Wednesday, June 28, 2017

स्मार्टफोन ने कम कर दिए साइबर चोरी के रास्ते

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब लोग ब्रांडेड कंप्यूटर खरीदने  की बजाय उसे एसेम्बल करवाना ज्यादा पसंद करते थे और ज्यादातर कंप्यूटर सोफ्टवेयर पाइरेटेड होते थे |धीरे –धीरे तकनीक ने पैठ बनाई और लोग भी जागरूक हुए वहीं सोफ्टवेयर निर्माताओं ने भी जेनुइन सॉफ्टवेयर खरीदने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए अपने सोफ्टवेयर की कीमतें कम कीं | एंटी पाइरेसी तकनीक बनाने वाली कम्पनी मूसो के एक शोध के मुताबिक सारी दुनिया में पाइरेसी साईट पर जाने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले छ प्रतिशत की गिरावट आयी है |इसका एक कारण नेटफ्लिक्स जैसी वीडियो कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाईट का आना भी है जो दुनिया के चार देशों को छोड़कर हर जगह अपनी सेवाएँ दे रही हैं और दूसरा हॉट स्टार जैसे वीडियो एप की सफलता है |  
सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है |मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के पुनरुत्पाद से है जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है |इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है जिससे मुनाफा बढ़ा है |भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है |पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर टोरेंट वेबसाईट पर विश्वव्यापी रोक लगने से अब भारत में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं |ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं |सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज –रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है |ऑडियो –वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार –बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं | मुसो की ही रिपोर्ट के मुताबिक पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है जिसका कुल पाइरेसी में योगदान लगभग बत्तीस   दशमलव पांच प्रतिशत है दूसरे नम्बर पर पब्लिक टोरेंट उसके बाद वेब डाउनलोड ,प्राइवेट टोरेंट और स्ट्रीम रिपर्स शामिल हैं |भारत जैसे देश जो पाइरेसी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं वहां नेट की उपलब्धता का विस्तार पाइरेसी की समस्या को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं कर सकता पर कम जरुर करेगा क्योंकि भारत में डेस्कटॉप के मुकाबले स्मार्टफोन की संख्या लगातार बढ़ रही है |रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व में ऑनलाइन पाइरेसी शामिल चौसठ प्रतिशत लोग डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से  पाइरेसी साईट पर जाते हैं वहीं मोबाईल फोन से इन साईट्स पर जाने वाले लोगों की संख्या मात्र पैंतीस प्रतिशत है |
हिन्दुस्तान में 28/06/17 को प्रकाशित लेख 

हम मानने को तैयार नहीं

जीवन के  दो युग आमने सामने हैं|मेरा चौदह वर्षीय बेटा अक्सर शीशे के सामने खड़ा होकर अपने आप को निहारा करता है अपनी उगती हुई हल्की दाढ़ी पर हाथ फेर कर पूछता है मैं कब शेव करूँगा ?और उसी वक्त मैं भी उसी शीशे के सामने अपने बचे हुए बालों को समेटते हुए उनको रंगने की जद्दोजहद में लगा रहता हूँ जिससे अपनी बढ़ती उम्र को छुपा सकूँ |बाल तो ठीक है पर पकी हुई दाढी को कितना भी क्यों न रंग लो एक दो बाल छूट ही जाते हैं जो आपकी बढ़ती हुई उम्र की चुगली कर ही देते हैं |मैं और मेरा बेटा उम्र के एक ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं जहाँ हम जो हैं वो मानने को तैयार नहीं है वो अब किशोरावास्था में है जब बच्चों के लिए बड़ा हो गया है और जवानों के लिए बच्चा ही है |उसका बाप यानि मैं अपनी जवानी की उम्र छोड़ आया है पर बुढ़ापा अभी आया नहीं है दोनों उम्र के जिस मुकाम पर हैं उसे बदलना चाहते हैं |मैं अपने सफ़ेद बालों को काले रंग से जिससे लोग मुझे अधेड़ न मानें और बेटा जल्दी से जल्दी दाढी उगा कर बड़ा हो जाना चाहता है | एक आगे निकल जाना चाहता है और एक पीछे लौटना चाहता है | दोनों ही दौर थोड़े मुश्किल होते हैं पर जहाँ किशोरवस्था में सपने  उम्मीदें और आने वाले एक बेहतर कल का भरोसा होता है वहीं चालीस पार का जीवन थोडा परेशान करता है |जिन्दगी का मतलब रिश्तों के साथ से होता है पर उम्र के इस पड़ाव पर इंसान का सबसे पहला करीबी रिश्ता  टूटता है यानि माता –पिता या तो वो जा चुके होते हैं या उम्र के ऐसे मुकाम  पर होते हैं जब कभी भी कोई बुरी खबर आ सकती है | जिन्दगी में एक अजीब तरह की स्थिरता आ चुकी होती है (अपवादों को छोड़कर) जहाँ से आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आप कितनी दूर और जायेंगे |इस चालीस पार के जीवन में वो बातें अब अजीब लगती हैं जिनका हमने खुद अपने चौदह पार के जीवन (किशोरावस्था ) में बड़े मजे से लुत्फ़ उठाया था जैसे जोर जोर से गाने सुनना और बार –बार शीशे में चेहरा देखना |बेटे को जल्दी है ये समय जल्दी से बीत जाए और वो बड़ा हो जाए |मैं समय को रोक देना चाहता हूँ ताकि कुछ समय और मिल जाए |इन दिनों मुझे लखनऊ के शायर मीर अनीस साहब का एक शेर ज्यादा याद आता है “दुनिया भी अजब सराय फानी देखी,हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी,जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा,जो जाके ना आये वो जवानी देखी |
प्रभात खबर में 28/06/17को प्रकाशित 

