Tuesday, November 15, 2011

एक मुलाक़ात अखिलेन्द्र मिश्र के साथ


बात से बात निकलती है अखिलेन्द्र जी का निराला अंदाज़
अखिलेन्द्र  मिश्र नहीं पहचान पायेंगे पर जब मैं आपको यक्कू की याद दिलाऊंगा तब आपको एहसास होगा ओह तो ये हैं .........जी हाँ साल बीतते रहे दुनिया बदलती रही और अखिलेन्द्र जी हर नए पात्र को जीवन देते रहे ,उन्हें जीते रहे और हमें देते रहे एक से बढ़कर एक यादगार प्रस्तुतियाँ टीवी पर मेरा इनसे परिचय यक्कू से हुआ किशोरावस्था के दिन थे चन्द्रकांता पहले ही पढ़  रक्खी थी पर क्रूर सिंह ऐयार का ऐसा रूप जब टीवी पर देखा तो बस वाह वाह ही निकला ,बिना किसी सम्बन्ध के बस उनसे एक रिश्ता बन गया .दिन पर दिन बीतते रहे अखिलेन्द्र जी फिल्मों में आगे बढते रहे और मेरा जीवन भी सरकता रहा .सरफ़रोश ,लगान ,दा लीजेंड ऑफ भगत सिंह ,गंगा जल , अपहरण ,दीवार ,रेडी , जैसी फिल्मों में वो अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करते रहे ,ये तो कुछ ऐसी फ़िल्में जिन्हें दर्शकों ने सराहा पर ऐसी भी बहुत सी फ़िल्में आयीं जिन्हें व्यवासायिक रूप से भले ही प्रसिद्धि न मिली हों पर आपके निभाए किरदारों को दर्शकों का प्यार जरुर मिला .
खैर आइये लौटते हैं वर्तमान में मिश्रा जी से  मेरा परिचय हमारे एक कॉमन मित्र के जरिये हुआ बात उन्हें पत्रकारिता विभाग में लाने की थी पर ऐसा हो न सका अखिलेन्द्र जी को कोटिशः धन्यवाद वो तैयार भी थे (वो क्यों नहीं आ पाए इस विषय पर एक किताब लिखी जा सकती है अत; इस विषय को यहीं विराम दिया जाए ) .संयोग इसी को कहते हैं वो दो नवंबर को लखनऊ में अपनी एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में  आ रहे थे पर नियति का खेल देखिये मैं कुछ आवश्यक कारणों से सात नवंबर तक लखनऊ से बाहर था .लखनऊ लौट कर मैंने उनको हिचकते हुए फोन लगाया ,फोन नहीं उठा थोड़ी देर बाद मेरा फोन बज उठा अखिलेन्द्र जी फोन कर रहे थे मैंने कुशल क्षेम पूछी तो ऐसा कहीं से नहीं लगा कि मैं किसी अभिनेता से बात कर रहा हूँ ऐसा लगा जैसा कोई पुराना दोस्त बेलौस अंदाज में बतियाता है. उनकी बातों में वही रवानी थी .शाम को शूटिंग के बाद यूँ ही लखनऊ भ्रमण पर निकल  जाया करते थे मंदिरों के दर्शन करते , न किसी स्टारडम का दिखावा न आसमान से उतरे हुए अभिनेता बनने का ढोंग , तो मुलाक़ात का वक्त तय हो गया दिन के तीन बजे मुझे उनके होटल पहुंचना था वो होटल में मेरी राह तक रहे थे .मैं वक्त पर पहुँच गया दरवाजा उन्होंने खोला पर कमरे में घुसते ही जो दृश्य मैंने देखा उसकी कल्पना मैंने नहीं की थी कमरे में रामायण उसके चारों ओर मंदिरों के प्रसाद टीका फूल मालाएं (हालाँकि मैंने इसका जिक्र उनसे नहीं किया ).बातचीत का सिलसिला फिल्मों से शुरू होकर उनके निजी जीवन तक जा पहुंचा .
