को विदा करने के बाद सौगत को रोक लिया गया कि एक रात हम फिर से पार्टी करेंगे पुराने दिन ताजा करेंगे हालंकि तब तक हमारे दल में  इसमें अविनाश और ब्रजेश दो और लोग जुड चुके थे | साल बीतते गए इस बीच वो निफ्ट से निकल कर जामिया एम् सी आर सी में लेक्चरर बन गया और मैं जौनपुर से लखनऊ आ गया फोन पर बात भी अक्सर नहीं होती हाँ पर जब मैं दिल्ली जाता  तो जम के धमाल होता था ये बात अलग है कि धमाल मचाने वाले दो ही लोग होते थे और ऐसा मौका उसके जौनपुर छोड़ने के बाद एक ही बार आया जब हम दिल्ली में मिले|
लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी मंसूरी में सौगत के साथ 
2006 में सौगत  लखनऊ में प्रैक्टिकल परीक्षाएं लेने आये थे  जब वो  अपने रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा था गेस्ट हाउस के उस कमरे में हम कितनी देर तक अपनी अपनी जिंदगियों के बारे में बात करते रहे मैं उसके आई ए एस के साक्षात्कार के किस्से सुनता रहा और फिर वो खबर आयी जिसका हम सबको इंतज़ार था एक सपना जिसको सौगत जी रहा था सच हुई उसका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया और वो मंसूरी प्रशिक्षण के लिए चला गया बीच बीच में कभी कभार बात हो जाती हमें मिले हुए एक साल हो चुके थे कि नियति ने फिर हमें मिला दिया हुआ कि जिस दिन सौगत के प्रशिक्षण का अंतिम दिन था मैं देहरादून में था सौगत से बात हुई और उसने हमें मंसूरी के लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी  में बुला लिया और रात ज्यादा हो जाने कारण मुझे भी उस संस्थान में एक रात रुकने का सौभाग्य प्राप्त हुआ अद्भुत अनुभव था |

भारतीय रेल के जून 2021 अंक में प्रकाशित 

Tuesday, July 6, 2021

पॉडकास्ट की बढ़ती लोकप्रियता

 

इंटरनेट पर हमेशा वीडियो और चित्रों का राज रहा है |दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले जहाँ ध्वनिया यानि पॉडकास्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहा था |भारत में वीडियो के प्रति दीवानगी बरकरार रही| कोरोना महामारी और वर्क फ्रॉम होम जैसी न्यू नार्मल चीजों ने  काफी कुछ बदला है ,और इसी दौर में लोगों की इंटरनेट पर पसंद वीडियो के साथ साथ ध्वनियों ने भी जगह बनाई और पॉडकास्ट की लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हुई | ऑडियो ओ टी टी रिपोर्ट कंटार और वी टी आई ओ एन के अनुसार संगीत  और पॉडकास्ट स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म जैसे स्पोटीफाई,गाना जियो सावन में मार्च 2020 में समय बिताने की संख्या में बयालीस प्रतिशत का इजाफा हुआ |ग्लोबल इंटरटेनमेंट एंड मीडिया आउटलुक रिपोर्ट(Global Entertainment & Media Outlook 2019–2023) के अनुसार साल 2018 के अंत में भारत में मासिक रूप से पॉडकास्ट सुनने वाले लोगों की संख्या चार करोड़ रही| यह संख्या साल 2017 के आंकड़ों से 57.6 प्रतिशत ज्यादा रही | मासिक श्रोताओं की संख्या से आशय  ऐसे श्रोताओं से है जो महीने में कम से कम एक पॉडकास्ट जरुर सुनते हैं| रिपोर्ट के पूर्वानुमान के मुताबिक़ यह आंकड़े साल 2023 तक 34.5प्रतिशत की दर के साथ बढ़कर 17.61करोड़ हो जाने की उम्मीद है |इन आंकड़ों के साथ भारत पॉडकास्ट की दुनिया का चीन, अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरे नम्बर का सबसे बड़ा बाजार बन गया |इसी रिपोर्ट के अनुसार देश में संगीत ,रेडियो और पॉडकास्ट का बाजार साल 2014 में 3890 करोड़ रुपये का था जो साल 2018 में बढ़कर 5573 करोड़ रूपये का हो गया |
भारत के विविधता वाले बाजार में पॉडकास्ट एक शहरी प्रवृत्ति बन कर रह गया था और इसके बाजार में जितनी तेजी से वृद्धि होनी चाहिए उसका बड़ा कारण इन आडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफोर्म में इंटरैक्टिवटी का ख़ासा अभाव था |इंटरनेट की तेज दुनिया में अब कोई इन्तजार नहीं करना चाहता और इसीलिये पॉडकास्ट को वो लोकप्रियता नहीं मिल रही थी जितनी सोशल मीडिया साईट्स को मिली |जबकि ध्वनियों का मामला इंटरनेट के एक आम उपभोक्ता के लिए वीडियो के मुकाबले ज्यादा सरल है और इसमें डाटा भी कम खर्च होता है | भारत जैसे देशों में, जहां इंटरनेट की स्पीड काफी कम होती है, वीडियो के मुकाबले पॉडकास्टिंग ज्यादा कामयाब हो सकती है। भारतजैसे भाषाई विविधता वाले देश में जहाँ निरक्षरता अभी भी मौजूद है | पॉडकास्ट लोगों तक उनकी ही भाषा में संचार करने का एक सस्ता और आसान विकल्प हो सकता है |प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात कार्यक्रम का पॉडकास्ट काफी लोकप्रिय है |
 पॉडकास्ट की सबसे बड़ी खूबी है इसकी ग्लोबल रीच यानि अगर आप कुछ ऐसा सुना रहे हैं जो लोग सुनने चाहते हैं तो किसी चैनल के लोकप्रिय होते देर नहीं लगेगी | भारत हमेशा श्रोत परम्परा वाला देश रहा है जहाँ हमारे सामाजिक जीवन में कहानियां बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है   कोरोना महामारी से उपजी पीड़ा और चिंताओं ने लोगों को कहानियाँ कहने और सुनने दोनों के लिए प्रेरित किया |उधर लोग सोशल मीडिया पर लोग अपनी राय व्यक्त करने के लिए लिखने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते है तो इसका विकल्प ध्वनियाँ ही ही हो सकती हैं |फेसबुक (लाईव ऑडियो रूम )और ट्विटर (स्पेक्स) आवाज की दुनिया में पहले ही कदम रख चुके हैं | इसी कड़ी में 2021  मई  में देश में लॉन्च होते ही  क्लबहाउस लोगों की चर्चा का केंद्र बन गया |क्लब हाउस  ध्वनि  आधारित एक सोशल नेटवर्किंग साइट है| जो लोगों को ‘किसी भी चीज’ और ‘हर चीज के बारे में’ बात करने की सुविधा  देता है। लांच होने के बाद ही ये तेजी से लोकप्रिय हो रहा है|आधिकारिक तौर पर भारत में इसके कितने उपभोक्ता है इसका आंकड़ा जारी नहीं किया गया है |