Thursday, June 15, 2017

कैसे कारगर हो कूड़ा प्रबंधन

आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ ही कूड़े की समस्या मानव सभ्यता के साथ आयी |जब तक यह प्रव्रत्ति प्रकृति सापेक्ष थी परेशानी की कोई बात नहीं रही पर इंसान जैसे जैसे प्रकृति को चुनौती देता गया कूड़ा प्रबंधन एक गंभीर समस्या में तब्दील होता गया क्योंकि मानव ऐसा कूड़ा छोड़ रहा था जो प्रकृतिक तरीके से समाप्त  नहीं होता या जिसके क्षय में पर्याप्त समय लगता है और उसी बीच कई गुना और कूड़ा इकट्ठा हो जाता है जो इस प्रक्रिया को और लम्बा कर देता है जिससे कई तरह के प्रदुषण का जन्म होता है और साफ़ सफाई की समस्या उत्पन्न होती है |भारत ऐसे में दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहा है एक प्रदूषण और दूसरी स्वच्छता की | वेस्ट टू एनर्जी  रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक  शोध के मुताबिक  भारत में अपर्याप्त कूड़ा  प्रबन्धन  बाईस तरह की बीमारियों का वाहक बनता है |कूड़े में  पौलीथीन एक ऐसा ही उत्पाद है जिसका भारत जैसे विकासशील देश में बहुतायत से उपयोग होता है पर जब यह पौलीथीन कूड़े में तब्दील हो जाती है तब इसके निस्तारण की कोई ठोस योजना हमारे पास नहीं है |लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में भारत सरकार  ने बताया देश में पंद्रह हजार टन प्लास्टिक कूड़ा पैदा होता है जिसमें से छ हजार टन उठाया नहीं जाता है और वह ऐसे ही बिखरा रहता है |पिछले एक दशक  में भारतीय रहन सहन में पर्याप्त बदलाव आये हैं और लोग प्लास्टिक की बोतल और प्लास्टिक में लिपटे हुए उत्पाद सुविधाजनक होने के कारण ज्यादा प्रयोग करने लग गए हैं |केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2014-15 में 51.4 मिलीयन टन ठोस कूड़ा निकला जिसमें से इक्यानबे प्रतिशत इकट्ठा कर लिया गया जिसमें से मात्र सत्ताईस प्रतिशत का निस्तारण किया गया शेष तिहत्तर प्रतिशत कूड़े को डंपिंग साईट्स में दबा दिया गया इस ठोस कूड़े में बड़ी मात्रा पौलीथीन की है जो जमीन के अंदर जमीन की उर्वरा शक्ति को प्रभावित कर उसे प्रदूषित कर रही है | भारत सरकार की स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट” के अनुसार  देश में कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) एक बड़ी समस्या है | इस रिपोर्ट में भारतीय आंकड़ा सर्वेक्षण कार्यालय (एन एस एस ओ ) से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया गया है |ग्रामीण भारत में तरल कूड़े के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं है जिसमें मानव मल भी शामिल है देश के 56.4 प्रतिशत शहरी वार्ड में सीवर की व्यवस्था का प्रावधान है आंकड़ों के मुताबिक़ देश का अस्सी प्रतिशत कूड़ा नदियों तालाबों और झीलों में बहा दिया जाता है|यह तरल कूड़ा पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर देता है|यह एक गम्भीर समस्या है क्योंकि भूजल ही पेयजल का प्राथमिक स्रोत है |प्रदूषित पेयजल स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की समस्याएं पैदा करता है जिसका असर देश के मानव संसधान पर भी पड़ता है |गाँवों में कूड़ा प्रबंधन का कोई तंत्र नहीं है लोग कूड़ा या तो घर के बाहर या खेतों ऐसे ही में डाल देते हैं |शहरों की हालत गाँवों से थोड़ी बेहतर है जहाँ 64 प्रतिशत वार्डों में कूड़ा फेंकने की जगह निर्धारित है लेकिन उसमें से मात्र 48 प्रतिशत ही रोज साफ़ किये जाते हैं |देश के तैंतालीस प्रतिशत शहरी वार्ड में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने की सुविधा उपलब्ध है | कूड़ा और मल का अगर उचित प्रबंधन नहीं हो रहा है तो भारत कभी स्वच्छ नहीं हो पायेगा |दिल्ली और मुंबई  जैसे भारत के बड़े महानगर वैसे ही जगह की कमी का सामना कर रहे हैं वहां कूड़ा एकत्र करने की कोई उपयुक्त जगह नहीं है ऐसे में कूड़ा किसी एक खाली जगह डाला जाने लगता है वो धीरे –धीरे कूड़े के पहाड़ में तब्दील होने लग जाता है और फिर यही कूड़ा हवा के साथ उड़कर या अन्य कारणों से साफ़ –सफाई को प्रभावित करता है जिससे पहले हुई सफाई का कोई मतलब नहीं रहा जाता |उसी कड़ी में ई कूड़ा भी शामिल है | ई-कचरा या ई वेस्ट एक ऐसा शब्द है जो तरक्की के इस प्रतीक के दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है वह पहलू है पर्यावरण की बर्बादी । भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग ४ लाख टन ई-कचरा उत्पन्न होता है. राज्यसभा सचिवालय द्वारा  'ई-वेस्ट इन इंडियाके नाम से प्रकाशित एक दस्तावेज के अनुसार भारत में उत्पन्न होने वाले कुल ई-कचरे का लगभग सत्तर प्रतिशत केवल दस  राज्यों और लगभग साठ प्रतिशत कुल पैंसठ शहरों से आता है| दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में ई-कचरे के उत्पादन में मामले में महाराष्ट्र और तमिल नाडु जैसे समृृद्ध राज्य और मुंबई और दिल्ली जैसे महानगर अव्वल हैं | एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का लगभग ९० प्रतिशत ई-कचरा असंगठित क्षेत्र केअप्रशिक्षित लोगों द्वारा निस्तारित किया जाता है| 
अमर उजाला में 15/06/17 को प्रकाशित 