दस भाई बहनों के परिवार में सबसे छोटी संतान जिनको दुर्घटना वश गाँव के एक नाटक में अभिनय करने का मौका मिल गया (नाटक का एक पात्र किन्हीं कारणों से रिहर्सल में हिस्सा नहीं ले पा रहा था ) और उस नाटक ने उनके जीवन का भविष्य तय कर दिया और सिनेमा को एक दैदीप्यमान नक्षत्र मिल गया उन्होंने औपचारिक रूप से अभिनय नहीं सीखा बस गलतियाँ करते रहे और सीखते रहे सीखना जैसे उनके जीवन का मूलमंत्र बन गया. बातचीत के दौरान चाय नाश्ते का दौर चलता रहा और वे होटल के स्टाफ के साथ उसी विन्रमता से पेश आ रहे थे जैसे कि हम लोगों के साथ .एक चीज़ जो मैंने गौर की कि वो एक अच्छे वक्ता के साथ एक अच्छे श्रोता भी निकले किसी तरह की कोई उकताहट नहीं, न ही व्यर्थ में व्यस्तता का ढोंग विषय बदलते रहे और बात आगे बढ़ती रही जुगाड तकनीक से किस तरह उन्होंने गाँव के नाटक में पेट्रोमैक्स का प्रयोग एक प्रोजेक्टर के रूप में कर दिया जिससे नाटक की शुरुवात में पात्र परिचय में लोगों को फिल्म देखने का आभास लगे और ये प्रयोगधर्मिता बाद में उनके अनेक किरदारों में देखने को मिली .उन्होंने बड़े स्पष्ट लहजे में कहाँ अभिनय उनका पेशा नहीं है .अभिनय उनका जुनून है .हमारे साथ आये कुछ पत्रकार मित्रों ने उनको घेरने की कोशिश की लेकिन वे किसी भी मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष बने बगैर बेबाकी से अपनी बात कहते रहे .समय बीतता जा रहा था और बातें खत्म नहीं हो रही थीं मेरे लाख मना करने के बावजूद वे हम लोगों को छोड़ने नीचे उतरे वहाँ सुरक्षा गार्डों ने उन्हें घेर लिया और अपने साथ फोटो खिंचवाने की जिद करने लगे गार्ड का कैमरा फोटो खींचने में बहुत वक्त ले रहा था पर अखिलेन्द्र जी का देशी अंदाज़ वहां भी दिख रहा था उन्होंने न सबके साथ फोटो खिंचवाई बल्कि उनको ये भी बताया कि किस तरह फोटो अच्छी आ सकती है .मैं उनसे एक वायदा लेकर निकाल पड़ा था कि अब जब भी वो लखनऊ आयेंगे एक शाम हमारे साथ बिताएंगे वो तो लखनऊ से जा चुके हैं पर उनके साथ बिताए हुए पल हमेशा के लिए दिल के किसी कोने में कैद होकर रह गए हैं.