इसकी लोकप्रियता से उत्साहित होकर आडियो स्ट्रीमिंग में उपभोक्ताओं की पहले ही पसंद बन चुकी कम्पनी स्पोटीफाई ने क्लब हाउस को टक्कर देने के लिए इसी माह आवाज पर आधारित एक सोशल नेटवर्किंग एप ग्रीन रूम लांच कर दिया है माना जा रहा है कि लाईव आडियो मार्केट में एक कदम आगे निकले हुए ग्रीन रूम कलाकारों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करेगा और इसके लिए कम्पनी जल्दी ही एक क्रियेटर फंड बनाने जा रही है जिससे ऑडियो  क्रियेटर को यू ट्यूब की तर्ज पर अपने लोकप्रिय काम के पैसे भी मिलेंगे |

रेड्शीर कंसलटिंग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में पांच प्रमुख म्यूजिक स्ट्रीमिंग एप के कुल उपभोक्ता आधार का मात्र एक प्रतिशत ही सशुल्क उपभोक्ता हैं जो कुल राजस्व का चालीस प्रतिशत योगदान दे रहे हैं |रिपोर्ट के मुताबिक़ इन कम्पनियों को अपने उपभोक्ता आधार में कम से कम छ प्रतिशत को सशुल्क उपभोक्ता बनाना पडेगा तभी ये मुनाफा कमा  पाएंगी|पॉडकास्ट में विज्ञापनों से आय दूसरा साधन है|साल 2014 में में पॉडकास्ट विज्ञापनों से 0.5 मिलीयन डॉलर का विज्ञापन राजस्व आया था जो साल 2018 में बढ़कर 7.2 मिलीयन डॉलर हो गया|प्राईस वाटर कूपर्स के एक आंकलन के मुताबिक़ यह राजस्व 58.9प्रतिशत की दर से बढ़कर साल 2023 में 58.9 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़कर 72.9 मिलीयन डॉलर हो जाएगा |देश में ध्वनि आधारित इस तरह के सेवाओं की कोई परम्परा नहीं ऐसे में इस तरह के एप पर क्या बोलें और क्या न बोलें जैसी समस्या से लोगों को दो चार होना पड़ेगा|इंटरनेट पर हुई वीडियो क्रांति के अनुभव बताते हैं कि वीडियो कंटेंट में बहुत अश्लीलता, फूहड़ मजाक और फेक न्यूज की बाढ़ भी आ गयी है |

चूँकि इंटरनेट पर किसी तरह का कोइ सेंसर नहीं है ऐसे में बच्चों को अवांछित ऑडियो  कंटेंट से कैसे बचाया जाएगा |उपभोक्ताओं द्वारा बोले गए शब्द कंटेंट का क्या होगा उसकी निजता की रक्षा कैसे की जायेगी | इसके अलावा, नफरत फैलाने वाले भाषण जैसे दुरुपयोग की निगरानी के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल की कमी के कारण इस तरह के एप कैसे अपने उपभोक्ताओं को इंटरनेट पर ध्वनि की दुनिया में  सुरक्षित अनुभव दे पायेंगे इसका फैसला अभी होना है |


दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में 06/7/2021 को प्रकाशित 

Wednesday, June 23, 2021

कोरोना ने दिखाई टेली मेडिसिन की राह

 