Wednesday, May 31, 2017

सूचना,शिक्षा और मनोरंजन का मतलब सिर्फ इंटरनेट

मार्शल मैक्लुहान ने जब 1964 में जब “माध्यम ही संदेश है” जैसा क्रांतिकारी वाक्य दुनिया को दिया था तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी उनका यह कथन कैसे आने वाले वक्त में जनमाध्यमों की दशा –दिशा तय करने वाला हो जाएगा |सच यह है कि किसी भी वक्त में कौन सा जनमाध्यम लोगों के बीच लोकप्रिय होगा यह उस वक्त के समाज  के तकनीकी चरित्र पर निर्भर करेगा |मतलब समाज में उस जनमाध्यम  का बहुतायत में प्रयोग किया जाएगा जिसकी तकनीक बहुसंख्यक वर्ग तक उपलब्ध होगी |भारत में अखबार ,रेडियो  से शुरू हुआ यह सिलसिला टीवी से होता हुआ इंटरनेट तक आ पहुंचा |लम्बे वक्त तक रेडियो भारत में  रेडियो ने एकछत्र राज किया फिर उसे टीवी से चुनौती मिली |भारत में टेलीविजन चैनल क्रांति अभी पैर पसार ही रही थी कि इंटरनेट के आगमन ने विशेषकर मोबाईल इंटरनेट ने   खेल के सारे मानक ही बदल दिए |अब सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का मतलब सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट हो गया है और भारत अपवाद नहीं है |एक्सेन्चर कम्पनी का डिजीटल कंज्यूमर सर्वे “विनिंग एक्सपीरियंस इन द न्यू वीडियो वर्ल्ड” यह बता रहा है कि सारी दुनिया में चित्र और ध्वनि माध्यम के रूप में टेलीविजन तेजी से अपनी लोकप्रियता खो रहा है और लोग डिजीटल प्लेटफोर्म (कंप्यूटर और स्मार्ट फोन ) पर टीवी के कार्यक्रम  देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं 2016 में 52 प्रतिशत व्यक्ति टीवी के कार्यक्रम देखने के लिए टेलीविजन  का इस्तेमाल अपने पसंदीदा उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहे  थे 2017 में यह आंकड़ा गिरकर 23 प्रतिशत रह गया यानी कुल 55 प्रतिशत की गिरावट आई|इसी तरह  2016 में 32 प्रतिशत लोग टेलीविजन के कार्यक्रम देखने के लिए अपने पसंदीदा उपकरण के रूप में लैपटॉप और कंप्यूटर का प्रयोग कर रहे थे और यह आंकड़ा 2017 में बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया है | इस सर्वे में दुनिया के छब्बीस देशों के छब्बीस हजार लोगों ने हिस्सा लिया |इस सर्वे में भारत का जिक्र विशेष तौर पर है जहाँ दर्शकों का टीवी कंटेंट देखने के लिए