Wednesday, October 26, 2011

Reality bites common man

भारत में इस वक्त त्योहारों की धूम है वहीं टीवी पर रियल्टी शो का बोलबाला है टेलीविजन पर जब धारावाहिकों की शुरुवात हुई थी तो किसी ने नहीं सोचा था कि धीरे धीरे ये बुद्धू बक्सा  हम सबके जीवन को किस हद तक प्रभावित करने वाला है ड्राईंग रूम में दबे पाँव घुसने वाला टीवी आज शान से हमारे बेडरूम में बैठा है और ऐसा ही कुछ हुआ इसमें प्रसारित कार्यक्रमों के कंटेंट में भारत का पहला सोप ऑपेरा हम लोग एक मध्यम वर्गीय परिवार के संघर्ष की कहानी थी जिसे घर के सब लोग साथ बैठ कर देखा करते थे ,हम लोग से शुरू हुआ ये सफर आज भी जारी है पर इसके रूप बदल गए हैं जो हमें इमोशनल अत्याचार से लेकर राखी के इन्साफ और ऐसे ना जाने कितने रूपों में दिखते हैं जिन्हें आजकल हम रीयल्टी शो के नाम से जानते हैं मैं थोडा तफसील से आपको बताता हूँ भारत के पहले रियलिटी शो का श्रेय अंताक्षरी कार्यक्रम को प्राप्त है। 3 सितम्बर 1993 को शुरू हुए इस शो के करीब 600 एपीसोड दर्शकों तक पहुंचे और हजारों प्रतिभागियों ने इसमें हिस्सा लिया.आपको ये भी बताता चलूँ सफलता की नयी इबारत लिखने वाले इन रीयल्टी शो का इतिहास मात्र दो दशक पुराना है इनकी शुरुवात संगीत आधारित कार्यकर्मों से हुई पर 2001 में कौन बनेगा करोड़पति ने इसमें एक नया आयाम जोड़ते हुए दुनिया को ये दिखाया कि भारत में सामान्य ज्ञान को भी टेलीविजन से जोड़ा जा सकता है और ये प्रयोग ख़ासा सफल रहा फिर तो सच का सामनाराखी का स्वयंवरइंडियाज गॉट टैलेंटइस जंगल से मुझे बचाओखतरों के खिलाडीनच बलिएइंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा,बार्नविटा क्विज कांटेस्टरोडीजस्प्लिटसविलाझलक दिखलाजाएक्स फैक्टरजस्ट डांसलिटिल चैंप्सरतन का रिश्ताकॉमेडी का महामुकाबलास्टंट मानियालव लॉक अप जैसे कार्यक्रमों का सिलसिला ही चल पड़ा . बिग बॉस जैसे शो ने तो जैसे खेल के सारे नियम ही बदल दिए .कई रीयल्टी शो पर अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप भी लगे पर फिलहाल हर साल एक नए सीजन के साथ अनेक रीयल्टी शो हमारे सामने आ रहे हैं और दर्शक भी इन्हें स्वीकार कर रहे हैं रीयल्टी शो आज ज्ञान देने के अलावा शादियाँ करवा रहे हैं ,लोगों के झगड़े सुलझा रहे हैं हाँ वे आपका सामना सच से भी करा रहे हैं .पारिवारिक धारावाहिकों में प्रयोगधर्मिता गायब सी हो गयी है जिससे दर्शक एक खालीपन महसूस कर रहे थे और इस खालीपन को बखूबी भरा है जीवन की वास्तविक परिस्थियों में रचे बसे इस कार्यक्रमों ने जिसमे नायक या नायिका और कथानक जिंदगी के आस पास के ना होकर बल्कि वास्तविक ही होते हैं .दूरदर्शन के एकाधिकार के खत्म होने के बाद सैकड़ों  सेटेलाईट चैनलों ने दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई पर एक वक्त के बाद धारावाहिकों में वही सास बहू की कहानी या दो परिवारों के संघर्ष की दास्तान जैसे विषय घूम फिर के हमारे सामने आते रहे यही वक्त था जब भारत में टेलीविजन इंटरैक्टिव हो रहा था यानि मोबाईल  क्रांति ने दर्शकों को  एस एम् एस के रूप में ऐसी ताकत दे दी थी जिससे वो किसी भी धारावाहिक के बारे में अपनी राय सीधे चैनल को भेज सकते थे यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एस एम् एस की इस ताकत के पीछे व्यवसायिक उद्देश्य भी थे क्योंकि टेलीविजन के कार्यक्रमों में भेजा जाने वाला एस एम् एस सामन्य एस एम् एस से कई गुना महंगा पड़ता है जिसका एक हिस्सा कार्यक्रम निर्माताओं या चैनल के पास जाता है .रीयल्टी शो की इस कहानी में सब कुछ अच्छा है ऐसा भी नहीं संगीत और गेम शो जैसे कार्यक्रमों को छोड़कर ज्यादतर कार्यक्रम शहरी इलीट क्लास को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं जिसमे ग्लैमर का तडका टीवी और सिनेमा के कलाकार लगते हैं जिससे वो हमारे आस पास के होकर भी हमारे नहीं होते हैं पर वक्त बदलते देर नहीं लगती जब सिलसिला शुरू हुआ है तो हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि रीयल्टी शो के कार्यक्रमों में भी बदलाव आएगा और ये संगीत और गेम शो के अलावा अन्य  विषयों में आम आदमी को आगे लायेंगे और आप भी तो यही चाहते हैं .क्यों मैं सही कह रहा हूँ न .
आई नेक्स्ट में 26 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित 

Wednesday, September 21, 2011

आशा


निराशा के घोर बादलों ने
जब डाला मेरे मस्तिष्क पर डेरा
मेरे स्वप्नों के छीना बन कर लुटेरा
चिंता करती जब मुझे हताश
खत्म होती जब जीवन की आस
महकती हवा देती तब मुझको सन्देश
जीवन के कुछ सुखद क्षण हैं शेष
सुख दुःख तो जीवन में आते जाते हैं
सुखी वहीं हैं "नादान" जो दुःख सह जाते हैं
इसी उम्मीद पर जीता मेरा मन
कभी तो पूरे होंगे मेरे स्वप्न
(साल था 1995 पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए ये कविता दिखी )