कोरोना जैसी अति संक्रामक बीमारियों ने यह चेता दिया कि अगर रोग की प्रकृति बदल रही है तो इलाज के तरीके भी बदलने होंगे| मरीज़ों और डॉक्टरों दोनों के लिए आमने-सामने बैठ कर इलाज करना और करवाना दोनों जोखिम भरा काम हो गया है| देश की स्वास्थ्य सेवाओं का  आधारभूत ढांचा खुद रोगग्रस्त है|ऐसे में ऐसे लोग जो उच्च रक्तचाप,डायबिटीज, ह्रदय रोग या अन्य सामान्य  जीवन शैली आधारित  बीमारियों से ग्रसित है| जिसमें चिकित्सकों से नियमित जांच की जरुरत होती है|उन लोगों के स्वास्थ्य पर भी  भारी संकट आ गया है |वहीं कोरोना के हलके लक्षणों वाले रोगी भी अस्पताल जाने की बजाय घर में ही आइसोलेट रहकर कोरोना से लड़ रहे हैं |
ऐसे तमाम रोगियों के लिए इंटरनेट एक आशा की बड़ी किरण के रूप में उभरा |मार्केट इंटेलिजेंस फर्म कलगाटो के एक विश्लेषण  में यह तथ्य सामने आया कि  अप्रैल 2021 में ओनलाईन फार्मेसी कम्पनी फ़ार्म इजी और नेटमेड्स के डेली एक्टिव यूजर्स की संख्या में दो गुनी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गयी वहीं ओनलाईन डॉक्टरों के वीडिओ परामर्श दिलाने वाली साईट प्रैक्टो के उपभोक्ताओं की संख्या में तीन गुना से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गयी |भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ऐसे स्वास्थ्य एप /वेबसाईट का न केवल प्रयोग कर रहे हैं बल्कि वहां ज्यादा समय भी बिता रहे हैं |उदाहरण के लिए प्रैक्टो और ओनलाईन दवा की रिटेल चेन मेडप्लस में यह समय अप्रैल में दो सौ प्रतिशत बढ़ गया | दुनिया में दूसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स भारत में है जिसमें बड़ी भूमिका स्मार्टफोन धारकों की है | सरकार की टेलीमेडिसिन प्रेक्टीस गाईड लाईन्स  देश के सुदूर इलाकों में चिकित्सकों को इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएँ देने को विधिक स्वरुप प्रदान करती है जिसे साल 2020 में बीस मार्च को जारी किया गया है |चिकित्सा का यह तरीका न केवल संकट के इस समय बल्कि भविष्य में भी लोगों को फायदा पहुंचाएगा | टेलीमेडिसिन प्रेक्टीस गाइड लाईन्स  को मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इण्डिया और नीति आयोग के द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है |  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने टेलीमेडिसिन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच उन लोगों तक जहाँ दूरी एक महत्वपूर्ण कारक है वहां रोगों और चोटों में अनुसंधान, मूल्यांकन और स्वास्थ्य सेवा की सतत शिक्षा के लिए निदान,उपचार और उनके रोकथाम के लिए वैध जानकारी के आदान प्रदान में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग स्वास्थ्य पेशेवरों  द्वारा किया जाना है |शाब्दिक रूप से टेलीमेडिसिन का तात्पर्य इंटरनेट के माध्यम से  दूरी से किया गया उपचार है |डॉक्सऐप, एमफाइन और प्रेक्टो जैसे इंटरनेट  प्लेटफॉर्म मरीजों को डॉक्टरों से जुड़ने और आभासी परामर्श को शेड्यूल करने में सहायता प्रदान कर रहे हैं |हालाँकि अभी यह प्रयोग बहुत ही सीमित मात्रा में है क्योंकि इसमें सबसे बड़ी बाधा रोगी की उस मानसिकता में जिसमें वह डॉक्टरों से आमने सामने मिल कर ही अपने रोग का निदान चाहता है |ये सोच  अस्पतालों में अनावश्यक भीड़ बढाती है |

इस गाईड लाईन्स के अनुसार अब डॉक्टर रोगियों को वीडियो, ऑडियो, ईमेल द्वारा परामर्श प्रदान कर सकते हैं | यह गाईड लाईन्स उन दवाओं को भी श्रेणी बद्ध करती है जिन्हें टेलीमेडिसिन द्वारा रोगियों को नियत किया जा सकता है |जैसे पैरासिटामोल और इसके जैसी हल्की दवाएं किसी भी परामर्श द्वारा रोगी को दी जा सकती हैं, लेकिन उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे रोगों की दवाएं निरन्तरता परामर्श में ही रोगी को टेलीमेडिसिन द्वारा दी जा सकती हैं जिसमें अनिवार्य रूप से सबसे पहला परामर्श रोगी  और डॉक्टर का आमने सामने का होगा |गंभीर रोगों के विषय में डॉक्टर टेलीमेडिसिन के इस्तेमाल से दवाएं नहीं निर्धारित करेंगे |इस बात का निर्धारण कि रोगी का  दूर से इलाज (टेलीमेडिसिन) किया  जाए या नहीं डॉक्टर के अपने पेशेवर निर्णय के अधीन होगा | आगे जाकर, डॉक्टरों को दूरस्थ परामर्श प्रदान करने के लिए एमसीआई  के बोर्ड द्वारा प्रशासित एक ऑनलाइन कोर्स पूरा करना होगा।चूँकि ऑनलाईन कोर्स के विकसित होने में अभी समय लगेगा तब तक डॉक्टर अंतरिम रूप से सरकार द्वारा निर्धारित गाईडलाईन्स के अनुसार मरीज देख सकते हैं |

टेलीमेडिसिन का यह प्रारूप भविष्य में  ई-स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक रूप देने में मदद करेगा | इसमें न केवल दूरस्थ परामर्श को लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी | बल्कि यह ऐसे समाधान भी निकालेगा  जो रोगियों, डॉक्टरों, डायग्नोस्टिक क्लीनिकों और फार्मेसियों को आपस में जोड़ देंगे।जिसका फायदा निश्चित रूप से रोगी को जल्दी स्वस्थ होने में मिलेगा | टेलीमेडिसिन भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद लाभकारी  हो सकता है जहां डॉक्टरों की भारी कमी है । स्टेटिस्टा साईट  के एक शोध के अनुसार देश में टेलिमेडिसिन के बाजार का आकार   तीस  प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से साल 2020 से  2025  के बीच बढेगा|  भारत जैसे गरीब देशों में मेडिकल सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने में टेलिमेडिसिन अहम टूल साबित हो सकता है | टेलिमेडिसिन को सभी जगहों तक पहुंचाने के लिए हेल्थ रिकॉर्ड को डिजिटाइज करना पहला अहम कदम है दुनिया के एक कोने में बैठा विशेषज्ञ और रोगी  दुनिया के दूसरे कोने में बैठे विशेषज्ञ की राय ले सकता है |पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि देश में अभी भी करोडो लोग इंटरनेट की पहुँच से दूर हैं |इस तरह की सेवाओं के लिए अंग्रेजी का कार्यकारी ज्ञान होना भी जरुरी है |भारत के नए इनत्नेट उपभोक्ताओं में नब्बे प्रतिशत भारतीय भाषाओं के बोलने वाले हैं |हालांकि प्रैक्टो ने भारत की पन्द्रह क्षेत्रीय भाषाओँ में अपनी सेवा शुरू की है|बोस्टन के चिकित्सक डोली अर्जुन ने ने टेलीहेल्थ नामक सेवा दलितों और जनजातियों के लिए शुरू की है जिसमें स्थानीय भाषा अनुवादकों के साथ जुड़कर रोगियों का इलाज किया जा रहा है |बिग ओ हेल्थ एप हिन्दी भाषियों के लिए डाक्टरी परामर्श उपलब्ध करा रहा है |

देश में टेलीमेडिसिन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लोग स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक का इस्तेमाल कितनी जल्दी अपने व्यवहार में शामिल कर लेंगे |