डिजीटल डीवाईस (कंप्यूटर और स्मार्ट फोन ) का प्रयोग टीवी के मुकाबले  बहुत तेजी से हो रहा है और यह दर अमेरिका और इंग्लैण्ड जैसे विकसित देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा है |2016 के मुकाबले  इस वर्ष  भारत में यह गिरावट अठहत्तर प्रतिशत  है |दर्शकों की रूचि में आया जीवन के हर क्षेत्र में असर डाल रहा है हाल के वर्षों मे आये डिजीटल बदलाव ने जनमाध्यमों के उपयोग पैटर्न को पूरी तरह बदल कर रख दिया |माध्यमों के डिजीटल होने से पहले रेडियो और टीवी भारतीय स्थितियों  में एक सामूहिक जनमाध्यम हुआ करते थे जिसका उपभोग पूरा  परिवार साथ किया करता था और इसलिए उनके कंटेंट में सामूहिकता पर जोर रहा करता था कारण तकनीक महंगी और लोगों की प्रतिव्यक्ति आय कम थी इसलिए जनमाध्यमों का उपयोग सिर्फ माध्यम उपभोग न बनकर एक उत्सव में परिणत हो जाता था |

डिजीटल उपकरणों के प्रति बढ़ती दीवानगी इस ओर इशारा कर रही है कि भारत सामूहिकता के इस दौर से निकल कर एक ऐसे समाज में बदल रहा है जहाँ “मैं” पर जोर है इसके कारण जनमाध्यमों में  कंटेंट के स्तर पर लगातार विविधता आ रही है और सिर्फ डिजीटल उपकरणों को ध्यान में रखकर सीरियल और अन्य कार्यक्रम बन रहे हैं |शहरों में पूरे परिवार का एक साथ बैठकर टीवी देखना अब इतिहास होता जा रहा है । स्माार्टफोन और कंप्यूटर ने हमारी इन आदतों को बदल दिया है। नई पीढ़ी की दुनिया अब मोबाइल और लैपटॉप में है, जो अपना ज्यादा वक्त इन्हीं साधनों पर बीता रही है। परिवार भले ही एकल और छोटे होते जा रहे हैं पर डिजीटल उपकरणों की संख्या बढ़ती जा रही है क्योंकि डिजीटल उपकरण को लोग अपनी रुचियों के हिसाब से अनुकूलित कर सकते हैं |परम्परागत टेलीविजन यह सुविधा अपने दर्शकों को नहीं देता |पर कुछ तथ्य ऐसे भी हैं जिन पर चर्चा करना जरुरी है डिजीटल उपकरणों का अधिक प्रयोग दर्शकों को डिजीटल डिपेंडेंसी सिंड्रोम (डी डी सी ) की गिरफ्त में ला सकता है जिससे जब उन्हें इंटरनेट नहीं मिलता, तो बेचैनी होती और स्वभाव में आक्रामकता आ जाती है|डिजीटल संस्कृति अपनी अनुकूलन सुविधा के कारण इन्सान को अकेला बना रही है और टेलीविजन जैसे जनमाध्यमों के उपभोग में बदलाव की यह प्रवृति इस अकेलेपन को और बढ़ा सकती है |
नवोदय टाईम्स में 31/05/17 को प्रकाशित 