Tuesday, September 6, 2011

Reel Life Wisdom


अन्ना के आंदोलन ने देश के सोये हुए मध्यम वर्ग को एक नयी  तरीके की राजनैतिक चेतना का एहसास कराया .मैं कोई राजनैतिक लेक्चर देने नहीं जा रहा .मैं तो बस उस माध्यम की शक्ति का एहसास आप सबको कराना चाहता हूँ जो हमारे जीवन में असर तो डालता है पर हम मानने को तैयार नहीं होते जी हाँ फ़िल्में जरा याद कीजिये अन्ना के समर्थन में हो सकता हो आपने भी कैंडल मार्च निकाला हो कुछ याद आया ये कैंडल मार्च का आइडिया ‘रंग दे बसन्ती’ फिल्म ने हमें दिया कि हाँ हम भी दुनिया बदल सकते हैं .फ़िल्में समाज का आईना होती हैं इस विषय पर मतभेद हो सकते हैं पर कोई भी फिल्म अपने वक्त और समाज से कट कर नहीं बन सकती आप इस तथ्य से असहमत हो सकते हैं पर इसे ख़ारिज नहीं कर सकते हाल ही आयी फिल्म आरक्षण इसका ताजा उदाहरण  है मुद्दा यह महत्वपूर्ण नहीं है कि फिल्म आरक्षण समर्थक है या विरोध में पर इसी बहाने आरक्षण जैसे मुद्दे पर सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर लंबी लंबी बहस चलीं थोडा सा पीछे चलते हैं आज की यंगिस्तानी पीढ़ी महात्मा गाँधी को केवल राष्ट्र पिता के रूप में जानती थी उनका दर्शन क्या था हू केयर्स लेकिन फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने समाज को गांधीगीरी का एक नया मंत्र दिया ,फिल्म के बहाने ही सही गाँधी जी का दर्शन दुबारा जाना समझा गया .हम अपनी फिल्मों को भले ही बहुत गम्भीरता से न लेते हों लेकिन सामाजिक परिवर्तन में इनकी एक बड़ी भूमिका रही है .लोगों की मानसिकता एक दिन में नहीं बदलती उसके लिए लगातार प्रयास की जरुरत होती है और ये काम फिल्मों के द्वारा बेहतरीन तरीके से होता है .मनोरंजन उद्योग के फलने फूलने से हम लगातार टीवी और उसी बहाने फिल्मों के संपर्क में रहते हैं . समाज की हर छोटी बड़ी समस्या पर जहाँ फ़िल्में बनी हैं वहीं फिल्मों ने हमें विरोध के नए प्रतीक दिए हैं .एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती पर जब ‘धारावी’ फिल्म बनी तो लोगों को एहसास हुआ कि वहां पर रहने वाले लोगों का जीवन कितना मुश्किल है उनके जीवन स्तर को बेहतर करने का सरकारी प्रयास तेजी से इसी फिल्म के बाद हुआ .हमें आजादी मिले ज्यादा वक्त नहीं हुआ थाजब देश के कई हिस्सों में दस्यु आतंक सर चढ  कर बोल रहा था और तब आयी ‘जिस देश में गंगा बहती है(1960)’ डाकुओं की समस्या  और उनके पुनर्वास पर बनी कुछ अच्छी फिल्मों में से एक है .हमारे समाज और उसमे होने वाली घटनाएँ हमेशा फिल्मों के केंद्र में रही हैं .ऑनर किलिंग पर अभी आयी फिल्म ‘खाप’ हो या राजनीति का सच बयान करती फिल्म ‘राजनीति’ हो .फिल्मों के लिहाज से हर दशक अपने समय का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है..आजादी से पहले जब छुआ छूत पर बात करना मुश्किल था ‘अछूत कन्या’ जैसीफिल्म ने बड़े सार्थक तरीके से इस समस्या को लोगों के सामने रखा इसी कड़ी में कुछ और नाम सुजाता ,अंकुर ,पार सद्गति  ,दीक्षा ,समर जैसी फिल्मों के भी हैं जो समय के सच को बयान करती हैं .हम फिल्मों के असर से बच नहीं सकते आप ‘पीपली लाईव’ को भूले नहीं होंगे एक साथ देश के किसानों की समस्या और इलेक्टोनिक मीडिया की नौटंकी पर करारा व्यंग्य .ऐसा संयोग और विषय के साथ न्याय कम ही फ़िल्में कर पातीं हैं .हमारी फ़िल्में बदली हैं और बदल रही हैं और साथ साथ दुनिया भी तो अब हमारे भी बदलने का वक्त आ गया है तो शुरुवात आजसे ही क्यों न की जाए .