अमर उजाला में 23/06/2021 को प्रकाशित 

Saturday, June 19, 2021

तलाशने होंगे उपाय

 

   कोरोना जैसी महामारी ने देश को स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता की अहमियत सबको करा दिया है |देश अभी दूसरी लहर की पीड़ा से उबरने की कोशिश करता हुआ दुबारा खड़े होने की कोशिश कर  रहा है |विशेषज्ञ मानते हैं कि कोरोना महामारी की तीसरी लहर  सितम्बर तक आ सकती है जिसका शिकार बच्चे ज्यादा होंगे |ऐसी ख़बरों के बीच महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सूचना के अधिकार  में पूछे गए सवाल के जवाब में बताया कि पिछले साल नवंबर तक देश में छह महीने से छह साल तक के करीब 9,27,606 गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की गई। मंत्रालय की ओर से जारी  किए गए आंकड़ों के मुताबिक इनमें से, सबसे ज्यादा 3,98,359 बच्चों की उत्तर प्रदेश में और 2,79,427 की बिहार में पहचान की गई।

 वहीं लद्दाख, लक्षद्वीप, नगालैंड, मणिपुर और मध्य प्रदेश में एक भी गंभीर रूप से कुपोषित बच्चा नहीं मिला है|यानि उत्तर प्रदेश और बिहार में देश के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे रह रहे हैं |कुपोषण सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है अगर समय रहते इसका निदान न किया जाए तो यह आर्थिक और सामाजिक समस्या बन कर सामने आती है |विश्व स्वास्थ्य संगठन  गंभीर कुपोषण को लंबाई के अनुपात में बहुत कम वजन हो या बांह के मध्य के ऊपरी हिस्से की परिधि 115 मिली मीटर से कम हो या पोषक तत्वों की कमी के कारण होने वाली सूजन के माध्यम से परिभाषित करता है।गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों का वजन उनकी लंबाई के हिसाब से बहुत कम होता है और प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होने की वजह से किसी भी  बीमारी से उनके मरने की आशंका किसी सामान्य स्वस्थ बच्चे के मुकाबले  नौ गुना ज्यादा होती है।इसके अलावा वर्ष 2019 में ‘द लैंसेट’ नामक पत्रिका द्वारा जारी रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 1.04 मिलियन मौंतों में से तकरीबन दो-तिहाई की मृत्यु का कारण कुपोषण है। देश में फैले कुपोषण को लेकर ये  आँकड़े काफी चिंताजनक हैं। बच्चों  को लंबे समय तक संतुलित आहार न मिलने से उनकी  रोग प्रतिरोधक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण वह आसानी से किसी भी बीमारी का शिकार हो सकते है|

 कुपोषण के ख़िलाफ़ काम करने वाली सरकारी यहाँ तक की अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे संयुक्त राष्ट्र का ध्यान माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पर है, ये संस्थाएं इस बात पर जोर देती हैं कि आयोडीन, आयरन या विटामिन ए का ड्रॉप पिलाएं| ऐसे में उनका ध्यान माइक्रोन्युट्रिएंट्स पर है| लेकिन ये समस्या इससे आगे की है आयरन की गोलियों से कुपोषण से निजात नहीं मिली मतलब इस समस्या का तकनीकी समाधान नहीं निकल सकता है. इसकी अपनी सीमाएं हैं|ऐसे में ज़रूरी है कि कि इसे खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देखा  जाना चाहिए | खाद्य सुरक्षा और खाने के सामान में विविधता कुपोषण दूर करने के लिए ज़रूरी है| और ये दोनों ही चीजें सीधे तौर पर व्यक्ति की आय से जुड़ी होती हैं| और आय नहीं होगी तो पोषण मिलना मुश्किल है|महिला और बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2019 में भारतीय पोषण कृषि कोष की स्थापना की थी। इसका उद्देश्‍य कुपोषण को दूर करने के लिये बहुक्षेत्रीय ढाँचा विकसित करना है जिसके तहत बेहतर पोषक उत्पादों हेतु 128 कृषि जलवायु क्षेत्रों में विविध फसलों के उत्पादन के उत्पादन पर ज़ोर दिया जाएगा। विशेषज्ञ कृषि को कुपोषण से संबंधित समस्याओं को संबोधित करने का अच्छा तरीका मानते हैं। किंतु देश की पोषण आधारित अधिकांश योजनाओं में इस और ध्यान ही नहीं दिया गया है। पोषण आधारित योजनाओं और कृषि के मध्य संबंध स्थापित करना आवश्यक है, क्योंकि देश की अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या आज भी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है और सर्वाधिक कुपोषण ग्रामीण क्षेत्रों में ही देखने को मिलता है। कोविड काल ने इस समस्या को ज्यादा गंभीर बनाया है |पहले से ही गरीब लोगों के रोजगार पर असर पड़ा है और स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ा है ये असंतुलन एक नए दुष्चक्र का निर्माण कर रहा है जिसके केंद्र में बच्चे हैं |एक ओर कोरोना के तीसरी लहर में सबसे ज्यादा उनके चपेट में आने की आशंका, वहीं गरीबी और गिरती आय पहले से ही कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए एक ऐसी खाई का निर्माण कर रही है जिससे निकलना मुश्किल दिख रहा है |प्रख्यात बाल लेखक जैनज़ कोरज़ाक ने कहा  था कि- 'बच्चे और किशोर, मानवता का एक-तिहाई हिस्सा हैं। इंसान अपनी जिंदगी का एक-तिहाई हिस्सा बच्चे के तौर पर जीता है। बच्चे...बड़े होकर इंसान नहीं बनते, वे पहले से ही होते हैं,हमें बच्चों के अंदर के इंसान को जिन्दा रखना होगा |पर क्या देश के सारे सारे बच्चे बड़े हो पायेंगे या उनमें से कई कुपोषण का शिकार हो विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त होकर काल कवलित हो जायेंगे इस मुश्किल सवाल का जवाब समाज और सरकार दोनों को मिलकर ढूँढना होगा |