Friday, May 5, 2017

अब मौसम की खुशियाँ कहाँ

गर्मी आ गयी हैं पर इन गर्मियों में वो कशिश नहीं दिखती जो हमारे बचपन में दिखती थी न अब वैसी लू चलती है न अब गर्मी आने की वैसी तैयारी होती है जैसी हमारे जमाने में होती थी |गर्मी के आने से पहले सुराही या घड़ा खरीदा जाता था हम पिता जी की उंगली पकड़ के मंडी जाते थे जहाँ पिता जी न जाने उन घड़ों में क्या परखते थे ये हम आज तक न समझ पाए कि उन दिनों एक जैसे घड़े में क्या देखते थे |तब कूलर विलासिता की चीज थे एसी क्या होता है लोग जानते भी नहीं थे पर उन गर्मियों का इन्तजार हम साल भर करते थे शाम होते ही छत पर पहुँच जाना और उसे पानी डाल कर ठंडा करने की कोशिश करना क्योंकि तब पूरा परिवार सारी रात  उसी छत पर काटता था |सुबह सत्तू (चने का आटा) का नाश्ता किसी मैगी ,ब्रेड से ज्यादा लुभावना लगता था |हमारा शहर आज की तरह मेट्रो नहीं था वो कुछ कस्बाई रंगत लिए हुए था यानि हमारे माता पिता जो ठेठ गाँव से निकले थे और हम जैसे लोग जो उस शहर में पैदा हुए थे दोनों की दुनिया खुबसूरत थी न उन्हें शहर  की कमी खलती थी न हमें गाँव की |अब हर घर में एसी है सत्तू माल में बिकता है पर मेरा बेटा उसे डाउन मार्केट खाना समझता है उसे फास्ट फ़ूड  पसंद है जो अपने स्मार्ट फोन से मंगाना अच्छा लगता है |तपती धूप में वो अपने पिता के साथ कुछ मीटर भी नहीं चल सकता क्योंकि उसकी त्वचा खराब हो जायेगी |जंगल जलेबी उसने देखी नहीं क्योंकि वो मॉल में बिकती नहीं ऐसे न जाने कितने फल जिनको खाने के लिए हम साल भर गर्मियों का इन्तजार करते थे उसके लिए उनका कोई मायने नहीं |वो चाहे अमरख हो या कैथा या फिर खट- मिट्ठा फालसा जैसे फल जो हम जैसे गरीब परिवारों के लिए गर्मियों को उत्सव में बदल देते थे |उन दिनों हम यही फल पाकर अपने आपको खुशनसीब समझते थे |तब सनस्क्रीन नहीं होती थी और गर्मी कितनी भी क्यों न हों रात में घर की भीगी छत मस्त नींद सुला ही देती थी |अम्बार और करौंदा के अचार खाने का जायका बना देते थे |आज घर में एसी है अम्बार और करौंदा मॉल में नहीं मिलता कभी कभार फुठ्पाथ पर दिख जाता है |कैथा खाए हुए सदियाँ बीती अब मौसम बदलना जश्न मनाने का मौका नहीं होते सारा जोर मौसम के वेग को नियंत्रित करने पर होता है |छतें गायब हो गयीं आसमान में तारे गिने दशक बीत गये अब मौसम बदलने का मतलब समझ ही नहीं आता फ्रिज का ठंडा पानी और एसी की ठंडा हवा गर्मी को  महसूस नहीं होने देते शायद इसे ही मौसम का वैश्वीकरण कहते हैं जब सारे मौसम एक जैसे लगते हैं |सुख तो बहुत है पर अब बदलते मौसम वो खुशियाँ नहीं देते जैसा हमारे ज़माने में देते थे
प्रभात खबर में 05/05/2017 को प्रकाशित 