आई नेक्स्ट ६ सितम्बर २०११ को प्रकशित 

Tuesday, August 23, 2011

अभी भी परदे के पीछे हैं दलित


हाल ही में आई प्रकाश झा की वहुचर्चित फिल्म आरक्षण ने एक बार फिर से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस छेड़ दी है. फिल्म में आरक्षण को लेकर प्रकाश झा ने एक नजरिया प्रस्तुत करने की कोशिश की है. आरक्षण पर चलरही बहस में किसी न किसी रूप में एक बार फिर से दलितों और उनके अधिकारों को लेकर एक बहस चल निकली है पर इस बार बहस का मुद्दा ललित कलाएं हैं आमतौर पर साहित्य संगीत और कलाओं में दलित प्रतिनिधित्व कम मिलता है साहित्य में दलित साहित्यकारों ने इस निर्वात को भरने की कोशिश की है पर
हिंदी फिल्मों में अभी भी सार्थक दलित हस्तक्षेप का इन्तिज़ार है . आरक्षण फिल्म के बहाने ही सही पर अब इस मुद्दे पर गौर करने की जरूरत है कि हमारी फिल्मों में दलित और दलितों से जुड़े मुद्दे किस तरह से गायब हैं.अगर बॉलीबुड की फिल्मों का अवलोकन करें तो साफ पता चलता है कि किस तरह से फिल्मों में जातीय वर्चस्व गहराई से बैठा हुआ है. हमारी फिल्में मीडिया की कल्टीवेशन थ्योरी के अनुरूप कैसे बार बार एक ही विचारधारा का संदेश हमारे मस्तिष्क में ठूंस रही हैं. कलाएं समाज से जन्म लेती हैं और अंतत: समाज को प्रभावित करती हैं. हिन्दी फिल्में भी कहीं से इसका अपवाद नहीं हैं हिन्दी फिल्मों के इतिहास में समाज में होते हुए सांस्कृतिक परिवर्तनों को पकड़ा जा सकता है किन्तु  यह अलग बात है कि ये परिवर्तन फिल्मों में ज्यों के त्यों नहीं आये जाहिर है कथानक के साथ लेखक और निर्देशक की सोच भी उसमे जुड गयी .यूँ तो फिल्मों को समाज का ही प्रतिबिंब माना  जाता रहा है. इस लिहाज से देखा जाए तो समाज और साहित्य में जैसा भेदभाव दलितों के साथ हुआ वहीं फिल्मों में भी बदस्तूर जारी रहा. लंबे समय तक फ़िल्में रामायण और महाभारत की कहानियों के इर्द गिर्द बनती और हिट होती रहीं जहाँ सब कुछ अच्छा और सुहाना था अंत में सत्य की जीत होती है और असत्य पराजित होता है नायक अपने नायकत्व के कारण कुछ गलत कर ही नहीं सकता और खलनायक कभी सही हो ही नहीं सकता पर जीवन में सब कुछ स्याह और सफ़ेद के आईने से नहीं देखा जाता पर फ़िल्में बरसों से इसे आईने से समाज को आइना दिखाती आयी हैं .
फिल्मों के नाम से ही पता पड़ता है कि सवर्ण मानसिकता की गुलामी से अभी हमारा हिंदी सिनेमा बाहर नहीं निकला है मि.सिंह vs मिसेज मित्तल (२०१० ), मित्तल v/s मित्तल (२०१० ) , रोकेट सिंह सेल्स मैन ऑफ दा इयर (२००९ ), सिंह इस किंग (२००८ ), मंगल पांडे (२००५ ), भाई ठाकुर (२००० ), अर्जुन पंडित (१९७६, १९९९ )क्षत्रिय (१९९३ ), राजपूत (१९८२) ,जस्टिस चौधरी (१९८३),पंडित और पठान (१९७७ ) ये कुछ उदाहरण हैं जो बता रहे हैं कि हमारे फिल्मकारों के दिमाग में क्या चल रहा होता है चलिए सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर इन सारे नामों को स्वीकार कर लिया जाए फिर भी क्या कारण है कि दलित ,दुसाध ,मंडल पासवान