राष्ट्रीय सहारा में 19/06/2021 को प्रकाशित 

 


Thursday, June 10, 2021

लालच व आशावादी सोच

 



कभी कभी कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं कि हमारे दिमाग में अब तक फीड हुई परिभाषाएं एकदम नए रूप में सामने आ खडी होती हैं .अक्सर अपने बच्चे से मैं उसकी चॉकलेट की जिद या किसी और चीज़ के लिए जिद करते समय  उसे यही समझाता हूँ कि लालच बुरी बात है .एक  चॉकलेट  ही मिलेगी ज्यादा नहीं . मेरा बेटा शायद मेरे कहे को ज्यादा बड़े अर्थों में गुण रहा था .एक दिन उसने कहा पापा ,आप मुझसे ये क्यों कहते हैं कि लालच बुरी बात है .मुझे ज्यादा नंबर लाने का लालच है , तो क्या यह बुरा है ? मुझे स्पोर्ट्स में ट्राफी जीतने का लालच है, तो क्या यह गलत है ? बेटा अपनी बात कह चुका था और मैं उलझन में पड़ गया था .अब कहानी में यही थोडा सा ट्विस्ट है. हमें बचपन से बताया जाता है कि जितनी चादर है उतना ही पैर पसारना चाहिये .
बात थोड़ी पुरानी है एक जंगल में एक आदमी रहता था न पास में कपडा न ही रहने को मकान लेकिन उसके पास एक दिमाग था जो सोचता था समझता था उसने सोचा क्यों न उसके पास रहने को एक ऐसी जगह हो जहाँ उसे बारिश में भीगना न पड़े ठण्ड में ठिठुरना न पड़े और गर्मी भी कम लगे. अब आप सोच रहे होंगे कि ये बात उसके दिमाग में आयी कहाँ से अब जंगल में रह रहा था तो जरुर उसने पक्षियों के घोंसले को देखा होगा. खैर यहीं से मानव सभ्यता  का इतिहास बदल जाता है. इंसान ने अपने लिए पहले घर बनाया और फिर अपनी जरुरत के हिसाब से चीज़ों का आविष्कार होता गया .बैलगाडी से शुरू हुआ सफ़र हवाई जहाज़ तक पहुँच गया . कबूतर से चिठियों को पहुंचाने की शुरुवात हुई और आज ई मेल का जमाना है .बगल की बंटी की दुकान आज शॉपिंग मॉल्स  में तब्दील हो गयी ,घर के धोबी की जगह कब वाशिंग मशीन आ गयी हमें पता ही नहीं चला .लेकिन इन सब परिवर्तन में एक बात कॉमन है. वो है लालच , लालच जीवन को बेहतर बनाने का, लालच जिन्दगी को खूबसूरत बनाने का,लालच खुशियाँ मनाने का ,लालच आने वाले कल को बेहतर बनाने का. आप भी सोच रहे होंगे कि ये कौन सी उल्टी गंगा बहाई जा रही है. लालच अगर अच्छा न होता तो हम ज्यादा का इरादा कैसे कर पाते. अब तो मुझे लगने लगा है कि सारी दुनिया की तरक्की, विज्ञान के नए आविष्कार सब लालच का ही नतीजा हैं. सैचुरेशन पॉइंट से उठाकर आगे ले जाने का काम करता है हमारा लालच .

अब जबकि लालच के इस पक्ष से सामना हुआ है तो मेरे मन में भी न जाने कैसे कैसे लालच पनपने लगे हैं .लालच इस दुनिया को हिंसा से मुक्त करने का शांति की बात को किताबों और भाषणों से निकाल कर सारी दुनिया में गूंजा देने का .आम आदमी को खास आदमी बना देने का लालच .शिक्षा , स्वास्थ्य  रोजगार जैसी बेसिक चीज़ों को हर किसी के लिए उपलब्ध कराने का लालच वह भी बिना किसी ज्यादा मशक्कत के .

मेरे लालच की लिस्ट तो बढ़ती ही जा रही है .यहीं रोकता हूँ इस लिस्ट को . अगर  लालच आशावादी सोच के साथ हो और उससे दुनिया बेहतर होती हो तो लालच बुरा नहीं है .

प्रभात खबर में 10/06/2021 को प्रकाशित 

 

Saturday, June 5, 2021

निजी आंकड़ों को लेकर कितने जागरूक हम ?

 इंटरनेट साईट स्टेटीस्टा के अनुसार देश में साल 2020 में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या सात सौ मिलियन रही जिसकी साल 2025 तक 974मिलीयन हो जाने की उम्मीद है भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाईन बाजार है |यह डाटा आज की सबसे बड़ी पूंजी है यह डाटा का ही कमाल है कि गूगल और फेसबुक जैसी अपेक्षाकृत नई कम्पनियां दुनिया की बड़ी और लाभकारी कम्पनियां बन गयीं है|डाटा ही वह इंधन है जो अनगिनत कम्पनियों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं |वह चाहे तमाम तरह के एप्स हो या विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स सभी  उपभोक्ताओं  के लिए मुफ्त हैं |असल मे जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डाटा के बदले मिल रही है | बिजनेस स्टैण्डर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में भारत में गूगल और फेसबुक ने 1०००० करोड़ रुपये कमाए |वहीँ  इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के हिसाब से 2019 में रिलायंस इंडस्ट्रीज  ने 11,262 करोड़  रुपये कमाए परन्तु जब हम दोनों कम्पनीज से मिले प्रत्यक्ष रोजगार और साथ ही उसके साथ बने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को देखते हैं तो दोनों में जमीन आसमान का अंतर मिलता हैं | जैसे 90 बिलियन डॉलर वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज 194056 लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती है और इससे कहीं ज्यादा लोग वेन्डर कंपनियों के माध्यम से रोजगार पाते हैं।|मजेदार तथ्य यह है कि फेसबुक कोई भी उत्पाद नहीं बनाता है और इसकी आमदनी का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है और आप क्या विज्ञापन देखेंगे इसके लिए आपको जानना जरुरी है |यही से आंकड़े महत्वपूर्ण हो उठते हैं | देश में जिस तेजी से इंटरनेट का विस्तार हुआ उस तेजी से हम अपने निजी आंकडे (फोन ई मेल आदि) के प्रति जागरूक नहीं हुए हैं परिणाम तरह तरह के एप मोबाईल में भरे हुए जिनको इंस्टाल करते वक्त कोई यह नहीं ध्यान देता कि एप को इंस्टाल करते वक्त किन –किन चीजों को एक्सेस देने की जरुरत है |