Saturday, April 29, 2017

रिश्ते चाहिए ? एप पर जाइए


वर्तमान समाज  एक एप का समाज है दुनिया  स्मार्ट फोन के रूप में हथेली में सिमट चुकी है |इंटरनेट और डेस्कटाप कम्प्यूटरों से शुरू हुआ  यह सिलसिला मोबाईल  के माध्यम से एक एप में  सिमट  चुका है पिछले एक दशक में इंटरनेट ने भारत को  जितना बदला उतना  मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में किसी और चीज ने नहीं बदला है ,यह बदलाव बहु आयामी है बोल चाल  के तौर तरीके से  शुरू हुआ यह सिलसिला  खरीददारी  ,भाषा  साहित्य  और  हमारी अन्य प्रचलित मान्यताएं और परम्पराएँ  सब  अपना रास्ता बदल रहे हैं। यह बदलाव इतना  तेज है कि इसकी नब्ज को पकड़  पाना समाज शास्त्रियों  के लिए भी आसान नहीं है  और  आज इस तेजी  के मूल में एप” ( मोबाईल एप्लीकेशन ) जैसी यांत्रिक  चीज  जिसके माध्यम से मोबाईल  फोन में  आपको किसी वेबसाईट को खोलने की जरुरत नहीं पड़ती |आने वाली पीढियां  इस  समाज को एक एप” समाज के रूप में याद  करेंगी जब  लोक और लोकाचार  को सबसे  ज्यादा  एप” प्रभावित कर रहा  था |हम हर चीज के लिए बस एक अदद एप” की तलाश  करते हैं |जीवन की जरुरी आवश्यकताओं के लिए  यह  एप” तो ठीक  था  पर  जीवन साथी  के चुनाव  और दोस्ती  जैसी भावनात्मक   और  निहायत व्यक्तिगत  जरूरतों   के लिए  दुनिया भर  के डेटिंग एप  निर्माताओं  की निगाह  में भारत सबसे  पसंदीदा जगह बन कर उभर  रहा है | उदारीकरण के पश्चात बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और रोजगार की संभावनाएं  बड़े शहरों ज्यादा बढीं ,जड़ों और रिश्तों से कटे ऐसे युवा  भावनात्मक  सम्बल पाने के लिए और ऐसे रिश्ते बनाने में जिसे वो शादी के अंजाम तक पहुंचा सकें  डेटिंग एप का सहारा ले रहे हैं |
भारत में है युवाओं की सबसे ज्यादा आबादी
संयुक्त राष्ट्र की एक  रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां 35.6 करोड़ आबादी युवा है भारत की अठाईस प्रतिशत  आबादी की आयु दस साल से चौबीस  साल के बीच है। सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में मौजूदा समय में युवाओं कीसबसे  सबसे अधिक है इसी आबादी का बड़ा हिस्सा वह है  जो स्मार्ट फोन का इस्तेमाल बगैर किसी समस्या करता है  ये तकनीक को अच्छी तरह जानते और समझते हैं |मोबाईल ख़ासा व्यक्तिगत माध्यम है और हर व्यक्ति अपनी जरूरतों के हिसाब से एप” चुनकर इंस्टाल कर सकता है |पिछले एक दशक में  शहरी भारतीय रहन सहन में ख़ासा परिवर्तन आया है और युवा जल्दी आत्म निर्भर हुए हैं जहाँ वो अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद ले रहा है |यूँ तो देश में  ऑनलाइन मैट्रीमोनी का कारोबार अगले तीन साल में 1,500 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसारवैवाहिक वेबसाइटों पर साल 2013 में 8.5 लाख प्रोफाइल अपलोड की गईजिनकी संख्या साल 2014 में बढ़कर 19.6 लाख हो गई। यानी एक साल में 130 फीसदी का इजाफा।पर डेटिंग एप का बढ़ता चलन इस ओर इशारा कर रहा है कि सम्बन्ध बनाने में भी अब लोग वेबसाईट के बजाय एप पर अधिक निर्भरता बढ़ा रहे हैं वर्तमान में डेटिंग एप  का आकार 13 करोड़ डॉलर से भी ऊपर चला गया है और जो लगातार बढ़ रहा  है। ओनलाईन डेटिंग साईट्स में अव्वल  टिंडर इंडिया का  दावा है कि उसे    एक दिन में 14 मिलियन स्वाइप्स होते हैं जो कि सितंबर 2015 में 75 लाख तक ही थे।