जैसी दलित जातियों के नाम पर फिल्म नहीं बनती क्या दलित हमारे समाज का हिस्सा नहीं हैं ,अगर हैं तो वो फिल्मों में क्यों नहीं दिखते और अगर दिखते भी हैं तो हमेशा की तरह पीड़ित सताए हुए इसका क्या अर्थ निकला जाए या तो धरातल पर सामजिक परिवर्तन के नाम पर कुछ ठोस नहीं हुआ है और अगर हुआ है तो भी हम इसे सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हो स्वीकार नहीं पाए हैं तथ्य यह भी है कि राजनैतिक रूप से दलित लामबंद होकर उभर रहे हैं और उन्हें एक वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है जो सरकारों की तकदीर बना बिगाड़ सकते हैं लेकिन एक औडिएंस के रूप में उनकी इच्छाओं ,अपेक्षाओं और जरूरतों को महत्व नहीं दिया जा रहा है
सिनेमा में क्या दिखाया जा रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि कैसे दिखाया जा रहा है यह महत्वपूर्ण है और इसी से दिखाने वाले की मानसिकता का पता चलता है यूँ तो उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली संख्या में ऐसी कई फिल्मे में हैं जिनका कथानक आधार दलित रहे हैं जिनके नाम की महज़ चर्चा करना सिर्फ स्थान की बर्बादी ही होगी पर दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाला हमारा फिल्म उद्योग  देश की सबसे बड़ी आबादी को कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है ये सवाल जरुर विचारणीय है . कहते हैं सिनेमा बदल रहा है बदल तो रहा है नयी तकनीक तेजी से आ रही है फिल्मों के डिजीटल प्रिंट धड़ा धड रिलीज हो रहे हैं रोज नए मल्टीप्लेक्स खुल रहे हैं सिनेमा तो बदल रहा है एक चीज जो नहीं बदल रही है वह है सिनेमा का जातिगत स्वरुप अपने आप को प्रगतिशील कहने वाला मुंबई फिल्म उद्योग हमेशा सवर्णों पर मेहरबान रहा है आजादी के बाद सोचिये कितने दलित अभिनेता फिल्म में आये हैं या उन्हें मौके मिले है.अछूतकन्या,सुजाता,अंकुर,पार .सद्गति,दीक्षा,समर जैसे कुछ अपवाद नामों को छोड़ दें तो हिंदी सिनेमा जाति प्रथा पर प्रहार करता कभी नज़र नहीं आया.हमेशा की तरह हमारी फ़िल्में टैलेंट की क़द्र करती हैं और दलित टैलेंटेड नहीं होते अन्यथा क्या कारण है कि फिल्मों की दुनिया में कुछ परिवारों का राज चलता है उसके बाद अगर किसी के लिए जगह बचती है तो वो भद्र कुलीन सवर्ण जातियों के लोग ही होते हैं. फिल्म के कथानक में भी दलित पात्रों को विकसित होने का पूरा मौका नहीं दिया जाता उन्हें जिंदगी में जो कुछ भी हासिल हो रहा है उसके लिए उनकी उधम शीलता नहीं बल्कि लोगो की दया और भगवान के आशीर्वाद का महत्त्व ज्यादा होता है इस तरह हमारा फिल्म मीडिया एक सवर्ण एजेंडा सेटिंग सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है.सिर्फ तकनीक के बेहतर हो जाने से फिल्म उद्योग का भला नहीं होने वाला है कथानक के साथ होने वाले प्रयोगों के लिहाज़ से हिंदी फिल्म जगत को अभी एक लंबा रास्ता तय करना है .
23/08/11 को अमर उजाला के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित 