टेक एआर सी की एक रिपोर्ट के अनुसार एक भारतीय कम से कम चौबीस एप का इस्तेमाल  करता है और यह आंकड़ा वैश्विक औसत से लगभग तीन गुना ज्यादा है | यह तथ्य बताता है कि एक आम भारतीय किसी एप को डाउनलोड करने में कितनी कम सावधानी बरत रहे हैं |सबसे ज्यादा सोशल मीडिया एप का इस्तेमाल किया जाता है और यही से इंसान के डाटा बनने का खेल शुरू हो जाता है यह सोचने में अच्छा है कि हमारे ऑनलाइन प्रोफाइल पर हमारा नियंत्रण है | हम तय करते हैं कि हमें कौन सी तस्वीरें साझा करनी हैं और कौन सी निजी रहनी चाहिये |  पर तथ्य इससे अलग है  कि जब आपके डिजिटल प्रोफाइल की बात आती हैतो आपके द्वारा साझा किया जाने वाला डेटा केवल एक आइसबर्ग का टिप होता है | हम बाकी को नहीं देखते हैं जो मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन सेवाओं के अनुकूल इंटरफेस के पानी के नीचे छिपा हुआ है | हमारे बारे में सबसे मूल्यवान डेटा हमारे नियंत्रण से परे है | यह ऐसी गहरी परतें हैं जिन्हें हम नियंत्रित नहीं कर सकते हैं जो वास्तव में निर्णय लेते हैंवो हम नहीं हैं बल्कि हमारे डाटा को विश्लेषित करने वाला होता है |

पहली परत वह है जिसे आप नियंत्रित करते हैं | इसमें वह डेटा होता है जो आप सोशल मीडिया और मोबाइल एप्लिकेशन में फीड करते हैं | इसमें आपकी प्रोफ़ाइल जानकारीआपके सार्वजनिक पोस्ट और निजी संदेशपसंदखोजअपलोड की गई फ़ोटोआदि चीजें  शामिल हैं |

दूसरी परत व्यवहार संबंधी टिप्पणियों से बनी है | ये इतने विकल्प नहीं हैं जो आप होशपूर्वक बनाते हैंलेकिन मेटाडेटा जो उन विकल्पों को संदर्भ देता है | इसमें ऐसी चीजें शामिल हैं जिन्हें आप शायद हर किसी के साथ साझा नहीं करना चाहते हैंजैसे कि आपका वास्तविक समय स्थान और आपके अंतरंग और पेशेवर संबंधों की विस्तृत समझ | जैसे एक ही घर में अक्सर एक ही कार्यालय की इमारतों या आपके आराम करने के समय  के वक्त आपके मोबाईल की जगह  को दिखाने  करने वाले स्थान पैटर्न को देखकर,  कंपनियां बहुत कुछ बता सकती हैं कि आप किसके साथ अपना समय बिताते हैं। ऑनलाइन और ऑफलाइनआपके द्वारा क्लिक की गई सामग्रीआपके द्वारा इसे पढ़ने में बिताए गए समयखरीदारी पैटर्नकीस्ट्रोक डायनेमिक्सटाइपिंग स्पीडऔर स्क्रीन पर आपकी उंगलियों के मूवमेंट (जो कुछ कंपनियों का मानना है कि भावनाओं और विभिन्न मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को प्रकट करते हैं)|

तीसरी परत पहले और दूसरे की व्याख्याओं से बनी है | आपके डेटा का विश्लेषण विभिन्न एल्गोरिदम द्वारा किया जाता है और सार्थक सांख्यिकीय सहसंबंधों के लिए अन्य उपयोगकर्ताओं के डेटा के साथ तुलना की जाती है | यह परत न केवल हम क्या करते हैं बल्कि हम अपने व्यवहार और मेटाडेटा पर आधारित हैंके बारे में निष्कर्ष निकालते हैं | इस परत को नियंत्रित करना बहुत अधिक कठिन है,  इन प्रोफ़ाइल-मैपिंग एल्गोरिदम का कार्य उन चीजों का अनुमान लगाना हैजिन्हें आप स्वेच्छा से प्रकट करने की संभावना नहीं रखते हैं। इनमें आपकी कमजोरियांसाइकोमेट्रिक प्रोफाइलआईक्यू लेवलपारिवारिक स्थितिव्यसनोंबीमारियोंचाहे हम एक नए रिश्ते में अलग होने या प्रवेश करने वाले होंआपकी छोटी सी टिप्पणियों (जैसे गेमिंग)और आपकी गंभीर प्रतिबद्धताएं (जैसे व्यावसायिक परियोजनाएं) शामिल हैं |