ये डेटिंग एप अपनी प्रकृति में अलग अलग सेवाएँ देने का वायदा करते हैं वैसे भी भारतीय डेटिंग एप यहाँ की परिस्थितयों को बेहतर समझते हैं क्योंकि भारत रिश्तों और सेक्स के मामले में एक बंद समाज रहा है पर अब वो धीरे धीरे खुल रहा है |ट्रूली मैडली जैसे एप यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते  हैं कि कोई शादी शुदा  इस एप से न जुड़े वे महिलाओं की सुरक्षा का वायदा करते हैं वहीं टिनडर जैसा अन्तराष्ट्रीय ब्रांड गैर गंभीर सम्बन्धों को बढ़ावा देता है पर भारतीय डेटिंग प्लेटफोर्म शहरी भारतीयों का इस बात का भरोसा देते हैं कि आप गैर गंभीर सम्बन्धों को भविष्य में एक नाम दे सकें और अपने भविष्य के जीवन साथी को सिर्फ तस्वीर देख कर न चुने बल्कि उनके साथ एक गैर प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाएं और वक्त के साथ यह फैसला करें कि अमुक व्यक्ति एक जीवन साथी के रूप में आपके लिए बेहतर रहेगा या नहीं ,यहाँ ऐसे डेटिंग एप  ऑनलाइन मैट्रीमोनी साईट्स से एक कदम आगे निकल जाते हैं और एक उदार द्रष्टिकोण का निर्माण करते हैं जो भारतीय पारम्परिक वैवाहिक व्यवस्था से अलग एक विकल्प युवाओं को देते हैं जो जाति,धर्म और समाज से परे विवाह का आधार व्यक्ति की अपनी पसंद बनता है |इन डेटिंग एप की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑनलाइन प्लेटफार्म के अलावा ये विज्ञापनों के लिए पारम्परिक रूप से महंगे माध्यम टीवी का भी इस्तेमाल  कर रहे हैं |
तरह तरह के डेटिंग एप और उनसे जुड़े खतरे
ट्रूली मैडली, वू ,टिनडर,आई क्रश फ्लश और एश्ले मेडिसन जैसे डेटिंग एप भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं जिसमें एश्ले मेडिसन जैसे एप किसी भी तरह की मान्यताओं को नहीं मानते हैं आप विवाहित हों या अविवाहित अगर आप ऑनलाईन किसी तरह की सम्बन्ध की तलाश में हैं तो ये एप आपको भुगतान लेकर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है हालंकि डेटिंग एप का यह कल्चर अभी मेट्रो और बड़े शहरों  तक सीमित है पर जिस तरह से भारत में स्मार्ट फोन का विस्तार हो रहा है और इंटरनेट हर जगह पहुँच रहा है इनके छोटे शहरों में पहुँचते देर नहीं लगेगी |पर यह डेटिंग संस्कृति भारत में अपने तरह की  कुछ समस्याएं भी लाई है जिसमें सेक्स्युल कल्चर को बढ़ावा देना भी शामिल है |वैश्विक सॉफ्टवेयर एंटी वायरस  कंपनी नॉर्टन बाई सिमेंटेक के अनुसार ऑनलाइन डेटिंग सर्विस एप साइबर अपराधियों का मनपसंद प्लेटफार्म बन चुका है। भारत के लगभग 38 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वह ऑनलाइन डेटिंग एप्स का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति  जो मोबाइल में डेटिंग एप रखते हैउनमें से करीब 64 प्रतिशत  महिलाओं और 57 प्रतिशत  पुरुषों ने सुरक्षा संबंधी परेशानियों का सामना किया है। आपको कोई फॉलो कर रहा हैआप की पहचान चोरी होने के डरके साथ-साथ उत्पीड़ित और कैटफिशिंग के शिकार होने का खतरा बरकरार रहता है।
नवभारत टाईम्स ,में 29/04/17 को प्रकाशित 