Friday, July 29, 2011

एफ एम् पर खबरों से क्यों डरती है सरकार



कैबिनेट ने एफ एम् रेडियो के तृतीय चरण के लाइसेंस की नीलामी की अनुमति दे दी है इस चरण में 227 शहरो में 839 नए एफ एम् रेडियो स्टेशन खुलेंगे . हालांकि यूँ तो आकाशवाणी के प्राथमिक चैनल की पहुँच लगभग सम्पूर्ण भारत पर है पर गुणवत्ता के मामले में एफ एम् का मुकाबला ये प्राथमिक चैनल नहीं कर सकते. भारत में एफ एम् की शुरुवात 1972 में तत्कालीन मद्रास केंद्र से की थी पर लागत की अधिकता के कारण इस प्रयोग को पूरे भारत में प्रोत्साहित नहीं किया गया नब्बे के दशक में आकाशवाणी ने देश के चार बड़े शहरो में एफ एम् सेवा प्रारम्भ की बाद में निजी प्रसारकों के इस क्षेत्र में उतरने से यह क्षेत्र एक बड़े बाजार में तब्दील हो गया लगभग बारह सौ करोड रुपये का यह बाजार 2015 तक दुगुना हो जाएगा . एफ एम् रेडियो के तृतीय चरण के लाइसेंस एफ एम् रेडियो को भारत के लगभग पच्चासी प्रतिशत आबादी तक पहुंचा देंगे
दिक्कत यह है कि सभी निजी एफ एम् स्टेशन अपने प्रसारण का इस्तेमाल मात्र मनोरंजन के लिए ही कर सकेंगे इसका कारण सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा लगाई गयी बंदिश है.टेलीविजन से खबर देने के मामले में दूरदर्शन का एकाधिकार ना जाने कब का टूट गया लेकिन रेडियो में आकाशवाणी का एकाधिकार अभी तक कायम है .टेलीविजन में तो ये हाल है कि अगर दूसरे चैनल उपलब्ध हो तो को दूरदर्शन के समाचार देखना नहीं चाहता. उम्मीद की जा रही थी कि एफ एम् रेडियो के विस्तार के तृतीय चरण में निजी प्रसारकों को समाचार प्रसारित करने की छूट दे दी जायेगी पर सरकार ने इतनी रियायत दी है कि जो रेडियो स्टेशन ऑल इंडिया रेडियो के समाचार बुलेटिन का प्रसारण करना चाहता हैं, उन्हें ऐसा करने की इजाज़त होगी.सरकार के इस कदम का मतलब है कि रेडियो समाचारों की दुनिया में आकाशवाणी का प्रभुत्व कायम रहेगा
जाहिर है कि सरकार रेडियो के मामले में कोई बदलाव नहीं चाहती वह यही चाहती है कि रेडियो श्रोता उन्हीं ख़बरों को जाने सुने जो वह लोगों को बताना चाहती है .संचार क्रांति के इस युग में इस तरह का बेसिर पैर का सेंसर किसी की भी समझ से परे है .नेपाल जैसे छोटे से पड़ोसी देश ने एफ एम् को ख़बरों के लिए खोल दिया है .अगर हमारे यहाँ भी एफ एम् पर ख़बरों की इजाजत दी जाती है तो वह क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक अच्छा अवसर होगा.रेडियो एक सस्ता साधन है बशर्ते सरकार इसके महत्व को समझे और ख़बरों व सूचनाओं पर सरकारी एकाधिकार की सोच से मुक्त हो ,मौजूदा रवैया किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उचित नहीं . 
दैनिक हिन्दुस्तान में २९ जुलाई को प्रकाशित 