वे व्यवहार संबंधी भविष्यवाणियाँ और व्याख्याएँ विज्ञापनदाता के लिए बहुत मूल्यवान हैं | चूंकि विज्ञापन का मतलब जरूरतों को बनाना है और आपको ऐसे निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना है जिन्हें आपने (अभी तक) नहीं किया है,  चूंकि कम्पनियां जानती  हैं कि आप उन्हें सीधे कुछ नहीं बताएंगे कि यह कैसे करना है|  बैंकोंबीमा कंपनियोंऔर सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा किए गए बाध्यकारी निर्णय बिग डेटा और एल्गोरिदम द्वारा किए जाते हैंन कि लोगों द्वारायह मनुष्यों से बात करने के बजाय डेटा को देखते है जो  बहुत समय और पैसा बचाता है |इसलिएविज्ञापन उद्योग में एक साझा विश्वास है कि बड़ा डेटा झूठ नहीं है  यदि किसी उपभोक्ता ने मौसम का हाल जानने के लिए कोई एप डाउनलोड किया और एप ने उसके फोन में उपलब्ध सारे कॉन्टेक्ट तक पहुँचने की अनुमति माँगी तो ज्यादातर लोग बगैर यह सोचे की मौसम का हाल बताने वाला एप कांटेक्ट की जानकारी क्यों मांग रहा है उसकी अनुमति दे देंगे |अब उस एप के निर्मताओं के पास किसी के मोबाईल में जितने कोंटेक्ट उन तक पहुँचने की सुविधा मिल जायेगी|यानि एप डाउनलोड करते ही उपभोक्ता आंकड़ों में तब्दील हुआ फिर उस डाटा ने और डाटा ने पैदा करना शुरू कर दिया |इस तरह देश में हर सेकेण्ड असंख्य मात्रा में डाटा जेनरेट हो रहा है पर उसका बड़ा फायदा इंटरनेट के व्यवसाय में लगी कम्पनियों को हो रहा है |यह भी उल्लेखनीय है कि डेटा चुराने के लिए बहुत से फर्जी एप गूगल प्ले स्टोर पर डाल दिए जाते हैं और गूगल भी समय समय  पर ऐसे एप को हटाता रहता है पर ओपन प्लेटफोर्म होने के कारण जब तक ऐसे एप की पहचान होती है तब तक फर्जी एप निर्माता अपना काम कर चुके होते हैं |ग्रोसरी स्टोर और कई तरह के क्लब जब कोई उपभोक्ता वहां से कोई खरीददारी करता है या सेवाओं का उपभोग करता है तो वे उपभोक्ताओं के आंकड़े ले लेते हैं लेकिन उन आंकड़ों पर उपभोक्ताओं पर कोई अधिकार नहीं रहता है |

उपभोक्ता अधिकारों के तहत अभी आंकड़े(डाटा) नहीं आये हैं |किसी भी उपभोक्ता को ये नहीं पता चलता है कि उसकी निजी जानकारियों का (आंकड़ों )किस तरह इस्तेमाल होता है और उससे पैदा हुई आय का भी उपभोक्ता को कोई हिस्सा नहीं मिलता |आंकड़ों की दुनिया में भी वर्ग संघर्ष का दौर शुरू हो गया है किसी के निजी आंकड़ों की कीमत उसकी इंटरनेट पर कम उपस्थिति से तय होती है यानि अगर आप कई तरह की सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर हैं तो आपका डाटा यूनिक नहीं रहेगा | लोगों के निजी डाटा सिर्फ कम्पनियों के प्रोडक्ट को बेचने में ही मदद नहीं कर रहे बल्कि  यह आंकड़े हमें  भविष्य के समाज के लिए तैयार भी कर रहे हैं |पूर्व में फ़ेसबुक ने यह स्वीकारा था कि उनके ग्रुप द्वारा व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम के डाटा को मिला कर के  उसका व्यवसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है| फ़ेसबुक ने यह भी स्वीकार किया था कि उसके प्लेटफ़ॉर्म में अनेक ऐप के माध्यम से डाटा माइनिंग और डाटा का कारोबार होता है सका बड़ा कारण इंटरनेट द्वारा पैदा हो रही आय और दुनिया भर की सरकारों में अपनी आलोचनाओं को लेकर दिखाई जाने वाली अतिशय संवेदनशील रवैया  है |कम्पनियां अनाधिकृत डाटा के व्यापार में शामिल हैं भले ही वे इसको न माने पर वे अपना डाटा देश की सरकार के साथ नहीं शेयर करना चाहती वहीं सरकार इस तरह के नियम बना कर अपनी आलोचनाओं को कुंद कर सकती है |फिलहाल देश इन्तजार कर रहा है की सोशल मीडिया पर आने वाला वक्त अभिवक्ति की स्वंत्रता और लोगों की निजता के बीच कैसे संतुलन बनाएगा और व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक जो अभी तक लंबित है |क्या लोगों को इंटरनेट पर वो आजादी का एहसास करा पायेगा जिसके लिए लोग इंटरनेट पर आते हैं | भविष्य का भारतीय समाज कैसा होगा यह इस मुद्दे पर निर्भर करेगा कि अभी हम अपने निजी आंकड़ों के बारे में कितने जागरूक है |

राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप में 05/06/2021 को प्रकाशित 

Monday, May 31, 2021

डिजीटल सेवाओं के लिए सुविधा शुल्क

 


दुनिया को जोड़ने वाला, इंटरनेट। एक क्लिक पर हमारे हर सवाल के तमाम जवाब देने वाला, इंटरनेट। घर बैठे शॉपिंग और फिर घर बैठे ही डिलीवरी करने वाला, इंटरनेट। आम हो या ख़ास सबकी एक जरुरी जरुरत सा बन चुका है इंटरनेट इतनी खूबियों वाले इंटरनेट का फायदा उठाने के लिए एक अदद कम्प्यूटर या मोबाईल के साथ जिस चीज की जरुरत होती है वो है एक सर्च इंजन| सारी दुनिया में आज खोज का पर्याय बन चुकी कम्पनी का नाम है गूगल | गूगल इंटरनेट का प्रवेश द्वार है और खोज-विज्ञापन के बाजार में यह विशालकाय है।शुरुआत में इंटरनेट पर उपलब्ध लगभग हर सेवा मुफ्त में ही मिलती थी फिर धीरे –धीरे इंटरनेट पर उपलब्ध कई सेवाओं की खिड़कियाँ मुफ्त के लिए बंद होने लगीं पर ज्यादातर ये मुफ्त सेवाएँ विशेसीकृत सेवाओं की थी जैसे नौकरी ढूँढना या फिर अपने लिए जीवन साथी की तलाश आदि पर गूगल की सेवाएँ सब मुफ्त ही रहीं |इस बीच गूगल लगातार हमारे जीवन में घुसपैठ बढाता रहा सर्च इंजन से शुरू हुआ सफर ई मेल फोटो वीडियो और न जाने कितनी सेवाओं को जोड़कर हमारे जीवन को आसान करता रहा | यदि उपभोक्ताओं को डिस्काउंट और बहुत कुछ फ्री मिल रहा है तो उन्हें चिंता क्यों करनी चाहिए? इसको समझने के लिए जरूरी है कि 2016 में भारत में एक फोन कम्पनी  ने फॉर जी सेवा शुरू की जिसमें उपभोक्ताओं को करीब एक वर्ष तक इंटरनेट और कॉलिंग की मुफ्त सेवाएं दी गई। परिणाम यह हुआ कि एक समय 15 से ज्यादा टेलीकॉम कंपनियां भारत में सेवाएं दे रही थी, अब महज तीन बची हैं। अब तीनों कंपनियां अपनी दरें बढ़ा रही हैं। बाजार से प्रतिस्पर्धा काफी हद तक खत्म हो गई है।