Saturday, April 22, 2017

बदलाव की प्रक्रिया की धुरी बन रहे हैं स्मार्ट फोन

इंटरनेट  के जमाने में देश में  बदलाव की प्रक्रिया की धुरी बन रहे हैं स्मार्ट फोन|भारत में ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा देने में इंटरनेट आधारित स्मार्टफोन की बड़ी भूमिका है,खरीद प्रक्रिया का यह बदलाव सबसे ज्यादा स्मार्टफोन की खरीद को प्रभावित कर रहा है|मार्केट इंटेलिजेंस फर्म काउंटर प्वाईंट रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले साल हर तीन में से एक स्मार्ट फोन की खरीद ऑनलाइन की गयी,जिसमें नब्बे प्रतिशत फोन ऑनलाईन शौपिंग प्लेटफार्म फ्लिप्कार्ट ,स्नेपडील और अमेजन द्वारा बेचे गये|कुल बेचे गए स्मार्टफोन में से साढ़े सैतालीस प्रतिशत अकेले फ्लिप्कार्ट कम्पनी द्वारा बेचे गये |पिछले साल की चौथी तिमाही (अक्तूबर –दिसम्बर ) में भारत अमेरिका को पिछाड कर दुनिया में  चीन के बाद दूसरे नम्बर पर  सबसे ज्यादा स्मार्टफोन धारकों का देश बन चुका है पर भारत के स्मार्ट फोन बाजार में अभी भी असीमित संभावनाएं हैं क्योंकि भारत में अभी दस मोबाईल फोन में से मात्र चार ही स्मार्ट फोन हैं और यह आंकड़ा विकसित देशों के स्मार्टफोन धारकों के मुकाबले काफी कम है |स्मार्ट फोन की बढ़ोत्तरी ऑनलाईन शौपिंग को बढ़ावा दे रही है इस ओनलाईन खरीद के कारोबार  में मोबाईल फोन का एक बड़ा हिस्सा है |ऑनलाईन विक्रेता नए मोबाईल मॉडल पर जहाँ ज्यादा डिस्काउंट देते हैं वहीं अनेक ऑफर के साथ खरीददारों को भी लुभाते हैं |यदि आप फोन से नहीं संतुष्ट हैं तो उसे आसानी से एक मेल या फोन काल पर एक माह के भीतर आसानी से लौटा भी सकते हैं जिसमें पैसे के नुक्सान होने की संभावना भी नहीं रहती है|शोध संस्था नाइंटीवन मोबाईल्स डॉट कॉम के एक शोध में यह बात सामने आयी है कि ऑनलाईन मोबाईल की खरीद पर कीमत  परम्परागत मोबाईल दुकानों के मुकाबले औसत रूप से पांच प्रतिशत कम रहती है| वहीं मोबाईल दुकानों पर वापस करना खासा सिरदर्द का काम रहता है पैसा वापस नहीं मिलेगा आपको तुरंत कोई दूसरा मोबाईल खरीदना पड़ेगा |परम्परागत दुकानों में ज्यादा विकल्प नहीं रहते हैं जबकि ओनलाईन खरीद में क्रेता के पास असीमित विकल्प रहते हैं,यदि आप वहां से खरीदी हुई चीज वापस भी कर रहे हैं तो भी आपका पैसा सुरक्षित है आप या तो पैसा वापस ले सकते हैं या उस ऑनलाईन स्टोर पर कोई भी चीज उसी पैसे में कभी भी खरीद सकते हैं |ऑनलाईन स्टोर में परम्परागत दुकानों के मुकाबले वितरण लागत में काफी कमी हो जाती है ये एक बड़ा कारण है कि लोग मोबाईल फोन ऑनलाइन खरीदना पसंद कर रहे हैं |यह एक द्वीपक्षीय प्रक्रिया ई कॉमर्स जहाँ स्मार्ट फोन की ऑनलाइन बिक्री बढ़ा रहा है वहीं स्मार्ट फोन की बढ़ती संख्या ई कॉमर्स के कारोबार को बढ़ा रही है | तस्वीर का दूसरा रुख भी है कम्पनियों के लाख दावों के बावजूद ऐसे लोगों की भी काफी संख्या है जिन लोगों ने ऑनलाईन खराब इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खरीदा और उसे वापस करने में उन्हें खासी परेशानी और मानसिक संत्रास झेलना पडा |दुकान से खरीदी चीजों को तुरंत वापस कर उसके बदले दूसरी चीजें प्राप्त की जा सकती है|हमें इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ इंटरनेट की आधारभूत संरचना विकसित देशों के मुकाबले काफी पिछड़ी है ग्रामीण इलाकों में स्मार्ट फोन का अधिकतर  इस्तेमाल सिर्फ फ़िल्में देखने और गाने सुनने में ही किया जा रहा है|इन इलाकों में स्मार्ट फोन का स्मार्ट इस्तेमाल तब ही हो पायेगा जब समुचित इंटरनेट की उपलब्धता मिलेगी |
नवोदय टाईम्स में 22/04/17 को प्रकाशित लेख 

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