Thursday, July 21, 2011

इन्टरनेट ने बदल दी दुनिया



  दुनिया कितनी बदल गयी है सुना होगा आप सब ने और कहीं न कहीं महसूस भी किया होगा ह्यूमन सिविलाएजेशन का दौर जो रोटी कपडा और मकान से शुरू हुआ उसमे टाईम के साथ साथ न जाने कितनी चीजें जुडी पर हमारी बेसिक नीड्स इन्हीं के आस पास घूमती रहीं .हमारे राईट्स और ड्यूटीस का सारा संघर्ष रोटी कपडा और मकान का ही रहा है पर अब इसमें एक नया चेंज आया है वो है इन्टरनेट यू एन ओ  की एक रिपोर्ट के अनुसार इन्टरनेट सेवा से लोगों को वंचित करना और ऑनलाइन सूचनाओं के मुक्त प्रसार में बाधा पहुँचाना मानवाधिकारों के उल्लघंन की श्रेणी में माना जाएगा यू एन के स्पेशल रेप्रेसेंतेटिव फ़्रैंक ला रू ने ये रिपोर्ट विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रसार  और संरक्षण के लिए तैयार की है.जरा सोचिये और किसी अधिकार ने हमारी जिंदगी इतनी तेजी से नहीं बदली है जितनी इन्टरनेट ने बदल दी है .बैंक में लगने वाली लाइन खतम हो गयी है गैस बुकिंग से लेकर ट्रेन और हवाई जहाज़ तक के टिकट नेट की मदद से खरीदे जा रहे हैं यानि हम कह सकते हैं कि इन्टरनेट आने वाले समय में संविधान सम्मत और मानवीय अधिकारों का एक प्रतिनिधि बन कर उभरेगा आज इन्टरनेट जिस तरह देश और दुनिया को चेंज कर रहा है कि अब इसके बगैर जीवन की कल्पना करना संभव नहीं पहले इंसान की मूलभूत आवयश्कता थी रोटी कपड़ा और मकान लेकिन अब इसमें इन्टरनेट को शामिल कर यू एन ओ ने एक प्रगतिशील कदम उठा कर इस धारणा को पुष्ट किया है कि ह्यूमन राय्ट्स एक डायनामिक कांसेप्ट है जैसे जैसे दुनिया बदलेगी ह्यूमन राय्ट्स का दायरा भी बढ़ेगा पर इसमें इन्टरनेट का शामिल होना इन्टरनेट की व्यापकता और इसकी
शक्ति को दर्शाता है. जापान में आयी सुनामी के समय लोगों तक हेल्प पहुँचाना या इजिप्ट में हुए सत्ता  परिवर्तन में इन्टरनेट ने अपनी  पावर को प्रूव तो किया है. इन्टरनेट ही इकलौता मीडियम है जो रेडियो न्यूज़ पेपर और टेलिविजन की तरह वन वे मीडियम न होकर मल्टी डायमेंशनल है. अन्य दूसरे मीडियम के इतर यह उन कंट्रीज में भी कारगर है जहाँ संचार साधनों को पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं प्राप्त है. इस मीडियम में थाट्स का फ्लो रोकना या उन्हें प्रभावित करना उतना आसान नहीं होता. इससे स्वतंत्र विचारों का सम्प्रेषण अधिक आसानी से होता है.सिटीजन जर्नलिस्ट के कांसेप्ट को पुष्ट करने में इन्टरनेट का सबसे बड़ा योगदान है आप कुछ भी दुनिया के साथ शेयर सकते हैं बगैर किसी सेंसर के आपको अपनी बात जन जन तक पहुंचाने के लिए कोई इंतिजार नहीं करना है .एक तरह से देखें तो इन्टरनेट ने मॉस कम्युनिकेशन के सीनेरियो को पूरी तरह से बदल दिया है डेवलपमेंट को सोसायटी के अंतिम आदमी तक पहुंचाने के लिए एड्मिनिस्त्रशन का  करप्शन फ्री और ट्रांसपैरेंट होना जरूरी है और इस काम को और अधिक फास्ट करने में इन्टरनेट एक एफ्फेक्टिव मीडियम के रूप में उभरा है इन्टरनेट विरोध या असहमति दर्ज कराने के एक नए प्लेटफॉर्म के रूप में उभरा है .विकासशील देशों में भले ही इन्टरनेट अपने पैर तेजी से पसार रहा हो पर उसकी गति विकसित देशों के मुकाबले कम है आईटीयू के ही आंकड़ों के अनुसार विकसित देशों में हर तीसरा व्यक्ति इंटरनेट से जुड़ा है वहीं विकासशील देशों में पांच में से चार व्यक्ति अब भी इंटरनेट से दूर हैं. भारत जैसे देश में जहाँ आर्थिक असमानता ज्यादा है वहाँ डिजीटल डिवाइड की समस्या और ज्यादा  गंभीर हो जाती है लेकिन रोटी कपडा और मकान जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकता के साथ जुड़ने से  अब इन्टरनेट सेवाओं का विस्तार भी दुनिया की सरकारों की प्राथमिकता में रहेगा और जैसे जैसे सरकारें अपनी जनता को एक बेहतर जीवन उपलब्ध करती जायेंगी इन्टरनेट का विस्तार अपने आप होता जाएगा .यह कहना ठीक नहीं होगा कि इससे एक दिन में देश या दुनिया की तस्वीर बदल जायेगी पर एक शुरुवात तो हो ही गयी है
आई नेक्स्ट में १२ जुलाई को प्रकाशित 

पसंद आया हो तो