इंटरनेट के व्यवसाय का ढांचा भी बदल रहा है जो अब सिर्फ विज्ञापन आधारित न होकर सेवाओं के सब्सक्रिप्शन शुल्क के रूप में अपना विस्तार कर रहा है इसी कड़ी में गूगल ने आगामी एक जून से अपनी गूगल फोटो  मुफ्त क्लाउड स्टोरेज सर्विस बंद करने का फैसला किया है । अब गूगल  की ओर से गूगल  फोटो के क्लाउट स्टोरेज के लिए शुल्क वसूला जाएगा। इसका यह मतलब हुआ कि अगर आप गूगल  ड्राइव या फिर किसी अन्य जगह अपनी फोटो और डेटा को पंद्रह जी बी से ज्यादा  स्टोर करते हैं, तो इसके लिए आपको चार्ज देना होगा।  जो उन्हें प्रतिमाह के हिसाब से 1.99 डॉलर (146 रुपये) पड़ेगा । गूगल  की तरफ से इसे गूगल वन  नाम दिया गया है। जिसका वार्षिक सब्सक्रिप्शन शुल्क  19.99 डॉलर (करीब 1464 रुपये) है। इस तरह का शुल्क जी मेल में पहले से ही लागू है जिसमें कोई भी जी मेल उपभोक्ता सिर्फ पंद्रह जी बी तक का मेल स्टोरेज मुफ्त हासिल कर सकता है इससे ज्यादा के लिए उसे शुल्क देना होगा |
यानि भारत में इंटरनेट समय का एक चक्र पूरा कर चुका है और इस इंटरनेट पर कुछ कम्पनियों का एकाधिकार है बीच में चीन की कुछ कम्पनियों ने भारत में पहले से स्थापित गूगल जैसी कम्पनियों को चुनौती देने की शुरुआत जरुर की पर राजनैतिक वजहों से उन कम्पनियों को देश से बाहर जाना पड़ा |दुनिया में दूसरे स्थान पर इंटरनेट उपभोक्ताओं वाला देश ऐसी कोई स्वदेशी कम्पनी विकसित नहीं कर पाया नतीजा गूगल जैसी कम्पनियों का एकाधिकार जो अब हमारे जीवन का अंग बन गयीं हैं | कंपनी मुनाफा बढ़ाने के लिए ऑनलाइन सर्च कारोबार में अपने प्रभुत्व दुरुपयोग कर रही है। गूगल की मूल कंपनी एल्फाबेट इंक है और इसका बाजार मूल्य 1,000 अरब डॉलर से अधिक है। आज गूगल से टक्कर लेना इसलिए भी आसान नहीं है, क्योंकि उसने सर्च के मामले में अपना एकाधिकार बना रखा  है. गूगल ब्यानबे प्रतिशत सर्च को नियंत्रित  करता है, जो कि उसके सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी माइक्रोसॉफ्ट बिंग ढाई प्रतिशत  से बहुत ज्यादा है|फिलहाल गूगल की आय का सबसे बड़ा स्रोत विज्ञापनों से होने वाली आय से आता है जो कि गूगल केवल उपभोक्ताओं को अपने  सर्च इंजन पर  ही नहीं बल्कि यूट्यूब ,जी मेल , क्रोम , एंड्राइड, मैप  और अन्य सभी सेवाओं पर भी ट्रैक करते हैं।गूगल ट्रैकर्स वास्तव में पचहतर प्रतिशत  शीर्ष मिलियन वेबसाइटों पर लगे होते हैं "गूगल एनालिटिक्स"अधिकांश साइटों पर इंस्टॉल किया गया है, जिससे वेबसाइट मालिकों और गूगल को पता चलता है कि उपभोक्ता  कौन सी साइट पर कब और कितने देर के लिए जाता है |जो विज्ञापन आपका हर जगह आपका पीछा करते हैं, उनमें से अधिकांश वास्तव में इन गूगल विज्ञापन नेटवर्क के माध्यम से चलाए जाते हैं। ये विज्ञापन न केवल कष्टप्रद हैं - वे आपको और अधिक चीजें खरीदने के लिए लक्षित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
अपनी सेवाओं के लिए शुल्क लेना या लेना किसी भी कम्पनी का विशेषाधिकार है पर यहाँ स्थिति थोड़ी अलग है उपभोक्ताओं के पास ऐसा कोई सशक्त विकल्प है ही नहीं कि वो इंटरनेट की कुछ सेवाओं के लिए किसी अन्य कम्पनी के बारे में विचार करे |ऐसे में जहाँ हम अपने ही आंकड़ों से कमाए गए मुनाफे से गूगल जैसी कम्पनियों को विशाल बनाने में मदद करते हैं जबकि उस मुनाफे का कोई भी हिस्सा उस उपभोक्ता तक नहीं पहुंचता जिसके कारण मुनाफा कमाया जा रहा है वहीं मुनाफे को अधिकतम करने के लिए अब उन्हीं उपभोक्ताओं से शुल्क भी वसूला जा रहा है |मुनाफा कमाने की ये होड़ कहाँ जाकर रुकेगी इसका फैसला अभी होना बाकी है पर यह सच है कि इंटरनेट का यह दावा कि यह  हमारा समय बचा के हमारे जीवन को आसान बनाता है कहीं से सच नहीं लगता बल्कि यह उस बचे हुए समय को उसी इंटरनेट की अंधी सुरंगों  में बिताने के लिए प्रेरित करता है |
दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 31/05/2021 को प्रकाशित 

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